उनकी आँखों से ,अश्क क्या गिरी। मैं समझा मुझ पे, बिजली गिरी।।
उनकी आँखों से ,अश्क क्या गिरी। मैं समझा मुझ पे, बिजली गिरी।।
मारकर फूल मत समझो कि हम संतुष्ट हैं। मुस्कुराओ अन्यथा हम रुष्ठ हैं। क्या करें मासूमियत से आपकी, ये चिढ़ाते नैन क्या कम दुष्ट हैं।
बहुत देर से ही सही मगर, समझ में आया, मगर से हो तुम, मेरे झील से जीवन में।
बिन बुलाये मेहमान हैं हम जब कहोगे तब चले जायेंगे। घर आपका है, हम खुद का समझ बैठे थे, आपको अपना समझ बैठे थे।
कड़वे बोल सुन सुन कर, तेरे, मैं हो गया पागल। है ऐसा क्या कि तब भी, मैं तेरा सम्मान करता हूँ।
नहीं होती है रात , सिर्फ सूरज के डूबने से। रात तब भी होती हैं , जब उम्मीद नहीं, दिखती…तुम्हें पाने की।
पलकों पर नींद बिखरी पड़ी होती है , फुर्सत में समेट कर सोते हैं।।
ये किनारे दूर होते गए , सिर्फ शकों के सैलाब से।।
‘उलझ पड़ें न कहीं हम, के इस ज़िन्दगी से, अपनी क्या बनेगी, आज तक बनी किसकी है.. इसलिए रखता हूँ हर आतिश को खुद में दफन, कहीं वो पूछ न बैठे कि आगज़नी किसकी है..’ […]
प्रेम नगरी में मैने प्रेमा से पूछा प्रेम के क्या है परिभाषा। शर्माती हुई कही “ए अजनबी क्या है तेरा अभिलाषा”।।
मत आना मेरे मैयत में , अश्क समंदर बन जाएंगे । डर है क़यामत के ए नूरी, कब्र भी मुझे ताने ही देंगे।।
‘फ़िज़ाओं के बदलने का इंतज़ार किसको है, रुसवा शख्सियत हूँ मैं ऐतबार किसको है.. आज दर-बदर हूँ तो ये भी सोचता हूँ, चलो देखता हूँ मुझसे प्यार किसको है..’ – प्रयाग मायने : रुसवा – […]
जब तुम गेसूओं में गुलाब गूंथते थे। तब मेरे अरमान के फूल खिलते थे।।
पत्थर पे लकीर, खींचने वाले। खुद को किया, तुझको हवाले।। संवार दे तू , या बर्बाद कर दे। जो भी दे, हंस हंस के दे।
साजिशें भी थीं, सामने गुनहगार भी थे। जवाब हमारे पास, तैयार भी थे। हम चुप रह कर सब सहते रहे, थोड़े नादान ही सही हम,मगर थोड़े समझदार भी थे।
तेरी दुआओं को सलाम, तेरी वफाओं को सलाम। तेरे दर से जो आई, उन हवाओं को सलाम।
चलो छुपा कर रखते हैं, खुशियों के बीज , बो देंगे कभी; अगर गम बढ़ जाए, ज़रा हंस लेना तुम , और हम भी मुस्कुराएं
कितना चले !कितना रुके! , हम जिंदगी के सफर में , ये कोई नहीं पूछता , मगर लोग अक्सर पूछते हैं, मंजिल के कितने करीब हो!
हर शाम इतनी मीठी ना होती, अगर तुम ना होते , खुश तो होते हम, पर खुशनसीब ना होते, गुजारिश है बस इतनी तुमसे, इस मुस्कान को खोने मत देना, खुशनुमा किया है हृदय को, […]
क्यों निभा रहे हैं हम, इस झूठे रिश्ते को, जहां वो हमें अपना नहीं मानते, और हम उन्हें पराया नहीं।
थाम कर तुम्हारा हाथ , आज भी चलना चाहते हैं, चाहे दूरी कितनी भी हो, साथ निभाना चाहते हैं।
कुछ इस तरह चला; यू मोहब्बत का सिलसिला, ना तुमको इसका एहसास था, ना मुझको इसका गम, हम दोनों मसरूफ रहे, इसे बेवजह निभाने में।
यह न समझो हम कभी रोये नहीं आसुंओं से चेहरा धोए नहीं। पी गए भीतर ही भीतर अश्रुजल बस दिखावे के लिए रोये नहीं।
अंधेरा इतना भी नहीं था कि रोशनी में अपनी जगह बना सके, और रोशनी भी इतनी नहीं थी कि अंधेरे को मिटा सके,
तुम्हें तुम्हारी ताजगी मुबारक , मुझे सुखें पत्तों से प्यार है, तुम्हें नाज है अपनी खूबसूरती पर , मुझे तेरी सीरत से प्यार है, तू खुश है इस नएपन से, मुझे तेरी नादानी से प्यार […]
‘इस कदर गुज़रेंं हैं हम इश्क के दौर से, दिल धड़कता है यहाँ, सदा आती है कहीं और से..’ – प्रयाग मायने : सदा – आवाज़
पत्थर को पत्थर से मारे तो क्या मारे ए दीवाने । दिल को जरा शीशे बना कर वार करो तो जाने।।
हां मान लेता हूं , अब नहीं होता ,पहले जैसा, बार-बार वो इजहार करना , मगर मैं उस कस्तूरी-सा जो कपड़ा फट जाए , मगर खुशबू नहीं छोड़े।
बेवफाई के बाजार में ए दोस्त वफाई नहीं मिलती। सब है यहाँ धोखेबाज़ कोई प्रेम कली खिलती तो कैसे खिलती ।।
कभी खामोशी के साथ , चार कदम चल कर तो देखो ! अपने वजूद का एहसास; पल भर में हो जाता है।
बदल कर रख दी मैंने अपनी सारी आदतें , मगर तुम पत्थर ही रहे..
आंखों को बंद करने से, दुखों का मंजर छुप नहीं जाता। तब और उभर कर नजर आती है, उनकी गहराईयां।
होश अब नहीं रहा इंसानियत का, बेसुध से सब हो गए हैं , जाने कैसा है यह नशा अपने भी गुम हो गए हैं।
एक दिन दिल ने जब कहा , वहाँ दग़ाबाज़ों का बसेरा है। नादान चाहत से तब मैं कहा , संभल वहाँ जरूर कोई सपेरा है।।
हर जख्म छिपा करके हंसने की कोशिश कर रहा हूं| काश समझ लिया होता उसे भी, जो अब समझने की कोशिश कर रहा हूं|
न बैठो दिल में मेरे इस तरह से आशा बन, कहीं न पा सकूं तो, दुःखी रहेगा मन। तुम्हारे साथ बिना रह नहीं सकता, तुम्हीं हो सांस मेरी तुम ही दिल की धड़कन।
अंधेरी रात में आशा एक चिराग हो तुम, इस बियाबान में संगीत का एक राग हो तुम।
वक्त थम सा गया, और ज़िन्दगी चलती रही। तेरी याद बहुत आई, तेरी कमी खलती रही। फ़िर ढूंढ़ने निकल पड़े तुझे, आंख के आंसू मेरे। खैर, तू मिला नहीं, पर मिलने की आस पलती रही।
आज कैसे – कैसे हुए जज़्बात के रोना आया, बीती किसी बात पे रोना आया। एक दुखती रग है, गर दबा देता है कोई, नहीं मिलती उस दर्द से निजात पे रोना आया…
कर ले ख्वाईश पुरी जो आज तुम्हारे दिल में है। क्या पता कल मैं रहूं या न रहूं ए किसने देखा है।।
कहीं खुशियों के दीप जले, कहीं अरमान भरे दिल। कहीं पे हो गईं, राहें लंबी, किसी को मिली मंज़िल।
चलो हम फिर नारी पे, एक सुंदर कविता रचे। नारी जीवन से प्रेरित रचना ही कविता में सजे।।
मेरी मुहब्बत को उसने भरी महफिल में तमाशा बना दिया। मैने जब दी उसे तोहफ़ा, तब उसने ज़हरीली मुस्कान लेती हुई मेरे मुंह पे फेंक दिया।।
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‘आज रह-रह के वही शख्स याद आता है, मैं उसे जब भी मनाता था, मान जाता था.. मेरे ज़ाहिर से ग़म भी आज ना दिखे उसको, जो बारिशों में मेरे आँसू जान जाता था..’ – […]
‘ठहरे पानी के ही मानिंद अपनी फितरत थी, न जगह छोड़ी और न ही किनारे तोड़े..’ – प्रयाग मायने : मानिंद – तरह/समान
यूं ही नहीं चीर रहे हवाओं को जहाज हिंद के पाक की नापाक आंखों की तकरार जांचने बैठे हैं हम चीन की छोटी आंखों की गुस्ताखियां देखना चाहते हैं तभी आज घड़ी के कांटे की […]
मेरे देश पर भ्रष्टाचार की तलवार तो कुछ ऐसे पड़े थाली में भोजन से ज्यादा अब चमचे हिस्सा लेने खड़ी
हमें औरों सा ना समझ, आंखों से और बातों से, इरादों को भांप लेते हैं। ये झाड़ पर चढ़ाना, मीठी-मीठी बातें बनाना, यहां नहीं चलेगा, हम स्वार्थ की चाह को, दिमाग़ से अपने; थोड़ा जांच […]
मेरा दिल ही मेरा रक़ीब है, मैं भुलना चाहता हूं, उसे और ये याद करता रहता है।
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