गूंगी नहीं हूं मैं मुझे भी बोलना आता है बस मेरे संस्कार मुझे मौन कर देते हैं।।
गूंगी नहीं हूं मैं मुझे भी बोलना आता है बस मेरे संस्कार मुझे मौन कर देते हैं।।
जिंदगी जिस राह पर चल रही है, उसकी कोई मंजिल नहीं है, कश्ती साहिल पे थी सही, मजधार में डूब रही है, कत्ल हुआ है सर-ए-आम, पर तू मेरा कातिल नहीं है।
जिंदगी जिस राह पर चल रही है, उसकी कोई मंजिल नहीं है, कश्ती साहिल पे थी सही, मजधार में डूब रही है, कत्ल हुआ है सर-ए-आम, पर तू मेरा कातिल नहीं है।
एक दूसरे पर उंगली उठाते-उठाते जीवन गुजर जाता है, पर एक कवि ही है जो स्वयं की कमियों को ढूंढ पाता है।
मन को सम्भाल कर रखा है तेरी यादों को सहेज कर रखा है आँख में आँसू रोज आने लगे हैं, क्योंकि जो कल मेरा था वो आज किसी और का हो चुका है।
जो सावन में भी न मिल पाया वो ये माह कहां से देगा इस महीने का तो नाम ही “सितम-बर” है ये रहम कहां से देगा मेरा हकीम तो खुद बीमार है वो मरहम कहां […]
पियक्कड़ों के शहर में शरबत ढूंढ रहा हूं खारे सागरों से मीठा पानी पुकारता रहा हूं अपने हाथों से अंजुली भर के पानी पिलाती हो मुझे मैं वही छोटा सा तालाब अपने घर रोज चाहता […]
छुपाकर ही रखना बेबसी, मानुष ! दिल ए इज़हार मत करना, कर लेना बातें,परछाईं से अपनी, जमाने को दीदार मत करना, और बैठे हैं लोग खोल कर कानों को, दर्द ए इक़रार मत करना, माना […]
ऐ दोस्त दुनिया में प्रेम करने वालों की तकदीर बदलती रहती है। आईना तो वही रह जाता है मगर तदबीर बदलती रहती है।।
कब से उठाए बैठी हूँ अपनी घूंघट उनके दीदार के लिए । एक वो है ख्वाबों में आशियाना तलाशते है मेरे लिए।।
यहां जान बहुत सस्ती है, नहीं दुंगा! मैं जीने आया हूं तेरे लिए। और चांद तारों का क्या हैं करना! मैं खुशियां लाया हूं तेरे लिए। — Manush
शायद मेरे ज़नाज़े के पीछे अश्क बहाती हुई कोई आ रही है। एक झलक देखें तो किस लिबास में मेरी ज़नाज़े के संग आ रही है।।
एक सुबह चाय ने मुझ से कहा फुर्सत हो तो क्यों नहीं बैठ जाते। तुम्हारे मन मस्तिष्क को हम अंदरुनी ताजगी से भर देते।।
हम उन पर शेर लिखते गए हमज़ेली भी दीवानी होती गई। ख्वाबों के सिलसिला ऐसी चली ज़िन्दगी की नई मंजिल मिल गई।।
रौशनी से नहा रहा है आज नूर महल, मुद्दत बाद निकला है चाँद मेरे शहर मे । ए फीज़ा तुझे है काली घटा की कसम, नज़र न लगाना तू मेरे नूर महल में।।
अब आ ही गए हो तुम तो दुश्मन की जरूरत ना रहेगी बैठे बैठे बहुत वक़्त गुजर गया लगता है अब फुरसत ना रहेगी नाम तुम्हारा भी सुना था बड़ा देखने की हसरत अधूरी ना […]
हम गिरें भी तो वहीं जहां इर्द-गिर्द मेरे अपने थे। शायद ना थी खबर हमें रेत पर बने मेरे सपने थे। वीरेंद्र
अश्कों के समंदर में ए खुदा मुझे सिर्फ दो गज ज़मीन दे दे। गर करने लगे वह अपनो से बेवफ़ाई तब,ज़माना मुझे उसी में दफ़ना दे।।
काली मुलायम उड़ती जुल्फें तेरी, इश्कबाज़ों पे कयामत ढाती है। जब चले तू खुली वादियो में, घटा की नियत भी बदलती है।।
जख्मों को हमारे वह कुरेदते जा रहे हैं, कुछ इस तरह वह मुझे आजमा रहे हैं। मेरी रूह में सांस धुंधली हुई जाती, हम उनकी मोहब्बत के कर्जदार होते जा रहे हैं।
कभी झांक कर देख मेरी नजरों में हो जाएगा तू दीवाना। एक बार दिल में आकर तो देख आ तुझे मैं लबों से छू लूं तू कभी मेरा गीत बन कर तो देख।
उफ़ ये बेरूखी वो तो इक झलक के प्यासे हैं किस्मत से कमज़ोर हैं मुस्कान भी न पा सके
जिंदगी इक खेल है कोई पास कोई फेल है शिकायत न रहे किसी से सभी से मेरा मेल है
उनकी तारीफ में कोई कैसे कुछ लिखे नजरों को उनसे हटना ही जब मंजूर नहीं
अभिमन्यु नहीं है मगर चक्रव्यूह वैसा है कहते नहीं बनता जीवन ये कैसा है खड़े हैं कुरुक्षेत्र में लड़ने के लिए कमाना और बचाना चाहते पैसा है
राम चरित मानस को मन में दोहराए मिल कर के लोग सब सीता राम गाए कलयुग में केवल ये नाम ही आधार है सुमिर सुमिर भव से पार उतर जाए
बनाए रखना हिम्मत भगवान् हमारे आते रहे हरदम हम आपके द्वारे भक्तो के रक्षक भगवान् आते हैं मीरा और राधा के जैसे नहीं पुकारे
आते नहीं तूफान तो कश्ती पार हो जाती जीत जाते जंग नहीं हार हो जाती आते रहे तूफान अब तैर जाएंगे सोचा नहीं था दुनिया बीमार हो जाती
अंधेरा बहुत है आओ दीपक जलाएं कोरोना महामारी को मिलकर हराए दूर रहने में ही बचेगी जान अब बिना संकोच के हम सभी मास्क लगाए
सम्हाल कर बोले शब्द वापस नहीं आएंगे पता है आपको कितना दिल दुखाएगे बोलो गे अगर मीठे शब्द तो घाव भरने वाला मरहम बन जाएगे
मतलब कि दुनिया में मतलवी यार मिले एक बार नहीं हर बार है मिले दुश्मन अच्छे हैं ऎसे दोस्तो से हम उम्मीद करते हैं उनसे सच्चा प्यार मिले
जिस्म के कद्रदान तो कई होंगे, हमें तो रूह-ए-उन्स की तलाश है।
कछुआ और खरगोश दौड लगाएगे अधूरे हैं दोनों मंजिल कैसे पायेगे मुश्किलें हो जाएगी आसान जब दोनों दोस्त हो जाएंगे
सब कुछ मान कर जो पालते रहे बीपत्तियों का काँटा निकालते रहे बुढ़ापा मे वो असहाय हो गए कपूत घर से बाहर निकालते रहे
मधुशाला में ताला न लगाइए अभी नशा चढ़ा ही नहीं। कुछ यादें और ताजा होने दीजिए अभी तक पैमाने को लब से लगाया ही नहीं।।
यादों की मरहम भी क्या मरहम है। बेरहम भी मरहम पर जीने लगे है।। काश.. यह मरहम मर्ज़ नहीं होते। हम और आप आज कैसे जी पाते।।
जुल्म की दुनिया में कदम रखने वाले अभी समय है पीछे हटा ले मरने के बाद भी सुख नहीं पाएगा जीते जी दुनिया को स्वर्ग बना ले
पाना चाहते हो तो खोना सीखो हँसने से पहले रोना सीखो पाना चाहते हो प्यार अगर प्रेम के बीज बोना सीखो
धार्मिक कैसे कहे जो धर्म के नाम पर लड़ जाते हैं मत पाने के लिए कुछ लोग दंगे करवाते हैं चोला पहनने से कोई संत नहीं होता धार्मिक वो है जो प्रेम के दीपक जलाते […]
तुम्हारे नाम की मेंहदी लगाई उसने हाथों में। मेरे जज़्बात बन के रह गए इतिहास की बातों में।।
तू रहे आबाद कोई गम ना हो तेरी आंखें दर्द से कभी नम ना हो हमनें बहुत देखें हैं अपने जीवन में दुख ईश्वर से प्रार्थना है तेरे जीवन में वैसा कभी मंजर ना हो।
आजकल सावन में सारहीन अकविताओ का प्रभाव हो गया है शायद श्रेष्ठ कवि होने का दावाव हो गया है कवियों का मौन कुछ कहता है मन में भी कोरोना का घेराव हो गया है
तुम्हारी नाराजगी को मैं हरगिज समझती हूं अपनी गलतियों को भी खूब समझती हूं पर इंसान हूँ गलती तो हो ही जाती है अपनों से ही तो शिकायत जाती है
बड़ी भयानक ये महामारी है ब्लैक फंगस का भी कहर जारी है बताओ तो भगवान् क्या दुनिया के अंत करने की शुरू हुई तैयारी है
पागल हाथी की तरह कोरोना आया पूरे देश में तबाही मचाया मंदिर मस्जिद बंद है कहाँ जाए गिन नहीं सकते इतने चिता जलाया
हाल मत पूछो बच्चो के रखवालों से बंद पड़े हैं स्कूल यहां सालो से जान है तो जहां है समझाते रहे पंक्षी उड़ रहे असमय डालों से
न जाने कब घर से बाहर निकल पाएंगे कब तक कोरोना योद्धा मारे जाएगे दिल की धड़कन बढ़ जाती है समाचार सुन आखिर कब तक लोग सदा के लिए सो जाएगे
पैसा कमाने के चक्कर में अपनो को भूल गए मिल गए पैसे तो सेठ जैसे फूल गए सब कुछ नहीं है पैसा एहसास हुआ जब हम भगवान् की स्कूल गए
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