मां ने जब रोटियां बनाना सिखाया , मुझे कुछ समझ ना आया , कभी रोटियां जली तो कभी हाथ, फिर सीख ही गई मैं, रोटियां बनाना, और अब रोटियां नहीं जलती , बस जलते हैं […]

हैसियत क्या थी मेरी पूछिए मत, बस किताब के कोरे पन्ने थे , लिखते रहे अपनी रूबानी, जब बनी ना कोई गजल ना कोई नज़्म, फटकर सिमटकर पैरों तले बस कुचले गए।

मेरी शिक्षक मेरी मां ही तो है , सिखाया उसने चलना , बोलना और पढ़ना -लिखना। अर्थ न जाने कितने समझाएं । पूछो कितनी ही बार ;वह प्रश्न , फिर भी कभी ना डांट लगाए […]

कितनी उधेड़बुन करती हूं, मैं इन धागों के साथ । जिसे जिंदगी कहते हैं , कभी गम की गांठ खोलती हूं। कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं । बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में। […]

क्या उकेर देती , मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर। अपने भीतर की वेदना या दूसरों की प्रेरणा । अनकही बातें या सुनी सुनाई बातें। नहीं जानती इसका अर्थ क्या होता । क्या उकेर देती, […]

क्यों कुछ कहते नहीं, सब गूंगे बहरे बैठे हैं , सबके भीतर जलती है आग, फिर क्यों खामोश बैठे हैं, खो दिया है सम्मान को , अपने भीतर के इंसान को, तभी तो चुप ही […]

हर शाम इतनी मीठी ना होती, अगर तुम ना होते , खुश तो होते हम, पर खुशनसीब ना होते, गुजारिश है बस इतनी तुमसे, इस मुस्कान को खोने मत देना, खुशनुमा किया है हृदय को, […]

यह कहक़हा लगा कर , मुझे झुकाकर कहां चल दिए। मेरी धूमिल आंखों से ओझल होकर, सच को झूठ बनाकर कहां चल दिए। मैं थी बेकसूर, तुम कसूरवार, ठहरा कर कहां चल दिए। मैं मांगती […]

तुम्हें तुम्हारी ताजगी मुबारक , मुझे सुखें पत्तों से प्यार है, तुम्हें नाज है अपनी खूबसूरती पर , मुझे तेरी सीरत से प्यार है, तू खुश है इस नएपन से, मुझे तेरी नादानी से प्यार […]

हम काटते ही नहीं , बुराइयों की जड़ें, पालते हैं ,पोषते हैं , कभी इच्छाओं के लोभ से, कभी रूपयों की चाह से, जब लगता है , वह जड़े हमें बांधती है, हम उठ खड़े […]

सब चाहते हैं, फिर से वो बचपन पाना, शरारत से भरी ऑंखें, और मुस्कुराना, पर मैं नही चाहती, वो बचपन पाना, डर लगता है, उस बचपन से, घूरती आँखों, और उन हैवानों से, अब है […]

कुछ पाया और कुछ खोया, क्यों मुझे इस बात पर रोना आया! क्यों बिछड़ते रहे अपने, क्यों अजनबियों के बीच मुझे रहना आया! सपनें टूटते बिखरते रहे, उसे समेटते दिल भर आया, कुछ खोया और […]

वो बेख़ौफ़ दिखाती है, अपनी पहचान, छिपती ही नहीं परदे के पीछे, रोका है उसे, टोका हैं उसे, छुपाया हैं, उसे, दबाया है उसे, फिर भी छिपती ही नहीं परदे के पीछे, और बेख़ौफ़ दिखाती […]

हम बंधते ही रहे, कभी विचारों तो कभी, दायरों के धागों से, सिमट कर रही जिंदगी, उसी चार कोनों के भीतर, जन्म से आजतक, बस दीवारों के रंग बदले, और लोगो के चेहरे, कभी इस […]

मैं चमकता-सा शहर हूँ, न रुकता हूँ, न थकता हूँ, मेरा कारवां न रुका है, वो फिर से दौड़ता है, एक रफ़्तार के बाद। हादसे तो मेरे भीतर की आम बातें हैं, मैं खीचता हूँ, […]

क्यों मैं बच गयी, उन कहरो से, भ्रूण हत्या, कुरीतियों, और अमावताओं से, मिट जाती मिट्टी में, न होती मेरी पहचान, न होती मैं बदनाम, न होती मैं हैवानों से दो चार, न होती यौन […]