Category: मुक्तक

  • जिन्दगी जब सोंचने बैठती है…

    जिन्दगी जब सोचने बैठती है
    कितने अफसाने याद आते हैं
    रो नहीं पाती हैं आँखें आजकल
    अश्क आँखों में ही जम जाते हैं

  • वो कुछ कहते नहीं

    वो कुछ कहती नहीं,
    ये स्वीकृति नहीं है!
    दबा-सा कोई रोष है,
    क्या सही ,क्या ग़लत,
    उसके लिए,
    तुम ही फैसला लो ,
    हर बार!
    क्या ये भी,
    उसी का दोष है?

  • शाश्वत सौंदर्य

    तुम जो पड़े हो पीछे,
    चेहरे की सुंदरता के ,
    वो अक्सर वक्त के बाद ढल जाती है,
    जाओ कभी अंदरूनी सौंदर्य के पीछे
    वो शाश्वत है हमेशा के लिए।

  • सवाल विचित्र-सा

    नैतिकता को पढ़ना-सुनना,
    अक्सर बहुत अच्छा लागे,
    सबपर पूरा असर ,
    पूरा समर्थन,
    मगर आचरण में सबके क्यों नहीं?
    यह सवाल विचित्र-सा,
    काल्पनिक-सा…..

  • सही मायनों में उजाला है।

    सही मायने में उजाला है,
    जहां बेटियों ने मां-बाप को संभाला है।
    चाहे मां पिता हो या मां पिता से सास-ससुर,
    उन्हीं से ही परिवार का सवेरा है।

  • विचारधारा

    परम सौंदर्य है सादगी, क्षमा उत्कृष्ट बल ।
    अपनापन अत्युत्तम रिश्ता, परिश्रम तकलीफों का हल ।

  • मेरे मन के कोने में

    तुम बिल्डर हो
    उम्र में इल्डर हो
    हो सके तो
    मेरे मन के किसी कोने में
    अपना घर बना लो।
    वीरान -सा छाया है
    हर तरफ यहाँ पर
    अपने प्यार का
    सुंदर -सा शहर बना लो।।

  • मैंने तुम्हें जिताया

    मैंने तुम्हें जिताया ,
    उम्मीद का बटन दबाकर,
    सोचा था कि बढ़ाओगे रोजगार को मेरे,
    मगर तुमने बढ़ाया,
    सिर्फ अपना पेट।

  • आज भी माँ की गोद में..

    आज भी माँ की गोद में सिर रखकर
    सो लेता हूँ
    होता हूँ उदास कभी तो लिपटकर
    रो लेता हूँ
    माँ को गुजरे जमाने हुए हैं मगर
    मैं आज भी माँ से मिलकर
    प्यार बटोर लेता हूँ…

  • ऊंचे-ऊंचे घरों में

    ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
    रहने वाले लोग,
    आजकल घरों में ही रहते हैं,
    मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
    रेहड़ी लेकर,
    खाली उदर बच्चों का,
    टिकने ही नहीं देता है।

  • रात का बटोही

    रात का बटोही भटकता फिरे,
    और नींद समुद्री लहरों-सी,
    किनारे को छुकर वापिस चली जाएं।

  • पास ही रहो

    बिना आपके सोचना भी मना है
    बिना आपके पथ अंधेरा घना है,
    बिना आपके जिन्दगी है अधूरी
    पास ही रहो, जीने को हो जरूरी।

  • मित्र अपना कह दिया

    आपने जब हमें
    मित्र अपना कह दिया
    यकीन मानिए,
    जलवा हमारा बढ़ गया।
    अब ये माथा आपका
    झुकने न देंगे हम कभी
    आपको सिर-माथ पर
    हमने सजा कर रख लिया।

  • क्या गिरा पाओगे?

    हमें क्या गिरा पाओगे,
    हमें क्या मिटा पाओगे,
    जो जवानी में गिर गिर के चलना सिखा हो,
    कभी आंसू तो कभी जहर पीना सिखा हो,

    आज खुश है हमें छोड़ कर,
    यारों हम भी खुश हैं उसे छोड़कर|😊🙂
    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
    ऋषि कुमार “प्रभाकर”

  • कुछ भी

    कुछ भी उसमें खास नहीं था,
    फिर भी उसे दिल में बसाया था,
    कोई हमसे छीन ना ले..
    हर दिन खुदा से दुआएं किया करता था

    मेरी तकदीर है,
    मेरी जन्नत की लकीर है,
    खुदा आज भी उसका इंतजार है,
    यदि दुआएं मेरी तुझे कबूल है|
    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍
    ऋषि कुमार “प्रभाकर”

  • आहिस्ता से बोल दो

    आहिस्ता से बोल दो
    क्या कह रहा मन
    करोगे मुहब्बत या
    दुत्कार दोगे।
    इकबाल है हमारा
    मिले आप पथ में
    इजहार कर दिया,
    क्या स्वीकार लोगे।

  • नटखट साथी

    साथी मेरा नटखट कम नहीं है वो,
    हमारे नयनों पे हाथ रख के..
    पूछे कौन है , बताओ तो,
    हम भी कम नहीं हैं , कुछ..
    आहट से जान लेते हैं ,
    ख़ुशबू से पहचान लेते हैं ।

  • दया भाव रखो

    अपनी आंखों में
    दया भाव रखो
    मदद करो गरीबों की
    उनकी सेवा में खपो।
    मिलेगा सुख स्वयं के भीतर से
    कभी हरि नाम जपो,
    मदद में लगो।

  • कहां ढूंढू।

    कहां ढूंढू में ऐसी भाषा कहीं,
    जैसा बोलूं वैसा लिख पाऊं,
    वो मैं मेरी हिंदी में ही पाऊं….

  • समा लेती है…

    समा लेती है ,
    हर भाषा को,
    अपने भीतर ,
    जिसकी कोई सीमा नहीं ,
    वो पूर्ण है खुद से,
    मेरी हिंदी जैसी कोई नहीं…

  • भीतर शमशाद है

    बाहर विषाद है
    भीतर शमशाद है ।
    अंतर्मुखी हो जाओ आली
    फिर देखो प्रसाद हीं प्रसाद है।।

  • व्यथित मन

    घबरा जाती हूं, विवादों से,
    व्यथित हो उठता है मन,।
    शांत हो पाती हूं एकान्त से,
    करती हूं दूर ऐसे टेंशन ।

  • वो चली गई!

    वो रात भर खांसती!
    चिल्लाती!
    घबराती!
    फड़फड़ाती!
    भुखी-प्यासी, आंसू बहाती,
    अकेली तड़पती,
    चलीं गईं!
    छोड़ सांस ,
    वो चली गई।
    मगर बेटे बड़े संस्कारी!
    ऐसे ना भुखा जाने देंगे,
    जीते जी तो कुछ कर ना पाए ,
    मगर आज पूरा ध्यान देंगे,
    जिसके लिए कितना तरसी वो,
    पूरा वो मान देंगे,
    पूरा वो सम्मान देंगे!

  • हसरत ए दीदार

    बहुत झगड़े हम रात भर
    दिल से अपने ,
    मगर बदनामी करे,
    मनमानी करे,
    दिल मेरा ,
    तुम्हारी ही गुलामी करें ,
    आखिर आना ही पड़ा लौटकर ,
    तेरे शहर में,
    तेरी गलियों में,
    हसरत ए दीदार को तेरे ,
    दिल मेरा बदनामी करे,
    दिल मेरा मनमानी करें।

  • अभी भी…

    अभी भी उम्मीद बाकी है,
    अभी मेरी सांसों में सांस बाकी है।
    कुछ छूने की ऊंचाईयां,
    कुछ पाने की इच्छा
    अभी मेरे सपनों में जान बाकी है।

  • पढ़ लेते हैं पन्ने जिंदगी के।

    पढ़ लेते हैं पन्ने जिंदगी के,
    जब हंसना हो या रोना हो।
    अब भी उसी तरह दिखते हैं ,
    वो बदलते ही नहीं ,
    बीते वक्त के बाद भी।

  • सावन :एक परिवार

    सावन की बहार है
    कविताओं की बौछार है।
    कवियों और कवयत्रियों का
    पावन ये परिवार है।।

  • प्रतीक्षा

    नव – प्रभात है बीती निशा ,
    जागो कोई कर रहा प्रतीक्षा ।
    धूप खिली है, सब पंछी भी उठ गए,
    अब रैन कहां जो सोए हो।

  • बेटी:- दो कुल का अभिमान

    होंठों की मुस्कान है बेटी
    सबके घर की शान है बेटी
    बेटा तो है कुल का दीपक
    दो कुल का अभिमान है बेटी..

  • यह क्या हो गया

    यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ नकाब ही नकाब है।
    यह कैसा मातम आज शायरो पे आया है।।
    ना नज्म है ना ग़ज़ल है ना नातशरीफ है।
    मौसम भी कुछ कुछ शायरों से ख़फा है।।
    गुलशन में भी गुल खिलना भूल गया है ।
    ए नकाब इतनी कयामत भी अच्छी नहीं है।।

  • एक ही सवाल हैं

    कितना समझें तुमको ,
    यह तुम ही बता दो,
    एक ही सवाल है तुझसे जिन्दगी,
    तू क्या है? और क्यों है ?
    बता दो ,
    ना एक पहेली है ,
    ना एक आईना है ,
    जो सुलझा सकूं तुझे,
    या देख सकूं तुझे।
    न जरिया है,
    न दरिया है ,
    न मौन है ,न शोर है,
    बता दे तू कौन है?

  • दो तरह के लोग..

    ” गीता” इस संसार में, दो तरह के लोग,
    परवाह नहीं इस भयंकर रोग की, भागे फिरते रोज़ ।
    दूजे वाले डरकर रहते, घर से बाहर कम निकलते,
    मगर मज़े की बात देखो, …….
    दोनों ही एक – दूजे को बेवकूफ़ हैं समझते
    ……….✍️ गीता..

  • घर घर की यही कहानी

    दिन रात घर घर की यही कहानी है।
    सास बहू के झगड़े युग युगांतर पुरानी है।।
    सास की कड़वी – बोली मैं तुमसे कम नहीं कलमुंही।
    बहू की कड़वी जबाब – तू ही जहर की पुरिया है।।
    सास उठाए झाडू तो बहू उठाए बेलन।
    यही दो अस्त्र की चर्चे घर में है आँगन में है।।
    यही दकियानूसी विचार हर घर को बर्बाद किया।
    नफ़रत की चिंगारी इधर भी है उधर भी है।।
    काश !! सास समझ पाती मैं भी कभी बहू थी।
    काश !! बहू भी समझ पाती माँ के बदले सासु माँ है।।
    बेचारा – पति महोदय भी घबड़ाए अब मैं क्या करुं।
    एक तरफ माँ है दूसरी तरफ अर्धांगिनी है।।
    कहे कवि – जो पुरूष इन दोनों पे काबू पा लिया।
    समझो उसके ही घर में खुशियों के बरसात है।।

  • बड़े शहर की जिंदगी…

    बड़े शहर की जिंदगी को छोड़ ,
    अब छोटे शहर की जिंदगी को,
    जीकर देख रहे हैं
    यहां भी लोग हैं; वहां भी लोग थे,
    यहां सोच बड़ी, वहां सोच छोटी ,
    न निभाते हैं रिश्ते को,
    न जानते हैं इंसानियत को,
    कौन आपका अपना है,
    कौन आपका पराया,
    पर जुड़े हैं अब भी सब,
    रुपए की चाह में,
    हैसियत की छांव में…….

  • जौहरी

    खुदा ने पत्थर को
    वनडोल बनाया।
    दम है उस जौहरी में
    जो अनमोल बनाया।।

  • घर में डाॅन

    मीच के आँखें रोते -रोते
    खोज रहा हूँ होकर मौन।
    मुझको रुलानेवाला जग में
    छुपकर बैठा आखिर कौन?
    नजर भला वो आए कैसे
    घर में बैठा बनकर डाॅन ।।

  • हँसते -रोते देखा

    पाकर सब नदियों का पानी
    सागर को खूब मचलते देखा।
    पत्थर के कलेजे रखनेवाले
    हिमालय को पिघलते देखा।।
    गम्भीर बड़ा आकाश मगर
    हमने उसको भी रोते देखा।
    सबको पाक करे जो नदियाँ
    बीच कीचड़ में सोते देखा।।
    ‘विनयचंद ‘ इस दुनिया में
    किसी को हँसते -हँसते देखा।
    और किसी को रोते -रोते देखा।।

  • आओ ताली बजाते हैं!

    आओ थाली बजाते हैं!
    गरीबी का मुंह दिखाने वाली,
    बेरोजगारी के लिए ,
    आओ ताली बजाते हैं!

    देश की कमर तोड़ने वाली
    मरी हुई अर्थव्यवस्था के लिए,
    आओ थाली बजाते हैं!

    झूठ को सच बनाने वाली
    दलाल मीडिया के लिए ,
    आओ ताली बजाते हैं!

  • शोर…

    शोर भीतर भी है।
    शोर बाहर भी है ।
    ये ऐसा मंथन हैं।
    जो चलता रहता है।
    गुंजता रहता है।
    हम शांत नहीं कर पाते।
    बस बना लेते हैं।
    शोर को अपनी आदत का हिस्सा।

  • सलाह

    लाखों की डिग्री लेकर,
    खोज सके न वैक्सीन|
    कवि खोज दिए कलम से अपने,
    कोरेना का ऐतिहासिक सीन|

    नेता की नियत बताएं,
    डॉक्टर मिल करते खेल|
    लिवर किडनी गुर्दा ही बेचे,
    कोरोना में गजब ही खेल|

  • मां ने जब रोटियां…

    मां ने जब रोटियां बनाना सिखाया ,
    मुझे कुछ समझ ना आया ,
    कभी रोटियां जली तो कभी हाथ,
    फिर सीख ही गई मैं,
    रोटियां बनाना,
    और अब रोटियां नहीं जलती ,
    बस जलते हैं हाथ।

  • झूठ

    माँ ही है संतान मोह में,
    सबसे से लड़ जाती है|
    जिसकी माँ खुद जज वकिल बने,
    उन बच्चों की हार नहीं हो सकती है|

    लाख गुनाह छिप जाते है,
    बस माँ के आ जाने पर|
    दंड के संग संस्कार सिखाती
    प्यार से घर लाने पर|

  • जल – धारा

    कुंदन सी निखर गई,
    टूटे मोती सी बिखर गई।
    अंतर्मुखी सब कहने लगे,
    सबका कहना सह गई मैं,
    जल – धारा सी बह गई मैं ।

  • उम्मीद

    उम्मीद की लौ रोशन रहे,
    ये जीवन जीने की चाह कहे।
    ना हो कभी ना उम्मीद मनुज,
    अवसाद की पीड़ा भी ना सहे।

  • मेरी शिक्षक मेरी मां

    मेरी शिक्षक मेरी मां ही तो है ,
    सिखाया उसने चलना ,
    बोलना और पढ़ना -लिखना।
    अर्थ न जाने कितने समझाएं ।
    पूछो कितनी ही बार ;वह प्रश्न ,
    फिर भी कभी ना डांट लगाए ।
    मुस्कुराकर ;माथे को चुमे
    और प्रेम से बतलाए।

  • गुरुवर के प्रति

    मान हैं
    सम्मान हैं
    देश की जान हैं।
    आम नहीं खास नहीं
    राष्ट्र निर्माता हैं शिक्षक।
    नाक से नेटा टपक रहा था।
    आंसू का कतरा लुढक रहा था।
    बाहुपाश में भरकर जिसने अपनाया
    वो मेरे भाग्यविधाता हैं वही ज्ञान के दाता हैं।।
    ऐसे शिक्षक गुरुगरीष्ट को वन्दन है बारम्बार।
    भूलोक से स्वर्गलोक तक खुशियाँ मिले अपार।।
    गुरुवर आपके चरणों में कोटि-कोटि नमस्कार ।।

  • दिखावे के पीछे -पीछे

    दिखावे का मायाजाल बड़ा भयंकर,
    जो फंस जाएं निकल ना पाए,
    फिर उचित ,अनुचित सब परे-सा,
    अलग-अलग हाथी के दन्तों -सा।

  • विश्वास

    विश्वास में विष भी है, और आस भी है।
    धोखा मिले या घात,ये तो अपने नसीब की बात है

  • क्यों कुछ कहते नहीं।

    क्यों कुछ कहते नहीं,
    सब गूंगे बहरे बैठे हैं ,
    सबके भीतर जलती है आग,
    फिर क्यों खामोश बैठे हैं,
    खो दिया है सम्मान को ,
    अपने भीतर के इंसान को,
    तभी तो चुप ही रहते हैं,
    होती है वारदातें आंखों के सामने ,
    फिर क्यों ,आवाज दबाए रहते हैं।

  • नारी तुम पर कविता लिखने को

    नारी तुम पर कविता लिखने को
    वर्णांका असफल है मेरी
    तुम तो जीवन की जननी हो
    सब कुछ तो तुम ही हो मेरी।
    माँ बनकर जन्म दिया मुझको
    यह सुन्दर सा संसार दिखाया,
    अच्छी-अच्छी शिक्षा देकर
    मानव बनने की ओर बढ़ाया।
    दीदी बनकर स्नेह लुटाया
    बहन बनी, खुशियों को सजाया
    दादी बनकर लोरी गाई
    नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया।
    भार्या का रूप मधुर धर कर
    जीवन में नईं खुशी लाई,
    सारा भार स्वयं पर लेकर
    पीड़ा में भी मुस्काई।
    बेटी बनकर घर आंगन में
    रौनक की किलकारी भर दी
    बेटों की बराबरी करके
    सब ओर नींव नई रख दी।
    तुम पर कविताएं लिखना
    सूरज को दिया दिखाना है,
    तुम सूरज हो इस जीवन की
    तुम पर नतमस्तक होना है।

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