जिंदगी खेलती है खेल हर लम्हा मेरे साथ नहीं जानती गुजर गया बचपन इक अरसा पहले खेल के शोकीन इस दिल को घेर रखा है अब उधेड़ बुनों ने कसकर अब इनसे निकलूं तो खेलूं […]

इक अजीब सा डर रहता है आजकल पता नहीं क्यों, किस वजह से, किसी के पास न होने का डर या किसी के करीब आ जाने का|

कर रहे थे बसर जिंदगी गुमनाम गलियों में आपकी मोहब्बत ने हमें मशहूर कर दिया पुकारने लगे लोग हमें कई नामों से हमें यूं बदनाम होना भी अच्छा लगा आपका तस्व्वुर हमारे ज़हन में गुंजता […]

लङता अंधेरे से बराबर नहीं बेठता थक हारकर रिक्त नहीं आज उसका तूणीर कर रहा तम को छिन्न भिन्न हर बार तानकर शर लङता अंधेरे से बराबर   किया घातक वार बयार का तम ने […]

बिना कलम मैं कौन क्या परिचय मेरा कहां का रहवासी मैं शायद कविता लिखने वाला कवि था मैं पर अब मै कौन बिना कलम मैं कौन   कलम के सहारे नन्ही नन्ही लकीरों से रचता […]

मेरी आवाज दबा दी गयी मेरे अल्फ़ाज मिटा दिये गये जला दिया मेरा जिस्म भी दुनिया ने मगर ख्वाहिशे कहां मिटती है ढ़ूढ़ लेती है कोई न कोई राह निकल पडती है परत दर परत […]

इक वक्त, इक रब्त जुड़ा था,   [रब्त = Relation] वक्त गुजर गया, रब्त रह गया कुछ लम्हो की दास्ता बनकर ये याराना पक्के अल्फ़ाजों में ज़हन में छप गया कुछ पल अजीज है बहुत, […]

वो आंखे आज तक चुभती है मुझको एक दम खाली, खाली कटोरे सी जो पूछ रही हों, कह रही हो अपनी भूखी दास्तां लफ़्ज ही बेबस है, नहीं समेट सकते दर्द को उनके खाली है […]

इसे बेनाम ही रहने दो, कोई नाम न दो वर्ना बेवजह दिल में कई सवाल उठेंगें उन सवालों का जबाव हमारे पास नहीं सिर्फ़ अहसास है हमारे पास, जो लफ़्जों में ढलते ही नहीं लफ्जों […]

पछताओगे तुम, रुसवाईयां करोगे गर छोड दिया हमने तेरी गलियों मे आना कभी   तुझसे मुश्ते-मोहब्बत मांगी थी, कोई कोहिनूर नहीं बस तेरे दीदार की दरकार थी चश्मेतर को कभी   भर गये पांव आबलो […]

इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ कोरे कागज पै स्याही सा बिखर जाता हूँ हर्फ़ हालातों में ढलकत कुछ कह देते है कोई सुनता है तो मैं संवर जाता हूँ कोई साखी है तेरे […]

वह भिखारी मलिन मटमैला फटा पट पहने था वह पथवासी नमित निगाहे नित पथ पर नयनों से नीर निकलता विदीर्ण करता ह्रदय अपने भाग्य पर कांपते हाथों में कटोरा स्कंध पर उसके परिवार का बोझ […]

चाहे कितनी नफ़रत कर लो हमसे तेरे दिल को अपना बनाकर रहेगें बहुत रो चुकी है आंखे हमारी तेरी आंखों से आंसू हम गिराकर रहेंगे चाहे कितनी भी अंधेरी हो जिंदगी की रातें शम्मां महोब्बत […]

कुछ अश्कों की महफिल जमी और वो याद आये रुखसार कुछ नम से हुए और वो याद आये एक जमाने की मोहब्बत वो चंद लम्हो में भुला बैठे हम भूलकर भी उन्हे भूला ना पाये […]

वो पूछते है हमसे कि आजकल हम क्या करते है क्या बताएं कि उनके इंतजार में किस कदर मरते है अपने अहसास, अपनी आरजू दिल में दबाए रखे है वो कहते है कि आजकल हम […]

बिछडने के ख्याल से हम आपसे मिलने से डरते है मगर कैसे बताएं हम किस कदर तनहा मरते है   देख न ले वो हमें, कहीं पुकार न ले उनकी गलियों से यूं गुज़रने से […]

अश्क बेपरवाह बहे जाते है एक कहानी है ये जो कहे जाते है कोई सुनता ही नहीं कोई ठहरता ही नहीं आते है लोग, चले जाते है अश्क बेपरवाह बहे जाते है   आंखो से […]

इक अधूरापन है जो झांकता रहता है दिल की दरारों से| मचलता रहता है, मुकम्मल होने की ख्वाहिश में|   कुछ यादें थी, अधूरी सी भीगना बारिश में कभी कभी| करवा ली है मरम्मत छत […]

थोडी सी उदासी जमा कर ली है मुठ्टी भर दर्द को कैद कर रखा है दिल के इक कौने में   कभी कभी इसी दर्द को घोलकर स्याही में बिखेर देता हूं उदास कागज़ पर […]

चले जाओगे तुम ये सोच नहीं था हो जाएगें तनहा हम ये सोचा नहीं था हंसते हंसते बितायी थी जिंदगी हमने गम में ढ़ल जाएगी जिंदगी ये सोचा नहीं था तेरी आंखो के नशे मे […]

पुरानी जिंदगी कभी कभी जाग उठती है यादें आ जाती है याद बेवजह खारी लकीरें छोडकर रुखसारों पर न जाने कहां खो जाते है जज्बात मेरे लफ़्ज जो कभी जुबां पर आ ना पाये जो […]

Saavan  ये कारवां चले तो, हम भी चलेंये शम्मा जले तो, हम भी जलेंखाक करके हर पुरानी ख्वाहिश कोइक नया कदम, हम भी चलें……   कभी ठहरी सी लगती है,कभी बहती चली जाती हैजिंदगी है […]

October 17: Anti Poverty Day सर्दी में नंगे पांव कूड़ा बटोरते बच्चे ठिठुरता बचपन उनका सिकुडी हुई नन्ही काया टाट के थैले की तरह   उनके रूदन का क्या जिक्र करू मैं लफ़्जों के कुछ […]