मेरी बेटी।
छोटी सी गुड़िया,
कभी हंसती, कभी रोती।
तो कभी रुलाती,
तो कभी हंसाती।
मेरी बेटी।
अभी सीखा है, उसने
शब्दों से खेलना।
भाता है उसे,
एक ही सार में,
स्वर और व्यंजनों को गाना।
मेरी बेटी।
कोमल पंखुड़ी से होंठ,
और आंखों में शरारत।
चुरा लेता है, मेरा मन।
जब रोती है,
कह जाती है,
मुझे अम्मा।
यह छू जाता है,
मेरे मन को।
जी चाहता है,
छुपा लूं कहीं।
इस दुनिया से दूर,
मेरी बेटी…
मेरी बेटी…
Author: Pratima chaudhary
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मेरी बेटी….
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कविता क्या होती है!
कविता क्या होती है
कुछ शब्दों की तुकबंदी,
या लय का विस्तार।
जो अंत मन को व्यक्त कर लेती है
या फिर सौंदर्य श्रृंगार।
कविता क्या होती है?
जिसने देश की खुशबू और
होता है भव्यता का गुणगान।
नव आचरण का निर्माण कर,
पूरे जग पर अधिकार कर।
कविता क्या होती है?
यह मीठा सा गीत जो बयां करती है,
कवि की स्व कल्पना को।
कविता क्या होती है?
हां , मैं जान गई,
कविता क्या होती है!
वह है शब्दों की पूर्ण परिपाटी,
जो ओज, शोक, प्रेम ,रस ,सौंदर्य।
सभी भावों को व्यक्त कर देती है।
हां, यह कविता होती हैं….. -
मैं जिंदगी जी रहा हूं।
मैं जिंदगी जी रहा हूं।
दूसरों के दिए एहसानों,
पर पल रहा हूं।
भटक रहा हूं मैं,
अपने आप से।
घर के रास्ते,
बार-बार टोह रहा हूं।
कहां जाऊं,
मैं किस डगर।
जो भूख मिटा दे,
मेरी इस कदर।
यह थकान जो मैं,
लादकर लाया हूं।
तपती धूप में,
मैं लौट आया हूं
मैं कौन हूं?
पहचाना मुझे।
हां, मैं प्रवासी मजदूर हूं।
रोटी की भूख और पानी की घूंट।
कि तलाश में,
फिर अपने गांव लौट आया हूं।
कहां मिली मुझे,
दो पल चैन की रातें।
आंखों में दुखों का सैलाब लाया हूं।
शहर में गुजारा कर रहा था मैं,
अब तो गुजर आया हूं।
हां, मैं लौट आया हूं। -
कभी शौक था मुझे….
कभी शौक था मुझे,
रंगों से खेलने का,
सपनों को बुननें का,
तारों को गिनने का,
चंदा से छिपने का ,
फूलों को छूने का,
कभी थी झूले की चाह,
तो कभी गुड़ियों की
कभी दौड़ती थी ,
कभी हंसती थी,
कभी मांगती थी, कुछ पैसे।
त्योहारों में।
दिवाली के दियों की,
चाह करती थी।
होली के रंगों की और
पिचकारी की।
बहुत उमंगे होती थी।
पर अब न चाह है,
इन सब चीजों की।
बस थोड़ी मुस्कान,
और थोड़ी खुशियां दे दे ।
अब यह जिंदगी… -
जिंदगी की कड़वाहट
मिट जाए जिंदगी की कड़वाहट ,
ए खुदा! तू इसे मीठा सा सच कर दे। -
थामती रही हौसलों को…
औंधे मुंह जा गिरी मैं।
थामती रही हौसलों को,
फिर भी वह जा फिसली।
तब खत्म हुई जीवन आशा,
संपूर्ण अब जीवन सारा।
जा छिपी में तम शिविर में,
बस अब मिटने की आशा।
बदला कुछ पल भर में ऐसा,
जब प्रकट हुई उज्जवल आशा।
थामा कुछ ऐसे,
उसने मुझको।
ना डरी मैं, ना छुपी मैं।
सामने थी डटी मैं।
फिर पाया मैंने वो साहस,
और हौसलों का साथ।
न थी अकेली मैं,
और न गिरी मैं…. -
ए रास्ते!
ए रास्ते ! मिट भी जाओ,
अब आंखें मंजिल नहीं ढूंढती ,
बस रास्ता देखती है ,खत्म होने का। -
#shayri 2liner तुम फिर से…
तुम फिर से मेरी यादों का हिस्सा मत बनो,
ना वजह बनो, मेरे मुस्कुराने की। -
बेटी का घर।
तुम बांध लो अपना सामान,
कुछ भूल ना जाना,
यह सुनते ही,
बेटी का दिल बोला!
यह घर भी,
अपना-सा नहीं लगता।
चार दिन बीत जाने के बाद,
दोहराए जाते हैं यही सवाल!
कि कब आएंगे मेहमान!
कब जाने की तैयारी है!
कुछ पल और रुक जाऊं,
ऐसा दिल चाहता है।
पर ना जाने,
सबके दिल में क्या होता है।
इन रिश्तो में उलझ कर,
समझ नहीं पाती हूं मैं,
कि कौन-सा घर मेरा अपना है। -
मत दो मुझे फुलों-सी मुस्कान
मत दो मुझे फुलों-सी मुस्कान,
पर; कांटो सी चुभन भी नहीं चाहिए। -
वो किसे…
वो किसे दिखाएं; अपना साफ मन ,
जहां तन की बात पहले होती है। -
मैं नाखुश…
मैं नाखुश-सी हूं आजकल,
इसका कोई मलाल नहीं।
मगर तू खुश रहे सदा ,
तेरी तकलीफों की सौगात; अपने लिए,
खुद हमने खुदा से मांगी थी। -
वो कुछ कहते नहीं
वो कुछ कहती नहीं,
ये स्वीकृति नहीं है!
दबा-सा कोई रोष है,
क्या सही ,क्या ग़लत,
उसके लिए,
तुम ही फैसला लो ,
हर बार!
क्या ये भी,
उसी का दोष है? -
अधूरे लोग…
अधूरे लोग, अधूरी बातें,
अधूरी जिंदगी के पन्ने ,
और अधूरी सांसे ,
बस ख्वाबों में रहना पसंद करते हैं। -
जो है तू सामने
जो है तू सामने,
वो तू है नहीं,
और है जो तू,
ज़हन से,
आजकल वो दिखता नहीं। -
शफ़ाख़ाना
तुमने किया है पाक ए इश्क जो
बड़ी शिद्दत से हमसे,
तो अहसान फ़रामोश हम भी नहीं ,
आ! तेरी दर्द ए दवा का शफ़ाख़ाना,
हमने भी खोल दिया है। -
चलो एक होड़ लगाएं
चलो एक होड़ लगाएं,
खुद से,
खुद को बेहतर बनाने की ,
झूठ से , फरेब से,
ईर्ष्या से, द्वेष से,
छुटकारा पाने की,
चलो एक होड़ लगाएं ,
बड़े चाव से ,
पाक इंसान बन जाने की। -
चलो ऐसा एक ज़हान बनाएं
चलो ऐसा एक ज़हान बनाएं,
जहां नहीं होगी ,
आदमी को आदमी से नफरत,
नेकी की राह, नेकी हो सबमें,
प्रेम हो सबसे, प्यार की हसरत,
कदर करता हो, जहां हर कोई ,
हर किसी के मान की,
कौन छोटा !कौन बड़ा!
बस उम्र बताएं,
हैसियत ना किसी को ,
बड़ा बनाएं,
मानवता जहां अपनी पहचान दिखाएं,
चलो ऐसा एक जहान बनाएं। -
शाश्वत सौंदर्य
तुम जो पड़े हो पीछे,
चेहरे की सुंदरता के ,
वो अक्सर वक्त के बाद ढल जाती है,
जाओ कभी अंदरूनी सौंदर्य के पीछे
वो शाश्वत है हमेशा के लिए। -
सवाल विचित्र-सा
नैतिकता को पढ़ना-सुनना,
अक्सर बहुत अच्छा लागे,
सबपर पूरा असर ,
पूरा समर्थन,
मगर आचरण में सबके क्यों नहीं?
यह सवाल विचित्र-सा,
काल्पनिक-सा….. -
मेरी बेबसी को मशहूर ना कर
मेरी बेबसी को मशहूर ना कर,
माना बड़ा जालिम है तू जमाने,
फिर भी मजबूर ना कर,
और मजबूत है बहुत हम अंदर से,
माना टूटे हुए दिखते हैं,
तू मजबूर ना कर!
अक्सर मजबूर लोग ,
इतिहास लिखते हैं। -
जिंदगी अगर तू अश्म है
जिंदगी अगर तू अश्म है ,
तो क्या!
मत इतरा,
मेरी मेहनत भी किसी फौलाद से कम नहीं। -
सही मायनों में उजाला है।
सही मायने में उजाला है,
जहां बेटियों ने मां-बाप को संभाला है।
चाहे मां पिता हो या मां पिता से सास-ससुर,
उन्हीं से ही परिवार का सवेरा है। -
मैं जताती नहीं
मैं जताती नहीं,
प्यार तो क्या।
उसे महसूस कर लेना ,
जब तुम्हारी जरूरत का ख्याल ,
मुझे तुमसे पहले हो… -
खामोशी का कारवां
क्यों खामोशी का कारवां है ,
तेरे और मेरे बीच ,
ना तुम उसे तोड़ते हो ,
ना मैं उसे लांगती हूं। -
मेरी बिटिया रानी
मेरी बिटिया रानी,
क्या वह चाहे,
व वह ही जाने।
हम उसकी,
सदा ही माने।
इशारों में भी,
इतराती है।
हम सब पर,
रोब जमाती है।
कभी इधर,
कभी उधर,
वो भागे।
ना जाने,
उसको क्या भावे।
वह सबकी प्यारी है,
मेरी बिटिया रानी है। -
पिता का साया।
पिता का साया,
छांव है शीतल सी।
जो धूप से बचाती है,
बचपन को बचाती है।
वह कठोर हाथों का स्पर्श,
बेशक तुम्हें अच्छा ना लगे।
पर उसके पीछे की मेहनत,
तुम बखूबी जानती हो।
हां, अभी तुम युवा हो,
तो ऐसा ही लगता है।
पिता की रोक-टोक,
अच्छी नहीं लगती।
सिर्फ नजरे चुराने,
को जी चाहता है।
वह क्या चाहते हैं,
तुम्हें पता नहीं!
वह बस चाहते नहीं की।
किसी परेशानी से ,
तुम्हारा सामना हो।
वह छुप कर मुस्कान देखते हैं।
तुम्हारी।
वह पिता है तुम्हारे,
वह तुमसे बहुत प्यार करते हैं। -
राहें खत्म होती ही नहीं….
राहें खत्म होती ही नहीं,
इस जिंदगी की,
हर मोड़ पर नया हुजूम
मेरा इंतजार करता है,
मुड़ जाऊं इस राह से,
खामोशी को तोड़कर ,
आगे बढ़ने को जी चाहता है
मगर यह ऐसा गोल भंवर है,
जिसके घेरे का,
ना कोई अंत है,
ना ही सीमा…. -
कितनी कशिश थी..
कितनी कशिश थी,
उनकी मासूमियत में।
भूल जाते थे सारा जहां।
जो बदल गए अब,
एक तूफान के बाद।
अब न झलक मिलती है,
ना निशान दिखते हैं।.. -
कितने कोरे कागज….
कितने कोरे कागज रंग डाले,
तुम्हारे लिए।
फिर भी ना कह पाए,
जो कहना था…. -
अभी-अभी।
अभी-अभी कुछ बूंदों से रूबरू हुए,
चमकते हैं मोती से,
बरसते हैं बुंदों की तरह।
पर आयानास ही नहीं बरसते।
जब बनते हैं गम के बादल,
सिमट जाते हैं पलकों पर।
फिर गिरते हैं धीरे-धीरे
बिना किसी शोर के क्षण-क्षण। -
क्या नया है इस जीवन।
क्या नया है इस जीवन में,
वही रोज की शाम सुबह है।
जब हम थक जाते हैं,
फिर उम्मीद के झरोखों से,
झाकते हैं।
बदल जाता है वह सब कुछ,
हर सुबह नई-सी लगती है,
और हर रात-सी नई लगती। -
बिन बुलाए आते हैं
बिन बुलाए आते हैं गमों के सागर,
मुसीबतों के तूफान,
और कभी चाहकर भी नहीं होती,
खुशियों की बारिश ,
मुस्कुराहटों की बौछार। -
कभी वो नचाती थी उसे
कभी वो नचाती थी उसे,
अब सत्ता उसे नचाती हैं,
गांव को गोद लेना,
तो बात पुरानी ठहरी ,
अब मीडिया को भी,
गोद लिया जाता है। -
मैंने तुम्हें जिताया
मैंने तुम्हें जिताया ,
उम्मीद का बटन दबाकर,
सोचा था कि बढ़ाओगे रोजगार को मेरे,
मगर तुमने बढ़ाया,
सिर्फ अपना पेट। -
मुझको अगर जीतना है।
मुझको अगर जीतना है ,
तो ज़िद कभी ना करना,
बस हृदय को;
थोड़ा-सा छू जाना। -
ये जो उदासी है तेरे अन्दर….
ये जो उदासी है तेरे अंदर,
वो खुशी में बदल जाएगी।
तू उठ तो सही,संघर्ष के लिए ,
वक्त तो इंतजार में है तेरे,
किस्मत भी बदल जाएगी। -
ऊंचे-ऊंचे घरों में
ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
रहने वाले लोग,
आजकल घरों में ही रहते हैं,
मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
रेहड़ी लेकर,
खाली उदर बच्चों का,
टिकने ही नहीं देता है। -
मैं चाहती हूं…
मैं चाहती हूं ख्वाबो की पौड़ियों पर चढ़ना,
मगर पीछे से जिम्मेवारियों की रस्सी खींच रही है -
रात का बटोही
रात का बटोही भटकता फिरे,
और नींद समुद्री लहरों-सी,
किनारे को छुकर वापिस चली जाएं। -
जिंदगी ने सौगात में
जिंदगी ने सौगात में ,
खूबसूरत-सा लम्हा जरूर दिया ,
मासूम से हाथों ने जब ,
उंगलियों को मेरी थाम लिया। -
ये ज़माना…
ये ज़माना जो है दिखावे का ही है
अंतर्गुणो को हमेशा नजरअंदाज किया जाता है -
मैंने जिंदगी को…
मैंने जिंदगी को हमेशा सहेली बनाकर रखा,
मगर वो है कि हमेशा दुश्मनी निभाती रहती है। -
कुर्सी क्या है?
कुर्सी क्या है ?
कितना मुश्किल है इसे समझना।
सब राजनीति की संरचना है,
सुन रखे हैं पुराने वादें,
अब नए वादों में फंसना है।
ये तो कुर्सी का मसला है।
कहीं सत्ता की चाल है ,
कहीं कुर्सी का दाव है।
फिर से,
दो कुर्सियां आपस में जा टकराई।
जो बच गयी ,
वो कुर्सी फिर सत्ता में आई।
आम जनता; आम ही रह गई।
जो ना बदली , वो बदल ना पाई।
अब क्या करें !
भगवान भरोसे सब
रख छोड़ा है ,
सब ने कुर्सी से नाता जोड़ा हैं,
जनकल्याण के नारे,
किताबों में ही अच्छे लगते हैं,
अब रोज़ यहां बड़े चाव से,
कुर्सी के नारे लगते है। -
पाक इश्क…
पाक इश्क अक्सर होता नहीं,
मगर जब होता है तो बेमौसम बरसता है!
और जिस पर बरसता है,
वो बहुत भीगता है,
आंसुओं से भी और उस खुमार से भी! -
दर्द का आलम
दर्द का आलम सहसा बाढ़ बन गया,
जब किताब के पन्नो में;
उनकी तस्वीर रूबरू हुई। -
बड़ी बेबाक बातें करते हैं वो….
बड़ी बेबाक बातें करते हैं वो,
जमाना कब तक उन्हें चुप कराता।
जो खौफजदा है नहीं,
उन्हें खौफ कौन दिलाता….! -
हमारी मौजूदगी में।
झुक कर उठ जाती थी,
उनकी नज़रें,
हमारी मौजूदगी में।
और अब आलम ऐसा है,
कि उनकी नज़र,
अब उठती ही नहीं। -
तुम्हें ढूंढती रही निगाहें..
तुम्हें ढूंढती रही निगाहें,
बरसों बीतने के बाद।
कभी तुमने ना खबर दी,
न ही तुम तक आने का पता। -
बीता कल
जब उसने आँखे खोली,
तब पाया एक नया संसार,
रंग बिरंगी थी दुनिया उसकी,
और खुशिया आपार,
खेलती थी आँख मिचौली,
संग अपने हमजोली,
न पड़ती थी डॉट उन्हें,
दो बोल मीठे बोलते,
पा लेते थे, सब हँसकर,
क्या नया था क्या पुराना,
जो भी था; सब था प्यारा,
खेल घरौंदे के खेले उसने,
छुपकर करते थे श्रृंगार,
न बंधी वो, बंधन में,
नाचती गाती अपनी मगन में,
क्या कब कौन जान है पाता,
क्या है अगले ही पल में,
और कौन छुपा है,
किसके भीतर,
छिपा बैठा था ,एक शैतान!
और वो भी थी; उससे अंजान,
जा फंसी वो उस चंगुल में,
बोध नहीं रहा उस पल में,
आँसु भी न बह पाए,
थी बैठी वो सब गवांए,
क्या विडंबना कि बच न पाई,
जा पहुंची गर्त की खाई में,
छिन सा गया उसका बचपन,
भागती रही अपनो से दुर,
खोती रही वो अपना सकुन,
हो जाती कमरें में बंद,
बोल गए ! सब मीठे,
न चाहती थी मिलना जुलना,
सिर्फ अपनें गम में घुलना,
न सुबह की लाली पाती,
न सर्दी की धुप,
हर एक व्यक्ति तब मुजरिम लगता,
मन में यह सब; कब तक चलता,
होकर सबसे दुर,
कैद हो गई वो
जा गमों के पिंजरों में,
उड़ने की अभिलाषा न जगी,
न कुछ पाने की चाह,
वक्त भी न भर पाया,
उस बीते कल को.
सोचती रही; वो जब उस पल को।…