Author: Pratima chaudhary

  • मां ने जब रोटियां…

    मां ने जब रोटियां बनाना सिखाया ,
    मुझे कुछ समझ ना आया ,
    कभी रोटियां जली तो कभी हाथ,
    फिर सीख ही गई मैं,
    रोटियां बनाना,
    और अब रोटियां नहीं जलती ,
    बस जलते हैं हाथ।

  • ये कैसा कारवां

    ये कैसा कारवां जो कभी खत्म ना हुआ,
    वह उम्मीद कभी न धुंधली हुई और न मिटी ,
    वह साथ पाने का जज्बा अभी भी बरकरार है।

  • हैसियत क्या थी मेरी…

    हैसियत क्या थी मेरी पूछिए मत,
    बस किताब के कोरे पन्ने थे ,
    लिखते रहे अपनी रूबानी,
    जब बनी ना कोई गजल ना कोई नज़्म,
    फटकर सिमटकर पैरों तले बस कुचले गए।

  • आज कर दूं, आंखें नम

    आज कर दूं, आंखें नम या समंदर कर दूं ,
    मेरे भीतर का वो दर्द ; कैसे संदल कर दूं।

  • टुट कर बिखरी नहीं….

    टूट कर बिखरी नहीं,
    सांस है अभी थमी नहीं।
    थक चुकी है जीवन आशा ,
    फिर भी लौ बुझी नहीं।

  • कभी पल-पल…..

    कभी पल-पल इबादत करते थे मेरी,
    अब किसी गैर की आयत हो गए।

  • मेरी शिक्षक मेरी मां

    मेरी शिक्षक मेरी मां ही तो है ,
    सिखाया उसने चलना ,
    बोलना और पढ़ना -लिखना।
    अर्थ न जाने कितने समझाएं ।
    पूछो कितनी ही बार ;वह प्रश्न ,
    फिर भी कभी ना डांट लगाए ।
    मुस्कुराकर ;माथे को चुमे
    और प्रेम से बतलाए।

  • मगर से हो तुम

    बहुत देर से ही सही मगर,
    समझ में आया,
    मगर से हो तुम,
    मेरे झील से जीवन में।

  • नहीं होती है रात

    नहीं होती है रात , सिर्फ सूरज के डूबने से।
    रात तब भी होती हैं ,
    जब उम्मीद नहीं, दिखती…तुम्हें पाने की।

  • जिसे जिंदगी कहते हैं

    कितनी उधेड़बुन करती हूं,
    मैं इन धागों के साथ ।
    जिसे जिंदगी कहते हैं ,
    कभी गम की गांठ खोलती हूं।
    कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं ।
    बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में।
    कितनी उधेड़बुन करती हूं,
    मैं इन धागों के साथ।
    जिसे जिंदगी कहते हैं।

  • नींद

    पलकों पर नींद बिखरी पड़ी होती है ,
    फुर्सत में समेट कर सोते हैं।।

  • क्या उकेर देती

    क्या उकेर देती ,
    मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर।
    अपने भीतर की वेदना या दूसरों की प्रेरणा ।
    अनकही बातें या सुनी सुनाई बातें।
    नहीं जानती इसका अर्थ क्या होता ।
    क्या उकेर देती,
    मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर ।
    किसी की हास्य परिहास या कसमों वादों का साथ ।
    मां की मीठी लोरी या बचपन की हमजोली।
    वही रोज की थकान या फिर अपने अरमान ।
    क्या उकेर देती ,इन कोरे पन्नों के ऊपर ।
    बचपन की खुशहाली या युवा रोजगारी।
    उकेर देती देश की पुकार या पीड़ितों की चित्कार ।
    उकेर देती आरोप-प्रत्यारोपों की दुकान,
    जो खुली रहती है दिन रात ।
    क्या उकेर देती, इन कोरे पन्नों के ऊपर।
    तुम्हारे कुछ न कहने के बाद ।
    तुम्हारे कुछ न कहने के बाद।

  • ये किनारे

    ये किनारे दूर होते गए ,
    सिर्फ शकों के सैलाब से।।

  • क्यों कुछ कहते नहीं।

    क्यों कुछ कहते नहीं,
    सब गूंगे बहरे बैठे हैं ,
    सबके भीतर जलती है आग,
    फिर क्यों खामोश बैठे हैं,
    खो दिया है सम्मान को ,
    अपने भीतर के इंसान को,
    तभी तो चुप ही रहते हैं,
    होती है वारदातें आंखों के सामने ,
    फिर क्यों ,आवाज दबाए रहते हैं।

  • खुशियों के बीज

    चलो छुपा कर रखते हैं,
    खुशियों के बीज ,
    बो देंगे कभी;
    अगर गम बढ़ जाए,
    ज़रा हंस लेना तुम ,
    और हम भी मुस्कुराएं

  • कितना चले! कितना रुके!

    कितना चले !कितना रुके! ,
    हम जिंदगी के सफर में ,
    ये कोई नहीं पूछता ,
    मगर लोग अक्सर पूछते हैं,
    मंजिल के कितने करीब हो!

  • हर शाम इतनी मीठी ना होती

    हर शाम इतनी मीठी ना होती,
    अगर तुम ना होते ,
    खुश तो होते हम,
    पर खुशनसीब ना होते,
    गुजारिश है बस इतनी तुमसे,
    इस मुस्कान को खोने मत देना,
    खुशनुमा किया है हृदय को,
    तो कभी इसे रोने मत देना।

  • क्यों निभा रहे हैं हम

    क्यों निभा रहे हैं हम,
    इस झूठे रिश्ते को,
    जहां वो हमें अपना नहीं मानते,
    और हम उन्हें पराया नहीं।

  • थाम कर तुम्हारा हाथ….

    थाम कर तुम्हारा हाथ ,
    आज भी चलना चाहते हैं,
    चाहे दूरी कितनी भी हो,
    साथ निभाना चाहते हैं।

  • कुछ इस तरह चला…

    कुछ इस तरह चला;
    यू मोहब्बत का सिलसिला,
    ना तुमको इसका एहसास था,
    ना मुझको इसका गम,
    हम दोनों मसरूफ रहे,
    इसे बेवजह निभाने में।

  • कहां चल दिए!

    यह कहक़हा लगा कर ,
    मुझे झुकाकर कहां चल दिए।
    मेरी धूमिल आंखों से ओझल होकर,
    सच को झूठ बनाकर कहां चल दिए।
    मैं थी बेकसूर, तुम कसूरवार,
    ठहरा कर कहां चल दिए।
    मैं मांगती रही इंसाफ इस दर पर,
    तुम मुझे ठुकरा कर कहां चल दिए।
    अब बता दो जश्न जीत की या मेरे हार की,
    मनाने कहां चल दिए?
    मैं मिलूंगी कहीं ना कहीं ,
    किसी और सूरत में ,
    फिर से पूछूंगी ये सवाल।
    मेरी अस्मत पर दाग लगा कर कहां चल दिए?
    तुम हंस रहे हो मेरी हार पर,
    अगली जीत मेरी ही होगी ।
    अब तुम लगा सकते हो।
    यह कहकहा, मुझे झुका कर।

  • अंधेरा इतना भी नहीं था

    अंधेरा इतना भी नहीं था कि रोशनी में अपनी जगह बना सके,
    और रोशनी भी इतनी नहीं थी कि अंधेरे को मिटा सके,

  • तुम्हें तुम्हारी ताजगी मुबारक…

    तुम्हें तुम्हारी ताजगी मुबारक ,
    मुझे सुखें पत्तों से प्यार है,
    तुम्हें नाज है अपनी खूबसूरती पर ,
    मुझे तेरी सीरत से प्यार है,
    तू खुश है इस नएपन से,
    मुझे तेरी नादानी से प्यार है।

  • कभी खामोशी के साथ….

    कभी खामोशी के साथ ,
    चार कदम चल कर तो देखो !
    अपने वजूद का एहसास;
    पल भर में हो जाता है।

  • बदल कर रख दी मैंने.…

    बदल कर रख दी मैंने अपनी सारी आदतें ,
    मगर तुम पत्थर ही रहे..

  • बुराइयों की जड़े

    हम काटते ही नहीं ,
    बुराइयों की जड़ें,
    पालते हैं ,पोषते हैं ,
    कभी इच्छाओं के लोभ से,
    कभी रूपयों की चाह से,
    जब लगता है ,
    वह जड़े हमें बांधती है,
    हम उठ खड़े होते हैं,
    अपने विचारों के ;औजार लेकर
    दौड़ते हैं, काटते हैं ,
    जब क्षमता होती नहीं ,
    हमारे भीतर; उसे मिटाने की..

  • मंजर

    आंखों को बंद करने से,
    दुखों का मंजर छुप नहीं जाता।
    तब और उभर कर नजर आती है,
    उनकी गहराईयां।

  • होश अब नहीं रहा…

    होश अब नहीं रहा इंसानियत का,
    बेसुध से सब हो गए हैं ,
    जाने कैसा है यह नशा
    अपने भी गुम हो गए हैं।

  • वो डरावना-सा बचपन

    सब चाहते हैं,
    फिर से वो बचपन पाना,
    शरारत से भरी ऑंखें,
    और मुस्कुराना,
    पर मैं नही चाहती,
    वो बचपन पाना,
    डर लगता है,
    उस बचपन से,
    घूरती आँखों,
    और उन हैवानों से,
    अब है हिम्मत,
    हैं डर को जितने का दम,
    तब नहीं था, वो मेरे भीतर,
    डरती थी, सहमती थी,
    बंद कमरे में , सिसकती थी,
    चाहती थी, खुलकर हंस सकूँ,
    पर न कुछ कह पाना न समझ पाना,
    रोना याद कर उन लम्हों को,
    और खुद को सजा देना,
    मैं नही चाहती वो बचपन पाना,
    जहाँ छिनी जाती थी,
    पल पल मेरी खुशियां,
    जोड़ती थी साहस, की खुद को है,
    बचाना,
    बचाया खुद को मैंने,
    कभी वक़्त ने साथ दिया, कभी दूरियों ने,
    कभी अपनों ने, कभी परायो ने,
    कोमल मन पर , वो डर का साया,
    मैं नही चाहती वो बचपन दोहराना।।।।

  • कुछ पाया और कुछ खोया

    कुछ पाया और कुछ खोया,
    क्यों मुझे इस बात पर रोना आया!
    क्यों बिछड़ते रहे अपने,
    क्यों अजनबियों के बीच मुझे रहना आया!
    सपनें टूटते बिखरते रहे,
    उसे समेटते दिल भर आया,
    कुछ खोया और कुछ पाया।

    क्या हुआ जो सब टूटा,
    मेरे भीतर के दर्द को, 
    कब मैंने समेटा,
    जो खोया उसे ठुकराया,
    जानकर भी इस बात पर क्यों,
    इन आँखों ने सैलाब बहाया।
    क्यो मुझे सिर्फ खोना ही आया!
    कुछ पाये थे वो लम्हें, वो बातें।
    इन सब से दूर अब मुझको जीना आया।
    कुछ खोया और कुछ पाया।

  • वो बेख़ौफ दिखाती है, अपनी पहचान

    वो बेख़ौफ़ दिखाती है,
    अपनी पहचान,
    छिपती ही नहीं परदे के पीछे,
    रोका है उसे, टोका हैं उसे,
    छुपाया हैं, उसे,
    दबाया है उसे,
    फिर भी छिपती ही नहीं परदे के पीछे,
    और बेख़ौफ़ दिखाती है,
    अपनी पहचान,
    वो जता देती है,
    वो मदद करती हैं,
    पराये की भी अपनों की तरह,
    वो दिल रखती है अपना ,
    सोने-सा होकर।
    वो जता देती है,
    उसका न होना क्या है।
    बिन माँ के बच्चे का होना क्या है,
    बिन गोद की दुलार का होना क्या है,
    वो बेख़ौफ़ दिखा देती है,
    अपनी पहचान,
    हर रास्ते पर वो चलती है,
    देती है, हमारा साथ,
    वो औरत है,
    जो कही न कही , छुपी रहती है,
    किसी परदे के पीछे,
    और बता देती है,अपनी पहचान।

  • हम बंधते ही रहे।

    हम बंधते ही रहे,
    कभी विचारों तो कभी,
    दायरों के धागों से,
    सिमट कर रही जिंदगी,
    उसी चार कोनों के भीतर,
    जन्म से आजतक,
    बस दीवारों के रंग बदले,
    और लोगो के चेहरे,
    कभी इस घर की मान बनी,
    कभी उस घर की लाज,
    फिर भी बांधते ही रहे हमें,
    कभी रिश्तों के धागों से,
    कभी आंसुओ की डोर से।।।

  • मैं चमकता सा शहर हूं

    मैं चमकता-सा शहर हूँ,
    न रुकता हूँ, न थकता हूँ,
    मेरा कारवां न रुका है,
    वो फिर से दौड़ता है,
    एक रफ़्तार के बाद।
    हादसे तो मेरे भीतर की आम बातें हैं,
    मैं खीचता हूँ, सबको अपनी और अनायास,
    हिला देता हुं किसी की जड़ को,
    मैं खुद मजबूत खड़ा रहता हूँ।
    मेरे भीतर के कालेपन को,
    कोई देख नहीं पाता।
    मेरी ऐसी चमक ही है यारों,
    जो हर किसी को, है भाता,
    मेरे भीतर की हैवानियत,
    कोई जान नहीं पाता,
    मैं चमकता-सा शहर हूँ,
    कैसे कोई लूट जाता हैं,
    कैसे कोई टूट जाता है,
    मैं देखता हूँ, मुस्कुराता हूँ,
    मुझे आदत है अब इन सबकी,
    नयेपन का सब रंग मुझे भाता है।
    मैं पालता हूँ, अजनबियों को अपने भीतर,
    कभी कोई एक न हो जाए,
    शोला भड़कता हूँ,
    मैं शहर हूँ।
    मैं वाकिफ हूँ, आग कहा जलनी चाहिए,
    ख़्वाहिशें लोगो को राख होनी चाहिए,
    उनके भीतर का इंसान मर जाना चाहिए,
    अपराध होते रहे, सामने ,पर वे अंधे होने चाहिए,
    ये नफ़रत ये अंजानापन,
    कभी कम ना होना चाहिए,
    बीतें हादसे को फिर से दोहराना चाहिए,
    आज फिर एक गुनाह मेरे भीतर हुआ,
    कल उसे फिर से दोहराना चाहिए,
    मैं चमकता-सा शहर हूँ,
    तुम्हे मेरे पास आना चाहिए,
    मैं आईना हूँ,
    तुम्हारे भविष्य का,
    जो तुम्हें सब देगा,
    जो जरूरत अगर पूरी न हो,
    उसे पाने में साथ देगा,
    तुम अगर बढ़ना चाहो,
    गुनाह के रस्ते पर,
    तुम्हारा हाथ थाम लेगा,
    तुम मेरे पास आओ,
    अपने गांव की मिट्टी छोड़कर,
    जो तुम्हें संस्कार देती है,
    शर्म देती हैं, उसको भुला देगा,
    मेरे पास आओ,
    वो सिखाती है, तुम्हें, दुसरो की इज़्ज़त देना,
    यहाँ इज़्ज़त नीलाम करने की आज़ादी देगा,
    मैं चमकता सा शहर हूँ,
    मेरे पास आओ,
    जहाँ तुमने कभी आवाज ऊँची भी न की होगी,
    बेख़ौफ़ चिल्लाने की आज़ादी देगा,
    यहाँ बहरे और गूंगे है सब,
    जो तुम्हारे हारने पर,अपनी
    जीत की जश्न देगा।।।।।

  • क्यों बच गई है मैं?

    क्यों मैं बच गयी, उन कहरो से,
    भ्रूण हत्या, कुरीतियों, और अमावताओं से,
    मिट जाती मिट्टी में,
    न होती मेरी पहचान,
    न होती मैं बदनाम,
    न होती मैं हैवानों से दो चार,
    न होती यौन शोषण का शिकार,
    न चढ़ती मैं दहेज़ की बलि,
    न होती एसिड अटैक का शिकार,
    न बलात्कारियों की बनती हवस,
    क्यों बच गयी मैं?
    क्यों बच गयी मैं?
    निभाते- निभाते सहते- सहते,
    थक गयी हूँ मैं,
    ये ज़िदंगी मिली है मुझे,
    फिर भी हँस लेती हूँ मैं,
    फिर लगता है,
    क्यों नही मैं बन जाऊ,
    इस पाप की भागीदार,
    न दू बेटी समाज को,
    मिटा दू उसकी पहचान,
    फिर से न उठ जाये ये सवाल,
    क्यों बच गयी मैं,?
    क्यों बच गयी मैं?

  • जिंदगी

    जिंदगी कितनी सुलझी हुई है,
    अगर हम माहिर हो उसे सुलझाने में।

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