Category: ग़ज़ल

  • जहां में चाहे गम हो या खुशी क्या

    गजल : कुमार अरविन्द

    जहां में चाहे गम हो या खुशी क्या |
    मेरे मा – बैन रंजिश दोस्ती क्या |

    खुदा मुझको यकीं खुद पे बहुत है |
    तो पंडित हो या चाहे मौलवी क्या |

    मुहब्बत के ‘ चरागे – दिल बुझे हैं |
    तो जाये आज या कल जिंदगी क्या |

    हजारों ‘ ख्वाहिशें ‘ फीकी पड़ी हैं |
    मुकद्दर है नही तो फिर कमी क्या |

    अगर ‘ तुम छोड़ दो लड़ना तो सोचूं |
    गुलों की खार से होगी दोस्ती क्या |

  • नादान

    हर एक तनहा लम्हे में एक अर्थ ढूँढा करती थी|
    हर अँधेरी रुसवाई में गहरा अक्श ढूँढा करती थी |
    मैं मेरी परछाई में एक शख्स ढूँढा करती थी|
    मेरी मुझसे हुई जुदाई में कुछ वक़्त ढूँढा करती थी |
    लोग कहते थे की नादानी का असर है,
    मैं उस नादानी में भी कदर ढूँढा करती थी|

  • दिल और दिमाग

    यूँ तो दिल उबल रहा है,
    शब्दों के उबाल से |
    और ये कम्बखत दिमाग कहता है,
    अपने ज़ज्बातों को संभाल ले |

  • नहीं तकदीर में जो मेरे क्यों फिर जुस्तजू करते

    गजल : कुमार अरविन्द

    नहीं तकदीर में जो मेरे क्यों फिर जुस्तजू करते |
    मेरी किस्मत में क्या है वो पता जाकर के यूं करते |

    रखी इज्जत हमेशा है जिसने अपना समझकर तो |
    उसी इंसान को ऐसे नहीं बे – आबरू करते |

    हमें मिलने का मौका तो नही मिल पायेगा जानम |
    कभी ख्वाबों में आ जाओ तो जी भर गुफ़्तगू करते |

    ज़हर का घूंट पीकर भी बचे यदि तो बचा लेना |
    किसी भी हाल में साहब नहीं ‘रिश्तों का खूं करते |

    ये दिल का ‘आइना है जो सदा सच ही दिखाता है |
    मुखौटे को अलग रखकर जो इसको रूबरू करते |

  • Ghazal

    मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है
    इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा है

    दुख देता है घर में बेटी का होना
    चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा है

    कुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत
    सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा है

    सबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी
    लड़का कितना महगां हो पर चलता है

    शादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का
    खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता है

    लुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा
    आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है

  • Ghazal

    मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है
    इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा है

    दुख देता है घर में बेटी का होना
    चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा है

    कुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत
    सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा है

    सबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी
    लड़का कितना महगां हो पर चलता है

    शादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का
    खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता है

    लुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा
    आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है

  • कुछ न कुछ टूटने का सिलसिला आज भी ज़ारी है

    कुछ न कुछ टूटने का सिलसिला आज भी ज़ारी है
    इस दुनिया का डर प्यार पे आज भी भारी है।।

    टूटकर बिखरना, बिखरकर समिटना आज भी जारी है,
    पर पड़ जाए ना दरार इस बात का डर आज भी भारी है।

    झुकना गिरना हवाओं के झोंकों से आज भी जारी है,
    टूट कर ना उखड़ जाऊं इस बात का डर आज भी भारी है,

    कहना, सुनना, लड़ना, झगड़ना उनसे आज भी जारी है,
    खामोश ना हो जाए वो कहीं इस बात का डर आज भी भारी है॥

    बहुत कुछ कर गुजरने की कश्मकश आज भी जारी है,
    पर ये वक्त का पहिया मेरी हर कश्मकश पर भारी है,

    उड़ कर आकाश छू लेने की मेरी कोशिश आज भी जारी है,
    पर लोगों की टांग खींच कर गिराने की कला आज भी भारी है॥

    राही

  • मुहब्बत की गली कूचों में क्या है

    गजल : कुमार अरविन्द

    मुहब्बत की गली कूचों में क्या है |
    इधर देखो मेरी आँखों में क्या है |

    बड़ा ही जोर है उन के जुबां में |
    नही तो जोर जंजीरों में क्या है |

    ये करने वाले हैं कर जाते हैं सब |
    वगरना आग तकरीरों में क्या है |

    खुदाया दिल नही देखा कहीं पे |
    खुदा को पा गये ख्वाबों में क्या है |

  • चले आओ मेरी आँखों का पानी देखते जाओ

    गजल : कुमार अरविन्द

    चले आओ मेरी आंखों का पानी देखते जाओ |
    कहानी है तुम्हारी ही , निशानी देखते जाओ |

    मैं जिन्दा हूं तुम्हारे बाद भी तुमको तसल्ली हो |
    कफ़न सरका के मेरी बे – ज़बानी देखते जाओ |

    तुम्हारी बेबफाई का उतारूं आज मैं ‘ सदका |
    मेरी यूं ‘ ख़ाक में मिलती जवानी देखते जाओ |

    कहां गुजरी गुजारी जिंदगी तुमको पता कैसे |
    मेरे इस दर्द की पागल कहानी देखते जाओ |

    हमारे पैरहन से ख़ुशबुएं आती हैं हर लम्हा |
    गुलों के साथ रहने की निशानी देखते जाओ |

    सुकूं मिलता नहीं है बाद मर जाने के दुनियां में |
    कफ़न ओढ़ी हुई ‘ आंखों मे पानी देखते जाओ |

    अभी तारा ये रूठा था ‘अचानक चा़ंद निकला है |
    छतों पर से करिश्मे आसमानी देखते जाओ |

    अगर हिंदी हमारी माँ रही उर्दू बनी मौसी |
    यक़ीनन आप मेरी हम ज़ुबानी देखते जाओ |

    तुम्हीं कहते रहे अरविन्द कुछ दिल में कहीं होगा |
    मुहब्बत हो गयी है ‘ मेहरबानी देखते जाओ |

    बेजबानी – चुप रहना , सदका – न्यौछावर या उतारा ,
    खाक – मिट्टी , पैरहन – कपडे

  • न करो चमन की बरबाद गलियां

    ✍?अंदाज ?✍
    ——-$——–

    न करो चमन की बरबाद गलियां
    कुचल के सुमन रौंद कर कलियाँ

    पुरुषार्थ है तुम्हारा तरूवर लगाना
    बागो मे खिलाना मोहक तितलियां

    आगाज करो नव राह बदलाव के
    गुलशनो मे रहे सुकून की डलियां

    माली हो तुम करो महसूस यहां
    समझो सृजन की सत्य पहेलियां

    मासूम वृक्ष लताएं हैं सव॔ धरोहर
    फैलने दो इनकी मंत्रमुग्ध लडियां

    संस्कार धरो प्रकृति का मान रखो
    धरती पे निखारों मानवीय कडियां

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ(छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक -24-04-2018)

  • नूर हो तुम आफताब हो तुम

    ✍?(अंदाज) ?✍
    ——-$——

    नूर हो तुम आफताब हो तुम
    लहर हो तुम लाजवाब हो तुम

    मेरे चाहते दिल की तमन्ना जवाॅ
    दिलकश गजब शबाब हो तुम

    जिसे समझा मैने दिल से अपना
    मुक्कमबल सच्चा ख्वाब हो तुम

    देख कर चढता है नशा मुझमे
    दिलकश नशीली शराब हो तुम

    हर दिन पल तुझको पढता हूं मै
    सुकून भरी मेरी किताब हो तुम

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक -25-04-2018)

  • उठ जाग मत थक हार इंसान तू

    ✍?(अंदाज )?✍
    ———-$———-

    उठ जाग मत थक हार इंसान तू
    मानवीय औकात निखार इंसान तू

    है तू प्रचंड शक्ति शाली बलवान
    आत्म ज्ञान परख संवार इंसान तू

    मानवता का न गिरने दे स्तर यहाॅ
    स्व पहचान कर रख धार इंसान तू

    तेरा कम॔ चरित्र गुण की हो पूजा
    अपना शौर्य सूर उबार इंसान तू

    विकृत परिवेश प्रथा हालात हटा
    बुध्दि शक्ति से कर वार इंसान तू

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक -26-04-2018)

  • घोर कलियुग है देख पाप प्रबल

    ✍?(अंदाज )?✍
    ———$——-

    घोर कलियुग है देख पाप प्रबल
    चंहुदिश क्षुद्र देख विद्रूप दलदल

    दूषित जल घना हवाएं प्रदूषित
    मन मे मैल देख बेईमानी सबल

    स्वभाव मे मिठास बोली मे छल
    दिखावा ठोस देख बुध्दि मे नकल

    कपट भाव है अंतस मे रचा-बसा
    आचरण मे नाटक का देख अकल

    आपसी मेल मिलाप मे छुपा स्वाथं
    मानव मे चाल देख कुटिल सफल

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक -26-04-2018)

  • Kya??

    mauz e zindgi humari unhei achi nhi lagti Kya…
    Jo takleefo k farman bejwa deti Hai wo..

    cherei par hasi humarei haseen nhi lagti Kya..
    Jo sikan ki lakire la deti Hai wo..

    raat ko aankh band krnei ki rshm thi Jo wo, ab nhi hoti kya ..
    jo nindo sei b ab jaga deti Hai wo…

    mar mar k ji raha hun itna hi kaafi nhi Kya…
    Jo ab meri dhadkano ko b thaam deti Hai wo..

  • तनहा

    इश्क़ में हैं गुज़रे हम तेरे शहर से तनहा,
    महब्बत के उजड़े हुए घर से तनहा!

    हम वो हैं जो जीये जिंदगी भर से तनहा,
    और महशर में भी जायेंगे दहर से तनहा!

    तख़्लीक़े-शेर क्या बताऊ कितना गराँ हैं,
    होना पडे हर महफ़िल-ओ-दर से तनहा!!

    तुफानो-बर्क़ो-खारो-मौज़ो से निकलकर,
    हम निकले गुलशनो-दश्तो-बहर से तनहा!

    हम हैं वही जिसे कहता हैं ज़माना शायर,
    दुनिया में है मक़बूल हम नामाबर से तनहा’!

    तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’

  • माँ बाप के नाम

    पैदा कलम से कोई कहानी की जाए,
    फिर जज़्बातों की तर्जुमानी की जाए!

    खिलावे हैं खुद भूखे रहकर बच्चों को
    माँ-बाप के नाम ये जिंदगानी की जाए!

    ग़म से तो हाल ही में ही बरी हुए हम,
    मुब्तिला होके बर्बाद जवानी की जाए!

    सबको आदत हैं बे-वजह हंगामे की,
    कभी हक़ की भी हक़बयानी की जाए।

    ‘तनहा’आईना के सामने लिखे ग़ज़ल,
    ऐसे उसकी खुद की पासबानी की जाए!

    तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’

  • वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए

    गजल

    वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए |
    बाखुदा हूं ‘ खुदा बाखुदा कीजिए |

    दर्दे – दिल आज मेरे मुखालिब रहे |
    सुखनवर से उन्हें ‘ आशना कीजिए |

    चांद तक की अदा कुछ सँवर जायेगी |
    अश्क आंखों से गर आबशा कीजिए |

    कल्बे – रहबर इनायत बनी गर रहे |
    चंद – लम्हों में फिर राब्ता कीजिए |

    मशवरा ये हुकूमत तुम्हीं से लेगी |
    नौजवानों खड़ा ‘ काफिला कीजिए |

    जब वरक लफ्ज तेरे आगोश मे हैं |
    दर्दे दिल लिख के ही रतजगा कीजिए |

    मुझको अरविन्द हर सू नजर आते हैं |
    मोजिज़ा ही सही मोजिज़ा कीजिए |
    कुमार अरविन्द

  • ग़मगीन लम्हों का मुस्कुराना हुआ है

    ग़मगीन लम्हों का मुस्कुराना हुआ है
    —————————————-

    कोई एहसास दिल को छुआ है
    मुमकिन है,आपका आना हुआ है

    ख़्वाबों की धुन्ध छँटने लगी
    इक फ़साने का, हक़ीक़त होना हुआ है

    सिसक रही तन्हाई भी हँस पड़ी
    नज़र को नज़र का नज़राना हुआ है

    तसल्ली ने दिया-दिल को यकीं-
    इंतज़ार में पलों का सताना हुआ है

    इज़हार को मचलने लगी क़शिश
    सूना जीवन सुहाना हुआ है

    ले हाथ सीने पर,आँहें भरे “रंजित”
    ग़मगीन लम्हों का मुस्कुराना हुआ है

     

    रंजित तिवारी
    पटेल चौक,
    कटिहार
    पिन–854105
    (बिहार)
    मो-8407082012

  • बिछडा जो फिर तुमसे

    बिछड़ा जो फिर तुमसे तनहा ही रह गया,
    ग़म-ए-हिज़्र मे अकेले रोता ही रह गया।

    मुसलसल तसव्वुर में बहे आँसू भी खून के
    शब् में तुझे याद करता, करता ही रह गया!

    मैंने शाम ही से बुझा दिए हैं सब चराग,
    शाम से दिल जला तो जलता ही रह गया।

    था गांव में जब तलक प्यास ना थी मुझे
    शहर जो आ गया हूँ तो प्यासा ही रह गया

    कुछ ना रहा याद मुझे बस आका का घर रहा,
    मेरी आँखों में बस मंज़रे-मदीना ही रह गया

    सच का ये सिला हैं के फांसी मिली मुझे,
    और वो झूठो का रहबर सच्चा ही रह गया

    जमाना टेक्नोलॉजी से पहुँचा हैं चाँद तक,
    ‘तनहा’ हैं जो ग़ज़ल को कहता ही रह गया

    तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’
    @©opyrights reserved

  • जिंदगी और मौत

    सोज़िशे-दयार से निकल जाना चाहता हूँ,
    हयात से अदल में बदल जाना चाहता हूँ!

    तन्हाई ए उफ़ुक़ पे मिजगां को साथ लेके,
    मेहरो-माह के साथ चल जाना चाहता हूँ!

    आतिशे-ए-गुज़रगाह-ए-चमन से हटकर,
    खुनकी-ए-बहार में बदल जाना चाहता हूँ

    मैं हूँ खुर्शीद-ए-पीरी जवानी के सफ़र में,
    बहुत थक गया हूँ ढल जाना चाहता हूँ!

    मैं हूँ ‘तनहा’ शिकस्ता तन-ओ-जहन से,
    आशियाँ-ए-बाम पर टहल जाना चाहता हूँ

    तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’

  • मयस्सर कहाँ है।

    मयस्सर कहाँ हैं सूरते-हमवार देखना,
    तमन्ना हैं दिल की बस एक बार देखना!

    किसी भी सूरत वो बख्शा ना जायेगा,
    गर्दन पे चलेगी हैवान के तलवार देखना!

    सज़ा ए मौत को जिनकी मुत्ताहिद हुए हैं हम
    आ जायेगी उनको बचाने सरकार देखना

    करो हो फ़क़त तुम गुलो की तारीफ बस,
    कभी तो गुलशन के भी तुम खार देखना।

    केमनी टी स्टाल पर यही करते है हम रोज़,
    चाय पीते रहना औ र तेरा इंतज़ार देखना।

    अपनी खुद्दारी ‘तनहा’ तू छोड़ेगा तो फिर,
    इसे आ जायेगा खरीदने बाज़ार देखना!

    तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’

  • विष मय है आज देख परिवेश।

    ✍?(गीताज ) ?✍
    ——-$——-

    विष मय है आज देख परिवेश।
    आक्रोश मे घुला है सुप्त आवेश।।
    कण कण मे गुस्सा
    आलम मे नव क्रोध
    धरती है कुम्हलाई
    पल बना है अबोध
    क्षण बना है विद्रोही खाके ठेस ।
    आक्रोश मे घुला है सुप्त आवेश।।
    नजारो मे अहम
    बचनो मे फरेब
    चापलूसी मे बैठा
    ठाठ अकड ऐठ ऐब
    घृणित मंजर काढ़े बैठा है भेष ।
    आक्रोश मे घुला है सुप्त आवेश।।
    मानवता है पीड़ित
    इंसानियत है बुझी
    मानव देख है वेबश
    रीति है अनसुलझी
    भाव देख रहादृश्य देख निनिंमेश।
    आक्रोश मे घुला है सुप्त आवेश।।

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ(छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक -13-04-2018)

  • जिंदगी मे व्यवहार जिंदा रखिए

    ✍?(अंदाज)?✍
    —–$—–

    जिंदगी मे व्यवहार जिंदा रखिए
    जिंदगी मे सुसंस्कार जिंदा रखिए

    रूठना मनाना क्रम है जीवन का
    रूठकर भी नेह धार जिंदा रखिए

    सच्चे प्रेम की परिभाषा यही है
    नेह का श्रद्धा आपार जिंदा रखिए

    बुराईया कटुता है मन का कचरा
    मंशा मे शुद्धता सार जिंदा रखिए

    सबको मिले संसार की हर खुशी
    ऐसा सात्विक विचार जिंदा रखिए

    खुद से मिले इंसान को प्रसन्नता
    धारणा ऐसी बेशुमार जिंदा रखिए

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ(छग)
    ✍??????✍
    ( दिनांक-09-04-2018)

  • जख्म दबाकर मुश्काता हूं

    जख्म दबा – कर मुश्काता हूं |
    चुप रहकर मैं चिल्लाता हूं |

    मेरी बातें खुल न जाये |
    बातों से ‘ मैं बहकाता हूं |

    घर में ‘ आग लगा मत देना |
    पानी पर मैं चढ़ जाता हूं |

    मेरी आंखें नोच न लेना |
    कुछ तो तुमको दिखलाता हूं |

    गहरी चोटें बोल रही हैं |
    खुद के खातिर लड़ जाता हूं |

    तुम सब अपना छोड़ो यारों |
    झूठा खुद को बतलाता हूं |

    सारी ख्वाहिश ‘ छोड़ न देना |
    अरविन्द तुम्हे समझाता हूं |
    ❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • हुआ हूं खाक यहां रह गया

    हुआ हूँ ख़ाक यहां रह गया ‘ धुआं मेरा |
    किसी में दम है तो रोको ये कारवां मेरा |

    सभी ये कहते है अक्सर ज़मीन मेरी है |
    कोई ये क्यों नही कहता है आसमां मेरा |

    बदन से रूह तलक मैं ही बस गया तुझमें |
    मिटायेगा तू कहाँ तक बता निशां मेरा |

    मेरे लबों से हँसी तू मिटा न पायेगी |
    ए ज़िन्दगानी ले कितना भी इम्तिहां मेरा |

    नहीं है खौफ कि दुश्मन जहां हुआ कैसे |
    कि अब जहां का खुदा खुद है मेहरबां मेरा |

    कई हज़ार फफोले हैं पावँ में लेकिन |
    खुदा गवाह ‘ अभी अज़्म है जवां मेरा |

    ये और बात कि मेरी ज़बान कट जाये |
    मगर बदल नही सकता कभी बयां मेरा |

    फकत यही न कि तुमसे ये दिल लगा बैठे |
    रोशन तुम्ही से है सारा ये आशियां मेरा |

    वो दिल्लगी हुई अरविन्द खत्म सारी पर |
    ये दिल भी तो नही भटका कहाँ कहाँ मेरा |
    ❥ कुमार अरविन्द

  • मत करो देर

    **मत करो देर”**

    मत करो देर , झटपट पाट दो , दिल की दरारों को ।
    जमाना क्या कहेगा ,समझ़ो, जमाने के इशारों को ।

    जिदों का यह अड़ियली रुख ,बहुत ज्यादा, नहीं अच्छा ,
    छोड़कर जिद निभाओ , प्यार के अलिखित करारों क़ो ।

    बात बचपन की जो होती , जो समझाते,समझ जाते ,
    जवानी का है अब आलम , ना लौटाओ, बहारो को ।

    अगर जो बात बन जाए ,हो जन्नत जैसी जिंदगानी ,
    सजाने जिंदगी अब बुला ल़ो झट चाँद तारों को ।

    जानकी प्रसाद विवश

  • टूटती जिंदगी

    हमने चाहतों को सजाना छोड़ दिया
    तेरे जाते ही जमाना छोड़ दिया

    क्यों हम टूटते ही चले जा रहे हैं
    लगता है उसने बनाना छोड़ दिया

    नींद भी हमें अब कम आती है
    ख्वाबों ने भी तो आना छोड़ दिया

    डर लगता है अब बिखरने से हमें
    नजरों से नजरें मिलाना छोड़ दिया

    सफर में एक साथी कुछ देर का
    उसने भी साथ निभाना छोड़ दिया

    हर खुशी में एक गम छुपा दिखता है
    सो हमने खुशी को पाना छोड़ दिया

    लोग आते हैं और चले जाते हैं
    हमने दिल को समझाना छोड़ दिया

    अब गिरना वाजिब लगता है शिव
    इसलिए संभल जाना छोड़ दिया

    शिव उपाध्याय

  • कच्ची मिट्टी के जैसी मै धीरे धीरे धँसती हूँ

    कच्ची मिट्टी के जैसी मै धीरे धीरे धँसती हूँ

    मै लडकी हूँ इस आँगन की तब ही इतनी सस्ती हूँ

     

    लोग लगाएगें बोली मेरी बडे सलीके  से

    लोग तमाशा देखेगें कि मै कितने में बिकती हूँ

     

    मेरी मर्जी का मोल नही है मेरे ख्वाब की क्या कीमत

    कोई नही पूछेँगा मुझसे मै क्या हसरत रखती हूँ

     

    मेरा कद बढता है तो फिर बाप के काधेँ झुकते है

    मै गीली लकडी चूल्हे की धीरे धीरे जलती हूँ

     

    मुझको क्या उम्मीद ‘लकी’ अब इस दुनिया मे आने की

    माँ की कोख में सदियों से मै डरती डरती पलती हूँ

  • विकराल बन तू महाकाल बन

    ✍?(अंदाज) ?✍
    ——-$——

    विकराल बन तू महाकाल बन
    मिसाल बन तू बेमिसाल बन

    अनंत अकूत अद्भुत साहस धर
    प्रचंड प्रबल प्रतिरुप विशाल बन

    बुराईया मिटा हटा कुरूप रीतियां
    संरक्षक सुसंस्कृती का ढाल बन

    सभ्यता संस्कार रहे सुरक्षित सदा
    सौहार्द्र समन्वयक शुद्ब बहाल बन

    मानव की मानवता सम्मान बचा
    स्वयं उत्तर बन तू नही सवाल बन

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ(छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक -06-04-2018

  • विद्रूपता का सव॔ विनाश करो

    ✍? (अंदाज ) ?✍
    ——-($)——

    विद्रूपता का सव॔ विनाश करो
    कण -कण मे दृढ विश्वास भरो

    शौर्यशिलता का प्रतीक तुम
    बुद्धि मे विवेक गुण खास धरो

    चिंतन करो स्वास्थ्य मंथन करो
    सुखद सम्भाव रहे प्रयास करो

    घृणित बुराईयो का न वास रहे
    मानवीय समझ मे हर उजास भरो

    कम॔शीलता की गढ परिभाषा नई
    शुद्ध मानवीय औकात पास रखो

    टूटे गिरे को देकर जीवन पथ नया
    पथभ्रष्टो मे सच्चाई सुवास भरो

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ(छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक 03-04-2018)

  • सिर्फ़ अपनी झूठी शान दिखाते है लोग

    सिर्फ़ अपनी झूठी शान दिखाते है लोग

    सिर्फ़ अपनी झूठी शान दिखाते हैं लोग

    दिल छोटा रखते हैं
    इमारत बडी बनाते हैं लोग

    नफ़रत दिल मे है
    प्यार जताते है लोग

    अपने सच से हैं बेख़बर
    ओरो को आईना दिखाते हैं लोग

    बेचकर ज़मीर अपना
    नाम कमाते हैं लोग

    ज़ख्म पे मरहम लगाते हैं
    बाद में तमाशा बनाते हैं लोग

    सब अपने मतलब से चलते हैं
    रास्ता कहाँ बताते है लोग

    जीते जी “जीने नही देते”
    मर जाने पे आंसू बहाते हैं लोग ।

    (राजनंदिनी राजपूत)-राजस्थान, ब्यावर

  • मिल जायेगी ताबीर मेरे ख्वाबों की एक दिन

    मिल जायेगी ताबीर मेरे ख्वाबों की एक दिन,
    या ख्वाब बिखर जायें कुछ कह नहीं सकता।

    बह जाउं समंदर में तिनके की तरहं या फ़िर,
    मिल जाये मुझे साहिल कुछ कह नहीं सकता।

    इस पार तो रौशन है ये मेरी राह कहकशा सी,
    मेरे उस पार अंधेरा हो कुछ कह नहीं सकता।

    गुमनाम है ठिकाना और गुमनाम मेरी मंजिल,
    किस दर पे ठहर जाउं, कुछ कह नहीं सकता।

    एक बेनाम मुसाफिर हूँ और बेनाम सफर मेरा,
    किस राह निकल जाउं, कुछ कह नहीं सकता।

    कर दी है दिन रात एक रौशन होने की ख़ातिर,
    पर किस कोठरी का अँधेरा मिटाऊँ कुछ कह नहीं सकता।

    बन कर बहता रहा हूँ फ़िज़ाओं में हवाओं की तरह,
    पर किसे कब छू जाऊं कुछ कह नहीं सकता।

    करता हूँ फरियाद मन्दिर, मस्ज़िद गुरुद्वारे में सर झुकाकर,
    किस दर पर हो जाए सुनवाई कुछ कह नहीं सकता।

  • नव पल परिवेश का अहवान हो

    ✍? (अंदाज )?✍

    नव पल परिवेश का अहवान हो
    अंतर्मन मे नैतिक उत्थान हो

    जीवन है जग मे एक भीषण युद्ध
    विजय भाव का मन मे उफान हो

    निज लक्ष्य मिले हो सबका भला
    स्वभाव मे ये गुण सव॔ पहचान हो

    आगाज हो रणकुशलता से सव॔त्र
    धरती के कण कण मे मुस्कान हो

    वैचारिक शक्ति से अलख जगाओ
    कम॔शीलता का नया निशान हो

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍??????✍
    ( दिनांक 02-04-2018)

  • अंदाज

    ✍? (अंदाज ) ?✍
    ——($)—–

    बिषमताओ से टकराना जरूरी है
    संघर्ष के जल से नहाना जरूरी है

    जीवन है गतिमान लय का रूप
    जिंदगी मे संवर जाना जरूरी है

    प्रतिकूलता है वक्त का इम्तहान
    समय मे निखर जाना जरूरी है

    न हो कुंठित निराशा से ङर कर
    आशा को ऊर मे लाना जरूरी है

    शिक्षा का उद्देश्य है नव परिवर्तन
    विकृत का पल ढहाना जरूरी है

    तू ऊर्जावान है आज का अर्जुन
    परिवेश मे बदलाव लाना जरूरी है

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍??????✍
    (दिनांक 01-04-2018)

  • सबको रस्ता दिखा रहा हूँ मैं

    गजल

    सबको रस्ता दिखा रहा हूं मैं |
    साथ ‘ मिट्टी उड़ा रहा हूं मैं |

    इन दरख्तों में अब भी जिंदा हूं |
    अपना साया मिटा रहा हूं मैं |

    मुझको लाकर लिटा गए जबसे |
    कब्रे – रौनक बढा रहा हूं मैं |

    इश्क करना ही सीख लो मुझसे |
    इश्क करना सिखा रहा हूं मैं |

    आइने में नजर न आयेंगे |
    ऐसे चेहरे बना रहा हूं मैं |

    लोग मुझे बत्तमीज कहतें हैं |
    खुद जो खुद का बता रहा हूं मैं |

    वो रुलाती रही मुझे हरदम |
    कह जिसे ‘ बेवफा रहा हूं मैं |

    चाहता हूं लिपट के फिर रो लूं |
    माँ तेरे घर से जा रहा हूं मैं |

    आग अरविन्द मय्यसर लेना |
    अपनी बस्ती जला रहा हूं मैं |
    }-❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • जवां धडकनो को धड़कने दो यारों

    //ग़ज़ल//

    जवां धडकनो को धड़कने दो यारों।
    जरा आशिकी औऱ बढ़ने दो यारों।१

    महकता रहे गुल चमन प्यार का ही,
    फि़जा रुत सुहानी बहकने दो यारों ।२

    करें प्यार इतना …समन्दर से गहरा,
    मुहब्बत जरा और …बढ़ने दो यारो।३

    सवरता रहे …..प्यार दोनों दिलो मे,
    इशारों इशारों मे….. कहने दो यारों।४

    कसम है सदा…. प्यार करते रहेंगें,
    वफा कर वफाई ..दिखाने दो यारो।५

    जले गर जमाना जलने दो “योगी”
    चलो प्यार को.. .निखरने दो यारो ।६

    योगेन्द्र कुमार निषाद “योगी”
    घरघोड़ा,छ०ग०

  • है चाह मिलूं उससे जो अक्सर

    गजल

    है चाह मिलूं उससे जो अक्सर नहीं मिलता |
    दीवार घरों में है मगर घर नहीं मिलता |

    ये आप भी देखें है कि बस मुझको भरम है |
    हर शख़्स परेशान है खुलकर नहीं मिलता |

    इस ज़िन्दगी के चिथड़े सिलाने है मुझे सब |
    इस शहर में पर कोई रफूगर नहीं मिलता |

    जज्बाती दिलों ने मेरे जब आग लगा ली |
    इस से कोई गमगीन तो मंज़र नहीं मिलता |

    सन्नाटे हैं तनहाई है रुसवाई है दिल में |
    धोखा जो जमाना दे वो पढ़ कर नहीं मिलता |

    वो प्यास बुझा देती मेरी आज सभी , पर |
    अच्छा है कि प्यासे को समंदर नहीं मिलता |

    हैं दोस्त भी ‘ अरविन्द ‘ बहुत सारे मेरे पर |
    जब दिल को जरूरत हो तो दिलवर नहीं मिलता |
    अरविन्द शुक्ला ( गोंडा )

  • अंदाज

    ✍?अंदाज ?✍
    ——-($)——

    आलस्य न प्रमाद धर
    तनाव न अवसाद धर

    ऊमंग रख नस-नस मे
    उत्साह का स्वाद रख

    तरुणाई की बेला है
    जीत भाव आगाध रख

    संघर्ष से घबरा नही
    तरंगित शंखनाद रख

    जीवन की परिभाषा गढ
    सकारात्मकता साथ रख

    रोग भय न कष्ट से डर
    दृढ़ता का तप साध रख

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    (दिनांक 28-03-2018)

  • रक्त से सनी धरती लाल देख

    ✍ ? गजल ?✍
    ——-($)——-

    रक्त से सनी धरती लाल देख
    चहुंओर हाहाकार हाल देख

    समरसता जल रही धूं धूं कर
    सद्भावना है बदहाल देख

    हिंसा आतंक का है जोर प्रबल
    छल-कपट का रुप विकराल देख

    भयाक्रांत भयावह आज स्थिति
    नैतिकता की घायल चाल देख

    साम्प्रदायिकता बन बैठा है नाग
    सव॔धर्म समभाव है तंगहाल देख

    तू बन नही कायर आज अर्जुन
    पुरुषार्थ जगा वक्त संभाल देख

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍?⭐??⭐?✍
    (दिनांक 27-03-2018)

  • तू ही हैअर्जुन आवाज सुन

    ✍? गजल ?✍


    तू ही हैअर्जुन आवाज सुन
    परिवेश का दर्दे साज सुन

    छटपटा रही धरती देख तू
    माहौल का क्रंदन आज सुन

    तेरे शौर्य मे बंधा है वर्तमान
    नव नीति का रम्य नाज सुन

    हिंसा भय दहशत का है आलम
    पीड़ित मानवता का राज सुन

    बिलखती धरा को उबारने तू
    पुरुषार्थ का अपना अंदाज चुन
    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)

  • गजल

    ✍? गजल ?✍
    —–(*)—–

    जग मे कुछ कर जाना जरूरी है
    जीवन मे मुस्कुराना जरूरी है

    चाहे हो कष्ट संकट गहनतम
    धैर्य से निकल जाना जरूरी है

    जग का काम है करना अवरोध
    बुद्धि से पार पा जाना जरूरी है

    हर नेक काम का होता है विरोध
    समझ से निखर जाना जरूरी है

    मानव का लक्ष्य है आगे बढना
    मनोबल से राह पाना जरूरी है

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍????✍

  • आओ धरती पे चरण रखो पाथ॔

    ✍? गजल ?✍
    ——-($)——-

    आओ धरती पे चरण रखो पाथ॔
    संत साधुओ को तारो निस्वार्थ

    बिलखता पल विषाक्त क्षण मे
    विषैले हवाओ को टारो साक्षाथ॔

    छल-बलयुक्त विकृत इस दौर मे
    दिखाओ अपना सच्चा पुरुषार्थ

    हो बसुंधरा के तुम ही पुत्र सपूत
    चले आओ धर वीरता गुणाथ॔

    सत-सज्जनो की सुनो आवाज
    सिसकती धरती पे करो कृतार्थ

    ईमान और बेईमानी के इस रण मे
    ऊठा गांडीव करने आओ परमाथं

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग )
    ✍????✍

  • सत्य असत्य मे क्या सच्चाई है

    ✍? गजल ?✍
    —–($)—–

    सत्य असत्य मे क्या सच्चाई है
    ईमान बेईमान के बीच लड़ाई है

    इंसान का इंसान मे नही विश्वास
    मानव का मानव के बीच खाई है

    परिवेश मे घुला है जहर ही जहर
    वर्तमान के देह मे पीड़ा समाई है

    दुष्ट दुष्कर्मो का बढ रहा सम्मान
    शरीफो की स्थिति यहाॅ बेहयाई है

    बना हुआ है भूमि का ठौर कुरुक्षेत्र
    संघर्ष की नियति देखो मुस्कुराई है

    ऊठ जाग ! अर्जुन ताड ले हालात
    अब घड़ी परीक्षा की तेरी आई है

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    ✍?⭐??⭐?✍

  • मेरें दामन मे दर्द का सिलसिला है

    वज़्न – 122 122 122 122
    अर्कान – फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन
    बह्र – बह्रे मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम

    काफ़िया – आ (स्वर)
    रदीफ- है।

    मेरें दामन मे दर्द का सिलसिला है।
    रहा हर सफ़र जिन्दगी की सज़ा है।

    वफा जिन्दगी भर किया धड़कनों का,
    न जीना सका मैं, न आया मजा हैं।

    कदम जब मेरा हौंसला कर उठा तो,
    ड़गर साँस, काटें चुभाता सदा है।

    जिधर देखता हूँ उधर नफरतें है,
    मुहब्बत पे अब और पहरा लगा है।

    फ़िकर जिस्म का जो किया हमने योगी,
    जहाँ का सितम और बढ़ने लगा है।

    स्वरचित,मौलिक
    योगेन्द्र कुमार निषाद
    घरघोड़ा (छ ग) 496111
    7000571125
    २४०३२०१८

  • मेरी जिंदगी का निखार तू है

    ✍? गजल ?✍
    ——-($)——-

    मेरी जिंदगी का निखार तू है
    मेरी मुस्कान का प्रसार तू है
    तेरी चाहत का मै हूं दिवाना
    मेरी मुहब्बत का आधार तू है
    मेरी कल्पना तमन्ना मेरी तू
    मेरी तबस्सुम का संसार तू है
    मेरी महबूबा मेरे दिलबर है तू
    मेरे गुले गुलशन का बहार तू है
    तू मेरी है नस-नस मे बसी
    मेरे जीवन का उल्फते यार तू है

    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग)
    (दिनांक 24-03-2018)
    ✍?⭐??⭐?✍

  • कफ़न का ही इन्तिजाम

    कफ़न का ही इँतजाम कर दो |
    दो गज की जमीं नाम कर दो |

    दफन कर के मुझको जमीं में |
    मुझे गुल से गुलफाम कर दो |

    चलें आयेंगे देखने मुझको |
    ये मैय्यत सरे – आम कर दो |

    कतारों में जिन्नाद होंगे |
    मुझे तुम जो हअमाम कर दो |

    मेरे सर पे ‘ इनाम रख कर |
    मुहब्बत सरे – आम कर दो |

    तमाशा बना कर रखा क्यूं |
    अगर चाहो गुमनाम कर दो |

    भटकती मेरी रूह को तुम |
    किसी का भी गुलआम कर दो |

    मुहब्बत ‘ का इनाम देना |
    मेरे सर पे इनाम कर दो |

    ए अरविन्द ये खाक उड़कर |
    मुझे इश्के – खैय्याम कर दो |
    __________कुमार अरविन्द

    गुलफाम – फूलों के समान रंग वाला ,
    जिन्नाद – भूत प्रेत , हमाम – इत्र
    इश्के खैय्याम – इश्क का नशा करने वाला

  • इश्क को माना खुदा

    इश्क को माना खुदा है |
    देख लो क्या क्या सजा है |

    उन गुलों को क्यूं मसल दूं |
    जो मेरा भी हमनवा है |

    मुश्कुराहट देख के मेरी |
    आइना मुझ पर फिदा है |

    जख्मी तुम गुलनार देखना |
    मुश्कुराहट भी कला है |

    झुक गया है आसमां भी |
    चांद छत पर जब दिखा है |

    आइना मैं देख लूं क्यूं |
    माँ मेरी जब आइना है |

    चांद ‘ को मैं तोड़ लाऊं |
    चांदनी ‘ का फैसला है |

    हर खुशी मैं छोड़ आया |
    जब मिली माँ की दुआ है |

    बोलेगें अरविन्द क्या अब |
    दर्द आखिर बेजबा है |
    ❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

  • तेरी नयन मदभरी गजब

    ? गजल ?


    तेरी नयन मदभरी गजब
    तेरी अदाएं रसभरी गजब
    मुस्कानो की पहचान नई
    तेरी सदाएं खरी-खरी गजब
    अंगड़ाई मे खिली मोहकता
    तेरी जुबां मे प्रीत भरी गजब
    चाहत मे ढला ईशक नवल है
    तेरी नैनो नजर सरसरी गजब
    मेरे प्यार की है तू ख्वाहिश
    महबूबा तेरी जादूगरी गजब
    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग )

  • पाण्डव सा धैर्य धर्म मे संवरिए

    ? गजल ?

    पाण्डव सा धैर्य धर्म मे संवरिए
    कौरव सा न अधम॔ मे संघरिए
    सांसारिक खुशी चाह के लिखे
    बेईमानी का न दामन धरिए
    सत्य सच्चाई संसार का है सुख
    निज को पहचान खुद निखरिए
    स्वयं की मेहनत मे है भविष्य
    कम॔ पूजा की सार्थकता पसारिए
    अपने पथ-माग॔ खुद तय करना है
    आत्मविश्वास से स्वंय को परखिए
    तुम्हारी पहचान तुम्ही से ही है
    स्वंय को जान सत्य का संग धरिए
    श्याम दास महंत
    घरघोडा
    जिला-रायगढ (छग )

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