जॅंहा बचपन गुजारा , उन गलि‍यों में जाना चाहती हूं ; जि‍न्होनें बचपन सॅंवारा, उन पत्थरों से खेलना चाहती हूं ; आलीशान बगांले को छोड़कर, मम्मी की साड़ी से बने घर में रहना चाहती हॅू […]

चाहतों के दरमियाँ दर्द की दीवारें हैं! ख्वाहिशों में हरतरफ दौड़ती दरारें हैं! खोजते हैं सब्र को मयखानों में सभी, मयकशी में डूबते ख्वाब के नजारे हैं! Composed By #महादेव

तुम ! किसी दुर्दम्य वासना में क़ैद छटपटातीं रहीं जल — हीन मछली सी ……. और मैं ; तमाम वर्जनाओं में घिरा मोम–सा पिघलता रहा अनमना सुलगता रहा यक़ीनन , यह समझौता था—सम्बंध नहीं कहीं […]

ग़ज़ल : अनुपम त्रिपाठी इक शख्स कभी शहर से ; पहुँचा था गाँव में । अब रास्ते सब गाँव के ; जाते हैं शहर को ।। खेत–फ़सल–मौसम ; खलिहान हैं उदास । ग़मगीन चुभे पनघट […]

व्यंग्य …………………………………… ****** पूंछ— पुराण (समग्र)****** कभी देखा है ;आपने , ऐसा कुत्ता ! जो ; देखने में हो छोटा–सा मगर;पूंछ उसकी लंबी हो यानि कि ; —— भली–चंगी हो. जी हाँ ! कई ऐसे […]

ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल राहें  भी  रो  पड़ीं  मेरी  तलाश  देखकर ©® लोकेश नदीश

वक्त गुजरता है मगर खामोशी नहीं जाती! तेरी #चाहतों की मदहोशी नहीं जाती! किसतरह अब रोकूँ मैं यादों का सिलसिला? धड़कनों से तेरी सरगोशी नहीं जाती! Composed By #महादेव

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से साहिल पे […]

गरीबी ख़ुद के सिवा, औरों पे असरदार नहीं होती; शायद इसीलिए भूखों की, कोई सरकार नहीं होती !! . महज़ दो वक़्त की रोटी, और चन्द पैरहन तन पे; फक़ीरों को इससे ज्यादा की, दरकार […]

इक वक्त, इक रब्त जुड़ा था,   [रब्त = Relation] वक्त गुजर गया, रब्त रह गया कुछ लम्हो की दास्ता बनकर ये याराना पक्के अल्फ़ाजों में ज़हन में छप गया कुछ पल अजीज है बहुत, […]

वो आंखे आज तक चुभती है मुझको एक दम खाली, खाली कटोरे सी जो पूछ रही हों, कह रही हो अपनी भूखी दास्तां लफ़्ज ही बेबस है, नहीं समेट सकते दर्द को उनके खाली है […]

सुनो, मैंने भी एक दौर देखा हैं.. पिछले कुछ समय में मैंने एक दौर देखा हैं, मैंने अन्ना का आंदोलन देखा हैं, मैंने निर्भया की माँ देखी हैं, मैंने रोहित वेमुला की लाश देखी हैं, […]

पथरों के शहर बस्ती है यह पथरों की शहर जिसे कहते लोग बस्ती यह ऊँची मंजिलों की जहां छोटे दिल के बस्ते लोग   बस्ती है यह मकानों की यहां घर नहीं मिला करते बस्ती […]

  कभी  कभी, तुम  राहें  भूल  कर……! (गीत ) कभी  कभी,   तुम  राहें  भूल  कर, मेरी  गलियों  मे  आया  करो…. कभी  कभी  तुम  ख़ुद  को  भूल  कर, ज़रा  नजरें  मिलाया  करो…………! ख़ुद  में  इतने  खोये  […]

घर और खँडहर   ईटों और रिश्तों   मैँ गुंध कर मकान पथरों का   हो जाता घर   ज्यों बालू , सीमेंट और पानी जोड़ें ईट से ईट त्यों भरोसा, जज़्बात और प्यार जोड़ें […]

तेरा मेरा रिश्ता यूई की आंखों से बहते आँसुओं को रूह की नजर से देख यह आँखें मेरी हैं पर आँसू तेरे हैं इन आंसुओं में जो बहता है वोह पानी मेरा है पर धारा […]

जब आसपास की खट पट खामोशी में बदलती है। जब तेज़ भागती घडी की सुइंया धीरे धीरे चलती है।।   दिनभर दिमाग के रास्तों पर विचारों का जाम होता है। मन रूपी मेरी तकती पर […]

  Retirement  का  सुकून  ……..! अब सुकून आ गया है जिन्दगी मे थोडा, जब से मैंने औरों संग दौड़ना है छोडा… जब से मैंने औरों जैसा दौड़ना है छोडा… अब तो वक्त मिल रहा है, […]

दर्द-ए-गम इस दर्द-ए-गम का, अपना ही मंज़र है, रात तो आती है, पर नींद नहीं आती  शून्य का एहसास है, पर समझ नहीं आती  जिंदगी तो चलती है, पर जान नहीं होती  एक घुटन सी […]

आज नहीं तो कल तैरे नाम की बंदगी मैँ , झुका हुआ मेरा सर  तैरे इशक की इबादत में, बंधे हुए मेरे हाथ  तेरे नूरानी नूर मैँ, रौशन रह्ता मेरा मन  तेरी ख़ुशियों मैँ, नाच्ता […]

काली छाया    ख़ुद को पाने की राह में, ध्यान लगा जो ख़ुद में खोया, अन्तर मन में उतरा मैं जब, अंधकार में ख़ुद को पाया , अन्दर काली छाया देख के, ख़ुद को गर्त […]

जब से तुझको पाया है , जिव देखो तुझ्सा लगता है , दुनियाँ मानो शीश महल , हर चेहरा ख़ुद का लगता है I                                                                                                                                          …… यूई

रिश्तों की मौत   रिश्तों के मरने का है अपना ही अंदाज़ तासीर मरे रिश्तों की है लम्बी बीमारी सी पल पल मारती पर मरने नही देती मरा हुआ रिश्ता मरा हुआ इनसान जान दोनों […]

चौराहा   बीच चार राहों के , वोह मुकाम , रुक कर जहां, एक राह चुनता इंसान . ऐसे कितने चौराहों से, गुजरती जिंदगी़ , चुनते हुए राहें, लिखती दास्ता अपनी .   कितने चौराहों […]