ए दोस्त सोचो,अगर राह में रोड़े न होते। जीवन के परिभाषा, हम कैसे समझ पाते।। यही रोड़े सभी को जीवन धारा बदल दिया। वरना संसार के इस सैलाब में हम कहाँ होते।। ठोकर पे ठोकर […]

यदि नारी से निर्माण हुआ है नया संसार। फिर क्यों नारी पे हुआ घोर अत्याचार।। हम कहते है नारी होती है ममता के सागर। फिर क्यों हुआ बाजार में आज ममता बेकार।। आंचल में हम […]

शब्दों की सीमा लांघते शिशुपालो को, कृष्ण का सुदर्शन दिखलाने आया हूं,                                  मैं देश दिखाने आया हूं।। नारी को अबला समझने वालों को, मां काली का रणचंडी अवतार याद दिलाने आया हूं,                          मैं […]

आज तू हंस ले , खुलकर मुझ पर, मगर ,थोड़ा सा सब्र कर; अरी; सुन ! मेरी अभागी क़िस्मत! मैं सीख तुम्हें सीखलाऊंगा, मेहनत की जंजीरों से जकड़कर, मुलाजिम तुम्हें बनाऊंगा। मुलाजिम, तुम्हें बनाऊंगा! ——मोहन […]

कहीं तो छुपा है, किसी ना किसी कोने में, दुबका हुआ सा, मौके की तलाश में, कम या फिर ज्यादा, मगर छिपा जरूर है, हर मस्तिष्क में! और बचा तो ‘मानुष’ तू भी नहीं , […]

वो घड़ी है कौन सी जिस घड़ी खुश रहते हो तुम, अब घड़ी की जगह मोबाइल ने ले ली हर घड़ी उसी में गुम रहते हो तुम।

उठो फिर से मेरे यारो, यहाँ कुछ काम करना है| शहर है जाम यदि यारो, कही से राह देना है लड़ो सरकार से भाई, हमें इतराज ना तुमसे| पर परवाह करो मेरी भी,एक जुड़ी जान […]

चलो होड़ लगाते हैं, ओ री! बारिश तेरी, मेरे नयन झरने से। ओह! मगर तुम हार जाओगी, ये झरना तो पूरी रात बहता है, और तुम बरसती हो कुछ क्षण के लिए।

बहुत भीड़ है मन्दिर में, मस्जीद में शोर-शराबा है, मेरा हृदय महल बहुत खाली-सा यहां विराजमान हो जाओ, प्रभु! फिर मेरे लिए यहीं अयोध्या और यहीं है काबा ।

कभी माँ का प्यार तो कभी बहन का प्यार। यही प्यार के रिश्ते में बना है हमारा घर संसार।। काश!!! यह पवित्र रिश्ते हम में नहीं होते। जरा सोचो, कैसे चल पाता हमारा घर संसार […]

एक दिन, ऐसे ही मैंने कोशिश की , खुद को खुद में ढूंढने की, अपने वजूद को ; गहराइयों में टटोलने की, अरे! कौन हूं मैं? लिंग ,नाम, पहचान , गौत्र, जाति ,धर्म,देश, सब पर […]

एक दिन ऐसे ही मैंने कोशिश की , खुद को खुद में ढूंढने की, वजूद को गहराइयों में टटोलने की, अरे! कौन हूं मैं? लिंग ,नाम, पहचान ,गौत्र, जाति ,धर्म,देश सब पर विचार किया, फिर […]

जीवन क्या है? क्या है जीवन! लकड़ी का कोई फट्टा-सा, पेड़ का कोई पत्ता-सा कब टुट जाएं कुछ पता नहीं, मानो कोई गुब्बारा-सा तैरता मटका बेचारा-सा कब फूट जाए पता नहीं।

तू जिंदगी ! दर्द भरे आसमान सी, मुसीबतें काले बादल है, मगर मैं ठहरा! हौसलों के रॉकेट सा , चीरता मेघों को जाऊंगा, जिंदगी तेरे आसमान को छलनी करता ,उभर जाऊंगा। ———मोहन सिंह “मानुष”

छुपे सूरज क्षितिज में तो यकीनन शाम कहते हैं जहां जन्मे प्रभू उसको अयोध्या धाम कहते हैं हमारी आस्था देवों में कोई कम नहीं लेकिन जो मर्यादा के स्वामी हैं उन्हें श्री राम कहते हैं।

मेरा सब कुछ ले ले तू बस अपना स्नेह मुझे दे दे दो बात प्रेम के बोल मुझे मैं इसी बात का भूखा हूँ, तेरे सुन्दर बोलों पर मैं अपनी राह बदल लूंगा, सारी बातों […]

जिसको बोल कर, मन हो जाए प्रसन्न , ऐसी मेरी यह भाषा है । भाव को मेरे बना दे दर्पण , करती है शब्दों का समर्पण , ऐसी मेरी यह भाषा है। जैसा चाहूं वो […]

मैंने राखी भेजी है राखी पर अपने भैया को भैया इस बार पहन लेना पिछली बार की तरह इसे साइड पर को मत रख देना थोड़ी सी देर पहन लेना।