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संपादक की पसंद

  • “माँ मुझे विवाह नहीं करना”

    समाज में स्त्रियों की दशा देखकर
    मेरे मन में उठे विचार:-

    माँ मुझे विवाह नहीं करना।
    पति की परछाई बनकर,
    पति के पीछे-पीछे नहीं चलना।
    माँ मुझे विवाह नहीं करना।

    अपने कलेजे के टुकड़े(संतान) पर,
    पति का आधिपत्य स्थापित नहीं करना।
    माँ मुझे विवाह नहीं करना।

    परिजनों की दी पहचान मिटा,
    ससुराल की प्रथा नहीं बनना।
    माँ मुझे विवाह नहीं करना।

    अपनी लीक से हटकर,
    पति की डगर नहीं चुनना।
    माँ मुझे विवाह नहीं करना।

    अपने सपनों की रोशनी मिटा,
    अंधेरों में मुझे नहीं मिलना।
    माँ मुझे विवाह नहीं करना।

    खुद अपना अस्तित्व मिटा,
    सम्बंधों की बलि नहीं चढ़ना।
    माँ मुझे विवाह नहीं करना।

  • ख्वाहिशों के समंदर…

    तेरे-मेरे बीच में वो पहले जैसी बात नहीं रही।
    ना रही वो बातें, वो मुलाकात नहीं रही।
    ख्वाहिशों के समंदर पड़ गए सूखे-सूखे
    रीत में प्रीत में वो पहले जैसी बात नहीं रही।
    मुश्किलें अब सजा नहीं लगतीं
    ख्वाहिशों में भी वो पहले जैसी बात नहीं रही।
    गजब का फ़ितूर था हम दोनों के दर्मियां
    आफतों में अब पहले जैसी बात नहीं रही।
    आशियाना भी रास नहीं आता
    लोगों में वो पहले जैसी बात नहीं रही।

  • यादों का सृजन

    मेरी यादों के लम्हे
    चुन-चुन कर
    सृजन मत करो
    जिंदा लाश हूं मैं
    मेरे अर्थहीन शरीर से
    लगन मत करो
    बेनूर हो जाएंगी
    यह निगाहें
    जो अभी चमकती है
    भूल जाओ मुझे
    खुद को इस कदर
    मगन मत करो
    तुम्हारा रूप तुम्हारा रंग
    खुदा की अमानत है
    इसे मेरे लिए दफन मत करो
    उम्र भर तड़पोगे
    मेरी यादों का सृजन करके
    ऐसा जुल्म खुद से
    मेरे सजन मत करो।
    वीरेंद्र

  • पिताजी

    अपने सुख दुःख की पोटली को
    रख किनारे में
    हमारे सुख दुःख को
    अपना जीवन बनाया
    पिताजी ने ही हमे सब कुछ सिखाया

    कल तक चलना नहीं आता था
    चलना आपने सिखाया
    आज ज़िन्दगी की दौड़ में
    दौड़ रहा हूँ
    संभलना आपने सिखाया
    पिताजी ने हमे सब कुछ सिखाया

    कभी प्यार से
    कभी डांट के
    हमे सही गलत का मतलब बताया

    खाकर ठोकर
    रह ना जाये हमारा दिल कमजोर
    इस दिल मजबूत बनाया
    पिताजी ने हमे सब कुछ सिखाया

  • हृदय की वेदना

    हृदय की वेदना जब सीमा के पार हुई
    कोशिशें बहुत कीं कम करने की,
    पर वो शमशीर की धार हुई
    तब लेखनी चल पड़ी मेरी, दर्द कम करने के लिए
    दिल के जज्बातों को जब -जब किया बयां,
    एक कविता हर बार हुई

  • दिवस विशेष

    क्या माँ ने कभी विशेष दिन ही ममता लुटाया है।
    क्या माँ ने मात्र किसी खास दिन ही खिलाया है।

    क्या पिता ने कोई दिन देखकर जरूरतें पूरी की,
    या फिर केवल एक दिन सही गलत सिखाया है।

    इन्हें किसी एक दिन पूजना हमारी संस्कृति नहीं,
    फिर मात्र एक दिन ही विशेष किसने बनाया है।

    कैसी विडंबना है, हम कहने को तो आजाद हैं,
    परंतु पाश्चात्य सभ्यता ने हमें गुलाम बनाया है।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • कैसे कहूँ?

    कैसे कहूँ, किससे कहूं कि हाल ए दिल क्या है,
    रोना अकेले ही है अंजाम ए बयान क्या है।
    जब तक खुश रहती हूँ, लोगों की हंसी सुनाई देती है।
    जब दुखी होती हूँ बस अपनी चीख सुनाई देती है।
    बाते बहुत है पर डर लगता है कुछ कहने से,
    बहुत से किस्से हैं दिल के कोने में सहमे से।
    डर लगता है लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे मेरी बाते सुनकर।
    इसीलिए मैंने भी खुद को छुपा लिया कुछ किरदार चुनकर।
    खुदको खोने का डर भी सताता है,
    आइना भी अब किरदार ही दिखाता है।
    दुःख है भी तो बयान नही हो पाता है,
    किरदार मेरा दर्द छुपाना ही सिखाता है।
    पास हूं मैं बहुत से लोगों के, कुछ लोग मेरे लिए जरूरी हैं।
    पर किसी से कुछ न कह पाना पता नहीं कैसी मजबूरी है।

  • “मेरी कलम की धार”✍

    उठाई थी कलम कुछ अनसुलझे
    सवाल लिखने के लिए।
    अपने दिल के ज़ज्बात
    ना जाने कब लिखने लगी।
    लोग कहते हैं कि
    मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
    बस जितनी तकलीफें
    मिलती रहीं तुझसे,
    “मेरी कलम की धार”
    उतनी तेज चलने लगी।
    रूबरू होते गए हम
    तेरे दर्द से जितना
    मेरी आँखों से मोतियों की
    लड़ी झड़ने लगी।
    किस्से तो रोज सुनती थी
    इश्क, मोहब्बत के।
    पर ना जाने कब!
    मैं भी तुझसे प्यार करने लगी।
    रोका बहुत था मैंने अपने दिल को,
    पर तुझे देखते ही मैं तुझ पर मरने लगी।
    लोग कहते हैं कि
    मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
    पर मैं तो बस तेरा दिया हर दर्द लिखने लगी।

  • वह पहले जैसी बात नहीं

    क्यूँ आज सूरज हो गया निस्तेज
    वह पहले जैसी बात नहीं।
    हवा भी चल रही है मद्धम-मद्धम
    उसमें भी पहले जैसी बात नहीं।
    न जाने क्यों बेरुखी कर रहे हैं
    सब मौसम के साथ
    कोई भी तो नहीं दिखाई देता।
    हर गली कह रही है
    वह पहले जैसी बात नहीं।
    पहले तो यूं भीड़ उमड़ी रहती थी।
    हर गली नुक्कड़ पर लोगों की
    जमात लगी रहती थी।
    ऊपर वाले के एक फैसला से
    इतना आ गया फासला!
    रिश्तों में भी अब
    पहले जैसी बात नहीं।
    कितनी मायूसी छाई है चारों तरफ
    मेरा दिल कहता है यह कैसा मंजर आया है?
    जिसमें पहले जैसी बात नहीं।
    तुम भी तो कितना
    बदल गए हो वक्त के साथ
    तुम्हारे व्यवहार से भी तो जाहिर होता है।
    तुम में भी वह पहले जैसी बात नहीं।

  • विपक्ष की राजनीति

    विपक्ष की गंदी राजनीति, हक से बेशक करो।
    सैन्य बल कि शौर्यता पर, नाहक ना शक करो।

    जो तुम निशस्त्र वीरों को ज्ञान बाँट रहे।
    तुम्हारे पूर्वजों का बोया ही वह काट रहे।
    हाथ अब बंधे नहीं, आदेश की प्रतीक्षा नहीं,
    विजय तिलक से सजता अब ललाट रहे।
    वीरों की वीरता पर प्रश्न खड़े करने वालों को,
    उत्तर मिल जाए, विध्वंस इतना विनाशक करो।
    सैन्य बल कि शौर्यता पर, नाहक ना शक करो।
    विपक्ष की गंदी राजनीति, हक से बेशक करो।

    तुम्हारी कथनी-करनी मेल नहीं खाती है।
    झूठ और बस झूठ ही तुम्हारी थाती है।
    ज्ञात हमें, इसमें दोष कुछ तुम्हारा नहीं,
    शिशु वही सीखता, जो माँ उसे सिखाती है।
    इस विकट परिस्थिति में, पक्ष-विपक्ष भूलाकर,
    सेना का मनोबल बढ़े, बात ऐसी उद्देशक करो।
    सैन्य बल कि शौर्यता पर, नाहक ना शक करो।
    विपक्ष की गंदी राजनीति, हक से बेशक करो।

    वीरों की शहादत पर सियासत, कुछ तो शर्म करो।
    स्वयं पर गर्व हो, देशहित में कुछ ऐसा कर्म करो।।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • नमन 🙏

    जिनके नाम से दुश्मन
    थर थर कांपा करते है
    बलिदान हुए वीर जवानो को
    हम सब नमन करते है

    ये सच्चे देश भक्त है
    ऐसे नहीं जायेंगे
    दुश्मनो को
    अपनी रूह से भी हराएंगे

    देश को जगमगाये
    ये वो अमरदीप है
    देश के लिए मर मिटे
    ये वो शहीद है

    वो चले गए
    अब हमे उनकी राह पर चलना है
    उनकी तरह अपने देश के लिए कुछ करना है

    हमारी सुरक्षा के लिए
    सीमा पर तैनात ये रहते है
    सभी वीर जवानो को
    हम सब नमन करते है

    जय हिन्द 🙏

  • बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी घर छोड़ते हैं।

    ये भाग- दौड़ के किस्से अजीब होते हैं,
    सबके अपने उद्देश्य और औचित्य होते हैं।
    कभी शिक्षा कभी जीवन की नव आशा में,
    सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी घर छोड़ते हैं।

    जीवन में सबके अजीब उधड़बुन होती है,
    समस्याओं की फ़ौज सामने खड़ी होती है।
    गुजरना पड़ता है जब विपरीत परिस्थितियों से,
    सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी प्रताड़ित होते हैं।

    जब सफलता और रोजगार की बात होती है,
    असफलता पर जब कुण्ठा व्याप्त होती है।
    सारे प्रयास होते हैं जब निरर्थक,
    सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी खूब रोते हैं।

    घर से दूर रहकर सब तकलीफें सहते हैं,
    कभी खाते हैं कभी भूखे रह जाते हैं।
    जी भरकर देखते हैं तस्वीर माँ- बाप की,
    सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी कम सोते हैं।

  • कब कोई सिपाही जंग चाहता है

    कब कोई सिपाही ज़ंग चाहता है।
    वो भी परिवार का संग चाहता है।

    पर बात हो वतन के हिफाजत की,
    न्यौछावर, अंग-प्रत्यंग चाहता है।

    पहल हमने कभी की नहीं लेकिन,
    समझाना, उन्हीं के ढंग चाहता है।

    बेगैरत कभी अमन चाहते ही नहीं,
    वतन भी उनका रक्त रंग चाहता है।

    खौफ हो उन्हें, अपने कुकृत्य पर,
    नृत्य तांडव थाप मृदंग चाहता है।

    ख़ून के बदले ख़ून, यही है पुकार,
    कलम उनका अंग-भंग चाहता है।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • हर गली रुदन करती है

    कितना कष्ट होता है जब
    एक सैनिक शहीद होता है ।
    पूरा देश रोता है ।
    हर गली रुदन करती है ।
    एक अशांत-सी पीड़ा
    मन में घर करती है ।
    रोती है धरती जब
    मृत सैनिक को गोद में
    लेती है ।
    अग्नि भी गर्मी कम करके
    शोक प्रकट
    करती है ।
    जिस जगह से गुजरता है
    जनाजा वह
    गली रुदन करती है।
    माँ की छाती में दूध उतरता है
    जब बेटे की अर्थी आती है।
    पत्नी छाती पीट पीटकर
    बेसुध होती जाती है ।
    मेरी कलम रोती है जब
    किसी सैनिक के
    शहीद होने की खबर पाती है।
    उस कोख को क्या कहूँ जो
    सीमा पार उजड़ जाती है ।
    बाप किस तरह कन्धा
    देता है जिसकी
    वेदना और
    स्थिति पर ‘प्रज्ञा की कलम’
    नि:शब्द हो जाती है।

  • बहुत याद आते हैं

    बहुत याद आते हैं,
    वो गुजरे हुए पल।

    वो तुम्हारे खत का इंतजार।
    हर पल मिलने को बेकरार।
    गलियों में घुमना बनकर आवारा,
    पाने को एक झलक का दीदार।

    बहुत याद आते हैं।

    तुम्हारे मिलने का वादा।
    बेकरारी बढ़ाती और ज्यादा।
    मिलने के बाद तुमसे,
    ना जाने देने का इरादा।

    बहुत याद आते हैं ।

    बेपरवाह थे, क्या कहेगा जमाना।
    फिर भी छुप कर मिलना मिलाना।
    छिपकर मिलने का अलग मजा था,
    हर जुबां पे था बस हमारा फसाना।

    बहुत याद आते हैं।

    जुबां से बगैर कुछ भी कहे।
    हाले-दिल बयां करती निगाहें।
    वो शरमा कर पलकें झुकाना,
    गले में डाल कर अपनी बाँहें।

    बहुत याद आते हैं ।

    गुजरे वक्त लौट कर नहीं आते।
    हसरत है, ये भलीभाँति जानते।
    जहाँ मैं तुम्हारा दिवाना, तुम मेरी चाहत,
    फिर से वो पल हैं जीना चाहते।

    बहुत याद आते हैं।
    वो गुजरे हुए पल।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • नश्तर

    कहीं दिल पे नश्तर , तो कहीं नश्तर पे दिल।
    ज़माना खराब है ग़ालिब जरा संभल के मिल।।

  • दुनिया भयी बाबरी

    कोरोना बीमारी के लगातार बढने के बावजूद किसी भी तरह की कोई सावधानी लेने से लोग परहेज कर रहे हैंं
    यह ऐसा समय है जब सबको अपने और अपने परिवार का ख्याल रखना चाहिये और हर संभव सावधानी रखनी चाहिये
    लेकिन लोग सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुये, बेपरवाह, बिना किसी काज के घूमते आपको हर जगह मिल जायेंगे, इसी स्थिति पर दो लाइन प्रस्तुत हैं –

    दुनिया भयी बाबरी, छोड़ समझ को संग
    बैठ के देखत रहो, अब तरह तरह के रंग

  • बहती नदिया सी बह गई मैं

    लोभी दुनियां में जी गई मैं,
    विष का प्याला पी गई मैं
    ना मीरा हूं ना नीलकंठ,
    फिर भी सब झेल गई
    मानों प्राणों पर खेल गई,
    हुई भावहीन,हुई उदासीन
    कंचन सी निखर गई,
    टूटे मोती सी बिखर गई
    अंतर्मुखी सब कहने लगे,
    सबका कहना सह गई मैं,
    बहती नदिया सी बह गई मैं

  • गिरेबां

    गिरेबां अपनी जब भी झांकता मैं।
    हर बार पाता, कहाँ तू और कहाँ मैं।
    आईना मैं भी देखता हूँ, वाकिफ़ हूँ,
    और भी बेहतर हैं ‘देव’ तुझसे जहाँ में।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • बाल गीत – मजदूरी ना कराना |

    अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर बाल
    श्रमिकों के नाम प्रस्तुत मेरी एक बाल गीत
    बाल गीत – मजदूरी ना कराना |
    लगा लॉक डाउन बाल मजदूरी ना कराना |
    भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना |
    अबोध बच्चो को प्यार का सहारा है |
    माँ बाप के प्यार ने जीवन उनका सुधारा है|
    नन्हें हाथो हथोड़ा ना कोई थमाना |
    भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना |
    जीना खाना पढ़ना रहना अधिकार है |
    खेलना कूदना हँसना उपचार उनका है |
    गरीब बच्चों ना तुम कभी सताना |
    भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना |
    नन्हें बच्चे भारत का भविष्य है जानो |
    बागडोर देश हाथ होगी ये तुम मानो |
    मरते बच्चो जान है सबको बचाना |
    भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना |
    चाहिए जिन हाथो खिलौना जूठन थमाते हो |
    मिलना पुचकार जिनको गालिया सुनाते हो |
    उदास मुखड़े अब मुस्कान है खिलाना |
    भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना |
    बाल मजदूरी भारत मे अपराध होती है |
    निर्दयी मालिक से मासूमियत रोती है |
    प्यारे बच्चो हाथो कलाम है थमाना |
    भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • कविता (स्वतंत्रता दिवस प्रतियोगिता)

    झांक हमारे अंदर लहू है, पानी नहीं।
    आज़मा कर देख, हम किसी से कम नहीं
    क्यों इतराता है, तू अपनी ताक़त पे।
    गर आज हम नहीं, तो कल तू भी नहीं।।
    अपना हक़, सिन्हा चीर कर ले लेंगे हम।
    झुका दे मुझे , तुझ में इतना दम नहीं।।
    गर गिर गये हम तो, संभलना जानते हैं।
    हम से है जमाना , जमाने से हम नहीं।।
    यही मिट्टी मांगा था , कभी लाल लहू।
    लहू से सिंचे है भारत को, पानी से नहीं।।
    मेरे वतन पे, बुरी नज़र रखने वाले।
    धूल न चटा दूं तो हम भी, वतन के सपूत नहीं।।
    तिरंगा मेरी आन बान शान के प्रतीक है।
    संभल जा देश द्रोही, अब तेरा खैर नहीं।।
    मिट्टी के कण कण में , लिखा है हमारे देश के नाम।
    वक्त आने पर आगे बढेंगे, पिछे कभी हटेंगे नहीं।।

  • द्रौपदी का प्रण

    बाहुबल से सबल रहे,
    फिर क्यों विफल रहे।
    केश पकड़ घसीटा गया,
    भरी सभा मुझे लुटा गया।
    दुःशासन का दुस्साहस तुम देखते रहे,
    दुर्योधन का अट्टहास कर्ण भेदते रहे।
    वरिष्ठ सभासद मूक दर्शक बने रहे,
    कौरवों के भृकुटी क्यों तने रहे।
    वो चीर मेरा हरते रहे,
    अस्मिता तार करते रहे।
    केशव ने रक्षा-सूत्र का धर्म निभाया,
    भरी सभा मुझे चीरहरण से बचाया।
    क्यों पतिधर्म का खयाल न आया,
    क्यों तुम्हारे रक्त में उबाल न आया।
    अंहकार के मद में चूर वो ऐंठे रहे,
    क्यों हाथ पर हाथ धरे तुम बैठे रहे।
    कौरवों से ज्यादा पांडवों का दोष है,
    निर्जीव वस्तु माना इस बात का रोष है।
    दाँव लगाने से पूर्व लज्जा तनिक न आई,
    भार्या और वस्तु का भान क्षणिक न आई।
    सभी मूक सभासदों का नाश चाहिए,
    कौरव वंश का समूल विनाश चाहिए।
    प्रण है, केश मेरे तब तक बंधेंगे नहीं,
    कौरवों के रक्त से जब तक धुलेंगे नहीं।
    धरती पर सभी स्त्रियों का सम्मान चाहिए,
    भारत भूमि पर महाभारत का ज्ञान चाहिए।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • ऐ ज़िन्दगी

    ऐ ज़िन्दगी मैंने तुझको दिया क्या है
    तेरे लिए किया क्या है
    तूने मेरे गम पे खुशियों के वस्त्र ढक दिए
    तेरे लिए मैंने सिया किया है

    ना रखा तुझे खुश
    ना रखा ऐशो आराम में
    हर पल तुझसे माँगा
    तुझे दिया क्या है

    मैं पराया मांगू हर चीज़ स्वार्थ में
    तू अपना समझ कर दे निस्वार्थ में
    आखिर समझ नहीं आया
    ये रिश्ता क्या है

    तूने हर वक्त साथ दिया
    मेने हर कीमती वक्त है खोया
    तू तो हर वक्त मेरे लिए ही जिया है
    पर ऐ ज़िन्दगी मैंने तुझको दिया क्या है

  • धधक रहा है मुल्क

    धधक रहा है मुल्क, और कुछ आग मेरे सीने में।
    वफ़ादारी खून में नहीं तो फिर क्या रखा जीने में।

    वतन परस्ति से बढ़कर, और कोई इबादत नहीं,
    वतन परस्ति का सुकून, न काशी में न मदीने में।

    सियासत के ठेकेदार, देश जला सेंक रहे हैं रोटी,
    हमारे घरों में रोटी, मिलती मेहनत के पसीने में।

    अच्छे ताल्लुकात हैं उनसे जिन्हें मैं जानता हूँ, वो
    पत्थर नहीं फेंकते, चढ़ ऊँची इमारत के ज़ीने में।

    बिखरना लाज़मी है, जब मजहबी दरार पड़ जाए,
    डूबने से बच नहीं सकते, गर छेद हो सफ़ीने में।

    देवेश साखरे ‘देव’

    ज़ीना- सीढ़ी, सफ़ीना- नाव

  • कविता- इंसान मे जानवर

    कविता- इंसान मे जानवर
    हाथी एक जानवर मगर
    इंसान की इंसानियत ढोता रहा |
    थके मांदे एक शेर के बच्चे को
    अपनी सुंढ मे ढोता रहा |
    इंसान कहने को आदमी मगर
    जानवर से बदतर होता जा रहा |
    गर्भवती हथिनी को
    बम भरा फल खिलाये जा रहा |
    दर्द की हद को हराने
    जल के अंदर साँसे रोक
    मुंह को जल मे सुबाए
    पानी और पानी पिता रहा |
    खड़े खड़े अपनी जिंदगी की
    साँसे रोके जा रहा |
    पशु हिंसक हो सकता था
    कितनों को रौंद सकता था
    मगर दर्द सारा खुद सह लिया |
    तोड़ अपने साँसे
    दुनिया से बिदा हो लिया |
    सम्झना मुश्किल है
    जानवर इंसान बन गया
    या जानवर मे इसान जिंदा हो रहा |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • भारती की अथहा पीड़ा

    क्षणभर में क्षीण हो
    छलकी आंख भारत मां की
    जब मजदूरों के छाले
    सीने में लेकर बैठ गई
    निज संतान का दर्द दिखा तो
    ऐसी दर्द की आह,,,,, भरे
    जैसे लोह पथ गामिनी
    सीने के छाले रौंद गई
    कटी छिली हाथों की लकीरें
    एक संघर्ष सुनाती हैं
    सूरज के ताप से जलती गोद मेरी
    उनके कदम जलाती है
    निराशा से ग्रस्त नयन
    आस को निहारते
    कहीं दिख जाए कोई
    जल भोज बाटते
    महामारी ने मुंह बांधा तो
    मार भूख की बड़ी लगे
    पेट पे कपड़ा बांध लिया
    आंसू की भी एक लड़ी लगे
    अथाह दर्द समेटे थी वो
    मेदनी अपनी गोदी में
    कृतहन बना जो समाज दिखा तो
    रक्त के आंसू रोती है
    कितने वर्ष से दबा हुआ वो
    तारतम्य दुख के नीचे
    सुख छाया निवासी क्या जाने
    की कैसी पीड़ा होती है
    आखिर किन शब्दों में कहूं मैं
    अपनी लहू की पीड़ा को
    भूख से बच्चे बिलख रहे
    ये भूली अपनी क्रीड़ा को
    यमराज के सामने खड़ी हुई
    कहे रोक ले इस मनमर्जी को
    तुझे अपना -अपना सूझ रहा
    मैं जानू तेरी खुदगर्जी को
    जाने कितने घरों से बली लिए
    नहीं भर्ती मौत की क्या मटकी
    नित- नित मेरी कोख उजाड़ रहा
    तू आया क्यों है रे कपटी

  • लाचार

    वक्त ने कैसा करवट बदला बेज़ार होकर।
    तेरे शहर से निकले हैं बेहद लाचार होकर।

    पराया शहर, मदद के आसार न आते नज़र,
    भूखमरी करीब से देखी है बेरोजगार होकर।

    तय है भूख और गरीबी हमें जरूर मार देगी,
    भले ही ना मरे महामारी के शिकार होकर।

    आये थे गाँव से, आँखों में कुछ सपने संजोए,
    जिंदगी गुज़र रही अब रेल की रफ़्तार होकर।

    बेकार हम कल भी न थे, और ना आज हैं,
    दर-ब-दर भटक रहे, फिर भी बेकार होकर।

    जरूरत मेरी फिर कल तुझको जरूर पड़ेगी,
    खड़ा मैं तुझको मिलूँगा फिर तैयार होकर।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • नारी

    अबला थी जो नारी अब तक
    सबला बनके दिखलाएगी
    पुरुष के हाथों की कठपुतली
    अब दुनिया को चलाएगी ।
    घुट घुट के यह मरती रही
    मुंह से कभी भी आह न की
    पुरुष ने अपनी राह बना ली
    पर नारी को राह न दी ।
    अब खुद अपने दम पर
    वह परचम ऊंचा लहराएगी
    अबला थी जो नारी अब तक
    सबला बन के दिखलाएगी ।
    त्याग और बलिदान में आगे
    भारत की हर नारी है
    चुप चुप रहकर हर जुल्म सहे
    रो रो कर रात गुजारी है ।
    अब ना सहेंगे जुल्म पुरुष का
    संदेश यह जन-जन में पहुंचाएगी
    अबला थी जो नारी अब तक
    सबला बनकर दिखलाएगी।
    वीरेंद्र

  • मन की पतंग

    मीठे मीठे सपने संजोने दो
    होता है जो उसे होने दो
    कल का पता नहीं क्या होगा
    बाहों में और थोड़ा सोने दो ।………..
    जागी है अखियां हम सो गए हैं
    यादों में उनके हम खो गए हैं
    रोको ना रस्ता उनकी निगाहों का
    प्यार के बीज और बोने दो ।
    मीठे मीठे सपने संजोने दो ………….
    कैसे बुझाए अब दिल की लगी को
    खिलने से कौन रोके मन की कली को
    प्यार की राहों में छिप जाए अगर
    ढूंढना न मुझको और खोने दो
    मीठे मीठे सपनों संजोने दो …………
    मन की पतंग बिन डोर उड़ी
    जहां भी चाहा न, उस ओर मुड़ी
    यौवन भी लेने लगा अंगड़ाई
    दिल ने कहा मेरे मन से, होता है जो और होने दो।
    मीठे मीठे सपने संजोने दो …………
    होता है जो उसे होने दो
    कल का पता नहीं क्या होगा
    बाहों में और थोड़ा सा दो।
    वीरेंद्र

  • जब तू याद आया

    जब मैं हुई उदास, तो तेरा मुस्कुराना याद आया
    जब हुई तुझसे दूर, तो तेरा पास आना याद आया
    तू नहीं आया, पर तेरी याद चली आई
    तेरी याद से मिलकर, मुझे मुस्कुराना याद आया
    किताब में रख़ा मिला एक सूख़ा फ़ूल गुलाब का
    आज फ़िर से वो किस्सा सुहाना याद आया
    आंखों में नमी है, मग़र रोती नहीं हूं मैं
    किसी को दिया हुआ, एक वादा पुराना याद आया
    फुर्सत से बीत जाते हैं, जब कुछ पल मेरे
    मुझे फ़िर वो गुज़रा ज़माना याद आया

  • मजदूर

    हमारा कसूर क्या था
    आखिर क्यों मजदुर हुए हम
    दर दर भटकने पर
    मजबूर हुए हम

    इस महामारी से तकरार है
    रोजी रोटी की दरकार है
    अपनों से मिलने के लिए
    बेक़रार हुए हम

    मरने का खौफ नहीं
    अपनों के साथ जीने मरने की खायी है कसम
    इस कसम को निभाने के लिए
    नाराज रास्तो पे चल पड़े हम

    जिन्दा रहे तो कीड़ों-मकोड़ों
    से रेंगते नजर आयेंगे ।
    मर गए तो ये सवाल,
    तुझसे पूछे जायेंगे ।

    मेरा कसूर बता,
    क्यों मजदूर हुए हम ।

  • गजल- प्यास पानी हो गई |

    गजल- प्यास पानी हो गई |
    तुझसे बीछड़ दर्द इश्क अब कहानी हो गई |
    आँख से उमड़ा समंदर प्यास पानी हो गई |
    छलकता सागर आंखो से सैलाब की तरह |
    तेरी यादे मेरी रोज रातो की रवानी हो गई |
    खिलते फूल देख तेरा हंसना याद आता है |
    सिसकती ओस की बुंदों की जवानी हो गई |
    आती है बहारे तेरे लहराते आँचल की तरह |
    चर्चा तेरे मेरे इशक सबकी जुबानी हो गई |
    जितना भूलना चाहा तुम उतना याद आए |
    तू पास नहीं यादे सारी तेरी निसानी हो गई |
    तेरे इश्क का जादू है कभी उतरता ही नहीं |
    करके इश्क तुझसे शायद नादानी हो गई |
    जब भी याद आओ साथ तुम भी आ जाओ |
    तेरी हर निसानी अब और सयानी हो गई |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • भोजपूरी देवी गीत (आल्हा धुन) – मइया न देर लगाय |

    भोजपूरी देवी गीत (आल्हा धुन) – मइया न देर लगाय |
    मुंह से महिमा केतना सुनाये,कालिका बरनी ना जाय |
    जेतना गाई ओतना पाई ,गावत गावत पार ना पाय |
    जय जय हे काली भवानी ,किरपा तोहरो गवलो ना जाय |
    हाथ जोड़ी के जे भी पुकारे ,देवी उनपर खुश होई जाय |
    नारियल सुपारी फूल चढ़ावे ,माई मगन तब होई जाय |
    बड़ी दयालु मोरी काली माई ,आवत कबों ना देर लगाय |
    लाल चुनरिया चम चम चमके , रूपवा माई निरख ना पाय |
    जे भी पूजे उ फल पावे ,भगतन झोली खाली ना जाय |
    ढ़ोल नगाड़ा घंटा बाजे , बजे शंख रहे गगन घहराय |
    जगमग जगमग ज्योति जरावे ,धूप कपूर रहे सब महकाय |
    काली माई मूहवा उजारा ,जीभवा लप लप लाल लपकाय |
    माई चरण सब शीश झुकावे ,वर देवे माई हाथ उठाय |
    जादू टोना भूत परावे ,जब जब नाम काली गोहराय |
    छप छप कांटे दुखवा हरावे ,थर थर बैरी भाग पराय |
    माई के आरती भारती गावे ,जागा मईया ना देर लगाय |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • नादान बचपन:-कहाँ गई वो गुड़िया

    याद आती हैं वो बचपन की बातें
    जब पापा के हाथों से
    चोटी करवाती थी।
    माँ लोरी गाकर सुलाती थी।
    कहाँ गई वो बचपन गुड़िया ?
    जिसकी शादी मैं रोज़ कराती थी।
    बाबा की भजन संध्या में
    मैं ही आरती सुनाती थी ।
    भाईयों से रोज़ का झगड़ा
    और माँ से खफ़ा हो जाती थी।
    तुम बेटों को ही प्रेम करती हो
    पापा की दुलारी बन जाती थी।
    कहाँ गई वो बचपन की गुड़िया?
    जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
    कागज़ की नाव पर बैठकर
    दुनिया की सैर हो जाती थी।
    कहां गई वो बचपन की गुड़िया ?
    जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
    दादी बात-बात पर डाटती थी
    उन्हें देखकर मैं पुस्तक खोल
    पढ़ने बैठ जाती थी।
    कहां गई वो बचपन की गुड़िया?
    जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
    मेले से हर बार मैं
    चश्मा खरीद लाती थी।
    भईया के तोड़ने पर
    पापा से मार खिलाती थी।
    कहां गई वो बचपन की गुड़िया?
    जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
    यही कुछ निशानियाँ हैं मेरे पास
    ‘नादान बचपन’ की
    जब नानी के घर जाती थी।
    जब माँ जबरन मुझे खिलाती थी।
    कहाँ गई वो बचपन की गुड़िया?
    जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।

  • मैं मजदूर हूँ

    विलासता से कोसों दूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    उँची अट्टालिकाएँ आलिशान।
    भवन या फिर सड़क निर्माण।
    संसार की समस्त भव्य कृतियाँ,
    असम्भव बिन मेरे श्रम योगदान।
    फिर भी टपकते छप्पर के तले,
    रहने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    वस्त्र, दवाईयाँ या फिर वाहन।
    संसार की अनन्य उत्पादन।
    असम्भव बिन मेरे परिश्रम,
    कारखानों की धूरी का घूर्णन।
    तपती धूप में पैदल नंगे पाँव,
    चलने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    कर्ण भेदती करुण क्रंदन।
    आतुर तीव्र हृदय स्पंदन।
    सुंदर वस्त्र, सजे खिलौने,
    निहारती बच्चों के नयन।
    बाल हठाग्रह पूर्ण करने में,
    असमर्थ हूँ, मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    छप्पन भोग तो मुझे ज्ञात नहीं।
    दो समय भी रोटी पर्याप्त नहीं।
    संसार की क्षुधा मैं तृप्त करता,
    किंतु मेरी व्यथा समाप्त नहीं।
    शांत करने क्षुधा की अग्नि,
    जल पीने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    जहाँ-तहाँ फैला कूड़े का अंबार।
    जिसे देख करते घृणित व्यवहार।
    अस्पृश्य गंदगी अपने हाथों से ,
    मैं स्वच्छ करता हूँ सारा संसार।
    फिर भी गंदी बस्ती में,
    रहने को मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    सदियों से हम शोषित, उपेक्षित वर्ग हैं।
    वैसे कई योजनाएँ, नाम हमारे दर्ज़ है।
    ज्ञात नहीं लाभ उसका किनको मिला,
    साहूकारों का सर पर हमारे कर्ज है।
    अंतहीन ॠण से उॠण होने हेतु,
    बाध्य हूँ, मैं मजबूर हूँ।
    हाँ, मैं मजदूर हूँ।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • सच झूठ

    एक दिन रस्ते पर मिले दो नौजवान
    मैंने पूछा दोनो से क्या है आपका शुभ नाम
    पहला बोला मेरा नाम है सच
    सब सोचते मैं हूँ ढीठा
    दूसरा बोलै मेरा नाम है झूठ
    दुसरो से बोलता हूँ मीठा

    झूठ बोले सच होता है मेरे नीचे
    ये बोले सामने
    मैं बोलू पीठ पीछे

    हम दोनों से चलती है दुनिया की हर रीत
    झूठ हो जाये कितना भी बड़ा
    पर सच जाता हमेशा जीत

    हर रस्ते पे हमसे मिलना होगा
    हम में से एक को तुम्हे चुनना होगा
    सच को चुनने से
    कुछ वक्त में मिल जायगा आराम
    झूठ चुनने से
    कुछ वक्त में ज़िन्दगी हो जायगी हराम

  • लाॅकडाऊन vs शराब

    मुद्दतें बाद आज गला तर हो गया।
    मर रहा था, अब बेहतर हो गया।।

    कल जो खाने की तलाश में, कतार में थे खड़े।
    आज उनके भी कदम, मयकदे को चल पड़े।
    चेहरे से लाचारी का झूठा नकाब,
    शराब देख कर रफूचक्कर हो गया।
    मुद्दतें बाद आज गला तर हो गया।

    हुक़्मरानों का हर हुक़्म सर आँखों पे सजाया।
    मौत के सामान का सौगात, फिर क्यों पाया।
    बगैर इसके हमारी साँसे तो रुकी नहीं,
    सरकार का हाल क्यों बदतर हो गया।
    मुद्दतें बाद आज गला तर हो गया।

    जहाँ घर से निकलने पर थी सख्त पाबंदी।
    हर गली चौराहे पर थी कड़ी नाकेबंदी।
    फिर क्यों सड़कों पर खुला छोड़ दिया,
    डूब कर शराब में तर बतर हो गया।
    मुद्दतें बाद आज गला तर हो गया।

    शराब के दम पर देश की अर्थव्यवस्था बचाएंगे।
    महामारी का खौफ, क्या अब भूल जायेंगे।
    हिफाज़त की बात अब कहाँ चली गई,
    कथनी और करनी में क्यों अंतर हो गया।
    मुद्दतें बाद आज गला तर हो गया।

    मुफ़लिसी के दौर से अभी कई गुज़र रहे।
    यह अपना सरकारी खजाना भर रहे।
    शराब की तलब में कहीं ऐसा न हो,
    कि जुर्म करने पर आतुर हो गया।
    मुद्दतें बाद आज गला तर हो गया।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • जुबां जो कह नहीं सकती..

    जुबां जो कह नहीं सकती
    आंखें वो राज़ कहती हैं।
    दिल में जो कुछ भी चलता है
    धड़कनें आवाज करती हैं ।
    लगाए लाख भी पहरे
    दिलों पर चाहे जमाना,
    मोहब्बत तोड़कर पहरे
    दिल को आजाद करती है।
    मिले ना दुनिया की शोहरत
    सच्चा दिलदार मिल जाए।
    जहां में प्यार की दौलत ही
    सच में आबाद करती है।
    किसी को टूट कर चाहो
    अगर वो छोड़ दे दामन,
    एक तरफा मोहब्बत ही ‘प्रज्ञा’
    जलाकर खाक करती है।

  • फिर आएँगे

    कह चले हैं अलविदा उन शहरों को
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे,
    महामारी में बचे रहे तो.. फिर आएँगे l

    मजदूर हूँ, हुनर हाथों में और दिलों में सपने लिए आएँंगे
    इंतजार था बंद खुलने का,
    अपनों से मिलने का,
    चिंता मत करो साहब!
    महामारी बीत जाने दो,
    जिंदा रहे तो फिर आएँगे l
    कह चले अलविदा उन शहरों को,
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे l

    अब तो रेल गाड़ी की रफ़्तार कम सी लगती है ,
    यादों की रफ़्तार के आगे..
    चैन तो तभी मिलेगा ,
    जब अपनों से मिल जाएँगे l
    कह चले हैं अलविदा उन शहरों को,
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे l

    प्रवासी है साहब!
    यहाँ सब मतलब से बात करते हैंl
    प्यार और किसी की देखभाल कहाँ पाएँगे,
    ऐसे में तो सिर्फ अपने ही हैं
    जो गले लगाएँगे l
    कह चले हैं अलविदा उन शहरों को,
    जिनमें हम कमाने-खाने आए थे l

  • मौत घूम रही है

    कल फिर महफिलें सजेगी
    हम भीड़ के हिस्से होंगे ।
    खुद को कैद कर लो आशियाने में
    वरना हम ना होंगे सिर्फ हमारे किस्से से होंगे ।
    हमसे भी मजबूत देश आज असहाय है
    कोई नजर नहीं आता दर्द लेने वाला
    खौफ पहचान लो कुछ दिन ही तो हैं
    वरना कल कोई नहीं होगा कफन देने वाला ।
    हर गली हर मोड़ पर अदृश्य हो
    मौत टहलने निकली है दर से
    प्यार है अगर अपनों से
    भूलकर भी ना निकलना घर से ।
    प्रशासन की अपील आज भी
    कुछ बेदर्द मानने को तैयार नहीं
    वह हिंदुस्तानी हो सकते नहीं
    जिन्हें अपने देश से प्यार नहीं ।
    कर बद्ध निवेदन करता कोई
    हम सब की खातिर बारंबार
    कुछ तो फर्ज निभाओ तुम भी
    मन आंखों से देखो अपना सा लगता संसार ।
    घृणित कर्म के भागीदार
    क्यों बनते हो जीवन में
    ईश्वर अल्लाह देख रहा है
    रुक जाओ अब आंगन में ।
    हर अपने बेगाने को
    बिना मजहब के चूम रही है
    सड़कों पर सन्नाटा है
    केवल मौत ही घूम रही है।
    वीरेंद्र

  • Shayri

    हर बीमारी का हल दवा नहीं होती
    हर छोटी चीज़ रवा नहीं होती
    भुज जाते है दीये कभी तेल की कमी से
    हर बार कुसूरवार हवा नहीं होती
    – हिमांशु ओझा

  • चल पडे बैठकर रेल में

    ये मेहनतकश हैं भारत के,
    चल पडे बैठकर रेल में
    इनकी दुविधा समझें हम सब,
    ना लें इसको खेल में
    देश बन्द हुआ, काम बन्द हुआ
    पेट बन्द तो नहीं होता
    काम नहीं, कमाई नहीं है,
    भूखे पेट कैसे सोता.,
    ना खाना है ना दूध मिला
    घर में भुखा बालक रोता
    भुखमरी की दुर्दशा रहे थे ये झेल
    गांव इनके इनको ले चली ये रेल

  • फोटो पर कविता प्रतियोगिता :- शीर्षक – “सुनों!!”

    !सुनों!
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
    क्रूरता की पराकाष्ठा तो देखो, अब तक ये कुटुंब से दूर है|

    भूतल से नभतल तक यह जो हाहाकार मचा,
    प्रकृति ने शुरू अपना तांडव जो किया,
    मनुष्य के मुँह पर जोरदार तमाचा दिया,
    यह जो प्रकृति का बरसा है कहर,
    हकीकत में मनुष्य द्वारा ही दिया गया है जहर|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|

    प्रश्न यह मन में उठता है..
    क्यों हर परिस्थिति में मजदूर ही पिसता है,
    समाजसेवा के यहाँ पर्चे फटने लगे,
    पर डोनों में तो करोना ही बटने लगे,
    गाँव पहुँचने की मन में लिए आस,
    पहुँच गए रेल गाड़ी के पास|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|

    कोरोना का राक्षस बन बैठा सबका भक्षक,
    उल्लास न कहीं दिखता ,मातम ही पैर पसारे टिकता,
    इस महामारी के आगे सब अस्त्र-शस्त्र पड़े धराशाही,
    न रहा अब कोई किसी का भाई..
    इन्हें तो बस गाँव की याद आई..
    किस बात का रोना गाते हो, तुम ने जो बोया वही तो पाते हो|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|

    अस्तित्व अपना बचाने को, घर वापस अपने जाने को|
    पोटली के साथ मुँह को बाँधे बैठे हैं खिड़की के सहारे,
    आँखों के साथ हाथ भी बाहर झाँके, गाँव-गाँव ही अब पुकारे|
    सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर है, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
    क्रूरता की पराकाष्ठा तो देखो अब तक ये कुटुंब से दूर हैं|

    स्वरचित कविता
    रीमा बिंदल

  • देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया

    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया ?
    जिसे अपना बनाया वही बेगाना शहर हो गया।।
    लेके दिल में तमन्ना था आया यहाँ।
    बन्द सब कुछ हुआ अब जाए कहाँ?
    न खाने को कुछ है बचा और जीना दुष्कर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    बन्द फैक्टरी हुई सब धन्धा गया।
    कार रिक्शा चलाना भी मन्दा भया।।
    अब तो किराये के घर से भी बेघर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    कोई पैदल चला कोई साईकिल सवार।
    बस ट्रक से चला कोई यू•पी• बिहार।।
    कुछ अफवाहें उठी व टीशन पे भगदर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया। ।
    बड़ी मुश्किल से कुछ रेलगाड़ी मिली।
    जैसे तैसे श्रमिकों हित सवारी मिली।।
    बांध मुख पे सब पट्टी आठों पहर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    गाड़ी चलती रही मन मचलता रहा।
    देख खिड़की से हर मन पिघलता रहा।।
    गांव जाकर भी सब के सब बेघर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया।।
    आत्मनिर्भर बनो एक स्लोगन मिला।
    भूखे प्यासे को वाह क्या भोजन मिला।।
    देख दुनिया ‘विनयचंद ‘ किधर का किधर हो गया।
    देखो कैसा कोरोना का जग में कहर हो गया। ।??

  • “खिड़कियों से झांकती आँखें”

    कितनी बेबस हैं लोह-पथ-गामिनी (रेलगाड़ी)
    की खिड़कियों से झांकती 👁आंखें।
    इन आंखों में अनगिनत प्रश्न उपस्थित हैं।
    कितनी आशाएं कीर्तिमान हो रही हैं ।
    अपने परिजनों से मिलन की उत्सुकता
    ह्रदय को अधीर कर रही है।
    परंतु कोरोना महामारी का भय
    यह सोचने पर मजबूर कर रहा है,
    कि कहीं अपने परिजनों को हम
    भेंट स्वरूप कोरोना महामारी तो
    प्रदान नहीं कर रहे?
    यह बात लोह-पथ-गामिनी के इन
    सहयात्रियों को व्यथित कर रही है।
    मुख पर लगा मुखौटा(मास्क),
    इंनकी इस धारणा को बखूबी प्रदर्शित कर रहा है।
    इन श्रमिकों, प्रवासी मजदूरों को
    इस बात की अत्यंत खुशी है
    कि एक अर्से के बाद
    जिस रोटी की तलाश में वो परदेस गए थे।
    आज उसी रोटी की अभिलाषा में
    अपने गंतव्य प्रस्थान करेंगे।
    रूखी सूखी खाकर ही,
    अपनी जठराग्नि को शांत करेंगे।
    “मजबूरी में मजदूरी की
    मजबूरी में घर से निकले।
    आज फिर मजबूरी में
    मजदूरी छोड़ प्रवासी पहुंचेंगे।।”

  • मतलबी दुनिया

    मेरी जलती चिता पर लोग रोटी सेंक लेते हैं
    सहारे की जरूरत पर मेरा ही टेक लेते हैं
    जमाने ने मुझे समझा किसी माचिस की तीली सा
    जला करके दिया अक़्सर जिसे सब फेंक देते है।
    शक्ति त्रिपाठी “देव”

  • नासूर

    जख़्म गर नासूर बन जाए, उसे पालना बहुत भारी है।
    ज़िन्दगी बचाने के लिए, अंग काटने में समझदारी है।

    यह फलसफ़ा असर करता है, हर उस नासूर पर,
    चाहे वह शारीरिक हो या फिर सामाजिक बिमारी है।

    जहाँ – तहाँ फन उठाए घुम रहे हैं, आस्तीन के साँप,
    डसने से पहले ही, जहरीले फन कुचलने की बारी है।

    अच्छाई का झूठा नकाब, अब हटने लगा चेहरों से,
    जब भी गले लगाया, तुमने पीठ में खंजर उतारी है।

    गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं बची हममें,
    नज़र अंदाज़ करने की भी, यह कैसी लाचारी है।

    शराफ़त को कमजोरी समझने की भूल ना करना,
    क्रांति पर यकीं रखते, हम नहीं अहिंसा के पुजारी हैं।

    देवेश साखरे ‘देव’

  • भीगी भीगी रातों में

    भीगी भीगी रातों में जब याद तुम्हारी आती है
    सच कहता हूं यार मेरे ये आंखें जल बरसाती हैं
    कैसे कह दूं दोस्त मेरे की मुझको तुमसे प्यार नहीं
    प्यार असीमित है तुमसे ,इसमें कोई इनकार नहीं
    व्यथित हृदय कुंठित होकर बस , तेरा नाम बुलाता है
    सिवा तेरे इस नाजुक दिल को नहीं और कुछ भाता है।
    रात रात भर रोता हूं बस तेरी याद सताती है
    सच कहता हूं यार मेरे ये …………………….
    सोच था की फूल खिलेगा मेरे दिल की धरती पर
    किन्तु उगा है नागफनी अब मेरे दिल की परती पर
    अपने इस छोटे दिल में कुछ पीर छुपाए बैठा हूं
    इन आंखों को देख असीमित नीर छुपाए बैठा हूं
    कैसे तुझे बताऊं कि तू कितना मुझे रुलाती है
    रात रात भर रोता हूं बस तेरी याद सताती है
    सच कहता हूं यार मेरे ये………………………..
    Shakti Tripathi DEV

  • प्रवासी मजदूर

    प्रवासी मजदूर

    मजदूर हूं, मजबूर हूं,
    कैसी है तड़प हमारी,
    या हम जाने, या रब जाने,
    आया कैसा चीनी कोरोना,
    ले गया सुख-चैन हमारा,
    जेब में फूटी कौड़ी नहीं,
    छूट गया काम- धाम हमारा,
    खाने को पड़ गए लाले,
    घर जाना अब है जरूरी हमारा,
    जाऊँ या न जाऊँ दोनों तरफ है मौत खड़ी,
    मंजिल है मिलोंं दूर फिर भी,
    घर जाना है जरूरी हमारा,
    कुछ पैदल ही चले गए,
    कुछ साइकिल से चले गए,
    कुछ रास्ते में ही दुनिया छोड़ गए,
    सामने है कोरोना खड़ी,
    जाऊं या न जाऊं,
    दोनों तरफ है मौत खड़ी,
    मंजिल है मिलों दूर फिर भी,
    घर जाना है जरूरी हमारा,
    महीनों से हूं पिंजरबद्ध पंछी बना,
    लॉकडाउन में मैं हूं पड़ा,
    ऐसे में आया राहत सरकार का,
    प्रवासी मजदूर के लिए चलेगी रेलगाड़ी,
    मन खिल गया हमारा,
    बुढ़ी माँ मुझे बुला रही,
    अब घर जाना है जरूरी हमारा ।

  • शाहील

    अश्कों के समंदर में ए ग़ालिब, गोता लगाए जा रहा हूँ मै।
    शाहील मुकद्दर में है या नहीं, बस यही सोचे जा रहा हूँ मैं।।

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