Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • हम सब

    आओ इस कल्पना की दुनिया में खो जाये
    हम सब एक हो जाये
    ये जात पात सब मिट जाये
    आओ सब अपने दुःख सुख में एक हो जाये
    आओ इस कल्पना की दुनिया में खो जाये
    हमारे सपनो में भी पंख लग जाये
    खुद खुश रहे और दुनिया में ख़ुशी फैलाये
    हम ज़िन्दगी में खूब उचे उड़े
    पर धरती को ना भूल जाये
    इस दुनिया के समुन्दर में तेर हम सफलता के मोती ले आये
    कभी डॉक्टर बन जाये तो कभी सैनिक बन जाये
    अपने देश के लिए कुछ कर जाये
    हम सब एक हो जाये
    आओ इस कल्पना की दुनिया में खो जाये

    हिमांशु के कलम की जुबानी

  • धृतराष्ट्र:- महाभारत के उत्तरदाई

    धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षाओं ने
    ही बीज बोया महाभारत का
    धृतराष्ट्र आंखों से अंधे थे
    उन्होंने दुर्योधन के
    व्यक्तित्व को अंधा बना दिया
    इतिहास धृतराष्ट्र को ही
    महाभारत का जिम्मेदार ठहराता है
    गलत नहीं है
    क्योंकि धृतराष्ट्र के पुत्र मोह ने ही
    दुर्योधन के ह्रदय में वैमनस्य के
    बीज बोए और उनको
    फलने-फूलने का अवसर दिया
    दुर्योधन मामा शकुनि की हाथों का पासा था
    और कर्ण की मित्रता का गुरुर
    जो उसे युद्ध भूमि की ओर
    अग्रसर करता चला गया
    सौ पुत्रों की मां कहलाने वाली गांधारी

  • एक भूल

    मैं आज जो निकली राहों पर
    यह राह मुझे बात सुनाती है
    कहे शर्म तो आती ना होगी
    मेरा घ्रणा से नाम बुलाती है
    कहे घूम रही चौराहों पे
    कोई वजह है या आवारा है
    पत्थर मुझे पत्थर कहते हैं
    धित्कारे चौक चौराहा है
    सूरज की किरण से शरीर जला
    सन्नाटा पसरा चारों ओर
    करें भयभीत भयावर नैनों से
    एक पवन का झोंका करे था रोश
    यहां आई तो मुझको पता चला
    प्रकृति खुद बनी पेहरी थी
    सिर अपना झुका घर लौट गई
    क्योंकि गलती तो मेरी थी
    फिर खुद पर बैठकर रोश किया
    क्यों देश नजर ना आया मुझे
    यह भूल फिर ना होएगी अब
    यह वादा कर लिया था खुद से

  • पहली मुलाकात

    जब तुझसे मेरी पहली
    मुलाकात होगी
    बिना बोले ही आंखों से
    सब बात होगी

    बिताकर कुछ पल जिंदगी
    के साथ तेरे
    फिर से हमारे प्यार की
    शुरुआत होगी

    तेरे चेहरे की मुस्कुराहट
    से दिल को सुकून आएगा
    बयां किए बगैर ही
    तू लफ्जों को समझ जाएगा

    क्या खूब हमारे प्यार
    का अफसाना होगा
    जब तेरे शहर में मेरा
    यूं आना होगा।

  • खुशी की ट्रेन

    चलो दर्द को भूल जाते हैं
    हंसी की ट्रेन पकड़ कर
    खुशी के संसार में जाते हैं
    पुरानी यादों में से ‘कुछ’ को चुनकर
    फिर से नई दुनिया बसाते हैं

  • प्यारी नर्स

    खुदा के फरिश्ते के रूप में तुम आती हो
    होठों पर मीठी सी मुस्कान लाती हो
    अपनी जिजीविषा और कर्मनिष्ठा से
    टूटी आशा को जगा जाती हो
    रोगियों में रोगों से लड़ने की
    क्षमता बता जाती हो
    हो भले ही अजनबी और अनजान चेहरा
    बन जाता है पल भर में परिवार तुम्हारा
    इस रिश्ते को बखूबी निभा जाती हो
    खुदा के फरिश्ते के रूप में तुम आती हो।।

  • माँ और रोटी का खुरचन

    जब भी देखता हूँ मैं
    इस रोटी के खुरचन को
    तो माँ आ जाती है यादों में।
    तवे पे रोटियाँ बनाती जब
    जला -जला के रोटियाँ की
    सौंधी सुगन्ध फैल जाती वातों में।।
    तोड़ -तोड़ के खुरचन सारे
    करती साफ रोटियों को।
    चुपड़-चुपड़ घी से मैया
    हमें खिलाती रोटियों को।
    जब पूछता कारण इसका
    मुस्कुरा के रह जाती माता।
    आ परदेश में अपने हाथों
    बना के रोटी जब भी खाता।।
    मैया याद में आती है और
    खुद हीं समझ जाता हूँ मैं।
    सेहतमंद यही रोटी है
    सबको अब बतलाता हूँ मैं।।

  • सफलता

    सफलता

    सफलता नहीं है कोई वस्तु
    सफलता है दृढ संकल्प की अग्नि
    सफलता को अगर पाना है तो
    सफलता के पीछे दौड़ लगाओ
    कमर कसकर समय के संग बढ़ना होगा
    आगे ही आगे बस आगे ही बढ़ना होगा
    खून पसीने को एक करके
    नंगे पांव ही चलना होगा
    लक्ष्य को अपने साध कर
    बांधाओ को लांघ कर
    किस्मत और लकिरों को भूल
    मेहनत करके बढ़ना होगा
    सफलता अगर पाना है तो
    बाधाओं से नहीं घबराना होगा
    हार को अपने स्विकार कर
    लक्ष्य पर निशाना साधना होगा
    संयम रखकर अपने ऊपर
    मुश्किल राह को चूमना होगा
    दिन रात के परछाई को
    उखाड़ दिमाक से फेंकना होगा
    निरन्तर करके प्रयास धरा पर
    सफलता को कैद करना होगा
    आंधी तूफान संग जो बहते
    चूमती सफलता कदम है उनकी

    ©️ महेश गुप्ता जौनपुरी

  • समंतराल

    ना दर्द है
    ना धूप है
    यह कैसी दुनिया लगे बेदर्द है

    हा खुश हूं मैं
    हा बेसुध हु मै
    अपने दुनिया मे बेशक सफल हु मै

    पर खलती तेरी कमी
    बेजान सी यह ज़िन्दगी
    यह आंखों की नमी ढूंढे तेरी गली

    यह सब कुछ लगे बेमाना
    जूठी लगे यह मेरा सफरनामा
    क्यों ज़माने के सब बंधन तोड़ तू नहीं मिलती

    हाथो की लकीरें क्यों नहीं मिलती जिस तरह कभी मिलती थी
    समंतराल सी क्यों जीते है हम अपनी अपनी ज़िंदगी में

    क्या मुझसे मिलने की कसीस तुझे भी होती है
    या खुदा यहीं दास्तान ए ज़िन्दगी सिर्फ मेरे लिए लिखी है

  • जीने का हक

    माँ से बोली एक बेबस बेटी:-

    अविस्मरणीय है कोख तेरी माँ
    जिसमें स्फुटित हुई हूँ मैं ।

    तुझे किसने बता दिया है माँ
    बेटा नहीं बेटी हूँ मैं ।

    तभी से तू बेसुध है तेरे चेहरे की मुस्कान उड़ी
    चिन्ता ने तुझको आ घेरा मेरे जीवन पर आन पड़ी।

    तू भी तो एक बेटी है माँ फिर क्यों इतना पश्चाताप करे दुनिया वालों की खातिर तू ‘भ्रूण हत्या’ का पाप करें।

    गर्भ में ना मार मुझे हाँथ जोड़
    बोली बेटी ये——

    अभी-अभी तो साँस मिली है
    माँ उसको तुम मत छीनों।

    ममता की छाँव नहीं दे सकती हो पर
    ‘जीने का हक’ तो मत छीनों ।

  • रोटी का खुरचन

    अक्सर कहा करता था मैं
    माँ जाऊँगा परदेश को।
    “”ना ना वश कर”कहती
    माँ को मत कलेश दो।।
    दृढ़ संकल्प होकर ऐसा
    एक दिन निश्चय कर डाला।
    आजिज होकर मान गई
    और कहने तू सुन ले लाला।।
    खाना पकाना हाथ का खाना
    बाहरी को ना हाथ लगाना।
    तवे पड़ा रोटी का खुरचन
    मेरे ख़ातिर लेकर तू आना।।
    साल महीना काट के आया
    जब मैया के पास में।
    आखिर खुरचन क्यों मंगवाई
    बोलो मैया साथ में।।
    जली हुई रोटी अच्छी है
    कहीं कच्ची रोटी खाने से।
    ‘विनयचंद ‘तो समझ गया
    और कहता आज जमाने से।।
    माँ तो माँ होती है इसकी
    ममता का कोई हिसाब नहीं।
    बच्चों की जाँ तो माँ होती है
    करना कभी बुरे बर्ताव नहीं।।

  • तेरी परछाई

    सुनो ना मां!
    मत घबरा मेरे आने से
    मुकम्मल हो जाएंगे दोनों
    एक नए बहाने से
    तेरे पंख मेरी उड़ान होगी
    जमाने में अपनी नई पहचान होगी
    तेरी परछाई बन तेरे ख्वाबों
    को चुन लूंगी
    कह ना पाई जो तू किसी से
    वह मैं सुन लूंगी
    बेटी हूं तेरी , तेरा साथ निभाऊंगी
    तेरे सम्मान के खातिर दुनिया
    से मैं लड़ जाऊंगी
    इस बेरंग जहान में आओ
    रंग भरते हैं
    चल ना मां एक नए सफर पर चलते हैं ।

  • गूंगी लड़की

    गूंगी लड़की
    —————
    रात्रि के अंधकार में,
    नहा जाती वह दूधिया प्रकाश से।

    जब उसकी कहानी के
    पसंदीदा किरदार
    उसको घेरे खड़े होते।

    बेबाकी से वो दिखा देती
    अपने दिल में उठे
    ज्वारभाटो के निशान
    कह देती वो बात
    जो शायद जुबां से ना कह पाती।

    हृदय के बंद कमरे में
    बजते संगीत से उठती
    स्वर लहरियां
    छिड़ते तार।

    अंदर था कोलाहल
    बाहर मौन।

    गूंगी लड़की के समान थी y
    जो सिर्फ
    इशारों में ही
    बात समझ जाती।

    कठपुतली सी
    नाचती रहती चारो ओर।

    खोल देती ताले लगे द्वार
    और प्रिय का करती इंतज़ार.
    ख्वाबों में हाथ पकड़
    आलिंगन में बंधी
    चल पड़ती उस राह पर
    जहां वो जाना चाहती थी
    हर बार।

    निमिषा सिंघल

  • किन्नर

    किन्नर
    ——–
    व्यंगात्मक हंसी में भी प्रेम तलाशते,
    अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर यह संवेदनाओ से भरे हृदय
    अपनी दो जून की रोटी के लिए
    आपके घर खुशियों के मौकों पर
    भर भर झोली दुआएं दे जाते हैं।
    बदनसीबी की रेखाएं
    हाथ में लेकर पैदा हुए ये इंसान….
    मां बाप के दुलार के लिए तड़पते ही रह जाते हैं।

    जिन की दुआएं औरों के लिए आसमानों में क़ुबूल की जाती है…
    अपने लिए दुआओं के नाम पर इनकी झोली खाली ही रह जाती है।

    एकांत में भगवान से शिकायत करते ये इंसान
    मांगते हैं बस एक ही दुआ
    हे भगवान !अगले जन्म में मुझे ये रूप ना देना।

    अपने दुखों को ताली बजा- बजाकर कुछ कम करना चाहते हैं
    और आपके सुख में ताली बजा नाच गाकर
    आपकी खुशी के लिए दुआएं दे जाते हैं।

    घटिया मानसिकता रखने वाले लोग
    इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं
    कोई पूछे इस धुले- पुछे समाज से…
    आखिर गलती क्या है इनकी जो इन्होंने इस रूप में जन्म पाया!

    भगवान ने भी एक ही शरीर में स्त्री-पुरुष दोनों के गुण देकर इनको छला है।

    जब ये रूप भगवान ने ही दिया है
    तो फिर किस बात का मजाक…
    किस बात की घिन…
    क्यों व्यंग बाण चला चला कर पहले से ही छिदे हुए दिल में और छेद कर देना …
    इस क्रूर समाज की नियति बन चुका है।

    इनकी पैदाइश भी बदकिस्मती और मौत उससे भी बड़ा परिहास…

    जूते चप्पलों से मारकर बुरी तरह मृत शरीर को घसीटा जाता है।

    इस तरह एक सुंदर आत्मा को इस क्रूर संसार से विदा किया जाता है।
    यह कहकर
    इस रूप में फिर वापस ना आना किन्नर।
    तुम फिर वापस ना आना इस रूप में किन्नर
    ——————-
    निमिषा सिंघल
    ——————-

  • दायरे

    किन्नर
    ——–
    व्यंगात्मक हंसी में भी प्रेम तलाशते,
    अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर यह संवेदनाओ से भरे हृदय
    अपनी दो जून की रोटी के लिए
    आपके घर खुशियों के मौकों पर
    भर भर झोली दुआएं दे जाते हैं।
    बदनसीबी की रेखाएं
    हाथ में लेकर पैदा हुए ये इंसान….
    मां बाप के दुलार के लिए तड़पते ही रह जाते हैं।

    जिन की दुआएं औरों के लिए आसमानों में क़ुबूल की जाती है…
    अपने लिए दुआओं के नाम पर इनकी झोली खाली ही रह जाती है।

    एकांत में भगवान से शिकायत करते ये इंसान
    मांगते हैं बस एक ही दुआ
    हे भगवान !अगले जन्म में मुझे ये रूप ना देना।

    अपने दुखों को ताली बजा- बजाकर कुछ कम करना चाहते हैं
    और आपके सुख में ताली बजा नाच गाकर
    आपकी खुशी के लिए दुआएं दे जाते हैं।

    घटिया मानसिकता रखने वाले लोग
    इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं
    कोई पूछे इस धुले- पूछे समाज से…
    आखिर गलती क्या है इनकी जो इन्होंने इस रूप में जन्म पाया!

    भगवान ने भी एक ही शरीर में स्त्री-पुरुष दोनों के गुण देकर इनको छला है।

    जब ये रूप भगवान ने ही दिया है
    तो फिर किस बात का मजाक…
    किस बात की घिन…
    क्यों व्यंग बाण चला चला कर पहले से ही छिदे हुए दिल में और छेद कर देना …
    इस क्रूर समाज की नियति बन चुका है।

    इनकी पैदाइश भी बदकिस्मती और मौत उससे भी बड़ा परिहास…

    जूते चप्पलों से मारकर बुरी तरह मृत शरीर को घसीटा जाता है।

    इस तरह एक सुंदर आत्मा को इस क्रूर संसार से विदा किया जाता है।
    यह कहकर
    इस रूप में फिर वापस ना आना किन्नर।
    तुम फिर वापस ना आना इस रूप में किन्नर
    ——————-
    निमिषा सिंघल
    ——————-

  • ♥️♥️वो माँ होती है ♥️♥️

    ♥️♥️mother’s day special♥️♥️

    जो नज़रो से परख ले
    वो माँ होती है ।
    दर्द को दिल में जो रख ले
    वो माँ होती है ।

    कर कोई काम तू बुरा
    खुदा से चाहे हो छुपा
    जो तेरा चेहरा भांप ले
    वो माँ होती है ।

    जो तुझको जन्म दे
    तेरे मुख को चूम ले
    हो तू कष्ट में तो रोती है
    वो माँ होती है ।

    जो कष्ट तेरे छीन ले
    चुभते काँटे बीन ले
    तुझपे प्यार वार दे
    वो मां होती है ।

    जब कभी तू उदास हो
    भले कोई ना पास हो
    जो सदैव साथ दे
    वो मां होती ।

  • मोर मन के परेवना

    मोर मनके परेवना
    ★★★★★★★

    कोयली कस कुहकत जीवरा के मैना न |
    महकत अमरैय्या गोंदा तय फूले जोहि ||

    मोर मन म बसे हिरदे के परेवना ओ |
    संगी घलो हर झूमत नजरे नजर म न ||

    लाली कस परसा दिखत रुपे ह तोरे ओ |
    दिखत रिकबिक घलो टिकली सिंगारे ह ||

    तोरेच आगोरा म जीवरा ह संगवारी न |
    कलपत हिरदे हावे रतिहा आगोरा ओ ||

    नइ मिले थोड़कुन आरो ह तोरेच जोहि |
    मन मे पीरा घलो मन कुमलाये भारी न ||

    तिहि मोर परेवना अस सुवा तय मोर घलो |
    आसा मोर मनके घलो हिरदे के जीवरा ओ ||

    दगा झन दे मोला बगिया के गोंदा ओ |
    पीरा हिरदे म हावे घलो मन ह भारी न ||

    तेहर तो जल्दी आजा मोर तय परेवना ओ |
    तोरेच आगोरा म हिरदे हर जुड़ावत हावे ||
    योगेश ध्रुव”भीम”

  • मां तू मां है

    “माँ तू माँ है” योगेश ध्रुव”भीम”
    ************************
    माँ तू जननी है,
    तूने मुझे,
    कोख में,
    पाला,
    नौ माह तक,
    जन्म दी,
    इस वसुंधरा का,
    दर्शन कराई,
    जननी हो न,
    खुद दुख सहकर,
    सुख का भोग कराई,
    हाँ माँ,
    नदियों के नीर की,
    निर्मलता की धार हो,
    शीतल चन्दन हो तुम,
    तू ही तो हो,
    मुझे चलना सिखाई
    मेरे हर पगो का सहारा बनी,
    मुझे बातें करना सिखाई,
    हाँ माँ,
    मुझे सिखाई बाते करना,
    मैं आपके बाग का,
    फुलवारी हुँ,
    हाँ माँ,
    आप खुद भूखी रहती,
    खिलाती मुझे,
    भर पेट भोजन,
    न अघाउँ तब तक,
    मेरे तुतली जुबा रोना,
    संगीत है आपका,
    खुद रहती बीमार,
    पिलाती दवा मुझे,
    आप तो ममता की,
    अथाह समुद्र हो,
    हाँ माँ,
    मुझे सूखे में,
    सुलाती,
    खुद गीले में सोती,
    रात-रात भर,
    केवल और केवल खुद,
    जगती,
    मेरे लिए,
    और सुलाती मुझे,
    हाँ माँ !!
    मेरे हर दर्द का अहसास,
    खुद ब खुद करती,
    हाँ माँ!!
    ममता की करती बौछर,
    और पूरी करती मेरी आस,
    आप तो विशाल बरगद हो,
    जिसमें ममता की,
    छायाँ फलती फूलती है,
    तेरे डाँट फटकार में,
    छिपी होती है प्यार,
    ममता की आँचल में,
    आश्रय दी मुझे,
    हाँ माँ !!
    मेरे बचपन से,
    यौवन तक का सफर,
    हर उस कष्ट में,
    हाँ,
    मुझे सहारा दी,
    मेरे हर बातों को,
    पहुँचती बाबुल तक,
    करती मेरे,
    ख्वाइस को पूरा,
    बचाती बाबुल के,
    डाँट से,
    ओ मेरी अच्छी माँ,
    प्यारी माँ,
    आप तो,
    ममता की सिंधु हो,
    मुझे काबिल,
    इंसान बनाने में,
    आपके हरेक,
    पसीने के बून्द है,
    ममतामयी,
    ओ प्यारी माँ,
    हाँ,
    हाथ है आपका,
    कहता है,
    इसलिए भीम,
    माँ तो माँ होती है,
    ओ प्यारी माँ,
    ओ मेरी भोली माँ,

  • इम्तिहा

    “इम्तिहा” योगेश ध्रुव “भीम”

    “जिंदगी की डोर खिंचते चल पड़े हम,
    मंजिल की तलाश पैरो पर छाले पड़े”

    “बिलखते हुए सवाल लिए पापी पेट का,
    दर-दर भटकते लेकिन हल ढूढ़ते ढूढ़ते”

    “चिराग जलाते हुए जीने की तमन्ना लिए,
    दर्द बयाँ करू कैसे चिराग तु बुझाते चले”

    “डगर भी कठिन इम्तिहा की मौन है हम,
    मेरे परवर दिगार रहम नाचीज पे तू कर”

  • मधुशाला

    मधुशाला खोल के भारत ने
    हरिवंश राय बच्चन की रचना को
    चरितार्थ किया
    मंदिर-मस्जिद बैर कराते
    मेल कराती मधुशाला
    फैली है चारों ओर
    महामारी फिर भी
    खुली हुई है मधुशाला
    पूरा भारत है लाक डाउन
    पर खुली हुई है मधुशाला
    बढ़ता जा रहा है कोरोना संक्रमण
    फिर भी खुली हुई है मधुशाला
    लम्बी है कतार जहाँ पर
    खुली हुई है मधुशाला
    सोशल डिसटेंसिग का
    उल्लंघन है
    जहाँ खुली है मधुशाला

  • अजन्मी बेटीयां

    बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा बहुत प्यारा है
    नाक के नीचे बेटी मरती ऐंसा हिन्दुस्तान हमारा है

    जोर शोर में लगे है नेता जी बेटी को बचाने में
    नेता जी के कार्यक्षेत्र में दम तोड़ रहीं है बेटी नाले में

    सहकारी अस्पतालों में हो रहा कर्म काण्ड बेटी का
    चन्द रूपये के खातिर विनाश हो रहा है बेटी का

    धन के लोभ में डाक्टर बाबू भी बने है कसाई
    इज्जत के सारे जंजीरों को है अब बेंच खाई

    निज अखबार के पन्नों पर बेटी का गुणगान है होता
    शाम ढले बेटी का मारने का इंतजाम है होता

    अस्मत लूटते दिन रात यहां दिखलाकर सपने बड़े बड़े
    बेटी का यौवन निहारते नेता जी खड़े खड़े

    फिता काटते बेटी बचाओ अभियान का शर्म हया बेंच खाई
    खूद की लुगाई का अबार्शन करवाकर ज्ञान देते देखो भाई

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • पैरों तले होंगे आसमां कितने?

    आज उनकी गली में उजाले होंगे
    जमीं पर पर बिखरे
    अनगिनत सितारे होंगे
    पैरों तले होंगे आसमां कितने?
    नजरों में जन्नत के नजारे होंगे
    कितनी मसरूफ है जिंदगी अपनी
    उनके जहां में सुकून के
    आलम ढेर सारे होंगे
    हमसे गमों का बोझा ढोया नहीं जाता
    वह खुशियां कितनी शिद्दत से
    धागे में पिरोते होंगे।

  • चलो फिर से गांव चलते हैं

    चलो साथी फिर से गांव चलते है
    कुछ बचें होंगे पेड़ गर वहां छांव ढूंढते हैं
    आम भी तो आए होंगे,जामुन भी इतराए होंगे
    बचपन के फिर से वो पल ढूंढते हैं
    चलो साथी फिर से गांव चलते हैं
    पुरानी नीम के नीचे सब चौपाल लगाएंगे
    बड़की काकी को फिर से अपने पीछे दौड़ायेंगे
    बहुत रह लिया परदेस में ,अब अपने घर को चलते हैं
    चलो साथी फिर से गांव चलते हैं
    रखा होगा मां ने अचार , चटकारे लगाएंगे
    कोयल की कुहू को हम भी दोहरायेंगे
    गांव जाती सड़क पर फिर दौड़ लगाएंगे
    उड़ गए हैं जो रंग जिंदगी के उन रंगों में रंगते हैं
    चलो साथी फिर से गांव चलते है
    गांव से निकले हैं तो खोई पहचान है
    हम कल भी अजनबी थे और आज भी गुमनाम हैं
    इस खाली कैनवास पर यादों को सजाते हैं
    चलो साथी फिर से गांव चलते हैं।

  • आज की नारी

    मैं आज की नारी हूँ

    न अबला न बेचारी हूँ

    कोई विशिष्ठ स्थान

    न मिले चलता है

    फिर भी आत्म सम्मान बना रहा ये

    कामना दिल रखता है

    न ही खेला कभी women कार्ड

    मुश्किलें आयी हो चाहे हज़ार

    फिर भी कोई मेरी आवाज़ में आवाज़

    मिलाये तो अच्छा लगता है

    हूँ अपने आप में सक्षम

    चाँद तारे खुद हासिल कर लूं

    रखूँ इतनी दम

    फिर भी कोई हाथ बँटाये तो

    अच्छा लगता है

    हो तेज़ धूप या घनी छाँव

    डरना कैसा जब घर से

    निकाल लिए पांव

    फिर भी कोई साथ चले तो

    अच्छा लगता है

    जीवन कैसा बिन परीक्षा

    जहाँ लोगो ने

    न की हो मेरी समीक्षा

    फिर भी कोई विश्वास करे

    तो अच्छा लगता है

    गलत सही जो भी चुना

    अपना रास्ता आप बुना

    फिर भी कोई कदमो की

    निगहबानी करे

    तो अच्छा लगता है

    अपने अधिकार भलिभाँति

    जानती हूँ

    क्या अच्छा क्या बुरा

    पहचानती हूँ

    फिर भी कोई परवाह करे तो

    अच्छा लगता है

    नहीं लगता मुझे अंधेरों से डर

    हार जीत सबका दारोमदार

    मुझ पर

    फिर भी एक कान्धा हो सर रखने

    तो अच्छा लगता है

    मैं शौपिंग करूँ तुम बिल भरो

    लड़कियों थोड़ी शर्म करो

    फिर भी कोई ये अधिकार मांगे तो

    अच्छा लगता है

    औरत होना पहचान है मेरी

    और बाजुए भी

    मज़बूत है मेरी

    फिर भी कोई बढ़ कर दरवाज़ा

    खोले तो अच्छा लगता है

    बस इतना ही है अरमान

    खुद बना लूँगी मैं रोटी

    कपडा और मकान

    सिर्फ थोडा सम्मान मिले तो

    अच्छा लगता है ..

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • गंगापुत्र:-भीष्म पितामह

    भीष्म पितामह श्रेष्ठ योद्धा
    भारत का मान बढ़ाते हैं
    अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ते
    रण में लड़ने जाते हैं
    हस्तिनापुर की सीमाएं सुरक्षित
    करने का
    प्रण ह्रदय में लेकर वह
    प्रिय पाण्डवों के सामने उपस्थित हो
    युद्घ को तत्पर हो जाते हैं
    दिग्विजयी गंगापुत्र
    ना अस्त्र उठायेंगे नारी पर
    यह भीष्म प्रतिज्ञा लेते हैं
    अपनी मृत्यु को स्वयं बताकर
    प्रिय अर्जुन के तीरों से
    छलनी हो जाते हैं
    धन्य है भारत की धरती
    जिसपर ऐसे शूरवीर ने
    जन्म लिया
    भीष्म पितामह की
    निष्ठा से भारत माता का
    मान बढ़ा
    जय हो भीष्म पितामह की
    जय हो
    उस परशुराम के शिष्य की
    जय हो।

  • जन्मदिन शुभकामना

    तेरे हाथ की हथेली पर मैं
    क्या उपहार की भेंट करूँ
    काबिल नहीं हूं इतना मैं आज
    जो तुझको कुछ भेंट करूँ।

    देने को बस मेरे पास में
    तुझको प्यार और सम्मान है
    प्रार्थना है बस इतनी ईश्वर से
    आशीषों से वर्षा फुहार करें।

    उम्र तेरी हो इतनी लंबी
    जितनी सूर्य से पृथ्वी है
    पैरों में हो फूलों की चादर
    काँटों से कभी न पार करें।

    आज आपके जन्मदिवस पर
    बस इतनी सी है अभिलाषा
    रहो सदा खुश अपने जीवन में
    गमों का कहीं न नाम रहे।।

  • माता सीता

    वो प्यारी सी नन्ही सी कली थी
    धरती से वो जन्मी थी
    जनक जी के महल में लेकिन
    पाली पोसी और बड़ी हुई थी
    मखमल पर ही सोती थी वो
    कुछ भी कष्ट न देखे थी
    जैसे ही वो बियाही गई फिर
    कष्टों में ही वो जीती रही
    न सुख पाया उसने रानी का
    न पाया सुख कोई और
    रही भटकी फिर वन वन सीता
    बाल्मीकि जी की शरण मिली
    फूल उठाना भी भारी था जिसको
    वन से लकड़ी काटती रहीं
    स्वयं ही अपनी रसोई बना कर
    अपने बच्चों में खोई रहीं
    देकर प्रमाण वो आई थी महल में
    फिर भी किसी ने मानी थी
    किया विरोध सभी ने उसका
    निष्पाप को पापी मानती रही
    कष्टों को ही झेल रही थी
    फिर प्रमाण की बारी आई
    दिया प्रमाण फिर सीते ने ऐसा
    सबकी बोलती बंद करी
    चली गई जहां से आई थी
    पृथ्वी माँ को गोद में
    देकर प्रमाण वो अपने जीवन का
    सदा के लिए वो सो गई।।

  • वायरस

    वायरस
    ——–
    वायरस हो क्या!
    जो लहू में संक्रमण की तरह फैलते ही जा रहे हो।
    या फिर परिमल जिस की सुगंध खींच लेती है अपनी ओर।
    या व्योम में अंतर्ध्यान शिव
    जो जग को मोहित कर लीन है तपस्या में।
    या फिर सूरज
    जिसकी ऊर्जा से जीवन पाता है यह संसार।
    या फिर विशाल गहरे सागर हो तुम
    जो हर अच्छाई बुराई को अपने अंदर समा लेते हो कुछ नहीं कहते।
    या वैद्य हो
    जो प्रेम में पनपी
    व्याधियों को ठीक कर देता है।
    शायद गंधर्व के वाद्य यंत्र से उपजे ध्रुपद हो तुम।
    जिसका माधुर्य लावण्यता अलंकृत कर देती है मुझे।
    ठुमरी की थिरकन में बसी ताल हो तुम
    कुछ भी हो बेमिसाल हो तुम।
    ____________________
    निमिषा सिंघल
    ___________

  • और क्या चाहिए …………

    दर्द ए दिल कि दवा चाहिए
    तु बस आ,कुछ ना चाहिए
    खामियाजा महोब्बत का भुगत रहा हूँ
    तुझसे दुर होने का हौसला चाहिए
    तुम बीन जिना,अब मुश्किल सा हो गया है
    अब तु ही बता,और क्या चाहिए ।।

    तुम्हारी खुमारी इस कदर सी लगी है
    तुम्हारी बिमारी इस कदर सी लगी है
    तुम्हारे अलावा कुछ,ना चाहिए
    अब तु ही बता,और क्या चाहिए ।।

    बीन तेरे क्या,जिन्दगी हो गयी है
    हर एक खुशी में कमी हो गयी है
    आलावा तुम्हारे कुछ दिखता नहीं है
    इतना हुआ ,कि जान चाहिए
    अब तु ही बता और क्या चाहिए ।।

  • श्रीराम और हनुमान

    मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हुए जब।
    भक्त शिरोमणि हनुमान हुए तब ।।
    बन मातु पिता के आज्ञाकारी
    श्रीराम अयोध्या छोड़ गए।
    श्री राम के सेवा ख़ातिर हनुमत
    निज मातु पिता भी छोड़ गए।।
    ऐसे स्वामी सेवक को
    प्रभुरुप वन्दना करते हैं हम।
    ‘विनयचंद ‘मर्यादित नर
    नारायण कहलाते हैं वर।।

  • धन्य हो अन्नदाता

    धन्य हो अन्नदाता

    इस वैश्विक कोरोना महामारी में
    लड़ते किसान सुबह शाम खेत में
    बन्द पड़े सब कमा काज
    दबे देखो कोरोना का राज
    देश के मेहनती किसान
    है देखो बहुत ही परेशान
    नहीं है डर कोरोना का
    नहीं है डर मर जाने का
    भरना है पेट देश के मेहमानों का
    खटिया खड़ी देश के कारोबारियों का
    लडना है वैश्विक कोरोना के प्रकोप से
    देश बर्बाद हो रहा बस आरोप से
    मेरा तन मन सब समर्पित है
    दाने का एक एक टुकड़ा अर्पित है
    देश के मेहमानों के लिए
    कोरोना के प्रकोप के लिए
    लडना बहुत जरूरी है
    मेरा हाथ जोड़ कर विनती है
    घर में रहो घर में रहो यही निवेदन है
    पालन करो लाकडाउन का यही अनुमोदन है

    महेश गुप्ता जौनपुरी

  • दास्तां -ए- सैनिक

    एक सैनिक की यही दास्तां है
    वैसे तो सदा वह गुमनाम होता है
    हो जाए शहीद बस तभी नाम होता है
    देश की रक्षा कर चिर ख़ामोशी में सो जाता है
    फिर कौन याद करता है ? किसे याद आता है ?
    है एक सवाल ! जो उसे भी याद आता होगा
    शहादत के समय मन में कौंध जाता होगा ,
    बुढ़ापे की लाठी बनने का धर्म भी तो निभाना था
    रहेगा ताउम्र किसी की मांग में सिंदूर ये भरोसा भी दिलाना था
    इसी उधेड़बुन में उसे फिर कुछ याद आता होगा
    देश है सर्वोपरि यह सोच जाता होगा ।।
    और फिर लड़ते-लड़ते चिर निद्रा में सो जाता होगा।
    ऐ मेरे देश ! सैनिकों को कुछ तो मान दो
    उनकी हिम्मत और जज्बे को थोड़ा सम्मान दो
    माना कि रक्षक वह है पर थोड़ा कर्तव्य उठा लो तुम
    उनके परिवार के खातिर थोड़ी वफादारी निभा लो तुम
    आतंकवाद का सफाया कर उनकी भी जान बचाना है
    है अनमोल उनकी भी जान ये विश्वास उन्हें दिलाना है
    सैनिक केवल एक जान नहीं अपने परिवार की जान हैं
    देश सहित ना जाने कितनी उम्मीदों का पैगाम है।
    Kanchan dwivedi

  • चंद मुक्तके – विजय हमारी है |

    चंद मुक्तके – विजय हमारी है |
    प्रभु की माया होगा कोरोना का सफाया |
    इसी मंसा मोदी ने लोक डाउन लगाया |
    चहुं ओर मचाया हाहाकार छुपा दुशमन |
    धीरे धीरे सबने मिलकर है असर घटाया ||1||

    लौटकर खुशी फिर घर सबके लुभाने लगी |
    बच्चो की खुशिया उछल कूद मचाने लगी |
    बूढ़े जवान सभी लेते सांस राहत की अब |
    उठाया कदम दमन अब असर दिखाने लगी ||2||

    ग्रीन गुलाबी लाल रंगो बंटा देश का हिस्सा |
    हटी पाबन्दिया कुछ कही मर्ज का किस्सा |
    किया इतना सब्र थोड़ा और कर लेंगे हम |
    खड़ा किया जो हउआ कट बचा मात्र बित्ता ||3||

    लड़ना जिवन का काम चाहे दुशमन शैतान |
    होगी विजय हमारी लड़ेंगे नहीं करेंगे आराम |
    होगा जो नियम हम हर हाल मे मान लेंगे |
    रासन पानी कि किल्लत ना करेंगे घमासान ||4||
    खुद से ज्यादा रक्षा वतन की प्यारी है |
    भारत की आन बान शान सबसे न्यारी है |
    न थकना न रुकना ना झुकना है हमे |
    खुल जाएँगे सारे बंधन जो हमने गुजारी है||5||

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • कविता- जीत लेंगे |

    कविता- जीत लेंगे |
    अबतक तो जीते है हम आगे भी जीत लेंगे|
    विजय भारत नाम इतिहास पन्नो लिख लेंगे |
    लड़ी है लड़ाइया कितनी हार ना मानी हमने |
    छुपे दुश्मन कोरोना को हम बाहर खींच लेंगे |
    भारत हर खासो आम देश के साथ लड़ाई मे |
    जरूरत पड़ी वतन को अपने लहू सींच लेंगे |
    थोड़ा असर तो दिखाया दुशमन ने आते आते |
    मरने ने देंगे किसी अपने उसे बांहों भींच लेंगे |
    कभी डरे नहीं क्यो डरे हम दुश्मन कायर से |
    हमारी लड़ाई हम ही लड़कर खुद जीत लेंगे |
    अपना ही नहीं हमे दुनिया का भी ख्याल है |
    बचाकर जान गैरो दुनिया को हम सीख देंगे |
    फैलाया कोरोना वाइरस चीन मानवता दुशमन |
    सुखी रोटी खाये मगर ना हम उससे भीख लेंगे |
    हो चुका अधमरा कोरोना कातिल अबतब है |
    निकलेंगे जल्द हम घरो ईश्वर हम आशीष लेंगे |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286

  • शूरवीर

    आज फिर गूँज उठा कश्मीर

    सुन कर ये खबर

    दिल सहम गया

    और घबरा कर हाथ

    रिमोट पर गया

    खबर ऐसी थी की दिल गया चीर

    हैडलाइन थी

    आज फिर गूँज उठा कश्मीर

    फ़ोन उठा कर देखा तो

    उनको भेजा आखिरी मेसेज

    अब तक unread था

    न ही पहले के मेसेज पर

    blue tick था

    ऑनलाइन status भी घंटों पहले

    का दिखला रहा था

    अब मेरा जी और ज़ोरों से घबरा रहा था

    सोचा रहा था

    उस खबर में कही एक नाम उनका न हो

    जिसमे लिखा था

    आज फिर देश ने खोया अपना शूरवीर

    आज फिर गूँज उठा कश्मीर

    सुद्बुध खो के बस फ़ोन

    देखे जा रही थी

    रह रह के उनकी

    बातें याद आ रही थी

    तुम एक शूरवीर की पत्नी हो

    और मेरे शहीद होने से डरती हो

    मेरी तो ये इच्छा है के मैं

    एक दिन तिरंगे में लिपट कर घर आऊं

    बहुत शिकायत करती हो तुम

    फिर हमेशा के लिए तुम्हारे

    साथ ठहर जाऊँ

    उनकी ये बातें दिल भेद देती थी बन कर तीर

    फिर अचानक मन वर्तमान में आ पंहुचा

    जहा सुना था

    आज फिर गूँज उठा कश्मीर

    सोते जागते उठते बैठते

    मैं सिर्फ सोच रही थी

    अपने बारे बारे में

    और भूल गई

    जिनका नाम शामिल था आज

    शहीदों की लिस्ट में

    जाने ये सुनकर, उस

    माँ पर क्या बीत रही होगी

    जब ये खबर उन तक पहुँची होगी

    के नहीं रहा उनका शूरवीर

    जाने वो पत्नी खुद को और

    पुरे घर को कैसे संभालती होगी

    ऊपर से मज़बूत दिखती होगी

    पर भीतर बहा रही होगी नीर

    जब से सुना होगा

    आज फिर गूँज उठा कश्मीर

    इतना आसन नहीं इन शूरवीरों की

    शौर्य गाथा गा पाना

    अपना प्रेम छिपा कर

    एक पत्नी और माँ का कठोर

    हो पाना

    जाते जाते अपने वीर को

    मुस्कुरा कर विदा कर पाना

    सच पूछो तो उसकी वीरता सुन के

    सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है

    पर उसके साथ ही शरीर बिन

    प्राण का हो जाता है

    जब उसकी शहादत पर

    पर सारी दुनिया को होती है पीर

    सब रोते हैं जब

    ये देश खोता है अपना शूरवीर

    दहल जाते हैं सभी सुन के

    आज फिर गूँज उठा कश्मीर

    तभी फ़ोन विडियो कॉल से बज उठा

    इन प्राणों में प्राण आये

    जब देखी उनकी तस्वीर

    सारे आँसू पोंछ लिए उसी पल

    क्योंकि नहीं दिखना चाहती थी

    साहसहीन

    पर मेरी नज़रों को वो भाप गए

    और बोले

    मैंने कहा है न के

    मैं वापस आऊँगा

    चाहे तिरंगे में लिपट कर

    या अपने पैरों पर चल कर

    फिर क्यों होती हो ग़मगीन

    मैं भी उनके साथ मुस्कुरा तो दी

    पर दिल में वो डर हमेशा रहता है

    जब गूँज उठता है कश्मीर ….

    उरी ,पुलवामा ,हंदवारा के शहीदों और भारतीय सेना के शूरवीरों को मेरी भावपूर्ण श्रधांजलि

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • दीदार -ए-माहताब

    नजरें चाह रही दीदार-ए-माहताब का
    नाचीज़ को क्या पता अमावस भी होती है।

  • तुमको लिखा करूंगी

    अब से मैं प्यार लिखूंगी

    तो तुमको लिखा करूंगी

    वो शामें मेरी ,जो तुम पर

    उधार हैं , उन पर

    ख्वाब लिखूंगी

    तो तुमको लिखा करूंगी

    वो गलियाँ जिन पर तेरे

    वापस आने के निशान नहीं

    उन पर इंतजार लिखूंगी

    तो तुमको लिखा करूंगी

    धड़क जो हुई कुछ तेरे नाम

    सा सुन कर

    उन पर एहसास लिखूंगी

    तो तुमको लिखा करूंगी

    कभी जो मायूसी मुझसे

    आ लिपटी

    उन पर शाद लिखूंगी

    तो तुमको लिखा करूंगी

    दर्द और ज़िन्दगी

    दोनों तुमसे मिले

    उन पर ख्याल लिखूंगी

    तो तुमको लिखा करूंगी

    जो न कह पाऊँगी अब

    तुमसे कभी

    उन पर कविता लिखूंगी

    तो तुमको लिखा करूंगी ….

    और इस तरह तुम्हारी

    याद में

    तुमको भुलाने

    तुमको लिखा करूंगी….

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”

  • आवारा सावन

    सावन के एक एक बूंद जो गिरा मेरे होंठो पे।
    कैसे बयां करू अपनी दास्तां इन सुर्ख होंठो से।।
    उन्हें क्या पता कब चढी सोलहवां सावन मुझ पे।
    आ कर एक मर्तबा देख तो ले क्या गुजरा है इस दिल पे।।
    बहकने लगे है मेरे कदम यही बेईमान फीजाओ में।
    उलझन में फंस गए हम इसी बरस के सावन मे।।

  • दायरे

    दायरे
    ____
    ****
    दायरे थे ही नहीं मानव की लालसा के!
    हर तरफ फैलाव था पैर पसारे।
    जीव सीमट रहे थे दायरो में….

    लुप्त और लुप्तप्राय होते जीव
    सिर्फ किताबो में छपी तस्वीर बनते जा रहे थे।

    बंजर होती धरती ….
    सिमटते वनस्थल….

    त्राहिमाम की कर्कश ध्वनि ….
    जीवो का हाहाकार….
    कानों को भेदता,
    मानव का क्रूरतम अट्टहास।

    बेलगाम मानवता…
    दिखावटी जीवन …..
    आधुनिक बनते हम।

    लहूलुहान धरती….
    कटते, सूखते दरख़्त…..
    टूटते पहाड़, मौसम के बदलते मिजाज।

    अचानक !
    रुक गया सब कुछ..
    कस गई लगाम…
    बंधक हम सब…
    जीव जंतु बेलगाम

    सूनी नहीं है राहें! मानव के बिना
    शांत है बस….

    जहां कभी दिखते भी न थे जीव जंतु …..
    आज बिना किसी रोक-टोक …
    पूरी आजादी से …
    बिना किसी डर के ..
    नाचते हैं ये सब।

    प्रातः बेला….
    पक्षियों के गीत…
    हवाओं का संगीत…..
    भीनी स्वच्छ पवन …
    अद्भुत सुंदरता लिए अंबर…

    उस पर उगता..
    सुनहरी आभा लिए सूर्य..
    अद्भुत, अद्वितीय नजारे।

    स्वच्छ निर्मल नदियां . …
    जैसे मिट गए हो
    मलीनता के सारे दाग…
    उदास नदियां मुस्कुरा उठी हैं जगमगा रही हैं..
    और मानव!
    बेड़ियों में जकड़ा लाचार निशब्द..
    बढ़ती लालसा अचानक सिमट गई हैं ..
    दायरो में रहना सीख ही लिया आखिर मानव ने….।

    महसूस किया होगा
    उस घुटन को जो मानव ने अपने कृत्यों से पूरी कायनात को जबरदस्ती थोप कर भेंट दी थी…

    अब सिमट रहे हैं दायरे मानव के….
    दिन पर दिन छोटे होते जा रहे हैं।

    बेबस मानव दायरो में रहना सीख रहा है।

    जैसे जीव जंतु सिमट गए थे
    मानव की बढ़ती लालसा के कारण दायरों में।

    आज मानव उन्हीं दायरो में सिमटा है
    अपनी आजादी की उम्मीद लिए हाथ जोड़े प्रार्थना करता।।

    भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती…..
    सिर्फ महसूस होती है
    उस की धमक।

    आंखों में पश्चाताप के आंसू
    और अपने कृत्य!

    निमिषा सिंघल

  • मुझे अच्छा नहीं लगता…

    मुझे अच्छा नहीं लगता यूँ
    मलिन वस्त्रों में लिपटे रहना।
    यूँ अपनी स्मृति खोकर
    बेसुध पड़े रहना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।
    गीतमाला सजाकर
    चंद्र को ताकते रहना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।
    अब बिन वजह
    गगन में आंखें गड़ाकर
    देखते रहना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।
    थक के चूर होकर
    किसी वृक्ष के तले बैठना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।
    कीमती वस्त्र धारणकर
    मलिन बस्तियों में जाना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।
    राजभोग खाकर
    भूंखों के आगे डकारना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।
    रेशम की चादरों पर
    अपनी रातें गुजारना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।
    कवि मन है प्रज्ञा!
    फिर भी शब्दों से खेलना
    मुझे अच्छा नहीं लगता।

  • एक दोपहर ऐसी भी

    एक दोपहर ऐसी भी:’
    मैं कुछ उधड़-बुन में थी
    अपनी आकांक्षाओं की
    निर्मम हत्या करके
    अपने दंश भरे पलंग पर लेटी…
    कुछ आराम पाने की अभिलाषा
    हृदय में लेकर…
    तभी तुम्हारी स्मृतियों के चक्रव्यू ने
    मुझे आ घेरा…
    और मेरी वेदना के शूल
    हृदय में चुभने लगे…
    रक्त स्त्राव और हृदयाघात से
    मैं व्यथित होकर विलाप करने लगी…
    तभी मैंने अचानक देखा
    बादलों में बना एक मेमना
    विशाल अंबर का प्रतिबिंब लग रहा था…
    हवा का झोंका उसे मेंमने को
    विभिन्न आकार दे रहा था…
    मेरी कल्पनाओं के क्षितिज
    उसे दूर तक देखते रहे
    और मेरे नैन थककर सो गए….

  • पथ के राही न भटक

    =राही पथ से न भटक=योगेश ध्रुव”भीम”
    ×××××××××××××××

    अडिग मन राह शांत हो,
    निश्छल जीवन लेकर चल,
    चाहे भटके मन: चंचल,
    जीवन नाथ के तू चल,
    पथ के राही न भटक
    ऐसे पथ में तू चल ||

    न डिगा अपना नियत,
    ऐसे नियति बना कर चल,
    मिला जीवन सौभाग्य पूर्ण यह,
    दुर्भाग्य गर्त में न डाल के चल,
    पथ के राही न भटक,
    ऐसे पथ में तू चल ||

    लक्ष्य ऐसा अडिग कल्पना ,
    ऐसे मूरत बना के चल,
    कल्पना की कामयाबी,
    सकार जीवन लेकर चल,
    पथ के राही न भटक,
    ऐसे पथ में तू चल ||

    अंतिम पड़ाव उस जीवन की,
    ऐसा मूरत बना कर चल,
    जन मानस की मन:पटल पर,
    ऐसे चित्र उकेर कर चल,
    पथ के राही न भटक ,
    ऐसे पथ में तू चल ||

  • मजदूर हूँ मैं

    मजदूर हूँ मैं
    मजबूर नहीं।
    नहीं कभी चिंता
    अपन रोटी की
    सबका घर मैं
    भरना चाहूँ।
    चिलचिलाती धूपों ने जलाया,
    कभी बारिश के पानी ने भींगाया।
    कपकपाती ठंढी से भी लड़ना चाहूँ।।
    क्योंकि मजदूर हूँ मैं।।
    किसानी से कारखाना तक
    अपनी सेवा का क्षेत्र बड़ा है।
    अपने हीं दम पर तो
    व्यापारियों का व्यापार खड़ा है।।
    कर्तव्य बोध के कारण
    अपनों से दूर हूँ मैं।।
    सेवा धर्म है अपना
    क्योंकि मैं मानव हूँ।
    सेवा के हीं खातिर
    कष्ट उठाऊँ न हीं श्रम का दानव हूँ।।
    एक मजूरी दे ‘विनयचंद ‘
    कह दे जग में नूर हूँ मैं।
    मजदूर हूँ मैं।।

  • नारी

    “नारी”
    प्रकृति सा कोमल तुम,
    मेरु समान दृढ़ता लिए,
    नीर सा निर्मल हो तुम,
    नारी तुम न हारी हो ||

    अन्धकार की दीपक,
    निश्च्छलता की मूरत,
    सोये मन की आशा हो,
    नारी तुम न हारी हो ||

    वसुंधरा की शोभा हो,
    वात्सल्य मयी ममता,
    धिरजता की मूरत धर,
    नारी तुम न हारी हो ||

    अर्धनारेश्वर में तुम तो,
    नर नारी के रूप लिए,
    जननी तुम तो जननी,
    तुम बीन अधूरी सृष्टि,
    नारी तुम न हारी हो ||
    योगेश ध्रुव”भीम”

  • हमन प्रबुधिया नोएन गा

    “हमन परबुधिया नोएन गा”
    **************************

    जांगर पेरत पसीना चुचवावत,
    भुइय्या के छाती म अन उगावत,
    चटनी बासी के खवैय्या आवन न,
    येहर धान के कटोरा हावे गा,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    मोर छाती म बिजली पानी,
    रुख राई अउ जंगल झाड़ी,
    कोयला के खदान हावे गा,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    चारो मुड़ा हे नदिया नरवा,
    हीरा लोहा टिन के भंडार हावे,
    इहाँ के लोहा जपान जाथे न,
    बैलाडीला भिलाई महान हावे,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    इहाँ के जंगल म तेंदू पत्ता,
    साल सागौन के रवार हावे न,
    हर्रा बेहड़ा चार महुवा तेंदू,
    लाख कत्था अउ जड़ी बूटी,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    इहाँ के भुइय्या म महानदी,
    अरपा पैरी अउ इंद्रावती न,
    तीरथगढ़ चित्रकूट झरना हावे,
    खारुन शिवनाथ केलो रेंड नदियां,
    मैनपाट घलो स्थान हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    सबले ऊँचा गौरालाटा हावे न,
    महामाया अउ बम्बलाई माता,
    सम्बलाई माई दन्तेश्वरी दाई,
    गंगरेल अउ हसदो बाँध हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    हैहयबंसी राज करिस इहाँ,
    पाण्डबंसी अउ सोमबंसी राजा,
    सिरपुर अउ रतनपुर के घलो,
    इतिहास ह भारी हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    लक्ष्मण मंदिर भोरम देवा,
    कैलाश गुफा अउ मंदकुद्वीपे,
    इहाँ ये सबो स्थान हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    वीरनरायन जइसे सपूत महान,
    स्वामीआत्मानंदा गुरु घासीदास,
    सुंदर लाल शर्मा इहाँ गाँधी घलो न,
    एखरे सेती भीम बोलत हावे न,
    हमन परबुधिया नोएन रे,
    सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा ||

    रचनाकार
    सहाशि योगेश ध्रुव”भीम”

  • भोजभोजपुरी गीत = बलमुआ ना अईले |पुरी देशभक्ति गीत-भारत देशवा हमार |

    भोजपुरी गीत = बलमुआ ना अईले |
    धक धक धड़के मोर छतिया |
    हे सखी मोर बलमुआ ना अईले |
    नींदिया ना आवे सारी रतिया |
    हे सखी मोर बलमुआ ना अईले |
    लोगवा कहेला देशवा कोरोनवा आइल बा |
    लागल लोकडाउनवा कहा सजनवा भुलाइब बा |
    बंद बा मोबाइलवा होवे नाही बतिया |
    हे सखी मोर बलमुआ ना अईले |
    चिंता सतावे कैईसे होइहे मोर सजनवा |
    सुना पड़ल सेजिया सुना बा अंगनवा |
    कहवा से अईले बैरी कोरोना नतिया |
    हे सखी मोर बलमुआ ना अईले |
    सजना बिना बेकार सिंगार का करी हम |
    जबले ना अइहे इंतजार अब करी हम |
    साले बहुत हमके पिया के सुरतिया |
    हे सखी मोर बलमुआ ना अईले |
    मिलिहे कोरोनवा उनके अगिया से जारब |
    अईहे पिया जब उनके नजर उतारब |
    कोरोनवा के आवे हाली मऊतिया |
    हे सखी मोर बलमुआ ना अईले |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि/लेखक /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब 9955509286
    व्हात्सप्प्स -8210525557

  • जवानी के जोश के सन्दर्भ में

    इन तीखी नजरो से देखा ना करो दिल बहक जाएगा
    उम्र तो अठारह के पार है जवानी में फिसल जाएगा

    फिर न कहना ये तुमने क्या कर दिया दिल के बहक जाने में
    हूइ खता मैं माफ़ी चाहता हूँ जो भी हूआ जाने अन्जाने में

    सम्भल कर चला करो तुम जवानी में लोगों को जेल हूई है
    जिस्मनी मिजाज तक लोगों कि हरतके भी फेल हूई है

    उतर जाएगा ये नशा एक दिन जवानी का उम्र ढलते ही
    होगी उम्र कैद गर छेड़ा किसी महिला को राह चलते ही

    निकले बूढ़े होकर जेल से सफेद बाल तो डाई कराओगे
    बिना शादी के तूम हमसब के दादा जी कहलाओगे ।

    अभी भी थरकी मिजाज कायम है उम्र होने के बाद भी
    अब कौन सा कांड करोगे अन्दर जाने के बाद भी

  • मलाल

    मुझे ताउम्र ये मलाल रहेगा

    तुम क्यों आये थे

    मेरी ज़िन्दगी में

    ये सवाल रहेगा

    जो सबक सिखा गए तुम

    वो बहुत गहरा है

    चलो प्यार गहरा न सही

    पर उसका हासिल

    सुनहरा है

    गैरों की नज़र से नहीं

    खुद अपनी नज़र से परखा था तुम्हें

    मुझे लगा तेरे मेरा संग

    कमाल रहेगा

    मुझे ताउम्र ये मलाल रहेगा

    अब क्या ज़िक्र करे

    तुम्हारी मजबूरियों पर

    पोर ख़तम हो जाते हैं

    उँगलियों पर

    गलती से जो

    किसी ने भी जाना

    मेरा दावा है

    तेरे नाम पर

    बवाल रहेगा

    मुझे ताउम्र ये मलाल रहेगा

    लोग कहते हैं ,

    हम किसी को तब नहीं भूलते

    जब हम भी

    उसके दीमाग में

    हो गूँजते

    किसी का ख्याल रखना

    भी कहाँ

    तेरी फितरत में है

    तू किसी और को फिर

    इसी फ़रेब से

    बेहाल करेगा

    मुझे ताउम्र ये मलाल रहेगा

    मुझे ताउम्र ये मलाल रहेगा ….

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास

  • कवन मैया गोर बाड़ी

    भोजपुरी देवी:- कवन मैया गोर बाड़ी

    गीत कवन मैया गोर बाड़ी
    हमका पता ना
    कवन मैया गोर बाड़ी।
    निमिया के डाल पर झूला पर बा
    हमार मैया झूललबाड़ी हमका पता बा।
    सोने की थाली में भोजना बनावा
    हमार मैया जेंवल बाड़ी
    हमका पता बा।
    सोने के गड़ुवा में जलुवा
    भरल बा
    हमार मैया पियल बाड़ी
    हमका पता बा।
    फूला नेवारों की सेजा
    बिछ्ल बा
    हमार मैया सूतल बाड़ी
    हमका पता बा।
    कवन मैया गोर बाड़ी हमका पता बा।।

  • कोरोना योद्धा

    कोरोना योद्धा
    सभी वंदनीय हैं।
    पर ना जाने क्यों कुछ अराजकता तो
    इन पर पत्थर फेंकते हैं,
    जिन पर फूलों की वर्षा करनी चाहिए ।
    हर पल तत्पर होकर इस महामारी में
    अपनी देशभक्ति निभा रहे हैं।
    पर ना जाने क्यों कुछ अराजक तत्व
    उन्हें पत्थर मार रहे हैं।
    निंदनीय है और
    हम इसकी घोर निंदा करते हैं।
    डॉक्टर हों या पुलिसकर्मी
    या सफाई कर्मचारी
    या हो कोई देशभक्त
    इस कोरोना की महामारी में
    अपनी व्यक्तिगत चिंता छोड़कर
    अपना फर्ज निभा रहे हैं।
    वो महारथी सम्माननीय हैं
    और हमें
    उनका सम्मान करना चाहिए
    जो अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर
    हमारी जिंदगी बचाने में लगे हुए हैं
    अभिनंदन हो आपका करोना योद्धा

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