Category: हिन्दी-उर्दू कविता
सपनों में बच्चे देखना सुखद हो सकता है ; लेकिन ; बच्चों में सपने देखना आपकी भूल है जैसे; सपने…… सिर्फ़ सपने बच्चे : साकार नहीं करते वैसे ही; बच्चों में सपने साकार करना फिजूल […]
लबों पर जब कोई आता है अक्सर! रगों में कोई उतर जाता है अक्सर! उम्र बीत जाती है जिसकी यादों में, गली से तेरी मुकर जाता है अक्सर! Composed By #महादेव
ღღ__कभी फुरसत मिले जो ‘साहब’, तो पूरी ये अहद कर दो; . कुछ इस हद तक मुझे चाहो, कि बस “हद” कर दो !!…..#अक्स .
आँखों में रखा बुलंदिओं का जोश है यहाँ हर इंसा खुद में मदहोश है वहां से निकल तो आया था जहाँ शोर था कैसे निकलू जो अपने ही अंदर सरफ़रोश है कौन सी दुनिया को […]
aankhon mein rakha bulandion ka josh hai yahan har insaa khud mein madhosh hai wahan se nikal to aaya tha jahan shor tha kaise nikaloon jo apne hi ander sarfarosh hai kaun si duniya ko […]
!!!! SAGAR KE DIL SE !!!! patjhar main bhi kuch patte shakho par reh jaate hai bhure waqt main bhi kuch dost saath nibha jaate hai maut se sangharsh aur jeewan se pare ek naya […]
!!!! SAGAR KE DIL SE !!!! phir ek baar sagar shant hai kisi khaas lehar ka intzaar hai baitha hun baahain failaaye kinaare par dil uss se aalingan karne ko baitaab hai @@ SAGAR @@ […]
जब अंधे;आपस में मिल बैठकर , : संध्या बांचते हैं कुत्ते : पत्तल चाटते हैं……….. यही तो है ; हमारी व्यवस्था ! कि; अंतिम पंक्ति का अंतिम व्यक्ति डरा–सहमा जड रह जाता है उसे धकिया […]
Ummar ho gayi Par wo nahi dekh paya kabhi Jo bachpan main dekha payar Maa ki aankhon main Wo ahsaas aaj bhi mujhe Skoon deta hai Aaj bhi maa ko mere paasa Hone ka saboot […]
बनाया है खुदा ने इन्सान को दुनिया बनाने के लिए मगर देखिए क्या हो रहा है दुनिया में लगा है इन्सान खुद को बनाने में!
हासिल कुछ भी नहीं नफरतों से क्यों खेलते हो फिर जज्बातों से जब इंसा ही इंसा का दुश्मन हो क्या मिलेगा किसी को इबादतों से राजेश’अरमान’
कमबख्त दिल सब समझता है खुद दिल से दूरियां रखते है वज़ूद सामने होता है लेकिन खुद को बहरूपिया रखते है राजेश’अरमान’
ღღ___बहुत सुना था ऐ इश्क़, तेरे बारे में लोगों से; . देख सांसों की ज़मानत पे, मैं तुझसे मिलने आया हूँ !!…..#अक्स .
सत्ता और सुन्दरी एक ही सिक्के के दो पहलू दोनों का चरित्र : दलबदलू इक- दूजे के बिना अधूरे दोनों प्रतिबध्द परस्पर पूरे आदमी के लिए ; ———– दोनों ही निहायत जरुरी दोनों का वशीकरण […]
मुस्लमान बनके बांटो या हिन्दू होके बांटो ,, पर दोस्त , केवल रोटी के ही टुकड़े हर घर में बांटो ……!! […]
आंसू तेरी भी रही होगी कोई कहानी कही सोचता हु कभी-कभी में, की ऐ आंसू , तेरी भी तो रही होगी कोई कहानी कही , दुःख में सुख में आ जाता है तू हर घड़ी […]
भारत! अब न भारद्वाज कि भारत रही न अकबर की हिन्दुस्तान एक कलियुग का सुदामा हाथों मे दिया लिए हुए हिन्दुस्तान ढूढ़ रहा था कचरे कि ढेर मे उसकी उंगलीयाँ थिरक रही थि और भारत! […]
सिकुड़कर फटि हुई कपड़ो मे गठरीनुमा होता जारहा है वह मायुस सा आँखो मे प्रचुर गम्भीरता लिए हुवे जैसे मजबूर मुक पशु हो पडा है फुटपाथ मे इसे देख अपने बदन के सुटको उतार फेकनेको […]
न हुई सुबह न कभी रात इस दिल ए शहर में कितने ही सूरज उगे कितने ही ढलते रहे
baithaa huaa thaa main niruttar sa hokarr– ki,kisi ki aawaaz aayee puchha — to kahaa main hu ” Tanhaai”—aapka sath nibhaane ko aayee shunytaa si hotho pe khillkhilaahat ne dhakk jamaaii hasi aayee— kahaa Maine […]
किसी नदी का सिर्फ़ नदी होना ही पर्याप्त नहीं होता ॰ किसी भी नदी का जीवन बहुत लंबा नहीं होता बेशक; लंबा हो सकता है : रास्ता , न, ही ……………….. शेष रह जाता है […]
जिनके आने से पहले, मौसम का गुमाँ हो जाता था आज वो खुद ही हो गए, इक मौसम की तरह राजेश’अरमान’
इम्तिहाँ लेते है वो कुछ इस अंदाज़ से आता हुआ जवाब भी हम भूल जाते है राजेश’अरमान’
अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है ये चादर जरा आहिस्ते से संभल कर ही हटाना ये फूलों से नहीं ,चुभते काटों से सजी मजार […]
सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की और हमें सच बोलते […]
आराईश अपने अंदर की तो हम अब खो चुके है तलाश आलम की करते फिरते रहने को नासबूर है परस्तिश बन्दे की हो या फिर ख़ुदा की हो बस कुछ न कुछ मांगने का अजीब […]
मेरी खिड़की से कोई ख्वाब निकल फिर खो गया इन हवाओं में अब मैं खिड़की बंद रखने लगा अब ख्वाब आते है भागते भी नहीं बस इक घुटन सी फैलती है उनके साथ रहने से […]
आए न रास किश्तों के क़त्ल ,क़त्ल हो तो एक बार हो मेरे क़ातिल दुआ मेरी ,तेरे खंजर की न खत्म कभी धार हो देते है खुद को धोखा ,औरो के फरेब से क्या बच […]
अनंत की खोज व्याकुल सा कण कण मन चंचल अपार चिंतन जिजीविषा मृतप्राय अपने होने का अभिप्राय एक खोज अनंत की निष्कर्ष मरीचिका एक खोज मोक्ष की निष्कर्ष अज्ञात एक खोज सृष्टि की निष्कर्ष मौन […]
वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे कौन समझा है इन […]
दोस्त बचपन के याद बहुत आते है जब बिछड़ जाते है कहां बयां हो पाते है जज्बात लफ़्जों में अधूरे ही रह जाते है मुकम्मल होने की हसरत में शरारतें, मस्ती जिनसे होती थी मुकम्मल […]
दर्द के चरागों को बुझने का कोई बसेरा दे दो ग़ुम हुए लोगों को कोई इक नया चेहरा दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा […]
दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब […]
है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है, गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है यूँ […]
मेरे अस्तित्व के इर्दगिर्द बैठे है कई जाल मकड़ी के भेदना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे सत्य के इर्दगिर्द बैठे है असत्य के पंछी उड़ाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे मन के इर्दगिर्द बैठे है […]
अनुभूति से ओतप्रोत जीवन चलता है जैसे कोई लहर जैसे कोई झोँका जैसे कोई मौसम बस अनुभूति ही तो है अनुभूति से परे अपने भीतर का अपने मन का अपने अंतर्द्वंद का कोई नाता होता […]
तुम एक परिणाम हो तुम क्रिया नहीं हो सृष्टि एक क्रिया है जो रची गयी है रचने की क्रिया एक अलोकिक सत्य है प्रकृति ,पानी .वायु ,अग्नि सब परिणाम है बस तुम्हारी तरह तुम भयभीत […]
गैरों से क्या करें शिकायत अपनों से ही मिली तिज़ारत रूसवाइयां तेरी साथ लेकर कर लेंगे इस जहाँ से रुखसत राजेश ‘अरमान’…
हम भी है तुम भी हो ,पर ये सहारे बदल गए लहरें तो वही है मगर ये किनारे बदल गए लोग पत्थर के बन गए है , ,दिल हमारे है आईने हम तो अब भी […]
गर निकल पड़े जो सफर को देख मुड़ के न फिर डगर को आएँगे यूँ तो कई विघ्न पड़ेंगे देखने कई दुर्दिन हौसला हो साथ अगर हो जायेंगे ये छिन-भिन्न तट से जो भटक गई […]
निकला ढूंढने अपने दुश्मन को कोई मिला नहीं टटोला जो अपने मन को पहचान गया अपने दुश्मन को राजेश ‘अरमान’