भाव बहने दे

June 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

खुद पर किताब लिखने दे
गलत-सही किया है
आज तक जो,
उसका हिसाब लिखने दे।
बन्द आंखों से
आज भीतर तक
खुद का मिजाज
पढ़ने दे।
भीतरी कालिमा
के बीच पड़ी
चमकती मणि समान
रूह है जो,
उसके सच्चे से भाव
पढ़ने दे।
मेरे भीतर के
भाव बहने दे,
मुझको खुद से ही
बात करने दे।

जीवन का सत्य है

June 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सत्य को समझने की
नजर,
जरूर मायने रखती है,
रहस्य समझने वाली
जिन्दा आत्मा
अपने भीतर आयने रखती है।
जो देख लेती कमियाँ
अपनी देहजनित,
त्याग देती हैं
लोभ नेहजनित।
खूब इकट्ठा करते जाना,
फिर उसे खा न पाना,
छोड़ कर ऐसे ही पोटली में
धरती से चले जाना।
भूख की स्थिति में
खा न पाना,
जब पेट साथ न दे तब
खाने की अभिलाषा रखना,
अभिलाषा का अभिलाषा ही
रह जाना,
अचानक अलविदा कह जाना,
कल खाऊंगा की आस में
कल का कभी न आ पाना,
यही कथ्य है,
जीवन का सत्य है।

यकीन मानिये

June 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जरा सा आप भी
कीजिये मुहब्बत,
यकीन मानिए,
सुनकू पाओगे।
जरा सा आप भी
सच की राह पर चलिए,
यकीन मानिये,
सुकून पाओगे।
जरा सा आप भी
त्याग करना सीखिए,
यकीन मानिए
सुकून पाओगे।
जरा आप भी
दान-धरम कीजिये,
यकीन मानिए
सुकून पाओगे।
जरा सा ठोस के
साथ नरम होइये
यकीन मानिए,
सुकून पाओगे।

मुहब्बत नाम है मेरा

June 22, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मैं मुस्कुराती हूँ,
गुनगुनाती हूँ,
कभी उत्साह में उड़ती
कभी गम के कुंए में डूबती,
फिर
गोता लगाकर लौट आती,
उतरती डूबती सी
डूबती फिर से उतरती डूबती सी,
एक दिन दो दिन, महीने, वर्ष बीते,
फिर भी
आपको भूले भुलाए याद करती सी चली,
उस ओर अपने पग बढाती सी चली,
जिस ओर केवल आश है,
झूठी दिलासा साथ है,
जिस बिंदु को सच्चे समय ठुकरा दिया,
वो बिंदु फिर मिलता नहीं
यह आज के वेदों का सच है,
झूठी दिलासा साथ है ,
मुहब्बत नाम है मेरा,
दिलासा काम है मेरा।
……………………………………..डॉ. सतीश पांडेय, चम्पावत।

पिता

June 21, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पिता एक ऐसा शब्द है
जिसकी जितनी व्याख्या हो
वह कम है,
पिता जीवन का मूल है,
हमारा जीवन उनके
चरणों की धूल है,
पिता के बिना अपने अस्तित्व की
कल्पना करना सबसे बड़ी भूल है।
कितना संघर्ष करते हैं पिता
अपने बच्चों तक
हर सुख पहुंचाने के लिए।
खुद भूखे रहते हैं
बच्चों तक अन्न रस पहुंचाने के लिए।
खुद पसीने से लथपथ होने तक
मेहनत करते हैं पिता,
बच्चों के चेहरों पर
मुस्कान लाने के लिए।
हम भी नहीं भुला सकते
पिताजी को
फादर्स डे पर शत-शत नमन
पिताजी को।

खूब बारिश हो रही है

June 20, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

खूब बारिश हो रही है
रात भर, दिन भर
पहाड़ों में भूस्खलन
हो रहा है,
सड़कें टूट चुकी हैं,
नदियां उफान पर हैं,
खतरे के निशान पर हैं
या उससे ऊपर हैं,
हर जगह नमी है,
जिन्दगी थमी है।
मनुष्य क्या, जानवर
पेड़-पौधे, पक्षी
सभी सहमे हुए हैं,
रोजगार ठप है,
अब मौसम से खुलना कब है,
इसी आशा में,
संभले हुए हैं।

ईमान साथ रखना है

June 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

लोगों की जुबान का डर
नहीं रखना है,
बल्कि ईश्वर की सत्ता का
भान रखना है।
लोग गलत देखकर
गलत कहेंगे,
लेकिन ईश्वर गलत देखकर
माफ नहीं करेंगे।
थोड़ा सा ताकत पाने पर
गुमान नहीं करना है,
ईमान साथ रखना है
बेमान नहीं बनना है,
निरंकुश नहीं बनना है
ईश्वरीय सत्ता का
अंकुश समझना है,
उस सत्ता की नजर सर्वत्र है
इसे सचमुच समझना है।

मेघा बरसे खूब

June 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

भीग गई पूरी शैय्या
मेघा बरसे खूब,
अब मैं सोऊँ कहाँ, रहूँ कैसे।
यह पगडंडी, घर है मेरा,
नभ नीला ही, छत है मेरा।
आज जिसे है मेघ ने घेरा।
तड़-तड़ बरखा, तन में- मन में
अब मैं रहूँ कहाँ कैसे।
जो कुछ था सब
भीग गया है,
सिर पर डाले चदरिया
तन धरती पर बैठ गया है।
उठ कर जाऊँ कहाँ,
नहीं है कोई ठिकाना यहां,
अब मैं रहूँ तो कहाँ अब कैसे,
खाऊँ कैसे बिना पैसे।

देश सोने की चिड़िया

June 17, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अपना अपना काम यदि
कर लें सब ईमान से,
देश सोने की चिड़िया
होगा फिर ईमान से।

पूरा नहीं जरा सा भी
यदि दायित्व समझ लें सब
देश सोने की चिड़िया,
होगा फिर ईमान से।

कथनी करनी में अंतर
मिट जाये जब हम सब में,
देश सोने की चिड़िया
होगा फिर ईमान से।

बात कम हो काम अधिक

June 17, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बात कम हो काम अधिक
तब तो है कुछ बात।
ऐसा क्या प्रचार जो
दिन को बोले रात।
दिन को बोले रात
रात को दिन कहता हो।
तस्वीरों को खींच,
दिखावा ही करता हो।
कहे कलम दिखावा
है सच्चाई पर घात,
पहले कर लो काम
फिर होगी बाकी बात।

दान-धरम में खर्च

June 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बिल्कुल देर न कीजिये,
भले काम में आप।
होता जायेगा भला,
खुद का अपने आप।।
गणना करते ही रहा,
पूँजी की दिन-रात।
उम्र बिता दी धन कमा,
समझ न आई बात।।
यहीं रह गया सब जमा
जान न पाया राज।
जाना है सबको भले
जाये कल या आज।।
थोड़ा सा हो जाय गर
दान-धरम में खर्च,
उत्तम है यह कार्य तुम
करो कहीं भी सर्च।

साँझ इतनी मनोहर है

June 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

साँझ इतनी मनोहर है
गगन में सितारे हैं
धरा में भी सितारे हैं,
बड़े अद्भुत नजारे हैं,
खड़ा हूँ पर्वत की चोटी में
बने घर की छत पर,
बह रही है हवा ठंडी,
कभी है तेज फिर मंदी।
कटा सा चाँद आया है
मगर है चाँदनी सुन्दर,
बहुत शीतल है बाहर पर
भरा है ताप कुछ अन्दर।

आया मौसम मानसून का

June 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आया मौसम मानसून का
बरसा है जल रात भर,
लाया पानी कहाँ से इतना
आसमान बादल में भर।
सुबह-सुबह जल्दी उठ चिड़िया
रोजगार की खोज में
चूं-चूं करती दुबकी बैठी
कुछ रुकने की आस में।
चिड़िया सोच रही है मेरे
पास अगर छाता होती
उर की भूख मिटाने मैं भी
दाना चुगने को जाती।
भूखे बच्चे देख घोंसले में
बैठूँ कैसे बैठूँ,
लेकिन बाहर मानसून है
जाऊँ तो कैसे जाऊँ।

मिटा दिया

June 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दो माह पूर्व ही
विवाह हुआ था उसका
किसी की नाजों से पाली गई
बिटिया थी वह,
कितनी प्यारी गुड़िया थी वह।
अचानक पता चला
उसका निधन हो गया है।
न बीमार थी,
न कोई अन्य बात थी।
लेकिन गले में निशान मिला
लोग बोल रहे थे जिसके
साथ सात फेरे लिए थे
उसी ने सुला दिया,
कभी न जगने वाली नींद में।
आवाजें उठ रही हैं,
दहेज हत्या बन्द हो,
मासूम के कातिलों को
सजा मिले।
लेकिन वह तो चली गई,
जिसकी शादी के लिए
पिता ने खेत बेच दिया था,
सारी मांग तो पूरी कर ही दी थी।
फिर क्या रह गया था,
जो बिटिया मिटा दिया,
बेजान बना दिया।

रौनक बढ़ा देते हो

June 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

प्याज तुम
आँसू निकाल देते हो
फिर भी भाते हो
क्योंकि
स्वाद बढ़ा देते हो।
प्रेम तुम खुशियां
भी देते हो,
आँसू भी देते हो,
लेकिन जिन्दगी की
रौनक बढ़ा देते हो।
प्याज की कई
परतों की तरह,
जज्बात छिपाए रखते हो
भीतरी परत तक का
साथ निभा देते हो।

भाव लिखने हैं

June 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

फूल बोने हैं
भले कांटे उगें बागों में,
जोड़ दें रिश्ते सभी
नेह के धागों में।
भाव लिखने हैं
भले बेसुरे ही क्यों न हों,
जिसको भायेंगे वही
बांध लेगा रागों में।
खोजने हैं जो
कहीं खो गए हैं बागों में
खोजने जायेंगे तो
खोज लेंगे लाखों में।

निपटना होगा तुझे

June 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

निपटना होगा
विपरीत धारा से,
तैरना होगा
पार पाने तुझे।
घुमाना चाहेगा,
भंवर जब भी तुझे
समझ तत्काल तूने
खुद को संभालना होगा।
कष्ट सबकी
परीक्षा लेता है,
जो डरा वो
हार जाता है।
निडर होकर किया
संघर्ष जिसने
वही बस पार जाता है।

सत्य क्या था

June 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बीतता जा रहा है निरन्तर
वक्त रुकता कहाँ है किसी को
दिन उगा, दोपहर- रात फिर
चक्र है यह घुमाता सभी को।
चक्र चलता रहा है अभी तक
पौध उगती रही और मिटती रही
आने जाने की निर्मम कथा
कुदरत भी लिखती रही।
सोचता रह गया एक मानव
लक्ष्य क्या था मेरी जिंदगी का
क्यों उगा, क्यों मिटा, क्यों खपा
सत्य क्या था मेरी जिंदगी का।

आओ दो बोल सुना जाओ ना

June 13, 2021 in Poetry on Picture Contest

आओ दो बोल
सुना जाओ ना,
गीत के बोल
सुना जाओ ना।
हो गए दिन बहुत
सुना ही नहीं,
अपने उदगार
सुना जाओ ना।
सूनी सूनी सी फिजायें हैं अब
सारी मुरझाई दिशाएं हैं अब,
वो घनी रात थी वो बीत गई
वो कड़ी धूप थी जो बीत गई,
अब तो बारिश जरा सा होने लगी,
आपके बिन हँसी भी रोने लगी,
थाम लो आप अब कलेजे को
आओ दो बोल सुना जाओ ना
अपने उदगार सुना जाओ ना।

पुलकित हुआ तन

June 13, 2021 in Poetry on Picture Contest

मनोहर शाम है
छितरे हुए हैं व्योम में घन
टपकती बूँद के अहसास से
पुलकित हुआ तन।
लग रहे हैं बहुत खुश पेड़-पौधे
उग रहे हैं अनेकों बीज
दे रहा भानु उनको ताप
गगन भी दे रहा है सींच।

सुकून

June 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुकून!!
तू मेरे पास कब होता है,
तुझे ही मालूम है,
या मुझे ही पता है,
यही तो तेरी अदा है,
जब मैं कर्तव्य पथ पर
रमा होता हूँ,
तब तू मेरे पास होता है।
निःसहाय की मदद के समय
परोपकार की भावना के समय
सच्चाई की चाह के समय
सुकून तू मेरे पास होता है।
दायित्व निभाते समय,
गिर पड़े को उठाते समय
रूठे को मनाते समय
स्नेह में नहाते समय
सुकून तू मेरे पास होता है।
मेहनत की कमाई के समय
थोड़ा सा भलाई के समय
सुकून तू मेरे पास होता है।

महसूस कर लेना

June 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक रास्ता है जो
आपसे मिलाता है,
है कठिन मगर वो ही
आस को जगाता है।
मन से मांगकर पाँखें
तन में घौंप दी जायें
उड़ चलूँ मिलूँ आकर
ये उमड़ पड़ी चाहें।
या मन ही भेज दूँ
बस पहचान लेना
भेजे हुए सिंगनल
महसूस कर लेना।
मन न भी भेज सको तो
कुछ तो करना
प्रत्युत्तर की तरंगें
भेज देना।

भीतर पड़ा है सूखा

June 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बारिश बहुत है बाहर
भीतर पड़ा है सूखा,
खाता हूँ खूब चींजें
फिर भी रहा हूँ भूखा।
मन में उमड़ के बादल
नैनों में खूब बरसा,
चाहत हुई थी शायद
ऐसा हुआ है शक सा।

कोशिश है भाव पढ़ लूँ

June 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नजरें टिकी हैं तुम पर
कोशिश है भाव पढ़ लूँ
पाने को पार मन का
पत्थर की नाव गढ़ लूँ।
उतरे या डूब जाये
कोशिश कभी न छोडूँ
तुम छोड़ना भी चाहो
मन से कभी न छोड़ूँ।
ऐसे ही सब समझ लूँ
कहना जो चाहते हो,
वह भी मैं भांप लूँ जो
कहना न चाहते हो।

मजबूत कर लो हृदय

June 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आँसू को पोंछ लेना
खुद को संभाल लेना,
मजबूत करना मन को
खुद को संभाल लेना।
कमजोर पड़ यूँ कैसे
जीवन चलेगा आगे,
आशा हो पूरे घर की
दायित्व भी हैं आगे।
ईश्वर की जो है मर्जी
वह ही हुआ है अब तक,
वश में नहीं है मन के
रोओगे ऐसे कब तक।
सब छिन गया लुटा है
लेकिन करें भी क्या अब
रख लो ख्याल खुद का
हृदय संभाल लो अब।
मजबूत कर लो हृदय
फिर से खड़े उठो अब
कुछ याद में जियो कुछ
आगे को देख लो अब।
वह रात थी दुखों की
उसको भुलाना होगा,
गर भूल भी न पाओ,
थोड़ा भुलाना होगा।
कवि और क्या कहे अब
कविता ही एक मरहम,
कोशिश करेगी कविता
दुःख थोड़ा कम हो मन का।

विडम्बना

June 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिम्मेदारों!!
यूँ उलझ कर आप आपस में
भुला देते हो जनहित को।
बिता देते हो ऐसे ही समय।
खींचातानी गजब की है
आपकी जो भूल कर
आम जीवन के दर्दों को
अलग मुद्दे उठाते हो
हँसाने की जगह
केवल रुलाते हो।
अहिंसा सत्य की बातें
समभाव की बातें
किनारे फेंक देते हो
भिड़े लड़े आपस में समाज
ऐसा यत्न करते हो।

फर्ज अपना निभाते चल

June 2, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

फर्ज अपना
निभाते चल ओ राही,
बोल उत्साह के
सुनाते चल ओ राही।
दुःखी के पोछ आँसू
जरा सा दे सहारा,
गमों को दूसरों के
मिटाते चल ओ राही।
हर तरफ दुख ही दुख है
बड़ी विपदा खड़ी है,
कई घर लुट गए हैं,
घड़ी संकट भरी है,
नहीं अब टूटना है,
तुझे तो जूझना है,
थके हारे को हिम्मत
दिलाते चल ओ राही।
समझ पाया नहीं है
अगर कोई अभी तक,
उसे सारी हकीकत
बताते चल ओ राही।
जरा सा सावधानी
सभी रख लें समझ लें
जीत पायेंगे पक्का
बताते चल ओ राही।
—– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय।

सोच समझ इंसान

May 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हवा हवा में उड़ नहीं, सोच समझ इंसान,
हवा बिना ये फेफड़े, नहीं करेंगे काम।
नहीं करेंगे काम, जिन्दगी उड़ जायेगी,
बिना सजग रहे सब, धूल में मिल जायेगी।
कहे लेखनी काम कर रही आज एक दवा,
मुँह में मास्क लगा, छान छान कर ले हवा।

सभ्यता पर दाग है

May 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

भेड़िए से सब तरफ
फैले हुए हैं आज भी
हैं लगाये टकटकी
इज्जत मिटाने दूसरे की।
वासना अपनी
जहर सी वे उगलते हैं,
राह चलती जिन्दगी को
वे निगलते हैं।
पापियों के पाप पर
अब लगानी आग है
पापियों का पाप
मानव सभ्यता पर दाग है।
कील ठोंको उन कुकर्मी
भेड़ियों के हाथ में
सौंप दो जनता के हाथों
सूली चढ़ा दो साथ में।
न्याय में देरी न हो
कर लो त्वरित अब कार्यवाही,
मत दबो दुष्टों के आगे
सब करेंगे वाहवाही।

मत हो निराश

May 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हो सकता है,
मेहनत से बहुत कुछ
हो सकता है।
संभावनाएं होती हैं,
हर किसी बात की
कुछ न कुछ संभावनाएं
होती ही हैं।
एक आशा की किरण
पासा पलट देती है,
मंजिल पर सच्ची नजर
किस्मत बदल देती है।
आज समस्या यदि है
कल सरलता भी होगी
ठोस बर्फ में कल
तरलता भी होगी।
आज बीज है
कल पौध भी उगेगी
परसों पेड़ भी उगेगा
एक दिन फल भी लगेगा।
बंजर को खोद ले
खाद-पानी डाल
कल खुद देखना
मेहनत का कमाल।
आज हीनता है
कल होगा मालामाल
बस घेर न पाए तुझे
निराशा का जाल।
हर चीज में
संभावनाएं तलाश,
युक्ति लगाकर चल
मत हो निराश।

रोड़ी-रेत-सीमेंट का अनुपात

April 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

वो मिस्त्री के साथ
काम करने वाला मजदूर,
कहना मानने को है मजबूर,
ईंट लपका दे,
मसाला फेंट दे,
थोड़ा गीला बना,
थोड़ा सख्त बना,
चल टेक लेकर आ,
सरिया मोड़,
टूटी हुई बल्ली को जोड़,
इधर आ उधर छोड़
ये टेड़ा है इसे तोड़।
ईंट की हर मजबूती
जानता है वह
सीमेंट के सैट होने का
वक्त समझता वह,
कभी जुड़ता है
कभी बिखरता है वह।
रोड़ी-रेत-सीमेंट का अनुपात,
जानता है वह,
ठोस बनने से जुड़ी
हर बात जानता है वह,
लेकिन बन नहीं पता
पेट की खातिर हर बात
मानता है वह।
सीमेंट से सने हाथ
पसीने से भीगा तन
कर्मठ सा व्यक्तित्व
कोमल सा मन।
लंच के समय
पानी पी लेता है,
सुबह के आधे पेट नाश्ते से
दिनभर जी लेता है।
मिस्त्री का अस्त्र है वह
इमारत बनाने का शस्त्र है वह।
मेहनत की पहचान है वह
एक कर्मठ इंसान वह।

जीवन श्लेष युक्त कविता है

April 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जीवन श्लेष युक्त कविता है
इसको सुलझाते-सुलझाते
सारी उम्र बीत जाती है
लेकिन सुलझ नहीं पाती है।
अर्थ, रहस्य, लक्ष्य क्या इसका
है किस हेतु बना यह
या केवल है स्वप्न देखने
मिटने हेतु बना यह।
हँसना-गाना खुशी मनाना
कभी है रोना-धोना,
कभी काटना फसल स्वयं की
कभी है फिर से बोना।
चक्र चला दिन हुआ कभी तो
कभी रात फिर होना,
कभी पाप के मैल में रमना
कभी नदी में धोना।
आज नहीं तो कल सुख होगा
इसी आस में रहना,
सुख आने तक चला-चली में
बिन जाने चल देना
कल भोगूँगा सोच सोच कर
धन संचय कर लेना
लेकिन उसको भोग न पाना
बिन भोगे चल देना।
जीवन श्लेष युक्त कविता है
इसको सुलझाते-सुलझाते
सारी उम्र बीत जाती है
लेकिन सुलझ नहीं पाती है।
——- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।

नाटक के किरदार अनेकों

April 29, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नाटक के किरदार
अनेकों रूप-रंग के हैं
अलग अलग मुखौटे पहने
अलग ढंग के हैं।
जीवन में मिल जाते हैं
हम भी घुल मिल जाते हैं,
कभी पहचान कर लेते हैं
कभी धोखा खा जाते हैं।
कभी गिराने का
कभी मिटाने का
कभी हिलाने का भीतर तक
मौका पा जाते हैं।
आखों में लाकर नमी सी,
मन में आस जगाते हैं,
बाहर से ठंडाई सी ला
भीतर आगे लगाते हैं।
संपदा और धन के मद में
बौरा कर चलते हैं,
निर्धन की निर्जीव समझते
मद में ही रहते हैं।
खुद को मानवता का सेवक
कहते नहीं थकते हैं,
लेकिन मानवता को
पीड़ा देते रहते हैं।

अभ्यास कीजिये

April 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पानी है यदि सफलता
अभ्यास कीजिये,
अपने हुनर का तुम निरंतर
अभ्यास कीजिये।
व्यवहार में कमी हो कहीं
अहसास कीजिये
कमियां सुधारने का,
अभ्यास कीजिये।
आदत है बोलने की
तो सच बोलिये,
जिह्वा में सच समाये
अभ्यास कीजिये।
करनी है जिद तो आप
कुछ बनने की कीजिये
गिरने की जिद नहीं हो
अभ्यास कीजिये।
अपने में मुग्ध हो तो
होते ही जाईये
कमियां दिखें स्वयं की
अभ्यास कीजिये।
निंदा की बात करना
व्यवहार में अगर हो
तो छूट जाए वह सब
अभ्यास कीजिये।

प्रतिकार करना है

April 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

रोना नहीं है तुम्हें
प्रतिकार करना है,
बुरी नजर से देख पाये नहीं
कभी कोई ,
तुम्हें बन दुर्गा, महाकाली
दुष्ट दल को मसल कर रखना है।
तुम्हारी राह तब तक
है नहीं महफूज जब तक
खुद के भीतर
जगा चंडी जगा काली
नहीं मर्दन करोगी।
तुम्हारी निरीह बोली
नहीं कोई सुनेगा
जब तलक नहीं तुम गर्जन करोगी।
दया का, धरम का
लोप सा हो गया है,
निर्लज्जता की व्याप्ति है सब तरफ,
संवेदना में जम गई है धूल की परत।
वासना में विक्षिप्त कर रहे हैं
नजरों से प्रहार,
निकाल ले चंडी बन तलवार
रोना नहीं है करना है गलत का प्रतिकार।

जुटाना होगा साहस

April 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हवा की दिशा में
भले ही सब बहें
मगर तू फैसला
खुद की हिम्मत से करना।
हो अगर पंखों में ताकत,
और पाने का जज्बा,
तब तेरा निश्चित होगा,
मन की मंजिल में कब्जा।
हवा इस ओर होगी,
भले तूफान होगा,
मगर उस ओर कोई
गर परेशान होगा,
तुझे तूफान को
काट कर जाना होगा,
मदद करने उसे
तुझे भिड़ जाना होगा।
जुटाना होगा साहस
जुटाना होगा आत्मबल,
तू हिम्मत से हवा के विपरीत भी
जीत लेगा कल।

फूल बन जाना है

April 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ठकराये गर कोई
तो पत्थर बन जाना है,
ताकि नुकसान न कर पाये,
सम्मान दे कोई तो
फूल बन जाना है
जो प्रेम की सुगंध लुटाये।
प्रेम के बदले
प्रेम होना ही चाहिए
नफरत की राहों से
किनारा होना ही चाहिए।
प्रेम का बीज
बोना ही चाहिए।
भूख लगने पर बच्चे को
रोना ही चाहिए।
गलत का साथ
छोड़ना ही चाहिए।
अच्छे से रिश्ता
जोड़ना ही चाहिए।
टेबल फैन को
अपनी ओर मोड़ना ही चाहिए
खुद का पसीना खुद में
सोखना ही चाहिए,
कोई गलत दिशा में हो तो
उसे रोकना ही चाहिए।

हद को लाँघिये

April 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कुछ नया इतिहास रचना है
तो हद को लाँघिये
अन्यथा रेखा के भीतर,
इंच में कद नापिये।
दूसरे की औऱ अपनी
कीजिये तुलना नहीं,
तुम गलत के सामने
गलती से भी झुकना नहीं।
लिंग से और जाति से
खींची गई रेखा मिटाकर
सब बढ़ें आगे सभी को
खूब अवसर दीजिये।
गर्व का पीकर हलाहल
क्यों दसानन सा बनें
दूसरों की तोड़ रेखा
मान भी मत कीजिये।
तोड़ कर सब रूढ़ियाँ जो
रोकती हैं उन्नयन को,
भेदभावों को मिटाकर,
कुछ नया सा कीजिये।

विदाई

April 27, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नाजों से पाली बिटिया
के विवाह का अवसर
विदाई का पल,
वह रोक नहीं सका
अपने आँसू।
दो आँसू क्या निकले,
भभक भभक कर रोने लगा,
याद आने लगे
बिटिया के बचपन के
पल,
कितना पापा पप्पा करती थी।
आज दुल्हन बन
चली अपने घर।
देखता रह गया वह राह।

खूब आनन्द लीजिये

April 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब भी खुशियों के पल आयें
खूब आनन्द लीजिये,
जिन्दगी की खूबसूरती का
खूब आनन्द लीजिये।
जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है,
जूझना अपना काम है,
लेकिन कर्म का भी
मिलता दाम है।
मगर कर्म के बाद भी
न मिल पाए फल
तब भी न होइये निराश,
छोटी छोटी बातों पर
कीजिये ख़ुशियों का अहसास,
जब खुशी आई
तब नहीं नाचे,
तो कब नाचोगे
दुख भुलाना होगा,
खुशी खोजनी होगी
बाकी दुःख सुख की बातें तो
अब तक भोगी हैं,
आगे भी भोगनी होंगी।

कड़वा भी पीजिये

April 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कभी-कभी
हमारी बात पर भी गौर कीजिए,
मीठे के साथ- साथ में
कड़वा भी पीजिये।
अंगूर, सेब, आम सब
आम बात है,
पंचरत्न नीम का भी
स्वाद लीजिये।
सूखा पड़े न वक्ष पर
अश्कों से सींचिये,
सही गलत के बीच में
रेखाएं खींचिये।
मीठे में व्याधियां हैं
कड़वे में है दवाई
कड़वे ने आज तक
कई व्याधियां मिटाई।
कड़वे से नफ़रतें हैं
मीठे से प्यार जग को
रक्षक है तन का कड़वा
यह भान है न जग को।
कड़वे वचन भले ही
लगते बुरे हमें हैं,
लेकिन सही दिशाएं
देते वही हमें हैं।
कभी-कभी
हमारी बात पर भी गौर कीजिए,
मीठे के साथ- साथ में
कड़वा भी पीजिये।

एक दिन सब ठीक होगा देखना

April 25, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज कल परसों
कभी तो पायेंगे
कुछ नई आशा की
किरणें दोस्तों।
कब तलक भय
का रहेगा राज यह
कब तलक फैली रहेगी वेदना।
कब तलक होगा
रुदन चारों तरफ
कब तलक साँसों के
संकट से घिरी,
इस तरह बिखरी रहेगी वेदना।
एक दिन निकलेगा
सूरज वैद्य बन,
एक दिन हर देगा सारी वेदना,
तब तलक साँसें
बचाना यत्न कर,
एक दिन सब ठीक होगा देखना।

न घड़ी एक भी गँवानी है

April 25, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नींद पलकों में भरी
स्वप्न आंखों में सजे
आज आलस्य त्याग
और कल मिलेंगे मजे।
आज है काली निशा
तारे तक खो गए हैं
ठोस चट्टान भी
देख यह रो गए हैं।
ये हवा चल रही है,
मगर है दूषित सी
श्वास लेना है कठिन
आस है अपूरित सी।
आस पूरित हो
खूब मेहनत कर,
न घड़ी एक भी गँवानी है।
है कठिन यह समय
मगर तूने
राह मंजिल की
अपनी पानी है।

अर्थ का महत्व है

April 25, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अर्थ का महत्व है
शब्द तो शब्द है,
बिना अर्थ के शब्द
निरर्थक है।
अर्थ कुछ भी
लगाया जा सकता है,
निश्चित अर्थ
या निर्मित अर्थ।
चेहरे के भाव का अर्थ
मूँछों में ताव का अर्थ
मझधार में नाव का अर्थ
आ रहे चाव का अर्थ
बस शब्द के
सार्थक होने की शर्त,
शिखर हो या गर्त,
मगर बात का
कुछ न कुछ हो अर्थ,
पाप और पुण्य की
सच और झूठ की,
दान औऱ लूट की
शब्दावली का अर्थ
अपनी अपनी रुचि के
अनुसार लगता सा,
प्रस्फुटित होता रहता है।
अर्थ है तब शब्द है
या शब्द से अर्थ है,
शब्द अर्थ का समन्वय
जिन्दगी की शर्त है।

भविष्य को आवाज

April 25, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कूड़े के ढेर में
खोजने में लगे थे
नन्हें नन्हें हाथ,
तन्मयता के साथ,
जरूरत की चीजें,
दे रहे थे सामाजिक
जीवन को,
सच्ची सीखें।
पूछा तो बोले
उनके घरों से
निकला हुआ यह कूड़ा है
मगर हमारे लिए
कूड़ा नहीं
इस आशा से जुड़ा है
कि इसमें कुछ होगा,
जो मदद करेगा जीने में,
भूख है, इसलिये
खोजना है इंतज़ाम
क्या पता उनका फेंका हुआ
आ जाये हमारे काम।
प्लास्टिक की बोलतें
बेचकर
एक गुड़िया खरीदी है
पिछली बार,
एक थैली तो ऐसी थी
जिसमें परौठे थे चार।
एक चाबी वाला घोड़ा था
घोड़ा ठीक था लेकिन
चाबी टूटी थी,
मगर मेरी किस्मत रूठी थी
वो दूसरे बच्चे को मिल गया,
उसका चेहरा खिल गया।
मैं भी ढूंढ रहा हूँ
यह टूटी फूँकनी मिली है
उसे फूंक रहा हूँ,
सीटी बजाकर
भविष्य को आवाज दे रहा हूँ।
अपनी इच्छा की पूर्ति को
संघर्ष का आगाज कर रहा हूँ,
आज कीचड़ में सना हूँ
कल कमल बन खिलूँगा
एक दिन आपसे
इंसान बन मिलूँगा।

टूटन में भी टूट मत(छन्दबद्ध)

April 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

इतना करना आज तू, उम्मीदें मत छोड़,
टूटन में भी टूट मत, ले आ नूतन मोड़,
ले आ नूतन मोड़, स्वयं के जीवन मे तू,
नहीं हताशा रखूं, ठान ले अब मन में तू,
कहे लेखनी लगे, आग अब घी हो जितना,
खूब हौसला रहे, ताप उग जाये इतना

रखना मन में हिम्मत

April 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

स्थिति कैसी भी आये
मगर तू रखना मन में हिम्मत।
हिम्मत से ही जीत मिलेगी,
हारेगी कठिनाई।
कभी घड़ी
कठिन आ जाये,
समझ परीक्षा आई।
भय मत करना
आये चाहे
कैसी भी कठिनाई।
तुझे लगेगा हार गया हूँ
मूर्छा मन में छाई,
तब देना छींटे उमंग के
भागेगी कठिनाई।
जिसने भी संघर्ष किया है,
जीत उसी ने पाई,
जो पहले ही हार गया हो
वो क्या जीते भाई।
हार नहीं हो
शब्दकोश में,
जीत मंत्र ले साध,
क्या होगा कैसा होगा
यह नहीं सोच तू बात।
अंतिम सांस बची हो जब तक
आस न छोड़ना भाई,
ईश्वर मदद करेगा तेरी,
होगी सब भरपाई।
आज रात है
कल दिन होगा,
भागेगी कठिनाई,
तेरी हिम्मत बढ़े रे मानव
तब यह कविता गाई,
सार्थक गीत बना दे मेरा
हिम्मत रख ले भाई।

मनुज अब सुमिरन करता है

April 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

श्रीराम हरो पीड़ा
मनुज अब सुमिरन करता है।
जहां तहाँ फैली महामारी,
दुखी हुई प्रजा यह सारी,
दूर करो रजनी अंधियारी,
सुमिरन करता है,
मनुज अब सुमिरन करता है।
संकट से घिर गए हैं सारे
तुम न उबारो तो
कौन उबारे,
मानव जाति पड़ी विपदा में,
सुमिरन करता है
मनुज अब सुमिरन करता है।
फैल गया सब ओर रोग है
एक में फैला कई में फैला
रोको अब इस संक्रमण को
सुमिरन करता है,
मनुज अब सुमिरन करता है।
श्वास को तरसा
वायु थम रही,
दम घुटता रह गया मनुज का,
ऐसे में एक आस बने हो,
सुमिरन करता है
मनुज अब सुमिरन करता है।
कवि की कलम शारदा बसती
लेकर आश्रय उनका,
माँ के चरणों में वंदन कर
सुमिरन करता है,
मनुज अब सुमिरन करता है।
कहना सुनना कठिन हुआ है
एक ही अस्त्र बची दुआ है,
आज बता दो
कौन दवा है,
सुमिरन करता है
मनुज अब सुमिरन करता है,
श्रीराम हरो पीड़ा
मनुज अब सुमिरन करता है।
—– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय,चम्पावत, उत्तराखंड

हर सको दर्द दूजे का

April 23, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

भीड़ के बीच में
ख्याल खुद का रखो,
हर सको दर्द दूजे का
नुस्खा रखो।
वेदना हो भले
दिल के भीतर भरी
मगर होंठ में आप
मुस्कां रखो।
यह न अहसास हो
दूसरे को कभी
आपका दिल
गमों से भरा है बहुत,
आपको देखकर
सबको ऊर्जा मिले,
आपको देखकर
नव प्रेरणा मिले।
दर्द आने न देना
नयन बूँद तक,
उसको भीतर सूखा दो
उड़ा दो कहीं,
जिन्दगी है गिने चार
दिन की यहाँ,
चार दिन को गँवाना
गमों में नहीं।
भीड़ के बीच में
ख्याल खुद का रखो,
हर सको दर्द दूजे का
नुस्खा रखो।

कुदरत की छवि

April 23, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

थोड़ा निहारने दो
कुदरत की छवि मुझे तुम
तुम भी निहार लो ना
इस वक्त भूलो सब गम।
सूरज निकल रहा है
सब ओर लालिमा है,
कलरव में उडगनों के
प्यारी सी मधुरिमा है।
चारों तरफ है शुचिता
सब साफ दिख रहा है,
ठंडी पवन का झौंका
नवगीत लिख रहा है।
मज्जन किये से पर्वत
उन रजकणों से ऐसे
चमके हुए हैं देखो,
मोती भरा हो जैसे।
फूलों ने रात भर में
भर कर शहद स्वयं में
भँवरे बुलाने जैसे
संदेश भेजा वन में।
भेजी सुंगध वन में
भेजी उमंग मन में
शोभा सुबह की ऐसे
उल्लास लाई मन में।

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