शतरंज में अक्सर बाज़ियाँ पलट जाती हैं
अक्लमंदी से मोहरे चलना ए बाज़ीगर
किस्मत बुलंद हैं गर अदने से मोहरे की तो
राजा के हिस्से में शह और मात आती है
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से
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संपादक की पसंद
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Shayari
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Shayari
दूरियां ज़बरदस्त कायम है
दरमियाँ दो दिलों के
कौन जाकर समझाए उन्हें
किस्मत से मोहब्बत मिलती है
दिलों में रंजिशें हो तो
इश्क़ मुकम्मल हुआ नहीं करते
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
डर
डर का वजूद कुछ नहीं
ये स्वयं जनित मनोभाव है
आसन्न खतरे की चिंता से
उत्पन्न भय निराशावाद है
एक अंतहीन भ्रम की स्थिति
हक़ीक़त के धरातल पर
भय का ना कोई ओर छोर है
किसी कार्य के क्रियान्वन से पहले
उद्विग्न मन में उठा ये शोर है
अरे! मुझे डर लग रहा है
डर का दबदबा कायम है
हमारे मन मस्तिष्क में,
बड़े शातिर अंदाज़ हैं इस डर के
हावी रहता है कल्पनाओं पर
मिल जाता है जाकर अतीत में
रोकने को तैयार जैसे जीत के मंज़र
काबू करना चाहता हो कहीं अंतर्मन को
सोचो खुद को बंधन में क्यों रखना
क्यों ना डर पर ही घात किया जाए
क्यों न इस डर को ही डराया जाए
इसके झूठे इरादों से पीछा छुड़ाया जाए
असफ़लताएँ कुछ मिली भी तो क्या
आने वाले भविष्य को क्यों न संवारा जाए
ये निगोड़ा डर भी कहीं भाग जाएगा
जब इच्छाशक्ति से प्रबल मन जाग जायेगा -
अमर प्रेम
दो दिल जुड़ते हैं जब सच्चाई से
चंचलता निरंतर जवान होती हैं
किसी से प्यार हो जाना
बेहद सुखद अनुभूति हैं
खुशनुमा अहसासों में
डूबकर कल्पनाएँ सोती हैं
आलिंगन किये रहते हैं
उमड़ते जज़्बात हर पल
ऐसा सच्चा प्रेम जहाँ
पूर्णतः भावनाएं निश्छल
दूर होकर भी ये वियोग
कभी नहीं अपनाते हैं
सच्चे प्रेमी विरह में भी
मिलन के ख्वाब सजाते हैं
ऐसा अटूट प्रेम जब कभी
दो आत्माओं को मिलाता है
जन्मो जन्मों तक के लिए
प्यार अमर हो जाता है -
मेरी फितरत
आम खाके गुठलियों का ढेर लगाना
है मेरी नहीं फ़ितरत।
एक गुठली से बृक्ष लगाना, चाह मेरी
और मेरी यही फितरत।। -
भाभी को बधाई
मानों कल हि की बात हो……
एक नन्ही सी गुड़िया, मेरे गुड्डे से ब्याही थी।
दुल्हन के लिबास में, आंगन में खिलखिलाई थी।मुस्कुराहट पर उसकी, दुनिया सारी वार दू्ं।
दुआओं-आशिर्वाद संग, उम्र भर का प्यार दूं।दाम्पत्य जीवन में जो, अगला कदम बढ़ाया है,
उम्मीदों के प्रकाश से, जीवन जगमगाया है।इंतजार के पल जल्द ही थम जायेंगे,
घर आंगन में खुशियों के दीपक जगमंगायेगै।अब मैं अपने शब्दों को यहिं विराम देती हूं,
आने वाली खुशियों की दुआएं तमाम देती हूं। -
प्यारी भाभी का जन्म दिन
मां के आंगन को, पकवानों की खुशबू से महकाती है।
कभी बहन बनकर, कभी दोस्त बनकर, रास्ता दिखाती हैं।ख़ामोश मुस्कुराहट से ही, सब-कुछ कहजाति है।
पर कभी – कभी तो, बड़ी-बड़ी आंखों से हमें डराती है।माना कि भैया ने ढूंढा है, पर हमने तुमको पाया है,
हर आशाओं को तुमने, अहसासो से सजाया है।कितना कुछ कहना चाहुं, पर शब्द नहीं हैं कहने को।
अब छोड़ो चलो, बातों को बातों के लिए रहने दो।शुभ हो जन्मदिवस, और वर्ष हो खुशियों से सरोबार।
ढेरों शुभकामनाओं के साथ, स्वीकारो हमारा ‘प्रेम’ रुपी उपहार। -
अम्मा
अम्मा,
एक बात कहूं
ये जो तुम बकरी भैस
गोबर घास में
लगी रहती हो न
अच्छा है,
तुम अकेली तो नही
बाबू की अलग सुनने की आदत,
तुम्हारी थकान,
तुम जो आकर शाम को
सो जाती हो
जानता हूँ तुम थकी रहती हो
पैर का दर्द और
एक गिलास मे आधे चाय
दर्द दूर कर देते है?
मुझे तो नही लगता…
अम्मा,
ये भैस बकरी बेचना मत
अकेली पड़ जाओगी
और मैं….
अम्मा दर्द होगा ना पैर में
दबा दूं??-कुमार किशन
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सवाल ज़िन्दगी से
हज़ारों सवालों से भरी ये ज़िन्दगी
कभी खुद के वजूद पर सवाल उठाती
कभीचलती भी,कभी दौड़ती भी है
ये थक कर कभी चूर चूर हो जाती
हर दिन नए हौसलों को संग लेकर
शाम ढलते जैसे उम्मीदें तोड़ जाती
कभी मज़बूरियों का वास्ता देकर ये
अपने होने का सही मकसद भूल जाती
सुकून की खोज में भटकती फिरती ये
क्यों खुद में हर सुख ये नहीं तलाशती
मोह है न जाने किस चीज़ का इसको
शायद ज़िन्दगी खुद ही न समझ पाती
क्यों कल की चिंता में आज को बिताना
क्यों नहीं आशावादी ये रुख अपनाती
©अनीता शर्मा -
जिंदगी
कैसे समझाएं तुम्हें कि हम कोई
झुंड नहीं है मवेशियों के
कैसे यकीन दिलाएं तुम्हें कि
हमारे भी कई ख्वाब हैं
छोटी-छोटी ख्वाहिशें हैं
जिन्हें हम भूल नहीं सकतेतुम हमारे जीवन में
आते हो आंधी की तरह
और बिखेर देते हो हमें
रेत के घरों के की तरह
इस बिखरी रेत को अब
इकट्टा तो कर लेने दो
जिंदगी को फिर
नये सिरे से जी लेने दो -
वृक्ष की व्यथा
धरती जल रही अम्बर जल रहा
जल रहा सकल जहान ।
हाल कहे क्या पशु-पक्षियों के
हैं व्याकुल सब इन्सान ।।
सघन छाँव करके मैं तरूवर
सबको पास बुलाया ।
खुद जलकर सूरज किरणों से
सब की जान बचाया ।।
खाया पीया बैठ यहाँ पर
सब भागे जल के भीतर ।
छम-छम छप-छप छपाक -छप-छप
केहरि मृग अहिगण और तीतर ।।
मस्त मगन हो नहा रहे सब
पशु पक्षी संग-संग इन्सान ।
‘विनयचंद’ कोई मुझे भी ले चल
बीच दरिया में करूँ स्नान ।। -
शहर में भी गांव हूँ मैं
भीड़ है बहुत दिखता तन्हा हर इंसान हैं
एक दूजे से मुँह फुलाये खड़े मकान हैं
सूरज को भी जगह नहीं झांक पाने की
फुर्सत किसे, दूजे की देली लांघ जाने की
फिर भी पड़ोसी से पूछता हाल हूँ मैं
शहर में भी गांव हूँ मैं।पड़ती बड़ी गर्मी, बूंद को पंछी तरसते हैं
बड़ी मुश्किल यहाँ, कभी बादल बरसते हैं
पपीहा कहाँ, जिसको तलब हो बूंद पाने की
दिखती नहीं बच्चों में हरसत, भीग जाने की
फिर भी बनाता कागज की नाव हूँ मैं
शहर में भी गांव हूँ मैं।पकवान है विविध, क्या आलीशान शादी है
ट्रैफिक जाम में फसी, सुना बारात आधी है
लगी एक होड़ सी है, टिक्का पनीर पाने की
जल्दी पड़ी है सबको खा कर के जाने की
बारात के आने के इंतजार में हूँ मैं
शहर में भी गांव हूँ मैं।सब सोचते है उसका, ओरौ से मुकाम ऊंचा है
दौलत नहीं है पास जिसके, इंसा भी नीचा है
लगी एक दौड़ सी है, बस दौलत को पाने की
किसी को फिक्र ना “राजू”, दिलों के टूट जाने की
सबको दुवा सलाम करता हूँ मैं
शहर में भी गांव हूँ मैं।~राजू पाण्डेय
ग्राम – पो. बगोटी (चम्पावत) – उत्तराखंड
यमुनाविहार – दिल्ली -
मेरा खामोश घर
दीवारों के भी कान होते है,
लोग कहते हैं
लेकिन मेरी चीखें क्यों सुन नहीं पाता है
मेरा खामोश घर -
तुम झूठ किसी और दिन बोलना
सच कभी हमारा दामन नहीं छोड़ता
कोई भटकाव हमारा प्रण नहीं तोड़ता
जब भी विरोधाभास का आभास हुआहम कोई प्रतिक्रिया देते वक़्त नहीं भूले
अपने शब्दों को बोलने से पहले तोलनाफिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए
तुम झूठ किसी और दिन बोलना
तुम झूठ किसी और दिन बोलनाहमने फिर भी बेरुखी नहीं अपनायी
लाख चाहे लफ़्ज़ों के हेर फेर की
अक्सर बेतरतीबी से चोट खायीलेकिन सम्मान देने की खातिर
हमने कभी फटे में टांग न अढ़ाईक़श्मक़श में दिल से जो बात की
बस अपने दिल से ये आवाज़ आयीकभी अपने इस बड़ी कमज़ोरी का
तुम राज़ किसी के आगे नहीं खोलनाफिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए
झूठ किसी और दिन बोलनातुम
तुम झूठ किसी और दिन बोलना -
किरदार
जटिल है किसी को पूर्णतः समझना
अस्थिरता रहती है सबके जीवन मेंक्यों मानक तय करना किसी के लिए
गुज़रता है हर कोई अलग संघर्षों सेहर शख्स में दो किरदार जीवित हैं
अपनी सच्चाई अपने ही साथ हैहम किस किरदार को जीना चाहते हैं
ये निभाना भी सिर्फ अपने हाथ हैकोई इतना अनुभवहीन नहीं यहाँ
हर बंदा परिपक्व ही दिखता हैविचारों में भिन्नता हो भी तो क्या
ज़रा सा संभल रिश्तों को जीवित रखता है -
कोख का सौदा
आने से पहले ही गैर जीवन का पुरौधा बन गया
जन्म से पहले ही जननी की कोख का सौदा हो गयाअंश किसी का,गर्भ किसी का ,किसी और गर्भ में प्रत्यारोपित
लोग कौन ,देश कौन सा,किनके बीच में, हाय!कैसा ये जीवन शापित
एक अनजाने को कैसे कोई अपनी ममता सौंप गया
जन्म से पहले ही ———-कोख बना जब साधन माँ के पेट की क्षुधा मिटाने का
भूख प्यास ने किया कलंकित कैसे जीवन मानव का
देखते ही देखते बदतर कितनों का जीवन हो गया
जन्म से पहले ही———-क्या मेहनतकश इन्सान नहीं हम,ऐसी क्या लाचारी है
अपने अंश का सौदा करके ग़ैरत को गाली दे डाली है
सशक्तिकरण के दौर मे, तेरी चेतना का क्या हो गया
जन्म से पहले ही————
सुमन आर्या -
आंगन के पाथर
पैर जैसे ही पड़े आंगन में बरसों बाद
एक एक पाथर मचल उठा, सुबक पड़ा
उसके आने के अहसास से
ये तो वही पैर थे जो बरसों पहले
बच्पन में दिनभर धमाचौकड़ी करते थे
आंगन के इन पाथरो पर
और कभी कमेड या छोटे पत्थर से
लिखते इन पर अ आ इ ई, १ २ ३ ४
कभी पिठ्ठू, कंचे, गिल्ली डण्डा खेलते
कभी बैट बॉल घुमाते थे इसी आंगन में
कभी ईजा के साथ लीपने में लग जाते
गाय के गोबर से नन्हे हाथों से
तुरन्त उखाड़ फेकते थे
कहीं भी घास उग आये आंगन में
एक तरफ़ सूखते रहते थे अनाज और दालें
और एक कोने में बँधी होती थी दुधारू गाय
फिर अचानक बंद हो गयी पैरों की चहलकदमी
और अकेले रह गए
बंद मोल के साथ आंगन के पाथर
धीरे धीरे उगने लगी घास और
हावी हो गयी कटीली झाड़ियां
दरवाजे में लगे संगल ने भी निराश हो
छोड़ दिया था दरवाजे का साथ
दीमक लगा दरवाजा खड़ा था किसी तरह
शायद उनके आने की प्रतीक्षा में
उसके पैरों के साथ कुछ और पैर थे
कुछ नये पैर थे तो कुछ पुराने
पाथर जो पैर पैर से वाकिफ थे
बैचेन हो गये उन पुराने पैरों को ना पाकर
जो अचानक गायब हुये थे इन्हीं पैरों के साथ
शायद वो फिर लौट कर ना आये
पाथर खुद को संभालते बुदबुदाये
लौटकर आने वालों में कुछ नन्हें पैर भी तो है
शायद फिर से लौट आये वो पुरानी रौनक
और फिर शुरू हो जायें इस आंगन में
पिठ्ठू, कंचे, गिल्ली डण्डा, बैट बॉल के खेल
फिर सजाने लगे हम पाथरों को
लिखकर अ आ इ ई, १ २ ३ ४ -
दहाड़
ज्यों पले इक मां की गोद में,
नन्ही सी जान।
त्यों पले तू भारत की गोद में,
पाकिस्तान।समुद्र है हिंदुस्तान मेरा,
लहरें हैं विशाल।
एक लहर भी क्रोधित हो तो,
तू हो जाए बेहाल।तिनके को भी तरसेगा,
भूख से होकर व्याकुल।
दर दर तू भटकेगा ,
प्यास से होकर पागल।ले छीन लिया वो हक हमने,
जो तुझे देके गलती की थी।
इस बूंद बूंद पानी की कीमत तूने ना पहचानी,
अब भूखा प्यासा फिरेगा तू,
हम हैं जिद्दी हिन्दुस्तानी।बहुत हो गए वार तेरे,
अब बारी हिंदुस्तान की।
भूल जाएगा, सच में अपनी
तू पाकिस्तान,
पहचान भी।शेरों का जंगल है ये ,
ओर खोफनाक दहाड़ है,
अरे तेरी क्या हैसियत है,
तू कुत्तों का सरदार है।।✍️✍️ऊषा शोना
-
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर
लेके काँधे पे बन्दूक
दिल में देशप्रेम अटूट
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।
न हीं जीवन की मोह
न हीं परिजन बिछोह
देश के खातिर दिया सब कुछ है छोड़।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
ये हमारे वीर सिपाही
लड़ने में न करे कोताही
जलती धरती अंबर बरसे घनघोर।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
नहीं किसी से वैर है
न अपना कोई गैर है
भारत माँ की रक्षा में है न कोई थोड़।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
विस्तारवाद नहीं इनकी चाह
विकासवाद के चलते राह
५६ इंच की सीना देख यार पुड़जोर।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।।
कारगिल में था वैरी रोया
रोया था गलवान में।
दुश्मनों के छक्के छुराए
डरे नहीं बलिदान में।।
‘विनयचंद ‘ इन वीरों के दिल से लागे गोर।
चल पड़े हैं वीर देखो शरहद की ओर।। -
पहली बारिश
पहली बारिश….।
आज सुबह से बारिश
रुकने का नाम नही ले रही
जानती हो,
पहली बारिश याद आ गयी,
उस रोज देर तक बस स्टॉप पर
ठहरे रहे,
अजनबी से,तुम मुझसे अनजान थी
और मैं भी….
ये बारिश भी सडकों को जाम कर गयी थी
न बसों का चलन
न कैब कोई,मेरा रुम तो नज़दीक़ था
और लगभग सूरज भी
नींद में ही था,
तो मैने पूछ ही लिए के,
गर आपको,ठीक लगे तो कुछ देर
पास में मेरा रुम है
कुछ देर ठहर जाओ
और किसी को कॉल करके
बुला लेना,
…..ठीक
पर….
उस दिन रात को ठीक 11:11 मिनट
पर वो पहली बारिश थमी,
उन वक़्त 6 से 11 के बीच का वक़्त
साथ बैठे बातों और चाय की
चुस्कियों में बीत गया,
आज की बारिश,याद दिलाती है
उस दिन की,
कुछ खास तो नही पर
उसका होना बहुत खास था
और….पहली बारिश……।-कुमार किशन
-
शहीद
Saavan pratiyogita me सहभाग लेना चाहती हुं !
मेरी कविता स्वीकार करें.
*शहीद*
शहीद हुवा हैं मेरा सैनिक
युद्धभूमी गलवान
हम सबको अभिमान शौर्य का
भारत हैं बलवान !!शस्त्र उठाओ अस्त्र उठाओ
पवित्र भूमी का तिलक लगाओ
स्वदेस मेरा जीवन यारो
यही है मेरी शान !!निर्भर हैं ये आत्मन मेरा
जब तक है सांसे तनमे
लढता जाऊं कण कण भूमी
गाऊ भारत गान !!दुष्मन को पानी दिखला दूं
इस मिट्टी की आन
लिये तिरंगा आगे बढता
यही है मेरी जान !!*Mrunal/vinita ghate*
*Pune* -
कविता
तुम रहे हमेशा आगे ऐसे
तूफान भी न छू पाए
तुम्हारे देश के एक-
एक कण को…….
कोई अपना बनाकर
न ले जाए…..
जान हथेली पर लेकर
तुम चीर लाते हो
दुश्मन की आंख…..
तुम ढाल बने रहे ऐसे
कि शत्रु भी तुमसे
कांप जाते…..
अपनी करूणा की
चादर को छोड़
तुम वतन की रक्षा
में लौट आते ……
तुम हृदय के
सभी रिश्तों को
एक चुनौती दे आते…
रिश्तों के इन एहसासों में
एक राष्ट्रपूत प्राण हूं।
अपने स्वार्थ की
रक्षा से पहले
राष्ट्र का में
बलिदान हूं।
देश के लिए
तुम्हारा जीवन
का एक एक क्षण
तुम्हारा हिंदुस्तान है…
ए वीर देश के
वीर पुष्प….
तुम्हारा प्रेम
दुनिया के सभी
प्रेम से शक्तिमान है…… -
विश्व समर जीत
जाग हे पार्थ जाग तू,
दे काल को अब मात तू,
काल के कपाल पर अमिट रेखाएं खींच,
अब तू काल समर जीत।
स्वयं के सम्मान हेतु ,
विश्व के कल्याण हेतु ,
अपने अंदर के ज्वाल पुष्प को तू सींच,
अब तो दिव्य समर जीत ,
अब तो विश्व समर जीत ।।
हो रही हूंकार है ,
उठ रही तलवार है,
गांडीव के बाण से ,
विश्व के इतिहास में ,
गाथा नवीन लिख।
उड़ उड़ान बाज की ,
हुंकार हो वनराज की,
हर संकट में बने कठिनाई तेरी मीत,
अब तू धर्म समर जीत।
अब तो विश्व समर जीत।। -
किसने बनाई ये सरहदें??
सरहद की ये आड़ी-तिरछी लकीरें,
किसने खिंची क्या पता!
गर जो वो तुमको मिले,
मुझे भी उसका पता देना!!बस पुछुंगी इतना ही,
एकता ना तुमको भायी!
सीमांत बना कर क्या मिला,
इंसानो से ऐसी भी क्या थी रूसवाई!!पंछी, नदियां,रेतें,पवन,
उन्मुक्त से बहे तो कौन इनको रोक पाता!
इनमें ना कोई मजहब,जात ना पात,
ना कोई सीमा जो रोके इनका रास्ता!!ये तो लगता जैसे,
कुछ-कुछ भाईयों का बंटवारा!
कुछ जमीन,
तुम रखो कुछ हमारा!!लडेंगें -मिटेंगें,
ना रखेंगें भाईचारा!
इंसानियत से भारी हुआ,
अभिमान हमारा!!फिर भी ना हुयी संतुष्टि,
तो सिपाहियों को खड़ा किया!
गोली बंदूक और तोपों से सजी सरहद,
और कंटीली तारों का आवरण किया!!इंसानों को रोका ,
पर रोक ना पायें प्रकृति को!
वो सब जानती है,
इसओछी,घटिया राजनीति को!!इसलिये तो इसकी,
सुंदरता बरकरार है!
मानव जाती को ,
नरसंहार मिला उपहार है!!जब-जब हलचल हो सरहद पर रोजाना,
चुनावी बिगुल बजेगा समझ जाना!
नेता रुपी शकुनि होगा,
मासूमों की लहु बहवा खुद चैन से सोता होगा!!रंग एक लहू का ,
चाहे पाकिस्तानी, चीनी या हो भारतवासी!
मानवता है सबसे ऊपर,
चाहे हो कोई देशवासी!!सारे योद्धा होते हैं,
किसी के घरों का हैं आफताब!
सबका लहु है लाल,
सबको है जीने का अधिकार!!फिर भी कुछ इंच जमीन के लिये,
कितनी जानें गयीं होंगी कुर्बान!
कितनों के तो बलिदानों को भी,
नहीं मिला होगा उचित सम्मान!!इतिहास गवाह है ,
इन खुनी झड़पों में!
किसी के मांग का सिंदूर ,
किसी के घर का चिराग गया!!उस नेता का ,
कुछ ना गया!
जो युद्ध का हीरो बन,
गद्दी पर विराजमान हुआ!!सब अभिमान एक तरफ रख कर,
सुलह बेहतर ऊपाय है!
क्या ताबुतों में बंद लाल ,
किसी माँ से बर्दाश्त हो पाये है??जानती हुं देश के लिये ,
जान न्योछावर सौभाग्य कि बात है!
पर जब बातचीत से बात बनेगी,
फिर खून खराबे का क्या काम है!!कुछ ना मिलेगा,
आंसुओं, उजड़े गोद और मांग के सिवा!
अंत में पता चलेगा ,
कुछ ना बचेगा लहूलुहान विरान भूमि के आलावा!!हां,पर क्षमादान का ये मतलब ,
नहीं तुम सर पर चढ़ कर नाचोगे!
पर सुन लो ऐ चीन,पाकिस्तान,
तुम्हारी गलती को अब ना बख्शेंगे!!जितना झुक के किया ,
शांति वार्ता हमने!
हरबार पीठ में ,
छुरा भोंका है तुमने!!तुमलोगों को नहीं है ,
अपने शूरों कि कदर!
पर यहाँ लेकर घुमता है ,
हर भारतवासी उनको अपने जिगर!!इतिहास गवाह है जब-जब,
किसी फौजी कि अर्थी उठी है!
हरेक घर का चूल्हा बुझा ,
हरेक मां रोयी है!!भारत माँ के एक पुकार से ,
हर माँ अपना लाल भेज देगी!
ओ !!रिपु हमको कायर ना समझो,
गर जो कोई माँ तुम्हारे वजह से अब रो देगी!!मुंह कि खाओगे इसबार ,
छिन लेंगे तुमसे तुम्हारी जमीन भी!
जान न्योछावर को हैं तैयार ,
हम और हमारे जवान सभी!! -
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे परमवीर तुम शौर्य महान,
हेभारत मा के वीर सपूत
इस देश के लिए कुर्बान है जान
बलिदान तेरा न व्यर्थ जाएगा
तेरा लहू इस देश के काम आएगा
न झुकने देंगे हम शीश चमन का
तिरंगा यह हर पल गगन में लहराएगा
याद रखेंगे सदियों तक
तेरा यह अमूल्य बलिदान
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे परमवीर तुम शौर्य महान
मैं भी चलूं उसी पथ पर
जिस पथ पर लाखों वीर गए
मिट गए देश पर हंसते हंसते
जंग लड़ने जो रणधीर गए
वीर समाधि बनी उन्ही की
इस पावन उज्ज्वल धरती पर
खून से सनी है भारत की सीमा
राख हुए जो देश के रण पर
धन्य है भारत मां का आचल
धन्य है भारत देश महान
हे कर्मवीर हे धर्मवीर
हे परमवीर तुम शौर्य महान। -
रूक जाना विकल्प नहीं
सडकें ठहर गई सी लगती हैं
हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा है
बचकर निकलना अब चमन में
फूलों के संग मिल गया कांटा है।
कोरोना का कहर कहें या कहें
प्रकृति से खिलवाड़ की सजा
जो कल तक बस मस्त मलंग रहे
आज कर रहे इंकार लेने से मजा।
कोरोना काल में जीने का तरीका
हर किसी को हर हाल में बदलना होगा
थक कर रुक जाना विकल्प नहीं
उठकर सम्हलना और फिर चलना होगा।
वीरेंद्र -
कवि
कवियों की तो बात ही कुछ और है |
सोच की उनका नहीं कोई ठौर है,
मन की गति उनकी , प्रकाश से भी तेज़ है|
दुनिया में उनसे आगे , नहीं कोई विशेष है ||न जाने कितनी ही तुलनाएँ कर जाते हैं |
कितनी ही उपमाएँ दे जाते हैं,
कभी प्रक्रति को मनुष्य से भाँपते हैं|
तो कभी जीवन के उद्येश्य को विचारते हैं ||कभी एक तिनके को बलवान बता देते हैं |
कभी सर्वोत्तम को भी निष्फल बता देते हैं,
कभी अंधेरी गुफाओं का भेद देते हैं |
तो कभी मनुष्य के चरित्र को ही भेद देते हैं ||कभी स्त्री के सम्मान को दर्शाते हैं |
तो कभी पुरषो के अत्याचार को बतलाते हैं,
कभी एक बालक की जिज्ञासा बतलाते हैं |
तो कभी गलत विचारों का भी विरोध कर जाते हैं ||यही तो कवि के मन की बात है |
हर जगह हर मोड़ पर ,
उनकी सोच में कुछ खास है |
हर किसी से कुछ हटकर ही सोचते हैं ||
तभी तो सभी के दिलों में बसतें हैं |कभी लोगों की सोच को बदलते हैं कवि,
तो कभी समाज में नया दौर भरतें हैं कवि |
सभी के दिलों का अहम हिस्सा हैं कवि ,
सभी की ज़िंदगी का अहम किस्सा हैं कवि|| -
शहीदों को नमन
“आजादी के मतवाले हँसकर फंदे पर झूल गये,
बोलो उन वीर सपूतो को हम सब कैसे भूल गये।
मंगल पांडेय ने देखो आजादी का बिगुल बजाया था,
टोली संग अपनी अंग्रेजो को खूब मजा चखाया था।
रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजो के छक्के छुड़ा दिये,
अपनी तलवार से जाने कितने दुश्मन मिटा दिये।
आजादी की परिभाषा चंद्रशेखर आजाद सिखा गये,
अल्फ्रेड पार्क मे न जाने वह कितनी लाशे बिछा गये।
ऊधमसिंह सबको स्वाभिमान से रहना सिखा गये,
जलियावाले का ले बदला डायर को मजा चखा गये।
सुभाष चन्द्र बोस शान से ‘जय हिंद’का नारा लगा गये,
सम्पूर्ण विश्व को सेना का अनुशासन व महत्व सिखा गये।
भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु के भी अंदाज निराले थे,
ये सब वीर सपूत भारत की आजादी के सच्चे दीवाने थे।
अशफाक खाँ ,राजनरायन मिश्र आजादी की राह दिखा गये,
कर आहुत अपने प्राण वो भी शान से तिरंगा फहरा गये ।
मोहम्मद इकबाल इस देश की शान से शौर्य गाथा गा गये,
‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’ ये सबको बता गये।
ये देश प्रणाम उन वीर सपूतो को आज भी प्रतिपल करता है,
जो आजादी दिला गये उनको नमन देश यह करता है।” -
हम सिपाही है….. सिपाही ही रहेंगे…..
….हर तरफ़ एक शोर है…..हर तरफ़ एक ही बात,
मुल्क़ के लिए अपनी जान जो दे गए,
यथासंभव हमें देना हैं मिलकर उनके परिवार का साथ…..
जोड़ सकते है हम अगर एक लहर को तो
जोड़ेंगे दिन और चाहे रात,
वापिस तो नहीं ला सकते अपने शहीदों को
पर मिटा भी नहीं सकते उनके अपनो के दर्द भरे जज़्बात…..
हमारे लिए वो लड़े जिनके वो बैरी नहीं
टुकड़ों में बिखर गया अब उनका शरीर , बिखरे है वो कहीं कहीं,
मुल्क अपना है लोग अपने है पर ,
अपनापन बस वहीं निभाते हैं….
क्या कैंडल मार्च या स्टेटस पोस्ट करने से कुछ होगा
बॉर्डर के इस पार पुतले फूँक फूँक कर ,
असली आतंकवाद तो हम आप जग जाते है….
एक बेटे , भाई, पति, पिता की कमी को ,
क्या अब कोई पूरा कर पाएगा ?
फ़िर भी उस माँ – बाप का कलेजा देखो ,
हमारे एक बेटे की शहादत का बदला लेने,
हमारा दूसरा बेटा भी बॉर्डर पर उनसे लड़ जाएगा….
तुम्हारी शहादत का बदला लेने ,
क़ाश अब देश पूरा एक जुट हो जाए….
अच्छे दिन तभी अच्छे लगेंगे ,
जब एक रोती माँ के आँसू ,
वापिस खुशियों में बदल जाए
वापिस खुशियों में बदल जाएं…………हम सिपाही है… सिपाही ही रहेंगे,
जिंदा हैं या शहीद हुए ,
अपने वतन की रक्षा हमेशा करेंगें……।।जय हिंद जय भारत…….
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हम वो पागल प्रेमी हैं जो मातृभूमि पर मरते हैं ।
न पायल पर, न काजल पर
न पुष्प वेणी पर मरते हैं
हम वो पागल प्रेमी हैं
जो मातृभूमि पर मरते हैं ।सियाचिन की ठंड में हम
मुस्तैद है बन इमारत माँ
सरहद की रेत पर हमने
लहू से लिखा भारत माँहमें डिगा दे हमें डरा दे
कहाँ है हिम्मत बिजली की
नहीं चाह है फुलवारी की
नहीं तमन्ना तितली कीनहीं गुलाब , केसर ,चम्पा
हम नाग फनी पर मरते हैं
हम वो पागल प्रेमी हैं
जो मातृभूमि पर मरते हैं ।हम तो वो रंगरसिया हैं
जो खेले होली खून -खून
हरी -हरी चूनर माँ की
देकर स्वेद बूंद -बूंदपीठ दिखाकर नहीं भागते
सिर कटाकर मिलते हैं
देख हमारी वर्दी पर
ज़ख्म वफ़ा के मिलते हैंजहां तिरंगे के रंग तैरे
उस त्रिवेणी पर मरते हैं
हम वो पागल प्रेमी हैं
जो मातृभूमि पर मरते हैं ।रचनाकर :- गौतम कुमार सागर , ( 7903199459 )
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सोचता हूँ….
सोचता हूँ, क्यों ये बंदूकें है तनी?
उन जीवों पर जो दिखते हूबहू हम जैसे,
नेताओं के कठपुतले बन,
मात्र खून के कतरे है बहे।सोचता हूँ जब माता-पिता के विषय में,
आँखों से मन के भाव झलक पड़े।
“हमारा आशीर्वाद है, लौट तुम्हे आना है”
बस यही शब्द याद रहे।सोचता हूँ जब प्यारी बहन के बारे में,
जिसकी डोली मुझे उठानी है,
उसकी खुशियों में अपनेपन की मिठास मुझें मिलानी है।सोचता हूँ जब उन प्यारे नन्हें हाथों को,
जिनके कोमल स्पर्श से माथे की शिकन हट जाती,
प्यारी-सी मुस्कान सारी चिंता मिटा जाती।सोचता हूँ जब उस मन को,
जिसमें बस मेरा ही ख्याल रहता है,
जिसका दिल सदा मुझे खोने का दर्द सेहत है।ऐसी परिस्थिती में भी हम जवान भारत माँ के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं,
युद्धभूमि में हम मर मिटने को तैयार हो जाते हैं,
पर एक सवाल जो युद्ध के समय हमेशा अखरता है,
आखिर क्यों हम नेताओं की वजह से घुन से पिस जाते हैं?
क्यों धरती माँ के सभी सपूत आपस में ही लड़ते हैं?
नेताओं के कठपुतले बन,
मात्र खून के कतरे ही बहते हैं। -
कवि का समर्पण
आप लिखते खूब हो पर कभी गाते नही हो,
मंच पर समर्पण भाव मे नजर आते नही हो।
आपकी रचनाओं मे जीवन की सारी सच्चाई दिखती है,
हर पाठक को उसमे अपनी ही परछायी दिखती है।
आप कभी-कभी कड़वी बात भी लिख देते हो,
लोगों को दर्पण मे उनका अक्स दिखा देते हो।
कुछ लोग आपसे अन्दर ही अन्दर जलते है,
पीठ पीछे आपकी खूब अलोचना करते है।
पाठक से इतने सवाल सुनकर मुझे अच्छा लगा,
फिर हर एक बात का मै भी जवाब देने लगा।
मै जीवन की कड़वी सच्चाई शान से लिखता हूँ,
इसीलिये कुछ लोगों की आँखों को खलता हूँ।
जो जलते है मुझसे वो बराबरी कर सकते है,
है हुनर तो वो भी चंद पंक्तियाँ लिख सकते है।
शायद जीवन की डगर बहुत टेढ़ी-मेढ़ी होती है,
अगले पल क्या होगा ये बात हमे न पता होती है।
बोलो ऐसी अनिश्चितता को किस तरह लयबद्ध कर दूँ ,
और अपनी अधूरी छवि को कैसे मंच को समर्पित कर दूँ । -
शहीद को सलाम
शरहद पर से पापा मेरे फोन किए थे शाम को।
कुछ दिन धीरज रखना बेटा आऊँगा मैं गाम को ।।
पढ़ना लिखना खेल कूद में सदा रहो तुम आगे।
दादा दादी और अम्मा का रखना ध्यान बड़भागे।।
तेरे खातिर ढेर खिलौने लाऊँगा मैं ईनाम को।।
कुछ दिन धीरज रखना बेटा आऊँगा मैं गाम को।।
देख नहीं सकते दादाजी कान न सुनते दादी की।
फिर भी सुनाते हमें कहानी शरहद के शहजादी की।।
अम्मा मेरी पूजा करती सदा आपके नाम को।
जल्दी आना पापा मेरे अपने घर और गाम को।।
ठीक ठाक से रहना पापा अपना ख्याल खुद रखना।
नहीं चाहिए मुझे खिलौने बन्दूक लेकर आ जाना।।
फौजी बनकर मैं भी पापा रक्षा करूँ आवाम को।
हुआ सबेरा घर बाहर मचा तहलका था भारी ।
दौड़ दौड़कर हँसता रोता बालक खोल किवाड़ी।।
ये नादान कैसे समझेगा आखिर इस कोहराम को।
करके फोन और गुमसुम होकर आएगें अब शाम को।।
ताबूत बीच में ओढ़ तिरंगा लेटे हो क्यों पापा।
ये आना भी कैसा आना मना रहे सब स्यापा।।
उठ जाओ और पकड़ अंगुरिया मुझे घुमाओ गाम को।
‘विनयचंद ‘के अश्रुपुष्प संग स्वीकारो एक सलाम को।।
जल्दी आना पापा मेरे अपने घर और गाम को।। -
चाहता हूँ माँ
तेरे कांधे पे सर रख, रोना चाहता हूं मां।
तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।तू लोरी गाकर, थपकी देकर सुला दे मुझे,
मैं सुखद सपनों में, खोना चाहता हूं मां।
तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।।इतना बड़ा, इतनी दूर न जाने कब हो गया,
तेरा आंचल पकड़कर, चलना चाहता हूं मां।
तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।।जीने के लिए, खाना तो पड़ता ही है,
तेरे हाथों से भरपेट, खाना चाहता हूं मां।
तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।।जिंदगी का बोझ, अब उठाया जाता नहीं,
बस्ता कांधों पर फिर, ढोना चाहता हूं मां।
तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।।जिंदगी की भाग दौड़ से, थक गया हूं अब,
बचपन फिर से मैं, जीना चाहता हूं मां।
तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।।जिंदगी के थपेड़े, बहुत सह चुका ‘देव’,
ममता की छांव में, पलना चाहता हूं मां।
तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।।देवेश साखरे ‘देव’
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हिन्दी सावन शिव भजन 2 -भोला जी की भंगिया |
हिन्दी सावन शिव भजन 2 -भोला जी की भंगिया |
भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया |
मन मन रोती है गुस्सा करती है |
भंगिया पिसती है गणेश जी की अम्मा |
भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया |
भंगिया मै पीऊँगा जल्दी डालो कमंडल मे |
भंगिया ना पिलाऊँगी देखे देव भूमंडल मे |
चलो देवघर बाबा धाम मे |
भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया |
बच्चे अभी छोटे है गणेश कार्तिक अच्छे है |
बच्चो ना बिगाड़ो मन के अभी कच्चे है |
लो पी लो ठंडी लस्सीया |
भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया |
डमरू डम डम बजाऊँगा बम बम नाचुंगा |
झम झम सावन बरसेगा बाबा धाम रहूँगा |
कावरियों बोलो बम बम |
भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया |श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि/लेखक /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286 -
वंदेमातरम
मां तुझ से है मेरी यही इल्तज़ा।
तेरी खिदमत में निकले मेरी जां।तेरे कदमों में दुश्मनों का सर होगा,
गुस्ताख़ी की उनको देंगे ऐसी सजा।गर उठा कर देखेगा नजर इधर,
रूह तक कांपेगी देख उनकी कज़ा।कभी बाज नहीं आते ये बेगैरत,
हर बार शिकस्त का चखकर मज़ा।दुश्मन थर – थर कांपेगा डर से,
वंदे मातरम गूंजे जब सारी फिज़ा।देवेश साखरे ‘देव’
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देश के वीर जवानों के लिए
🍀🌷🌹🙏नमन् है मेरे देश के वीर सिपाही को 🍀🌹🙏
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कोटी कोटी प्रणाम है मेरे देश के वीर सिपाहियों को जो अपनी जान की परवाह किए बिना मेरे देश की जान बचाने के लिए कोई कसर नही छोडंते बारम्बार प्रणाम आपको,,,,
🍀🌸🌷🌹 वीर तुम बढ़े चलो,,,,
धीर तुम बढ़े चलो,,,,,🍀🙏
जान है जहान है आपने ये ना देखा कभी ,,,
दुश्मनों की नजरें जब भी गडीं अपने देश में
तुमने कदमों को ना खींचा जी जान लगा दी देश में🙏
मुरझाने लगी जो बगिया मेरे देश की तुमने सीचें उसके उपवन,,🙏
कही गोलियां बरसाई तुम पर कही वार सहें सीने में,,
लगी देश की शान मुरझाने तो तुमने ना खीचें पीछें अपने कदम,, 🍀🌹🙏
दिन का पहरा ना देखा ना देखा रात का वो पहर
बस बन चले तुम मेरे वीरों मेरे देश के लिए एक प्रहर,, 🍀🌹🙏
कही गोलियां चली तुम पर तुम फिर भी सेवा करते चलें,
कितनी रातें कितने दिन थे ना जाने कितनी जान बचातें गए,,, मेरे देश के लिए तुम ना जाने कितने दुख सहते गए 🍀🌸🌹🙏
त्याग के इतिहास में जब नाम तुम्हारा आएगा ,,
देश बचाने वालों तुम्हारा भी नाम इतिहास में लिखा है और लिखा जायेंगा,,, 🍀🌹🙏
अपना घर छोड़कर तुमने देश के परिवार को बचाया,,
वास्तव में सेवा क्या है तुमने ही यह कर दिखाया ,,🍀🙏
क्या लिखू मेरे शब्द कम है तेरी तपस्या
को बया करने को तुमने जो किया मेरे देश के लिए उस तपस्या को बया करनें को,,,,, कोटि कोटि प्रणाम हैं मेरे देश के वीर सिपाहियों को,,, 🙏पी सी जोशी हल्लदानी
,🙏🍀🍀🍀🍀🌸🌸🌸🌸🌹🌹🌹🌹🙏 -
फौजी
लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया था
उस पर मरने वाला आज उसमें ही घुसकर सोया था
भारत माँ के सपूत ने चैन शान्ति बाँटी थी
भारत माँ के लिए एक माँ ने अपना लाल खोया था
लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया थाघर में नन्हीं चहकती सी चिड़िया वो छोड़ आया था
अपने बटुवे में सारा घर घुसा लाया था
बीवी का काजल, पिता का आशीर्वाद संग उसके आया था
हमारे अमन के लिए वो अपनी हर रात नहीं सोया था
लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया थाताबूत में वापिस उसको उसका दोस्त लाया था,
आँसू से सबका गला भर आया था
माँ बेसहारा सी थी, पिता बेहाल थे
उसकी बेटी-बीवी ने अपना सब कुछ खोया था
लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया था
लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया था~मयस्सर
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‘जंग का ऐलान’
जंग का ऐलान हम नहीं करते,
पर जंग छिड़ जाने पर पीछे नहीं हटते।
यही तो है हम हिन्दुस्तानियों का हुनर,
सिर कटा सकते हैं पर झुका नहीं सकते।
आखरी साँस तक लड़ते हैं हम फौजी देश के लिए,
शहीद हो जाते हैं पर हिम्मत हार नहीं सकते।
हारना तो हमको आता ही नहीं है और,
कभी दहशतगर्द हम पर विजय पा नहीं सकते।
मिट जाते हैं हँसते हुए हम अपने देश के लिए,
पर कभी दुश्मन को पीठ दिखा नहीं सकते।
हम दुश्मन को खदेड़ आते हैं उसकी जमीं तक,
चीन हो या चाहे पाकिस्तान हमसे पार पा नहीं सकते।
हम फौजी शेर का जिगरा रखते हैं,
तिरंगे में लिपट सकते हैं मगर तिरंगा झुका नहीं सकते।
कुर्बान हो जाये भले जिस्म का कतरा-कतरा,
अपने देश की मिट्टी का एक टुकड़ा तक गवाँ नहीं सकते।
आ तो सकते हैं बेशक जिन्दा हमारी सीमा पर दुश्मन,
पर हमारी गोलियों से बचकर जिन्दा जा नहीं सकते।
हमें हिन्दुस्तान ही प्यारा है, तिरंगा ही तो जान हमारा है।
‘भारत माता की जय’ के सिवा कुछ भी हम गा नहीं सकते।🇮🇳 ‘जय हिंद जय भारत’🇮🇳
मेरा शत शत नमन सभी फौजी भाईयों को🙏🙏🙏
रचनाकार:-
प्रज्ञा शुक्ला ‘सीतापुर (उत्तर प्रदेश) -
चाय में डूबे बिस्किट
चाय में डूबे बिस्किट
सी हो गयी है जिंदगी
कब टूट जाये,
कब घुल जाये
खबर नहीं -
जो बीत गई…
जो बीत गई वो याद बनी,
यादों में एक चेहरा मुस्काया है
आंखें हैं नम, दिल में है .गम,
होठों ने गीत नया एक गाया है
जो बीत गई वो याद बनी,
यादों में चेहरा एक समाया है
कहीं पर भी हों वो, दिल से दूर नहीं हैं
कुछ यादों ने, कुछ ख्वाबों ने अक्सर हमको मिलवाया है
जो बीत गई वो याद बनी…
यादों ने गीत नया लिखवाया है -
हम परिंदे हैं…
हम बसाएंगे
अपना घरौंदा कहीं…
हम परिंदे हैं
एक जगह रुकते नहीं…
जहाँ मिलती हैं
खुशियाँ जाते हैं वहाँ
हम गमों में
घरौंदा बनाते नहीं…
चुनते हैं तिनके
घोसले के लिए..
जिंदगी भर कहीं
हम बसते नहीं…
पंख हैं, हौसला है
रुकेंगे नहीं..
भरेंगे जाकर उड़ानें कहीं…
हम परिंदे हैं
एक जगह रुकते नहीं… -
कहां रह गए वो??
इंतजार किया जी भर कर उनसे मिलने की कोशिश भी की,
कहाँ रह गये वो जिन्होने हर वादा निभाने की कसम भी ली।
आसान भी तो नही है सूर्य की किरणों की तरह बिखर जाना,
खुद की खुशियों को न्यौछावर कर दूसरो को खुशी दे जाना।
माना बहुत व्यस्त है जिन्दगी की उलझनों मे वह आजकल,
पर कहाँ रह गये जो मुझे याद करते थे हर दिन हर पल।
शायद खुशी मिलती होगी तुम्हे मुझे यूं तड़पता हुआ देखकर,
मेरा क्या?तुम खुश रह लो मुझे दुनिया मे तन्हा छोड़कर।
बोलो मिट गयी है यादे या भुलाने की कोशिश मे लगे हो तुम,
क्या?अब भी न मनोगे कि कितना ज्यादा बदल गये हो तुम। -
अब उठ नौजवान
अब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना है
जगमगाते दीप से
सूरज की तरह चमकना हैदिल जो कहे
वो करना है
ज़िंदा मछली की तरह
धारा के विपरीत तैरना हैज़िन्दगी गिराएगी
कभी भटकाएगी
कहदे अपने होसलो से
हर हाल में मंज़िल तक पहुंचना हैअब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना हैहार भी जाये तो गम मत करना
अपनी राह पर चलते रहना
क्यूंकि हार की रात कितनी घनी हो
पर जीत का सवेरा तो होना हैना डर तू
ना घबरा तू
अपने होसलो के पंखो को फैलाके
परिंदे की तरह आसमान में उड़ना हैअब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना हैअपने गमो को पीछे छोड़
तुझे आगे बढ़ना है
अब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना हैये जीत तो मिटटी है
हाथ में आते ही फिसलेगी
मेहनत के पसीने से
इस मिटटी को कठोर बनाना हैअब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना हैइस ज़िन्दगी के सागर में
कई तूफान आएंगे
अपने हौसले की नाव को मजबूत बना
इस सागर को पार करना हैअब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना हैपहले कदम में
तेरा मन बहकेगा
कुछ और करने को कहेगा
पर याद रखना अपना वादा
जो अपने आप से किया था
चाहे गिर जाऊ राहो में कई बार
पर मंज़िल की नज़रो से नहीं गिरना है
अब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना हैसमझता हूँ तेरी
राहे आसान नहीं
रख भरोसा उस ऊपर वाले पर
अगर उन्होंने रास्ता दिखाया है
तो उनकी दया से ही तू मंज़िल तक पहुंचना है
अब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना हैकर तप पूरी लगन से
तुझे ध्रुव तारा बनाना है
अपने आने वाली पीढ़ी का
मार्गदर्शक बनना है
अब उठ नौजवान
तुझे कुछ करना है– हिमांशु ओझा
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पत्थर होना आसान नहीं
मैं ‘पत्थर’ हो गया हूँ
पर वो पत्थर नहीं
जिसे ‘पूजा’ जाय,
बस एक ‘साधारण पत्थर’,
पर साधारण पत्थर होना ही क्या ‘आसान’ है?देखने में आसान लग सकता है,
पर वो पत्थर कभी ‘मैग्मा’ रहा होगा
धरती के अंदर,
न जाने कितने ‘ताप’, कितना ‘प्रेशर’
उसने कितने दिनों तक झेला होगा,
और जब ‘बर्दाश्त’ से बाहर हो गया होगा सबकुछ
तो एक दिन ‘फट’ गया होगा उसके अंदर का ‘ज्वालामुखी’,
वो ‘लावा’ बन बस बहे जाने को तैयार…
ओह! उस दिन कितनी ‘शांति’ मिली होगी उसे,
फिर धीरे-धीरे ‘ठण्डा’ हुआ होगा वो
अब बिल्कुल दूसरे स्वरूप में…पर ‘पत्थर’ होने के लिए
फिर न जाने उसने कितनी ‘बारिश’, कितनी ‘धूप’,
और न जाने कितने ‘मौसम’ झेले होंगे,
तब जाकर बन पाया होगा वो ‘पत्थर’,
पत्थर बन जाना इतना भी ‘आसान’ नहीं..
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नारी शक्ति
मैं पुत्र उस नारी की जिनकी आंखों में पीड़ा देखी ,
उजागर करता हूं उन पीड़ा का……….।
जनमानस से भरा जिसने धरती को ,
घर के कोनों में मजबूर हुई जीने को।
दुर्गा, काली के रूप में पूजा जिनको ,
शर्मसार किया उनको ।
सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारंभिक बीज है वो ,
फिर भी गोद में कुचला उनको।
नए – नए रिश्ते को बनाने वाली रीत है वो,
हमने हर रिश्तो में नीचा दिखाया उनको।
उसने हममें कोई फर्क नहीं किया ,
हमने सामाजिक जंजीर दिया।
उसने हमको नौ महीने गोद में रखा ,
हममें से कोई उनका चीरहरण किया।
कांटो में स्वयं चली, हमें फूलों की सेज दिया।
हमने उन पर षड्यंत्र रचा,
आखिर कैसी रीत है ये l
सच में क्या नारी अबला है?
ऐसी भूल ना कर, ये तो स्नेह है उनका ।
कहीं धैर्य खत्म ना हो जाए,
फिर से काली, दुर्गा ना बन जाए l
बदल लो अपनी नजरिये को l
बदल लो अपनी नजरिये को ll
राजीव महली -
रोटी के तमाशे
ये उम्र, ये मजबूरियाँ और रोटी के तमाशे,
फिर लेकर निकला हूँ पानी के बताशे।
बाज़ार के एक कोने मे दुकान सजा ली,
बिकेंगे खूब बताशे ये मैने आस लगा ली।
सबको अच्छे लगते है ये खट्टे और चटपटे बताशे,
इन्ही पर टिका है मेरा जीवन और उसकी आशायें।
बेचकर इन्हे दो जून की रोटी का जुगाड हो जाता है,
इसी कदर जिन्दगी का एक-एक दिन पार हो जाता है।
अपने लड़खड़ाते कदमों पर चलकर स्वाद बेचता हूँ,
इस तरह भूख और जिन्दगी का रोज खेल देखता हूँ। -
हमसे दीवाने कहाँ..
अब कहां हमसे दीवाने रह गये
प्रेम की परिभाषा और मायने बदल गये,
तब न होती थी एक- दूजे से मुलाकाते,
सिर्फ इशारों मे होती थी दिल की बातें,
बड़े सलीके से भेजते थे संदेश अपने प्यार का।
पर अब कहाँ वो ड़ाकिये कबूतर रह गये,
पर अब कहाँ हमसे दीवाने रह गये।
जब वो सज- धजकर आती थी मुड़ेर पर,
हम भी पहुँचते थे सामने की रोड़ पर,
देखकर मुझे उनका हल्का- सा शर्माना,
बना देता था हमे और भी उनका दीवाना।
पर अब कहाँ हमसे परवाने रह गये,
पर अब कहाँ हमसे दीवाने रह गये।
दोस्तो संग जाकर कभी जो देखते थे फ़िल्मे,
पहनते थे वेल बॉटम और बड़े नये चश्में,
आकर सुनाते थे उन्हे हम गीत सब प्यारे,
तुम ही तुम रहते हो बस दिल मे हमारे,
पर अब कहाँ वो दिन प्यारे रह गये।
पर अब कहाँ हमसे दीवाने रह गये।।
जो मिलता था मौका तो खुलकर जी लेते थे,
कभी अपनी ‘राजदूत’ से टहल भी लेते थे,
खूब उड़ाते थे धूल हम भी अपनी जवानी में,
कभी हम भी ‘धर्मेन्द्र- हेमा’ बन जी लेते थे।
पर अब कहाँ वो सुनहरे मौके रह गये,
पर अब कहाँ हमसे परवाने रह गये।
पर अब कहाँ हमसे दीवाने रह गये।।
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मुठ्ठी भर यादें…
आज कुछ पुरानी सौगात मिली
मैंने अपने कमरे की तलाशी ली।
तो कुछ किताबें धूल में लिपटी हुई,
कुछ खत, कुछ गुलाब के फूल सूखे हुए
कुछ तस्वीरें, कुछ तोहफे
और कुछ बन्द लिफाफे मिले।
जिन्हें छुपाकर रखा था मैंने
भूल गई थी दुनियादारी में पड़कर
आज वो मुठ्ठी भर यादें
मुझे मिल गई।
जिन्हें मैने सबसे छुपाकर अपनी
अलमारी में रख दिया था।
आज वो यादें धूल में लिपटी हुई
मुझे आ मिलीं।
और उनकी स्मृतियों ने
मुझे फिर विचलित कर दिया।
वो मुठ्ठी भर यादें
मुझे मिल गईं।
जिन्हें भूले जमाने हो गए। -
उम्र पार की
इन सुर्ख अधरों को
मेरे गालों तक मत लाना
चाहत और बढ़ जाएगी
प्यार की
अपनी जुल्फों को अब
और मत लहराना
रात लंबी हो जाएगी
इंतजार की
तड़पते रहेंगे उम्र भर मगर
जुबां से कुछ ना कहेंगे
उनको भी तो खबर होगी
दिल ए बेकरार की
तुम्हारी यादों को शब्दों में
किस तरह ढालूं
सुबह की धूप हो या
कली अनार की
कभी सावन कभी भादो
जैसी लगती हो तुम
सच क्या है देखूं
एक बार उम्र प्यार की।
वीरेंद्र