कुछ ऐसे ही हाल होने वाला हैं मानव तेरा ,
सांस थमेगा जब तेरा याद आयेगा मेरा ,
सिसक सिसक दम हैं मैंने तोड़ा ,
तेरी भी बारी आयेगी होने दे सवेरा ,
महेश गुप्ता जौनपुरी
कुछ ऐसे ही हाल होने वाला हैं मानव तेरा ,
सांस थमेगा जब तेरा याद आयेगा मेरा ,
सिसक सिसक दम हैं मैंने तोड़ा ,
तेरी भी बारी आयेगी होने दे सवेरा ,
महेश गुप्ता जौनपुरी
मेरे बापू
चरखा के बल पर जिसने
देश भक्ति को जगाया था
गजब का हुंकार था
बापू के जज़्बातों में
सत्य अहिंसा की लाठी से
जिसने धुल चटाया था
खदेड़ गोरों के सैनिक को
देश का मान बढ़ाया था
गोरों को लोहे का चना चबवाया
देश को अपने आजाद कराया
सत्य अहिंसा का लेकर अस्त्र शस्त्र
बापू ने भारत देश का गौरव बढ़ाया
गोरों के अत्याचारों से गली शहर सहमे थे
बापू के आहट से ही गोरे डरें डरें छिपते थे
बापू के आगे गोरे भी नतमस्तक थे
ऐंनक पहने लाठी लेकर देश पर समर्पित थे
महेश गुप्ता जौनपुरी
शीर्षक – भारत माँ का बेटा
माँ मुझे भी मँगा दे बन्दूक
मैं भी सीमा पर लडने जाऊँगा
मैं बच्चा अब नहीं रहा
मैं भारत का लाज बचाऊँगा
चीन पाकिस्तान को खदेड़
दुश्मन का चीता जलाऊँगा
एक सर के बदले मैं
दस सर काट कर लाऊँगा
आँख उठाया कोई तो
जमकर गोली चलाऊँगा
भारत का झण्डा मैं
दुश्मन के सिने पर फहराऊँगा
जंग छिड़ेगी अब तो
आर पार की लड़ाई होगी
गोली बन्दूक की बाते
अब मेरे जज्बातो से होगी
देश को अपने सुरक्षित कर
शान भारत का मैं बढाऊगा
सिने पर गोली खाकर मैं
वीर शहीद कहलाऊँगा
माँ मुझे भी मँगा दे बन्दूक
मैं सीमा पर लडने जाऊँगा
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
शीर्षक – बदलाव
झूठ के आगे सच
दबता जा रहा हैं साहेब
अमीर के आगे गरिब
रौदा जा रहा साहेब
झूठ फलता फुलता
आगे बढता जा रहा साहेब
सच को झोड झूठ का
साथ दे रहे हैं साहेब
इंसान का ईमान
बदलता जा रहा साहेब
हर इंसान में एक शैतान
जागता जा रहा हैं साहेब
सच्चाई का गला
घुटता जा रहा हैं साहेब
इंसान ही इंसान को
भुलता जा रहा हैं साहेब
अकड़ की दीवार
बढता जा रहा हैं साहेब
घर से परिवार
छुटता जा रहा हैं साहेब
सच का साथ अब कोई
देता नहीं हैं कोई साहेब
झूठ का रिश्ता
जुड़ता जा रहा हैं साहेब
स्वार्थ में इंसान
बदलता जा रहा साहेब
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
✍✍✍✍✍✍✍✍✍
( पैसा बोलता हैं.. )
जेब ढीली बाजार में
ऑख टके सामान को
जी मचले बीच बाजार में
बेवस लाचार सम्भाले पैसे
हाथ पाव किये भागे पैसा
मुहँ बन्द कर दे बाजार में
पैसा बोलता हैं……..
बाजार पहुँच करता राज हैं पैसा
आने से घर इतराता हैं पैसा
छोटे बडे सभी से पैसा
जी छुडाना चाहता हैं
कभी इधर कभी उधर
हर पल भागता रहता हैं पैसा
इंसान की नियत बदले तो
पैसा बोलता हैं……..
पैसा हैं जिसके पास
अकड कर चलना हैं पहचान
गाडी बंगला घर परिवार
पैसे के बिना हैं बेकार
समाज में उसी का हैं पहचान
जिसका चलता पैसे पर राज
लगा माथे पर टिका लम्बा
करता हैं देखो वह व्यपार
इशारे में जब हो जाये काम
पैसा बोलता हैं…….
महेश गुप्ता जौनपुरी
घनघोर अन्धेरा छा रहा हैं
इंसान का ईमान डगमगा रहा हैं
किसका अब कौन सुन रहा हैं
भगवान भी जाग कर सो रहा हैं
सच्चाई पर कोहरा छा रहा हैं
झुठ पर बादल मड़रा रहा हैं
सत्य अहिंसा के पुजारी पर
ग्रह का साया छा रहा हैं
मारो लुटो खाओ जग को
हिंसा मानव में समा रहा हैं
पाप पुण्य का नाम अब
धीरे धीरे खो रहा हैं
इंसान में दुरिया अब आ रहा हैं
जीवन का सूकुन छिड़ता जा रहा हैं
परमपंरा में कलयुगी व्यधा छा रहा हैं
धर्म के चक्कर में खुन की नदिया बहा हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
( कंजुस )
भगवान की कृपा हैं सब कुछ हैं
धन हैं दौलत हैं घर हैं परिवार
एक रुपया जेब से नहीं निकलती
कंजुसी से हैं बहुत बेचारे लाचार
खाने को हैं बहुत कुछ घर में
लेकिन करते सुखी रोटी का आहार
कपड़े पहनते फटे पुराने दिखते हैं गरिब
कंजुसी से बहुत हैं बेचारे लाचार
घर के पैसे से बेटे करते हैं मौज
हाय – हाय पैसा करते हैं हर रोज
पैसे के आगे कुछ सुझता नहीं यही हैं रौब
कंजुसी से बहुत हैं बेचारे लाचार
पेट भर आहार न करते पानी का करते उपयोग
नोटो में लग रहे दीमक देखो करते सदुपयोग
दान धर्म पर एक चवन्नी नहीं देते
कंजुसी से हैं बहुत बेचारे लाचार
महेश गुप्ता जौनपुरी
की कलम से……
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
जातिवाद
लड़ते रहो तुम जातिवाद में
कलम सर हो जायेगा
ऑख उठाकर देख ना पाओगे
काम कोई और कर जायेगा
जातिवाद हैं दुश्मन हिन्दू का
जातिवाद ही हिन्दू को निगल जायेगा
जाति धर्म का लड़ायी करवाकर
दिमक बनकर दुश्मन चाट जायेगा
लड़ते रहो तुम जातिवाद की लड़ाई
एक एक करके मर जाओगे
बहन बेटी की इज्जत को तुम्हारे
कोई और रौद कर चला जायेगा
खेलते रहो तुम जातिवाद
धीरे – धीरे हिन्दू राज्य खत्म हो जायेगा
फिर से होगी मुगलो की राज्य
कोई नहीं बच पायेगा
छोडो जाति धर्म की लड़ाई
हिन्दू बनकर देश को बचाओ तुम
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( तिरंगा )
मैं हूँ भारत माँ का लाल
तिरंगा अंबर में फहराऊँगा
सिने में भर कर देश भक्ति
राष्ट्रगीत मैं गाऊँगा
लाल किले के शीर्ष पर
झण्डा मैं लगाऊँगा
भारत माँ की जयकारा लगाकर
शीश मैं झुकाऊँगा
तीन रंग का तिरंगा हैं पहचान
वीरो का हैं शान तिरंगा
भारतीयो का हैं जान तिरंगा
जन गण मन हैं गाते मिलकर
शान आन बान हैं तिरंगा
भारत माँ के बेटे का जान हैं तिरंगा
बुरी नजर ऊठी तिरंगे पर तो
छलनी सीना कर देगें
भारत माँ लाज बचाकर
दुश्मन को त्रस्त हम कर देगें
तिरंगा के अभिमान के लिए
जीवन को कुर्बान कर देगें
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
बेटी
खौल उठा खुन मेरा
देख कर इस मंजर को
थैले में कही कचरे में कही
मरी पड़ी हैं नन्ही बेटी
वो खुदगर्ज को मैं कैसे समझाऊ
जो ढुढ़ते हैं यौवन में बेटी
लगता हैं हैवानियत भरी हैं
इस भोले भाले चेहरे में
हर एक इंसान में दरिन्दा हैं
भला इसे पहचाने कौन
मौन पड़ी हैं वह माँ भी
जिसने साजिश में हाथ बटाया
फूल सी बच्ची का
अपने हाथो से गला दबाया
थु हैं उनके भरी जवानी पर
जो ऐसा घृणीत कर्म करते हैं
बेटी माँ से ही आज डरने लगी
गर्भ में ही थरथरीने लगी
डर डर कर आती हैं इस दुनिया में
अपनी अस्तित्व को बचाने के लिए
महेश गुप्ता जौनपुरी
आईना
सच को देखो
झुठ परेशान बहुत हैं
ऑखो को देखो
ऑसू में दर्द बहुत हैं
प्यार में देखो लोग
छल कपटी बहुत हैं
चेहरा जितना मासुम
रंग उसके बहुत हैं
जिन्दगी भले ही छोटी हो
लेकिन पहचान बहुत हैं
घाव अभी ताजा
दिल में जख्म बहुत हैं
जुदाई हैं कैसी
तन्हाई बहुत हैं
घर घर में देखो
लड़ाई बहुत हैं
बदलते कलयुग में
कठिनाई बहुत हैं
हर रोज अपने से
लड़ाई बहुत हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
( माँ )
सुबह उठते ही जब
सूरज की किरणें दिखाई देती हैं
चिड़िया चहचहा कर गीत सुनाने लगती हैं
माँ का मेरे प्रेम समर्पण होता हैं
ऊठ जा लल्ला सुबह हुयी
माथे को जब चुमती थी
यौवन में जब ऑखे खुलती
माँ याद बहुत आती हो
लोरी गा कर सीने से लगा
मुझे जब सुलाया करती थी
सोने के लिए अब मैं माँ
मोबाइल से खेलकर सोता हूँ
ना जाने बचपन मेरा
किस गली में खो गयी
माँ के साथ मेरा लड़कपन
कही खो गयी हैं
सुना देखता हूँ जब घर की चौखट
माँ याद बहुत आती हो
खाने के हर एक निवाले में
प्यार की खुशबू ढुढ़ता फिरता हूँ
सर पर हथेली को मैं माँ तेरे
दिन रात मैं तो तड़पता हूँ
घर की सुनी गलीयारो को
मैं एक टक देखता रहता हूँ
लाठी को जब देखता हूँ दरवाजे पर
माँ याद बहुत आती हो
( पिता )
हे पितृ बन्धु सखा हमारे
जीवन काया के आधार हमारे
सर पर छाया के दाता हमारे
बारम्बार नमन करता हूँ
प्यार अनोखा देकर हमको
लाड़ प्यार दिया जीवन में हमको
सखा हमारे जीवन के हो तुम
पालन करते दास बनकर
त्याग तपस्या करते दिन रात
प्यार लुटाते रहते हो
अच्छी शिक्षा अच्छा कपड़ा
देते रहते हो हमको
प्यार बनाये रहते हो यू ही
कभी ना करते आराम हो
बारिस गर्मी जाड़ा धूप
सब सहकर पालन करते हो
अपने सारे खुशियो को त्याग
मेरे ख़्वाहिश को पुरा करते हो
घिसी हुयी जुते को पहन
दिन रात चलते रहते हो
परिवार के खुशियो के लिए
बाबू जी बहुत कष्ट उठाते हो
बेटा बेटी घर परिवार को
अपने खून पसीने से सिंचते हो
महेश गुप्ता जौनपुरी
जल
जल की महिमा बड़ी निराली
खेतो में करती हरियाली
जीवो को जीवन दान देती
जग को जल से संवार देती
आने वाला हैं भयंकर आकाल
जल का मिट रहा हैं संसार
जल के सारे साथी को
मिटा रहे हैं लोभ के नाते
सुखा पड़ता जा रहा हैं
पोखर ताल तलैया सब
पैकेट में बिक रहा हैं
जल की बूँदे अब
सिमटता चला जा रहा हैं
जल का अस्तित्व अब
जल की काया बनी रहे
चलो करे जल की रक्षा
हमारे नेता….
हम भी बहुत मजबूर हैं साहब
लात मार घुसा सह रहे हैं साहब
गाली सुबह शाम खा रहे हैं साहब
क्योंकि हमारे नेता चोर हैं साहब
शौक नहीं हैं गॉव को छोड़ना
रोजगार नहीं हैं मेरे प्रदेश में
रोटी की चाहत ने रखा हैं दुर
क्योंकि हमारे नेता चोर हैं
जुमलेबाजी कि सरकार चलाते
विकास विकास सुबह शाम चिल्लाते
प्रदेश का भला कुछ होता नहीं
क्योंकि हमारे नेता चोर हैं साहब
उत्तर प्रदेश बिहार हैं वोट बैंक
जिससे चलता नेता का दरबार
प्रदेश पर तनिक ध्यान नहीं हैं
क्योंकि हमारे नेता चोर हैं साहब
रोजगार मुहैय का देते चुरन
पंचवर्षीय में भर लेते झोली
प्रदेश का दुर्गति करके जाते
क्योंकि हमारे नेता चोर हैं साहब
महेश गुप्ता जौनपुरी
अब कि बार दिवाली में….
देश का पैसा देश में रखना
खर्चा मत करना चाइना की लाईट पर
तन मन को प्रशन्नचित रखना
कदम से कदम मिलाकर चलना
मिट्टी के दीपक जलाना
अब कि बार दिवाली में…
शुध्द वातावरण शुध्द मन को रखना
भेद भाव जाति पात से दुर रहना
राष्ट्रहित के लिए काम करना
गरीब को भी गरीबी का इनाम मिले
मिट्टी के दीपक जलाना
अब कि बार दिवाली में…..
मिट्टी के दिए से बरसाती किड़े मर जाते हैं
देश का पैसा देश में रहता
गरीब का दिवाली भी मन जाता हैं
हो राष्ट्र भक्त देश प्रेमी तो
मिट्टी के दिपक जलाना
अब कि बार दिवाली में…..
कला के प्रति समर्पित रहना
परम्परा को जिवन्त रखना
गरीबो को ना रोश दिखाना पैसे की परछाई का
भाईचारे के लिए दिपक खरिदना
मिट्टी का दीपक जलाना
अब कि बार दिवाली में……
आने वाली पीढी को
मिट्टी से लगाव सिखना
देश में रहकर देश से ना करना गद्दारी तुम
मिल जुल कर करे प्यार सभी से
मिट्टी का दिपक जलाना
अब कि बार दिवाली में….
महेश गुप्ता जौनपुरी
…..माँ….
रिश्ता बड़ा अनोखा हैं माँ का
त्याग हैं बलिदान हैं खुशियों की छलक हैं
माँ प्रेम हैं तपस्या हैं बच्चे की भाग्य विधाता
माँ जगत में महान हैं माँ नाम बड़ा अनमोल हैं
आंचल का छाया माँ के ममता का माया
सब कुछ फिका पड़ गया जिम्मेदारी आया
दिल दिमाक हँसी खुशी में बसी हैं माँ
ठोंकर लगे पॉव में माँ का नाम आये जुबान पर
सुख दुःख पीड़ा कष्ट हरणी हैं माँ
माँ को कष्ट की जंजाल में ना डालना बेटा
माँ नसीब वालो का ही देती हैं साथ
एक निवाले से ही पेट भर देती हैं माँ
दर्द था प्यार था ऑखो में ऑसू था
माँ का दुलार था ममता की लोरी था
आज जिस चौकट पर खड़ा हूँ अभागा
सब कुछ हैं माँ के प्यार और दुलार के सिवा
महेश गुप्ता जौनपुरी
( मेरे प्यारे दोस्तो )
दोस्तो मेरे दिल को आबाद मत करना
जीने को मिली सॉसे बर्बाद मत करना
ना खेलना तुम मेरे भावनाओ से मित्रो
हर मोड पर साथ देना हंस हस कर मित्रों
ईमान को अपने बनाये रखना मित्रों
जान है हाजिर मेरे प्यारे मित्रों
उंगली पकड बचपन से खेला हैं मित्रों
दोस्ती में ना करना गद्दारी मित्रों
जीवन में मिले हो अनमोल मित्रों
दामन छुडा कर ना जाना हम से मित्रों
रब ने बनाई हैं दोस्ती की मिसाल मित्रों
दोस्ती ही दोस्त का पहचान है मित्रों
सारे जग में ही दोस्ती की मिसाल है मित्रों
एक दूसरे से मिलकर जी लो जिन्दगी मित्रों
कृष्ण सुदामा की तरह करो मित्रता मित्रों
सुख दुःख में काम आओ मेरे प्यारे मित्रों
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( महंगाई का प्रकोप )
दाल का दाना सोना होगा ,
चावल हिरा जैसा महंगा ।
आटा होगा कोकिन हिरोइन ,
मसाला रोब दिखायेगा ।
फल को चखेंगे सपनो में लोग ,
जब वृक्ष सुखा रह जायेगा ।
दुध मिलेगा केमिकल का ,
जब गाय को काट खा जायेगें ।
महंगाई की इस हाहाकार से ,
कोई नही बच पायेगा ।
दूर -दूर तक वीरान होगा ,
किसानो पर जब अत्याचार होगा ।
महेश शम्भूनाथ गुप्ता जौनपुरी
(मोबाइल – 9918845864)
( पगली लडकी )
नयनो को अपने चुरा रही थी
जब वह मेरे सामने आयी
भोली प्यारी चेहरे पर
घबडाहट कि थी परछाई
हा हेलो जब बोला मैंने
नयनो से नयन मिला ना पायी
हाल ए दिल को जब पुछा मैं
इशारो से वह मुझको समझाई
एक टक मैं देखता रहा
वह पगली लडकी मेरे दिल को भाई
चोरी चोरी नयनो से अपने
गडती रहती देखने के बहाने
शर्म हया सब समझ में आयी
कुछ बाते मेरे दिल को भाई
ना जाने ये किस बन्धन में
बधने कि पारी आयी
दिल जाने कितने ख्वाब बुनती
रस्मो के बन्धन में जुडने को आयी ।
– कवि महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की / 2 )
नटखट चंचल नजरो से
बाते वह मुझसे करती हैं
बात बात में वह मुझसे
मेरे सपनो को चुराती हैं
ऑखे बन्द करता हूँ तो
पगली लड़की सामने आ जाती हैं
नयन भी उसके करे कमाल
छुप – छुप कर देखा करती हैं
ये बेचैनी भी ना जाने क्यो
उसको देख कर बढ जाती हैं
जब बाते ना होती हैं उससे
ये दिल ना जाने क्यों खोया रहता हैं
मेरा मन ना जाने क्यों
कितने ख्वाबो में गोता लगता हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
05/03/2017
( पगली लड़की /03 )
ना जाने क्यों इतनी अधुरी
सी लगती हैं जीवन
गुनगुनाता मचलते
मस्ती में चले जा रहा था
आगे से मेरे आ रही थी
एक पगली सयानी लड़की
नयनो से मेरे जब मिले नयन
रुक सी गयी जीवन के पल
ठहाके मार हँसने लगी
वह पगली लड़की मेरे दिल में समाई
मुड़कर जब देखा उसने
कोयल कि किलकारी गुँजी
एक रोज सपने में मेरे हंसकर आयी
क्या बताये यारो वह मेरे दिल को भाई
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की /04 )
मेरी जान तुम यू ही रूठा ना करो मुझसे
बादल बनकर मुझ पर यू बरसा ना करो
तुम्हारी लबो की हँसी मे बसी जिन्दगी
तुम यू ही मुझे तडपाया ना करो ।
तेरी साँसो मे बसी है मेरी सांसे
मेरी जान मुझे यू ही छोडा ना करो अकेले
तेरी धडकन ही हैं मेरी जिन्दगी
मेरी जिंदगी को खेल समझ खेला ना करो ।
तू समन्दर कि धारा मै रेत का किनारा
मेरे सासो को यू ही फिसलने ना देना
लबो पर न्योछावर है मेरी मोहब्बत
बस मेरी वादो को यू ही तोडा ना करो ।
रब से माँगी थी मैंने दुआए तुम्हारे लिए
खुश रहो खुश रखो घर आंगन को मेरे
सपना बस इतना सा सजाया था मैंने
मेरे घर को तुम स्वर्ग बनाये रखना ।
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की / 05 )
समझ ना पाया मैं उसके
जज्बातो कि हवाओ को
तकरार भी मैंने खूब किया
उस पगली को रुलाने के लिए
दर्द भर कर सिने में
अपने जहाँ को लुटाता रहा
खामोशी की झोली लेकर
इधर उधर घुमता रहा
छोटी छोटी बातो पर
मैं गुस्सा होता रहा
उसकी हर नादानी पर
मैं डाट फटकार लगाता रहा
सच में वह पगली ही
ना जाने क्यो इतना बेचैन रहती हैं
मेरे मुस्कुराहट के लिए
बात – बात पर ऑसू बहाती हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की /06 )
कण कण में मुस्कान बिखेरती
जीवन को न्योछावर करती
जिद पर अपने करे सवारी
घर में सबका मन बहलाती
बातो से अपने रस को घोलती
घर आँगन को महकाती हैं
छोटी छोटी बातो में
झगड़े की लडी बन जाती
घर कि जिम्मेदारी को
अम्मा बनकर निभाती
होठो पर मुस्कान लिए
सबको मोहित करती
वो पगली सी सयानी लड़की
ना जाने कितने रुप को मोहित करती
चंचल चितवन नयनो से अपने
सबके दिल को वह बहलाती
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की / 07 )
मृदुल चंचल उमंग लिए
मन को सुशोभित करती हैं
त्याग तपस्या आत्मबल से
मुस्कान की किरण बिखेरती हैं
थोडी सी पगली बनकर
दिल को मेरे खुश रखती हैं
समझ नहीं पाता मैं भी
क्यो गुस्से की महल बनाता हूँ
खुश रहता हूँ तो खुश रहती हैं वो
ऱुठु तो मनाती हैं
बातो बातो से साहस भर देती
जीवन को मेरे रौशन कर देती
मन प्रीत महेश प्रबल हुए
पगली लड़की जब जीवन में आयी
रंग बिखेर घर आंगन में मेरे
स्वर्ग छवि सा दृश्य बनायी
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की / 08 )
ना जाने आज क्यो मेरी
याद नही आ रही उसको
शायद पगली लड़की किसी की
यादो की माला गुथ रही हैं बैठ के
दिल मेरा भी ना जाने क्यो खोया हैं
उस पगली की यादो में रोया हैं
शायद भूल गयी हैं मुझको
यादो के झकोरो में खोई हैं कब से
जिम्मेदारी को लेकर वह
घर आँगन में फेरे लगाती हैं
डॉट सुनकर हजारो वह
फूलो की तरह खिली रहती हैं
बातो में उसके जब रुठु मैं
माफी की लडिया बिछाती हैं
सुख दुःख को सहकर वह
खुशिया बाटती फिरती हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की / 09 )
गीत गुनगुनाकर मेरे सपनो में
मुझसे मिलने आती हो
हँसकर प्यारी नयनो से
वार मुझ पर करती हो
मेरे दिल के दर्द को
कैसे तुम पढ लेती हो
मेरे मुस्कुराहट में तुम
अपनी मुस्कान क्यो ढुढती हो
कह दो मुझसे प्यार हैं तुमको
क्यो इसारे में बाते करती हो
पगली लड़की बनकर तुम
मन बेचैन मेरा करती हो
अधरो पर मुस्कान लिए
मुझको हँसाते फिरती हो
क्यो दु मैं सौगात तुम्हें
जो सब कुछ अर्जित कर बैठा हैं
प्यारी नयनो में
मेरी सुरत ले बैठा हैं
एक वादा तुमसे करते हैं
तुमको दुँगा सारे जहाँ की खुशी
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
( पगली लड़की / 10 )
दिल में मेरे ना जाने क्यो
कुछ सवाल गोते लगाते हैं
पगली लड़की को जब देखु
दिल मेरा धडकने लगता हैं
उसकी मासुमियत निगाहो को
मैं पढने की कोशिश करता हूँ
ना जाने ऐसी क्या बात हैं
वह मेरे ख्यालो में डुबी रहती हैं
मुझको खुश रखने के लिए
सौ व्रत तीज करती हैं
ना जाने कौन सी बात हैं उसमे
मेरे चेहरे को पढ लेती हैं
खामोशी के जंजीरो को तोड
खुशिया ही खुशिया भर देती हैं
जरा मैं परेशान होता हूँ
खुद ही माफी मांगने लगती हैं
मासुमियत भरी निगाहो में
एक दम पागली जैसी दिखती हैं
अपने सारे दुःख को छिपा
मुझको हँसाती फिरती हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
तुम पढ़ी लिखी इंग्लिश मिडियम
मैं पढ़ा लिखा शुध्द हिन्दी में
मैं खाता हूँ गेहूँ चावल प्रिये
तुम खाती पिज्जा बर्गर हो
मेरा तुम्हारा मेल हैं क्या
छुप छुप कर मिलना खेल हैं क्या
तुम रहिश जादी पैसे की बेटी
मैं वेवस लाचार किसान का बेटा
तुम हर बात को पैसे से तौलती
मैं जज्बात का संस्कार प्रिये
शौक तुम्हारे लम्बे चौड़े
मेरा कुछ शौक नहीं हैं
तुम कोका कोला पिज्जा खाती
मैं छाछ चना पर करता गुजारा
तुम शहरो की हो हूर परी
मैं गॉव का ठहरा आवारा
तुम जज्बातो को मेरे क्या समझोगी
मैं गॉव का ठहरा गॉवारी प्रिये
महेश गुप्ता जौनपुरी
कुल्हड़ कि चुस्की कुछ याद दिलाती हैं,
दोस्तों कि दोस्ती साथ निभाती हैं,
महक मिट्टी कि वतन पर प्यार लुटाती हैं,
चाय कि चुस्की बचपन जवानी कि कहानी सुनाती हैं,
महेश गुप्ता जौनपुरी: बूंद बूंद का प्यार
बरसों जुदाई के बाद ये घड़ी आयी हैं
पिया मिलन की रूत आयी हैं
मोहब्बत कि फिजा संग बरखा लायी हैं
चल भीग जाते हैं इस सुहाने मौसम में
तु मेरी दिवानी बन मैं तेरा दिवाना बन जाऊं
प्यार में जीवन को मैं फना यूं ही कर जाऊं
पपीहा का प्यास बनकर तेरे बांहों से लिपट जाऊं
अरमान मोहब्बत का मैं तेरे जहां में लुटा जाऊं
महेश गुप्ता जौनपुरी
जाति धर्म के बंटवारे में ,
इंसानियत का गला घुटता हैं ,
मन्दिर मस्जिद के चक्कर में ,
लहू लाल रंग का बहाता हैं ,
महेश गुप्ता जौनपुरी
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया
ग्रह के गर्भ में लिपटा हैं
बादलों में छुप छुप कर बैठा हैं
डरा सहमा सा यह दिखता हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
हैं किसका यह प्रकोप मां
चांद को निगल बैठा हैं
काल चक्र के साये में चांद देखो फंसा हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
अपने रोशनी को क्यो निगल बैठा हैं
चांद आज क्यो काला काला सा दिखता हैं
बना कर शक्ल मामा यूं ही क्यो बैठा हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
चंदा मामा आज क्यो धुंधले धुंधले से लगते हैं
किसके प्रतिशोध में जले भुनें से लगते हैं
अम्बर कि चोटी में खोये खोये से लगते हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
मां ये देखो कैसा चांद निकल आया हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
तिरंगा
भारत देश की शान हैं तिरंगा
देश प्रेमियों की जान हैं तिरंगा
मातृ भूमि का अभिमान हैं तिरंगा
आजादी के तराने का नाम हैं तिरंगा
नव विहंगम संसार हैं तिरंगा
भारत देश का पहचान हैं तिरंगा
वीर शहीदों का बलिदान हैं तिरंगा
जन गण मन अधिनायक हैं तिरंगा
होंठों कि मुस्कान हैं तिरंगा
गंगा यमुना कि धारा हैं तिरंगा
वसन्ती हवा कि बयार हैं तिरंगा
विश्व में सबसे किर्तिमान हैं तिरंगा
सर्व शक्तिमान हैं तिरंगा
हिंद की अभिलाषा हैं तिरंगा
सबसे अनोखा प्यारा हैं तिरंगा
देश बन्धू का आजादी हैं तिरंगा
जन जन का स्वाभिमान हैं तिरंगा
एकता सौहार्द भाई चारा हैं तिरंगा
सोने की चिड़िया का नाम हैं तिरंगा
शांति अमन प्यार का अहसास हैं तिरंगा
महेश गुप्ता जौनपुरी
सावन
बारिश कि फुहार ने रंग दिया सारा संसार
कौन सुना किसने सुना पपीहा करे पुकार
सुन के गर्जना मेघों की नृत्य लुभाता मोरनी को
सावन ये मनभावन हैं प्रेम लताएं प्रफुल्लित है
सावन के झूलों पर बरखा भी इठलाती है
रंग हरियाली छायी हैं बादरी भी सरमाया है
रंग बिरंगे फूलों पर भंवरा भी मंडराया हैं
हरी चुनरिया ओढ़ कर बैठी धरती भी हर्षायी है
आज जब बरसा सावन भीगा मेरा तन मन सारा
प्यार कि अनोखी छलक हमारा याद रखें दुनिया सारा
सावन कि फुहार में प्यार कि रंग से रंगना राधा
तुम भी भिगो मैं भी भिगु प्यार ना रहे हमारा आधा
गीत गाओ सुमंगल सावन झूम कर आया हैं
प्रेम लुटाती गले लगाती खुशीयों का दिन आया हैं
ऋतु झांक रही मनमोहक सावन देखो आया हैं
बसंती बयार बह रही हैं गीतों का मौसम छाया हैं
महेश गुप्ता जौनपुरी
वृद्धा आश्रम
बुढ़ि आंखें ना जाने कब से
देख रही हैं मुझको
एक टक लगाये निहार रही
बरसों से मुझको
कैसे कर लु मैं किनारा
इनका कौन है सहारा
यह छोटा सा वृद्धाश्रम
है सभी का गुजारा
पाप पुण्य की पावन धरा पर
यही है इनका आशियाना
बेटा कहकर है सबने मुझे पुकारा
कैसे रिस्ता तोड़ दु कौन है इनका सहारा
बेसहारा मैं ही हूं लाठी
अंधेरे में सहारा
अनाथ के आंगन में
ईश्वर ने जन्नत है उतारा
ठुकरा दु मैं कैसे
हे ईश्वर मैं अपने जन्नत को
भूल ना जाये हम बचपन को
देना मुझे आशीष अपना
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – ९९१८८४५८६४
maheshmayank4@gmail.com
युग धारा
एक युग बीत चला है देखो
एक ऊर्जा शक्ति निकल रही
चीर भानू के किरणों को
चांदनी रोशनी फैला रही है
बरखा भी इठला रहा है
नभ अम्बर की छाया में
मुदित हुआ भुमण्डल सारा
बादल कि गर्जना में
मोर हुआ है व्याकुल सा
पपीहा प्यासा तड़प रहा
हवा बसंती बह रही है
फूलों पर भौंरे गुंज रहें
बसंती हवायें झूम रहीं
नभ तम के आंगन में
ओंस कि बूंदें चमक रहीं
धरा पर जैसे मोती की माला
महेश गुप्ता जौनपुरी
मेरे बापू
चरखा के बल पर जिसने
देश भक्ति को जगाया था
गजब का हुंकार था
बापू के जज़्बातों में
सत्य अहिंसा की लाठी से
जिसने धुल चटाया था
खदेड़ गोरों के सैनिक को
देश का मान बढ़ाया था
गोरों को लोहे का चना चबवाया
देश को अपने आजाद कराया
सत्य अहिंसा का लेकर अस्त्र शस्त्र
बापू ने भारत देश का गौरव बढ़ाया
गोरों के अत्याचारों से गली शहर सहमे थे
बापू के आहट से ही गोरे डरें डरें छिपते थे
बापू के आगे गोरे भी नतमस्तक थे
ऐंनक पहने लाठी लेकर देश पर समर्पित थे
महेश गुप्ता जौनपुरी
सच में सब कुछ बदल गया
इंसान का जुबान बदल गया
राजाओ की कहानी बदल गया
अल्हड़ मदमस्त जवानी बदल गया
यारो की यारी बदल गया
फितरत होश जिन्दगी बदल गया
सच में बहुत कुछ बदल गया
रहने का तरिका बदल गया
स्वभाव तौर तरिका बदल गया
संस्कार का लिहाज बदल गया
अदब बडप्पन बदल गया
जुबान का स्वाद बदल गया
सच में बहुत कुछ बदल गया
प्रकृति का हाल बदल गया
इंसान का चाल बदल गया
नौजवान का संस्कार बदल गया
नीम का कड़वा स्वाद बदल गया
मिठे से मधुमेह हो गया
सच में सबकुछ बदल गया
नमक का स्वाद बदल गया
मिट्टी का रंगत बदल गया
हाथो के ठाले बदल गये
खाने के निवाला बदल गया
रहने के तौर तरिका बदल गया
सच में बहुत कुछ बदल गया
महेश गुप्ता जौनपुरी
प्रकृति धरोहर
वृक्ष धरा कि हैं आभूषण
मनमोहक छवि बिखरती
चन्द्र रवि के किरणो से
जीवन हर्षित करती है
कोयल की मृदुगान प्यारी
जग को रोशन करती
ओश की सुनहरी बूँद
चमचम सी करती हैं
हरियाली खेतो की
सुन्दर छवि निहारती
मदमस्त मयूरा नाचे
वर्षा के संग बादल बरसे
हरियाली के ऑगन में
चिड़िया करे बसेरा
छम छम की झंकार लिए
आता हैं वसन्त का मेला
महेश गुप्ता जौनपुरी
संवाद – वायु मानव
चन्द वायु की लड़ियों ने
आकर मुझको घेर लिया
सिसक सिसक कर कहने लगी
पेड़ो क्यों काट रहे हो
मैं दंग अचम्भा देखता रहा
पूछ बैठा सवाल
ये वायु तेरा क्या जाता हैं
मैं काट रहा हूँ पेड़ तो
स्थिर हो गयी वायुमान
त्राही त्राही मच गया
सॉस लेना भी मुश्किल हो गया
वायु कि जरुरत पड़ने लगी
खिलखिलाकर वायु ने बोला
मेरा कुछ नहीं जाता हैं
हे मानव प्यारे सोच विचार लो
तुम अपनी जीवन कि बगिया को
पेड़ लगाओ प्रेम करो
वायु को वरदान मिले
मानव हो मानवता दिखाओ
जीवो को जीवनदान दो
महेश गुप्ता जौनपुरी
नवजीवन का राग/03
ज्ञान का प्रकाश तुम
धैर्य रख जलाये चलो
अग्यानता को दुर कर
साक्षरता बढाये चलो
दिन क्या रात क्या
खुशी के गीत गाये चलो
अंधकार से प्रकाश में
जीत का जश्न मनाये चलो
प्रीत का गीत सदा
निर्भय हो गुनगुनाये चलो
डर भय अधंकार को
प्रकाश से जलाये चलो
चीर हो साहस का
नज्म हो प्यार का
चन्द्र रवि के किरणो से
मनोबल बढा़ये चलो
नीत वसुधा को प्रणाम कर
तिलक मिट्टी का लगाये चलो
आदम्य साहस के बल पर
वसुधा को स्वर्ग बनाये चलो
महेश गुप्ता जौनपुरी
नन्हा सा परिन्दा
एक नन्हा सा परिन्दा
खोज रहा हैं आसमान…
अपने हौसले से उड़ान भर
देखना चाहता हैं आसमान…
छोटे छोटे ऑखो से देखना चाहता हैं
प्रकृति की खूबसूरती को
महसूस करना चाहता हैं अपने पंखो से
आसमान की ऊँचाई को
एक छोटा सा नन्हा परिन्दा
अपने हौसले से बनाना चाहता हैं घोसला
बगिया की मनमोहक लताएँ
सर सर करती बगिया की हवाएँ
झुम झुम कर गाना चाहता हैं
वंसती का स्वागत करके
एक नन्हा सा परिन्दा
खेलना चाहता हैं प्रकृति के गोद में
महेश गुप्ता जौनपुरी
मोबाइल – 9918845864
तुम पढ़ी लिखी इंग्लिश मिडियम
मैं पढ़ा लिखा शुध्द हिन्दी में
मैं खाता हूँ गेहूँ चावल प्रिये
तुम खाती पिज्जा बर्गर हो
मेरा तुम्हारा मेल हैं क्या
छुप छुप कर मिलना खेल हैं क्या
तुम रहिश जादी पैसे की बेटी
मैं वेवस लाचार किसान का बेटा
तुम हर बात को पैसे से तौलती
मैं जज्बात का संस्कार प्रिये
शौक तुम्हारे लम्बे चौड़े
मेरा कुछ शौक नहीं हैं
तुम कोका कोला पिज्जा खाती
मैं छाछ चना पर करता गुजारा
तुम शहरो की हो नूर परी
मैं गॉव का ठहरा आवारा
तुम जज्बातो को मेरे क्या समझोगी
मैं गॉव का ठहरा गॉवारी प्रिये
महेश गुप्ता जौनपुरी
सुबह की लालिमा
सुबह सुबह सूर्य की लालिमा
मुझसे कुछ कहती हैं
भोर हुआ जग जा प्यारे
चिड़िया ची – ची करती हैं
नदियाँ झरना जंगल के बुटे
सबसे अनोखे से लगते हैं
ओंस की खिलखिलाती बूँद
वसुधा को जब स्पर्श करती हैं
मोती जैसे चमक जाती
ओंस की सुनहरी बूँदे
जिवन्त हो जाती पुष्प लतायें
जब प्रकृति रस का पान हैं करती
फूलो पर मड़राते भौरे
प्रेम का इजहार हैं करते
महेश गुप्ता जौनपुरी
मैं भारती हूँ
मैं भारत देश का वासी हूँ
वन्दन सबसे करता हूँ
देश हित के लिए
शीश अर्पित करता हूँ
हिन्दू हूँ हिन्दी हैं पहचान
राष्ट्र का सेवा करता हूँ
धर्म कर्म की बात ना करके
देश पर मर मिटता हूँ
गर्व हैं तिरंगा पर मुझको
जय हिन्द जय हिन्द गाता हूँ
मस्त हूँ मतवाला हूँ
सुर्य सा चमकता हूँ
माथे पर लगा चन्दन तिलक
जय श्री राम कहता हूँ
महेश गुप्ता जौनपुरी
किसान
हाँ मैं ही हूँ किसान साहब
जो खोतो में काम करता हैं
बैल को भाई मानता
खेत को धरती माता
हल को पालन हार मानता
जीवन को खेत में निकाल देता
शहर से कोशो दुर हूँ मैं
खेत में मैं लीन हूँ
आपके जैसी शान नहीं हैं मेरी
फिर भी तुम कर्जदार हो मेरे
चुभन होती हैं साहब मुझको भी
जब कोई मजदूर बोलता हैं
मजदूर नहीं हूँ मैं किसान हूँ
देश का प्रधान सेवक हूँ
मुझे नहीं आती चापलुसी
नहीं मिलती खबर अखबार की
खेतो में लगा रहता हूँ
इसीलिए अनपढ़ गँवार हूँ
मैं सेवक हूँ अन्नदाता हूँ
फिर भी मेरा कोई पहचान नहीं
महेश गुप्ता जौनपुरी
( लघुकथा )
एक गरीब महिला अपने परिवार के साथ एक टुटी झोपड़ी में रहती थी उसके परिवार में एक बेटी और एक बेटा था | उसकी माँ पास के गॉव में जाकर झाडू पोछा करके कुछ खाने कि चीजे लाती थी उसमें भी खाना सिर्फ दो लोगो को होता कभी माँ भूखी सो जाती थी तो कभी बेटा यह बोलकर सो जाता था कि माँ आज मुझे बिल्कुल भूख नहीं हैं | जैसे तैसे गरीब महिला का घर चल रहा था एक दिन रात को बहुत ही भयंकर ऑधी तूफान आया उसमें गरीब महिला का घर टूट गया और घर में पानी भर गया | गरीब महिला का परिवार एक कोने में डरा सहमा बैठा था | अचानक कि कि का आवाज आने लगा जब गरीब महिला पास में जाकर देखा तो वह एक कौआ का बच्चा था जो ऑंधी तूफान कि चपेट में बुरी तरह से ठण्ड के कारण कॉप रहा था गरीब महिला ने उसे हाथ से उठाकर पुचकारते हुए कपडे से ढ़क दिया कौआ का बच्चा उसके बाद भी कि कि करता रहा गरीब महिला ने उसे चावल के दाने दी खाने को कौआ बडे़ प्यार से सब दाने चूग गया | कौआ अब उस घर का पारिवारिक सदस्य बन गया महिला के जाने के बाद बच्चो का ख्याल करने लगा ऐसे ही दिन बितता गया कौआ को गरीब महिला कि लाचारी धीरे धीरे समझ में आ गया और अब वह भी वैसे ही करने लगा जैसे परिवार के अन्य सदस्य करते थे एक दिन खाता एक दिन भूख नहीं हैं बोलकर सो सो जाता | कौआ यह निर्णय किया कि आज से मैं अपने लिए दाना चूग कर खुद ही लाऊगा | कौआ एक लम्बी उड़ान भरा वह जाकर एक जंगल में उतरा कुदकते फुदकते आगे बढ़ ही रहा था कि उसको ढे़र सारा अनाज का भण्डार दिखा पड़ा और ढ़ेर सारी सोने चॉदी हिरे जावरात का भण्डार दिखा | कौआ भर पेट दाना चूगने के बाद एक हिरे का हार अपने में दबा कर घर कि तरफ उड़ान भरा हिरे का हार ले जाकर गरीब महिला के सामने रख दिया | गरीब महिला खुशी के मारे उछल पड़ी और हिरे का हार ले जाकर बाजार में बेंच कर ढ़ेर सारी सुख सुविधा की सामान ले आयी | सब मिलकर खुशी से रहने लगे एक परिवार कि तरह अचानक ऑंधी तूफान तेजी से आ गया कौआ सबको घर में ले जाने के लिए कॉव कॉव करता रहा | सब लोग घर में चले गये लेकिन कौआ तूफान कि चपेट में आ कर बाहर रह गया इतनी तेज तूफान थी कि कौआ का प्राण ले गया जब महिला बाहर निकली तो देखी कौआ जमीन पर पड़ा अपना प्राण त्याग दिया था महिला उसे सिने से लगा कर रोने लगी यह कहकर कि एक तूफान मेरे परिवार को खुशहाल बना दिया और एक तूफान मेरे परिवार के सदस्य को ले गया |
महेश गुप्ता जौनपुरी
मेरे कलम से…….
बदलने चले थे हम संसार
दो कदम में हो गये बेकार
नसीहत से बदल देते
बुरे को अच्छा बना देते
ख्वाब हर पल देखते थे
सुनहरे संसार को बदलने को
बदल ना सका मैं
लोगो की हालातो को
खुशिया भी ना दे सका
अपने चाहने वालो को
हसरते बहुत थी
ख्वाब को अपना बनाने की
लेकिन ना मंजिल साथ दी
ना मेरे अपने
सपने मेरे टुटते गये
बिखरे मोती की तरह
अच्छा सच्चा बनना चाहा
मगर मोल नहीं जमाने में
झुठ्ठा बनकर खेला होता
चाहने वालो की भीड़ लगती
कायरता को अपनाया नहीं
इसलिए नजरो में गिरा पड़ा हूँ
सच्चाई की ढ़ाल ढ़ोकर
मैं बहुत थक गया हूँ
रिस्ते को जोड़ने में
रास्ते से भटक गया हूँ
बदलने चला था संसार
लेकिन मैं खुद बदल गया हूँ
महेश गुप्ता जौनपुरी
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