कोई दवा देता है, कोई देता ज़हर
किसपे करे एतमाद, नहीं खबर
कौन अपना यहां, कौन पराया
सारा जहां है अपना, पराया शहर
Tag: संपादक की पसंद
संपादक की पसंद
-
पराया शहर
-
“कभी यूं भी आ”!!
गज़ल =”कभी यूं भी आ”
——————————–
कभी यूं भी आ मेरी आंख में
मेरी नजर को खबर ना हो,
मुझे एक रात नवाज दे कि
फिर ‘शहर'(सुबह) ना।अंशुमाली में तेरी ही आरजू रहती है
मिल जाए जन्नत की उम्र हुकूमत,
फिर भी तेरी ही आरजू रहती है।
कभी यूं भी आ मेरी आंख में,
मेरे अपनों को खबर ना हो।
मुझे एक रात नवाज दे,
कि फिर शहर (सुबह) ना।दास्तान ए मोहब्बत जब भी
सुनाती हूं किसी को,
सबकी आंखों में एक चमक
दिखाई देती है।
कोई देख ना ले तुझे मेरी आंखों में,
बस यही बात खटकती है।कभी यूं भी आ मेरी आंख में कि,
मेरे सपनों को खबर ना हो।
मुझे एक रात नवाज दे कि,
फिर शहर (सुबह) ना हो। -
गजल- मै ही अंदर था |
गजल- मै ही अंदर था |
बहर – मुजतस मुसम्मन मखमुन महजूफ
अरकान -मुफाएलुन फ़एलातुन मुफाएलुन फेलून
1212 1122 1212 22
काफिया – दर ,रदीफ़ – था
*************************************
ढूँढना उसे कहा जिधर देखो उसी का मंजर था |
जब कुए मे झांक कर देखा तो मै ही अंदर था |
नजर उठा कर देखो हर तरफ उसी का नजारा है |
करके सजदा देखा दीदार उसका कितना सुंदर था |
दिखता नहीं वो गर लगा लिया चशमा बुराई का |
दिल से पुकार देखा उमड़ता प्यार का संन्दर था |
चाहत नफरत मोहब्बत सब उसी का बदला रूप |
जिसने जितना चाहा उसे वही मस्त कलंदर था |
मीरा का श्याम रुक्कमनी सत्यभामा कृष्ण कहो |
गोप गोपिया ही नहीं कान्हा राधा का दिलवर था |
मंदिर मस्जिद या गिरिजा गुरुद्वारा मे ढूंढो उसे |
दिल से मानो खुदा वरना पड़ा रास्ते का पत्थर था |
आई जो मुसीबत क्यो इतना घबराते भारती तुम |
हाथ दोनों उठाकर जो पुकारा वही हमारा रहबर था |श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
भोजपुरी गीत- ई संसार ना मिली |
विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक बधाई |
भोजपुरी गीत- ई संसार ना मिली |
बचावा तनी धरती माई मौका फिर तोहार ना मिली |
मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
केतना सुखवा चाही मिली छहवा कहा राही |
लगावा पेडवा हम कही ठिकाना ना कही |
जनवा बचावेके कही जोगाड़ ना मिली |
मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
कबो आवे बाढ़ तूफनवा बरसे बिन मौसम सवनवा |
कही तरसे पानी परनवा धधके कही अगिया बनवा |
भिंगावे मनवा अइसन कबों फुहार ना मिली |
मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
कही गरमिया जान सुखावे कही जड़वा हाड़ कंपावे |
सुख गईले ताल तलैया मर गइली चील चिरईया |
चूक गईला फिर मौका दुबार ना मिली |
मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |
काटी काटी पेड़ के तनवा बन गइले महल भवनवा |
उखाड़ फुखाड़ पर्वत बनवा लउके सगरो शमशनवा|
बीजरी बरखा के कबों टंकार ना मिली |
मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |कुपित भईली प्रकृति महारानी ,
आइल सुनामी लेके प्रलय तूफानी |
देखा दुनिया के बिगड़ल कहानी |
धरती बचावा ना करा मनमानी |
फिर भारती कर जोरी पुकार ना मिली |
मिटावा जनी सुनर अइसन ई संसार ना मिली |श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
याद हैं वो गुजरे जमाने!!
याद हैं वो गुजरे जमाने
तुमको?
जब प्रीत से बढ़कर
और कुछ भी न था।याद हैं वो गुलिस्ता मुझको
जहाँ तेरे और मेरे सिवा
कुछ भी न था।कुछ दूर खड़े तुम थे
कुछ दूर खड़े हम थे,
याद है क्या तुमको
मेरी बाँहों में आना?आज़ादियां कहां अब
तेरे मेरे मिलन की,
तेरा नज़र उठाना
मेरा नज़र झुकाना।बरसात की वो बूंदें
और तेरा भीग जाना,
तेरे ही दम से खुश था
मेरे दिल का आशियाना। -
ज़िन्दगी के भंवर में….
किस्मत से डरी हुई हूँ मैं
ज़िन्दगी के भंवर में
फंसी हुई हूँ मैं ….तेरी स्मृतियों की दासी हूँ
हालतों की दुविधा से
सहमी हुई हूँ मैं …..गमों की आंधियों ने
झकझोर दिया है जीवन
याद ही नहीं है मुझे
आखरी बार कब हँसी हूँ मैं?….मेरे परिजनों ने खुद से
बाँधे रखा है मुझको
पता ही नहीं चला
कब बड़ी हुई हूँ मैं…. -
🌲🌲दरख़्तों सी जिंदगी🌲🌲
🌴🌴दरख्तों सी है ज़िन्दगी अपनी🌴🌴
कभी हर साख पर हैं पत्तियां
टूटती….लहराती….
और मिट्टी में मिल जाती….
🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂
कभी हर शाख पर गुल खिलता है
कभी हर शाख वीरान सी नज़र आती है
जिसकी हर एक शाख मृत है……
🍁🍁🍁🍁🍁
🌲🌲बसंत ऋतु आते ही जिसकी हर शाख🌲🌲
पत्तियों से हरी-भरी हो जाती है
जीवंत हो उठता है दरख़्ते का जर्रा जर्रा
जैसें यौवन अंगड़ाइयां ले रहा हो…..
💃💃💃💃💃💃💃
पतझड़ आते ही मानो किसी ने
लूट लिया हो, किसी सुंदरी के अलंकारों को
और विरह की वेदना में व्यथित होकर
वह साज श्रृंगार करना छोड़ चुकी हो…..
🧟♀️🧟♀️🧟♀️🧟♀️🧟♀️🧟♀️🧟♀️🌹🌹ऐसी ही है जिंदगी “प्रज्ञा”🌹🌹
जो कभी फूल के जैसे खिल उठती हैं
तो कभी काँटो-सी सूख जाया करती है…..
🤦♀️🤦♀️🤦♀️🤦♀️🤦♀️🤦♀️🤦♀️🤦♀️ -
“रिश्तों की पौध”
तुम्हारी हर एक बात सही है….
वक्त का पता तो चलता ही नहीं है
अपनों के साथ,
पर अपनों का पता चल जाता है वक्त के साथ।
मगर ए हमदम!
अपनों के प्रति ऐसी संवेदनाएं रखना,
अच्छी बात नहीं होती।
अपनों को अपना बनाने के लिए,
प्रेम की रसधार से सीचना पड़ता है।
“रिश्तों की पौध”को।। -
चाँद
चाँद में दाग है सबने जाना,
उसकी खूबसूरती को सबने माना,
खूसूरती का रहस्य किसी ने न जाना?
बादलों का आना चमकने से रोकना,
दूसरे पल रोशनी को भू तक पहुंचाना,
सेवा भाव को किसी ने न जाना l
दिवा में कहीं खो जाना,
एकाग्रता से शाम का इन्तजार,
दृढ़ मन को किसने जाना l
अपनी राह में चलना,
गती को बरकरार रखना,
कार्य निष्ठा को किसी ने न जाना l
भास्कर की परिक्रमा,
राह से न भटकना,
भक्तिभाव को किसी ने न जाना l
कार्यभाव में लीन,
चाँद को खूबसूरत बनाता,
रहस्य को किसी ने न जाना l -
क्या दूं उस सरकारी अफ़सर को
क्या दूं उस सरकारी अफ़सर को?
जो मांग रहा है हजार का हर्जाना
मेरी दो सो की दिहाड़ी से -
गूंजती फ़िजाओ में
गूंजती फ़िजाओ में रंग कितनें बिखरे हैं
और रेशम के धागे भी उलझे हैं,
कितनी मशरूफ है ज़िन्दगी अपनी
हम भी उलझे हैं वो भी उलझे हैं । -
अधूरी सी नज़्म
गीत बनकर तुम्हारी जिंदगी में आई थी
एक रोज ……..
गजल बनकर तुम्हारी
ज़िंदगी बन गई।और रुबाई बनकर
आंखें भिगोई तुम्हारी…एक दिन ख्वाब बनकर तुम्हारे
सपनों के खटखटाने लगी दरवाजे
और जगाने लगी तुम्हें रातों को….नींद में भी तुम मुझे ही ढूंढते थे
और मेरे ही खयालों में खोए रहते थे….पर न जाने किसकी नजर
हमारे प्यार को लग गई?तुम तुम ना रहे और
हमारी जरूरत भी ना रही…और मैं अधूरी सी एक नज़्म
बनकर रह गई…. -
रो लेता हूँ
इस बंजर-सी धरती पर कुछ अश्कों के बीज बो लेता हूँ।
जब जब तुहारी याद आती है तो छुप छुप के रो लेता हूँ।। -
दीवाने
तलाशी जिस्म की खुलेआम दे दी।
सब दिखाया पर दिल दिखाया नहीं।ढूढ़ते रहे हार के लौटना पड़ा सबको,
जब हाथ लगाया दिल धड़काया नहीं।ढूंढते ढूंढते रात दिन हाथ से निकले,
रूह में रहे वो हम ही को बताया नहीं।सबके सामने खुले आम जीते रहे हम,
हमने तो सच किसी से छिपाया नहीं।उनकी यादों में दीवाने हुए इस कदर,
आँखों को भिगाया राही सुखाया नहीं।राही अंजाना
-
इश्क के दो पन्ने
इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी
तुम्हारी याद में रात भर मैं भी जागूंगी।
——————————
प्रीत की चादर ओढ़ कर
अंबर के तले,
तेरे सपने मैं भी बुनूँगी
इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी।
—————————-
कल्पना के दरिया में तैर कर
रेत का चंदन बदन पर,
मैं भी मलूंगी
इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी।
——————————–
तुम से हार जाऊंगी
उसी को जीत मानूंगी,
तुम्हारी जीत में ही
मैं खुद को विजयी बनाऊंगी
इस तरह इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी। -
जब हमें तुम याद आये रात भर
जब हमें तुम याद आये रात भर
आंसुओं ने ग़म बहाये रात भर।ख़्वाब कितने ही सजाये रात भर
जिनको चाहा वो न आये रात भर।एक सूरज ढल गया जब शाम को
चांद तारे मुस्कुराये रात भर।कल मुझे इक फूल पन्नों में मिला
दिन पुराने याद आये रात भर।जिनके प्रियतम दूर थे परदेस में
चांदनी ने दिल जलाये रात भर।कहते हैं जो किस्मतों का खेल है
ख़्वाब उनको क्यों जगाये रात भर। -
भाग्य विधाता लोकतंत्र के
कितनी ही मेहनत करके दो जून रोटियां पाते हैं
भाग्य विधाता लोकतंत्र के सड़कों पर रात बिताते हैं।अफ़सोस नहीं हो रहा उन्हें जो कद्दावर बन बैठे
इन्हीं के पोषित देश भूमि के जो सत्ताधर बन बैठे
इन मक्कारों के खेल में हिंदुस्तानी ऐसे ही रह जाते हैं।
भाग्य विधाता…………..।अट्टहास आकाश कर रहा, धरती धारण दुख करती
यह पवन छूकर ज़ख्मों को और अधिक पीड़ा भरती
इस दुख से दो मुक्ति हमें हे देव! तुम्हें बुलाते हैं।
भाग्य विधाता……………….।महिमा मंडित मत करो तुम अपने कामों के नाम को
दिग्भ्रमित मत करो तुम, सीधी-सादी आवाम को
अपनी भूमि अपना राजा हाय फिर भी दुख पाते हैं
भाग्य विधाता…………….।दुष्टों की चीखों से जब गूंजा धरती आसमान
धारण किया था तब तुमने ही रणचंडी का रूप महान
आज देश के क्रांतिवीरों तुम्हें शक्ति याद दिलाते हैं
भाग्य विधाता………………। -
भारती
भारत माता
सुनो वीरों की कहानी,
अपनो का जो हुए शिकार l
कालापानी सावरकर को मिला,
हृदय तोड़ने वाला दर्द मिला l
सहम उठा दिल मेरा,
अनूठा देश प्रेम जो देखा l
मन विभोर हो उठा,
इतिहास के बदले स्वरूप जो देखा l
सपूतों से इतिहास ने साजिश रचा,
मै कुछ ना कर पाया, कुछ न कर पाया ll
सुभाष का क्या बोलूँ ,
मेरे लिए दरदर भटकते रहा l
पराक्रम से दुश्मनों को धूल चटाया,
आजादी का पहला तिरंगा लहराया l
उसे भी अपनो का धोखा मिला,
इतिहास तो छोड़ो भारतीय मुद्रा ने भी साजिश रचा l
लक्ष्मीवाई, राणा प्रताप जैसे वीरांगना,
दुश्मनों के हलक से कलेजे निकाले l
आजाद, खुदीराम जैसी वीरों ने अंग्रेजो के नींव हिलाए,
इन वीरों के नाम साजिश के काल मे समाए l
मै कुछ ना कर पाया, मै कुछ न कर पाया ll
एक लाल ने मुझे दोबारा खंडित होने से बचाया,
विडम्बना देखो मेरा लाल देशद्रोही कहलाया l
जो मेरे टुकड़े किए, वो राष्ट्रपिता कहलाया,
साजिशकर्ता देश का बागडोर संभाला l
पर मेरे लाल को तो मुझसे प्यार था,
न की इतिहास, न ही राजपाट से l
दिल में राष्ट्रभक्ति समाहित था l
दिल में राष्ट्रभक्ति समाहित था ll -
क्या कहूँ!! ओ ज़ालिम
क्या कहूँ!!
दिल में कितनी उदासी छाई है,
तेरी बेरुखी मेरी जान पर बन आयी है।
————————————
मैं एक गुमशुदा सी शाम हूँ और,
तू मेरी रुसवाई है।
——-‐———–‐—————-
इन तूफानों के आगे,
दिल में मीलों की खाईं है।
————————————
समझ नहीं पाती हूँ मैं कभी-कभी,
ये तेरी मोहब्बत है या बेवफाई है।
————————————-
मेरे अश्कों से तेरा दिल नहीं पिघलता,
ओ ज़ालिम! तू कितना हरजाई है।
————————————– -
छोटी बहन
सुने घर में फिर बाजी किलकारी
आंगन में पायल छनकारी
टुकुर टुकुर देख
आ रही छोटी बहन प्यारीसामने उसको पाए
सारे दुःख दूर हो जाये
जब भी वो मुस्कुराये
खुशियों की लहर है आयेफिर आयी खुशिया जो थी थमी
आगई घर की लक्ष्मी
बढ़ाई घर की रौनक
जिसकी थी कमीतेरी मुस्कान पे दुनिया तेरे नाम हो जाये
तू रोये तो पूरा घर है हिल जाये
तुझको देख मिल जाती है खुशिया सारी
मेरी बहन है प्यारीहिमांशु के कलम की जुबानी
-
”मेरा भोला प्रियतम”
”मेरा भोला प्रियतम”
जिनकी नज़रों से ललित कलाएं निकलती हैं,
अधरों पर राग अंगड़ाइयां लेते हैं।
केशों से बसंत दुग्ध पान करती है,
और रात अठखेलियां करती है जिनसे।
जिनकी एक चितवन मात्र से,
बिजलियां चमकने लगती हैं ।
अनगिनत दीप जल उठते हैं,
जिनके लावण्य की माधुरी से ।
विस्मय हो उठती हैं किरणें,
जिनकी अगाध छटा से।
प्रकृति मांगती है सौंदर्य जिनसे
ऐसा है ‘मेरा भोला प्रियतम’ । -
दादी माँ
आज दादी की बहुत याद आई!
वो बेचैन आत्मा ना जाने कहाँ
घूमती होगी….
ब्रह्मांड के किन कोनों से
गुजरती होगी…
कोई नहीं जानता…
जब मैं भूखी होती थी
तो दादी मां अपने हाथों से
खाना बनाती थी…
और पूरे परिवार को
हंसी-खुशी खिलाती थी…
वह दादी मां
आज बहुत याद आ रही है…
न जाने कहां ब्रह्मांड के किन
कोनों से टकराकर…
गुजरती होगी उसकी आत्मा
न जाने कहां होगी मेरी दादी मां..
शायद मुझे देख रही होगी..
और मुझे सुन रही होगी.. -
प्रकृति और पर्यावरण
प्रकृति और पर्यावरण
मानव आज हो रहा है, आज स्वार्थ प्रधान
प्रकृति और पर्यावरण का, नहीं है किसी को ध्यान
प्रकृति ही देती है सबको, सुरक्षा और जीवन दान
उसकी कृपा से ही, चहकता है सारा जहां
जल, वायु, सूर्य, अग्नि व भूमि है बड़े महान
जो देते हैं प्रतिदिन, सृष्टि को नया जीवन दानबरसात आती है समय पर, भर जाती है भंडार
अन्न फल-फूल कंद, यह सब दे जाती है उपहार
नदी, सरोवर व बाग, नव जीवन के है आधार
जो मानव जाति पर , सदा करते हैं उपकार
वर्षा के बादल देख , होती है खुशी अपार
सबको देती तृप्ति , नित वर्षा अपरम्पारभारत में ऋतु चक्र से ही, रहती हैं हर आस
कृषि पर ही निर्भर है, सबका आर्थिक विकास
जीवन को रोज सजाते हैं, धरती और आकाश
इससे ही रहा है , सबका उनसे रिश्ता खास
धरती देती है, सबको सुख-सुविधा और आवास
इससे जन-जन को है, उस पर अटूट विश्वासनदी सरोवर मानव मन, खेत और खलिहान
प्रकृति से ही मिलता है, सदा मनमाना वरदान
प्रकृति और पर्यावरण का है, सदियों से एहसान
प्रकृति की रक्षा करें, इस कर्त्तव्य को लो तुम ठान
पेड़-पौधे लगाकर फिर से, महकाएं सारा हिंदुस्तान
“प्रकृति और पर्यावरण” , ही है सच में भगवान।रचयिता- प्रकाश कुमार खोवाल (अध्यापक) जिला-सीकर (राजस्थान)
-
जिंदगी
जिंदगी
ये मेरी जिंदगी मुझे क्या से क्या बना दिया।
इस लाकडाउन में जीना मरना सिखा दिया।।उम्र में पहली बार सुकून के पल दे दिया ।
परिवार के संग हंसने खेलने का वक्त दे दिया।।मुसीबत को अपना ढाल बनाकर कर जीना सीखों ।
गरिबों को रोटी का निवाला ये हमदर्द तुम देना सीखों।।ये बला कट जायेगा धीरे धीरे सम्भलना सीखों ।
करके शुक्रिया वीर योद्धा का तुम लड़ना सीखों।।कैसे शुक्रगुजार करूं मैं तेरा ये खुबसूरत जिंदगी।
कैद पशु पक्षी के जीवन को दे दिया नया जिंदगी।।प्रकृति के झोंके से खिल रहा मदमस्त ये जिंदगी ।
फिज़ा में बिखेर कर खुशबू दे दिया इंसा को जिंदगी।।एक एक बात समझ में आया अब मुझको।
वक्त की मार ने सबक सिखाया है सबको ।।अमीरी गरिबी की फर्क नहीं अब शायद तुझको ।
वक्त के काल को समझ कर नमन करो तुम सबको।।महेश गुप्ता जौनपुरी
-
सुनो गाँव ! अब परदेश ना जाना
आयी विपदा न कोई सहाय हुआ
छूटा रोजगार बहुत बुरा हाल हुआ
तुम्हारा कष्ट भी किसी ने न जाना
पसीने से सींचा जिन शहरों को…
किसी ने तनिक एहसान न माना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।।छोड़ आये थे तुम जिसे एक दिन
आयी फिर उस गाँव-घर की याद
पश्चाताप की इस कठिन घड़ी में
न ही तेरा कोई हुआ सहाय…
गाँव का सफ़र पैदल पड़ा नापना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।।तुम गाँव मे रहकर मेहनत खूब कर लेना
परिवार का भरण पोषण भी कर लेना
मन हो भ्रमित तो याद फिर…
खूब उन विपदा के पलों को कर लेना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।
सुनो गाँव!अब परदेश न जाना।। -
चितेरा
ज़िन्दगी की राहों का
है ये कौन चितेरा,
धूमिल -धूमिल गलियारों में
है करता कौन सवेरा।घनघोर घटा से केशों
पर डोले मुग्ध पपीहा,
किसने उपवन रंगीन किया
है ये कौन चितेरा।अलि मंडराते पुष्पों पर
है किसने रंग बिखेरा,
रति के यौवन से भी सुंदर
लगता है आज सवेरा।विरह की वेदना से जलता है
‘प्रज्ञा’ का जीवन डेरा,
अब हर रात अमावस की
मुट्ठी में बंद सवेरा।।
कवयित्री:-
प्रज्ञा शुक्ला -
दोस्ती
कभी बुलाये प्यार से
कभी बुलाये मजाक से
ज़िन्दगी की हर घडी ये साथ देती है
दोस्ती होती ही ऐसी हैदिल होवे गम में
तो ये बात करे नरम में
छोटी ख़ुशी में भी
पार्टी मांगे जमके
मूड चाहे जैसा हो ये मज़ाक करती है
दोस्ती होती ही ऐसी हैकिसी से हुई मारपीट हो
किसी ने कर दिया चीट हो
ये उसको भी पछाड़ देती है
दोस्ती होती ही ऐसी हैये ना बुलाये कभी नाम से
दूसरा उड़ाए मजाक तो
गया वो काम से
हर बात में ये पास होती है
दोस्ती होती ही ऐसी हैदोस्ती की रीत तो पुरखो से चली आयी है
विभीषण जैसा मित्र पाकर श्री राम ने रावण पर विजय पायी है
दोस्त हर वादा निभाता पूरा है
दोस्त ही नहीं तो जीवन अधूरा है
परिवार भेजे सही राह पे तो मंज़िल ये पहुँचती है
दोस्ती होती ही ऐसी हैहिमांशु के कलम की जुबानी
-
द्रोपदी
जिसका जन्म हुआ यज्ञ
की प्रज्वलित अग्नि से
जो द्रुपद की पुत्री कहलाई
फूलों की नर्म सेज पर सोई
एक दिन हुई पराई
जिसके स्वयंवर में स्वयं
कृष्ण जी आये
वनवासी अर्जुन ही
मछली की आँख भेद पाये
अति सुन्दर द्रोपदी को लेकर
कुन्ती के पास ले आये
कुन्ती की आज्ञा से द्रोपदी
पाँच भाईयों की भार्या हो गई
और जगत में पान्चाली
कहलाई
जुये में पत्नी को हारे
धर्मराज युधिष्ठिर
सबके बीच में वह
अपमानित हुई बेचारी
कृष्ण जी ने एक-एक धागे
का मूल्य चुकाया
पाण्डु कुलवधू की
भरी सभा में लाज़ बचाई
अपमान का घूँट पीकर
द्रोपदी ने प्रतिज्ञा ली
नित खुले रहेगे केश
जब तक प्रतिशोध ना लूंगी
दु:शासन की छाती के
लहू से अपने
कलंकित केश धुलूँगी
नारी जाति की साहसी वीरांगना
थी द्रोपदी
जिसे महाभारत का उत्तरदाई
आज भी है ठहराया जाता
परंतु वह नारी तो
अति सम्माननीय थी
जो सदा घृणा से देखी जाती रही है । -
सावित्री वट पूजा
हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई ।
सावित्री पूजा,कईसे पूजई जाई?
बरगद की डाढ़ मगाई या फिरी,
बरगद के नीचे जाई।
हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई ।
चारि बजे ते पुलिस लागि हई ,
पूजा कईसे करि पाई।
हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई ।
साज-श्रिगार सबई करि बईठेन ,
फेरा कईसे लगाई।
हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई । -
सोचा था जो वो पुरा ना हो सका
सोचा था जो वो पुरा ना हो सका
बदलते हालात को देख मैं अपना ना हो सका
आंखों के आंसूओं को मैं अपने पोंछ ना सका
टुटते बिखरते देखता रहा मैं कुछ कर ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सकाबदलते काल चक्र में मैं किसी का ना हो सका
रिस्तें पर दाग लगाकर मैं खुद का ना हो सका
ख्वाहिशों को मैं अपने रूसवा मैं कर ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सकाअरमानों को मैं ढ़ोता रहा उड़ान दे ना सका
अपने अन्दर के इच्छाओं को मैं खो ना सका
आश लगाए बैठा रहा मैं कुछ कर ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सकामहामारी के काल में मैं खामोश रह ना सका
आवाज़ उठाता रहा लेकिन मैं पलायन रोक ना सका
मजदूरों का दर्द देखकर मैं सह ना सका
सोचा था जो वो मेरा सपना पुरा ना हो सकामहेश गुप्ता जौनपुरी
-
कलम में स्याही
नि:शब्द हूँ निस्तेज मैं
मस्तिष्क के आवेश में
शब्द भारी पड़ रहे
कलम की स्याही से
नित यह कह रहे
ना उल्लिखित कर पाऊँगा
मैं तेरे भाव को
ना प्रकट मैं कर पाऊँगा
तो मैं क्यूँ लिखूं
मैं क्यूँ रखूँ अब
अपने कलम में स्याही?? -
श्री राम
कथा सुनाऊ पुरुषोत्तम श्री राम की
विष्णु रूपी अयोध्या पति नाथ की
त्रेता युग में जनम हुआ
राजा दशरथ के महल में
अयोध्या हुआ पूरा चहल पहल मेंसुमित्रा से जनम हुआ लक्ष्मण और शत्रुघ्न का
जनम हुआ कैकेयी पुत्र भरत का
खुशियों की लहर उठी
आये भाई श्री राम केग्रंथो का ज्ञान मिला गुरु वशिस्ठ की कृपा से
शास्त्रों का ज्ञान मिला गुरु विश्वामित्र की दया सेआयी घडी खुशियों की
सबका जीवन सफल है हो गया
राम का सीता से मिलन हो गया
विधाता ने इस सुन्दर जोड़ी को है जोड़ दिया
सीता के लिए श्री राम ने शिव धानुष है तोड़ दियामंथरा ने शब्द भरे केकयी के कान में
भरत बने युवराज और राम जाये वन में
भरत ने ठुकराई बात
रखी पादुका श्री राम की सिंघासन पे
चौदह साल के लिए चल दिये श्री राम लक्ष्मण और सीता वन मेंमर्यादा मन में है पाले
वस्त्र धारी वल्कल वाले
जनकनन्दिनी का संगी।
सेवक जिसका बजरंगी।था व्यभिचारी, वामाचारी।
वो रावण बड़ा अहंकारी
लाकर उसको पंचवटी।
मन में हर्षाया कपटीमिथ्यावादी फैलाकर जाल
बुला बैठा लंका में काल
कमल नयन फूटी ज्वाला
महापाप रावण ने कर डालादानव बोला अंत में
जो विजय पताका नाम है
वो राम है , वो राम हैइंसा में बसा भगवान है
शत्रु को क्षमादान है
सर्वाधिक दयावान है
मर्यादा की पहचान है
नर नारी का सम्मान है
हिंदुत्व का अभिमान हैहिमांशु के कलम की जुबानी
-
अन्नदाता की व्यथा
“अन्नदाता की व्यथा ”
टुकड़े-टुकड़े हुई मेदिनी , कैसी ये लाचारी है ।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।शीश पकड़ बैठा किसान है , प्रश्न हजारों साल रहे ।
कैसे अन्न उगाऊँ मैं यदि , सूखे जैसे हाल रहे ।
बिन बरसे ही मेघ सिधारे , प्यासी धरा हमारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।कर्जदार था पहले से ही , धरती माता रूठ गई ।
कैसे मैं परिवार चलाऊँ , आस अन्न की टूट गई ।
व्यथा वंश की शूल चुभाए , भार हृदय पर भारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।जल बिन जीवन हुआ असंभव , चमत्कार विधिना कर दे ।
कहीं पेड़ से लटक न जाऊँ , खेतों में पानी भर दे ।
पानी लेकर अन्न दान दूँ , उतरे सभी उधारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।करुण पुकार न पहुँची उस तक , जो जग का पालनहारा ।
समाधान जब नहीं हुआ तो , तरुवर पर फंदा डारा ।
झूल गया यूँ कृषक निशा में , गृह में सुता कुंवारी है ।।
ऐसे उजड़े खेत कि जैसे , कोई विधवा नारी है ।
✍ माया अग्रवाल
👉 विशाखापट्टनम -
कोरोना
चंद लम्हो की ज़िन्दगी में अब और क्या- क्या होना है
ब्रष्टाचार क्या कम था जो आगया कोरोना है
गरीब खा रहे मांगके और अमीरो के पास सोना है
मिडिल क्लास की किस्मत में तो रोना ही रोना है
इस परेशानी में पूरा जाहां है रो दिया
कितनो ने अपने परिवार को है खो दिया
सारे देशो में ये लॉकडाउन है शुरू हो गए
जो जहा थे वो वही है रुक गए
घर जाते वक़्त कुछ रस्ते में ही मर गए
और घरवाले है की घर में बैठे बैठे थक गए
फिर भी इरादों में कमी नहीं लाएंगे
नियम पालन कर इसको हम हराएंगे
विदेशी को छोड़ अपनी संस्कृति अपनाएंगे
जोड़ लेंगे हाथ पर हाथ नहीं मिलाएंगे
वक़्त- वक़्त पर हाथ हम धोते जायेंगे
बहार जाते वक़्त मास्क पहन जायेंगे
किसी अज्ञात चीज़ को हाथ नहीं लगाएंगे
सुनो डॉक्टर, पुलिस तुमसे कुछ कह रहे
बहार रहकर सबकी रक्षा है ये कर रहे
अपनी जानपर खेलकर इस बीमारी से लड़ रहे
निकलो मत घर से सबको है ये कह रहे
बरतो सावधानी डरो मत सबको ये बता रहे
पूरी कोशिश करके बीमारी को जड़ से है ये मिटा रहे
यह सुनके पूरा देश बोले आज
में भी इनका साथ दूंगा
ये जो बोले उस नियम का पालन करूँगा
रहकर घर पे अपनी और अपने देश वासियो की रक्षा करूँगा
हम देश वासियो को अब साथ मिलकर चलना है
चंद लम्हो की ज़िन्दगी में अब और क्या- क्या होना है -
गांव याद आये
“गाँव याद आये”
**************हमें क्या पता आज,ये दिन देखना पड़ेगा |
न जाने कैसी मजाक,आज तूने किया है ||हँसते हुए निकले घर से,भूख मिटाने सभी |
गाँव घर ये आँगन,छोड़ चार पैसा कमाने ||दूर तलक परदेश,सभी हर कोने-कोने गए |
खेत खलिहान ले याद,बूढ़ी अम्मा की प्यार |काम की धुन काम करता,कोई चलता गया |
मजबूरी मे हमें आज,मजदूरी दूर करना पड़ा ||घोर अंधियारा छाए,ये काली रात आज कैसी |
पसंद न आए तुझे हम,मजदूरों की ये मजबूरी ||बच्चे बिलखतेअम्मा,बोझा लिए नंगे पाँव चली |
बाबुल भूख से कुम्हलाए,जिम्मेदारी लिए हुए ||पैरो में छाले पड़े है,डगर आज चलते चलते |
नीर को तरसे ये,रोटी बिखरे हुए पथ में पड़ी ||प्राण गवांते हम पथ में,मंजिल तलाश करते |
रहम कर परवरदिगार,गाँव अब याद आया है || -
वहि घरका ना जाउ कबहुँ
वहि घरका ना जाउ कबहुं
जहां ना होइ सम्मान
नीके जहां कोइ नाइ मिलइ
हुंआँ जाइते हइ अपमान
रूखी-सुखी खाइ लेउ
बढ़िया व्यंजन छोड़ि
प्रेम की छूड़ी रोटी
छप्पनभोग सि बढ़िया होइ
आधी राति का आवेते
घरवाली होति हइ दिक्क
तउ जल्दी घर जावै लगउ
नइ रातिक होई खिटि-पिट्टी । -
भोजपुरी देवी गीत –फेरिहा ये मइया |
भोजपुरी देवी गीत –फेरिहा ये मइया |
नजरिया तनी हमरो पर फेरिहा ये मइया |
सुधिया तनी हमरो आज लिहा ये मइया |
सब के त दिहलु माई अन धन सोनवा |
अंधरन के अँखिया बाझिन के ललनवा |
चरनिया तनी डलतू हमरो टूटही मड़इया |
नजरिया तनी हमरो पर फेरिहा ये मइया |
परमहंस ठाकुर माई दरसन दिहलु |
कालीदास मूरख आँख अंजन कइलू |
भक्त रहशू माई भइलू तू सहइया |
नजरिया तनी हमरो पर फेरिहा ये मइया |
कलकता के काली माई महिमा महान हो |
तोहरे किरीपा से होला जगमग जहान हो |
कहीया लेबू माई अब तू हमरो खबरिया |
नजरिया तनी हमरो पर फेरिहा ये मइया |
छोडब ना चरनिया चाहे जान चली जाई |
धुरिया चरनिया माई मथवा लगाई |
डालीदा आपन भारती दया के चदरिया|
नजरिया तनी हमरो पर फेरिहा ये मइया |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
अजूबी बचपन
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है
बचपन की अजूबी कहानियों में खोना चाहता है
जीनी जो अलादिन की हर ख्वाहिश
मिनटों में पूरी कर देता था,
उसे फिर क्या हुक्म मेरे आका
कहते देखना चाहता है
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है
मोगली जो जंगल में बघीरा और बल्लू
के साथ हँसता खेलता था
उसे फिर शेरखान को पछाड़ते
देखना चाहता है
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है
हातिम जो पत्थर को इंसान बनाने
कालीन पर बैठ उड़ जाता था
उसे फिर कोई पहली सुलझाते
देखना चाहता है
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है
वो रंगोली वो चित्रहार वो पिक्चर फिल्म
का शेष भाग
फिर उसी दौर में जा के समेटना
चाहता है
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है
साबू जो जुपिटर से आया था, चाचा
चौधरी के घर में जो न समां पाया था
ऐसे ही और किरदारों
को फिर ढूंढना चाहता है
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है
तब मासूम थे अजूबी सी बातों पर भी
झट से यकीन कर लेते थे
आज समझदार हो कर भी दिल किसी
अजूबे की राह तकना चाहता है
आज दिल फिर बच्चा होना चाहता है….
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
-
नीम दादा
दादाओं के भी दादा थे
वो ना जाने
कितने युगों से
खड़े थे एक पाँव पर
अपने घर के पास।
खेल कबड्डी
गिल्ली डंडे
भाग भाग के
आँख मिचौनी
खेला करते
सदा हीं
उनके आस-पास।।
भूख लगी
होगी बच्चों कै
जान कुछ फल
फैला देते थे नीचे।
हम भी उन
विद्रुम सम फल
को चुन-चुन
बड़े चाव से
खा जाते
अँखियों को मीचे।।
एक दिन रोना
आया हम सबको
आँसू के धार
बहे पुरजोड़।
कारण कि
उनके ऊपर
क्रुर कपूत ने
आकर कुल्हाड़ी से
प्रहार बड़ी जोर।।
काट -काट के
कर के टुकड़े
सब ले गया
अपनी नजरों से दूर।
इस गलती
का हर्जाना
कौन भड़ेगा
अब सब
हो गए मजबूर।।
कीट कीटाणु
और विषाणु
फैल गया बिमारी बनकर।
‘विनयचंद ‘
नादान बनो मत
बृक्ष पितर की रक्षा
कर नित हितकारी बनकर।। -
भोजपुरी देवी गीत – होखत दरशनवा |
भोजपुरी देवी गीत – होखत दरशनवा |
मह मह महकत बा भवनवा |
कालिका जी के होखत दरशनवा|
सोनवा से साजल माई दरबार बा |
तोहरे खातिर छोड़ली घरबार बा |
बलका रोई बरसत बा नयनवा |
कालिका जी के होखत दरशनवा|
मह मह महके गरवा लाल अड़हुलवा |
चम चम चमके हथवा माई त्रिशूलवा |
जय जय जैकार गुंजत बा गगनवा |
कालिका जी के होखत दरशनवा|
लह लह लहके माइके चुनरिया |
चह चह चहके मेहँदी अंजोरिया |
झूमी भगता नाचत बा मगनवा |
कालिका जी के होखत दरशनवा|
माई के चरनिया सिर मथवा लगाई|
गाई गीतिया भारती मईया मनाई |
नाची नाची लोगवा गावत बा भजनवा |
कालिका जी के होखत दरशनवा |श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
घरवाली को बना खिलाओ
घर में ही बैठो और रहो मौन
ना करो किसी से झगड़ा
ना कोई कुतर्क
नहीं पड़ो किसी
प्रपंच में
यदि रहना है सुखी तो
बढ़ाओ अपनी
सहनशक्ति को
और बटाओ हाँथ
घर के काम में
कभी रसोईघर में भी हो आओ
कुछ कच्चा-पक्का
घरवाली को बना खिलाओ
मुफ्त में आर्डर मत मारो
जो भी मिल जाये
वो प्रेम सहित खालो
यदि नहीं करोगे ऐसा तो
तो महाभारत होनी है पक्की
लॉकडाउन को सुखी बनाने की
मेरी राय बहुत है अच्छी। -
दर्दनाक मन्ज़र
किसी का दम
निकलता है घर में
तो कोई सड़कों पर
मारा-मारा फिरता है
भूंख लगती है तो
सिर्फ प्यास बुझा लेता है
इतनी धूप में सब
घर में बैठे हैं
तो कोई सड़कों पर
पसीना बहाता फिरता है
कितना दर्दनाक है वो मन्ज़र
जब कोई मीलों का सफ़र
पैदल ही करता है -
दादी माँ
आंगन में बैठी एक टक निहार लेती है
चलती धीरे पर काम तेजी से कर लेती है
पढ़ना कम आता है पर दुनिया का पाठ पढ़ा देती है
डॉक्टर नहीं पर हर दर्द ठीक कर देती है
दादी माँ की बात ही निराली है
तुम्हे मिले सबसे ज्यादा इसलिए बादमे वो खाती है
तुम सो चैन से इसलिए बादमे वो सोती है
दिखा ख़ुशी का चेहरा अपने दुःख में अंदर ही अंदर रोती है
साक्षात् भगवन भी इनसे मार्ग दर्शन लेता है
सफल वो ही ज़िन्दगी में जो इनसे आशीर्वाद लेता है
चारो धाम का पुण्य मिले जो इनकी सेवा करता है
जो इनके साथ रहे वो किसी मुश्किल से नहीं डरता है
माँ का दर्जा ऊंचा है
पर इनका उनसे भी ऊँचा है
इनके बताने पर ही सही दिशा पर चलती दुनिया सारी है
दादी माँ की बात ही निराली हैहिमांशु के कलम की जुबानी
-
हम शायर है जनाब
चोट जो तुमने दिया उसका कोष बना देते है
हम शायर है जनाब हम बातों से नहीं सिर्फ दिल में समझ जाते हैमकबरे हमारे नहीं हम लोगों के बना जाते है
हम शायर है जनाब प्यार कर के देखो ता उम्र तुम्हें याद किए जाते हैइस खलिश मे ना जिओ की दुनिया क्या कहेगी मेरे प्यार पर
हम शायर है जनाब खुद के या औरों के प्यार पर हम जान दिए जाते हैबात मज़हब का हो या मादरे वतन का
प्यार के वास्ते हम जान हथेली पर रख कर घूमते है
हम शायर है जनाब प्यार कर के देखो हम आज़माइश ए वफ़ा किए फिरते है -
हिन्दी गीत- सुना घर परिवार बिना |
हिन्दी गीत- सुना घर परिवार बिना |
प्रिया प्रिय बिना देह हिय बिना |
नीर क्षीर बिना भोजन खीर बिना |
उत्सव उदास उपहार बिना |
सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना |
खेत अन्न बिना कोष धन बिना |
विचार मन बिना आचार बेद बिना |
कैसा रिस्ता ब्यवहार बिना |
सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना |
प्यार भाव बिना यार चाह बिना |
तलवार वार बिना सागर खार बिना |
डूबे नैया पतवार बिना |
सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना |
भाई बहन बिना संतान दमपत्ति बिना |
चलन रहन बिना दान संपत्ति बिना |
अतिथि अपमान सत्कार बिना |
सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना |
किलकारी बाल बिना कुल खानदान बिना |
ससुर दामाद बिना कन्या दान बिना |
लज्जित दुल्हन संसकार बिना |
सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना |
नईहर मात बिना नानी नात बिना|
पीहर पति बिना काम रति बिना |
बेबस बचपन पुचकार बिना |
सुना घर परिवार बिना ठौर कहा घरवार बिना |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
उठ भी जा ना
चल अब उठ भी जा ना
अभी कुछ काम नहीं फिर भी क्यों तू थकता है
मुश्किलों को देख के इतना क्यों डरता है
सिख कुछ सूरज , चाँद से
खुद वक़्त पे है आते
पुरे जहान में वक़्त पे रौशनी है फैलाते
अगर ये नहीं उठते वक़्त पे
तो कहा तू उठा करता
ना कही देख पाता सिर्फ सो जाया करता
चल अब उठ भी जा ना
सिख किसान , डॉक्टर , सैनिक से कुछ
कितनी मेहनत करता है
सब काम के बाद भी समय पे ये उठता है
मेहनत करने वाला ही चैन की नींद सोता है
अगर ये नहीं उठते वक़्त पे
तो ना कभी चैन से खाता और ना सो पाया करता
चल अब उठ भी जा ना
बुजर्गो से सीख कुछ
कितनी जल्दी उठ रहे
रिटायर्ड हो गए पर अपना काम कर रहे
जल्दी उठ कर ये पूजा पाठ कर रहे
अगर ये नहीं उठते वक़्त पे
तो तुझे कौन उठाया करता
खुद मेहनत कर तेरी चीज़े कौन लाया करता
तू जीवन के हर कदम पे सफल हो ये दुआ कौन किया करता
चल अब तो उठ जा ना -
मृत टहनियाँ
वो टहनियाँ जो हरे भरे पेड़ों
से लगे हो कर भी
सूखी रह जाती है
जिनपे न बौर आती है
न पात आती है
आज उन
मृत टहनियों को
उस पेड़ से
अलग कर दिया मैंने…
हरे पेड़ से लिपटे हो कर भी
वो सूखे जा रही थी
और इसी कुंठा में
उस पेड़ को ही
कीट बन खाए
जा रही थी
वो पेड़ जो उस टहनी को
जीवत रखने में
अपना अस्तित्व खोये
जा रहा था
ऊपर से खुश दिखता था
पर अन्दर उसे कुछ
होए जा रहा था
टहनी उस पेड़ की मनोदशा
को कभी समझ न पायी
अपनी चिंता में ही जीती रही
खुद कभी पेड़ के
काम न आ पाई
पेड़ कद में बड़ा होकर भी
स्वभाव से झुका रहता था
टहनी को नया जीवन
देने का निरंतर
प्रयास करता रहता था
एक दिन पेड़ अपनी जडें
देख घबरा गया
तब उसे ये मालूम चला के
उसका कोई अपना ही
उसे कीट बन के
खा गया
उसे टहनी के किये पे
भरोसा न हुआ
उसने झट पूछा टहनी से
पर टहनी को
ज़रा भी शर्म का
एहसास न हुआ
वो अपने सूखने का
दायित्व पेड़ पर
ठहरा रही थी
चोरी कर के भी
सीनाजोरी किये जा रही थी
पेड़ को घाव गहरा लगा था
जिस से वो छटपटा रहा था
स्वभाववश
टहनी को माफ़ कर
उसे फिर एक परिवार मानने
का मन बना रहा था
मुझसे ये देखा न गया
मैंने झट पेड़ को
ये बात समझाई
की टहनी कभी तुम्हारी
उदारता समझ न पाई
और अपनी चतुराई
के चलते खुद अपने
पैरों पर कुल्हाड़ी
मार आयी
बहुत अच्छा होता है
ऐसी टहनियों को
वख्त रहते छांटते रहना
फिर कभी मृत टहनियों
को जीवन देने की लालसा
में दर्द मोल न लेना
मेरी ये बात सुन पेड़
थोडा संभल गया
कुछ मुरझाया था
ज़रूर पर
ये सबक उसके दीमाग
में हमेशा के लिए
घर कर गया
उसकी हामी ले कर
पेड़ को
उन मृत टहनियों से
मुक्त कर दिया मैंने…
आज उन मृत टहनियों को
पेड़ से अलग कर
दिया मैंने ….
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
-
दिल तुम्हारी और
आज भी वो दिल तुम्हारी और जाता है
जो तुमने तोड़ दिया था
आज भी तुम्हारे गुण गाता है
जिसका मुँह चुप कर दिया था
आज भी तुम्हारी गलियों में रहता है
जिसको कही और छोड़ दिया था
ये दिल सब जनता है
पर कहा मानता है
ये आज भी तुम्हारी आवाज सुनना चाहता है
जिस से तुम बोलती नहीं
खूब समझाया पर माना नहीं
वो किसी की दिल लगी को सजा समझने लगे ,
दो पल रूत के गुज़ारे , तो जफ़ा समझने लगे
अपने दिल से बोला आ तुझे जोड़ देता हु
ज़िन्दगी के पहिये को ख़ुशी की और मोड़ देता हु
इस नर्क से तेरा नाता तोड़ देता हु
पर दिल को कहा समझ में आता है
आज भी वो दिल तुम्हारी और जाता हैहिमांशु की कलम जुबानी
-
मज़दूर हूँ
प्रस्तुत है
हाइकु विधा में कविता:-मजदूर हूँ
पैदल चल पड़ा
घर की ओरविपदा आयी
सबने छोड़ दिया
मौत की ओरआशावादी हूँ
खुद ही जीत लूँगा
यह युद्ध भीतुम कौन हो?
समाज या शासन
बोलो खुद हीबन निष्ठुर
हमे ढ़केल दिया
काल की ओर…!!5
7
5 -
गजल- भूख के मारे हुये है |
गजल- भूख के मारे हुये है |
भूख ले आई शहर हम भूख के मारे हुये है |
छोड़ चले शहर को हम भूख के सताये हुये है |
कोरोना के कहर ने बदल दी है जिंदगी मेरी |
वाइरस से पहले भूख की आग जलाए हुये है |
बड़े बेआबरू होकर निकले सफर जरिया नहीं |
जाये तो जाये किधर हम मंजिल भुलाए हुये है|
कटता नहीं ये सफर हुकूमत का पहरा बहुत है |
चलना हुआ दुशवार नहीं दिनो से खाये हुये है |
थम जाएगी कब सांस गाँव भी अपना दूर है |
पैदल सही दिल उम्मीद मंजिल जगाए हुये है |
भूख लाई थी शहर भूख लौटा ले जा रही हमे |
पास दाना न पानी जेब सुखी रोटी दबाये हुये है |
कब मिल पाएंगे हम अपनो से हमे क्या मालूम |
लड़खड़ाते कदमो हम उधर नजरे गड़ाए हुये है |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286