सौ दफा मैं हारा बेशक
जिद है फिर भी जीत की
सरहद नहीं होती कोई
परिंदों और प्रीत की।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज
Category: शेर-ओ-शायरी
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सरहद
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कहानी
जिसकी जैसी थी कहानी,
वो वैसा किस्सा कह गया
कोई चुनता रहा तिनके यहां,
कोई मोती चुराकर ले गया*****✍️गीता
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अच्छी किस्मत
अच्छी किस्मत वाले लोग
आसानी मिल जाते हैं पर
दिल के अच्छे लोग बड़ी
मुश्किल से रहते हैं… -
स्वाद मोहब्बत का
वो हमें छोंड़कर गैरों के हो गये
चलो स्वाद ले लेने दो उन्हें भी
गैरों की मोहब्बत का,
जब वो हमारे नहीं हुए
तो किसी और के क्या होंगे ?? -
इजाजत
आपकी आंखों में खोना चाहता हूं
आपकी जुल्फों में सोना चाहता हूं ।
अर्जी डाल रखी है हमने भी इजाजत की
मंजूरी मिल गई, तो आपका होना चाहता हूं।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज -
तेरी मोहब्बत में
तेरी मोहब्बत में,
इस कदर मसरूफ़ रहे
तेरी मोहब्बत ने,
तन्हाई में भी तन्हा रहने ना दिया*****✍️गीता
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*आधा चांद*
आज चांद आधा है,
पर उसकी याद पूरी आ रही
सितारे हंस रहे मुझ पर,
मेरा ख्वाब अधूरा रह गया*****✍️गीता
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*अपने नसीब की*..
आह ! ना लेना कभी,
किसी गरीब की
हर किसी को मिल जाती है,
अपने नसीब की..*****✍️गीता
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मोहब्बत की कहानी
धीरे-धीरे लौ जलती रही,
धीरे-धीरे शमा पिघलती रही
परवाना दूर से ही मचलता रहा,
हर मोहब्बत की कहानी है यही*****✍️गीता
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*एहसास*
तू जब हुआ करता था
मेरे करीब तो
एक अलग एहसास हुआ करता था
आज जब दूर है मुझसे
तो कोई एहसास ही नहीं होता…!! -
मैं वो चट्टान हूँ
कोशिश बहुत करता है वो
मुझे तोड़ने की,
मगर मैं वो चट्टान हूँ
जो पिघल तो सकती है मगर टूट नहीं सकती… -
मोहब्बत
ये पता है कि दुश्वारियां बहुत हैं
मोहब्बत की पथरीली राहों में ।
न जाने फिर भी क्यों बेचैन रहता है
दिल सिमटने को किसी की बाहों में।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज -
दायरा
कुछ इस तरह से बढ़ता गया दायरा मोहब्बत का
कि हम जान भी ना पाए कि दिल ने कब करवट बदल ली। -
जाने क्यूँ..
जाने क्यूँ तुम मुझे
इतना चाहते हो
ना चाहते हुए भी
प्यार जताते हो
हम किसी और की
अमानत हैं साहब!
क्यों हम पर
इतना प्यार लुटाते हो ? -
गुज़रे पल..
गुज़रे पलों को याद ना कर,
ख़ुदा से उनकी फ़रियाद ना कर
जो नसीब में है वो होकर रहेगा,
तू कल के लिए…
अपना आज बरबाद ना कर.. -
*वही एहसास*
थकान नहीं मुझे,आराम चाहिए
तू दूर नहीं, मेरे पास चाहिए
आंख लग जाए आज जी भर के मेरी,
मां, तेरी गोदी का वही एहसास चाहिए..*****✍️गीता
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दिल का दीप
न होती हर रात अमावस की
न होती हर रोज दिवाली है।
जब दीप जले दिल का दिलबर
समझो उस रोज दिवाली है।। -
दीदार
अब चलें काफी रात हो गई ।
आपसे मेरी दो बातें हो गई।।
वक्त और ठंड के तकाजा है।
चलो आप से दीदार तो हो गई।। -
मैं भी चौकीदार!
इश्क़ ने हमें बर्बाद किया;
फिर भी दिल ने; खुद को आबाद किया।-२
अरे! ना आती है ,
तो ना आए !
नींदें रात को,
मैं भी चौकीदार !
गर्व से!
मोदी जी को याद किया। -
मैखाने
मुखौटे से भरे हुए मैंखाने हैं….
किस पे भरोसा करें यहां तो अपने ही बेगाने हैं। -
*जज़्बात छिपाए बैठे हैं*
आज वो नज़र चुराए बैठे हैं,
जज़्बात अपने छिपाए बैठे हैं,
हमसे छिपा ना पाएंगे जज़्बात लेकिन,
जाने क्यूं शर्त लगाए बैठे हैं ..*****✍️गीता
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निःशब्द
हम हर किसी में कमियां ढूंढते थे,
जब आईने के सामने आए तो निःशब्द हो गये.. -
बेचैन से हैं हम
बहुत उंगली उठाते थे हम उस पर,
आज वो चला गया तो भी बेचैन-से हैं हम.. -
वो इतना भी बुरा नहीं था
जब वो रोता हुआ घर से गया
तो समझ आ गया हमको,
वो इतना भी बुरा ना था
जितना हम उसे समझते थे.. -
आँसुओं की परवाह
रो रहा था वो भी
रो रहे थे हम भी..
लेकिन ना उसे हमारे आँसुओं की परवाह थी
और ना हमें उसके जाने की.. -
वो रुक नहीं सकता था..
हालात इतने भी बुरे ना थे कि वो रुक नहीं सकता था,
हम इतने भी मजबूर ना थे कि उसे रोंक नहीं सकते थे.. -
मुखौटे
मुखौटे लगा कर,
आए हैं कुछ लोग
महफ़िल में आज का,
मज़मून क्या है..*****गीता
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तहे-दिल से शुक्रिया
तहे-दिल से शुक्रिया !
मोहब्बत में जो रुसवा किया तुमने,
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हम तो बर्बाद हो जाते जो थोड़ा प्यार दे देते… -
बहाने ढूंढते हैं हम
तुमसे दूर जाने के बहाने बहुत हैं साहब!!
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पर तुम्हारे पास आने के बहाने ढूंढते हैं हम -
**बेचारा दिल**
ये बेचारा दिल बस
तुम पर मरता है
पागल है जो तुमसे
इतना प्यार करता है
तुम्हारी बेरुखी से तो
मौत अच्छी है
पर ये दिल एक तेरी
ख्वाहिश में धड़कता है… -
दो दिलों का व्यापार
करता है कौन, किससे प्यार यहाँ ?
प्यार तो है दो दिलों का व्यापार यहाँ…जिसमें अपनी पूंजी कोई और लगाता है
पर उसका मुनाफा कोई और उठाता है… -
‘गुजरा वक्त’
वो आज कहने लगे हमसे
लौट आओ फिर से
मेरी जिन्दगी में
बहार लौट आएगी…
मैंने एक धुन में कहा-
मैं गुजरा वक्त हूँ साहब
जो घड़ी बीत गई
फिर ना लौट आयेगी… -
पुरानी दास्तां
एक दिल कहता है, फिर एक मर्तबा किसी से इश्क़ कर।
दूसरा दिल कहता है, ए नादान पुरानी दास्तां से तो डर।। -
महफूज
चल घटा जो हुआ इश्क़ में, शायद अच्छा ही हुआ।
कम से कम नादान दिल, तीर ए नजर से तो बचा।। -
बेवजह
मुहब्बत में मुकाम तो मिलता है मुकद्दर वालों को।
हम बेवजह ही आज़माए अपनी सोए मुकद्दर को।। -
गैरों को मोहब्बत
कितनी शिद्दत से हम तुझे चाहते थे
तुझको अपना नसीब मानते थे..
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तुमने हमें छोंड़कर गैरों को मोहब्बत बक्शी
पर हम तो फकत तुझे अपना मानते थे.. -
‘मेरा मजहब और मेरा खुदा’
क्या कहें अब
जब तू खफा
‘मैं फकीर और तू खुदा’
इबादत में तेरी मिट गया
मेरा मजहब और मेरा खुदा… -
मेरा मुकद्दर
ऐ खुदा !
क्यों है तू खफा
किस बात की तू मुझे
देता है सजा
मेरा मुकद्दर रूठा मुझसे
हमदम हुआ जबसे जुदा… -
मेरा वजूद
मेरे जज्बातों की कद्र
कभी नहीं की उसने
फकत आँसुओं की
सौगात दी उसने
हम उसी की खातिर
मिट गये यारों!
मेरे वजूद की कभी ना
फिक्र की जिसने… -
हम कद्र करते हैं
भागते रहे अक्सर हम
उन लोगों के पीछे
जिन्हें हम प्यार करते थे !
पर कुछ हाथ ना आया
सिर्फ मायूसी के सिवा
अब बस हम उनकी
कद्र करते हैं
जो हमारी कद्र करते हैं… -
आसमान की ऊंचाई
पैर जमीं पर ही रहने दो मेरे
क्योंकि अक्सर आसमान की
ऊंचाइयों से अपने दिखाई नहीं पड़ते… -
साँसें
थोड़ी देर के लिए थम गई थीं साँसें
जब रुक गया था वो चलते-चलते,
मुड़कर देखा एक बार जब उसने
हम सहम गये और मध्यम हो गई साँसें. -
हंसते हंसते
कोई उसे जान से भी ज्यादा चाहा था किसी बेवफा को।
उसने पल में ही तोड़ दिए सपने हंसते हंसते किसी को।। -
मुझे यह गम नहीं
ए मेरे दोस्त मुझे यह गम नहीं कि तुम मेरे न हो सके,
गम तो इस बात की है कि तुम मुझे कभी समझ न सके। -
“दिल का देवता”
यूं देखकर भी क्यों
अनजान बनते होदेवता हो दिल के
क्यों हैवान बनते होमैं जानती हूँ तुम क्या हो
क्यूं सबके सामने महान बनते हो.. -
वो कतराने लगे हैं
वो हमसे कतराने लगें हैं
धीरे- धीरे दूर जाने लगे हैं
दिल में उनके जगह नहीं
बची है हमारे लिए,
तभी तो हमसे नजरें चुराने लगे हैं… -
थी जुस्तजू दिल को मगर…
रास्ते के पत्थर समझ के, ठोकर मार कर चले गए वो।
हम किनारे पे खड़े रहे, किसी के हो कर गुजर गए वो।। -
हाय रे किस्मत
खुद को जला के हम, अपनी प्यास कहाँ बुझा पाए।
समंदर भी मुझे देख कर , अपनी धारा बदलती जाए ।। -
“बाँहों का हार”
दीदार करके उसका
मैं पाक हो गई
मेरी मोहब्बत से
जिन्दगी आबाद हो गई
करता रहा वो
मेरे इजहार का इन्तजार
पर
मैं किसी और की बाँहों का हार हो गई..!! -
अब फुर्सत कहाँ
जाने क्या सोंचती रहती हूँ
बस उसके ही खयालों में
खोई रहती हूँ
जिन्दगी अब फुर्सत कहाँ
देती है
अपनी उलझनों में ही उलझी
रहती हूँ…