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मासूम खिज़राबादी

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मासूम खिज़राबादी

@मासूम खिज़राबादी • Joined Jan 2017 • Active 5 years ago

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by मासूम खिज़राबादी

सफाई-अभियान

March 10, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

कितनी ही बार

हमारे college में

NSS के तहत

Cleanliness drive का

प्रोग्राम चलाया गया

और हाँ

कुछ दिनों पहले ही

हमारे PM

मोदी जी ने भी

स्वच्छता को लेकर

देश भर में

सफाई–अभियान चलाया

College में NSS Volunteers ने

खूब हो–हल्ला मचाया

और देश भर में भी

जगह–जगह पर

लोगों ने खूब जोर लगाया…..,

 

और क्या खूब नज़ारा

साफ–सफाई का

मेंने यहां और वहां का पाया….,

 

यहां तो

सफाई का करतब

केवल NSS की

Cleanliness drive तक ही

सीमित रह गया

और वहां का मंज़र

न्यूज़ चैनलों

और अखबारों की

सुर्ख़ियाँ बनकर

काफी वाह–वाह पा गया,

काफी दिनों की

चर्चाओं में भी आ गया

लेकिन जैसे ही

पुरानी हुई

TV-अखबारों कि खबरें

वैसे ही

ये नितांत आवश्यक

सफाई–अभियान भी

पुराना होता चला गया….,

 

 

काफी कचरा साफ भी हुआ

लेकिन

दिखावेपन के नखरे में ही

ज्यादा काम हुआ

आस–पास को

साफ सुथरा रखने के लहजे में

ज्यादा कुछ न हुआ….,

 

इस अभियान का

पूरा असर

न होने में,

मेंने दूसरों को तो

कसूरवार ठहराया

लेकिन फिर

मामला गौर से परखने पर

मेंने खुद को भी

कहीं न कहीं

इसमें दोषी पाया

और फिर

समझकर अर्थ और जरूरत

साफ–सफाई की

एक कदम मेंने भी

इस अभियान में

सच में बढ़ाया….,

 

“वातावरण को रखकर साफ–स्वच्छ

रहोगे तुम हमेशा स्वस्थ

ये मेरा दावा है

और ये सफाई–अभियान

कोई दिखावा नहीं

क्योंकि साफ–सुथरा वातावरण तो

हमारे स्वस्थ जीवन खातिर

हमारा स्वच्छ पहनावा है”।

                       

                                                                                       – कुमार बन्टी

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by मासूम खिज़राबादी

कानून के कुछ रखवाले

March 7, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

कानून के कुछ रखवाले

खूब ख्याल रखते हैं

कानून का

खूब रक्षा करते हैं

कानून की

खास नज़र रखते हैं

इस बात की

कि कहीं ये कानून

“न्याय” का साथ तो नहीं दे रहा

इस तरह का कोई

घोर “अन्याय” तो नहीं हो रहा

 

 दरअसल “न्याय” के मायने

उनके लिये

कुछ अलग ही होते हैं

एक अलग ही

“न्याय की किताब”

वें अपने तकिये तले

रखकर सोतें हैं

 

ये रखवाले

इतने मेहनती होते हैं

कि सिपाही बनने खातिर

कुछ भी करने को

तैयार रहते हैं

यहां तक कि

“रिश्वत देने को भी”

इनके हिसाब से

खुद का उद्धार करना ही

“न्याय” है

जिसके लिए ये

तैयार रहते हैं

“रिश्वत लेने को भी”

 

अपने परिवार के प्रति

इतने जिम्मेदार होते हैं

कि उनके पालन-पोषण के लिए

गरीबों को भी

तबाह करने को तैयार रहते हैं

क्योंकि उसके बदले इनको

अमीरों से

मोटे पैसे जो मिल रहे होते हैं

 

 “असल न्याय” के खातिर

न कोई अपील

न दलील

और वकील तो इनमें से

कुछ खुद ही होते हैं

                                                            – कुमार बन्टी

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by मासूम खिज़राबादी

किस खतरनाक मंज़िल की तरफ

March 7, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

किसीकी मज़बूरी का उपयोग

क्या खूब

ये ज़माना कर रहा है

किस खतरनाक

मंज़िल की तरफ

इंसान अब बढ़ रहा है।

 

संतुष्टि का मतलब

स्वार्थ तक ही

सीमित रह गया

लगन वाला हुनर

अब तो बस

नौकरी पाने का

लालच बनकर रह गया।

 

मज़बूरी में ही हो रही हैं

कईयों की डिग्रियां

कईं जगह तो

हो भी रही है

इन डिग्रियों की बिक्रीयाँ।

 

मान–सम्मान का मतलब भी

अब केवल

दबदबा कायम करने तक ही

सीमित रह गया

औरो की क्या कहूँ

मैं खुद भी न जाने

जमाने की

कितनी आँधियों में बह गया

लेकिन फिर भी मैं

कम से कम ये सच तो कह गया।

 

                                                    –   कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

इनके बिना जीवन एक नाम ही है मात्र

March 6, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

माघ की इस सार्दी में

जब ये हवा चली

जो खिलती धूप की गर्माहट में

लग रही है भली।

 

जरा–से बादल

हल्की–सी हवा

कभी गरम

कभी नरम।

 

सूरज बादलों की खिड़की से

है झांक रहा

कभी–कभी सर्दी से

मैं भी हूँ कांप रहा

लेकिन फिर आते ही

धूप की चमक

मौसम दिखा रहा है

अपनी दमक।

 

पेड़ झूम रहे हैं

इस हवा में

ले रहे हैं

एक दवा वें

उस सन्नाटे भरी

सुनसानपन की

(सुनसानपन से बचने की)

जो थी भरी

उनमें कईं दिनों की।

 

धूप को सेंककर

हल्की हवा को देखकर

वें भी रहे हैं खिल

जबकि फूल आने को

अभी बाकी हैं कईं दिन

लेकिन खिला रहें हैं खुद को

(खिल रहें हैं खुद में)

 अभी से

ताकि फूल खिल सकें

सही से

और उनको

रस मिल सके

दूसरों को महकाने वाला

तभी तो

अभी से

फूलों को महकाने वाले

रस को बनाने वाले

और फूलों में चमक लाने वाले

जीवन सौंदर्य को

ये पेड़

कर रहें हैं एकत्र

इन पेड़ों के बिना

हमारा जीवन

एक नाम ही है मात्र।

 

पेड़ करते हैं

प्रकृति और जीवन को

बचाने का वादा

हम इनकी पहचान

क्यों नहीं करते

क्यों नहीं जान पाते इनका ईरादा।

 

                              –कुमार बन्टी

 

 

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by मासूम खिज़राबादी

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे

March 6, 2017 in Poetry on Picture Contest

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे

दो घूँट पानी कब मिलेगा?

बहाने मत बना

दम निकला जा रहा है

जल्दी बता

पानी कब मिलेगा

कैसे मैं अंकुरित कर दूं

अन्न के दानो को

कैसे मैं विश्वास कर लूँ

कि पानी कल मिलेगा

 

वैसे  लगता तो नहीं

कि अबकी बार

मेरी माटी को जल मिलेगा

लेकिन मैं भरोसा दिला रहा हूँ

माटी को

कि पानी जल्द ही मिलेगा

क्योंकि मैं जानता हूँ

कि इस माटी की प्यास बुझाकर ही

इस आस्मां को

सकून का कोई पल मिलेगा

 

                                                       -कुमार बंटी

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by मासूम खिज़राबादी

इतना वक़्त ही कहाँ

March 3, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

इतना वक़्त ही कहाँ मिलता है खाली मुझे

कि मैं कभी किसीसे नाराज़ हो जाऊँ।

 

अभी अपने ही कल खातिर उलझा हूँ इतना

कैसे मैं किसीका साथ आज़ हो जाऊँ।

 

सोचता हूँ कि चलते वक़्त के साथ

अपने ख्यालो की लाज़ हो जाऊँ।

 

औरों का तो मुमकिन हो या न हो

चलो अपने ही सिर का कभी ताज़ हो जाऊँ।

 

कईं बार ये भी सोचता हूँ

कि छोड़ खुदको यूँ सरेआम करना

अपने ही दिल में

खुद का हर राज़ हो जाऊँ।

 

 

फिर ये भी सोचता हूँ

कि जरूरतमंदो की

और जरूरतमंदो खातिर

कोई कामयाब आवाज़ हो जाऊँ।

 

किसीका रब बनने का गुण

मुझमे कहाँ होगा

कोशिशसार हूँ

कि अपनी तरफ़ से

बस एक सच्चा इंसान हो जाऊँ।

 

                                                                          –          कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

अधूरापन ये मेरा

March 3, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

अधूरापन ये मेरा

क्या पता

मेरे भीतर

कोई आग जला दे

और फिर कभी

मेरे भीतर कोई

 कामयाब सूरज़ उगा दे।

 

                                    –कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

पत्थर भी बन जाए पारस

March 1, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

 किसी बस

या फिर रेलगाड़ी का

अकेला सफ़र

और किसी ऊँची पहाड़ी का

चुपचाप स्वर

मेरी जगी हुई रातों का

मज़ेदार भंवर

और अभावों की जिंदगी में

मेरा मददगार सब्र

कहतें हैं मुझसे

सब मिलकर

कि तू

खुद में जा बखूबी सँवर

सुनता भी हूँ

इन सबकी

और इन्हीं के दौरान

करता हूँ

कोशिश भी

कईं बार

खुद को

कहता हूँ

खुद भी

कि सँवार के खुद को

तू बन जा

ऐसे हुनर वाला

कोई मानस

कि पत्थर भी

तेरे करीब आने से

बन जाए पारस।

                                                       –   कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

जब भी वो आ जाती है

March 1, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिंदगी में उम्मीदें

जैसे दोबारा आ जाती है

इस कदर से

खुमारी उसकी

मुझपे छा जाती है।

 

यारो तुम्हें पता है

ऐसा कब होता है?

–जब भी वो आ जाती है

जब भी वो आ जाती है।

 

वो किसीको कुछ भी

पता लगने नहीं देती

क्योंकि वो आंखों से नहीं

बल्कि पलकों के इशारों से

मुझे सब बता जाती है।

 

 

वो दिन देखे न रात

उसकी चलती है बस

जब भी वो चाहती है

बस आ जाती है।

 

जब मुझे उम्मीद नहीं होती

तब भी वो आ जाती है

शायद जब तक़दीर होती है

बस तब वो आ जाती है।

 

 

आने से पहले तो

बेशक़ ख़बर न हो उसकी

लेकिन जाने से पहले वो

मुझपे इनायत

बरसा जाती है।

 

 

 

 

 

वो तो चुपके से आकर

चुपके से चली जाती है

लेकिन मुझे चुपचाप से बेबाक

वो बना जाती है

 

सामने से मुझसे कईं बार

उसकी नजरें नहीं टकराती

और अपनी तरह मुझे भी

आँख–मिचोली सिखा जाती है।

 

जिन उलझनों से डरता मैं

भागता फिरता हूँ

उनसे वो मुझे

रब की तरह छुड़ा जाती है।

 

गुस्सा होने क तो वो

सिर्फ दिखावा करती है

थप्पड़ मारके मुझे

खुद रोकर

मुझे सता जाती है।

 

 

इतने दिनों से मेंने

बुना होता है

जो प्यार उसका

एक झटके में वो

सबके सामने

ला जाती है।

 

सोने से पहले अगर

याद न भी करुँ किसी दिन

तो भी वो सपने में आकर

अपना वजूद

बता जाती है।

 

पूछती है मुझसे

“तुमने क्यों बुलाया था मुझे”

और खुद वो बिना बताये ही

मिलने आ जाती है।

 

मुझसे, खुदसे, सबसे……,

वो अनजान बनकर आती है

लेकिन हर बार मुझपे

वो अपना निशां

बना जाती है।

 

कितनी मददगार है न वो

जिसकी खातिर हमेशा

तलबगार रहता हूँ मैं

कि वो नीँद से जगाकर मुझे

इतनी शायरी लिखा जाती है।

 

आपको तो उसकी बातें सुनके

उबासी आने लगी होगी

लेकिन मेरी तो वो

रातों की नींदें

उड़ा जाती है।

 

 

 

वैसे वो तो न जाने

अपनी तराफ से क्या चाहती है

लेकिन मेरी कायनात तो बस

उसकी मुस्कान में समाती है।

 

हर एक फिज़ा का नज़ारा

कुछ अलग ही रंग में होता है

उसके प्यारे से चहरे पे

बेहद प्यारी मुस्कान

जब आ जाती है।

 

चुपचाप ही देख लेता हूँ मैं

कईं बार तो

उसका खिलता चहरा

और मुझसे

खुशगवार मौसम की हवा

टकरा जाती है।

 

 

 

एक दिन वो

दूसरो से बोलके

अपनी मोजूदगी

मुझपे आज़मा रही थी

वो मानेगी नहीं

लेकिन मुझे तो

उसके कदमों की भी

आवाज़ आ जाती ही।

 

क़लम की स्याही

और कागज के बरखे.., ये सब

तभी कुछ काम के होते हैं

जब भी वो

शायरी बनके आ जाती है।

                                                                         –   कुमार बन्टी

 

 

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by मासूम खिज़राबादी

SHAYRI

February 27, 2017 in शेर-ओ-शायरी

बड़े से बड़े मुकाम में भी  कोई बल नहीं।

अगर जिंदगी में सकून का कोई पल नहीं।

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by मासूम खिज़राबादी

SHAYRI

February 27, 2017 in शेर-ओ-शायरी

जग में सारा का सारा ज्ञान लिखा हुआ कहां मिलता है।

ज्यादातर  ज्ञान तो  विचारों  में ही  छिपा हुआ मिलता है।

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by मासूम खिज़राबादी

सच्ची राह पे अगर….

February 27, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

सच्ची राह पे अगर  तेरा  एक कदम भी नेकी से पड़ा है।

तो  अगले ही  कदम पे  तेरा रब तेरे साथ में खड़ा है।

 

उसकी  फिक्र का  दिखावा करने वाले तो गुम हो गये

लेकिन  सच्ची  फिक्र  वाला अभी  भी  उसके  साथ में खड़ा है।

 

ऩफरत के  जबरदस्त  हमलों से भी  वो कभी न हुआ

जो कमयाब असर  अब प्रेम के अधभुत बाण से पड़ा है।

 

वो जिंदगी में  सकून कभी  किस तरह कमा सकता है

हमेशा से ही लालच का सिक्का जिसके मन में जड़ा है।

 

उद्दण्डता जो की थी पहले उसने वो अब माफ हो गई

क्योंकि अब वो  पक्केपन से  अपनी मर्यादा पे अड़ा है।

 

दोनों की परिसीमाऐं  काफी नज़दीक लगती हो लेकिन

बेवकूफी और बेकसूरी  में फर्क तो वाकई बहुत बड़ा है।

 

वो तो जिंदगी में भी कभी  मुश्किल ही  जाग पाएगा

अलार्म के बिना  जो आँख खुलने पे भी सोया पड़ा है।

 

कारीगर  या  मालिक के हुक्म पे आखिर  मरना ही है

ये  मजदूर  का  नाम   मज़दूर   यूं  ही  थोड़े  पड़ा  है।

 

जग ने उसकी तनक़ीद करने में  कोई कसर न छोड़ी

जग को सँवारने का भूत  जिस  ‘बंदे’ के सिर पे  चढा है।

 

                                                                – कुमार बन्टी

 

Tags: life, मजदूर दिवस पर हिंदी कविता, मजदूर पर हिंदी कविता 2 Comments »

by मासूम खिज़राबादी

रब  तो  वाकई  सबके  दिलों  में……..

February 27, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

रब  तो  वाकई   सबके  दिलों   में  बसता  सम  है।

लेकिन  उसे  पहचानने  वाला  इंसान  बड़ा कम है।

 

तुम  मेरे  चेहरे  की   इस  मुस्कान  पे   मत  जाओ

इसके  पीछे  छिपा  न  जाने  कितना  बड़ा  गम  है।

 

चाहे  अपना   चाहे   पराया   मतलब  अगर  न   हो

तो   किसीके   मरने  का  भी   किसे   यहां  गम  है।

 

आधुनिक तरक्की को तरक्की कहना मुनासिफ नहीं

अरे इस रोशनी की आड़ में छिपा बड़ा गहरा तम है।

 

ये  तलब  तब  बन  जाती  है   परेशानी  का  सबब

जब  जितना भी  लिख दूँ  लेकिन  लगे  ज़रा कम है।

 

समझने  की   बात  अगर  तुम   सच  में  समझ  गए

तो   फिर  कहोगे  कि  ‘बंदे’  में  वाकई  बड़ा  दम है।

                                                                        – कुमार बन्टी

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by मासूम खिज़राबादी

वक़्त की हवा

February 23, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

काश दुनियाँ में ऐसी भी कोई गलती हो

जिसे करने पर भी जिंदगी बेफिक्र चलती हो।

 

ऐसा जहां बनाने की कोशिश में हूँ

जहाँ इंसानियत सिर्फ रब से डरती हो।

 

अरे वक़्त की उस मार से क्या डरना

जो गलतफहमी को दूर करती हो।

 

ऐसी दौलत का मुझे क्या करना

जो मुझे खुद से ही दूर करती हो।

 

प्रेम की परिभाषा किसी घड़े का पानी नहीं

दुनियाँ भले ही ऐसा समझती हो।

 

वें स्कूल कैसे जाएंगे जिन्हें

पेटभर रोटी भी कभी–कभार मिलती हो।

 

और उन्हें पढ़ने–लिखने की क्या जरूरत

जिनकी हर बार सिफारिश से सरती हो।

 

वो पाश्ताप से भी कैसे सुधरेगी

जो जानबूझकर की गई गलती हो।

 

वक़्त की हवा बदलती जरूर है

चाहे कितनी भी मज़बूति से चलती हो।

 

                                                         –        कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

February 20, 2017 in ग़ज़ल

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला बस एक शक्स हमेशा रहता है।

जब मैं देखूं उसे  वो भी  आईने से  मुझे  बस देखता रहता है।

 

यहां इस खु़शहाली में अमीरों को नींद बस ठंडी हवा में आती है

लेकिन गरीब यहां का  जीवन–भर  अपना तन  सेंकता रहता है।

 

किसीको तो  प्यारा  है  अपना  इमान  अपनी जान  से  भी  ज्यादा

और  कोई  तो  यहां  बस  चंद पैसों खातिर  इसे  बेचता  रहता है।

 

अपने ज़ज़्बे के  ज़ोर से  कर  देता  है  कोई  तो  हर  मुसीबत  को  धवस्त

लेकिन  कोई तो  यहां  मुसीबत को  बस देखते ही  घुटने  टेकता  रहता है।

 

कोई पैसा कोई बुद्धि तो कोई  प्रेम  को हर मर्ज़ की दवा मानता है

लेकिन ‘बंदा’ तो सबसे जरूरी–बेहतरीन चीज़ को  बस नेकता कहता है।

 

                                                                                              – कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

CRY FOR SMILE

February 20, 2017 in English Poetry

God makes us cry

So that we can realize

The value of smile..,

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by मासूम खिज़राबादी

BEST

February 19, 2017 in Other

Best food= Thoughts

Best teacher= Experience

Best dress= Smile

Best hobby= Service (surplus time)

Best medicine= Laughter

Best sport= Duty

Best lesson= Patience

Best book= Life

Best student= Attempt

Best relation= Love

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by मासूम खिज़राबादी

SHAYRI

February 18, 2017 in शेर-ओ-शायरी

है मुझे एक मर्ज़

लेकिन मुझे खौफ नहीं

क्योंकि है वो मर्ज़

बेखौफी का ही।

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by मासूम खिज़राबादी

SHAYRI

February 18, 2017 in शेर-ओ-शायरी

जिंदगी से मुझे इतना कुछ मिला है

इस बात पे मैं कितना खुश हो लूँ

एक झटके में सबकुछ छूट जाना है

तो क्या इस बात के वास्ते अभी से रो लूँ।

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by मासूम खिज़राबादी

मंजिल का नज़ारा तो…………..

February 18, 2017 in ग़ज़ल

 मंजिल का नज़ारा तो अपनी पालकों तले कम ही बीता है।

हमारा ज्यादा वक़्त तो बस  सफर के बहाने ही  बीता है।

 

किसीके  दिल  में  किसीके  खातिर  प्यार  है  कितना

इस  उंचाई  को  नापने  खातिर  कहां  कोई  फीता है।

 

वक़्त  की  रफ्तार  को  कोई  लगातार  चुनौती दे सके

क्या  इस  दुनियाँ  में  कहीं  ऐसा भी  कोई  चीता है।

 

वो पुराने दिन  पुरानी बातें सिर्फ इतिहास में ही रह गई

इस  जमाने  में  तुम्हारे  खातिर  कहां  कोई सीता है।

 

लेकिन  उनकी वफा पे उंगली उठाना भी  मुनासिफ नहीं

ये मर्द भी तो  जानबूझकर  घाट–घाट का पानी पीता है।

 

अपने लिए भी जीने का वक़्त  कम मिलता है आज़कल

तुम पूछते हो कि  यहां कौन  किसके  खातिर जीता है।

 

हार–जीत के दौर में  असल जीत सिर्फ तब हासिल हुई

जब–जब इस ‘बंदे’ ने  पहले  खुद को  बखूबी जीता है।

 

                                                                       – कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

SHAYRI

February 17, 2017 in शेर-ओ-शायरी

उतार–चढ़ाव तो  इस जिंदगी में  हमेशा चलतें ही रहेंगें।

दुश्वार पल तो क्या मुकम्मल मुकाम भी सदा नहीं रहेंगें।

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by मासूम खिज़राबादी

SHAYRI

February 17, 2017 in शेर-ओ-शायरी

अगर  दोनों  ही  नाराज  हो  गये  तो फिर अब मनाएगा कौन।

फर्क तो बहुत पड़ता है लेकिन ये बात अब समझाएगा कौन।

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by मासूम खिज़राबादी

अज़ीब संपनता

February 16, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

 क्या अज़ीब संपनता है

इस देश की

क्या खूब साधनता है

यहां की

किसी के यहां तो

रोज़ कोई

नया पकवान बनता है

और कहीं तो

रोज़ कोई

भूखा ही मरता है

ये असमानता भी

क्या खूब बन पड़ी है

जो अलग–अलग जगहों पर भी

समान रूप से खड़ी है।

 

हम खेतों में

इतना उत्पाद उगाने का

दावा करते हैं

कि विदेशों में भी

उसे भेजने का

वादा करते है

लेकिन मिटा पा रहे

हम अपने ही देश के

कितने ही गरीबों के

 भूखे पेट की भूख

क्या इस बात पर

हम कभी

ध्यान भी कर रहे हैं।

 

गरीबों की गरीबी

मेज़बूरो की मज़बूरी

मासूमो की मासूमियत

और जरूरतमंदो की जरूरत

आज़ सिर्फ

इतनी ही बनकर रह गई है

कि पत्रकारों को

खबर मिल जाए

छापने के लिए

चैनलों को मुद्दा मिल जाए

बहस करने के लिए

और हमारे आदरणीय नेताओं को

मौका मिल जाए

भाषण देने के लिए

या फिर सोशल मीडिया को

कोई नया वीडियो मिल जाए

इंटरनेट पर डालने के लिए।

 

  समस्याएँ तो बहुत पुरानी हैं

लेकिन साथ में

एक और समस्या पुरानी है

कि कितनों ने ही

कितने ही तरीकों से दिखाई है

और कितनी ही बार समझाई है

लेकिन लगता नहीं

कि किसी कर्ता–धर्ता के

समझ में आई है

न ही लगता है

कि किसीके समझ में आनी है

क्योंकि

जो बैठे हैं उंचे पदों पर

उनके लिए अभावपने का

कहां कोई मानी है।

 

कईं बार तो

मुझे खुद पर भी

शक होने लगता है

कि आज़ अभावी हूँ

तो सोचता रहता हूँ

अभावी लोगों के दुख भी

लिखता रहता हूँ

लेकिन कल अगर

अभाव से दूर हो जाऊँ

तो कहीं मैं

ये बातें करना भी छोड़ न जाऊँ

डर ये मेरे भीतर

देख देखकर आया है

दुनियाँ का हाल

कर देता है जो

कईं बार मुझे बेहाल।

 

लोग अक्सर करते हैं

ये कारनामा

पहले अपनी समस्याओं के सवाल

लेकिन बाद में

संपनता आने पर

उन्ही समस्याओं को

कहने लगते हैं बवाल

क्योंकि ये समस्याऐं

अब उनकी

खुद की कहां रहती हैं

जो अब ये बातें

उनके समझ में

आने को रहती हैं।

 

                                   –कुमार बन्टी

 

 

 

 

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by मासूम खिज़राबादी

तार के टूटने का मतलब

February 15, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

 तार के टूटने का मतलब

सितार टूटना नहीं होता

लेकिन सिर्फ जिंदा रहना ही

जीवन का इस्तेदाद नहीं होता।

                                                   (इस्तेदाद= योग्यता, दक्षता)

 

जनसंख्या रोज़ बढ़ रही है

धरती अब छोटी पड़ रही है

लेकिन हर कोई यहां

मनवता से भरा

इंसान नहीं होता।

 

मुजरिम भी कहां

जुर्म करने से बाज़ आता है

जब तक वो कहीं

गिरफ्तार नहीं होता।

 

 

दुनियाँ का चलन अब

इतना बिगड़ गया है

कि एक भाई

अपने भाई का गला काटते वक़्त भी

शर्मसार नहीं होता।

 

नादानपने में लोग क्या–क्या करते है

जबकि ये बताने की जरूरत नहीं

कि मोम की  तलवार से

सूरज कभी

जख्म्सार नहीं होता।

 

ये शोर मेरे दिल का

इतना ज्यादा है कि

कितना भी लेकर समां

सब कुछ बयां नहीं होता।

                                                        – कुमार बन्टी

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by मासूम खिज़राबादी

चंद पलों का चुनिंदापन

February 15, 2017 in Poetry on Picture Contest

जैसे

उम्मीद की प्याली से

चुस्की लेकर

मानों मंज़िल की तरफ

कोई सरिता बह जाती है

वैसे ही

मेरे चंद पलों का चुनिंदापन

मुझे मिलते ही

मेरे मन की विचार–शक्ति

कविता बनकर

कुछ कह जाती है।

 

                                   – कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

प्यार जिससे करते हैं हम

February 13, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

 प्यार जिससे करते हैं हम

छुपाते भी उसीसे हैं

बात जिससे कर पाते नहीं हम

हमारी सब बातें भी उसीसे हैं।

 

मिले चाहे दर्द ही

हमें हर बार लेकिन

प्यार की ख्वाहिशों में

हमारी सब उम्मीदजातें भी उसीसे हैं।

 

दिखावा कर लेते हैं हम

उससे नाराज होने का

लेकिन पीछे हम फिर भी

आते–जातें उसीके है।

 

इतने बरसों की पढ़ाई में आजतक

किसी टीचर ने नहीं सुनाई

लेकिन आजकल ख़ुशी–ख़ुशी हम

डांट खातें भी उसीसे हैं।

 

बाकी जिंदगी तो सही चल रही है यारो

लेकिन अगर हैं

तो हमारी सब शिकायतें भी उसीसे हैं।

 

अरे.., मेरे प्यार से अनजान

उस पगली को तो ये भी नहीं मालूम

कि आजकल

हमारी सब इनायतें भी उसीसे है।

                                                            –   कुमार बन्टी

 

 

 

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by मासूम खिज़राबादी

उसकी तस्वीर

February 13, 2017 in हिन्दी-उर्दू कविता

 

बोलने वाले की हर बात में

मिठास होती है

अगर सुनने वाले में

सुनने खातिर

प्यास होती है।

 

उसकी तस्वीर निहारके

ऐसा लगता है मानो

उससे रोज़ मेरी

मुलाकात होती है।

 

ये बात सुनने में बहुत अटपटी लगेगी

लेकिन सच है

कि मेरी खुशी और गम

दोनो का कारण

उसकी याद होती है।

 

 

एक बात बहुत चुभती है मुझे

गुस्सा भी आता है

कि मेरी छुट्टियों के दिनों में ही

उसकी जरूरी क्लास होती है।

 

तभी तो यारों

उससे मिले बगैर

अरसा बीत जाता है

और फिर वो तस्वीर ही

आखिरी आस होती है।

                                                         –   कुमार बन्टी

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by मासूम खिज़राबादी

EMOTIONS

February 5, 2017 in English Poetry

Emotions

 

Emotions are only emotions

And emotions are everything

 

Emotions are universal

But emotions are unique also

 

Emotions can’t be denied

But all emotions are not good

 

Emotions exists everywhere

But real emotions are rare

 

Emotions make you fool

But also make you cool

 

 

Some emotions give you best taste

But some make your life “a waste’’

 

Some emotions help life to embrace

But sometimes make us embarrass

 

Emotions are found everywhere

With everyone

But different is the dare

To express them with everyone

 

Emotions are of great importance

But some have with them grievance

Emotions sometimes heal us

But sometimes destroy a great part of us

 

 

 

Sometimes emotions are pure

For someone’s sure

But sometimes dirty

For people like flirty

 

Emotions can’t be described as a whole

Even not only their rise or fall

 

My emotions are only mine

And not yours

Also yours not mine

Except those are ours….

 

                                                                                                   BY- KUMAR   BUNTY

 

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by मासूम खिज़राबादी

        ज्यादा नहीं मुझे तो बस………..

February 5, 2017 in ग़ज़ल

 

 ज्यादा नहीं मुझे तो बस एक  सच्चा इंसान  बना दे तूँ ।

एक बार नहीं चाहे हर बार सच में हर बार बना दे तूँ।

 

आसमां  छूने की ख्वाहिश  मेरी नहीं  मन नहीं मेरा

मुझे  तो  बस  सही  दिशा  में  उड़ना सिखा दे तूँ।

 

गलत गति से  गलत राह पे दौड़ना  मैं नहीं चाहता

मुझे  तो  सही  राह  पे  बस  चलना  सिखा दे तूँ।

 

सैंकड़ों बरसों के कतरे जीकर भी मेर मन नहीं भरेगा

मुझे तो बस  आज़ का पूरा दिन  जीना सिखा दे तूँ।

 

लाखों–करोड़ों के  झूठे  साथ  का  मुझे  क्या करना

मुझे तो बस  एक सच्चे साथी का  साथ दिला दे तूँ।

 

किसीकी बदलती हस्ती को जानकर  मुझे क्या करना

कौन हूँ क्यों जिंदा हूँ मैं मुझे तो बस ये समझा दे तूँ।

 

आज़कल दुनिया में  जीते–जीते भी बहुत मरते हैं रब्बा

इस ‘बंदे’ को  बस  मरने के बाद  जीना सिखा दे तूँ।

 

                                                                            –   कुमार बन्टी

 

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by मासूम खिज़राबादी

जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल….

February 3, 2017 in ग़ज़ल

 

 जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल

जेब में भले ही गोपाल ठन–ठन है  आज़कल।

 

साथ   देने  को   कोई  दूसरा  साथ में नहीं

बस  अपना बेचारा  साफ मन है आज़कल।

 

तुम    जब   सुनोगे   तभी   तो  जानोगे     कि

मेरी   बात  में  कितना   वज़न  है  आज़कल।

 

मरने  से पहले   ही   मौत   को  देखने  के   बाद

जिंदगी को जिंदा कर रहा जीवन है आज़कल।

 

बेफिक्र  ज़माने  की  करतूतें ‘बंदा’  बता  तो दे

लेकिन फिक्र उसी ज़माने की अडचन है आज़कल।

 

                                                               –   कुमार बन्टी

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