कविता -चैत्र मास
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शिक्षा समाज देश के सजग प्रहरी,
मौन धारण कर के बैठे हो,
बिगड़ रही नव पीढ़ी अपनी
चुप्पी तोड़ो आवाज उठाओ,
बच्चों को इतिहास बताओ,
पता आपको यह त्यौहार नहीं अपना है,
हर हिन्दू का नववर्ष चैत्र मास है,
जो काम मेरा है कर रहा हूं,
गूंगो के शहर में गा रहा हूं,
बने अशिक्षित आज के दिन सब,
गूंगे बहरे हो जाते चैत्र मास में सब,
क्यों प्रथा रीति औरों की अपनाएं,
क्यो अंग्रेजी नववर्ष वर्ष मनाएं,
भूले माँ भारती का हर बेटा
भूल न सकता दिनकर बेटा
एक जनवरी नही है नववर्ष हमारा
कहें ‘ऋषि’ चैत्र मास है नववर्ष हमारा।
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** ✍ऋषि कुमार प्रभाकर-
Author: Rishi Kumar
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चैत्र मास
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कविता-शिक्षा प्रेमी
कविता -शिक्षा प्रेमी
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हे शिक्षा प्रेमी
क्या बात कही तुमने
सच्चाई संग प्रहार किया
उतर गए कई नकाब,
बेच रहे शिक्षा को,
शहरों में खोलकर दुकान,
फीस पर फीस,
निकली जनता की खीस,
बस्ते के बोझ तले दबता बच्चा,
अच्छे नंबर के चक्कर में,
बच्चा कोचिंग करता-
कोचिंग के फीस से
मां-बाप की निकली खीस,
आलू मटर टमाटर बेचे
बेची घर की खेती भी,
फीस न पूरा होती तो यारों
बीबी बेचे मंगलसूत
नोटिस भेजे बैंक भी
कर्ज लिए हो हमसे भी,
वक्त खत्म पैसा दे दो
वरना खेती गिरवी रख दो
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’— -
जुआरी हूं
कविता -जुआरी हूं
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हां जुआरी हूं,
एक बार जुआ और खेलने दो,
जो बचा है मेरे पास अब
दांव पर लगाकर खेलूंगा,
बिक गया सब कुछ मेरा
अब उधार ले कर खेलूंगा,
सभी अपनों के आगे हाथ फैला –
जाऊंगा उसी महफिल में,
सबसे अपना हाल कहूंगा,
कोई मुझ पर तरस खाएगा
उधार पत्ते की चाल फेक दूंगा,
फटे पुराने उजले कपड़ों में,
बदहाली तंगी के जीवन में ,
कभी खेल से भागूँगा नहीं,
हो कर्ज मुसीबत लाख मुझ पर,
सुन! समझ ईश्वर तुझसे-
वरदान कभी भी मांगूंगा नहीं,
मरूंगा उस पथ पर भूख से बेहाल
पर मुकाम पाए बिना लौटूंगा नहीं
स्वाभिमान लिए अपना
खेल खेलता रहूँगा
देख बड़ी चाल को,
चाहे हाथ पांव कापें मेरे,
पर खेल से उठूंगा नहीं।
ना भविष्य की चिंता
ना भूत की
बस दृढ़ ध्यान लगाए वर्तमान पर
समझ रख चाल पत्तों की
चाल पर चाल चलाए जाऊंगा|
आज नहीं तो कल सौ बार हार कर,
एक दिन जीत जाऊंगा|
कोई खेले न मेरी तरह
जुआरी संग पक्का नशेड़ी हूं,
मैं समझदारों की नजर में,
जुआरी नहीं जुआरियों का कोच हूं,
जिसे सब कुछ गवाने की हिम्मत हो,
वो आए आज मेरी महफिल में
सूरज ढलने से पहले वह इनाम पाएगा,
सच वो आज नहीं तो कल जीत जाएगा|
हार मिले तो क्या हुआ,
सीख रहा तो क्या हुआ
हुआ तब जब कुछ किया नहीं,
हार के डर से महफिल में आया नहीं|
मिले जख्म जब दर्द का एहसास होगा,
किसी और को बताने में लक्ष्य आसान होगा,
यह समझ कर ,आ इस बार मेरी महफिल में,
कुछ सीख ले-
कुछ को सिखाने में निपुण हो जाएगा,
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’— -
शिक्षा क्या है
कविता- शिक्षा क्या है
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शिक्षा जो कोई लेकर चलता,
उसको शिक्षा ले चलती है|
मान प्रतिष्ठा धन वैभव देती है।
जीवन का मार्ग सुगम कर देती है|
मन मस्तिष्क आत्मा विकसित हो,
उठे मन में –
विचार कल्पना वह भी तो शिक्षा है,
प्रकृति खुदा से मिली जो शक्ति,
अंतर मन के भावों को प्रस्तुत करना शिक्षा है,
मस्तिष्क को इस योग्य बनाएं,
सत्य खोज सत्य का सार बताएं,
सच्चाई को जब वह पाता है,
संपूर्ण शरीर को पंच तत्वों से निर्मित मानता है,
शिक्षा मानव को निर्मित करती,
मानव शिक्षा को निर्मित करता,
धन्य मनुष्य शिक्षा पाकर,
खुद मस्तिष्क को विकसित करता,
प्यार सिखाएं आदर्श सिखाएं,
समता स्वतंत्रता नैतिकता का पढाए,
सभ्य समाज जन जग हितकारी बनना,
प्रकृतिवाद संग बच्चों को संस्कार सिखाएं, अनहित द्वेष राग पाल रखा जो,
रूढ़ीवादी ,
ना हित समाज संस्कार जो मान रखे हैं,
लिंग भेद और-
जाति धर्म ,क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर,
जीव जन धन हित ,शिक्षा कदम बढ़ाती है,
जो कुछ सोचे जो कुछ समझें ,
कुछ भी जीवन में करता है,
भोग विलास चाहे मृत्यु पीड़ा,
कुछ बोलते हैं! जन्म के पूर्व से ही शिक्षा चलती है,
सब कोई अपना अपना मत प्रकट करते हैं,
पर यह कोई नहीं प्रकट करता है
जो प्रकट हुआ वह सब को प्रकट करता है,
उलझ गए सब की परिभाषा में,
सीखने सिखाने की शिक्षाकेवल एक प्रक्रिया है।
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**✍ऋषि कुमार’प्रभाकर’—– -
फेल रिजल्ट
कविता -फेल रिजल्ट
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आज सारे,
ख्वाब टूट गए,
कभी सोचते थें,
जो बैठ टहल कर,
वो आज सारे ख्वाब टूट गए,
मत भरोसा करो,
इतना किसी पर,
काम पूरा ना होगा,
तो जमाना हसे
सदा तुम्हीं पर,
कल जिसे देखकर,
नाज करते थें,
रहें सलामत,
दुआ करते थें,
फोन पर उसकी छीक सुनकर,
नींद हराम होती आवाज सुनकर,
उसे गर्म पानी पिने की-
सलाह दिया करते,
देशी दवा करने की,
बात किया करते,
अदरक गुण की
चाय बना लेना,
मम्मी से फोन करके,
काढ़ा बनाने की
विधि जान लेना,
रहें तुम्हारी जैसी भी हालत,
हर समय की ,
खबर देते रहना,
आखिर दिया नही क्या उसे,
क्या कमी रखा, बताएं मुझे,
अरे….
उसे ऐसे सभाला ,
जैसे – माँ बच्चें को,
कुम्हार कच्चे घड़े को,
डाक्टर रोगी को,
ड्राइवर स्टेरिंग को,
तांत्रिक मंत्र को,
सपेरा बीन को,
माली फूल को,
सभाला बहुत उसे,
वह मुझे दर्द दिया,
हाथों में फेल का
रिजल्ट दिखा,
क्या कहूं उसे,
साथ रखूं उसे,
या छोड़ दू उसे,
इस हाल पर ,
निकाल दू उसे-
अपने अब ख्याल से,
ना उसके उपर तरस खाऊं,
किसी भी बात से,
मुझे जितना निभाना था,
निभा चुका हूं-
अब करें अपना गुजारा,
किसी भी राह से,
अब बस इतना ही काम करुगा,
करु अपने लिए दुआ,
उसे भी याद करुगा
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ -
धोखेबाज दोस्त
कविता- धोखेबाज दोस्त
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हजार झूठे स्वार्थी दोस्त से अच्छा,
एक सच्चा परम मित्र हो,
नाज किया
समय पैसा बर्बाद किया,
वही दोस्त आइना दिखा जाते,
डूबते हुए इंसान से-
किनारे होकर भी, मुंह फेर लेते,
इन उचक्के दोस्तों से अच्छा,
एक बौना अशिक्षित मित्र हो,
मेरी परेशानी मुसीबत में,
सदैव सदैव मेरे साथ हो,
ख्वाब में मेरा दर्द चीख सुनकर,
उठे, फोन करके दुआ कर दें,
मालिक भेज दे ऐसे मिलनसार को,
अपनी हिचकी से मेरी याद समझ लें,
आज भरोसा किस पर करूं,
दो कौड़ी के दोस्तों पे करूं,
जिससे कई बार चैट किया करते,
इनका हाल जानने के लिए फोन किया करते,
हमें पता नहीं था,
इतना बेदर्द स्वार्थी-
घमंडी चापलूस मतलबी मेरे यार हैं,
जिन पे किया अपार भरोसा हूं,
वही सबसे बड़े, झूठे मक्कार मेरे दोस्त हैं,
विश्वास हो गया,
मेरे मित्रों की मित्रता का पता चल गया,
लगा लाकडाउन तो,
जो छिपा था, और आज खुल गया,
फसा शहर में जब अकेला,
किससे बात करें ,
प्यार का खिले उजाला,
कोई फोन उठाकर काट दें,
कोई फोन ही उठाएं ना,
कोई ब्लॉक कर के रख दिया
कोई चुप रहने का सलाह दिया,
जिसे सुबह शाम ,फोन पर सलामी ठोकते,
वही दोस्त मुझे शैतान कह दिया,
डूब रहे निराशा में,
घुट घुट के जी रहे हैं रूम पर,
कान खोलकर,सुनो जमाने के लोग तुम,
मित्रता करो पशु जानवर से,
मत मित्रता करो ऐसे इंसान से,
जो हाल तुम्हारा ना सुने,
अपने व्यंग बाणों से बेहाल कर दें,
मित्रता करो उस इंसान से,
जो दुश्मन होकर भी तुम्हारा साथ दें,
हो गरीब पर दिलवाला हो,
जुबान से गूंगा, पर समझने वाला हो,
हर अंग से क्षतिग्रस्त हो,
रोगी कोढ़ी पागल आओ मेरे पास
उसे पलकों की छांव में रखकर-
प्यार करने वाला हूं,
बस अपने दर्द के जैसा,
मेरा भी दर्द समझे,
मैं उसे भगवान की तरह पूजने वाला हूं,
‘ऋषि’ की प्रार्थना खुदा बस इतनी हैं,
जिस मित्र ने बुरे हाल में साथ दिया,
हर पल की खबर लेकर मुझे प्यार दिया,
मुझे कुत्ता बनाना अगले जन्म में
रखवारी करूं अपने मित्र के घर परिवार की,
खुदा मैं तुझसे अपने पुण्य कर्मों का फल ,
इसी स्वरूप में मांगा हूं|
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’— -
दर्जी
कविता- दर्जी
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फटी पैंट मेरी,
ले दर्जी जी के घर जाता हूं,
टूटी फूटी मशीन के संग,
बैठा बुजुर्ग दर्जी हैं,
देख मुझे मुस्कुराया वह,
ढलती शाम तक में जो,
20 रुपए कमाया वह,
कारण पूछा हंसने का,
खुदा को दिल से धन्यवाद दिया,
पहला ग्राहक दुकान पर आने का,
बस एक हुनर था दर्जी में,
बाकी अब उसमें सब कमियां थी,
सुनो……
चश्मा उसका टूटा था,
फटा कुर्ता उसका था,
पके बाल,
पिचके गाल,
दांत भी सारा टूटा था,
संभल रहा ना,
हाथ में कैची
दृष्टि भी कमजोर थी यारों,
सुई धागे का
मेल समझ में
ना आता था,
नाखून बड़े ,
दाढ़ी बाल,
मूंछ बड़े थे,
सर्दी खांसी से,
ख़ास हाफ रहा था,
चार चार हैं,
बच्चे उसके,
बच्चों के बच्चे हैं,
सब के सब अच्छे हैं,
दुख होता हैं,
देख दशा दर्जी का,
क्रोध मुझे आया,
सुन शौक दर्जी के बच्चों का,
चड्डी गंजी,
हर वस्त्र सिला, सारी उम्र बच्चों का,
रोता हैं अपनी हालत पर,
हुनर हैं पर ताकत ना,
बच्चे हैं पर बच्चों को लगता अब,
बाप को अब उन्हें जरूरत ना ,
फटे पुराने कुर्ता में,
सड़क किनारे छप्पर में,
गर्मी वर्षा, ओला पाला सहता,
डांट भी सुनता ग्राहक का,
इसलिए सब कुछ सहता हैं,
दो वक्त की ,रोटी के लिए मरता हैं,
शर्म करो चार चार बच्चों तुम,
क्या तुमको अर्थी में,
कंधा देने के लिए जनमाया है,
उपकार करो ,
धर्म करो,
जीवन में,
संघर्ष करो,
जन्नत पाने के लिए यारों,
मात पिता की सेवा करो,
कहे ‘ऋषि’…
मात पिता के चरणो में,
जिन बच्चों का हाथ माथ रहेगा,
मात-पिता घर के बड़े बुजुर्गों का,
जिस बच्चे के सर पर हाथ रहेगा,
दुनिया का हर सुख पाए,
दिन प्रतिदिन उन्नत करता जाए,
देवलोक में,
देवताओं के श्री चरणों में
निश्चित वह स्थान को पाए,
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’— -
बुखार में मां की याद आई
कविता-बुखार में मां की याद आई
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वर्ष बाद बुखार हुआ,
मानों-
अंतिम समय ने घेर लिया,
चारों तरफ दिवाली का उत्सव था,
हम लिए बुखार अपनी,
कमरे में-
खुद को कैद कर लिया,
हमें क्या पता दीप कैसे जल गए,
सुनते रहे कानों से,
पटाखे साउंड की आवाज,
कहीं मधुर तो, कहीं घोर आवाज हो गए,
बल नहीं था मुझ में,
छत पर चढ़कर दीपों का दीदार कर लूं,
वर्ष बाद दिवाली आई,
हम भी कुछ दीप जला दूं ,
था रूम पर अकेला,
कोई नहीं सहारा था,
शिवाय मेरे होठों पर ,
मम्मी मम्मी के सिवा ,
ना कुछ नाम था,
बहुत याद आती थी,
मम्मी पापा की मुझे,
होती अगर मां मेरी
बुखार उतरे सर पर पट्टी रख देती,
देख आंखों के आंसू मेरे,
उठा आंचल अपना,
खुदा से दुआएं मांग लेती ,
मालिक ठीक हो जाए लाल मेरा,
यह कहते-कहते खुद आंसू बहा देती,
पोछती ना अपने आंखों का आंसू,
कई बार मेरा हाल पूछ लेती,
मेरे चेहरे पर हाथ फेर देती
नाड़ी पकड़ कर बुखार जान लेती,
मां तेरी कमी खलती मुझे,
पराए शहर में-
आपदा आती जब मुझपे,
तरस जाता हूं-
उस शाम रोटी के लिए,
माँ…
भूखे पेट लेटा हूं,
ठंड के संग लिए बुखार रोता हूं,
वो बचपन की बात याद आती है,
जब हुआ था बुखार मुझे,
रख कंधे पर ,तू दवा के लिए जाती है,
देख चेहरे को मेरे,
डॉक्टर से हाल पूछती,
लॉज खाली था कोई नहीं था अपना,
कौन हाल पूछे मेरा,
बस यही बात सताती –
इस अनजाने शहर में, कोई नहीं हैं अपना,
खाकर पारले जी
कुछ दवाई खा लिया,
उतरकर फिर चढ़ी बुखार जब,
हो सुबह-
तब घर जाने के लिए मन बना लिया
दुख मेरा दुगना हो जाता है,
वो तेरा! दुआओं के संग प्यार देखके,
बस आंखों में आंसू आ जाते हैं,
जब उतरी बुखार मेरी,
सारी यादों को लेकर,
तेरा ‘ऋषि’ कविता लिखने लगता है,
चंद पैसों शोहरत के लिए,
माँ मैं तुमसे बहुत दूर हूं,
आ देख जरा मेरी हालत को,
बुखार में कितना मजबूर हूं
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—- -
डॉक्टर साहब
कविता- डॉक्टर साहब
——————————-
देखिए डॉक्टर साहब जी,
बेटा क्यों अब रोता हैं|रात अंधेरी काले बादल,
रिमझिम बरसा पानी था,
हाय पिताजी प्रेम तुम्हारा,
कितना अद्भुत अच्छा था,देखा हमकों रोतें जैसे,
रख कंधे पर दौड़े चले,
दवा कराने कई कोश चले तुम,
रात अंधेरी काट चले,इतनी जल्दी पापा तुमको,
नंगे पाव ही दौड़ दिए ,
ठेश सहें पग पग पर,
दर्द कभी ना सहने दिए,हर जन्म में आपका ही मिलना,
‘ऋषि’ बिनती ऐसा करता हैं,
जन्म2 सेवा करके भी,
ना ऋण से मुक्ति पा सकते हैं, देखिये…….
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ -
खिलौना मत बनाना
कविता-खिलौना मत बनाना
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हे कुम्हार,
मत बना खिलौना हमें,
जमाना खेलें , तोड़ के,
मिटा दे मेरी हस्ती को,
बेचे किसी बाजार में,
कोई खरीदें मुझे,
बाजार की सबसे
सस्ती वस्तु समझ,
मिट्टी से बना हूं,
मिट्टी में ही मिल जाऊंगा,
किसी के घर की शोभा,
किसी बच्चें की मुस्कान,
किसी मेले की शान,
आपस में लड़े बच्चें,
कोई हंसे तो कोई रोए,
किसी के लिए सस्ता,
किसी के लिए महंगा,
वो जरा
सून कुम्हार,
हमें ऐसी वस्तु मत बना|
मैं गीली मिट्टी हूं,
तेरे हाथ चाक की काया हूं
तू चाहे जैसा ,आकार दे दे,
खड़े खड़े बाजार में ही ,चाहे तो बेच दे,
बना जानवर चाहें,
मंदिर के चौखट को,
घर के ओसार को,
सदा सदा प्रकाश दे ,
वह मुझे दीपक बना,
जब कुछ भी ,ना समझ आए,
मिट्टी को आकार देने की,
ठहर जाना वही कुम्हार,
फिर छोटा सा आकार देकर-
जला देना-
आग की भट्टी में,
बेरहम होकर पका देना,
इस बार खिलौना मत बनाना,
दर्द बहुत होता हैं-
हमें कोई तोड़े ,कोई फेंके|
इस बार मुझे-
ईट बनना,
किसी मंदिर की सीढ़ी,
किसी मस्जिद की गुंबद,
किसी शहर में मीनार बनू,
यह सब बनने से पहले,
इन सब का नीव बन जाऊं ,
क्यों अस्तित्व में आए,
जग को अपनी पहचान बताएं,
छुपा रहूंगा मिट्टी में दफन होकर,
अहसान समझेगा महल भी,
खड़ा आज जिसके ऊपर|
———————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—- -
चाय हटा लो
कविता- चाय हटा लो
—————————
माफी देकर,
गले लगा लो,
दुख होता हैं,
होठ से अपने,
चाय हटा लो|
जो हक मेरा हैं,
कुल्हड़ क्यूं छीन रहा,
देख देख रोते हैं,
कुल्हड़ मन माना,
होठों से चिपक रहा|
मत बे दर्द बनों,
हें मिट्टी के बर्तन,
तरस खाओ हम पर भी,
हम भी मिट्टी के बर्तन|
हममें तुममें
अन्तर इतना,
हमसे जलकर दूर रहें,
तुमसे जलकर पास रहें,
कह देना,
होठ से उसके,
हक मेरा नहीं,
उसका हैं|
छोड़ दो मुझको,
अपना लो उसको,
पल भर के लिए ,
हम साथ तुम्हारे,
अपना लो उसको,
कई जन्म का रिश्ता होगा |
—————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ -
गुड मॉर्निंग भेजा
कविता- गुड मॉर्निंग भेजा
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गुड मॉर्निंग भेजा,
हमकों एकSMS मिला,
क्षण भर हम ठहर गए थें,
हाय कोरोना तेरे कारण भूल गए थें,
अपने सभी बिछड़ गए थें,
जब से आया कोरोना हैं,
याद रहा हमकों सब कुछ,
बस भूल गए थें-
जन्मदिन आज तुम्हारा हैं,
क्या दे सकता हूं
क्या ले सकता हूं
इस खुशी के पल में हम,
बस चंद शब्द हैं उपहार हमारे,
परहित स्वहित,
स्वीकार करो यह उपहार हमारें|
वर्ष मिला जो जीवन में,
ईश्वर का धन्यवाद करों,
मात पिता गुरु चरणों का,
जब तक जिंदा हो सम्मान करों,
विश्वास रखों ईश्वर में भी,
रोज काम को करतें जाना,
लगन ,स्नेह, प्रयोग, से कुछ बढ़ कर ना,
भूलों जब भी राह अगर,
अनुभव शिक्षा काम ना आए,
ठहर वहीं पर पूछ किसी से,
फिर आगें कदम बढ़ाना,
आई हों जिस उम्मीदों से,
जल्द ही उसको छीन के लेना,
मात-पिता कुल का गौरव बन जाओ,
देश समाज हित कुछ कर जाओ,
त्याग करो,
बलिदान करो,
सब जन से स्नेहा करो,
अपना अध्ययन ऊपर रखकर,
सबसे बढ़कर ,अध्ययन से ही प्रेम करो|
राह में लाखों मिलेंगे तुमको,
सुन कष्ट तुम्हारें-,
आंखों से-
राह का कांटा चुनने की बात करें,
हंसी मजाक के संग,
सपनों में चांद पर चलने की बात करें,
सच चांद सा रोशन हो,
रात अंधेरी का बनो चांदनी,
करो संघर्ष मिले सफलता,
भटके दुश्मन का बच्चा भी,
पाएं मुकाम ,जब पढ़े कहानी,
हो बहुत सौभाग्यशाली,
अब औरों का सौभाग्य बनो,
रूहानी नूर बनो,
कदम बढ़ाओ पथ पर ऐसा,
भटके हुए राही का नूर बनो,
नूर बनोगी एक दिन सब का,
विश्वास से ‘ऋषि’ भी कहता हैं,
उपहार नहीं हैं कुछ पास मेरे देने को,
यह चंद शब्द भेट तुम्हें करता हूं|
———————————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—– -
अपनी भूख मिटाने के लिए
कविता-अपनी भूख मिटाने के लिए
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भूख मिटाने के लिये,
परिवार चलाने के लिए,
लेबर चौराहे पर जाते हैं,
आतें हैं मालिक कई
मजदूरी की मोल भाव करते हैं |
मजदूरी मिलती ना,
गाली मिल जाती है,
बड़े नसीब से काम मिले,
मालिक तानाशाह ,निकल जाते हैं
मनमानी से काम कराते हैं
सम्मान नही देते हैं,
मजदूर समझ इंसानों को,
गाली दे देकर काम कराते हैं,
महलों में रहने वाले,
मजदूरों की कदर करो,
सोचो जरा मजदूर न होगा,
तुम्हारे घर की सजावट कौन करेगा|
दस मंजिल की बिल्डिंग पर,
एक रस्सी सहारे चढ़ जाते हैं
लटक लटक – झूल झूल कर
पेंटिंग पुट्टी करते हैं,
बड़ा दुख होता उस क्षण उसको,
पत्नी के प्रसवकाल में
जब पैसा ना पाता हैं|
फोन लगाता है,
मालिक पैसा दे दो,
घर में आई बड़ी समस्या हैं,
बिक रहा सब कुछ
बीवी की दवाई में,
पैसे का इंतजाम करो,
डॉक्टर ने फरमान सुनाया हैं|
मजदूरी कुछ कर्ज अभी दे दो,
एक-एक पैसा लौटा दूंगा,
जब लौटे शहर आपके,
आकर बिल्डिंग में काम लगा दूगां,
बेटा दुख है मुझको सुन दुख तेरे,
हजार बचे हैं बस पैसे तेरे,
रामू श्यामू राजू भी मांग रहे हैं,
साहब पैसा दे दो घर वाले मांग रहे हैं,
मजदूर बेचारा
किससे जाएं दर्द सुनाएं,
उम्र गुजारी परदेस में रहकर,
गांव में किससे कर्जा उठाएं
वक्त वक्त की बात हैं यारों,
राजा भी कभी बिक जाए,
आए मुसीबत ना ,दुश्मन घर भी,
नहीं घर का तवा भी बिक जाए,
—————————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—— -
बदनाम हो गये
बदनाम हो गये
————————
बदनाम हो गये जमाने के नजरों में,
वजूद खो दिया खुद का उसे मनाने में,
इल्जाम लगता है इसे कोई और मिल गई,
क्या पता उसे –
रोते-रोते मेरी जिंदगी खाक हो गई,
वह हस्ती है किसी के हाथों में हाथ रखकर,
हम रो रहे हैं माथे पर हाथ रखकर,
शायद उसे –
आज नहीं तो कल समझ आ जायेगा,
आज जिसके साथ हूं मैं,
वह सिर्फ होटल सिनेमा पार्क तक ले जायेगा,
जो पपीहा बनकर जी रहा
वह मेरी मांग का सिंदूर बन जायेगा,
आये मिलन में कोई बाधा तो,
सागर की लहर या –
तूफान बन कर निकल जायेगा,
लांग जायेगा हिमालय को भी,
छोड़ जायेगा घर की चौखट भी,
कभी नहीं हमें अकेला छोड़ पायेगा,
अब हम क्या करें ,
उसने अपने चंद खुशियों के लिए हमें छोड़ा है,
मेरा काम था
पानी में डूबती बिच्छू को बचाना,
डंके मिले या दर्द मिले,
देख लगाव कोई पागल कह दे,
जब तक दर्द को भी सहकर जिंदा हूं,
तब तक बिच्छू तुझे बचाना है
———————————————-
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—– -
जितने बदले नंबर तुमने
जितने बदले नंबर तुमने
——————————
जितने बदले नंबर तुमने
हर नंबर तेरा मिल सकता ,
स्वाभिमान है बीच में आता है,
क्योंकि तुने ही मुझे ठुकराया है,
मत सोच हमें कोई नहीं मिल सकता,
पहले ,
अब भी ,
मिले थे ,कईयों चेहरे,
खुदा ही जाने क्यों तेरा चेहरा भाता है,
रोने के लिए या-
कुछ करने के लिए,
खुदा ने ऐसा दिन दिखलाया है,
बस इतना किसी के फोन से कह दे,
हां जहां भी हूं ,खुशहाल हूं मैं,
क्योंकि बीत गए वर्षों मेरे
खबर तेरी नहीं पाया हूं
——————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—- -
यादों में रहेगी
यादों में रहेगी
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बेचैन सा रहता हूं,
बन पागल फिरता हूं,
मिल जाए मुझे पुनः,
हर रोज दुआएं करता हूं,
मान दी हमने कई मन्नते,
कभी मस्जिद में भी
चादर चढ़ाया करता हूं,
खुदा खुशनसीब हूं या बदनसीब हूं,
आज आखिरी बार तुझसे,
यह बात पूछने आया हूं,
मिले मुझे तकदीर कहूंगा
ना मिली मुझे
ना फिर किसी से प्यार करूंगा,
मेरी थी मेरी होकर रहेगी,
हो हकीकत ना पर यादों में रहेगी,
——————————————-
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—- -
तकिया
तकिया
————-
रोती रही कईयों दिन तक,
दोस्त खबर भी देते रहें,
हम भी रोते घर बैठे,
जब कोई पूछे हाल मेरा,
झूठी हंसी दिखाते रहें,
कब सोया कब जागा हूं,
मैं जानू या रात ही जाने,
आकर देख मेरे तकिए को
है गीली आंसू से,
उसे नहीं सिखाया हूं,
कैसे धूप में रख दूं उसको,
तकिया है कपड़ा ना,
डरता हूं घरवालों से पूछेंगे कैसे भीगी
कुछ भी जवाब दे पाऊं ना
————————————-
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’——- -
भूल नहीं सकते
भूल नहीं सकते
———————–
भूल नहीं सकते वो रातें,
वो मनहूस घड़ी थी
या मेरी किस्मत फूटी,
एक नादानी से जंग छिड़ी,
जब से बिछड़े ना कभी मिले,
कॉपी में ढूंढ रहा हूं नंबर उसका,
खबर मैं ले लूं –
जब जब याद सताए चेहरा उसका
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—— -
अपना इलाहाबाद
कविता- अपना इलाहाबाद
———————————–
दिन भर टहल रहे थे,
पार्क सहित संगम में,
देख दशा हम शोक में डूबे,
अपना इलाहाबाद है ऐसा|
एक तरफ तो न्यायालय है,
एक तरफ संगम है,
एक तरफ तो शिक्षा मंदिर,
एक तरफ जमुना की धारा है|
यहीं पड़ा-
स्वराज भवन भी,
यहीं खड़ी-
आजाद की मूरत भी|
सब कुछ मिलेगा जो चाह तेरी,
प्यार मोहब्बत –
राजाओं का चिन्ह मिलेगा,
जहां से आजादी की गूंज उठी,
वह तुमको स्वराज भवन मिलेगा,
मिले अतीत से तो ,मन हर्षित होता,
अपना इलाहाबाद है ऐसा|
जो सोच रही
गांधी नेहरू वीर जवानों की,
रोटी बेटी शिक्षा स्वास्थ्य,
सब के पास सुरक्षित घर होगा,
आओ दिखाएं शहरों में,
कोई नन्हा सा बच्चा कूड़ा बिनता होगा|
देख दशा-
शासन से पूछ रहा हूं,
कैसी व्यवस्था-
व्यवस्था की क्या परिभाषा है?
छोटे बच्चे पलते भीख के सहारे,
जहां पर संगम बसता है,
देखता हूं अपनी आंखों से,
कुछ जूठा समोसा खाते हैं,
भूख मिटाने के खातिर-
हाथ पसारे पार्कों में घूम रहे,
मिला नहीं भोजन का टुकड़ा,
मनमाना गाली पाते रहे,
एक लड़की दौड़ी अंकल अंकल कह,
मेरे पास वो आई हाथ पसारे,
मैले गंदे बालों में
फटे पुराने कपड़ों में,
हमें पैसा दे दो ,हमें भूख लगी हैं,
हम पूछे तेरे घर में कौन-कौन है,
बोली सब कोई है-
बस मम्मी ना, पापा है,
पापा पी के दारु सोते हैं,
घर का खर्चा भीख सहारे चलता है|
अब किससे पूछें,
इसका दर्द सुनाएं|
जनता को दारू मिल गई,
इन बच्चों को भोजन नहीं
लाखों में है भवन बने,
इनके परिजन में शिक्षा ना,
कहें ‘ऋषि’ निकलो पूंजीपतियों सब,
चलो गांव शहर में देखें,
कोई नंगा भूखा सोया होगा,
गुरुओं से भी कहता हूं,
उन्हें भोजन देकर-
शिक्षा मंदिर में लाना होगा|
ना फिर कोई कूड़ा उठाएं,
बच्चों के कंधों से, कूडे का बोझ हटाना होगा,
शहर गांव के स्कूलों में,
सस्ती सुंदर रोजगार परक,शिक्षा को लाना होगा,
फिर चमके फिर महके
खुशहाल रहें अपना इलाहाबाद हो ऐसा|
—————————————————
***✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’——- -
प्रेम से भिक्षा
कविता- प्रेम से भिक्षा
—————————-
प्रेम है शिक्षा,
प्रेम से भिक्षा,
प्रेम ही सब कुछ ,
बिना प्रेम नहीं-
जग मे जीने की इच्छा|
प्रेम ही देखो,
युद्ध कराये,
प्रेम ही देखो,
बुद्ध बनाये|
मातृभूमि से,
प्रेम इतना था,
छोड़ के कुनबा जान गवाये|
दो दिल जुड़ते ही,
टूट जाते हैं,
लाख मुसीबत सहकर भी,
अनजाने पथ से होकर,
परदेश में जा के जीते हैं|
लाख बुराई हो कलुआ में,
गोरी मात पिता से युद्ध करे,
बारहमासी नाक बहे,
सन जैसे बाल रहे,
आख से कानी, तन से काली,
गोरका ओसे प्रेम करे,
20 की लड़की,
30 का लड़का,
देखो जग में कैसा प्रेम चले,
चार चार बच्चों की अम्मा,
ब्वायफ्रेंड से बात करें|
हवा को किसने देखा है,
लहरों को किसने मोड़ा है,
प्यासी जब जब धरती हो,
अंबर प्यास बुझाता है,
प्रेम कोरोना जुड़वां भाई,
जब दुख मिलता तब पता चले,
एक दवा को जाये,
एक फोन पे रोये,
तब जनता को पता चले,
14 दिन का वनवास ओ झेले
हर 24 घण्टे रोता रहें,
तब माता पिता के आसूं बहे|
बढ़ा निराला, प्रेम ही देखो,
प्रभु जूठे बेर भी खा लेते हैं,
प्रेम की उपमा प्रेम ही देखो,
पापी खातिर –
जीसस सूली पर चढ़ जाते हैं,
जिसने थूक दिया जिसने किले ठोकी,
अपने अपराधी को भी माफी देते हैं|
———————————————–
**✍ ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ -
सभी सो रहे
कविता- सभी सो रहे
—————————-
सभी सो रहे हैं,
घरों में पड़े हैं|
हम ही हैं दीवाने,
अभी जग रहे हैं|
बड़ा दुख है हमको
जो जग रहे हैं।
दिखे ना किनारा,
चले जा रहे हैं।
सभी के घरों पर,
समय पर है भोजन|
हम है छात्र,
धुले ना है बर्तन|
बजे बारह रात जब,
सब्जी बन रही है|
लिए हाथ कॉपी,
पढ़ाई हो रही है|सभी…..
कई वर्ष बाद में,
पेपर है आया|
नकल हुआ भारी,
न्यूज़ पेपर रद्द बताया|
बड़े-बड़े माफिया,
नकल कराते हैं
रिश्ते में पड़कर टीचर,
वजूद बेच देते हैं|
देख के घटना हम
बैठे रो रहे हैं |सभी…
हमारा क्या होगा,
पापा कर्ज भर रहे,
छात्र जीवन में,
कुछ भूखे सो रहे |
छोटे-छोटे रुम में,
कई रह रहे हैं|
डिग्री भी भारी लेकर,
जहर खा रहे क्यूं|
PHD धारी देखो,
बेरोजगार क्यूं|
नेता सभी बैठे,
मजा कर रहे हैं|
अपराधी माफिया,
मंत्री बन रहे हैं|सभी….
—————————-
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ -
रावण हूं
कविता- रावण हूं
———————-
रावण हूं,
राम नही ,
राक्षस हूं,
भगवान नही,
अब की बार दशहरे में,
पहले खुद राम बनो
फिर आग लगाना मुझे|
रघुकुल की पता होगी
वे सत्य वचन पर,
अटल रहे,
चक्रवर्ती-
विश्व विजेता,
धर्म सत्य गौ,
विप्र पूजक रहे।
उस घर की,
मर्यादा थी,
वचन के कारण,
जिस राजा ने
मरघट पर काम किया,
उसी का स्वाभिमान था –
राम,
मर्यादा उनसे,
निकलती हैं,
पिता प्रेम,
कुल की मर्यादा,
के कारण
छोड़ दिया सिंहासन सारा,
पग पग बढ़ते,
चरण जिधर,
ले गुरु चरणों का,
आशीष उधर,
एक मौका दिए,
भाई भाई का दिल मिल जाए,
बाली बल में मस्त रहा,
झट प्रभु उसका अन्त किया,
अंगद आया, संदेशा लाया,
हे रावण क्यों तकरार बढाया,
माफी मिलेगी सुन रावण,
गर सीता को वापिस करेगा,
लेकिन उसने
अपमान किया,
झूठी शानों शौकत में,
राम से लड़ने का एलान किया,
दया करुणा सत्य-
युद्ध नीति जिसमें समाई हो,
वैसा राम बनो फिर आग लगाना|
मुझसे बढकर,
पापी लोभी,
हठी इंसान हैं यहाँ,
दो वर्ष की बेटी रोये
ऐसे हैं शैतान यहाँ,
मेरे पुतले से नेता दूर रहें,
चुगलखोर भ्रष्टाचारी,
रेपिस्ट दलबदलू,
संसद के इंसान यहाँ|
कहें “ऋषि” सुन जनता,
हर घर में रावण,
नहीं हो सकता,
ज्ञानी महारथी,
ग्रथों का ज्ञाता,
अब कोई नहीं बन सकता|
हर के लाए हरि कि पत्नी,
बिना इच्छा छू नहीं सकता,
बिषगड़ गये खुद खून के रिश्ते,
रावण जैसा कौन यहाँ बन सकता है
क्या देखा,
क्या देख रहा हूं,
भाई छूटा, भाई मरा,
बेटा मेघनाथ भी सो गया
हाथ लगाना,
आग लगाना,
राम जरा-
बनकर दिखना,
हे जन तब मुझे आग लगाना।
—————————–
**✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”— -
इबादत
कविता- इबादत
————————
परमेश्वर तेरा,
धन्यवाद करता हूं,
तेरी इबादत करता हूँ
तुझे प्रणाम करता हूं|
जब जब पुकारा,
तूने साथ निभाया,
मेरी मुराद पूरी करके,
मुझे खुशहाल बनाया,
दिया मुझे
सब कुछ दिया,
घर-परिवार दिया,
सम्मान दिया,
डूब रहा निराशा में
धन्यवाद है तुझे
जो मुझ पर आशा का संचार किया।
भूखा मुझे,
न रखा कभी,
सूखी सही,
दो वक्त की रोटी दी।
खुश हूं, खुशनसीब हूं,
कर्म के अनुसार
तूने मुझे मेरी मंजिल दी।
—————————–
**✍ऋषि कुमार “प्रभाकर” -
कन्या दान करोगे
आया है,
नवरात्र का दिन,
एक विनती,
सबसे से करते हैं,|
श्रध्दा और,
विश्वास भी हो,
प्रेम और,
पूजा पाठ भी हो |
मूर्ति विसर्जन करना भाई,
प्रदूषण का ध्यान भी हो|
ज्योति जलाओ,
प्रेम दिखाओ,
मां के भवन में
आनंद मनाओ,
नव दिन सब ध्यान धरो,
कोविड नियम का पालन करो|
संकल्प दिलाओ,
सब ले लो भाई,
माँ के नव दिन चरणों में,
नारी सुरक्षा का
संकल्प उठाओ,
बैठे माँ के
नव दिन चरणों में|
दो वर्षीय बेटी,
रेप में मर जाएँ,
फिर नौ कन्या,
कहाँ से लाओगे,
किसके पांव धोओगे
जरा सोच विचार करो
कल किसका
कन्या दान करोगे
—————————-
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर “ -
डांट
कविता- डांट
—————–
ओ शब्द
गूंज रहा,
सामने होकर,
सौ सवाल कर रहा|
सुधर गए,
समझ गए,
संभल गए,
या किसी की बातों में,
फिसल गए,
नारियल से सीख,
गन्ने से सीख,
क्रोध, ग्लानि
घृणा महसूस हो,
चला जा गाँवों में
कुम्हार की
थपकी से सीख
———————
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर” -
मेरा मित्र
कविता- मेरा मित्र
———————–
मेरा मित्र-
कमी बताया करता है,
जब भी मिला हूं उससे,
पढ़ कर मेरे चेहरे को,
हकीकत बताया करता है|
मेरी गलती –
खुद न समझ सका,
दे न सका धोखा ओ,
जो था वही दिखा सका,
उसे सच दिखाने की बिमारी है
सख्त पहरेदार मेरा,
गुनाह करने से डरता हूं,
चेहरा कैसे दिखाऊंगा,
सत्य हठी निष्पक्ष मित्र मेरा,
डरता नहीं, सत्य ही दिखाएगा|
साफ़ रहो, बेदाग बनों,
स्वच्छ छवि, इंसान बनों,
सुबह सुबह दर्पण से डरना सीखों,
चरित्रहीन ना ,चरित्रवान बनो
माना बेशर्म बनकर,
जीवन गुजारोंगे,
डरो यार वजूद से,
खुदा को कैसे शक्ल दिखाओगे|
—————————————
**✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—— -
हराम है
कविता -हराम है
——————-
हराम है,
आराम मेरा,
आ आराम करले,
जाॅन हैरान मेरा|
ख्याल रखले,
एक पल मेरी,
तुझसे भिन्न न
पहचान मेरी|
तेरे ख्याल में,
खुद ख्याल खो बैठा हूं,
हे आत्मा-
खुद पहचान बनाने में,
तुमसे पहचान बनना,
आज भूल बैठा हूं|
————————–
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—- -
बड़ी फ़िक्र थी
कविता- बड़ी फ़िक्र थी
——————————
बड़ी फ़िक्र थी उसे मेरी,
सौ बार समझाती थी,
कालेज समय से आया करो,
कमियाँ रोज बताया करती थी|नाखून बड़े हैं बाल बड़े,
कालर इतना गंदा है,
जगह देख क्यों नहीं बैठते
हाथ तुम्हारा साफ नहीं है|शर्ट में कैसे धूल लगी,
क्रोध में आकर चिल्लाती थी,
बटन खुली हैं हीरो बनोगे,
खुली बटन बंद करती थी|
खूब खर्च करो पैसा,
खुद की मेहनत के थोड़े ही हैं
मुझसे रोज ही लड़ती थी,
बेपनाह मोहब्बत करती थी|नाखून मेरा बाल मेरा,
कालर साफ भी होता था,
इसलिए गंदा कहती थी,
छू छू के बातें करती थी|सबसे लड़ती मेरे लिए ,
मेरी बुराई न सुनती थी,
मै खुश रहूं, हर उपाय करती
कभी कॉपी भी लिख देती थी|
—————————————
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—- -
गटर
कविता-गटर
—————–
प्यास थी
सरिता की,
पोखर भी,
नसीब ना|
सोचा था,
अपना भी,
विशाल सा,
घर होगा|
रंग बिरंगी,
दुनिया में
प्यारा सा
कुनबा होगा|
चढ़ गिरि से
झाँक रहा,
निर्झर दिख जाए|
रुक रुक उतरा मैं
दौड़ चला सीटी,
देख गटर रोने लगा,
शहर संग-
गटर भी सुखा था|
साथी सब
तितर बितर हो
बिछड़ गये थे,
भटक भटक-
दम तोड़ दिये थे|
दम छूट गया,
गटर किनारे,
जहाँ का पता मिला,
वहां पानी न था|
—————————
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—— -
कालेज का पहला दिन
कविता- कालेज का पहला दिन
—————————————–
कालेज का,
पहला दिन,
एक अनजाने से ,
पहचान हुई,
पता नहीं था ,
उसके बारे में-
फिर भी दिल के,
पास हुई,
दिल का धड़कना,
बढ़ गया मेरे,
जब उसकी नजरें,
मेरे चेहरे पर हुई|
झूठ हसी-
हसता चेहरा बनाया,
डरता था मन ही मन,
कहीं कुछ बोल न दे,
मै घायल हुआ-
जब उसने,
चेहरे पर मुस्कान दिखाया,
मै सरमाया वो सरमाई,
झट हमने नजर हटाया|
फिर जाते अपनी अपनी कक्षा में,
“ऋषि” ढ़ुढ़े दोपहर कि छुट्टी मे,
कभी इस कमरे से उस कमरे तक,
ढुढ़ रहा हूँ-
खड़े खड़े कालेज के प्रागंण में|
——————————————
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—— -
कालेज का नियम
मुक्तक- कालेज का नियम
———————————
अनजाने से पथ पर,
एक अनजाने से पहचान हुई,
दो दुनिया के थे दोनों,
मानों अंबर का मिलन धरती से हुई|देखा उसको पहली बार,
भूल गया खुद होशो हवास,
सारी खुशियां संग संग थी,
पपीहा बन देख रहा-
अब स्वाति बरसे तो बुझती प्यास|एक मिनट दो मिनट,
बीत गये चालीस मिनट,
टीचर आये चले गए,
भुल गया कालेज का नियम|
————————————
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—– -
सबका समय
कविता- सबका समय
—————————–
सब का समय आता ,
सबको समझ न आता है,
आया जिसको समझ अगर,
खुद को समझा पाया है,छोड़ दिया वह,
सब से लड़ना,
खुद के लिए या-
भारत मां के लिए लड़ता है|मान सम्मान,
कुल का गौरव,
पद प्रतिष्ठा,
खुद का एक रिकॉर्ड बने,
उन से लड़ना बंद किया,
खुद कि नजरों में,
खुद जिनकी न पहचान बने|दश बाई दश के, बन्द कमरे में,
ले किताब वह हाथों में,
कभी लेटे, कभी बैठे,
कभी चल चल के पढ़ता है,कभी दाल जली तो ,
कभी रोटी जली,
कभी भुखे भी, वह सोता है|रहता है वह प्रेमी बनकर,
सोता है नाम मात्र ही,
सच वह बड़ भोला है,
भारत माँ का बेटा है|
—————————–
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——— -
वर्ष पुरानी
कविता -वर्ष पुरानी
————————–
आज अचानक,
कुछ खोज रहा था,
कई वर्ष पुरानी कॉपी मिलती है|मैं साफ किया उसे,
फिर खोल उसे पढ़ने लगा,
पढ़ते-पढ़ते, मै रोने लगा|उसमें पड़ा गुलाब संग एक खत था,
सूख गया गुलाब पर,
खत यादें ताजा कर डाला,
कॉलेज की मेरी दोस्ती,
खत ने सब कुछ कह डाला|उसमें कुछ ऐसी बात लिखी थी|
परसों कॉलेज आओगे,
मत लंच बॉक्स लाना,
परसों जन्मदिन तुम्हारा है,
उस दिन को –
यादगार बनाना हम चाह रही हूं|
उस दिन कुछ अपने हाथों से
बनाकर लाऊंगी,
कुछ प्यार भरी बातें होगी
फिर अपने हाथों से खिलाऊंगी|मैं खत मे नहीं ,बतला सकती,
परसों क्या बनाकर लाऊंगी,
मेरी तरफ से उपहार समझना,
आप कहां और मैं कहां-
हम आपके लिए ,महंगा गिफ्ट नहीं ला पाऊंगी|मेरे खत का जवाब,
फेंक गिरा के मत देना,
आना जब कल कॉलेज,
मेरे खत का जवाब लिखकर,
मेरी कॉपी में रख कर देना|बहुत लिखी थी बातें उसमें,
सौ बार कुशलता पूछी थी,
सच में, जिस दिन कॉलेज न जाता था,
कॉलेज में क्या क्या हुई पढ़ाई,
वह सब कुछ लिखती थी,
अनुशासन ,प्यार-भरा ,डाट के संग
एक खत लिखकर-
वह अपनी कॉपी हमें देती थी|रोते-रोते खत को-
सौ बार चूमा,
खुदा दुआ मै तुझसे करता हूं,
जा उसकी रूह से मेरी यादें ताजा कर दे,
उससे कहना, वह याद किया है,
खत पाके चूमा रोया है,
आज तुम्हारे “ऋषि” का ,फिर से जन्मदिन आया है|
—————————————————————-
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—— -
विरह वियोग
कविता- विरह वियोग
——————————
अब हम किससे
अपना दर्द कहे,
कहां हम जाएं की-
अपने दर्द की दवा मिले|जब भी चेहरा याद आता है,
शृंगार रस के सपनों में डूब जाता हूं,
जैसे ही चेहरा दुख देता है-
विरह वियोग में हो जाता हूं|उसकी एक गलती-
आंखों में आंसू भर देती है,
मेरा सच्चा साथी, कलम कॉपी,
हस के हमसे कहता है,
उठा मुझे और भड़ास निकाल ले,
या मन में उठे विचारों की राह बदल दे|तुझे क्या लगता है-
जीवन में सब कुछ तू ही खोया है?
हे पागल प्रेमी दीवाना,
शीश उठा देख जरा,
तेरे जैसी कईयों रोए हैं|तू क्या खोया क्या पाया,
हम तुझको आज बताता हूं,
तू वह खोया जो तेरा था ही नहीं,
तू वह पाया जग में जो सब को मिला नहीं|जिसको प्यास लगी पानी पीता,
जिसको भूख लगी भोजन करता,
जब जब किसी के दिल पर-
आवारा पागल प्रेमी का इल्जाम लगा,
तब ऐसे पागल प्रेमी आवारा ही-
जिद में आकर सुंदर सा इतिहास रचा|अब मत रो हंसने की बारी है,
अब मत सो चलने की बारी है,
तु आज है रोया, कुछ ऐसा कर,
कल तेरी खुशियों में पूरी दुनिया रोए|
———————————————
****✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——- -
कसम
कविता- कसम
——————-
सौ बार कसम मैने खाई ,
फिर खुद ही उसको तोड़ा था,
जब जब होती नादानी मुझसे,
रब के आगे रोया था,दिल खोल के कहता-
हर एक बातें,
प्रभु गलती मेरी माफ करो,
नादानी और जवानी मे,
अज्ञानी और सयानी मे,
भुल गया था सपत मै अपना,
भुल किया खुद हाथो से|ना चोरी किया ना हत्या किया,
ना जग मे कोई कुकर्म किया,
मात पिता औरों के संग,
खुद कि बहना या गैरो के संग,
अपनों जस सम्मान दिया|एक गलती मै नीत करता था,
सोच के फ्यूचर रोता था,
कल सुधरे जीवन खुशी रहे,
इसलिए कसम मै खाता था|“ऋषि” मुरख कि बात सुनो,
माना तुम बड़ ज्ञानी विज्ञानी हो,
जिनके मन मे दृढ़ संकल्प नही,
जिनका मन खुद वश मे नही,
मंदिर मस्जिद चर्च मे जा के रोवे,
उनके संग कभी भगवान नही|जिनके जीवन मे सपना ना,
उनका जीवन खुद अपना ना,
माना गलती कर बैठे हो,
अब गलती दुहराना ना|ज्ञान कर्म इन्द्रिय को वश मे करना सिखो,
बनकर लवकुश घोड़े को पकड़ना सिखो,
जो अम्बर भू चारो दिशाओ को वस्त्र बनाया,
कामुकता पे विजय प्राप्त कर-
उसके जस अब मन मे संकल्प उठाना सिखो|राम वचन है या वचन राम है,
राम को जीवन मे पढ़ना सिखो,
खुद के शत्रु को ईशा से माफ़ी देना सीखो,
बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग पर चलना सीखो,दुख के बादल हट जाएंगे,
खुद की नजरों में ना गिर पाएंगे,
अब हर मंजिल तेरी चौखट चुम के जाए,
खुद पर विजयी होने के लिए,
फिर से संकल्प उठाया है|
————————————
****ऋषि कुमार “प्रभाकर”—— -
पिता पुत्री का संवाद
कविता- पिता पुत्री का संवाद
————————————-
तेरे खातिर दर-दर भटके,
हर धर्मों का चौखट चुमू,
आजा बेटी मां के सूनी आंचल में,
मैं सीता मरियम नाम से बोलूं|तुमको पाने के खातिर मैं,
कहां-कहां नहीं जाता हूं ,
चारों धाम कि यात्रा करके,
तू आए सब से विनती करता हूं|मान सरोवर बालाजी के धाम गया,
शिर्ड़ी चौखट अंबे मां के शरण गया,
मैहर मां कि यात्रा कर दक्षिण भारत जाता हूं,
दानी बनकर दान करूं गाय की पूजा करता हूं|शर्म त्याग कर मस्जिद में भी जाता हूं,
सर पर टोपी –
घुटना टेकू तू आए कहता हूं,
व्रत रख,घुटना टेके कईयो रात बिताया था,
धर्म कार्य में दिल खोल के चंदा देता हूं|ऐसा कोई धर्म नहीं,
जहां मेरी अब पहुंच नहीं,
ऐसा कोई ईश्वर ना,
जिससे किया फरियाद नहीं|चर्च मे घुटना टेक टेक,
कई दिनों तक रोता था,
मैं लेकर आंखों में आंसू,
ईशा से सब बोल रहा था|हर मंदिर मस्जिद जा जा,
मै सब को दुख सुनाया हूं,
हार के आया जग से मैं,
अब आशा तुमसे लगाया हूं|घर आया रोते-रोते मैं,
आंख लगी सोने लगा,
सपना देखा बड़ा भयंकर,
एक लड़की हमसे बोल रही,
एक ही काया एक ही माया-
एक शक्ति की सृष्टि है,
देख व्रत पूजा मैं-
मैं तुमको पाऊं यह मेरी सौभाग्य रही|जग में आने से डरती हूं,
मां की कोख में पलने से,
भ्रूण हत्या से मर ना जाऊं,
क्या बच पाऊंगी लड़कों से|देख रूप यौवन मेरा-
कईयों पीछे चल देते,
सारी तपस्या मिट्टी होगी-
शायद पापा मेरे आने से|भारत को ना गंदा करो,
गंदे हैं कुछ लोग यहां,
जिस कन्या को देवी कहके पूजे,
तीन वर्षीय बच्ची का रेप यहां|जाति धर्म का आतंक यहा,
कैसे प्रेम को पाऊगी,
हुई सयानी जब मैं पापा,
कैसे अंतर्जातीय प्रेमी से मिलवाऊगी|सह न पाऊं आपकी ताना,
क्या एसिड से बच पाऊंगी,
जग का ताना सह लूंगी,
बिन कान्हा ना रह पाऊंगी,
सब कुछ अच्छा हो जाए-
एक बात हमें सताती है,
आधी रात को लाश जले,
नरभक्षी से जान बचे,
चलती बस से ,मैं भी चिल्लाऊंगी|यह सब कुछ तो सपना था,
इसमें कुछ खता भी तो अपना था,
यह संवाद सुनकर कसम लिया हूं,
अब ना बेटी मागू ना हिम्मत था|कहे “ऋषि” अब जोर लगा कर,
सब कोई बेटी को सम्मान दो,
दहेज प्रथा अब खत्म करो,
लड़कों को संस्कार दो|
———————————-
—–ऋषि कुमार “प्रभाकर”—- -
सोना बाबू
हास्य कविता,सोना बाबू
————————-
रात रात जग के हम
पढ़ाई करते थे|
मेरे पड़ोसी-
फोन पकड़ के चुमा करते थे|आया समय जब पेपर का,
वो रोया करते थे|
सोना बाबू फेल हुए,
बाबू लड़की से-
कोचिंग करते थे|रात रात जागकर,
वो उपदेश देते थे,
चटनी खा के जीवन गुजरे,
लाखों में वह बात करते थे|बड़े घरे के बिगड़े बच्चे,
पैसा खूब उड़ाते हैं|
खैनी गुटखा सिगरेट पीते-
रोज सिनेमा रूम पे आके पार्टी करते हैं|मजदूर किसान के बच्चे तुम,
इनकी नकल क्यों करते हो,
इनके घर तो धन का खजाना,
इनके संग क्यों रहते हो|करो पढ़ाई मन से यारों ,
या घर आकर बैठो तुम,
बन जा काबिल दुआ है मेरी,
ले छोरी फिर बैठो तुम|मात पिता और –
कुल का गौरव बन जाओ,
इतिहास रचो और बनो उदाहरण,
ऐसा जीते जी कुछ कर जाओ|
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
——ऋषि कुमार “प्रभाकर”——– -
सयानी
कविता- सयानी
———————–
तेरी एक ज़िद से,
सभी रो रहे हैं|
पापा मम्मी चिंता करके,
ओ भी रो रहे हैं|इण्टर के बाद दीदी,
घर से ही बाहर हो
SSC मे जाॅब बा,
देके गई दिलासा हो|चाह मेरी हम भी पढ़ले,
पैसा नाही घरे बा|
कब तक नोकरी मिली दीदी,
पुछे लोगवा सारा बा|बैंक वाला नोटिस भेजे,
खेती क उधार बा |
भारी वर्षा पाला से,
खेती सब बेकार बा|धान विकि कम भाव से,
सेठ से उधार बा|
माग न ,पैसा दीदी ,
ब्याज भारी लागत बा|कइ साल बीत गये,
हुई हूं सयानी दीदी,
सोलह वर्षी छोटी बहना,
ओ भी है सयानी दीदी|सुन के घटना रोवे,
बन्द कमरा करके ओ,
बार बार फैन देखे,
मन मे हत्या सुझे जो|मन को समझा के कहती
हत्या समाधान ना,
बिना संघर्ष किये,
मिलता है मुकाम ना |इलाहाबाद दिल्ली में,
कोटा क इ हाल है,
काउंटर 2 जाके पुछे,
क्या पार्ट टाइम जाॅब है|
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——- ऋषि कुमार “प्रभाकर”——- -
कोरोना काल मे
मत अजमा मेरी मोहब्बत को
तेरी एक झलक पाने को,
सौ बार तेरी गलियों से गुजरा हू,जब सब छोड़ दिये शहर को-
कोरोना का काल मे,
तेरी कसम ! तुझसे मिलने के लिए
सौ बार पुलिस का डंडा खाया हूं|अब भी तुझे यकीन नहीं,
एक दिल दर्द बयां करता हूँ,
जब सब जगह बन्द पड़ा था…
आना जाना,
जब राशन मेरा खत्म हुआ,
कई रात मै बिस्किट खाकर-
कई रात मै भुखे पेट ही सोया हू|बस यह आशा लेकर जीता था
एक दिन समझ तुम जाओगी
किसी मोड़ पर मिल जाओगीनित रो रो कर मै सोता था,
कई बार रुम मालिक आकर –
समझाता था,
मत रो बेटा …..
तेरे प्यार के –
ना काबिल है
एक दिन वह भी रोयेगी,
तेरे जैसा ही खुद किसी से धोखा पायेगी|
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——ऋषि कुमार “प्रभाकर”——— -
एक बात बोलू
कविता- एक बात बोलू
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एक बात बोलू..
क्या जरूरत थी,
एक फोटो के खातिर-
इतना सजने कि!जो अपनी सुन्दरता से
चांद को भी कायल करदे,
जग के सब अन्धो को भी
अपनी जुबां से घायल कर दे|उसको चार दिवारी मे रखकर,
कई घंटो का समय लगाकर,
नख से लेकर शिखा तक,
ले ली फोटो-
हर विधि से उसे सजाकर|मेरा दिल कह रहा है,
इन्हें दिल मे रखलू,
इस मट्टी के मूरत को,
दिल मे भगवान बनाकर|पूजा करलू,
पूजा की थाल सजाकर,
क्या कर जाऊं इनके लिए,
आखो मे छवि, दिल मे श्रध्दा,
इनको अपनी हाथों मे रखू,
पूजा की थाल सजाकर|
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———-ऋषि कुमार “प्रभाकर”——- -
किताब मेरी
कविता-किताब मेरी
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इतनी खूबसूरत तो नहीं है ।
जो तेरे लिये दिन रात तड़पता हूं ।
तू किताब मेरी,बसी तुझी में जान है
तभी रात भर जग जग के पढ़ता हूं।जिसने किया बेवफाई तुझसे ,
उसकी जिंदगी संवर नहीं सकती|
जिसने सहा नहीं तेरे राह का ठोकर,
जमाने में उसकी कीमत हो नहीं सकती|थूक देंगे जमाने के लोग तुझ पर,
अगर तुझे जमाने का ज्ञान नहीं |
चूम लेगे जमाने के लोग तुझको,
अगर तेरे ज्ञान में पाखंड नहीं|एक सच्चाई! तेरी बयां करता हूं,
तू बिकती है बाजार में,
चंद लोगों ने चंद कमाई के खातिर,
तुझे बदनाम कर रखा है|
कहीं पुण्य प्रताप तो –
कहीं अश्लीलता की भाग ,
कहीं गीता कुरान बना रखा है|हे किताब तुझे समझने के लिए,
कई रातों की नींद गवाया हूं|
किताब तू महान है-
कई वर्षों के बाद समझ पाया हूं|
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——- ऋषि कुमार “प्रभाकर”——- -
क्या गिरा पाओगे?
हमें क्या गिरा पाओगे,
हमें क्या मिटा पाओगे,
जो जवानी में गिर गिर के चलना सिखा हो,
कभी आंसू तो कभी जहर पीना सिखा हो,आज खुश है हमें छोड़ कर,
यारों हम भी खुश हैं उसे छोड़कर|😊🙂
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ऋषि कुमार “प्रभाकर” -
कुछ भी
कुछ भी उसमें खास नहीं था,
फिर भी उसे दिल में बसाया था,
कोई हमसे छीन ना ले..
हर दिन खुदा से दुआएं किया करता थामेरी तकदीर है,
मेरी जन्नत की लकीर है,
खुदा आज भी उसका इंतजार है,
यदि दुआएं मेरी तुझे कबूल है|
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ऋषि कुमार “प्रभाकर” -
शिद्दत
कविता- शिद्दत
——————-बड़ी शिद्दत से उसे चाहा था,
खुदा से दुआओं में उसे मांगा था|
पर समझ न सकी हमको यारो,
वह भरी महफिल में हमें रुलाया था|उसके होठों की मुस्कुराहट ही ,
मेरे जीवन के पतवार बन गए|
हम प्यार में थे पागल इतना,
सबकी नजरों में बदनाम हो गए|हर खता छिपा ली उसकी मैंने,
उसकी नजरों में शैतान बन गए|
जो दोस्त थे कल वजीर मेरे
आज वही उसके दिल मे,
बादशाह बन गए |
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——– ऋषि कुमार “प्रभाकर”——— -
तेरी खता
कविता – तेरी खता
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तेरी खता फिर से तुझे,
बदनाम कर सकती|
तेरे लफ्जों के कारण ही,
तुझे शैतान कह सकती|कहां अगर तू ये सच्चाई,
तुझे बदनाम करते हैं|
करें सबसे शिकायत जो ,
तुझे ओ ,इंसान कहते हैं|करना ना भलाई तू ,
नहीं तू भी ये रोएगा|
मिला शब्दों में गाली जो|
कहीं तू भी ये पाएगा|तेरे रिश्ते की कीमत को,
ओ अपने भाव में समझे|
तुझे गद्दार कहके ओ,
खुद को ठीक ही समझे|करें खुद ही गलती जो,
तुझे अज्ञान ही समझे|
अपनी ही चालो जस,
सभी का चाल ओ समझे|दूषित है हवा सारी,
उसे तेरी ही आशा है|
भटका है मुसाफिर ओ,
उसे तेरी जरूरत है|मेरे मालिक मेरे ईश्वर,
तुझे ओ याद करता है|
संभालो आज उसको तुम,
नहीं बर्बाद होता है|——–✍ ऋषि कुमार “प्रभाकर”——-
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जर्जर
हमें प्यार की बीमारी हो गई,
याद में उसके शरीर जर्जर हो गई|
अब हमें चार कंधों की जरूरत नहीं,
शमशान एक व्यक्ति ले जाए ऐसी मेरी शरीर हो गई|वर्ष पहले नींद छूट गई थी,
कुछ समय बाद भोजन छूट गया|
बस नजरें बची थी उसे देखने को,
जब मैं मरा वह आशा टुट गया|तब जमाने के लोगों को पता चला,
मरा क्यों जब मेरे जेब से खत मिला|
वह आखिरी खत था उसका,
खत संभालने या प्यार करने का सजा मिला|मत प्यार करो ऐसा
खुद को मिटा दो कीट फतिंगो के जैसा,
वह अपना कहीं घर बस आएगी
भूलकर भी तेरे कब्र पर ना आएगी|ना जमाना तुम्हें शहीद कहेगा,
ना तुम्हारे कब्र को प्रणाम करेगा|
संभल जाओ जमाने के प्रेमियों,
वरना जमाना तुम्हें नासमझ कहेगा|——-✍ ऋषि कुमार “प्रभाकर”———
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प्यार है या जख्म
कविता- प्यार है या जख्म
————————–क्या कसूर था मेरा,
बस आके एक बार बता जा|
खुश है-
आ उन्नीस बरस का प्यार बता जा|करले तुलना प्यार से अपने,
अब पूछो जरा मन सम्मान से अपने|
पाके हसले निस दिन सपने,
आ देख दशा, सपने डरते निस दिन अपने|हालात ने मोड़ा नहीं,
हालात को तू ने मोड़ दिया मोड़ दिया |
मिली खुशी तुम्हें ,सोच जरा,
मां बाप को किस हाल में छोड़ दिया|तोड़ खुशी को खुशी है पाई,
जा खुशी तेरी आबाद रहे|
जा खुश रहना, खुशी में अपने,
हर जन तेरी खुशियों का सम्मान करें|मुंह के गूंगे कान के बहरे,
अंधे लूले कोढ़ी पूछ रहे|
जिनके मुख पर कालिख थी,
हंसी छुपा के दुख बांट रहे|कोई संस्कार बताएं,
कोई दोष दिखाएं|
हम देख रहे हैं बेटी,
कोई गाली तुझे दे जाए |गोदी में तुझे रख कर के
दूध पिलाया आंचल में छिपा कर के|
हमें तो तूने जहर पिलाया,
सब जन को दिखा करके कर के|
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ऋषि कुमार प्रभाकर -
कुछ नहीं
हमें आता जाता कुछ भी नहीं,
सिर्फ शब्दों में खेल रहा हूं|
परिणाम का हमें कुछ पता नहीं,
मीठा खट्टा बोल रहा हूं|शब्द आन मान शान हैं,
शब्द शब्द वेदी बाण है|
शब्द राजाओं की तलवार यदि,
भिखारियों की ढाल और पहचान है|शब्द सिंहासन दे सकता है,
शब्द ही सब कुछ ले सकता है|
बनो गवार ज्ञानी चाहे,
शब्द ही जान ले दे सकता है|मां के शब्दों में संस्कार भरा है,
पापा के शब्दों में प्यार भरा है|
बढ़ा हुआ जब लाल वहीं,
देखो बेटे के शब्दों में जहर भरा है|करो निरीक्षण उन्नत खातिर,
मान प्रतिष्ठा वैभव खातिर|
कुल कुल की लज्जा,
शब्द सुधारों परिवार के खातिर|ऋषि कुमार “प्रभाकर”
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महबूब
जूम गूगल मीट पे
क्लास चल रही है |
नेटवर्क भी सही नहीं,
फिर भी बात हो रही है|मोर मोरनी बिछड़ गए,
राधा बन घर रो रही|
है गरीबी की मार से,
खुद फोन नहीं ले पा रही|स्वाभिमान नहीं वह छोड़ रही,
प्रेमी से ना कुछ बोल रही|
अब गूगल जुम पर देख देख कर,
रो रो कर जीवन गुजार रही|करके सिंगार सभी वह आती है,
प्रेमी को वह देख रही है|
हाय गरीबी हाय कोरोना,
खुद को वह धिक्कार रही है|मन को वश में करके, .
करती खूब पढ़ाई है|
सबके लिए वह समय है देती,
प्रथम वरीयता पढ़ाई को देती है -
सलाह
लाखों की डिग्री लेकर,
खोज सके न वैक्सीन|
कवि खोज दिए कलम से अपने,
कोरेना का ऐतिहासिक सीन|नेता की नियत बताएं,
डॉक्टर मिल करते खेल|
लिवर किडनी गुर्दा ही बेचे,
कोरोना में गजब ही खेल|