वृक्ष

April 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दो पत्ती के रूप में,
उगता है नन्हा बीज,
धीरे-धीरे एक दिन,
विशाल वृक्ष बनता है।
जो सैकड़ों प्राणियों का
बसेरा बनता है।
छांव देता है,
प्राणवायु देता है।
फल देता है,
फूल देता है,
बरसात बुलाता है,
सावन में
झूले झुलाता है।
जोड़े मिलाता है।
वृक्ष लेता कुछ नहीं
बस देता है देता है।

दो रूप न दिख पाऊँ

April 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हाथी की तरह
दो दांत मत देना मुझे प्रभो
कि बाहर अलग, भीतर अलग।
दो रूप न दिख पाऊँ।
दो राह न चल पाऊँ।
जैसा भी दिखूँ
एक दिखूँ,
नेक रहूँ।
न किसी से ठेस लूँ,
न किसी को ठेस दूँ।
बिंदास गति में बहती
नदी सा
चलता रहूँ।
हों अच्छे काम मुझसे,
उल्टा न चलूँ
सुल्टा रहूँ,
धूप हो या बरसात हो,
उगता रहूँ,
फूल बनकर
बगीचे में खिलता रहूँ।
महक बिखेरता रहूँ,
प्रेम सहेजता रहूँ।

चले चल मस्त राही मन

April 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

चले चल मस्त राही मन
नहीं काम है घबराना।
जहाँ मिलती चुनौती हो
उसी पथ में चले जाना।
जहाँ हो प्रेम का डेरा
वहाँ थोड़ा सा सुस्ताना
जहाँ हरि भक्ति पाये तू
जरा उस ओर रम जाना।
न करना तू गलत कुछ भी
न कहना तू गलत कुछ भी
जहां संतोष सच्चा हो,
वहां डेरा जमा लेना।
न कोई डर न कोई भय
न दबना है न पिसना है,
अगर डरना है मेरे मन
तुझे ईश्वर से डरना चाहिए।

उसका बनना चाहिए

April 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जितना खुद से हो सके
सेवा करनी चाहिए,
कष्ट झेलते मानव की
सेवा करनी चाहिए।
इसी बात के लिए हमें
मानव बोला जाता है,
मानव हैं, मानवता का
परिचय देना चाहिए।
स्याह पड़े असहाय की
आशा बनना चाहिए,
जिसका कोई हो नहीं
उसका बनना चाहिए।
बन जाएं कितने बड़े
उड़ें हवा के संग,
लेकिन हमको मूल से
मतलब रखना चाहिए।
दुःखी आंख के आंसुओं को
सोखे जो साथ,
वैसा ही कमजोर का
साथ निभाना चाहिए।

स्नेह बढ़कर दीजिये

April 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

स्नेह कोई दे अगर तो
स्नेह बढ़कर दीजिये
जंग को ललकार दे तो
जंग पथ पर कूदिये।
सीधा सरल रहना है तब तक
जब तलक समझे कोई
अन्यथा चालाकियों में
मन कड़ा सा कीजिये।
गर कोई सम्मान दे तो
आप दुगुना दीजिये,
गर कोई अपमान दे तो
याद रब को कीजिये।
गर कोई सहयोग दे तो
आप भी कुछ कीजिये,
हो उपेक्षा भाव जिस पथ
त्याग वह पथ दीजिये।
देखिए उस ओर मत
मुड़कर जहाँ हो दर्द भारी,
ना भले की ना बुरे की
चाह ही तज दीजिये।

कोरोना बढ़ने लगा

April 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कोरोना बढ़ने लगा,
रह सचेत इंसान,
मास्क लगाकर रखना है
कहना मेरा मान।
कहना मेरा मान,
बचा खुद के जीवन को,
जागरूकता से ही,
रक्षित कर जीवन को।
आज वक्त की यही जरूरत
सजग रहो,
बचाव करो ना,
रोको यह संक्रमण
तुम रोको कोरोना।

गुस्सा तो कमजोर का गुण(कुंडलिया छन्द)

April 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

गुस्सा तो कमजोर का, गुण होता है मान,
गुस्से से इंसान का, कम होता सम्मान।
कम होता सम्मान, कभी गुस्सा मत करना,
बढ़ते जाना और, स्वयं मन स्थिर रखना।
कहे लेखनी कहा, बुजुर्गों ने यह किस्सा,
वही सफल है आज, छोड़ दे जो मन गुस्सा।
———- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय,

यश-अपयश में एक समान

April 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सबसे गहरी यह बात है मन
तूने स्थिर रहना होगा,
कभी कहीं, कभी कहीं,
ऐसे न तुझे बहना होगा।
एक लीक एक धारा,
एक मार्ग हो साधन एक
एक नजर रख मंजिल पर
ऐसे तुझको बढ़ना होगा।
न क्रोध, न दर्द, न उलझन हो,
उत्साह सजा सा हरदम हो,
रह तू एक समान सदा मन,
लाभ अधिक हो या कम हो।
यश-अपयश में एक समान
गाली हो या हो गुणगान,
कभी न विचलित हो तू मन,
पथ रोशन हो या फिर तम हो।

प्रेम को बाँट लूँगा मैं

April 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नख नुकीले काट लूँगा मैं
प्रेम को बाँट लूँगा मैं
दूर कर के बुराई सब
भलाई छाँट लूँगा मैं।
मगर जो सत्य पथ है वह
जकड़ रखना पड़ेगा ना,
हाथ में लठ साफ सा
रखना पड़ेगा ना,
कि कोई जानवर बनकर
न नोचे सत कदम मेरे,
मुझे अपना सहारा एक तो
रखना पड़ेगा ना।
किसी से बोल दिल का एक तो
कहना पड़ेगा ना,
मुझे अपनों का अपना भी
कभी रहना पड़ेगा ना।
जरा सा मुस्कुरा दे
ओ मेरे हम दम प्रीतम तू
मुझे है नेह तुझसे यह मुझे
कहना पड़ेगा ना।

सदा मस्तक रहे ऊँचा

April 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

उठो जागो उठो जागो
करो इस मुल्क को रोशन
जगा लो देश का यौवन,
लगा दो आज निज तन मन।
सदा मस्तक रहे ऊंचा,
नहीं हो देखना नीचा,
हमारा देश यह भारत,
रहे ऊंचा सदा ऊंचा।
अहित कुछ भी न कर पायें
हमारा देश के दुश्मन
उठा लें अब खड़क को हम
मसल दें दुश्मनों को हम।
करें प्रयास सारे मिल,
बुराई दूर कर दें सब,
हर तरफ हो सुहाना कल,
सुहाना कल सुहाने पल।

आस नवरूप में बुलानी है

April 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हमें तो रोशनी की बात ही उठानी है,
जहाँ हो दर्द वहां पर दवा लगानी है।
छोड़ भीतर की गुनगुनाहट को,
बात अब जोश से सुनानी है।
छोड़ मन की समस्त टूटन को
आस नवरूप में बुलानी है।
लेखनी प्रतिबद्ध रखनी है,
फर्ज की बात अब निभानी है।
धूल कर हर तरह की दुविधा को
दे हवा दूर को उड़ानी है।
हो गये जो निराश जीवन में
उनमें आशा नई जगानी है।
घड़ी-पलों में बीतता है समय
घड़ी न एक भी गँवानी है।

भूख तक अन्न पहुंचाना होगा

April 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

भूखे तक अन्न पहुंचाना होगा
गरीब, असहाय, अनाथों को
खोज खोज कर अपनाना होगा,
भेदभाव की बातों को दफनाना होगा,
मनुष्य हैं हम मनुष्यता को
अपनाना होगा।
यदि अंधेरे का भीषण जंगल हो,
न कोई रोशनी का साधन हो,
तब वहीं पर उठा के सूखी घास
पत्थरों को रगड़ना होगा।
निरीह की मदद को मन
मचलना होगा।
कर्मपथ निकलना होगा।
गिर गिर के संभलना होगा।
झूठ से रोज उलझना होगा,
भूख तक अन्न पहुंचाना होगा,
कमजोर को अपनाना होगा।

हिरण सा मन बना लूँ

April 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जुबान से मेरी
किसी का दिल न दुखे
न कभी लेखनी यह,
ठेस के भाव लिखे।
न निशाना हो मेरा
कहीं पर व्यक्तिगत सा
न कोई बात बोलूं
दिखूँ जो व्यक्तिगत सा।
चाह इतनी रखूं कि
दिखे जो अनगिनत सी,
भूल जाऊँ वो टूटन
जो उपज थी विगत की।
हिरण सा मन बना लूँ
दिखे चंचल सा बाहर
मगर भीतर कलेजा
शेर का अब लगा लूँ।
धीर-गंभीर बैठूँ
नहीं विचलित कहीं पर,
कदम रौखड़ जमीं
आँख होंगी नमी पर।
भटक जाऊँ अगर तो
वहां पहुँचूं भटकर
जहाँ मन ईश मन्दिर
खड़ा बिंदास डटकर।
लिखूं वो सब मुझे जो
ले चले प्रेम पथ पर,
मिटा दूँ सब गलत वह
उगे जो द्वेष पथ पर।

सद न छोड़ कहती है

April 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

विचार ही तो हैं जो
व्यक्तित्व लिखते हैं मेरा,
सदविचार उत्साहित कर
बाग सींचते हैं मेरा।
सकारात्मकता मुझे
आशान्वित कर,
चाह को मेरी
पुष्पित कर पल्वित कर,
एक लय देती है,
प्रेममय करती है।
मगर कभी कभी
नकारात्मकता
तपन दे कर
मुरझा सी देती है,
राही की राह
अवरुद्ध करती है।
ऐसे समय में
हिम्मत से काम लेकर
छोड़ कर वो तम की राह
सद की तरफ बढ़ना
जरूरी हो जाता है,
नीति यही कहती है,
सद न छोड़ कहती है।

जीवन की मधुर बातों में

April 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

गुनगुनाते गीत मेरे
जीवन से जुड़े लफ़्ज़ों में
बुजुर्गों की दुआओं में,
प्रेम की निगाहों में ।
ममता के अश्कों में,
उमड़ते भावों में
भर रहे घावों में
टूटती चाहों में
दर्द में आहों में।
निकलते बोल मेरे
जीवन की मधुर बातों में
नेह भरे नातों में
मीठी मुलाकातों में
बीत गई यादों में,
गुनगुनाते रहे
गीत मेरे होंठो में
बिक रहे नोटों
बड़ों में छोटों में
दिल में लगी चोटों में,
निकलते बोल मेरे
ईश तुम सुन लेना
और सत पथ देना।

खुद पर रख विश्वास

April 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मगन हुआ मन आज है, उछल रहा उत्साह,
जीवन जी लूँ खुश रहूँ, खुद पर रख विश्वास।
खुद पर रख विश्वास, बढ़ूँ, प्रसन्न रहूँ मन,
जो दे ईश उसी में हो संतोष मेरा धन।
कहे लेखनी सत्य, भरा विस्तार गगन,
इसीलिए तो हुआ, आज मन खूब मगन।

सच की ही नकल होती है

April 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

धन की बातों से बड़ी
मन की बात होती है,
तन की बातों से बड़ी
मन की बात होती है।
गरीब आंख में
कुछ और बात हो या न हो
उनकी आंखों में मगर
ईश्वर की चमक होती है।
बो दिये बीज के जैसी ही
फसल होती है,
बिम्ब जैसा भी रहे
चीज असल होती है।
हमारी बात पर
करना नहीं यकीन साथी
क्योंकि हर बात बस
सच की ही नकल होती है।
जब कभी चाहते हैं
जग जाएं
तब निरी आँख क्यों
जगते हुए भी सोती है।

धन्य है किसान तू

April 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

धन्य है किसान तू
जो उगाता अन्न है,
भाव है जो दान का
उसमें तू ही सम्पन्न है।
खोद कर माटी
डाल कर के बीज उसमें
तूने उगाया, खिलाया
तू तो सचमुच धन्य है।
रात दिन जी-तोड़ मेहनत
खाद, पानी, धूप, बारिश
इन सभी में रम गया तू,
कर्तव्य पथ पर जम गया तू,
तूने उगाया हमने खाया,
भूख को अपनी मिटाया,
जी गए मेहनत से तेरी
जी का सहारा है दिलाया।
धन्य है किसान तू
जो उगाता अन्न है,
भाव है जो दान का
उसमें तू ही सम्पन्न है।

प्रेम भावों को लूटा दूँ

April 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जी जला दूँ गीत गाकर
फूंक डालूँ स्वर जलाकर
भेदभावों को मिटा दूँ,
प्रेम भावों को लुटा दूँ।
आँसुओं को सब सुखा दूँ,
सत्य पर नजरें झुका दूँ,
भावनाओं में न बह कर,
लेखनी अपनी उठा लूँ।
ठेस पाऊँ सौ जगह से,
धर्म पथ की ही वजह से,
पर अडिग चलता रहूँ,
भाव निज लिखता रहूँ।
शांति हो कोलाहलों में
लेखनी हो सांकलों में
हो मुखर कहता रहूँ मैं
बात सच लिखता रहूँ मैं।

यदि हो अमावस चाँद दो( मधुमालती छंद)

April 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आओ चलो बिंदास बन
निज राह को नवगीत दो,
हो उलझनें जिस राह में
उस राह को भी गीत दो।
कर बांध मुट्ठी बांध लो
यदि हो अमावस चाँद दो,
रात कर दो दोपहर तुम
सबको उजाला बाँट दो।
असहाय की कर लो मदद
तुम शेर को भी माँद दो।
यदि हों कदम गंदी जगह
खुद को स्वयं से डांट दो।

उठ तू जगा विवेक (कुंडलिया)

April 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

माफी तो मजबूत का, गुण होता है नेक,
कमजोरों की मदद को, उठ तू जगा विवेक।
उठ तू जगा विवेक, दिखा मत नाड़ी का बल,
यह बल हो कमजोर, तुझे फिर रौंद न दे कल।
कहे लेखनी समय, समय की बातें साथी,
किसी को दो माफी, किसी से मांगो माफी।

मेहनत-मंजिल

April 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मनुष्य सोचता है
मंजिल दिखे तो ,
तब मैं मेहनत करूँ।
मंजिल सोचती है
मेहनत करे तो
उसे झलक दे सकूँ।
ऐसे में जिसने
कर्मपथ को अपना
कदम है बढ़ाया,
उसी ने हमेशा
मंजिल को पाया।
जिसने दिखाया
आलस्य खुद में
उसने स्वयं का
पथ भटका पाया।
जिसने निगाहों को
शिखर पर टिकाया
उसने स्वयं को
मंजिल में पाया।
जिसने भी मन अपना
भटका दिया,
उसने स्वयं को
अटका दिया।
कल के लिए काम
लटका दिया
उसने स्वयं को
झटका दिया।

कमी बता देना

April 2, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बुरी आदत मेरी
नजरअंदाज मत करना
मुझे बता देना।
सच में गर मित्र हो,
सुधार करने को
मुझे बता देना।
गीत कोई तुम्हें
लगें कर्कश मेरे,
भाव मेरे कहीं पर
दुखाएँ दिल तेरा गर,
मुझे बता देना।
बिना बताये
भान हो पाना,
नहीं सम्भव स्वयं
स्वयं को जाना
नहीं मुमकिन स्वयं।
तुम मुझे देखकर
कमी बता देना,
सुधार करने को
कमी बता देना।

वो शक्ति दे

April 2, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दूर कर देना
बुरी आदत मेरी मेरे मौला,
किसी को दर्द न दूँ
बल्कि उत्साह दूँ मेरे मौला।
बह रहा हो
हताशा की
नदी में गर कोई,
उसे उबार लूँ
वो शक्ति दे मेरे मौला।
डूबते को नजरअंदाज
कर पाऊँ नहीं,
मदद कर लूँ
बिना उसके मैं रह पाऊँ नहीं,
वेदना दूर करने में
रहूँ रत रात दिन,
इस तरह सार्थक सी
भक्ति दे मेरे मौला।
दूर कर देना
बुरी आदत मेरी मेरे मौला,
किसी को दर्द न दूँ
बल्कि उत्साह दूँ मेरे मौला।

नेकी के वस्त्रों से

April 2, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ऊपर वाला
बिना वस्त्रों के भेजता है,
जन्म के वक्त निःवस्त्र
भेजता है।
ताकि आप ढक सको
नेकी के वस्त्रों से
अपना तन,
प्रेम से आच्छादित कर सको
अपना मन।
नेकी जरूरी है,
नेकी से ही
सार्थक होता है जीवन।
नेकी करने को
आपके सामने है
विस्तृत भूमि
और खुला आसमान,
मानो खुद को
धरती पर
केवल एक मेहमान
नेकी करो
और अपना बना लो
धरती और आसमान।

सच्ची दिशाओं में मोड़ो

April 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कहना सरल होता है
निभाना कठिन,
अगर ठान लो तो
नहीं कुछ कठिन।
केवल कहो मत
कर्म करते रहो
रुको मत कहीं पर
चलते रहो।
किसी का बुरा मत
सोचो कभी भी,
इज्जत बराबर
करो तुम सभी की।
टूटे को जोड़ो,
किसी को न तोड़ो,
जिन्दगी को सच्ची
दिशाओं में मोड़ो।
निगाहों में पानी
भावों में नरमी,
रख लो, रहो खुश
निराशा को छोड़ो।

आशा जगाते रहूँ

April 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

गीत लिखते रहूँ
मैं सुनाते रहूँ,
सो गए को जगाते रहूँ।
गर उठें भाव टूटन के मन में
बन रबर मैं मिटाते रहूँ।
निराशा हटाते रहूँ,
आशा जगाते रहूँ,
प्यार भावना को जगा
मैं मुहब्बत लुटाते रहूँ।
झकझोर कर आदमी को
आदमियत बताते रहूँ,
हो रही हो गलत बात तो
अंगुली उठाते रहूँ।
गीत लिखते रहूँ
मैं सुनाते रहूँ,
सो गए को जगाते रहूँ।
गर उठें भाव टूटन के मन में
बन रबर मैं मिटाते रहूँ।

मित्र साथ रखिये

April 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुगंध के लिए
इत्र पास रखिये
कठिन समय के लिए
मित्र पास रखिये।
विपत्ति में हौसला रखिये,
हँसी-मजाक का भी
शौक सा रखिये।
दुखों को आप हल्के में रखिये
अन्यथा रोज सकते में रहिए।
ईश दरबार में
झुकते रहिए,
छोड़ चिंताएं सभी
काम करते रहिए।

मित्र साथ रखिये

April 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुगंध के लिए
इत्र पास रखिये
कठिन समय के लिए
मित्र पास रखिये।
विपत्ति में हौसला रखिये,
हँसी-मजाक का भी
शौक सा रखिये।
दुखों को आप हल्के में रखिये
अन्यथा रोज सकते में रहिए।
ईश दरबार में
झुकते रहिए,
छोड़ चिंताएं सभी
काम करते रहिए।

क्यों है

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आदमी आज परेशान इतना क्यों है,
लुटा सा देखता अरमान क्यों है,
खुद के घर में बना मेहमान क्यों है,
इंसान है तो फिर बना हैवान क्यों है।
धड़कता दिल बना बेजान क्यों है,
जानता है सभी कुछ फिर बना अंजान क्यों है।

तभी सार्थक है लिखना

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मेरे लिखे से उजाला हो जाये
कुछ भी नहीं तो
उठें चिंगारिया,
किसी को जिन्दगी का
रास्ता मिल जाये।
अंधेरे में भटकता
अगर मन हो किसी का
मेरी दो पंक्ति उसको
रास्ता दे आये।
तभी सार्थक है लिखना
किसी काम आये,
मेरी पहचान छोड़ो
जमाना लाभ पाये।
देख अदना सा कवि हूँ
मगर संदेश मेरा,
अडिग रह राह अपनी,
न बन चिंता का डेरा।
साथ लाये नहीं कुछ
साथ जाये नहीं कुछ
बताकर सब गए हैं
पुराने कवि यही सच।
किसी को ठेस देने
कलम मेरी उठे मत
शुद्ध साहित्य सेवा
रहे केवल मेरा पथ।

घिस-घिस रेत बनते हो

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अहो पत्थर! नदी से
घिस- घिस रेत बनते हो,
धूल बह जाती है,
तुम ही तुम शेष रहते हो।
नदी की नीलिमा में
तुम बहुत ही श्वेत लगते हो।
भवन निर्माण में
तुम्हीं मजबूत बनते हो।
फिर भी नजीरों में जमाना
भावनाहीनों की तुलना
पत्थरों से कर
निरा अपराध करता है।
बोल कर पत्थर का दिल
पत्थर का वो अपमान करता है।

अनुभव सिखायेगा

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ईंट फेंकेगा आप पर कोई
आप उस ईंट को संभाल कर रखना,
कभी भवन बनाओगे
या कुछ सृजन करोगे,
काम आयेंगी वे ईंट और पत्थर।
आंख में रेत झौंके
आपके अगर कोई,
सच का चश्मा लगाना
आँख की नदी के
किनारे खड़े हो,
एकत्र कर लेना वह रेत।
सच का भवन बनाते वक्त,
रेत काम आयेगी।
जिन्दगी बतायेगी,
जमाना बतायेगा,
किस परिस्थिति में क्या करना है
अनुभव सिखायेगा।

मुस्कुराहट ही बड़ी पहचान है

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम्हारी मुस्कुराहट की
अजब सी बात देखी आज मैंने
दर्द में डूबा हुआ मन
दर्द सारा भूलकर,
फूल खुशियों के उगाने को
बढ़ाता है कदम।
मुस्कुराहट ही बड़ी पहचान है
इंसान की।
जानवर हँसते नहीं
शोभा है यह इंसान की।
खूब हँसते ही रहो,
औरों को भी मुस्कान दो,
मेहनत करो हँसते रहो
पूरा करो अरमान को।
यूँ जीवन में कभी पल
दर्द के भी लाजमी हैं,
हिम्मत नहीं छोड़ो कभी
दर्द में मुस्कान लो।

ईश ऐसा वर मुझे दे

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ईश ऐसा वर मुझे दे
ईर्ष्या से दूर बैठूँ,
पंक्तियाँ लिख दूँ वहाँ
जिस ओर थोड़ा दर्द देखूँ।
देख अनदेखा नहीं
कर पाऊँ पीड़ा दूसरे की,
बल्कि खुद महसूस
कर पाऊँ मैं पीड़ा दूसरे की।
मैं किसी के काम आऊँ
सीख यह मिलती रहे,
उठ मदद कर दूसरे की
आत्मा कहती रहे।
ईश मेरा मन करे
कुछ इस तरह की बात बस
बस रहूँ सेवा में रत
कोई नहीं हो कशमकश।

नेह, प्रेम, सम्मान

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जहां नहीं संतोष मन
छोड़ दीजिए राह,
उलझन की हर वस्तु की
छोड़ दीजिये चाह।
छोड़ दीजिये चाह
साथ में साथ मित्र का
जिसको केवल याद
रहता सौरभ इत्र का।
कहे सतीश जाना,
तुम दिल खोल वहां
नेह प्रेम सम्मान
का खूब स्थान हो जहां।

देख रहा दर्पण मनुज

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

देख रहा दर्पण मनुज
करने निज पहचान,
बाहर तो सब दिख गया
भीतर से अंजान।
भीतर से अंजान,
खिली लालिमा देख कर
मुस्काया मन ही मन
देखा जब सुन्दर तन।
कहे सतीश बाहर
भीतर रह तू एक,
आंख बंद कर निज
अंतस के भीतर देख।

बात हो रोजगार की

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बात हो रोजगार की, भरें युवा के जख्म,
जगे नया उत्साह अब, नयी बजे कुछ नज्म।
नयी बजे कुछ नज्म, खिले माथा यौवन का,
सिंचित कर हर फूल, खिले भारत उपवन का,
कहे लेखनी न्याय हो अब यौवन के साथ,
बेकारी हो दूर, यही हो पहली बात।

क्यों रखना है भेद

March 31, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मत भूलो सब एक हैं, क्यों रखना है भेद,
मानव हैं मानव सभी, क्यों रखना संदेह।
क्यों रखना संदेह, न कोई बड़ा न छोटा,
भेदभाव ने मनुज कुल का गला है घौंटा।
कहे सतीश सब एक, देख यह जन्म और गत,
सभी एक से मानव हैं तू भेद बना मत।

पानी बचाओ

March 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कई माह बीत गये
बारिश नहीं हुई।
सूखी धरा के अधर
ताकते हैं नभ को।
प्राणी हैं व्याकुल
जल की कमी से,
सब तरफ है सूखा
प्यास आज सबको।
पौधे झुलस कर
मुरझा गए हैं,
कब होगी बारिश
देखते हैं नभ को।
पानी बिना जीवन
कुछ भी नहीं है,
पानी से ज्यादा
कुछ भी नहीं है,
अतः आज ऐसा
नारा लगाओ
पानी बचाओ
पानी बचाओ।

मैल को धो डालिये

March 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बीज बोना है तुम्हें,
सद्भाव का बो डालिये,
साफ हो मन, साफ हो तन,
मैल को धो डालिये।
यूँ ही मंजिल जीत लेंगे
भ्रम को मत पालिये,
हो सके तो आप हृदय में
मुहब्बत पालिये।
यदि कहीं कोई दुखी
मिल जाये तुम्हें राह में
मान मौका आप उसकी
कुछ मदद कर डालिये।

दुआ खूब पाता रहेगा

March 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जाग इंसान उनकी मदद कर
है सहारे की जिनको जरूरत,
भूख से जो बिलखता है बचपन
आगे रहकर तू उसकी मदद कर।
क्या करेगा कमा करके इतना
क्या करेगा जमा करके इतना,
तू कमा खूब लेकिन कमाई
तू गरीबों में थोड़ा लगा ले।
कब तलक यूँ नजर फेर लेगा,
दान में भी जरा सा लगा ले।
साथ धेला नहीं जा सकेगा
सब यहाँ का यहां ही रहेगा,
गर जरा सा मदद को बढ़ेगा,
तू दुआ खूब पाता रहेगा।

होली की सबको बधाई

March 29, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

होली की सबको बधाई
अनेकों शुभकामनाओं के साथ।
रंग भरा हो जीवन सबका
खुशियां पायें आप। बधाई
होली की सबको बधाई।
गम का साया, पास न फटके
कोई बनता काम न अटके,
कदम बढ़ें निष्पाप। बधाई
होली की सबको बधाई।
बच्चे ऊंची शिक्षा पायें
यौवन को रोजगार मिले
निर्धन को धन, सबको सुखी तन
राम नाम का जाप।
अनेकों शुभकामनाओं के साथ। बधाई।
होली की सबको बधाई।
———– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, चंपावत।

नशे को दूर भगाओ

March 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नशा नहीं, जिन्दगी बचाओ
त्यौहारों के समय इस तरह
मत जीवन पर दांव लगाओ।
नशा स्वयं से दूर भगाओ।
झगड़े और फसादों की जड़
मद्यपान विवादों की जड़,
अपनी हानि नशे से होती,
इज्जत सबके आगे खोती
मानो इसको एक बीमारी
भरी समस्या इसमें सारी।
नशा न लो जिन्दगी बचाओ।
तन के भीतर कोमल अंग हैं
मद्यपान से सारे तंग हैं,
थोड़ी देर आनन्द रहेगा,
बाकी सब कुछ मंद करेगा।
अतः नशे को दूर भगाओ
जीवन को खुशहाल बनाओ।

होली की धूम मची है

March 28, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

होली की धूम मची है
घर – घर आँगन,
रंग है बिखरा,
रंग से जोबन रूप है निखरा।
मन की उमंग सजी है,
होली की धूम मची है।
रंग है उनका
खिल गया हम पर,
जो भी लगाया
फब गया हम पर,
प्रेम की पंक्ति रची है
होली की धूम मची है।
आप भी आओ
हम संग खेलो
प्रेम के प्रेम बदले
प्रेम को ले लो,
प्रेम की जोत जगी है।
होली की धूम मची है।
ढोल-मृदंग, मजीरा बाजे
राधा नाचे, कन्हैया नाचे
धुन प्यारी सी बजी है।
होली की धूम मची है।

होली में हम रम गए

March 27, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

होली में हम रम गए
पूछ न पाये बात,
कैसे हो कितना लगा
रंग बताओ आज।
रंग बताओ आज
कौन सा रंग लगा है,
प्रेम और माधुर्य
आज हर अंग सजा है
कहे लेखनी रंग
रंगा हो जीवन का पल
यही मिले आपको
अद्भुत होली का पल।

यह कैसी है हुड़दंग

March 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

होली है
पावन त्यौहार
उड़ रहे हैं रंग
मगर यह कैसी है हुड़दंग,
कई पड़े हुए हैं
सड़क पर नालियों पर
पीकर शराब,
कर दी है उन्होंने
अपने पारिवारिकजनों की
खुशियाँ खराब।
लगी में दौड़ा रहे हैं
अनियंत्रित वाहन,
राहगीरों पर
फेंक रहे हैं
हो-हल्ले का पाहन।
पवित्र होली
में स्वयं का अपवित्र चेहरा
दिखाकर मौहल बिगाड़ रहे हैं
और दिनों की खुंदक
त्यौहार में निकाल रहे हैं।

किसी को दुःख न मिले

March 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सब पायें नवरंग
किसी को दुख न मिले भगवान।
भरपेट भोजन, वसन ढका तन,
आस चढ़े परवान।
किसी को दुःख न मिले भगवान।
जीवन सबका खुशियों भरा हो
सूखे न मन कोई,
हरा ही हरा हो,
खूब उगें धन-धान।
किसी को दुख न मिले भगवान।
समरसता हो
लोगों के भीतर,
भेदभाव सब दूर रहे
मानव एक समान।
किसी को दुख न मिले भगवान।
सब राजा हैं
सब प्रजा हैं
कोई न समझे मालिक खुद को
सब हैं यहाँ मेहमान।
किसी को दुःख न मिले भगवान।
सब पायें नवरंग
किसी को दुःख न मिले भगवान।

मीठी सी बोली सुना दे

March 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

चल गुजिया ही खिला दे
मीठी सी बोली सुना दे
समझेंगे खेल ली होली,
पोत दे लालिमा रोली।
भूल जा सारी शर्म पुरानी
झिझक से काहे होली मनानी,
आज हमें है रस्म निभानी
चल गुजिया ही खिला दे
मीठी सी बोली सुना दे।
रंग से तर हैं लोग बिरज के
मन में लहर सी उठी है इधर से
हमको भी होली रंगा दे,
चल गुजिया ही खिला दे।

पानी में भी रंग है

March 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पानी में भी रंग है, बेरंगा मत देख,
ज्योति जगा ले नयन में, अंधियारा मत देख,
अंधियारा मत देख, रोशनी खोज डाल अब,
रंग खोज ले और अहमिका छोड़ डाल अब।
कहे लेखनी देख, और कर ले नादानी,
होली में मत फेर , इस तरह पानी-पानी।

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