SHRINGAAR KI EK RACHNAA ———————————————————- mera mehboob mera sanam hai…I —————————————————– saawan ka baadal—— hai unke aankho ka kaajal mayur sa mnn hai nritymay bhaavnaao ki baarish hui hai, muhabbat ki guzarish hui hai is […]
SHRINGAAR KI EK RACHNAA ———————————————————- mera mehboob mera sanam hai…I —————————————————– saawan ka baadal—— hai unke aankho ka kaajal mayur sa mnn hai nritymay bhaavnaao ki baarish hui hai, muhabbat ki guzarish hui hai is […]
बचपन की कागज़ की नाव जो बारिश के पानी में तैरती थी जो कई बार तैरते तैरते थक जाती थी और उसे फिर से सीधा कर पानी में छोड़ देते थे और वो फिर तैरने […]
Chalkar dekha us raha pe, Jaha chalein sath the kabhi.. Sang tere chaltein the Milo, Par ab akele dil chalta nahi.. Jeekar dekha us lamhe ko, Jo humara hota tha kabhi.. Teri ek muskaan pe […]
बिना कलम मैं कौन क्या परिचय मेरा कहां का रहवासी मैं शायद कविता लिखने वाला कवि था मैं पर अब मै कौन बिना कलम मैं कौन कलम के सहारे नन्ही नन्ही लकीरों से रचता […]
कोई आफ़ताब तो नहीं जिंदगी में कहीं कोई दीया ही जल जाये कोई कविता हम कह नहीं पा रहे है कहीं कोई इक लफ़्ज ही खिल जाये
होठों से बयाँ होता है आँखों का दर्द सुनहरा , जब अश्क रूठ जाते हैं किसी बेगाने की यादों में , हर दर्द जवाँ हो जाता बीते हुये हर उस पल सेें, जिनकी यादों की […]
मंज़िल की बेताबी खत्म हुई यूँ कारवां से दिल लगाया हमने राजेश’अरमान’
हम बढ़ते रहे हम समझते रहे हम पढ़ते गए हम समझते गए छोटे थे तो बड़ा होने का ख्वाब बड़े हुए तो बचपन लगा प्यारा कुछ पाया तो खोने का डर कुछ न था तो […]
दोस्त इक अजीब सा रिश्ता पनपने लगा हम दोनों के बीच इक दूजे के दर्द को महसूस सा करने लगे कुछ खट्टी कुछ मीठी सांसों का बँटवारा भी रजा से करने लगे कुछ प्यार से […]
स्वयम् सृजन पाने की चाहत मालिक को, कैसे पूरी कर पाएगा, ख़ुद की अनुभूति कर ना पाया, उसको कैसे पाएगा ? है नग्न इंसान उसके हिसाब में, छुपा उससे कुछ ना पाएगा, अंत उतरने […]
मौलिक–विचार है म्हा–शक्ति, जो उसने ख़ुद तेरे चित् जगाई है, रहते ख़ास कारण उसके काम मैँ,क्यों उसने तुममे यह भरपाई है ? निर–विचार जो जीवन जी जाएगा,कैसे मूड़–मन को बदल तूं पाएगा, गर मौलिक–विचार […]
क्यों यह परदा दारी है, आ खुल के मेरे सामने आ मुझसे नज़र मिला के कह, तू कभी ना ग़लत हुआ सब नजरों में बन खुदा, भय का यह व्यापार चला मुझसे ना कहना ओ […]
गरूर–ए–नजर में तेरी, मेरा सर झुका रहा तूने जब आवाज़ दी, दिल ने पलट कर कहा शायद तूँ बदल गया, घर मेरा मुझे मिल गया फिर तू मुझे छल गया, दिल से मेरा घर गया […]
रूह मेरी तड़प तड़प गई, तूने ना पुकार सुनी तुझसे ना–उम्मीदी में, बैरंग सी यह फिज़ा बुनी ज़िन्दगी तो बसर गई, हर रिश्ता तार–तार हुआ तेरे–मेरे इस खेल में, हर किरदार दागदार हुआ …… […]
जाने क्यों तुम नाराज हुए, ख़ुद ही मुझको ज़ुदा किया ना थे हम हमराज़ कभी, फिर क्यों यह शिकवा किया ता–उमर चली तूने अपनी राह्, दिल मेरा लोच्ता रहा चला जब मैं अपने दिल की […]
था मैं चला कहां से, इसकी ना कोई याद मुझे हुआ मैं ग़लत कहां पे, इसका ना आभास मुझे चेतना है धुंधली सी, शायद था मैं कोई अंग तेरा क्या वोही है घर मेरा, जिस्मे […]
जुर्म उनके ,सितम उनके ,खता उनकी हम तो अब भी खाली हाथ बैठे है राजेश’अरमान’
रहस्य जीवन अनेक प्रश्न निरुत्तर प्रश्न संभव जीवन संभव मोक्ष निरर्थक प्रश्न पुनर्जन्म संभव जन्म सार्थक प्रश्न मृत्यु प्रश्न सत्य प्रश्न यथार्थ प्रश्न प्रारब्ध चिंतन सार्वभौमिक चिंतन अलोकिक प्रश्न जीवन चिंतन जीवंत प्रश्न आलोकित प्रश्न […]
जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेना वक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का कभी हाथों में तुम एक टूटा […]
जीतने की ख्वाइश में कछुए सा चल रहा हूँ, लेकिन ख्वाइशों का खरगोश सोने के लिए रूकता ही नहीं राजेश’अरमान’
खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है हर शक्ल आईने के सामने आकर बिखर जाती है कुछ तो रहस्य छिपा है आईने में शक्ल जो सिहर जाती है आईने को तोड़ के देखा शक्लों […]
बंद कर देखों नयन अपने खुली रहने दो , सब जो नयन नहीं है नयन से देखने का अभ्यास अविरल है स्वयं अन्य इन्द्रियों की दृष्टि शक्ति कम की है अभ्यास एक शास्वत जीवंत परिणाम […]
अपने साये भी अब अनजान नज़र आते है बिन बुलाये से मेहमान नज़र आते है हर शक्स उदास हर रिश्ते अब तो पत्थरों से ये बेजान नज़र आते है राजेश’अरमान’
तालीम कुछ गिनती की यूँ काम आई बस जाती सांसों को गिनता रह गया राजेश’अरमान’
जब किसी सितम की कभी इन्तहाँ होती है! सोती हैं ‘तकदीरें मगर आँख रोती है! वक्त के कदमों तले कुचल जाती हैं मंजिलें, डूबती तमन्नाओं की सहर कब होती है? Composed By #महादेव
मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है मृग जाने किस चाह से भटक रहा है रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है किस सत्य की खोज में मन […]
सच ने जब भी तोडा है दम झूठ ने ही उसे अग्नि दी है राजेश’अरमान’
था वो गुलाब के मानिंद नज़र बस तेरी काटों पे गड़ी मैंने भी महसूस किया कैक्टस को नज़रे जो कभी फूलों पे पड़ी राजेश’अरमान’
जब अपनी ही साँसें एहसान जताने लगे समझ लो साँसें भी अपनी हो गई है राजेश’अरमान’
धर्म की दूकान सदियों से चल रही है , कीमत तो चुकाई पर सामान नहीं मिला राजेश’अरमान’
बिखरी जा रही ज़िंदगी कुछ तेज रफ़्तार से कोई मोहलत नहीं कुछ भी दुरुस्त करने को राजेश’अरमान’
तेरी बेरुखी इस कदर काम कर गई बेवज़ह वक़्त को बदनाम कर गई रिश्तों पे पड़ी धूल जब जमने लगी ख़ामोशी के राज़ सरेआम कर गई राजेश’अरमान’
हर फैसले मेरे तेरे क़दमों में थे तूने क़दमों का फ़ासला कर लिया न हो दरम्यां सांसें भी अपनी लेकिन , तूने ज़ख्मों का काफिला चुन लिया राजेश’अरमान’
मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में देशद्रोहिता के रहस्य मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में असहिष्णुता के मायने मैं समझ नहीं पाता अपने ही देश में पलता धर्मो का खेल मैं […]
अजैविक गम की खाद से ख़ुशी हो गई बोन्साई राजेश’अरमान’
होठों पे ख़ामोशी की लहरें ढूंढ़ती है लफ़्ज़ों के समुन्दर राजेश’अरमान’
कुछ तो बात है तेरे शहर की ये ज़ख्मों को भी तन्हा नहीं रखते राजेश’अरमान’
What if the Sun desires not to shine? What if the birds desire not to chirp? What if the flowers desire not to bloom? What if the rivers desire not to flow? What if the […]
वो खफा है अब इस बात पर आता नहीं सलीका गम उठाने का राजेश ‘अरमान’
ज़िक्र तिरी वफ़ा का मसला था , जो अब न रहा मैं कब तिरी आँखों में बसा था, जो अब न रहा इक बुतखाने की तिश्नगी से बढ़कर कुछ नहीं कभी बुलंद जमाना मैं था […]
गुज़ारिश गुज़ारिश गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है अब तो हो गए वो रास्ते भी किसी अजनबी से जिन रास्तों ने […]
फेहरिस्त में भुलाने के नाम, मैं रोज़ सजा लेता हूँ इसी बहाने मैं सबको , याद करने का मज़ा लेता हूँ चाक किस्मत के रहने दो ताउम्र मेरी जागीर की तरह अपने हिस्से के गुनाहों […]
जो यादों में बसा है ,उसे वहीँ रहने दो मेरी दी हुई हिचकिओं में, उसे रहने दो आज साकी तू रुख से पर्दा नहीं नक़ाब उठा मैखाने के बातें बस मयखानों तक रहने दो किसने […]
कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई रात भर वो शाम दरवाज़े पे देती रही दस्तक कुछ धुँधले से साये करीब आकर छूते तो है अपना पता पूछते है मुझ अजनबी से […]
अपनी उलझनों के हम यूँ आदी हो गए है कभी मुजरिम तो कभी फरियादी हो गए है न होता कुछ तो कुछ और जरूर होता बस इसी सोच में कोई बर्बादी हो गए है राजेश’अरमान’
तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहीं क्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहीं […]
मेरी आवाज दबा दी गयी मेरे अल्फ़ाज मिटा दिये गये जला दिया मेरा जिस्म भी दुनिया ने मगर ख्वाहिशे कहां मिटती है ढ़ूढ़ लेती है कोई न कोई राह निकल पडती है परत दर परत […]
दुबले-पतले,गोरे-काले। तन पर कपड़े जैसे जाले।। दिख जाते हैं। नुक्कड़ पर,दुकानों पर। ढाबों पर,निर्माणधीर मकानों पर।। देश में इन की पूरी फौज। बिना लक्ष्य ये फिरते हैं यहां वहां हर रोज़।। ज़िन्दगी के पाठ ये […]
ღღ__मैं कह ही नहीं पाता, या तुम समझ नहीं पाते साहब; . कि अक्सर कुछ सवालों के, कोई जवाब नहीं होते !!…..#अक्स .
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