Category: मुक्तक

  • मेरी कलम

    नहीं सम्भल पाये हम
    ना जुल्फों को ही सम्भाला,
    मेरी कलम ने इस बीच
    कितनों को बेआबरू कर डाला।

  • राम का नाम

    वो न जाने क्यों
    अपना लगता है,
    कभी बीते कल में देखा
    सपना लगता है।
    तुम कुछ भी कहो
    गाओ बजाओ,
    लेकिन मुझे सबसे अच्छा
    राम का नाम
    जपना लगता है।

  • कलम’

    अन्दर की बातें बाहर करने वाले
    नजरों से गिर जाते हैं,
    बस एक कलम है जिससे मोहब्बत
    बढ़ती जाती है।

  • प्रेम

    प्रेम से अधिक प्रिय कोई
    एहसास नहीं
    जो इसे नहीं समझते उनसे
    प्रेम की आस नहीं।
    बसाया कभी था जिसको ह्रदय में,
    अब उसी को मेरे प्रेम का एहसास नहीं।😥😥

  • नफरत

    वो शीतलता का
    आनन्द नहीं समझते हैं
    जो नफरत की
    आग लगाया करते हैं।

  • जीवन की सुन्दरता

    जीवन की सुंदरता को
    कहाँ वो जानते हैं ??
    जो स्वयं से अधिक किसी
    और को पहचानते हैं।

  • हिंदी दिवस

    मातृ भाषा दिवस
    हिंदी दिवस की,
    सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

  • हरियाली

    तुम्हारी तरह
    खूबसूरत,
    हरियाली, खुशहाली
    चारों तरफ,
    खिली हुई है,
    प्रेम की हवा चल रही है,
    दर्द की दवा बन रही है,
    यूँ ही दिखते रहना
    नजरों के सामने ही रहना
    ऐसा कह रही है।

  • इरादा

    उम्मीद छोड़ कर तुम
    थक हार कर न बैठो
    जब तक न पा सको तुम
    तब तक न हार बैठो।
    पाने का यदि इरादा
    सचमुच रखोगे मन में,
    पा लोगे मन की मंजिल
    तुम आजमा के देखो।

  • शर्माजी के अनुभव : बहू का असुराल

    बात छोटी सी है, मगर मुश्किल बड़ी है,
    बहू बेटी दोनों बराबर, किस अंतर से छोटी बड़ी है।
    दोनों इज्जत ही तो है अपने घराने की,
    जिद सी क्यों है अहम दिखाने की।
    ये बात ज्यादा पुरानी नही है
    पर ऐसी है मुझसे भूली जानी नही है
    सफर कर रहा था बस का
    बस छोटा बैग और मैं तन्हा
    साथ बैठी महिला मुझसे बड़ी थी
    उनकी आंखें अपने हाथ की तस्वीर पर गड़ी थी
    शायद उनके छोटे परिवार की तस्वीर थी
    आंखों में थे आंसू और दिल मे भारी पीर थी
    अचरज तब हुआ, तस्वीर के छोटे टुकड़े कर गिरा दिए
    आंसू पोंछ कर आंखों के, उनके होंठ मुस्कुरा दिए
    उलझन में कितनी बाते सोच गया पल में
    लगा पत्थर पड़ ही गए हो मेरी अकल में
    तभी टिकट टिकट की आवाज आई
    मैंने पैसे दिए तब उसे सांस आई
    फिर महिला से पैसे मांगे तो उत्तर मिला, नही है
    टिकट बाबू बोला भाभी बस से उतरे ये मेला नही है
    मैंने झिझकते हुए कहा क्या मैं दे दूँ
    महिला ने मुझे एक नजर देखा, बोली क्या कहूँ
    मैंने पूछा कहाँ का लेना है टिकट
    महिला ने कुछ न कहा समस्या बड़ी विकट
    मैंने अपने गंतव्य का टिकट ही एक और लिया
    महिला ने देखा तो उनकी ओर बढ़ा दिया
    महिला ने देखकर मुझे कहा भैया शुक्रिया
    शुक्रिया मत कहें बस बता दे ये क्या किया
    मेरे सवाल पर महिला की नजर ठहर गई
    बोली परिवार नही मेरा जिस पर आपकी नजर गई
    मैं बोला फिर दर्द क्यों था आपकी आँखों मे
    बोली ये फंदा था जिसे काट पाई हूँ सालों में
    हो चुकी बर्बादी नही, आजादी के आंसू छलके
    मेरा दर्द मेरा अपना है बस, आपसे अच्छा लगा मिलके
    मैंने कहा ठीक है और ना बताये न सही
    अब कोई ठिकाना है जहाँ जाना हो कहीं
    बोली बाहर की दुनिया मैंने देखी कभी नही
    मैं बोला आप सी हिम्मत और नही कहीं
    बोली ससुराल नही असुराल में रही हूँ ना
    थप्पड़ घूंसे लात ताने और कितना कुछ सही हूँ ना
    हर हाल में जीने की हिम्मत में जिंदा रही
    दरिंदो के बीच में परकटा परिंदा रही
    मैं बरबस पूंछ बैठा क्या कोई अपना नही आपका
    बोली किस्मत में कंकर लिखे तो क्या दोष बाप का
    मैंने कहा चाहे तो आप मायके चली जाए
    बोली दिल के मरीज की क्यो बिन कसूर जान ली जाए
    बून्द को गिरना अकेले है पवन भी क्या कर सकती है
    कहने के दो घर बेटी के, बस इसमें सबर कर सकती है
    मैं बोला भाई कहा है, कोई मदद कर सकूं तो बताये
    मैं बर्तन चूल्हा ही कर सकती हूं भैया काम दिलवाये
    मुस्कुरा उठा मैं उनके साहस का कायल था
    पर उनके दर्द से आज अंदर तक घायल था
    पिता बिदा कर अरमानो संग भेज देता है ससुराल
    कैसे दूसरा घर ही बन जाता है बेटी के लिए असुराल
    सोच रहा था गलती हुई पुरुषत्व को बड़ा कहने में
    डर लग रहा था उनकी जगह भी खुद को रखने में

  • ख़ामोशियाँ

    यूँ तो ख़ामोशियों की
    कोई ज़ुबान नहीं होती लेकिन…
    प्रेम में ख़ामोशियों को समझना
    बहुत मायने रखता है l
    अगर एक दूजे की ख़ामोशियों को
    भी नहीं समझ पाए तो….
    लफ्ज़ तो लफ्ज़ हैं,
    कितना भी बोलो सब अर्थहीन है॥
    ______✍गीता

  • सूखी डाली

    सूखी डाली

    सूखी डाली के पहलू में
    चाँद पनाह मांग रहा है।
    लाचारी है कि वह क्या करे
    वक्त भी अपनी रफ्तार में है

  • शर्माजी के अनुभव : मातृत्व

    ढलता अंधेरा और काली सी महिला
    बाजार किनारे खड़ी, हाथों में थैला
    अजनवी थी मगर कुछ अलग था चेहरे में
    जैसे खुशी खड़ी हो उदासी के पहरे में
    बढ़ने लगा तो आवाज आई
    कहाँ तक जा रहे हो भाई
    मुड़कर कहा आपको कहाँ जाना है
    मेरा तो गोविंद नगर में ठिकाना है
    बोली मेरी मदद कर दीजिये
    बड़ी कृपा होगी साथ ले लीजिये
    मैंने कहा बैठिये, कृपा की कोई बात नही
    वैसे भी आज खाली है बाइक, कोई साथ नही
    लेकर उसको चल दिया, हम चुप ही रहे
    वैसे भी कुछ नया नही था, कोई क्या कहे
    कुछ देर बाद शुक्रिया कर उतर गई वो
    आगे जाकर जेब टटोली कुछ ख़रीदने को
    चौंक गया मैं, कटी जेब मे पैसे नही थे
    पूछता था दुकानदार लाये भी थे, या नही थे
    आज पहली बार मुझे मदद पर पछतावा हुआ
    बड़ा नुकसान नही था चलो जो हुआ सो हुआ
    गुजरता गया वक़्त मैं अब हर किसी को बताता
    नेकी मत करो देखो, मुझको बुरी दुनिया का पता था
    एक दिन फिर वही हुआ, जो हो चुका था पहले
    मेरी पहचान ना कर पाई वो, था “हेलमेट” पहने
    फिर वैसे ही ले जाकर उतार दिया उसको
    मेरा गुस्सा ले गया लग लिया उसके पीछे को
    कुछ दूर जाकर झोपड़ी में घुस गई चलते चलते
    सच ही है चोरों के महल नही चुना करते
    मैं भी झोपड़ी में चल दिया कुछ कर गुजरने को
    मैं रह गया अवाक, देख मुझे चौंक गई वो
    बच्चे को चम्मच से दूध पिला रही थी
    मैं देख रहा बच्चा, वो मुझे देख रही थी
    पूछा बाबू साहब, आपको क्या चाहिए
    मैंने भी कह दिया, चोरी का हिसाब लाइये
    सकपकाकर पैर पकड़, वो रो दी ऐसे
    एक माँ नही हो, कोई बच्ची हो जैसे
    मैंने कहा काम करो, हाथ पैर साबित है
    बच्चे को भी चोर बनाओगी या तेरी आदत है
    महिला ने कहा मैं चोर नही बाबू साहब
    बताती हूँ मेरे साथ जो हुआ है सब
    ये बच्चा मेरा नही, ये सहेली का है
    मुझको समझ नही आया ये पहेली क्या है
    आगे बोली सहेली तो मर गई बैसे
    आखिर बलात्कार झेलकर जीती कैसे
    बस तब से इसे पाल रही हूँ जैसे तैसे
    काम पर जाने से डरती हूँ, कही मर न जाऊँ सहेली जैसे
    इसीलिए ही मैं चोरी भी करती हूँ
    बिन ब्याही माँ हूँ न, दुनिया से डरती हूँ
    आंसू नही रोक पाया मैं ये हाल देखकर
    माँ आखिर माँ होती है, कैसी भी हो रो दिया कहकर

  • क्या इतना बुरा हो गया हूं मैं

    देखकर मुस्कुराते भी नही
    क्या इतना बुरा हो गया हूं मैं
    हर बार आप-आप कहती हो
    सच्ची, इतना बड़ा हो गया हूं मैं
    बचपन मे तो छोटी रजाई इतनी लंबी बातें थी तेरी
    अपने पैरों पर खड़े होने से तन्हा सा हो गया हूं मैं

    रश्क खाते थे दोस्त मेरे
    जब हम साथ चलते थे
    कितने अच्छे थे दिन
    तेरे गम मेरी खुशी से गले मिलते थे
    अब तेरी चुप्पी मेरे दिल में चीखती चिल्लाती है
    कभी क्या था तेरे लिए, अब क्या हो गया हूँ मैं

    कभी दो पल बैठ जा, इल्तजा है
    इतनी दूरी, ऐसी क्या वजह है
    तेरे चेहरे पर जिसने पहले की रंगत देखी हो
    उसको बेनूर देख कर, कितनी बार मर गया हूं मैं

    माना मैं तेरा सगा नही कोई
    पर सच मान दिल मे दगा नही कोई
    ले मेरा सर झुका है तेरे आगे, थाम ले या काट दे
    मैं तेरा दोस्त नही फिर, जो उफ भी कर गया हूँ मैं

    ए खुदा, किसी को ऐसा बचपन न दे
    बचपन दे तो ऐसी दोस्त ना दे
    दोस्त दे तो फिर छूटने की वजह न दे
    वजह दे तो फिर जिंदगी ना दे
    मैंने जिस की खुशी के लिए, जिंदगी उधार की तुझसे
    क्यों उसकी एक हंसी के लिए तरस गया हूं मैं

    प्रवीनशर्मा
    मौलिक स्वरचित

  • अभी जवान हूँ भोले

    जीन्स पहनी शर्ट घौंसी
    जिस्म नहला लिया इत्र से
    आईने में देखा मुस्कुराहट ने कहा
    अभी जवान हूँ भोले, किसी से कम हैं के

    बाहर आये तो लगा अब कुछ होगा
    जमाना बहुत पीछे रह गया होगा
    निगाह सब पर फिराई नापा तोला
    अपनी तोंद देखी काश कहीं से कम हो सके

    कुछ आज गए कुछ कल कुछ पहले ही कम थे
    हाय मेरे रेशमी बाल, मेरे हाथों के सनम थे
    सोचा कई बार झूठे बालों का सहारा ले लें पर फिर
    बिल्कुल नही करेंगे, जाने दो बेबफा सनम थे

    बड़े शर्मीले थे शर्माजी हम अपने लड़कपन में
    झुरझुरी छूट जाती थी, कोई गुजरी, तो बदन में
    उम्र बढ़ती गई मेरी खामियों के साथ साथ ऐसे
    गया सब जैसे खुशफहमी नही हो, मेरे वहम थे

    खैर चलो जो हुआ अच्छा हुआ, रहमत तेरी
    लाख कमियां है पर खुशियां भी कितनी दी, नेमत तेरी
    किसी को पसंद नही तो भी मैं पहली पसंद हूँ अपनी
    क्या चौदह सितम होंगे मेरी चार खुशियों से बढ़ के

    प्रवीनशर्मा
    मौलिक स्वरचित रचना

  • पिता दिवस

    जीवन भर
    बिना थके,मुस्कुराते हुए
    अपने संघर्षरत बच्चे को
    कांधे पर उठाकर चलने वाले
    पिता का पर्याय बन सके,
    ऐसा बिंब,
    रचा ही नहीं गया अबतक काव्यशास्त्र में।

    दरअसल,कविताओं में
    इतना सामर्थ्य नहीं कि वे उठा सकें
    ‘पिता’ शब्द का भार अपने कंधो पर..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (20/06/2021)

  • मेरे बाबू जी

    जिनके बिना मेरा नाम अधूरा
    जिनके साथ मेरा परिवार पूरा

    वो छत है बाकी सब दीवारें है
    एक उन्होंने पूरे घर के सपने सँवारे है

    वो माँ से कम दिखते है घर मे
    कितना कुछ कह देते है छोटी छोटी बातों में

    उनके हाथों से बहुत मार खाई है
    सख्ती में भी उनके प्यार की मिठाई है

    बहन को इतना ज्यादा प्यार जताते है
    इसी तरह नारी की इज्जत करना सिखाते है

    कुछ पैसो को देने के लिये कितना टहलाते है
    दुनिया मे पैसो की अहमियत इसी तरह बताते है

    उन्हें कुछ पता नही होता, पूछते है शाम को माँ से
    फिर भी बचा लेते है, इस काटो भरे जहाँ से

    और कुछ नही बस कहना इतना है
    मुझे बड़े होकर बस उनके जैसा बनना है

    प्रवीन शर्मा
    मौलिक स्वरचित

  • प्रेम किया नही हुआ

    सती और शिव संबाद प्रथम मिलन पर

    माना तुमने मुझसे प्रेम किया
    प्रेम ने मेरा भी मन छू लिया

    एक फ़क़ीर हूँ मैं, जानती हो ना

    तुम्हारा क्या भविष्य हुआ
    मेरे साथ बस धुआं ही धुआं

    मैं वन का घुमक्कड़ साधू
    मेरे पास कुछ नही ,तुम्हे क्या दूँ

    तुम दक्षसुता हो, मानती हो ना

    फिर भी कैसा भूत सवार किया
    क्या कोई सोच विचार किया

    मुझे सुख और दुख माटी के समान
    मेरे पग में कंकर को पुष्पो का मान

    क्या श्रृंगार हृदय से बैराग्य चाहती हो ना

    जाओ सब भूलकर, अब तक जो किया सो किया
    भूल जाना कभी तुमने किसी से प्रेम किया

    हे नाथ, आप का आदेश सर माथे
    मैं लौट जाउंगी, अपना मत बता के

    विरक्ति का विधान चाहते है ना

    मैं भूल जाउंगी, अब तक जो हुआ सो हुआ
    सिवा इसके की मुझे आपसे प्रेम हुआ

    मैंने दिन नही क्षण जिये है आपके लिए
    मैं प्यासी भटक रही हूँ, एक बूंद प्रेम का पिये

    समस्या का समाधान चाहते है ना

    मैं समस्या नही हूँ, संगिनी रहूंगी
    राग आपका अन्यथा बैरागनी रहूंगी

    माना आप अंतहीन हो बिश्वेस्वर
    प्रेम मेरी स्वांस है नही कोई ज्वर

    कितने त्याग किये अब एक और चाहते है ना

    ऐश्वर्य, महल, परिवार सब तज दिए
    प्रेम परीक्षा के लिए सब व्रत लिए

    बस यही तक आप मेरे थे, दुख नही
    पर मैं आपकी रहूंगी सदा सत्य यही

    मैं सती हूँ सती, अगर मेरे प्रेम में सत है ना

    तो अब मैं नही आप कहोगे प्रेम से प्रेम हुआ
    क्योंकि मैंने प्रेम किया नही आपसे प्रेम हुआ

    प्रवीन शर्मा
    मौलिक स्वरचित रचना

  • जब तक मैं कंवारा था

    जब तक मैं कंवारा था
    मजाक और झूठ का अंतर नही समझ पाया
    अब जानता हूँ सच तो लोग खुद से भी नही बोल पाते

    जब तक मैं कंवारा था
    किसी को दर्द में देख उदास हो जाता था
    अब देखता हूं तेहरवीं का जश्न तो छटी से बड़ा होता है

    जब तक मैं कंवारा था
    मानता था मुझे कोई दर्द नही, मेरी माँ है तो
    अब जानता हूँ कुछ दर्द किसी को बताए तक नही जाते

    जब तक मैं कंवारा था
    लगता था पापा कुछ भी ला सकते है,मेरी खुशी के लिये
    अब लगता है बच्चों की खुशी की कीमत जिंदगी के बीस साल होती है

    जब तक मैं कंवारा था
    आंखों में हूरों के सपने तैरते थे
    अब पहचान हुई उनके चेहरों के पीछे कितनी कालिख पुती होती है

    जब तक मैं कंवारा था
    मुझे बताया गया एक नौकरी और एक पत्नी काफी है
    अब बताने से भी कतराता हूँ शर्माजी, वो सब एक गलतफहमी होती है

    जब तक मैं कुंवारा था
    मुझे कुंवारेपन से चिढ़ सी होती थी
    अब चाहता हूँ ताउम्र उसी में गुजरती तो अच्छा होता

  • कहते मेरे है

    एक छत है मगर
    अलग अलग कमरे है
    कही गम कही खुशी कही बेखबरी
    सभी अलग अलग चेहरे है
    कोई नही जानता रात किसकी कैसी थी
    कही हल्के कही गहरे काले घेरे है
    उसकी इजाजत से उस तक जाना मुश्किल है जरा
    अलग दुनिया है अलग अलग पहरे है
    घरौंदे होते थे कभी, अब बस मकान होते है
    पसंद का रंग भी नही जानते, कहते मेरे हैं

  • बसंत बहार

    बसंत बहार

    बरसेगी धरती पे कब सावन के फुहार।
    बता ए घटा कब आएगी बसंत बहार।।
    मोर पपीहा भी मिलन के गीत गुनगुनाने लगे।
    मन के बगिया मे सैंकड़ों फूल खिलने लगे।।

  • वादा

    जब ज़िन्दगी कर रही होगी
    अंत निर्धारित हमारी कहानियों का
    जब वक्त की धुंध छँट जायेगी और
    साफ़ नज़र आने लगेगा चेहरा मौत का..!!

    जब उम्मीदों के पखेरूओं को रिहाई देकर
    नियति के आगे नतमस्तक हो जाओगे तुम
    जब वक्त के निर्मम पैरों के नीचे
    दबे सपनों की लाशें समेट रहे होंगे तुम..!!

    जब दुःख का रंग गहरा कर
    जज़्ब हो चुका होगा तुम्हारी आत्मा में
    जब तुम्हारे भीतर का ख़ालीपन
    एक चेहरा लिए खड़ा होगा तुम्हारे सामने..!!

    तब भी, हाँ तब भी
    तुम्हारी राह के अँधेरे मिटाती मिलूँगी मैं
    आख़िरी साँस तक
    तुम्हारे दिल का द्वार खटखटाती मिलूँगी मैं..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • आधुनिका नारी

    नारी के नवोन्मेष पर
    ————————–
    चाँद ने पलकें उठा कर
    देख तो लिया है अब~
    पश्चिम से आते प्रकाश को, पर आधुनिका को यह स्वीकार्य नहीं है,
    कि धरा पर रहने वाले लोग ,यह कहें
    कि ‘उस पर गिरने वाली हर किरण
    पूरब से आती है।’
    और जब सांझ हो,
    तो उसके कानों में गुनगुना जाती हैं :
    ‘अच्छा तो अब चलते हैं’
    क्योंकि तब तक आधी धरा पर रहने वाले लोग
    उसके कर्ण-पुट की गह्वर घाटी में
    घोल जातें हैं, सुमधुर जीवन- संगीत
    ‘एक तुम ही हो,
    एक तुम ही हो।’

    प्रदीप कुमार अग्रवाल
    मो-9082803377

  • प्रतिक्षा का पुल

    मेरा इंतज़ार एक पुल है
    असमर्थताओं के उस उफनते दरिया पर
    जो बह रहा है हम दोनों की दुनियाओं के बीच..!

    जिससे गुज़रकर एक दिन
    मेरी आँखों मे पलते मखमली सपनें
    उतरेंगे वास्तविकता के धरातल पर..!!

    प्रिय! मेरी प्रतीक्षा का पुल
    निर्मित है उम्मीदों की मिट्टी से
    जो आधार बनेगा हमारे सुखद मिलन का..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (30/05/2021)

  • तुम्हारे हाथ

    नदियाँ- सागर, सहरा- पहाड़, पानी-प्यास,
    सूखा- बरसात, तितली-फूल, छाया- धूप
    पंछी- आकाश, जंगल- उजाड़
    सबकी पीड़ाओं को
    आश्रय दिया है तुम्हारे हाथों ने

    कहो प्रेम!
    मेरे विस्थापित अश्रु
    अछूते क्यों हैं अब तक तुम्हारे हाथों से
    मेरी देह की निष्प्राण होती संवेदनाएँ
    प्रतीक्षा कर रही हैं तुम्हारे स्पर्श की संजीवनी की

    मेरे लिए सबसे सुंदर दुनिया
    बसेगी तुम्हारी हथेलियों की परिधि के बीच
    और सबसे सुंदर अंत होगा
    तुम्हारी लकीरों में ख़ुद को तलाशते हुए मिट जाना

    एक अनवरत नीरवता
    जो बसी है तुम्हारे और मेरे बीच
    जब भी खुले मेरे होंठ उसे भंग करने की कोशिश में
    उन्हें रोक दिया तुम्हारी उँगलियों की अदृश्य थाप ने

    मग़र एक दिन
    मैं स्वर दूँगी इस नीरवता को
    चूमकर तुम्हारी गर्म हथेलियों को..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (29/05/2021)

  • कलयुग आधार है

    कलयुग आधार है
    मिलता सदा प्यार है
    गाओ अधिकार है
    मुश्किल मे संसार हैं
    आत्मा का उद्धार है
    जीवन का सार है
    तुलसी का उपकार है
    मतलब के यार है
    एक ही प्रकार है
    करना बेड़ा पार है
    राम नाम आधार है
    बड़ा ये हथियार है
    मोक्ष का जो द्वार है

  • विधाता

    जुल्म अब सहा नहीं जाता है
    दुख कितना कहा नहीं जाता
    घर मे अब रहा नहीं जाता
    कुछ करो हे विधाता
    सबका दुनिया से बना रहे नाता
    हर कोई रहे हँसता मुस्कुराता

  • नज़दीकियाँ

    क्या मापदंड हैं
    नज़दीकियों के
    कितनी नगण्य है
    दो लोगों के बीच स्थित भौगोलिक दूरी
    जिनके दिल धड़कते हैं एक ही लय में..!!
    और कितना अर्थहीन है
    उन दो लोगों के बीच का सामीप्य
    जिनके दिलों के बीच
    कभी न पटने वाली खाई है..!!

    मैं कितनी दूर हूँ तुमसे
    तुम कितने नज़दीक हो मेरे?
    मुझे ख़ुद से
    कितना दूर कर गया है तुम्हारा सामीप्य..!!
    मैंने समय के हाथों में सौंप दिया है
    इन प्रश्नों को परिभाषित करने का दायित्व
    और अब मैं उन्मुक्त हूँ
    उसे जीने के लिए जो घट रहा है हमारे बीच..!!
    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (24/05/2021)

  • आहट होते ही

    कुएं का मेंढक
    समझता है और आएं नहीं
    मैं ही टर्राते रहूँ,
    राज अपना समझ कर
    और पर गुर्राते रहूँ।
    दूसरों के आने की
    आहट को सुन
    पूरा तालाब गंदा कर देता है।

  • कोशिश थी परिवर्तन लाने की

    कोशिश थी परिवर्तन लाने की उसके दिल के करीब जाने की
    हवा के झोंके ने रुख बदल सा दिया
    मेरी लाज ने मुझे आज रोक लिया।

  • जहर उगलने वाले

    सबसे भयानक मंजर
    वह होता है,
    जब जहर उगलने वाला
    खुद को विदूषक
    समझने लगता है।
    मन में इर्ष्या जलन और
    खुद ही पाऊँ और न पायें
    की भावना रखकर
    कुएँ के मेढ़क की तरह
    उछलने लगता है।

  • बस खुश रहो

    मेरी दुआ है तुम
    आबाद रहो
    खुश रहो, चाहे जहाँ रहो।
    मेरी हर आरज़ू में तुम हो
    जहाँ रहो बस खुश रहो।

  • पिता वह दरख्ता है

    पिता वह दरख्ता है
    जिसकी छांव में रहकर
    नन्हे-मुन्ने पौधे भी जीवित रहते हैं और थके हारे राहगीर उसकी ठंडी छांव में आराम पाते हैं ।।

  • कविता मन तक आती है

    तुम्हें बोलने को कुछ
    कविता मन तक आती है
    पर संस्कार हमारे
    हमें गूंगा बना देते हैं…

  • मुक्तक

    किसका शौक पूरा हुआ है,
    गम खुशी में जीवन रहा है,
    जो दिखावा कर रहे जमाने में,
    खुशी के लिए बहुत कुछ सहना पड़ रहा है,

    हालत ने पटका ऐसे,
    जो कल जी रहें थे राज शाही जैसे,
    जो सब्जी में पनीर मशरूम खाते थे
    वो स्वास्थ्य के लिए गोमूत्र पीते टानिक जैसे,

    कोई राजा से फकीर हो गया,
    कोई जुआ खेल अमीर हो गया,
    कोई लैला के लिए मजनू बना,
    कोई परिवार छोड़ देश हित में शहीद हो गया,
    ——–
    कवि ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-

  • तूफ़ान

    सागर के सीने पर उठने वाले
    ये विकराल तूफ़ान,
    वास्तव में उसकी पीड़ाएँ हैं,
    जो रह-रह के उद्वेलित होती रहती हैं,
    उस नदी की प्रतीक्षा में
    जिसे सागर में विलीन होने के पहले ही
    सोंख लिया किसी प्यासे रेगिस्तान ने..!!
    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • मुक्तक

    मुक्तक
    —————-
    मै मुर्गी खाऊ
    वो पाप बताते हैं
    वो कुकुरमुत्ता खाएं
    गर्व से स्वाद बताते हैं

    आगे से निकला पीछे से निकला
    उसका ऐसा वैसा स्वाद बताते हैं,
    शाकाहारी मांसाहारी कह करके
    सुबह शाम भोग लगाकर सोते हैं,

    अब कुछ भक्त अंधभक्त बोलेंगे
    धर्म जाति के नाम पर रोयेंगे,
    सच कहने ना सुनने की हिम्मत है
    चीनी खाएं गुड़ में दोष दिखाएंगे,
    ——–
    कवि-ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-

  • नियति

    पलक झपकते ही
    खो हो गए कितने ही मुस्कुराते चेहरे,
    जो कल तक थे हमारी कहानी का हिस्सा
    जैसे किसी चलचित्र में क्षण में बदल जाते हैं दृश्य…!!

    कितना कुछ बाक़ी रह गया
    जो कहा जाना था
    जो सुना जाना था..!!
    जिसे टाल दिया गया आने वाले कल पर,
    वो अब रहेगा सदा ही मन के धरातल पर
    ग्लानि का पर्वत बन कर..!!

    किसी का अचानक चले जाना
    संकेत है कि स्वघोषित ईश्वर मानव
    वास्तव में कितना बौना है अपनी नियति के आगे..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (12/05/2021)

  • सुख

    केवल आकार का अंतर होता है
    आग की लपट और चिंगारी में
    परन्तु समान होता हैं उनका ताप और गुणधर्म
    उसी प्रकार सुख भी
    चाहे छोटा हो या बड़ा,
    हो क्षणिक या दीर्घकालिक,
    उसकी प्रकृति में आनन्द ही होता है..!!
    महान सुख की लालसा के वशीभूत मानव
    तिलांजलि दे देता है अनेको छोटे सुखों की
    और जब जीवन की साँझ में
    पलटता है ज़िन्दगी की किताब के पन्ने
    तो पाता है पश्चतापों की अनगिनत कहानियाँ

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (11/04/2021)

  • तुम आओगे मुझे मिलने…..

    तुम आओगे मुझे मिलने
    खबर ये जब से सुन ली है
    अपने अरमानों की डोली
    हमने फिर से बुन ली है….

  • फकत इतना

    तुमने भी मोहब्बत की
    हमने भी मोहब्बत की
    फर्क बस फकत इतना था
    हम तो तुमसे करते थे
    तुमने किसी और से ही की…

  • चूर करती है

    लेखनी चलती है
    घमंड चूर करती है,
    जो उड़ता है हवा में ज्यादा
    उसे जमीं में आने को
    मजबूर करती है।

  • अपराजिता

    माँ,
    तुम्हारे बारे में लिखना कठिन है
    या यूँ कहूँ कि ये असमर्थता समानुपातिक है
    उस सहजता के जिससे तुम
    मेरे मौन के पीछे छिपी गहरी उदासी पढ़ लेती हो..!!

    तुम जलती रहीं निरन्तर एक दीप की तरह
    मेरे जीवन के अँधेरे मिटाने को
    ख़ुद के भीतर से तो खत्म चुकी हूँ कब की
    पर एक तुम ही हो जिसने अब तक बचा रखा है
    मुझे अपनी मुट्ठियों में..!!
    क्योंकि एक स्त्री हार मान सकती है परन्तु एक माँ नहीं
    मुझे विश्वास है कि तुम संजोये रखोगी
    मुझे अंत तक..!!

    निस्संदेह ये दुनिया एक अन्तहीन समर है
    और माँ एक ‘अपराजेय योद्धा’..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (09/04/2021)

  • वहम

    कभी-कभी
    आसपास पानी होने का भ्रम
    चंद साँसों का इजाफ़ा कर देता है
    तड़पकर मरते हुए
    किसी प्यासे मुसाफ़िर की ज़िन्दगी में
    तुम भी
    मेरे जीवन में एक मरीचिका की तरह हो
    तुम कहीं नहीं हो मगर
    तुम्हारे साथ होंने का वहम काफ़ी है
    जीवन की दुष्कर राहें नापने के लिए..!!
    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (08/04/2021)

  • कमाई करो

    प्यार से पहले
    कमाई करो
    धन हो या शिक्षा
    उसकी रोपाई करो,
    भूखे कभी न रहोगे
    ठग कभी न जाओगे,
    दुनिया तुम्हें रुलाएंगी,
    है ज्ञान तो रोने से बच जाओगे,
    शिक्षा- संघर्ष सवाल देती है
    धन- स्वाद, वस्त्र साधन देता है,
    जीवन को उत्तम से उत्तम रखना चाहो
    सिर्फ शिक्षा के प्रेमी के संग मिलकर रहना है
    ✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-

  • मत कर होड़ा होड़ी

    मत कर होड़ा होड़ी बीच सड़क तू चलने में।

  • भले मानुष बनो

    दिन पर दिन कर रहे व्यभिचार क्यों बढ़ा रहे हौं तुम‌ ऐब,
    खुद बीड़ी सिगरेट गुटखा खाए तम्बाकू पिये दारू, बच्चा खाए ना पावे एको सेब,
    मक्कारी चोरी छल से ना धन जोड़िए , ना मिलिहै कफन में जेब,
    उनका सबका पर्दाफाश करो ,जो तुम्हरा इस्तेमाल करि रहें अपनी रोटी सेंक,
    कथनी करनी सब जन याद करिहै ,कहिहै तो बंदा रहै एक
    व्यभिचार छोड़ भले मानुष बनो,इंसां बनो तुम नेक।।
    —✍️–एकता—–

  • मां बहन के नाम की गाली

    आज जब धरती मां सुला रही लोगों को अपनी गोद
    फिर भी रंजिशे मिट नहीं रही ,पुरानी बातें भी रहें खोद
    प्यार स्नेह तो बचा नहीं, गालियां देते एक दूजे को रोज
    मां बहन के नाम की गाली तो सब के मुंह में ऐसे रहे जैसे मोहनभोग
    भगवान के नाम से भी ज्यादा विख्यात हुई यें गालियां, है कुछ ऐसा संजोग
    बड़े बूढ़े तो देते फिरे खेलते समय बच्चे भी देते ,ना पातें खुद को रोक
    एक मां के जाए दो लाल यदि आपस में लड़े , अपनी मां को भी गाली देते हैं ताल ठोक
    गालियों से शुरू होता झगड़ा और हो जाते गोलियों से खोपड़ियों में छेद
    मिंन्टों समय बीत ना पाए, रुक जाती सांसें और खून हो जाता सफेद
    नहीं इस पर कोई रोकथाम क्या‌ है इसका भेद
    मां बहन के नाम की गंदी गालियां सुन होता मन को बड़ा खेद
    ——-✍️——एकता

  • महक रहा है सावन

    महक रहा है सावन
    सुन्दर सुन्दर कविताओं का आँगन,
    और महक आ गई है जब से
    हुआ नये कवियों का आगमन।

  • समाज का विकृत रूप भाग(३)

    आज की शिक्षित समाज के लोगों को मैंने अनपढ़ पाया ,
    बेटी बनी बहू को भी एक पल में ठुकराया,
    मानवता तो बची नहीं जताते बड़ा अपना_ पराया ,
    मायका भी है ससुराल भी है गोद में एक मासूम सा बच्चा भी है , लोगों की भीड़ में उसने खुद को अकेला पाया ,
    ना जाने हम सब में ही छुपा कहां दानव बैठा ,
    जिसने स्त्री के अस्तित्व को मिटाने का नियम बनाया ,
    हे ईश्वर आपकी बनाई दुनिया ने स्त्री का क्यों मजाक बनाया ।।——✍️–एकता—-

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