Panna, Author at Saavan - Page 3 of 12's Posts

इक रब्त

इक रब्त था जो कभी रहता था दरम्या हमारे किस वक्त रूखसत हुआ, खबर नहीं| »

कफ़स

कफ़स

इन परों में वो आसमान, मैं कहॉ से लाऊं इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं   (कफ़स  = cage) हो गये पेड सूने इस पतझड के शागिर्द में अब इन पर नये पत्ते, मैं कहॉ से लाऊं जले हुए गांव में अब बन गये है नये घर अब इन घरों में रखने को नये लोग, मैं कहॉ से लाऊं बुझी-बुझी है जिंदगी, बुझे-बुझे से है जज्बात यहॉ इस बुझी हुई राख में चिन्गारियॉ, मैं कहॉ से लाऊं पथरा गयी है मेरे ख्यालों की दुनिया अब इस दुनिया में ... »

चमकता जिस्म, घनी जुल्फ़े

चमकता जिस्म, घनी जुल्फ़े

चमकता जिस्म, घनी जुल्फ़े, भूरी भूरी सी आंखे यही है वो मुज़रिम जिसने कत्ल ए दिल किया है – Panna »

लिखते लिखते आज

लिखते लिखते आज कलम रूक गयी इक ख्याल अटक सा गया था दिल की दरारों में कहीं| »

खेल

खेल

जिंदगी खेलती है खेल हर लम्हा मेरे साथ नहीं जानती गुजर गया बचपन इक अरसा पहले खेल के शोकीन इस दिल को घेर रखा है अब उधेड़ बुनों ने कसकर अब इनसे निकलूं तो खेलूं कोई नया खेल जिंदगी के साथ| »

अगर तुम न मिलते

जिंदगी का कारवां यूं ही गुजर जाता अगर तुम न मिलते हमारे लफ़्जों में कहां कविता उतरती अगर तुम न मिलते »

मुकम्मल जिंदगी

मुकम्मल जिंदगी की खातिर क्या क्या न किया जिंदगीभर हमने मगर इक अधूरापन ही मिला जिसे साथ लिए घूमता रहता हूं मैं| »

अक्स

अपने ही अल्फ़ाजों में नहीं मिल रहा अक्स अपना न जाने किसको मुद्दतों से मैं लिखता रहा| »

गम की हवेली

गम की हवेली

**** था पहले दिल मेरा इक गम की हवेली अब हजारों गमों के झुग्गीयों की बस्ती हो गया!! ****   »

दास्ता ए इशक

लिखते लिखते स्याही खत्म हो गयी दास्ता ए इशक हमसे लिखी न गयी| »

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