हासिल कुछ भी नहीं नफरतों से क्यों खेलते हो फिर जज्बातों से जब इंसा ही इंसा का दुश्मन हो क्या मिलेगा किसी को इबादतों से                     राजेश’अरमान’

सत्ता और सुन्दरी एक ही सिक्के के दो पहलू दोनों का चरित्र : दलबदलू इक- दूजे के बिना अधूरे दोनों प्रतिबध्द परस्पर पूरे आदमी के लिए ; ———– दोनों ही निहायत जरुरी दोनों का वशीकरण […]

भारत! अब न भारद्वाज कि भारत रही न अकबर की हिन्दुस्तान एक कलियुग का सुदामा हाथों मे दिया लिए हुए हिन्दुस्तान ढूढ़ रहा था कचरे कि ढेर मे उसकी उंगलीयाँ थिरक रही थि और भारत! […]

सिकुड़कर फटि हुई कपड़ो मे गठरीनुमा होता जारहा है वह मायुस सा आँखो मे प्रचुर गम्भीरता लिए हुवे जैसे मजबूर मुक पशु हो पडा है फुटपाथ मे इसे देख अपने बदन के सुटको उतार फेकनेको […]

किसी नदी का सिर्फ़ नदी होना ही पर्याप्त नहीं होता ॰ किसी भी नदी का जीवन बहुत लंबा नहीं होता बेशक; लंबा हो सकता है : रास्ता , न, ही ……………….. शेष रह जाता है […]

अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है ये चादर जरा आहिस्ते से संभल कर ही हटाना ये फूलों से नहीं ,चुभते काटों से सजी मजार […]

सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की और हमें सच बोलते […]

आराईश अपने अंदर की तो हम अब खो चुके है तलाश आलम की करते फिरते रहने को नासबूर है परस्तिश बन्दे की हो या फिर ख़ुदा की हो बस कुछ न कुछ मांगने का अजीब […]

मेरी खिड़की से कोई ख्वाब निकल फिर खो गया इन हवाओं में अब मैं खिड़की बंद रखने लगा अब ख्वाब आते है भागते भी नहीं बस इक घुटन सी फैलती है उनके साथ रहने से […]

आए न रास किश्तों के क़त्ल ,क़त्ल हो तो एक बार हो मेरे क़ातिल दुआ मेरी ,तेरे खंजर की न खत्म कभी धार हो देते है खुद को धोखा ,औरो के फरेब से क्या बच […]

अनंत की खोज व्याकुल सा कण कण मन चंचल अपार चिंतन जिजीविषा मृतप्राय अपने होने का अभिप्राय एक खोज अनंत की निष्कर्ष मरीचिका एक खोज मोक्ष की निष्कर्ष अज्ञात एक खोज सृष्टि की निष्कर्ष मौन […]

वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे कौन समझा है इन […]

दोस्त बचपन के याद बहुत आते है जब बिछड़ जाते है कहां बयां हो पाते है जज्बात लफ़्जों में अधूरे ही रह जाते है मुकम्मल होने की हसरत में शरारतें, मस्ती जिनसे होती थी मुकम्मल […]

दर्द के चरागों को बुझने का कोई बसेरा दे दो ग़ुम हुए लोगों को कोई इक नया चेहरा दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा […]

दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब […]

है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है, गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है यूँ […]

मेरे अस्तित्व के इर्दगिर्द बैठे है कई जाल मकड़ी के भेदना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे सत्य के इर्दगिर्द बैठे है असत्य के पंछी उड़ाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे मन के इर्दगिर्द बैठे है […]

अनुभूति से ओतप्रोत जीवन चलता है जैसे कोई लहर जैसे कोई झोँका जैसे कोई मौसम बस अनुभूति ही तो है अनुभूति से परे अपने भीतर का अपने मन का अपने अंतर्द्वंद का कोई नाता होता […]

तुम एक परिणाम हो तुम क्रिया नहीं हो सृष्टि एक क्रिया है जो रची गयी है रचने की क्रिया एक अलोकिक सत्य है प्रकृति ,पानी .वायु ,अग्नि सब परिणाम है बस तुम्हारी तरह तुम भयभीत […]

गर निकल पड़े जो सफर को देख मुड़ के न फिर डगर को आएँगे यूँ तो कई विघ्न पड़ेंगे देखने कई दुर्दिन हौसला हो साथ अगर हो जायेंगे ये छिन-भिन्न तट से जो भटक गई […]

तुम महज एक तस्वीर हो मैं जानता हूँ कि, तुम महज इक तस्वीर हो ओर उससे आगे कुछ भी नहीं मगर दिल ये कहता है तुम महज इक तस्वीर नहीं हो सुना था तस्वीरें बोला […]

मेरे ज़ख्मों का खाता इक दिन नीलाम हो गया दुश्मनों को मिला न हिसाब और इन्तेक़ाम हो गया वाबस्ता थे जिन चेहरों से ,जो थे मेरे रात दिन उनके चेहरों का रंग सारे शहर में […]

बेशक; तुम खरीद लोगे! ……………… बिछाओगे निचोड़ कर फेंक दोगे; मुझे : एक हिकारत के साथ….. लेकिन; फिर भी हार जाओगे ! हाँफती साँसों से यकीनन : कैसे पार पाओगे ? पीड़ा और समर्पण से […]

**************************************************** खेल खेलते थे तब भी हम आज भी खेलते है बस नियम बदल गये कुछ नीयत भी बदल गयी भागते रहते थे तब भी हम हर तरफ़, चारो तरफ़ आज भी भागते है मगर […]

  मैं तितलियों की तरह उड़ना चाहती थी मैं फूलों की तरह मुस्काना चाहती थी मैं इंद्रधनुष के रंगों सा बिखरना चाहती थी पर……… ज़िम्मेदारियों की ज़जीरों ने मुझे कैद कर लिया घर गृहस्ती की […]

मंज़िल मुस्कुराते हुए तुम चलते चलो, गुनगुनाते तुम बढ़ते चलो, मंज़िल तुम्हारा इंतज़ार कर रही है हर मोड़ पर, तुम बस कदम संभाले चलते चलो, रास्ता मुश्किल जितना होगा, उतना सुन्दर परिणाम मिलेगा, ये बात […]

ढूंढ़ता बचपन ? बस ऐ,ज़िन्दगी मुझे मेरा बचपन लौटा दे। Nishit Lodha मुझे मेरा वो हस्ता हुआ कल लौटा दे, आंसू दे मुझको, पर उन्हें पोछने वाला वो आँचल लौट दे। ढूंढता हु में आज […]