छुपे सूरज क्षितिज में तो यकीनन शाम कहते हैं
जहां जन्मे प्रभू उसको अयोध्या धाम कहते हैं
हमारी आस्था देवों में कोई कम नहीं लेकिन
जो मर्यादा के स्वामी हैं उन्हें श्री राम कहते हैं।
Category: मुक्तक
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जय श्री राम
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दिशा
दिशा तुम्हारे कदमों की
कविता पहचाना करती है,
तभी यदा-कदा लिखने को
प्रेरित कवि को करती है। -
जीवन की पहेली
अपनों की भीड़ में अकेली सी,
खुद ही अपनी हूं मैं सहेली सी।
किसी को अपना .गम बता के भी क्या हासिल,
सुलझानी है खुद ही इस जीवन की पहेली। -
बेटियाँ
दुत्कार में सत्कार देती बेटियाँ
दूसरों के हित मे जीतीं बेटियाँ,
बेटियाँ में ही रमा संसार है
बेटियों से ही बना संसार है। -
मैं अपनी राह बदल लूंगा
मेरा सब कुछ ले ले तू
बस अपना स्नेह मुझे दे दे
दो बात प्रेम के बोल मुझे
मैं इसी बात का भूखा हूँ,
तेरे सुन्दर बोलों पर
मैं अपनी राह बदल लूंगा,
सारी बातों में मिट्टी डाल
नव सृजन को अपना लूंगा। -
हरियाली
बरसात आ रही है
फिर धूप आ रही है
फिर बरसात
फिर धूप,
बारी – बारी से आ रही है,
दोनों से ही तत्व हासिल कर
धरती हरियाली उगा पा रही है। -
अच्छी कवितायें मत लिखना मेरे दोस्त
अच्छी कवितायें मत लिखना मेरे दोस्त
चंद पैसों में तोले जाओगे
जैसे ही आगे बढ़ोगे
तमाम तरह की गालियां खाओगे। -
शायरी
मंजिल तक पहुँचने में
कठिनाइयां न आएं तो मजा नहीं आता,
कोई बेवजह दर्द दे तो सहा नहीं जाता। -
करते रहो संघर्ष तुम
करते रहो संघर्ष तुम
संघर्ष से ही पा सकोगे,
बस संघर्ष झगडे सा नहीं
बल्कि
मेहनत से आगे बढ़ने का हो,
कुछ अच्छा करने का हो। -
मेरी प्यारी हिन्दी
जिसको बोल कर,
मन हो जाए प्रसन्न ,
ऐसी मेरी यह भाषा है ।भाव को मेरे बना दे दर्पण ,
करती है शब्दों का समर्पण ,
ऐसी मेरी यह भाषा है।जैसा चाहूं वो बोल-लिख पाऊं ,
हर वर्ण में इसकी क्षमता है।
बन गई जो अभिमान मेरा
ऐसी मेरी हिंदी भाषा है। -
राखी
मैंने राखी भेजी है
राखी पर अपने भैया को
भैया इस बार पहन लेना
पिछली बार की तरह इसे
साइड पर को
मत रख देना
थोड़ी सी देर पहन लेना। -
ओ डाकिये
ओ डाकिये!!
मेरी राखी पहुंचा देना
राखी तक उन तक
जो देश की रक्षा करने को
सीमा में डटे हुए हैं। -
इजहार कीजिये
इतना न दूसरे से परेशान होइए
प्यार कीजिये, मनुहार कीजिये
रूठे हुए दिलों को मनाने के वास्ते
मनुहार कीजिये इजहार कीजिये -
शायरी
कुछ इधर से खाया कुछ उधर से
मोटे पेट हो गए
रात भर नकली नोट छापे
सुबह सेठ हो गए -
ऐसे दुखी हुए
दूसरे को आगे बढ़ते देख
वे ऐसे दुखी हुए
रात भर सोये नहीं
सुबह सुखी हुए -
बेकार आ गए
उनके शहर में, हम बेकार आ गए,
उनका खरीदा था शहर, हम बेकार आ गए। -
कितना अच्छा होता !
कितना अच्छा होता!
अगर ऐसे ही हमारे नाम भी अलग होते ,
और काम भी अलग-अलग होते ,
मगर, जात और धर्म एक ही होती,
इंसानियत। -
कितना अच्छा होता !
कितना अच्छा होता!
अगर ऐसे ही हमारे नाम भी अलग होते ,
और काम भी अलग-अलग होते ,
मगर, जात और धर्म एक ही होती,
इंसानियत। -
राफेल का भेंट
हे परमवीर हे युद्धवीर हे शरहद के रक्षक
दुश्मन के खातिर एक नकेल मैं देता हूँ।
दुश्मन मिल जाए गर्दिश में जिससे मिनटों में
एक आग्नेयास्त्र राफेल मैं देता हूँ।। -
मुक्तक
पढ़ने लिखने में
मन लगाकर
कुछ आगे बढ़ने की
सोच रखो बच्चो
कुछ बनने की
सोच रखो -
बेटी कोई वस्तु नहीं
बेटी कोई वस्तु नहीं जो
जो उसका दान करोगे,
बेटी तो बेटी है, क्यों
बेटी का दान करोगे।
ब्याह करो पर दान नहीं
क्या यह उसका अपमान नहीं,
जो वस्तु समझ कर दान हो गई,
इंसान नहीं , सामान हो गई।
—- डॉ0 सतीश पाण्डेय -
अच्छे मित्र
किताबों से अच्छे मित्र कहां हैं,
कविता से अच्छे चित्र कहां हैं।
दुखी हो के ना बैठ “गीता”,
“सावन” पे जाओ, सखी, दोस्त, बंधु यहां हैं। -
देश भक्ति
देश भक्ति की सरिता बहे
देश भक्ति की कविता बहे
ऐसी बरसात हो देश
भक्ति की बाढ़ हो -
शुभरात्रि
प्यारी सी शुभरात्रि है
सभी को
कविता यूँ ही खिलती रहे
सावन में बरसती रहे -
प्यारी वर्षा ऋतु में
प्यारी वर्षा ऋतु में
देखो कितनी सुन्दर हरियाली है,
नाहा रहे हैं सारे पौधे
शाखाएं क्या मतवाली हैं, -
जय हिन्द
वीरों को नमन
सैनिकों को नमन
जो भी सीमा में प्रहरी तैनात हैं
उन सभी को नमन
जय हिन्द
जय हिन्द -
गांव का मकान
गांव का मकान रोता तो होगा।
मेरे आने की आस में सोता ना होगा।।
ख़ुद को संभालने की कोशिश करता।
घुट घुट के खंडहर होता तो होगा।।
सिपाही बनकर पड़ा ताला भी।
अब जंग से जंग लड़ता तो होगा।।
बन्द दरवाज़े खिड़कियां सिसकती तो होगी।
पड़ोसियों से थोड़ी आस रखतीं तो होंगी।
कोई तो आए,उन्हें खड़काए फ़िर अंदर बुलाए।
बूढ़ा मकान, फ़िर से जवानी की आस रखता तो होगा।
वो बरामदे में लगा पीपल बुलाता तो होगा।
बचपन को अब भी अपनी डालो में झुलाता तो होगा।।
गांव का मकान बुलाता तो होगा। -
दर्द भरी इक गुज़ारिश
मेरे घर में रहे तो फिर किराया दे गए होते
भंवर में था , मुझे कोई किनारा दे गए होते
नहीं कुछ और ख्वाहिश है सनम तुमसे मुझे लेकिन
चले जाना हि था तो दिल हमारा दे गए होते।
शक्ति त्रिपाठी देव -
नाम देश का ऊंचा हो.
देश की रक्षा
पहला धर्म
देश की रक्षा
पहला कर्म,
जुटे देश की रक्षा को,
नाम देश का ऊंचा हो. -
दोहे
गरीब गरीब रह गया, सेठ सौ गुना सेठ।
खाई सा अंतर हुआ, भूख बराबर पेट।।1
गरीबों के उत्थान की, बनी योजना लाख।
कागज में पूरी हुई, उस तक पंहुची खाक।।2
—– सतीश पाण्डेय -
बेरोजगारी
आत्मघात, मानसिक पीड़ाएँ,
छीना-झपटी, राह भटकना,
बेरोजगारी के दुष्प्रभाव हैं,
पहला काम हो इसे रोकना. -
हाय रे आज के इंसान
कितने बदल गये है इंसान।
बेच कर अपना ईमान।।
सच्चाई से कोस दूर भागे।
झूठ के बीज बोये बेईमान।।
बुरी नजर वाले का मुंह है गोरा।
नेकी करने वाले को बना दिए हैवान।।
झूठ के पर्दे में छूप कर।
बनते है आज के दयावान।।
अधर्म पे चलने वालों को।
गर्व से कह गए हम आज का ‘महान’।। -
एक विनती
रख अभी जिंदा मुझे, आंसू बहाने के लिए
साथ तेरे प्रेम का रिश्ता निभाने के लिए
और कुछ ना मांगता हूं बस यही अरदास है।
दे दे बस दो गज जमीं इक आशियाने के लिए
शक्ति त्रिपाठी देव -
पता नहीं तुम कैसे
पता नहीं तुम कैसे लिख लेते हो
कविता, इतनी आसानी से
मेरे तो ख्याल ही गुल रहते है
ठहरते ही नहीं कागज पर -
बेटियां
बेटियां तो जिंदगी का मूल हैं
बेटियां शुभकामना स्फूर्ति हैं,
वंश चलने की न कर चिंता मनुज,
बेटियां निज वंश की ही पूर्ति हैं, -
सपनों की पंख
मत काटो मेरी पंख ;मेरे अपनों
मैं बुलंदी के आसमानों में उड़ना जानता हूं।
छोड़ दो मुझे मेरे रास्ते पर ,
मैं ठोकरो से संभलना जानता हूं। -
लिखने दे
मुझे तेरी हथेली पर जिगर की बात लिखने दे
तुझे लव की कसम है आज सारी रात लिखने दे
लिहाजा आप मुझसे हो खफा एहसास है लेकिन
मिला जो आपसे मुझको वही सौगात लिखने दे।
शक्ति त्रिपाठी देव -
पानी के बुलबुले जैसी जिंदगी है मेरी
पानी के बुलबुले जैसी जिंदगी है मेरी
सुन्दर है, सूरज से रोशन भी
मगर कब हो जाये खत्म
फ़ूट जाये कब बुलबुला, खबर नहीं -
धुँआ
छाती चौड़ी की
सिगरेट जलाई,
सोचता है इसे पी रहा हूँ।
तू नहीं पी रहा
इसको प्यारे
यह धुंआ तो मजे से तुझे पी रहा।
—– डॉ0 सतीश पाण्डेय -
लोकतंत्र में कवि
लोकतंत्र के वृहद भवन का
मुझको स्तम्भ मानो न मानो
मैं धरम जाति भेदों से ऊपर
आम जनता की बातें लिखूंगा।
जो घटित हो रहा है लिखूंगा
जो गलत हो रहा है कहूंगा,
सब चलें अपने कर्तव्य पथ पर
ऐसी कविताएं करता रहूंगा।
डॉ0 सतीश पाण्डेय -
पहचान
नाम बदलते रहा मैं
चेहरे छुपाता रहा
अपनी झूठी पहचान बनाने को
पैंतरे बदलता रहा, -
मुक्तक
सावन मास शिव का मास
शिव ही शिव चारों ओर
बरसात की बूंदें
शिव को करा रही स्नान ,
देवाधिदेव महादेव का
आओ सब करें ध्यान, -
प्रिया (कविता)
रखे रहो हाथो पे हाथ प्रिया ,
सोचती रहो कोई अनसोंची बात प्रिया,
सर्द हवा के झोंके में,
जरा- ठहर जाओ रात प्रिया,
हम मिलजुल कर सुख दुःख बाटेंगे,
जो मिलेगा जन्म जात प्रिया। -
अंगारों से खेलूंगा
अंगारों से खेलूंगा और तूफ़ा से लड़ जाऊंगा
मंज़िल मुठ्ठी में होगी ,ऐसे पीछे पड़ जाऊंगा
एक हार से कम ना आंको मुझे जरा दुनिया वालों
हर मुश्किल घुटने टेकेगी, गर जिद पे अड़ जाऊंगा
शक्ति त्रिपाठी देव -
शिव वंदना
जय महादेव जय मृगपाणी दक्षाध्वरहर जय कामारी
शशिशेखर ,नीलकंठ भगवन जय महाकाल जय त्रिपुरारी
शिव शंकर, गंगाधर शंभू जय जगद्गुरू जय व्योमकेश
मुझे अपनी शरण में लो भगवन ,सर्वज्ञ अनिश्वर जय महेश।
✍️ देव 🙏 -
तुम मिटाती रहो सबूत
तुम मिटाती रहो मेरे प्यार के सबूत
मैं सबूत जुटाता रहूंगा।
तुम कितना भी मेरे ख्वाबों से बचना चाहो
मैं हर रात ख्वाबों में आता रहूंगा। -
मुक्तक
स्वप्न में रोज लिखती हूँ
तुम्हारे नाम की कविता,
कहीं कोई देख ना ले
बस इसी चिंता में रहती हूँ,
इसलिए उन सबूतों को
मिटाकर ही मैं जगती हूँ। -
हौसला
हौंसले के दम पर जीते आ रहा हूं,
लहू को बहाकर घूंट पीते आ रहा हूं।
पहचान की परवाह करना मैं छोड़ दिया,
धर्म कर्म से जीने का सलीका जब से सीखा हूं।।✍महेश गुप्ता जौनपुरी
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नाम
नाम पहचान को तांक में रखकर,
धर्म कर्म सदैव करते रहना यारों।
अजर अमर के ढोंग को त्याग कर,
मरकर ख्वाहिश फूलों का ना करो।।✍महेश गुप्ता जौनपुरी
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हारा प्राणी
हारा प्राणी
हारा प्राणी धूल चटाता,
जीता प्राणी टेस में जीता।
जागरूक हमेशा लड़ता है,
हालातों से कभी नहीं घबराता।।✍ महेश गुप्ता जौनपुरी