Category: ग़ज़ल

  • नयन अश्कों से भिगोता रहा हूं मैं जिन्दगी भर

    नयन अश्कों से भिगोता रहा हूं मैं जिन्दगी भर ।
    गजल उनको ही सुनाता रहा हूं मैं जिन्दगी भर ।

    दरख्ते उम्मीद अब है कहां लगतें तेरे जमी पर
    रकीबों सा अब तड़पता रहा हूं मैं जिन्दगी भर।

    दुआओं का रुख बदलता रहा ताउम्र,गिरगिटों सा,
    मुबारक फिर भी से करता रहा हूँ मैं जिन्दगी भर।

    फ़िकर अब किसको रहा है जमाने में देख दिलवर,
    दरद अपनी अब भुलाता रहा हूं मैं जिन्दगी भर।

    मुकद्दर भी कब सही था हमारा इस दौर “योगी”
    मगर रों रों कर हसाता रहा हूँ मेै जिन्दगी भर।

    योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा,छत्तीसगढ़
    7000571125

  • कब्र दर कब्र

    एक दिन आसमां से गुजर जायेंगे |
    कब्र दर कब्र में हम उतर जायेंगे |

    आँधियों से ये कह दो रहें होश में |
    गर नही तो गुजर रौंदकर जायेंगे |

    लाख तूफ़ान दरिया उठाती रही |
    बस तेरा नाम लेकर गुजर जायेंगे |

    क्या करूँ मैं सभी लोग बिगड़े यहाँ |
    पर घरों में रहें तो सुधर जायेंगे |

    चाँद तारों से कह दो घरों में रहें |
    सामने से नही तो गुजर जायेंगे |

    मानता हूँ , दिलों में ही महफूज हैं |
    गर यहाँ से गये तो बिखर जायेंगे |

    चाँद तारों रहो हद मे सब , गर नही |
    लफ्ज तासीर तक भी उतर जायेंगे |

    ए परिंदे उड़ो तुम जमीं देखकर |
    जो मरेंगें खुदा के ही घर जायेंगें |

    अब जरा देख ‘अरविन्द गुब्बार को |
    पर हवा साथ खुद ही गुजर जायेंगे |
    ❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • दुआ ली हमने

    रोग जाता ही नहीं कितनी दवा ली हमने |
    माँ के क़दमों में झुके और दुआ ली हमने |

    इस ज़माने ने सताया भी बहुत है मुझको |
    आग ये सीने की अश्कों से बुझा ली हमने |

    जब नजर आई नहीं ख्वाब में ‘ माँ की सूरत |
    अपनी आंखों से हर इक नींद हटा ली हमनें |

    देखने तो आज सभी आये तमाशा मेरा |
    जब से दीवार घरों में ही उठा ली हमने |

    तेरी चाहत में हुआ हाल ‘ दिवानों जैसा |
    अपनी पगड़ी ही सरे आम उछाली हमनें |

    हर तरफ ही यूं नजर आने लगी उल्फ़त जब |
    दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने |

    खत्म हो जाये न ये दौर मुलाकातों का |
    ज़िंदगी बस तेरे वादे पे बिता दी हमने |

    माँ के क़दमों में ये सारा ही जहां दिखता है |
    बस तेरी याद में हस्ती भी मिटा ली हमने |

    खौफ था मुझको चरागों से ही घर जलने का |
    आग ‘ अरविन्द ‘ घरों में ही लगा ली हमने |
    ❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • दुआ ली हमने

    रोग जाता ही नहीं कितनी दवा ली हमने |
    माँ के क़दमों में झुके और दुआ ली हमने |

    इस ज़माने ने सताया भी बहुत है मुझको |
    आग ये सीने की अश्कों से बुझा ली हमने |

    जब नजर आई नहीं ख्वाब में ‘ माँ की सूरत |
    अपनी आंखों से हर इक नींद हटा ली हमनें |

    देखने तो आज सभी आये तमाशा मेरा |
    जब से दीवार घरों में ही उठा ली हमने |

    तेरी चाहत में हुआ हाल ‘ दिवानों जैसा |
    अपनी पगड़ी ही सरे आम उछाली हमनें |

    हर तरफ ही यूं नजर आने लगी उल्फ़त जब |
    दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने |

    खत्म हो जाये न ये दौर मुलाकातों का |
    ज़िंदगी बस तेरे वादे पे बिता दी हमने |

    माँ के क़दमों में ये सारा ही जहां दिखता है |
    बस तेरी याद में हस्ती भी मिटा ली हमने |

    खौफ था मुझको चरागों से ही घर जलने का |
    आग ‘ अरविन्द ‘ घरों में ही लगा ली हमने |
    ❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • मुफलिसी जहां की जबान

    मुफलिसी जहां की बस मैं जबान रखता हूं |
    आज हाथ में अपने आसमान रखता हूं |

    गौर कर जरा बस्ती पे कभी खुदा मेरे |
    हैं गरीब सब तो घर में दुकान रखता हूं |

    है खबर जमीं तो तुमने खरीद ली सारी |
    आसमान पे , लो अपना मकान रखता हूं |

    तुम्हे गर लगाना है आग तो लगा दो , पर |
    आँख में जहाँ वालों मै तुफ़ान रखता हूं |

    जानते रहे बेईमान है खुदा हम भी |
    इसलिए बेईमां के घर पे जान रखता हूं |

    काश इश्क का वो आगाज तो करें गर ‘मै |
    इक तरफ मुहब्बत ए कद्रदान रखता हूं |

    जब यहाँ वहाँ का अरविन्द ने जमीं छोड़ा |
    हाथ में तेरे लो ‘ सारा जहान रखता हूं |
    ❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • चांद तारों की शरारत

    हर तरफ ही इश्क़ की कलियाँ खिला दी जायेगी |
    चाँद तारो की शरारत कुछ मिटा दी जायेगी |

    तुम कहो , तो चाँद – तारें आसमां से तोड़ दूँ |
    गर नही तोडूं मेरी हस्ती मिटा दी जायेगी |

    कब तलक मैं जान अपनी ही छुपाऊंगा कहीं |
    इन हवाओं में मेरी भी जां उड़ा दी जायेगी |

    होश तो तुम्हारे भी उड़ जायेगें साहब कभी |
    नफ़रतों की ये दिवारें , जब गिरा दी जायेगी |

    हौसलें कब के मेरे भी मर गये थे जिस्म में |
    अब बदन के सारे जख्मों को दवा दी जायेगी |

    होश संभाले भी संभलते नही हैं तब खुदा |
    दर्द को हमदर्द दिल से जब मिला दी जायेगी |

    कब तलक ये चाँद अपनी चांदनी दिखायेगा |
    चांदनी ‘अरविन्द’ ले लो बस छुपा दी जायेगी |
    ❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • कदम दर कदम मै बढाने चला हूँ।

    कदम दर कदम मै बढाने चला हूँ।
    सफर जिन्दगी का सजाने चला हूंँ।

    खुशी-ए-जमाना तुझे सौप कर मैं,
    सफल जिन्दगी को बनाने चला हूँ।

    मुहब्बत से ज़्यादा ये कुछ भी नही है,
    ग़ज़ल प्यार मैं गुनगुनाने चला हूँ।

    दिखा दो वफाई वफा कर सनम तू,
    दिलो मे तुझे अब बसाने चला हूँ।

    पिछा रौशनी का रहा है जहाँ पे,
    तुफानों मे दीया जलाने चला हूँ।

    मुखातिब तराना बनाना तु “योगी”,
    भजन जिकड़ी अब लगाने चला हूँ।

    योगेन्द्र कुमार निषाद” योगी निषाद”
    घरघोड़ा,छ०ग०

  • Tu hi jaanta hai

    Tere man mein kya hai vo tu hi jaanta hai
    Mere dil ka haal bhi tujhse chupa nhi”

    Ku hain pareshan tu yeh tu hi jaanta hai
    Mein bhi tere saath hu tujhse judaa nhi”

    Ku dard hua tujhe yeh tu hi jaanta hai
    M har dukh mein tere sath hu tujhse khfa nhi”

    Ku ese chup hua hai tu jaise kuch bhi hua nhi
    Jo bhi tera haal hai ae dost vo mujhse chupa nhi”

    Saabit hue hain hum nakaam muhabbat mein
    Yeh tu bhi jaanta hai mein kabil-e-wafa nhi”

    Kuch bhi rahe rishta tujhse koi parvaah nhi
    Dil par tera hi raaj tha or rahega hamesha vhi”

    Jo dil mein hai tere vo bhi zahir hai mujhe
    Jo tu chupa rha hai mujhse vo bhi chupa nhi……

  • बहारो मे जब अकसर कुछ फूल आते है

    बहारो मे जब अकसर कुछ फूल आते है

    ये पौधे बेबसी अपनी अकसर भूल जाते है

    कुछ इस तरह मिलती है निगाह अजनबी से

    कहना क्या होता है हम अकसर भूल जाते है

    कल सरे राह नजरो की जो हम ने झलक देखी

    वो कत्लेआम वाली रात अकसर भूल जाते है

    मोहब्बत कैसे समझाऊ क्या एहसास होता है

    सपने तुम्हारे देखते है जगना भूल जाते है

    कुछ ऐसी हालत हो गयी है ज़िन्दगी की अब 

    सुबह जो याद आता है शाम को भूल जाते है

    मोहब्बत हो जाये तो समझना है बहुत आसान 

    बहुत कुछ याद आता है बहुत कुछ भूल जाते है 

    अनंत जैन
    श्योपुर (म.प्र.)

  • प्यार का इज़हार होने दीजिए

    प्यार का इज़हार होने दीजिए।
    गुल चमन गुलजार होने दीजिए।

    खास हो एैसा ही, कोई पल दे दो,
    वक्त को हम – राज होने दीजिए।

    हो सदा वचनों में इक नव सादगी ,
    प्यार काे अनुराग होने दीजिए।

    कर करम एैसा भी कोई तो यहां,
    मसखरा अब तुम न होने दीजिए।

    दिल मिले हसरत हे योगेन्द्र मेरी
    हो सके तो प्यार होने दीजिए।

    योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा,छ०ग०
    7000571125

  • चलना संभल कर यहां जर्रे जर्रे में है धोखा

    चलना संभल कर यहां जर्रे जर्रे में है धोखा।
    अब सांसे भी सांसों को देता रहा है धोखा।

    यूं जिंदगी को न कर इस कदर रुसवा यहां
    हर गली हर चौराहे पर पसरा है धोखा।

    वो सियासी नेता हो या हो कोई नन्हा बच्चा
    हर इंसान के रग-रग में छिपा है धोखा ।

    पानी की बुलबुले सी रह गई है जिंदगी,यहां
    जिन्दा खुद जिन्दगी को देता रहा है धोखा ।

    रात काली उजियारे सा महफिल है “योगेंद्र”
    दिन निकला तो है,पर उजाले का है धोखा।

    योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा,छ०ग०

  • वो गए है छोड़ के हर बार की तरह

    वो गए है छोड़ के हर बार की तरह,
    हम क्यों हैरान हो बेकार की तरह,
    ये कौनसी पहली दफा है मोहब्बत में,
    ये सब चलता रहता है सरकार की तरह,
    पता है वो वापिस लौट के आएंगे मिलने,
    हमने भी ठान लिया है इंतेज़ार की तरह,
    वो दिन सुहाने,राते प्यारी,कब तक,
    याद भी आते है तो तलवार की तरह,
    उम्मीद आज तक नही छोड़ी है हमने,
    सजा के रखा है घर, दरबार की तरह.

    ~हार्दिक भट्ट

  • बह्र

    बह्र – २१२२ / २१२२ / २१२

    :::::::::::::::::::;:::::::::::::::::::::::::

    जो हुआ वो सब भुलाना चाहिए ।
    रूठे मन को अब मनाना चाहिए।१

    बैठ यारों अब यहा महफिल सजें
    मयकशी का दौर लाना चाहिए।२

    गर शिकायत हो किसी को मगर,
    दिल से दिल को जोड़ जाना चाहिए।३

    आप आए तो ग़ज़ल का जाम ले,
    जश्न अब हमको मनाना चाहिए।४

    है खुशी का पल यहां तो चल यारा
    मौसिकी का गुरूर दिखाना चाहिए।५

    हर तरफ चर्चा तेरा “योगेन्द्र” यहा,
    झूमकर गाना बजाना चाहिए।६

    ::::::::::::::::: योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा,छ०ग०

  • सुकून

    जब न था इश्क
    दर्दे-ए-दिल न था!
    जब से उनसे उलझी नज़रें
    बेकली सी  हो गयी!!

    *********

                        इब्दिता-ए-इश्क में..
                  उनके उठाए नाज़-ओ-खम!
                         अब ना जाने अपनी फ़ितरत…
                          बेवफा सी हो गयी!!

                         *********

    चन्द लम्हे साथ था वो
    फिर हो गया नज़रों से दूर!
    उनके दिल से अपने दिल की
    गुफ्तगू तो हो गयी!!

    *********
                     वो नज़र से दूर है
                            पर है तो दिल के आस पास!
                            रूह को तसकीन है
                            पर दिल को मुश्किल हो गयी!!

                            *********

    deovrat – 12.02.2018 (c)

  • इंसान की शक्ल में आज हैवान नज़र आया

    इंसान की शक्ल में आज हैवान नज़र आया,
    की मैख़ाने के करीब कोई बदजुबान नज़र आया,

    कोई ज़माने पे इलज़ाम लागते नज़र आया
    तो कोई खुद को ही ऊपरवाले का पैगाम बतलाया,

    मैंने तब खुद को यह समझाया
    फ़िक्र न कर इनकी ये जोश
    चार बूँद के नशे से ही तो उभर कर आया

    किसी ने खूब नाम कमाकर भी अपने आप को ध्वस्त पाया,
    तो किसी ने इश्क़ में धोखे के नाम पर बार-बार जाम छलकाया,

    सुकूँ इस बात का मैंने जरूर पाया,
    की इंसान के चंद कष्टों और दुःखों को
    मैख़ाने की ताक़त ने दुनिया को दिखाया

    फिर भी बार-बार मैं मैख़ाने की चौखट पे
    इंसान के रूप में एक हैवान को ही पाया।।

    -मनीष

  • जो भी दिल में है छुपा मुझको तो दिखा दीजे

    जो भी दिल में है छुपा मुझको तो दिखा दीजे,

    जो ज़ुबा तक न आ सके तो आँखों से जता दीजे,

     

    प्यार है हमसे तो खुल कर के ही बयां कीजे,

    न हो कोई बात तो इशारे में ही ये खता कीजे,

     

    यूँ तो ख़्वाबों में बनाई हैं बातें कितनी,

    न हो मंज़ूर तो गुज़ारिश है के भुला दीजे,

     

    रखके सीने से लगाई हैं यादे तेरी,

    अब सरेआम न इनको  यूँ हवा दीजे,

     

    जो भी दिल में है छुपा मुझको तो दिखा दीजे॥

    राही (अंजाना)

  • वो जो तेरी यादों का समंदर कभी सूखता ही नहीं

    ===============================
    वो जो तेरी यादों का समंदर कभी सूखता ही नहीं ।
    लाख भुलाना भी चाहा मगर दिल भूलता ही नहीं।

    हैं बरसता हुआ गम की घटा जो सावन ले आया,
    जुदा ए सनम तुम बिन, दिल कही लगता ही नहीं ।

    लाख बोई है फसलें आरजू दिल की जमीं पर,
    वीरां ए दिल में बहार ए खुशियां फलता ही नहीं ।

    जिंदगी हर पहलू से गुजार देखा जो मैं अपनी,
    प्यार तुमने जो दिया वो कहीं मिलता ही नहीं ।

    कहाँ ढूंढूं तुमसा मै, और प्यार तेरा सा जहां मे,
    तू तो लाखों में है, तुम सा कोई मिलता ही नहीं ।

    पहली मुहोब्बत का दर्द दिया है योगेंद्र तुमने,
    अश्क आंखों में भरी,दर्द दिली मिटता ही नही।

    =============== योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा,छ०ग०

  • नहीं थकती……।

    नहीं थकती……।
    —————————-
    अश्रुपूरित नयन मेरे क्यों….?
    राह तुम्हारी ताकते नही थकती

    शून्यमात्र बिन तेरे-जीवन के पल
    “प्रीत”हमारी-कहते नही थकती

    मनुहार दिल की-सुने तेरा दिल भी
    “उम्मीदें”दिल की-सहते नही थकती

    गुदगुदाते मन को-मिलन के पल जो
    “यादें”उस पल की-हँसते नही थकती

    हृदय विह्वल-पुनर्मिलन की चाह मे-
    आह्लादित बयार-बहते नही थकती

    कर आलिँगन बन आश्रय मेरे प्यार का-
    होता यूं ,कि–खुशियाँ बरसते नही थकती….।

    —–रंजित तिवारी
    पटेल चौक, कटिहार
    पिन–854105
    (बिहार)

  • न सवाल हुआ , न जवाब ही हमारी तन्हाई में

    न सवाल हुआ , न जवाब ही हमारी तन्हाई में ।
    आंखों ही आंखों से बात हुई हमारी तन्हाई में ।

    खामोशी को इकरार समझने लगे थे,ख्वाबों मे,
    पर जिंदगी है हकीकत समझ में आई तन्हाई में ।

    जख्म दिल में जो लगते है दिखालाई नहीं देती ,
    बस दर्द है तड़फाती सदा हमे यूं ही तन्हाई में।

    तन्हा ही खुश हूं मैं ताउम्र जिंदगी भर के लिए,
    तेरी यादें ही काफी है जीने को यूं ही तन्हाई में।

    कोई सिला नहीं है हमको इस जहाँ में योगेन्द्र
    पिला भरी बोतल चल साकी यूं ही तन्हाई में ।

    …………………………. योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा,छ०ग०
    7000571125

  • वापस फिर आओगी क्या?

    जब एक दिन तुम बिना बताये
    दूर कही मुझसे चली जाओगी
    वापस फिर से आओगी क्या
    वापस फिर से आओगी क्या

    मैं नाराज था तुमसे उस पल
    मुझे मनाने वाला कोई नही था
    अब फिर से मुझे मनाने के लिए
    वापस फिर से आओगी क्या

    तुम अक्सर कहती थी मुझे
    कि ये सिगरेट छोड़ दो तुम
    क्या अब तुम इस सिगरेट को
    मेरे हाथ से छिन कर फेकने के लिए
    वापस फिर से आओगी क्या

    वो बात जो अधूरी थी तुम्हारी
    जिसका इंतज़ार मैंने किया था
    उसका जवाब अब दे पाओगी क्या
    वापस फिर से आओगी क्या
    आओगी क्या..?

  • Alvida

    जा रही हूँ आज सबसे दूर,
    खुद की ही तलाश में।
    वहीं, जहाँ छोड़ आयी थी खुद को, किसी की याद में।
    पर अब उससे भी ज़्यादा मुझे ज़रूरत है मेरी।
    अब ढूंढना है मुझे पहचान क्या है मेरी।
    हो सके तो माफ करना मुझे,
    मन करे तो याद करना मुझे।
    ले जा रही हूँ खुद को सबसे चुरा कर
    कहीं दूर…..कहीं दूर… बहुत दूर….. बहुत दूर…

    जहाँ मिल सकूं एक बार खुद से,
    और पूछ लू एक बार मुझसे,
    की क्यों रह गई मैं इतनी अकेली,
    कहाँ खो गई मेरी सारी खुशी ।
    चल पड़ी हूँ आज खुद को ही ढूंढने,
    जा रही हु म खुद को वापस लाने।
    जा रही हूँ…..

    लेती हूँ विदा अब इस वादे के साथ,
    याद रखूँगी वो हर एक बात।
    वो मस्ती के पल, यादों के कल,
    भूलूँगी न मैं…..
    मिलूँगी फिर खुद को तलाश कर,
    खुद को सबसे काबिल पा कर।
    फिर देखना सब कुछ ठीक हो जाएगा,
    हर सपना पूरा हो जाएगा।
    अलविदा… अब चलती हूँ मैं खुद की तलाश मे।
    हो सके तो कर देना माफ, गर रह जाऊँ मैं याद।
    अलविदा…… अलविदा….

  • Gulabi sa din

    Gulabi sa din

    please read and makes comments

  • पानी पानी की

    एक ताज़ा ग़ज़ल ……..

    गुलफिशानी – फूलों की बारिश ,
    बदगुमानी – शक

    ********************************

    मैंने दुश्मन पे गुलफिशानी की …
    आबरू.. उसकी पानी पानी की ….

    मुझ पे जब ग़म ने मेहरबानी की …..
    मैने फिर ग़म की मेज़बानी की ….

    मैं जिन आँखों का ख़्वाब था पहला
    क्यों ….. उन्होंने ही बदगुमानी की….

    वार मैंने निहत्थों पे न किया
    यूँ अदा रस्म ख़ानदानी की …….

    होठ उनके न कह सके जब सच
    फ़िर निग़ाहों से सच बयानी की ….

    सोचा बेहद के क्या रखूँ ता – उम्र
    फ़िर ग़ज़ल ” प्रेम ” की निशानी की …..

    पंकजोम ” प्रेम ”

    ***********************************

  • तस्वीर

    इक तस्वीर है इस दिल के पास।
    फिर क्यु दिल है उदास – उदास।।

    माना की तु दुर है सदियों से मगर,
    तेरी यादे है मेरे दिल के आसपास।।

    वो लरजते होठो से मेरे गीतो का गाना,
    उन गीतो को आज भी है तेरी तलास।।

    “योगेन्द्र” देखना मिल जायेगी मोहब्बत,
    इसलिये तो दिल मे बसी है इक आस।।

    योगेन्द्र कुमार निषाद
    १०.०१.२०१८

  • आज कुछ खाली – खाली लगता है

    आज कुछ खाली – खाली लगता है …२

    यूँ जो छोड़ गए तुम मुझके …

    हर चेहरा सवाली लगता है …

    आज कुछ खाली – खाली लगता है …

    हँस के मिलती हूँ

    जब भी मिलती हूँ सब से …

    ये मेरी आदत थी …

    पर ये हँसाना भी …

    अब बेमानी लगता है ……

    आज कुछ खाली – खाली लगता है …

    कितने खुश थे

    जब साथ थे दोनों

    वो हँसी वो ख़ुशी

    वो प्यार की बाते

    वो दिन वो पल

    संग बिताई राते

    अब जो सोचु

    तो कहानी लगता है ….

    आज कुछ खाली – खाली लगता है ..

    खुद को कोसु

    या तुझे बुरा मैं कंहू

    कंहू भी तो ,क्या

    तुझे मैं कंहू

    ये तो किस्मत है जो .

    हमे ,मिलाना बिछड़ना पड़ता है ….

    आज कुछ खाली – खाली लगता है ..

    मैं तो रोई

    जब जुदा हुए तुम मुझसे

    तूने हँसाने को कहा

    हँस के भी दिखाई मैं

    जब जाते जाते देखा

    तेरी आँखों को

    तेरी आँखों में भी

    पानी – पानी लगता है ….

    आज कुछ खाली – खाली लगता है ..

  • मोहब्बत

    जाते जाते बस एक काम कर देना,
    मेरे मोहब्बत को एक नाम दे देना ।
    गर कभी दुब जाऊं यादों में उसकी,
    तो मुझे बस दो घुट जाम दे देना ।।
    बड़ा बदनाम था मैं उसकी गली में,
    मरने के बाद मुझको पहचान दे देना ।
    जो चार दोस्त रहते थे साथ मेरे,
    मेरी अर्थी उठाने का उन्हें काम दे देना ।।
    जो मशगूल था उनके यादों के सहर में,
    कभी उन्हें भी हिज्र की शाम दे देना ।
    जो मोहब्बत में टूट जाते हैं अक्सर,
    उन्हें जिंदगी में एक नया मुकाम दे देना ।।

  • Deewana pagal

    Deewana pagal

    Tere ishq ka deewana, ye deewana ho gya..
    Tere pyar me hai pagal, ye parwana ho gya……..
    Neend raton me bin tere aati nhi..
    Tu kyon khwabo se mere hai jati nhi..
    Roop tera suhana hai bhata mujhe..
    Meri chilman ko kyon tu mitati nhi….
    Mera dil ab to mujhse begana ho gya..
    Tere ishq me deewana ye deewana ho gya..

    Teri julfo ke saaye hai chhaye yahan..
    Tujhko dhudha jahan me yaya aur vahan..
    Har ghadi tadpa bas teri deedar ko..
    Lag rha ye jahan bas dhuaa hi dhuaa..

    Ab to mera bhi ghar maykhana ho gya..
    Tere ishq ka deewana ye deewana ho gya..
    Tere pyar me hai pagal parwana ho gya…

  • जल उठे थे बुझ के हम

    जल उठे थे बुझ के हम, शमा – ए – लौ से प्यार की;
    फिर तेरी हर एक झलक, पे नज़रों को झुका जाना;

    गर कही जो चल पड़े, तेरे बुलाने पे सनम;
    वो तेरा मंजिल – ए – इश्क, से वापस को बुला जाना;

    कई असर चलती रही, कूचा – ए – गुल में यार की;
    वो तेरा मुझको दीदार – ए – तर को तरसा जाना;

    गर कहीं तुम मिल गए किस्मत सराहेंगे कसम;
    वो तेरा खा कर कसम, हर कसम को झुठला जाना;

    रात की खामोशियाँ, हमको सताती है “महक”;
    तेरी याद से रोज़ – रोज़, दिल का यूँ धड़का जाना;

    मेरी चाहत का सिला क्या देंगी तेरी तल्खियाँ,
    वो तेरा हर मोड़ पर, दिल का बहला जाना;

    देख कर हम लुट गए, तेरे प्यार की रुसवाइयां;
    फिर कज़ा के वक़्त पर, चेहरे का मुरझा जाना;

  • दर्द

    तेरी यादों का समन्दर कभी सुखता नही।
    आँखों में खुशी है मगर दर्द मिटता नही।

    चौमासें सावन सा बरसता गम है सीने में,
    जुदा-ए-सनम तुम बीन दिल अब लगता नही।

    लाख बोई फस्लें आरजुओं की दिल-ए-जमां पे,
    पर विरान -ए-दिल मे बहारें खुशीयॉ पलता नही।

    जिन्दगी के हर पहलू से गुजर देखा मैनें,
    जो प्यार तुमने दिया वो, कही अब मिलता नही।

    कहां ढुढूं तुमसा और प्यार तेरा सा…….,
    तू तो लाखो में थी तुमसा कही अब मिलता नही।

    माना यह पहली मोहब्बत का दर्द है ” योग्न्द्र”
    लाख मिटाओं पर दर्द अब मिटता नही।

  • जमाने बीत गए जिनको भुलाये हुए
    आजफिर हैं क्यो याद वही आये हुए

    कितने बेरुखी से तोड़े थे वो दिल को
    दिल के टूकड़ो को हैं हम सम्भाले हुए
    सोचते थे न आएगी क़यामत कभी
    ये क्या हुआ वो हैं दर पे आये हुए
    जिसे छूने की चाहत में उम्र गुज़ार दी
    ज़नाज़े को मेरे हैं वही गले से लगाये हुए

    जिन्दा था तो तन्हाई ने मार डाला,मौत पे
    अपने तो ठीक दुश्मन भी रोते हैं आये हुए
    “विपुल कुमार मिश्र”

  • उसी का शहर था उसी की अदालत।

    उसी का शहर था उसी की अदालत।
    वो ही था मुंसिफ उसी की वक़ालत।।
    ,
    फिर होना था वो ही होता है अक्सर।
    हमी को सजाएं हमी से ख़िलाफ़त।।
    ,
    ये कैसा सहर है क्यू उजाला नहीं है।
    अब अंधेरों से कैसे करेंगें हिफ़ाजत।।
    ,
    चिरागों का जलना आसान नहीं था।
    हवाओं ने रखा है उनको सलामत।।
    ,
    तुमको फिक्र है न हमकों है फुरसत।
    न है कोई मसला न कोई शिकायत।।
    ,
    साहिल भँवर में है जिंदा अभी तक।
    ये उसका करम है उसी की इनायत।।

    #रमेश

  • जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना।

    जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना।

    वो तो था ही नही कभी रहगुज़र अपना।।

    ,

    तुमको मुबारक हो भीड़ इस दुनिया की।

    हम काट लेंगे तन्हा ही ये सफर अपना।।

    ,

    भूल गए हो यक़ीनन तुम अपने वादे सारे।

    पर उदास रहता है वो गवाह शज़र अपना।।

    ,

    न कोई मुन्तज़िर है न है कोई आहट तेरी।

    फिर भी सजाता है कोई क्यू घर अपना।।

    ,

    ऐ बादल बरसों ऐसे भीगों डालो सबकुछ।

    की साहिल जलता बहुत है ये शहर अपना।

    @@@@RK@@@@

  • राघवेन्द्र त्रिपाठी

    राघवेन्द्र त्रिपाठी

    हर रास्ता हमसे तंग हुआ, हम फिर रास्ते की तलाश मे निकले ,
    शजरो शजर की चाहत मे रास्ते महज इत्तेफाक निकले ।
    ठहरे जहाँ पल भर को ब आजादी ब आबोताब ,
    हमारी आबादी का जनाजा लेकर लोग सब बर्बाद निकले ।
    वो इन्तजार मे था के धुन्ध छटे कोई अपना दिखे ,
    रोशनी हुई तो चेहरे महफूज नकाब निकले ।
    वो अपने ईमान पे अकड़ता रहा ताउम्र,
    कत्ले जमीर करके लोग सर उठा बेबाक निकले ।
    मुद्दत गुजरी इक हमराह की चाहत मे ,
    वीराने सब अस्बाब निकले ।
    दौलत औ शोहरत की चाहत मे  जिन्दगी हुई खाक ,
    सल्तनत से दूर फकीर बादशाह निकले ।
    दिनभर की जद्दो जहद और हकीकत की मार ,
    फिर आसमा पे चाँद और सैर पे कुछ ख्वाब निकले ।
    काटो ये दिल जिगर तस्वीर ए विशाल ए यार निकले ,
    बहे आंखो से चश्मे तर साथ लहू के शराब निकले ।

  • Dilo jajbaat per nazar rakhiye

    दिलो ज्जबात पर नजर रखिये
    गुमशुदा कुछ ना हो ये खबर रखिये
    दिल ना टूटे ज्जबात भी नहीं चटके
    दिल की दहलीज पर यूँ नजर रखिये “

  • ग़ज़ल-ये तुम क्यों भूल गए

    • ग़ज़ल-ये तुम क्यों भूल गए

      मैंने तुम से प्यार किया था…..ये तुम क्यों भूल गए
      तुमको सब कुछ मान लिया था ये तुम क्यों भूल गए

      सुबह थी तुम शाम थी तुम मेरे दिल की जान थी तुम
      सब कुछ तुझपर वार दिया था ये तुम क्यों भूल गए

      हर जन्म साथ निभाने का एक-दूसरे को अपनाने का
      साथ मिलकर कसम लिया था ये तुम क्यों भूल गए

      हर पल तेरा साथ दिया तेरे हर सुख-दुख के लमहों में
      तेरे हर एक जख्मो को सिया था ये तुम क्यों भूल गए

      एक तरफ थे दुनियावाले एक तरफ दीवाना “पियुष”
      सांसों में तुमको बसा लिया था ये तुम क्यों भूल गए

      पियुष राज ,दुमका ,झारखण्ड
      Poem.No- 64 (26 मई 2017)

  • जीने की ख्वाहिश न मरने का गम है!

    जीने की ख्वाहिश न मरने का गम है!

    है अधूरी कहानी जख्म ही जख्म है !!

    .

    न तुमने कहा कुछ न हमने कहा कुछ!

    बढी फिर भी दूरी ये वहम ही वहम है‌‌‍!!

    .

    कहीं तिरगी है और कहीं तन्हा राते !

    कहीं पर है महफिल जश्न ही जश्न है!!

    .

    न वक़्त तुमको मिला न हमको मिला!

    जो दिल मे थी बातें दफ्न की दफ्न है!!

    .

    सदिया है गुजरी ना है आहट ही कोइ!

    ना साहिल को ही कोई ‌रंज ओ गम है!!

    @@@@ RK@@@@

     

  • दीवाली

    इस दीपक में एक कमी है,,,,
    हर सैनिक की याद जली है ।।।।।।।
    जिसने दी आज़ादी हमको,,,,,,,,,
    उनकी बेहद कमी खली है ।।।।।
    दुश्मन को मारा सरहद पे,,,,,,,,,,
    तो दीवाली आज मनी है ।।।।।।।
    देखो इनको भूल न जाना,,,,,,,,,,,
    जो अब तेरे बीच नही है ।।।।।।।
    जिसने खोया अपना बेटा,,,,,,,,,,
    उन माँओं की आह सुनी है ।।।।।
    देके खुशियाँ हम लोगो को,,,,,,,
    गोली खुद के लिये चुनी है ।।।।।
    अपने भाई के आने की,,,,,,,,
    बहना को इक आस लगी है ।।।।
    तुम बिन सूने सारे दीपक,,,,,,,,,
    बेवा सी दीवार खडी है ।।।।।।।
    कैसे भूले बाते उसकी,,,,,,,,,,
    हर कोने में याद बसी है ।।।।।
    रौशन है घर सारा मेरा ,,,,,,,,,,,
    उनके घर में रात जमी है ।।।।।।
    दीवाली की पूजा है पर,,,,,,,
    उसके पापा और कहीं है ।।।।।।।।
    सूनी दरवाजे की झालर,,,,,,,
    रंगोली बेकार सजी है ।।।।।।।
    दीवाली पे रोके कैसे,,,,,,,
    माँ की आँखे नीर भरी है ।।।।।।।
    मज़बूरी त्यौहार मनाना,,,,,,,,
    आई ये दुश्वार घड़ी है ।।।।।।
    मरके खुशियाँ देने वाले,,,,,,,
    तेरी ये सौगात बडी है ।।।।।।
    ना लिख पाऊ दिल की हालत,,,,,
    होता अब खामोश ‘लकी’ है ।।।।।।

  • ज़िन्दगी

    इस तरह उलझी रही है जिन्दगी,,,,,,
    कोन कहता है सही है जिन्दगी।।।।।
    उलझनो का हाल मै किससे कहु,,,
    आँख के रस्ते बही है जिन्दगी।।।।
    अब नही पढना नशीब में इसे,,,
    गर्द सी मुझपे जमी है जिन्दगी।।।
    ना सुकूँ है दिल बडा बेचैन है,,,
    आग के जैसे जली है जिन्दगी।।।।
    उलझनो में ही सदा उलझा रहा,,,,
    मकङियो के जाल सी है जिन्दगी।।।
    ख्वाब है ना आखँ में नींदे कहीं,,,,,
    खार सी चुभने लगी है जिन्दगी।।।
    फुरसतो के पल नही मिलते मुझे,,,
    काम में ऐसी दबी है जिन्दगी।।।।
    मन्जिलो का भी निशाँ मिलता नही,,,,
    कोन से रस्ते चली है जिन्दगी।।।।।

  • साजन

    तुझको ही बस तुझको सोचू इतना तो कर सकती हूँ,,,,,,,,,
    तेरे ग़म को अपना समझू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।।
    मुझको क्या मालूम मुहब्बत कैसे करती है दुनिया,,,,,,,
    हद से ज्यादा तुझको सोचू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।
    इस दिन को तू मेरे सजना इतना तो ह़क दे देना,,,,,,,,,,,,
    छलनी में से तुझको देखू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।
    आज मुबारक वो दिन आया सामने मेरा साजन है,,,,,,,,,,
    तेरे ग़म के आँसू पी लू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।।।
    दो-दो चन्दा मेरे आगे आज खुशी का दिन है ये,,,,,,,,,,,
    इक पल में ही सदियाँ जी लू इतना तो कर सकती हूँ

    लिखना पढना छोड दिया तू बात करे हथियारो की,,,,,,,,,,,,
    किसने तेरे दिल में भर दी ये बाते अंगारो की ।।।।।।।।।।।
    कोमल तेरे दिल को आखिर किसने पत्थर कर डाला,,,,,,,,,,
    जो तू फिक्र नही करता है प्यार भरे त्यौहारो की।।।।।।।।।
    लड़वाऐगें तुझको ये तो मरवाऐगें आपस में,,,,,,,,,,,,,,,,
    जाने तू क्यो बाते माने मज़हब के सरदारो की ।।।।।।।।।
    गुरबत में मर जाये चाहे बात करेगें धर्मो की,,,,,,,,,,,,
    ऐसी नीति रही है लोगो अब तक की सरकारो की ।।।।।।।।
    अनपढ है ये जाहिल है ये,गुरबत में ही जाते है,,,,,,,,,
    हर इक लफ्जो में लिखता हूँ बाते मै लाचारो की ।।।।।।।।।।
    छोटे छोटे इन हाथो में दिखती है बन्दूक यहाँ,,,,,,,,,,,,,
    नस्ल हमारी चलती है अब धारो पे,तलवारो की।।।।।।।।।
    सबके हाथो में है खन्ज़र और किताबे छूट गयी,,,,,,,,,
    ऊचाँई बढती जाती है नफरत की दीवारो की ।।।।।।।।।।।।
    आपस में लड़ते रहने से हासिल क्या तुझको होगा,,,,,,,,,
    चाँदी रोज़ कटी है बस धर्मो के ठेकेदारो की।।।।।।।।।।।।।।
    डर बिकता, भय बिकता है और बिका है खून ‘लकी’,,,,,,,,,,
    गिनती रोज़ बढी जाती है दहशत के बाजारो की ।।

    मिट्टी से भी खुशबू आये गाँव हमारा ऐसा है,,,,,,,,,
    जैसे खोई जन्नत पाये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।।।
    तेरी आँखो का हर आँसू पौँछे प्यार मुहब्बत से,,,,,,,
    रोता रोता तू मस्काये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।।
    देखो अपने महमानो की इज्जत इतनी करते है,,,,,,
    चाहे खुद भूखे रह जाये , गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।
    कैसे भी हालातो में भी साथ नही छोडेगें वो,,,,,,,,,
    झगड़ा अपना खुद निपटाये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।
    कोई सुख हो या कोई दुख साथ हमेशा देते है,,,,,,,
    गलती पे मिल कर समझाये गाँव हमारा ऐसा है ।।।
    इक दूजे की खातिर अपनी जान गवाँ सकते है ये,,,,,,
    दुश्मन से भी जा टकराये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।
    हर हालत में खुश रहते है चाहे लाख गरीबी हो,,,,,,,
    सुख हो चाहे गम के साये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।
    भोले भाले इन लोगो पर कैसे फिर इल्जाम लगे,,,,,,
    जो आपस की कस्मे खाये गाँव हमारा ऐसा है ।

    पसीना वो बहाकर देख बच्चो को खिलाता है,,,,,
    जलाके खून सारा दूध वो उनको पिलाता है ।।।।।
    अदाकारी गरीबो में गरीबी ला ही देती है,,,,,
    जिसे ग़म भी हजारो है वही हँसकर दिखाता है ।।।
    अमीरो सीख लो जाकर हुनर तुम भी गरीबो का,,
    कि आँसू आँख में होते हुऐ कैसे छिपाता है ।।।।।।
    खुशी तो चीज ऐसी है खुशी में रो ना पाओगे,,,,,
    मगर जो है बहुत बेबस वही सबको हसाँता है ।।।।
    बडा अफ़सोस होता है ख़ुदा की रहमतो पे अब,,,,
    उसी सर पे नही छप्पर हवेली जो सजाता है ।।।।।
    करू ना क्यूँ ‘लकी’ मै फ़ख्र उन बेबस गरीबो पर,,
    निवाला छोड देता है मगर बच्चे पढाता है ।।।

  • ￰वतन

    वतन पे है नजर जिसकी बुरी उसको मिटा देगें,,,
    सबक ऐसा सिखा देगें कि धड से सर उडा देगें।।

    जहाँ पानी बहाना है वहां पर खून देगें हम,,,
    वतन से प्यार कितना है जहाँ को हम दिखा देगें।।

    हजारो साल काटे हैं गुलामों की तरह हमने,,,
    नहीं अब और सहना हैं ये दुनिया को बता देगें।।

    कसम है उन शहीदों की लुटा दी जान सरहद पे,,,
    उसी रस्ते चलेंगे और अपना सर कटा देगें।।

    हमारे गाँव का बच्चा नहीं है कम किसी से भी,,,
    जहाँ भी पावं रख देगें वहां धरती हिला देगें।।

    समन्दर कांप जाएगा ये दरिया सूख जाएगा,,,
    कि ऐसी आग भर देगें सभी मुर्दे जगा देगें।।

    मेरा हर शब्द अगांरा मेरा हर लफ्ज़ है बिजली,,,
    जहाँ दुश्मन दिखा हमको ‘लकी’ उसको जला देगें।।

  • वो औरत

    वो औरत

    करे हैं काम वो इस धूप में जलती सी इक औरत,,,
    गमों को झेल लेती है सभी, गहरी सी इक औरत।।।

    बडों का मान रखती है झुकी रहती है कदमो में,,,
    कि रिश्तों के दरख्तों पे लगी टहनी सी इक औरत।।

    थकी जाती है सारे दिन घरों के काम में लेकिन,,,
    सजन के वास्ते पल में सजी सवंरी सी इक औरत।।

    सभी इल्जाम दुनिया ने इसी पर थोप रक्खे हैं,,,
    खड़ी रहती है दरवाजे पे वो सहमी सी इक औरत।।

    चटकती धूप में सबके लिए रोटी बनाती हैं,,,
    जला देती है अपने ख्वाब वो सुलगी सी इक औरत।।।

  • ग़ज़ल

    ये मदहोश शाम और तन्हाई का आलम

    अपनों के बारे में न सोचते तो क्या सोचते

     

    करीब-ए-मर्क़ है फिर भी अकेले इसलिये

    खबरी के बारे में न सोचते तो क्या सोचते

     

    हुआ कभी जो गुमाँ दर्द ने सँवारा है,तो

    उस फ़रिश्ते को न सोचते तो क्या सोचते

     

    ठोकर खाया था राह-ए-जिंदगी में तो

    दिल-ए-पत्थर न सोचते तो क्या सोचते

    #VIP~

    ‘विपुल कुमार मिश्र’

  • कुछ पल मेरे साथ बिताओ तो कभी…

    विधा-ग़ज़ल
    काफिया-ओ
    रदीफ़-तो कभी
    *************************
    चाहती हो मुझे अगर बताओ तो कभी
    देख कर मुझको मुस्कुराओ तो कभी

    यूँ ना तड़पाओ तुम इतना दिल को मेरे
    हाल-ए-दिल अपना सुनाओ तो कभी

    दोस्त तो है बहुत पर तुझ से ना कोई
    पास बैठकर तुम बतियाओ तो कभी

    गम तो बहुत है जिंदिगी में मेरे दोस्त
    अपनी प्यारी बातो से हँसाओ तो कभी

    अगर रूठ जाऊं किसी बात पर तेरे
    तो प्यार जताकर मनाओ तो कभी

    क्या रखा है इस छनभंगुर जीवन में
    कुछ पल मेरे साथ बिताओ तो कभी

  • बहुत परेशान करती है तन्हा रातें हमकों।

    बहुत परेशान करती है तन्हा रातें हमकों।
    मुसल्सल याद आती है मुलाकातें हमको।।
    ,
    ऐसे क्यूँ ख़फ़ा हो गए बिना सबब के तुम।
    क़ोई वजह थी जहन में तो बताते हमकों।।
    ,
    ख़ुद मुज़रिम होके हमें गुनाहगार कह दिया।
    अपनी बेगुनाही के सबूत तो दिखाते हमको।।
    ,
    अश्कों की वज़ह बनते है ख़त मेरे अक्सर।
    कहतें हो तो फ़िर क्यूँ नहीं जलातें हमकों।।
    ,
    कहना आसान है ओ वादे भी तमाम होते है।
    पर क़ोई रिश्ता कहा था तो निभाते हमकों।।
    ,
    जिसे भूलना हो वो याद क्या रखता आखिर।
    लेकिन कहता है तारीखें याद दिलाते हमकों।।
    @@@@RK@@@@

  • “जिंदगी भर ये क्या इन्तेज़ाम किया हमनें”

    जिंदगी भर ये क्या इन्तेज़ाम किया हमनें।
    इक उम्र तो बस यूँ ही तमाम किया हमनें।।
    ,
    पता नहीं किस ख़्वाहिश में दर ब दर हुए।
    न सुकून ही मिला न आराम किया हमनें।।
    ,
    लिखें कई अधूरे अफ़साने क्यूँ मैंने खुद से।
    पढ़ के सोचतें है ये कोई काम किया हमनें।।
    ,
    मिलने आती है मंजिलें ख़ुद हमसे अक्सर।
    उन्हें पता है रास्ते को मकाम किया हमने।।
    ,
    ये क्या फिर वही साहिल फिर वही संमदर।
    चलों चले रोज़ की तरह शाम किया हमनें।।
    @@@@RK@@@@

  • “खुद पे कुछ इस तरह से वार किया मैंने”

    खुद पे कुछ इस तरह से वार किया मैंने।
    तेरा न आना तय था इंतज़ार किया मैंने।।
    ,
    जब थी फूलों सी फ़ितरत तो तोड़ा सबने।
    अब तोहमतें है खुद को ख़ार किया मैंने।।
    ,
    मौसम मेरे मुताबिक़ कहाँ होने वाला था।
    नाहक ही हवाओं पे इख़्तियार किया मैंने।।
    ,
    मुश्किले आती हैं दरिया की राह में अक्सर।
    जब मुझकों बहना था सब पार किया मैंने।।
    ,
    वहम था की हम नहीं कहतें हाल ए दिल।
    जबकि लिख के सब अख़बार किया मैंने।।
    ,
    जिसनें किया था बारहा नज़र अंदाज़ मुझे।
    उसी का इल्ज़ाम उसे दरकिनार किया मैंने।।
    @@@@RK@@@@

  • जो लिखा ही नहीं वो ख़्यालो में है।

    जो लिखा ही नहीं वो ख़्यालो में है।
    जिंदगी का मज़ा अब सवालों में है।।
    ,
    जो जाता है उसको चले जानें दो।
    देख लेंगे हम ग़म के जो प्यालों में है।।
    ,
    तस्वीरों को तेरी मैं अब रखता नहीं।
    बस तेरा चेहरा अंधेरे उजालों में है।।
    ,
    आँखों में मेरी है मंजिल ही मंजिल।
    फिर दर्द थोड़े न पैरो के छालों में है।।
    ,
    मौसमो की तरह था जो बदलता रहा।
    चर्चा उसी की वफ़ा के मिसालों में है।।
    @@@@RK@@@@

  • “ख्वाब है जिंदगी,जिंदगी ख्वाब है”

    ख़्वाब है जिंदगी,जिंदगी ख्वाब है।
    चेहरे देखा है उसका अलग आब है।।
    ,
    जिसको कहतें रहे उम्र भर हम दवा।
    उसको सारा जहाँ कहता शराब है।।
    ,
    खुद ही बदलें नहीं बस ये कहतें रहें।
    वक़्त है ये बुरा जमाना भी खराब है।।
    ,
    हो ख़्वाहिश वो मिलें फिर न पूँछिये।
    ग़र न मिलें फिर जिंदगी अज़ाब है।।
    ,
    हमनें जैसा किया हमकों वैसा मिला।
    क़ोई देखता है हमकों सब हिसाब है।।
    ,
    हमकों ऐसे भुला दोंगे मालूम न था।
    जैसे इंसान नही साहिल किताब है।।
    @@@@RK@@@@

  • “इक तारा आज फिर से टूटा बिखर गया”

    इक तारा आज फिर से टूटा बिखर गया।
    आसमान ने ये देखा वो फिर सिहर गया।।
    ,
    किसकी है ये खता की वो छोड़ आया घर।
    या खुद की ही वजह से वो यूँ बिखर गया।।
    ,
    जब मंजिल ही नहीं फिर क्या थी जुस्तजू।
    किसकी तलब में राही था लाखों शहर गया।।
    ,
    लो माना की आदमी को मुश्किल है मंजिले।
    पर जिसनें खाई ठोकरें आखिर निखर गया।।
    ,
    तेरे शहर में हूँ मैं बस इतना सा ही है कसूर।
    हम थे काफिले में ये काफिला जिधर गया।।
    ,
    मुसल्सल वक़्त की घड़ी है चलती जा रही।
    साहिल को खुद पता नही वो क्यूँ ठहर गया।।
    @@@@RK@@@@

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