उन्हें हम शिक्षक कहते हैं

April 22, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अंधेरी राह जीवन की
हमारी रोशन करते हैं,
हमें जो ज्ञान देते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
दिशा देते हैं जीवन को
करा कर बोध अक्षर का
नयन में ज्योति देते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
बिना शिक्षा के जीवन में
नहीं कोई सफलता है,
हमें शिक्षित बनाते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
हमें सदमार्ग देने को
जिन्हें ईश्वर ने भेजा है,
फरिश्ते से हैं सच में वे
जिन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
हमें मानसिक व सामाजिक
बुलन्दी की तरफ ले जा
हमारा कल सजाते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
नहीं लेते कभी कुछ वे
वरन देते बहुत कुछ हैं
हमें आगे बढ़ाते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
हमें करते प्रेरित हैं
हमारा कल बनाते हैं,
हमें आगे बढ़ाते हैं,
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।

चिपकाता है पोस्टर

April 22, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हर बार चिपकाता है
वह पोस्टर।
बैनर टाँगता है हर
चुनाव में।
इस आशा में कि
कभी तो बैठूँगा
अपने विकास की नाव में।
कुछ खिला पिला दिया जाता है
तात्कालिक संतुष्टि को,
ठेके-पल्ले का भरोसा दिया जाता है
ताकि समर्थन की पुष्टि हो,
वह नारे लगाता है जोर से
लेकिन पाँच साल बीत जाते हैं बोर से।
उनकी गाड़ी बदल जाती है,
इसकी उजली दाड़ी निकल आती है,
फिर भी उसका विकास
अटका रह जाता है,
वह भटका रह जाता है।
वह जहाँ था वहीं रह जाता है,
फिर पोस्टर चिपकाने में लग जाता है।
कई पांच साल बीत जाते हैं,
वे जीत जाते हैं
वह हार जाता है,
उसका विकास पड़ा रह जाता है,
और लोग विकसित हो जाते हैं।

जिन्हें सब कहते हैं श्रीराम

April 21, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हैं वह मर्यादा का नाम
जिन्हें सब कहते हैं श्रीराम,
पुरुषोत्तम, आदर्श संस्थापक,
न्यायप्रिय श्रीराम।
जन्म हुआ दशरथ जी के घर
अयोध्या जैसा धाम,
अपमानित थी मात अहिल्या
उन्हें दिया सम्मान।
लांछन से पत्थर बन बैठी
उन्हें दी नव पहचान,
हैं वह मर्यादा का नाम
जिन्हें सब कहते हैं श्रीराम।
खर-दूषण, ताड़िका आदि के
धर्म विरोधी काम
फैले थे सब तरफ भूमि में
उन्हें रौंधते राम,
चारों तरफ हुई धर्मजय
जय जय जय श्रीराम।
है वह मर्यादा का नाम
जिन्हें कहते हैं श्रीराम।
रावण तानाशाह बना था
मनमानी थी उसकी
धर्म कार्य बाधक था वह
चलती थी बस उसकी।
मातृशक्ति और ऋषि मुनियों का
करता था अपमान।
खुद वन जाकर किया राम ने
रावण पर संधान,
मार के रावण विजय धर्म को
देते हैं श्रीराम।
हैं वह मर्यादा का नाम
जिन्हें सब कहते हैं श्रीराम,
पुरुषोत्तम, आदर्श संस्थापक,
न्यायप्रिय श्रीराम।

आत्मसम्मान जीवित रखो

April 21, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आत्मसम्मान जीवित रखो
वक्त काफी कठिन क्यों न हो,
बस रहो कर्मपथ पर अडिग
वक्त काफी कठिन क्यों न हो।
मन में घबराहटों के लिए
कोई स्थान ही मत रखो,
खोज कर खूब सारी उमंगें
जिन्दगी को सफल कर चलो।
आप डालो नजर एक उन पर
बोझ ढ़ोते हुए श्रमिकों पर
हैं कमाते बहाकर पसीना,
चल रहे आत्मसम्मान पर।
हो सके न्यून आधिक्य कुछ भी
काम कर के कमाओ व खाओ
छोड़ कर हाथ पैरों को पथ में
आप अपना समय मत लुटाओ।
आत्मसम्मान जीवित रखो
वक्त काफी कठिन क्यों न हो,
बस रहो कर्मपथ पर अडिग
वक्त काफी कठिन क्यों न हो।

धरा माँ है हमारी

April 20, 2021 in Poetry on Picture Contest

धरा माँ है हमारी
पालती है पोसती है,
इसी में जिंदगी
सारे सुखों को भोगती है।
अन्न रस पहली जरूरत
है हमारी जिंदगी की,
वायु-जल के बिन कहाँ है
कल्पना इस जिन्दगी की।
और सबसे मूल है
टिकना हमारा पृथ्वी पर
आश्रय लेना चलाना
जिन्दगी को पृथ्वी पर।
एक आकर्षक गुरुत्वी
खींचता है केंद्र को जो
इस तरह से है कि जैसे
माँ लगाती वक्ष से हो।
चारों तरफ है वायुमंडल
जिंदगी को सांस देता,
नीर है अन्तःपटल में
जिन्दगी की प्यास धोता।
भानु की किरणों से लेकर
ऊष्मा जल मेघ कर के
हर तरफ बरसात देती है
धरा माँ है हमारी।
हजारों जीव बसते हैं
वनस्पतियां हजारों हैं,
सभी को पालने के
पोसने के पथ हजारों हैं।
कहीं लघु कीट कीचड़ में
कहीं महलों में मानव है,
कहीं जलचर कहीं थलचर
कहीं उड़गन का है कलरव।
निभाती पृथ्वी दायित्व पूरे
एक माता का,
करें महसूस हम भी
पूत बनकर दर्द माता का।
है इसका आवरण पर्यावरण
उसको बचाना है,
हमें संतान के दायित्व को
अच्छा निभाना है।
न हो दोहन निरंकुश
पृथ्वी माता के अंगों का,
सरंक्षण करें सब लोग
मिलकर पेड़ पौधों का।
पर्वतों का खदानों का
नियंत्रित ही करें उपयोग,
समुंदर और नदियों का
नियंत्रित ही करें उपभोग।
पेड़ पौधे लगायें
जंगलों को बचाएं हम
अपनी पृथ्वी माँ को
सजायें हम।
पृथ्वी दिवस है
आज यह संकल्प लेना है
धरा है मां हमारी
इस धरा को पूज लेना है।
*******************
कविता पर प्रकाश – कविता भाव, विचार, नाद व प्रस्तुति योजना का समन्वय है। इस समन्वय को कविता में स्थापित करने का प्रयास किया गया है। नाद स्वरूप गति, प्रवाह व तुक का समावेश किया गया है। पाठक हृदय तक सहजता से प्रविष्ट करने हेतु आम जीवन मे प्रचलित भाषा का प्रयोग किया गया है।
पृथ्वी के साथ माता व संतान का पवित्र संबंध स्थापित कर काव्य सृष्टि का लघु प्रयास है। प्रस्तुत और अप्रस्तुत के साथ अनुभूति को उकेरने का एक प्रयास सादर प्रस्तुत है।

मानव है मजबूर

April 20, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कैसे हो बेकारी दूर
मेहनतकश को काम नहीं है, बैठा है मजबूर।
कब तक ऐसा रोग रहेगा, सोच रहा मजदूर।
रोजी-रोजी की चिंता है, घर से आया दूर।
मन में चिंता है जीवन की, कठिनाई भरपूर।
मानव मानव में दूरी है, लोग रहे हैं घूर।
कहे सतीश कैसे दिन आये, मानव है मजबूर।

क्रोध स्वयं के लिए गरल है

April 20, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुन लेंगे भगवान
मगर तू सच का रखना ध्यान,
कि सच का मत करना अपमान।
झूठी झूठी माया जोड़ी,
हुआ बहुत धनवान।
अंत समय में सब मिट्टी है,
यह होता है भान।
निंदा, द्वेष बुराई का पथ
छोड़ सफल इंसान
पा सकता है अपनी मंजिल
प्रेम सुखों की खान।
निकले मुख से मंद बुराई
चाहे कितनी मंद,
मगर इधर से उधर से सच के
पड़ जाती है कान।
वाणी में संतुलन बना हो
नहीं रहे अभिमान,
क्रोध स्वयं के लिए गरल है
मत करना विषपान।
विष से अंग गलेंगे भीतर
बाहर फीकी शान,
तेरे भीतर क्रोध रोग है
सबको होगा भान।
वाचा में रख प्रेम मधुरिमा,
ब्राह्मी गाये गान,
सच्चे से हो संगति इस तन की
सच्चे का सम्मान।

कर ले अच्छा काम

April 20, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जीवन संघर्षों का नाम
बिना किए कुछ भी न मिला है, करना होगा काम।
कर्मों का फल देता ही है, देने वाला राम।
जिसको पाने में कठिनाई, उसका ऊँचा दाम।
पूरब हो पश्चिम हो या फिर, दक्षिण हो या वाम।
राज कर्म का है धरती पर, कर ले अच्छा काम।

बोझ खींचे जा रहा था वह

April 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बोझ खींचे जा रहा था वह
हाथ ठेले से,
पेट भीतर तक खींच कर
जोर लगा रहा था।
आँतें एक दूसरे से चिपक कर
सपाट होती जा रही थी।
हड्डियां व पेशियाँ
खिंचती चली जा रही थीं,
वह जोर लगाते जा रहा था
क्योंकि उसने भी
अपने बच्चों के लिए
चाबी वाली गाड़ी
खरीदनी थी।
बच्चे तो पड़ौसी लाला जी के
बच्चे की जैसी
साइकिल मांग रहे थे,
लेकिन पूरा जोर लगा कर भी
संभव नहीं था
उसके लिए साइकिल लेना।
इसलिए वह बीच का
रास्ता निकाल कर
चाहता था छोटी चाबी वाली
कार देना,
इसलिए बोला
जितना लादना है
लाद देना साब,
लेकिन बच्चों के लिए खरीद सकूँ
एवज में इतना देना
बाकी कुछ नहीं।

कब रुकेगा

April 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

संतापों क्रम यह
कब बदलेगा,
मानव जाति पर आया
संकट कब निपटेगा।
हा हा कार, चीत्कार
विभत्स करुण क्रंदन
कब रुकेगा,
ओ प्रकृति !!
तेरा यह आक्रोश
कब थमेगा।
लाखों जीवन लील चुका
यह विनाश का मंजर
कब थमेगा।
मानव जाति पर यह
अदृश्य खंजर
कब तक चुभेगा।
अस्त-व्यस्त है जिन्दगी
असहाय सी है
संभल रही है
बिखर रही है,
फिर फिर बिखर रही है
यह बिखराव
कब चलेगा,
ओ प्रकृति !
तेरा यह रौद्र रूप
कब तक रहेगा।

मन की आशा मुरझाई है

April 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बाँधे कमर नई आशा से
फिर दिल्ली पंहुचा था वो
रोजी रोटी खोज रहा था,
बच्चों को भी भेज रहा था।
कई दिनों के बाद जिन्दगी
ढर्रे में आने वाली थी,
मगर वही फिर कोविड़ कोविड़,
होने चारों तरफ लगी,
रोजगार के पट हो डाउन,
होने को फिर है लॉकडाउन।
सुबह कमाते शाम हैं खाते
कभी कभी भूखे सोते हैं,
सुनकर बन्द लॉकडाउन को
भीतर ही भीतर रोते हैं।
भूख अलग से रोग अलग से
घूम घूम मुश्किल आई है,
लौट किस तरह जाऊँ फिर अब
मन की आशा मुरझाई है।

रहस्य ही रह जाता है

April 18, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिंदगी का पल पल
बीत जाता है,
हम देखते रह जाते हैं,
सुबह से शाम तक
शाम से सुबह तक
मिलन से विरह तक,
बीते पलों की जिरह तक
नहीं कर पाते हैं,
कल से आशा लगाये
रह जाते हैं।
मगर विश्वास नहीं
कर पाते हैं।
कल भी बीतेगा,
बीतता जायेगा,
बीतता रहा है।
कभी नादान थे
अंजान थे,
वो भी बीत गया।
आज भी बीतेगा
कल भी।
मकसद आखिर क्या है
बीतने का।
बीतना ही है तो
फिर मकसद क्या है
होने का।
यह रहस्य
रहस्य ही रह जाता है।
वक्त बीतता ही जाता है,
बीत जाता है।

पलायन

April 18, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

गांव के खेत
बंजर होते गये
गांव के बुजुर्ग पेड़
रोते गये,
पुराने घर आँगन
टूटते रह गये।
जो गया लौट कर
आया नहीं।
शहर का हो गया
गांव फिर भाया नहीं।
वह चबूतरा टूटता
टूटता सा,
सोचता है स्वयं में
हुआ कैसा कि आखिर
जो गया भूल गया,
गांव का अपनापन
याद आया नहीं।

मन को भी सुनना होगा

April 18, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जो कृत्य खुशी दे मन को
वह कृत्य तुझे करना होगा
नफरत विद्वेष भरी बातों से
दूर तुझे रहना होगा।
तन अलग कहे मन अलग कहे
उलझन का मूल यहीं पर है,
तन-मन दोनों की सुन तूने फिर
तालमेल करना होगा।
मन राजी हो तन राजी हो
उसमें ही खुशियाँ आती हैं,
जीने की चाहत बढ़ जाये
ऐसा तूने करना होगा।
तन गलत दिशा में बढ़े अगर
रोके मन उसको शिद्दत से,
तन की जिद को कर शांत तुझे
मन को भी सुनना होगा।
मन से मत कभी बगावत कर
मन में है अद्भुत शक्ति बसी
तेरी राहें रोशन करने
उस ताकत को जगना होगा।

समदृष्टि

April 17, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मत कहना सूरज डूब रहा है
नहीं डूबता है सूरज
जलकर निरंतर रात औऱ दिन
ज्योति उगलता है सूरज।
धरती गतिशील घूमती है
स्थिर नहीं रहती है
इसलिए हर कोने में
क्रम क्रम से
उजाला बांटती रहती है।
अंधेरे और उजाले का
आना जाना चलता रहता है
न अंधेरे से डर
न उजाले से इतरा,
सब समदृष्टि रखने वाला ही
आगे बढ़ता रहता है।

गलत पर कर प्रहार

April 17, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

समाज में हो रहा गलत
तेरे भीतर की आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या
किसी निरीह की चीत्कार
किसी भूखे की भूख
प्यासे की प्यास
जीवन में व्याप्त दर्द
तेरे भीतर की आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या,
शोषित, उत्पीड़ित
उपेक्षित वर्ग के
तिरस्कार का दर्द,
भेदभाव की बात
भूख से बिलखते
बच्चों की रात
उर का दर्द
तेरे भीतर की आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या।
घूसखोरी व भ्रष्टाचार
युवाओं का
रह जाना बेरोजगार,
निरीहों पर अत्याचार,
तेरी आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या।
झकझोरता है तो
उठा ले लेखनी
लेखनी में पैदा कर धार
गलत पर कर प्रहार,
आवाज उठाने को
तेरा मन झकझोरता नहीं क्या।

लगी है आग जंगल मे

April 17, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

लगी है आग जंगल में
न जाने कौन है ऐसा
रगड़ माचिस की तीली को
जला कर चल दिया घर को।
इधर घर जल रहे लाखों
विकल हैं भस्म हैं प्राणी
उधर है मौज में लेटा
धुँवा महसूस करता है।
नहीं भू पर था बरसा जल
हलक सूखे थे जीवों के
लगाये टकटकी थे वे
निरन्तर नभ के मेघों पर।
इधर जल की जगह बरसी
मुसीबत आग बन उन पर
सभी कुछ भस्म कर डाला
किसी दानव की तीली ने।
ओस की बूंद पीकर वे
बचाये थे स्वयं साँसें
लगाकर आग मानव ने
जला संसार डाला सब।
अधजले सोचते हैं कुछ
बिगाड़ा था क्या हमने जो
लिया इंसान ने बदला,
किया आखिर था हमने क्या।

पतंगे पार निकलना होगा

April 17, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिन्दगी की अंधेरी रातों में
काम जुगनू से न चल पायेगा,
कभी चमकता कभी बुझता सा
ये नहीं राह दिखा पायेगा।
दबा ले स्विच जगा ले बत्ती को
ये बत्ती हो मन की ऊर्जा की,
करे प्रकाश मन के भीतर में
पथ बाहर भी दिखा पायेगा।
बिना प्रकाश को जगाये मन
कहीं भटक न जाये राहों में
सत्य की भक्ति छोड़कर भोला
अटक न जाये अन्य चाहों में।
तोड़ने होंगे मोह तूलिका के
पतंगे पार निकलना होगा।

भले ही सो रहा हूँ मैं

April 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

भले ही सो रहा हूँ मैं
थका-माँदा यहाँ
फुटपाथ में
मगर चलती सड़क है
रुकती है बमुश्किल
एकाध घंटा रात में।
उसी में नींद लेता हूँ
उसी में स्वप्न आते हैं,
कभी जब राहगीरों के
बदन पर पैर पड़ते हैं
अचानक स्वप्न थे
जो नींद में
वो टूट जाते हैं।
नया हूँ इस शहर में
भय से आँसू छूट जाते हैं,
यहां क्यों लेटता है कह
सिपाही रूठ जाते हैं।
अंधेरी जगह जाऊँ कहीं
तो श्वान होते हैं,
हमारी तरह उनके भी कुछ
गुमान होते हैं।
मुझे अनुभव नहीं है
इस तरह सड़कों में सोने का,
मगर असहाय हूँ
घर से निकाला हूँ
कमजोर हूँ मैं वृद्ध हूँ
अब तो दिवाला हूँ।
स्थान मुझको चाहिए
थोड़ा सा रोने का।
दो-तीन घंटे लेट कर
थोड़ा सा सोने का।
सुबह फिर काम खोजूंगा
उदर की पूर्ति करने को।
जगूं या जग न पाऊँ कल सुबह
सोचा नहीं मैंने,
मगर इस वक्त आधी रात है
सोया हूँ जगने को।

तैर ले बाढ़ है दुखों की अगर

April 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

छोड़ दे छोड़ दे उदासी को
कोई फायदा नहीं है चिंता से
गम में मत रह बढ़ा न दर्द ए दिल
कोई फायदा नहीं है चिंता से।
दुःख तो होता है कुछ भी खोने से
न कोई लौटता है रोने से
कुछ नया सोच दूर पीड़ा कर
ख्वाब ला मन में तू सलोने से।
जो भी चाहेगा कर्म ही देगा
तुझे भी फल मिलेगा बोने से
जाग जा हर घड़ी सवेरा है
कोई फायदा नहीं है सोने से।
कैसे पायेगा लक्ष्य तू ही बता
ऐसे मायूस पथ में होने से,
तैर ले बाढ़ है दुःखों की अगर
अपनी किस्मत को यूँ डुबोने से।

वहाँ भगवान है मेरा

April 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ईश्वर का पता कहाँ है
मन ढूंढता रहा है,
कोई कहे यहाँ है
कोई कहे वहाँ है।
मगर जब गौर से देखा
मुझे ईश्वर दिखा उसमें
कि था जब भूख से व्याकुल
खिलाई रोटियाँ जिसने।
गिर पडूँ तो सहारा दे
वही है देवता मेरा
जरूरत पर मदद कर दे
वही भगवान है मेरा।
दिखा दे नेकियों का पथ
प्रेरणा दे मुझे सत की
मुझे उत्साह दे दे जो
वही भगवान है मेरा।
जहाँ नफरत न हो बिल्कुल
मुहब्बत का रहे डेरा,
जहाँ ईमान रहता हो
वहाँ भगवान है मेरा।

नया स्वर फूँकना है

April 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

रोशनी कर दो ना
जला दो बल्ब सारे,
देखने हैं मुझे
दिवस में चाँद तारे।
अंधेरे से बहुत
उकता गया हूँ,
मन भरी पीड़ को
लिखता गया हूँ।
अब मुझे जूझना है,
नया स्वर फूँकना है,
बुलंदी है जगानी
नहीं अब टूटना है।
दर्द से आज कह दो
जरा दूरी बना ले,
मुझे अब वेदना को
दूर ही फेंकना हैं।
ठंड में ताप बनकर
स्वयं को सेंकना है।
तप्त मौसम अगर हो
शीत मन सींचना है।
मेरा अरमान हो अब
बुलंदी ही बुलंदी,
और संवेदना को
पास ही पास रखना है।
जिन्दगी की कहानी
सदा चलती रही है,
छोड़ कड़वाहटें सब
मधुर रस स्वाद चखना है।

हर अवसर भुनाना होगा

April 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हर अवसर भुनाना होगा
मौका मिलेगा तुझे भी
एक दिन मुश्किल से
उसे बस कस कर लपकना होगा।
हो अगर कंटक युक्त झाड़ी तो
बीच में फूल बनकर
महक के साथ महकना होगा।
उदासी फेंक कर
कुछ दूर अपने से तुझे,
जिगर मजबूत कर हँसना होगा।
राह भटका रहे कारक
नजरअंदाज कर,
तुझे मंजिल की सीढ़ी में
युवक चढ़ना होगा।
मैं नहीं हार मानूँगा
न विचलन ही रखूँगा,
सफल होंगे कदम मेरे
तुझे कहना होगा।
हर अवसर भुनाना होगा
मौका मिलेगा तुझे भी
एक दिन मुश्किल से
उसे बस कस कर लपकना होगा।

पापा

April 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तब आप कितने
सुन्दर थे पापा
देख पुरानी फोटो,
देखता रह गया मैं।
फौजी वर्दी
चमकता चेहरा,
फौलादी बाजू,
सीधे लंबे से,
जाने कब की है
यह फ़ोटो,
मुझे याद है
आपकी कर्मठता की
ठंडी चोटियों में
देश सेवा करते करते
दो वर्ष तक घर
न आ पाने की
मगर मनी आर्डर के
ठीक समय पर आने की।
उससे राशन खरीदने
स्कूल की फीस देने की।
पारिवारिक जिम्मेदारियों को
निभाने के लिए
जान लगा देने की
आपकी कर्मठता की
पूरी याद है।
धीरे धीरे आप वृद्ध होते गए।
मुझे फिर याद है।
आपके माथे पर
पड़ी अनुभवों की
झुर्रियां की,
रक्तचाप से परेशान
बार-बार सिर पर हाथ लगाते,
हँसमुख इंसान की।
तमाम तरह की
जीवन की दुश्वारियां
झेल चुके वृद्ध शरीर की।
मुझे तो याद है हम
सभी से स्नेह रखने वाले
हम सभी की
इच्छा पूरी करने वाले
एक देवता की।
कुछ कुछ याद है
मुझे थपकी दे सुलाने वाली
आपकी लोरी की गेयता की।
फिर याद है
आपके द्वारा ली गई
अंतिम साँसों की।
रह गई यादों की
जो अब साथ हैं।

धन का राज है

April 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

धन है धन्य
धन का राज है
सबके दिलों में।
बिना धन जिन्दगी का
पथ कठिन।
न हो धन पास जिसके
दूरियां रखते हैं उससे,
ठुंसा हो जेब में जिसके
खूब धन,
भले वह एक धेला भी न दे,
मगर उससे सभी
रखते हैं अपनापन।
सब कुछ भले संभव न हो
लेकिन बहुत कुछ
संभव है धन से,
मान-ईमान हैं
सब कुछ
खरीदे-बेचते धन से।
बहुत धन हो इकट्ठा गर
बड़ा मानव बनूँगा मैं
अगर संचित न कर पाऊँ
वही छोटा रहूँगा मैं।
यही धन है बनाता है
यहां आकार मानव का
यही धन है बढ़ाता है
मनुज के मन में दानवता।
तभी तो बोलते हैं
धन्य है धन
राज धन का है।
करूँ अर्जित इसे
इस बात पर ही ध्यान सबका है।

ख्वाब में वो ख्वाब क्यों (विषम छन्द का एक रूप)

April 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

उपवन में फूल खिले, महक आई
सुबह सुबह की मारुत, उड़ा लाई।
याद आया वह मुझे, नलिनी फूल,
या नासिका से जुड़ी, यह है भूल।
देख अनदेखा किया, जाते रहे
ख्वाब में वो ख्वाब क्यों, आते रहे।
हम विदाई गीत यूँ, गाते रहे
चल दिये थे जो वही, भाते रहे।
एक निठुराई सी हम, पाते रहे
क्यों जुड़े उनसे मगर, नाते रहे।
आंसुओं को बस निगल, खाते रहे,
ठेस उनकी ओर से, खाते रहे।
*****
काव्यस्वरूप- विषम छन्द स्वरूप

कुछ नया भाव होगा

April 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आँख में देखना
कुछ नया भाव होगा,
धड़कते दिल में
कोई घाव होगा।
वो पुराना हो
या नया हो
मगर रख हौसले से
भरना होगा,
मुकाबला
समस्याओं से
डटकर करना होगा।
कुछ नए परिवर्तन को
एक प्रयास तुझे
करना होगा।
उबलता भाव जो भी हो
न ठंडा हो पाये
बल्कि उस भाव को लेकर
बढ़ना होगा।
भीतर ही नहीं सोखना
उत्साह को,
बल्कि मन में बुलंदी रख
कदम चलना होगा।

रम तू जा माँ के चरणन में

April 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

रम तू जा माँ के चरणन में
घर में माता भूखी सोये, फिरे क्यों मन्दिरन में।
छोड़ दिखावा मूरख प्राणी, गर्व न कर निज तन में।
बूढ़ा होगा जब तेरा तन, तब रोयेगा मन में।
अतः आज मौका है भुना ले, बिठा दे फूलन में।
कहे सतीश माँ ही ईश्वर है, यह बैठा ले मन में।

नारी तुम ही नवदुर्गा हो

April 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम ही दुर्गा
नव दुर्गा तुम
नारी तुम ही नवदुर्गा हो।
जननी हो तुम जन्म की दाता।
सब कुछ तुम ही हो माता।
तुम से ही संसार बना है,
दया, प्रेम, चाहत, स्नेह,
करुणा और दुलार बना है।
तुम से ही संसार बना है।
ममता की उत्पत्ति तुम ही से
प्राण रस उत्पन्न तुम ही से,
बचपन, प्रौढ़, युवावस्था में
जीवन आधार टिका तुम ही से।
आज पवित्र नवरात्र पर्व में
पूजा पाने की अधिकारी हो
माँ नव दुर्गा के रूप स्वरूप में
नारी तुम स्थापित हो।

सुना दे मन मीत एक कविता (पद छन्द)

April 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुना दे मन मीत एक कविता
जिससे हो झंकार हृदय में, और बहे सुख सरिता।
दूरी रख ले उलझन मुझसे, ऐसी कह दे कविता।
भर दे थोड़ा सा आकर्षण, मुझे बना दे ललिता।
बन जायें खुशियाँ साजन सी, मैं बन जाऊँ वनिता।
कानों में हो मधुर मधुर धुन, ऐसी सुना दे कविता।
*******
काव्यस्वरूप – पद रूप में।

क्या बात करती हो

April 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुबह सुबह में
इतना चहचहाती हो,
क्या बात करती हो
बताओ ना,
कहीं इंसान की बातों
की कोई बात करती हो,
या मिलने-बिछुड़ने का कोई
जज्बात रखती हो।
बताओ ना।
भूख की प्यास की
आवास की
रोजगार पाने की
बताओ ना कि
क्या क्या बात करती हो।
मुहब्बत की मिलन की
या वफ़ा-बेवफा की
हानि की या नफा की
खुशी की या खफा की,
बताओ ना।
क्या बात करती हो।

कभी जिन्दगी हर्षपूर्ण है

April 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक गुलाब
एक सी पत्ती, काँटे, डंठल एक समान
फिर कौन रंग भरता है इनमें,
कहाँ है रंगों की खान।
लाल-सफेद, पीले, गुलाबी
कितने सारे हैं गुलाब,
इतने सारे रंग व खुशबू
मन विस्मित सा है जनाब।
जीवन इस गुलाब जैसा है
तरह तरह के रंग
कभी जिन्दगी हर्षपूर्ण है
कभी खूब बेढंग।
कभी सद्कर्मों की खुशबू
कभी गलत कार्य के काँटे
ईश्वर ने मानव को फल सब
कर्मों के अनुसार ही बांटे।
जितना हो सके मुझे अपने
कदमों को सद पर रखना है
क्योंकि मुझे ही कर्मो का फल
अपनी रसना में चखना है।

वे बेजुबान

April 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नवजात बच्चे
दूध पी रहे थे,
भूख उसे भी लगी थी,
दूध पिलाने में
भूख भी बहुत लगती है
दूध पिलाने में।
उर जल रहा था
आमाशय के तेजाब से,
बच्चों को छोटी सी
झाड़ीनुमा गुफा में छिपाकर
चल पड़ी वह घास चरने,
पलकें झपका कर
मासूमों से कह गई
जल्द आऊँगी।
शिकारी को पता था,
कब जानवर चरने निकलते हैं,
ऐसा ही हुआ,
थोड़ी देर में लगा
शिकारी का निशाना,
गोली लगी, गिर पड़ी वह हिरणी।
दो बच्चे झाड़ियों में
उसका इंतजार करते रह गए
धीरे धीरे सूख गए।
जाते जाते
इंसानियत को वे बेजुबान
पता नहीं क्या कह गए।

सुबह सुबह सूरज की किरणें

April 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुबह सुबह सूरज की किरणें
लगती हैं कितनी मनभावन,
नई लालिमा युक्त चमक है,
लगती हैं निखरी सी पावन।
खुश होकर चिड़िया बोली है
उठो सखी सुबह हो ली है,
एक झाँकती है बाहर को
दूजी ने आँखें खोली हैं।
छोटे-छोटे पौधों भी तो
देख रहे गर्दन ऊँची कर
आओ पास आ जाओ किरणों
बोल रहे हैं उचक उचक कर।
सूरजमुखी उस ओर मुड़ रही
बन्द कली इस वक्त खिल रही,
ओस बून्द को आत्मसात कर
किरणें धरती के गले मिल रहीं।

खूबसूरत है हिमालय पर्वत

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कुछ है बात निराली सी
मेरे भारत की बात अद्भुत है।
खूबसूरत है हिमालय पर्वत,
जहाँ से मीठी हवा आती है,
ऐसी लगती है जैसे हो शर्बत।
गंगा जमुना व नर्मदा जैसी
बह रही हैं पवित्र नदियां यहां
ये मेरा देश इतना पावन है,
देवताओं का वास भी है यहाँ।
एक छोर में खड़े पर्वत
दूसरे छोर में समुंदर हैं,
एक से एक पुरातन हैं भवन
साथ में गांव बड़े सुन्दर हैं।
सबमें है प्रेमभावना सी भरी
एकजुटता निराली ताकत है,
मेरे भारत की शान अद्भुत है,
मेरे भारत में खूब ताकत है।

ममता

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ममता किसने भर दी मन में
गाय को बछड़े से ममता है
माँ को बेटे से।
ये ममता किसने भर दी मन में।
ममता जिसने पैदा की वह
ईश्वर सबसे ऊपर है,
ममता का गुण सारे गुण से
ऊपर है बस ऊपर है।
पैदा होता है जब बच्चा
होता है असहाय,
निर्भर पूरी तौर वो माँ पर
ममता रखे ख्याल
ये ममता किसने भरी मन में।
थोड़ा सा भी बालक रोये
विचलित हो जाती है,
कब है भूख प्यास कब है
सब कुछ समझ जाती है।
ये ममता किसने भरी मन में।
ममता काफी कुछ जीवन में
प्यार मुहब्बत देती है,
ममता ही जीवन को देखो
नई दिशाएं देती है।
ममता किसने भर दी मन में।

नाच रहा मन मोर क्यों

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नाच रहा मन मोर क्यों,
आज बिना बरसात,
है यह आहट प्रेम की,
या है कोई बात।
या है कोई बात,
उमड़ क्यों नेह रहा है,
साजन पर है गीत
तभी यह गेय रहा है।
कहे सतीश कभी न
आये कोई आंच
प्रेमी करता रहे
मन ही मन प्यारा नाच।

हरियाली और खुशहाली रहे

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मेरा भारत मेरा देश
उन्नति को बढ़े,
हर तरफ हरियाली
और खुशहाली रहे।
दूध की नदियां बहें
खेत सोना उगल दें,
मेघ जल वर्षा करें,
वृद्धजन हर्षा करें,
युवा मंजिल को पायें
हर घड़ी मुस्कुराएं,
धर्म पथ पर चलें सब
कर्म पथ पर चलें सब।
न भूखा कोई सोये
सभी के तन वसन हों
न टूटें दिल किसी के
सभी के सब मगन हों।
पेड़ फल से लदे हों
स्रोत जल से भरें हों
नैन हों झील जैसे
नील जल से भरे हों।
मेरा भारत मेरा देश
उन्नति को बढ़े,
हर तरफ हरियाली
और खुशहाली रहे।

अच्छा ही होने लगता है

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पवन मनोहर झौंका लाई
साथ में उसके खुशबू आई,
सद्कर्मों का अच्छा ही तो
फल मिलता है मेरे भाई।
अच्छी सोच रखो मन में तो
अच्छा ही होने लगता है,
बिना स्वार्थ के रब की सेवा
होती है निश्चित फलदाई।
मन में स्वार्थ रहे तो कुछ भी
करने का फायदा ही क्या है
अपना पेट सभी भरते हैं,
पशुता का कायदा ही क्या है।

बालपन मोबाईल में

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

खो गए खेल
आज बचपन के,
रम गया बालपन मोबाइल में,
आँख का सूख रहा पानी है
टकटकी आज है मोबाइल में।
वक्त है ही नहीं बचा जिससे
संस्कारों को सीख लें बच्चे,
कुछ रहा बोझ गृहकार्यों का
बाकी सब खो गया मोबाईल में।
न रहा सीखना बड़ों से कुछ
न रही चाह सीखने की अब
न रहा शिष्य गुरु का नाता अब
गुरु तो अब भर गया मोबाईल में।
खेल क्रिकेट के कब्बडी के
हो रहे खेल सब मोबाईल में,
तनाव बढ़ रहा मोबाईल में
शरीर घट रहा मोबाईल में।
छीन बचपन के खेलकूद सभी
खा रहा है दिमाग मोबाईल
जानते हैं कि एक घुन है यह
फिर भी हैं डूबते मोबाईल में।

प्रेम भावना बढ़े

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ऐसी बातें क्यों करें, जो देती हों पीड़,
सबसे अच्छा बोल दें, अपनों की हो भीड़।
अपनों की हो भीड़, सभी अपने हो जायें,
बेगानापन छोड़, सभी अपने हो जायें।
कहे लेखनी छोड़, चलो सब ऐसी वैसी,
प्रेम भावना बढ़े, बात कर लो अब ऐसी।

सब ओर खुशी छा जाये

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सब ओर खुशी छा जाये
दुख की छाया पड़े न किसी में।
मन मानव का होता है कोमल
आशा होती है मन में,
आशा टूटे कभी न किसी की,
दिल टूटे न कभी भी,
इच्छा आधी रहे न किसी की।
इच्छा ऐसी रहे न किसी में
जिससे चैन हो छिनता,
पूरा हो प्रयत्न पाने का
भीतर रहे न भीतर चिंता।
भीतर चिन्ता खा देती है
बाहर है संघर्ष कड़ा
अतः मनोबल रख कर मन में
हो जा मानव आज खड़ा।

नाश, वासना छोड़ तुझे

April 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ओ नवोदित पीढ़ी
मेरे भारत की,
उठ जा तू धूम मचा दे
हर क्षेत्र में हर विधा में
भारत को मान दिला दे,
तू है वह पौध जिसमें
कल के फल लगने हैं,
तूने ही राष्ट्र सजाना है
तूने ही नाम बनाना है।
पुरखों ने जो मार्ग दिया
या उन्नति की जो दिशा बनाई,
तूने उसको आत्मसात कर
थोड़ा सा कुछ नया रूप दे
आगे बढ़ते जाना है।
भारत का मान बढ़ाना है।
नशा, वासना छोड़ तुझे
ज्ञानी-विज्ञानी बनना है,
अच्छे लोगों की संगति अपना।
अच्छा तुझको बनना है।

अपने अपने कर्मक्षेत्र में

April 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नफरत केवल खून सुखाता
प्यार उजाला देता है।
मेहनत का परिणाम अंततः
हमें निवाला देता है।
दूजे से ईर्ष्या रखने से
नहीं किसी का भला हुआ,
अपने ही संघर्ष से साथी
सबका अपना भला हुआ।
आमंत्रण देता कीटों को
मधु भर पुष्प खिला हुआ
ले जाओ मकरंद मधुर रस
अपनी किस्मत लिखा हुआ।
लेकिन उड़ने का प्रयास तो
उनको ही करना होगा
पाने को मकरंद मधुर
मधुमक्खी को उड़ना होगा।
प्यार मुहब्बत दया भाव से
हम सबको रहना होगा,
अपने अपने कर्मक्षेत्र में
तत्पर रहना ही होगा।

कोमल आभा बिखर रही है ( चौपाई छन्द)

April 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

चमक रही है नयी सुबह
सूरज की किरणें फैली हैं,
बन्द रात भर थी जो आंखें,
उनमें नई उमंग खिली है।
गमलों के पौधों में देखो,
नई ताजगी निखर रही है,
फूलों में कलियों में प्यारी
कोमल आभा बिखर रही है।
आँखें मलते गुड़िया आयी,
सुप्रभात कहने को सब से,
शुभाशीष लेकर वह सबका
प्रार्थना करती है रब से।
बिजली के तारों में बैठी
चिड़ियाओं की बातचीत सुन,
ऐसा लगता है दिन भर के
रोजगार की है उधेड़बुन।
राही थे आराम कर रहे
अपनी-अपनी शालाओं में
वे सब फिर से निकल चुके हैं
सुबह सुबह की वेलाओं में।
काव्यगत सौंदर्य – चौपाई छन्द में प्रकृति वर्णन का छोटा सा प्रयास।

कोरोना को दूर भगा लो

April 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

*कोरोना को दूर भगा लो*
*********************
मन का भय सब दूर करो
वैक्सीन लगा लो आप सभी
कोरोना को दूर भगा लो
वैक्सीन लगा लो आप सभी।
डरो नहीं कुछ दर्द नहीं है,
नहीं कोई डरने की बात,
रोग प्रतिरोधकता बढ़कर
होगी सब अच्छी ही बात।
आसपास में सबसे कह दो
पैंतालीस से ऊपर हैं जो
लगवा लो जी टीका खुद को
कोरोना को दूर भगा दो।
सभी व्यवस्थाएं पक्की हैं
स्वास्थ्य सेवा जुटी हुई है,
आओ आप लगा लो टीका
कोरोना को दूर भगा लो।
रचयिता—
—— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, जेआरएफ-नेट, पीएचडी,

एक बूँद भी टपक न पाई

April 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

स्टैंड पोस्ट का नल बेचारा
खड़ा रहा बस खड़ा रहा,
एक बूंद भी टपक न पाई,
ऐसा सूखा पड़ा रहा।
प्यासों के खाली बर्तन जब
देखे उसने रोना चाहा,
मगर कहाँ से आते आँसू,
ऐसा सूखा पड़ा रहा।
पिछली बारिश के मौसम में
ठेकेदार ने खड़ा किया था,
तब पानी था स्रोतों में भी,
इस कारण से खड़ा किया था,
जैसे ही बीती बरसातें
क्या करता बस खड़ा रहा,
एक बूंद भी टपक न पाई
आशा में बस खड़ा रहा।
परेशान है टोंटी उसकी
आते-जाते घुमा रहे हैं,
यह भी तो बेकार लगा है
ऐसी बातें सुना रहे हैं।
कुछ करना बस नहीं है उसके
बस उलझन में खड़ा रहा है,
कभी तो टपकेगा जल मुझसे
ऐसी आशा लगा रहा है।

मानव की पहचान

April 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आँख का जल एक है, मानव की पहचान,
अगर न हो संवेदना, फिर कैसा इंसान।
फिर कैसा इंसान, जानवर भी रोते हैं,
मानव में तो दया भाव के गुण होते हैं।
कहे कलम विचरते, हैं भू में प्राणी लाख,
दया की मूरत है, प्यारी मानव की आंख।

मत खोना विश्वास

April 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

खो जाये सब कुछ मगर, मत खोना विश्वास,
गया भरोसा बात का, होता है परिहास।
होता है परिहास, सभी हल्का कहते हैं,
बिना पूर्ण विश्वास सभी दूरी रखते हैं।
कहे लेखनी बीज, भरोसे का तू अब बो,
उगा भरोसा आज, भरोसा अपना मत खो।

पानी बरसा ही नहीं (कुंडलिया)

April 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पानी बरसा ही नहीं, सूख चुके हैं मूल,
अब कैसे जीवन चले, हिय में उठते शूल।
हिय में उठते शूल, जंग पानी को लेकर,
जनता में छिड़ रही, पड़े बर्तन को लेकर।
कहे सतीश अब है, हमको प्रकृति बचानी।
पेड़ लगाओ ताकि, मेघ बरसाये पानी।

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