Category: गीत

  • मा जानकी आरती

    जय दुखहरनी जय कल्याणी
    सीता मईया सब सुख देती
    जय दुखहरनी जय कल्याणी
    सीता मईया सब सुख देती
    ——————————–
    जय दुखहरनी जय कल्याणी
    सीता मईया सब सुख देती ।।1।।
    ————————————-
    जनकसुता तुम राम दुलारी
    जय वैदेही राम की शक्ति
    जन्मदायिनी तुम पालनकारिणी
    भक्ति दो हे भक्ति माई
    ———————————————-
    जय दुखहरनी जय कल्याणी
    सीता मईया सब सुख देती ।।2।।
    —————————————
    भव बंधन से पार लगाओ ।।
    जय मिथिलेश कुमारी काटो माया बंधन अब हमारी
    संहारिणी तुम्हीं हो माता हमारी
    भव बंधन से पार लगाओ ।।
    ————————————————-
    जय दुखहरनी जय कल्याणी
    सीता मईया सब सुख देती ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • ।।ब्रह्मचर्य आरती ।।

    ।।ब्रह्मचर्य आरती ।।
    ———————–
    जय ब्रह्मचर्य जय ब्रह्मचारी
    इस व्रत में प्रभु राम करो मदद हमारी
    जय ब्रह्मचर्य जय ब्रह्मचारी
    इस व्रत में प्रभु राम करो मदद हमारी
    ——————————————-
    जय ब्रह्मचर्य जय ब्रह्मचारी
    इस व्रत में प्रभु राम करो मदद हमारी ।।1।।
    ——————————————-
    राम तुम बिन माया हमें नचाता
    ये कैसा है पुत्र पिता का नाता
    कि बेटा मरा जाता और पिता देखता रहता
    ——————————————-
    जय ब्रह्मचर्य जय ब्रह्मचारी
    इस व्रत में प्रभु राम करो मदद हमारी ।।2।।
    —————————————————–
    राम मेरे माथ पे अपना हाथ रख दो
    और कुछ नाही माँगु मैं तुझसे,
    सिर्फ अपना दासस्वीकार कर लो
    ————————————
    जय ब्रह्मचर्य जय ब्रह्मचारी
    इस व्रत में प्रभु राम करो मदद हमारी ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • एक दीप जलाओ ऐसा

    सौ दीप जला लो मंदिरों में,
    चाहे हजार दीये जले तेरे आँगन में,
    जब-तक तेरे मन की तम ना होंगे दुर ।
    तब-तक है तेरे सारे दीये की रौशन सुन ।।
    ——————————————————-
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का
    ——————————————-
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।1।।
    ——————————————
    झुठी सुख के पीछे भागोगे तो दुख ही मिलेगा
    जब तक कर्म फल में तेरी आसक्ति रहेगा
    ये फल की इच्छा तुम्हें चैन से सोने न देगा
    झुठी सुख के पीछे भागोगे तो दुख ही मिलेगा
    —————————————–
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।2।।
    ———————————————-
    है सभी समस्याओं का निवारण दाता के नाम में
    मन का विकार हटता सिर्फ ब्रह्मचर्य-पालन से
    ब्रह्मचर्य एक परम साधना है,
    जिसके करने से सब पाप मिटता है
    ब्रह्मचर्य एक परम दीप है -2
    जिसे तुम्हें अपने उर में जलाना है ।।
    ————————————————
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना

    मन के बहकावे में यदि तु बहकेगा
    तो तेरा मानव जीवन व्यर्थ चला जायेगा
    —————————————————
    रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
    इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना
    रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
    इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना
    —————————————–
    रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
    इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना ।।1।।
    —————————————————
    तेरे अन्दर बैठा रहता है एक देवता
    तु उनकी बातों को कभी न नकारना
    तुम गीता का पाठ बड़े ध्यान से करना
    और उनका भाव तुम अपनी आत्मा से पुछना
    ———————————————-
    रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
    इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना ।।2।।
    —————————————————
    फल की आसक्ति को तु खुद पर कभी हावी ना होने देना
    जो देंगे प्रभु तुम उसी में खुश रहना
    हरिनाम से तु कभी विमुख न होना
    सुख हो या दुख तुम सदा राम राम जपना
    ———————————————–
    रे! नर मन के बहकाबे में तुम कभी न बहकना
    इस मानव देह से तुम हरिगुण गाना ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • राम आयेंगे तेरे द्वार

    राम आयेंगे तेरे द्वार
    तु मन से हटा ले विकार
    तेरा बेडा पार लगायेंगे राम
    तु मन से हटा ले विकार

    राम आयेंगे तेरे द्वार
    तु मन से हटा ले विकार

    गणिका को प्रभु उबारा
    अहल्या को प्रभु तारा
    तेरा भी शरनागत करेंगे स्वीकार
    तु मन से हटा ले विकार

    राम आयेंगे तेरे द्वार
    तु मन से हटा ले विकार

    पतितों को पावन करते है राम
    भोगी को बैरागी बनाते है राम
    सबको अपना आसरा देकर नाथ
    सबका भावसागर पार लगाते है राम

    राम आयेंगे तेरे द्वार
    तु मन से हटा ले विकार
    कवि विकास कुमा

  • मेरे मालिक मेरा दोष माफ करना

    मेरे मालिक मेरा दोष माफ करना
    हम है तेरी संतान, मुझसे प्यार करना ।
    मेरे मालिक मेरा दोष माफ करना
    हम है तेरी संतान, मुझसे प्यार करना ।।

    मेरे मालिक मेरा दोष माफ करना
    हम है तेरी संतान, मुझसे प्यार करना ।।1।।

    तेरी माया है बड़ी मायावी,
    फँसते है इसमें तीनों लोकों के प्राणी ।
    तेरे नाम से सबका उद्धार होता,
    तेरी कृपा जिसे मिले उसका भाग बदलता (भाग चमकताः) ।।

    मेरे मालिक मेरा दोष माफ करना
    हम है तेरी संतान ,मुझसे प्यार करना ।।2।।

    क्या माँगु मैं तुझसे, बिन माँगे देने वाला तु कहलाता ।
    तेरी चौखट पर सबकी फरियाद सुनी जाती,
    चाहे कामी हो या वो हो ध्यानी ।
    तेरी कृपा सब पर अकारण बरसती ।।

    मेरे मालिक मेरा दोष माफ करना
    हम है तेरी संतान ,मुझसे प्यार करना ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • तेरा सोया भाग बदल जायेगा

    राम नाम के जाप से होत क्लेश दूर ।
    सीतानाथ के कृपा से भाग बदलता जरूर ।।

    तेरा सोया भाग बदल जायेगा,
    तु भज ले प्रेम से राम का नाम
    तेरा जीवन सँवर जायेगा ।
    —–
    तु भज ले प्रेम से राम का नाम
    तेरा जीवन सँवर जायेगा ।।1।।
    —–
    राम नाम बिन मुक्ति न मिलेगा
    योनी पर योनी तुम्हें बदलना पड़ेगा ।
    नर रूप मिला है तो नारायण को पा लो (भज लो )
    नहीं तो घोर नरक में तुम्हें जाना पड़ेगा ।।
    .——
    तु भज ले प्रेम से राम का नाम
    तेरा जीवन सँवर जायेगा ।।2।।

    अन्त समय में तेरा उद्धार हो जायेगा ।
    यदि तु प्रेम से भजता है राम का नाम
    तो अन्त समय में तेरे हृदय में राम प्रकट हो जायेगा ।। (जायेंगे)

    तेरा सोया भाग बदल जायेगा ।
    तु भज ले प्रेम से राम का नाम
    तेरा जीवन सँवर जायेगा ।।3।।

    तु भज ले प्रेम से राम का नाम
    तेरा जीवन सँवर जायेगा ।।
    कवि विकास कुमार

  • अब रहा न सहारा किसी का

    तेरी चौखट पर सब एक दिन दुनिया से हार के मस्तक नवाता ।
    तेरा आशिष मिले बेगैर किसी का उद्धार ना होता ।।

    अब रहा न सहारा किसी का,
    एक तेरे अलावा ।
    जहां ने लाख ठोकरे लगायी,
    पर तुमने ही मुझको संभाला ।।

    अब रहा न सहारा किसी का,
    एक तेरे अलावा ।।1।।

    सुख में जो तुमको भूल जाते,
    प्रभु तुम उनके दुख की घड़िया हो काटते ।
    सबके उर में एक दिन परम ज्योत जलाके,
    प्रभु तुम सबके जीवन नईया पार लगाते ।।

    अब रहा न सहारा किसी का,
    एक तेरे अलावा ।।2।।


    लाख सपने दफनते है इस दिल में
    और ये छली दुनिया रोज मुझको छलते
    जिस पर विश्वास करूँ, वहीं एक दिन दगा देते
    किस पर विश्वास करूँ, ये बात समझ नहीं पाते ।।

    अब रहा न सहारा किसी का,
    एक तेरे अलावा ।।3।।

    ओ मेरे मालिक, मेरे दाता ओ जग के तारनहार ।
    तेरे सिवा इस जहां में कोई किसी का ना होता ।

    अब रहा न सहारा किसी का,
    एक तेरे अलावा ।।3।।

    जहां ने लाख ठोकरे लगायी
    पर तुमने ही मुझको संभाला ।
    अब रहा न सहारा किसी का,
    एक तेरे अलावा .। ।
    कवि विकास कुमार

  • जय शिवशंकर गौरीशंकर

    जय शिवशंकर गौरीशंकर
    पार्वतीशिव हरे-हरे (2)
    रामसखा प्रभु राम के स्वामी,
    विष्णुवल्लभ भोलेनाथ ।
    जय शिवशंकर गौरीशंकर,
    पार्वतीशिव हरे-हरे (2) ।।1।।

    कैलाशपति प्रभु औढ़रदानी,
    नीलकंठ तुम सर्व दुखभंजन ।
    दाता तुम्हीं हो तुम्ही विधाता,
    तुम से ही जग सब सुख पाता ..
    जय शिवशंकर गौरीशंकर,
    पार्वतीशिव हरे-हरे(2) ।।2।।

    श्रद्धाविश्वास के युगल रूप हो,
    भवानीशंकर हृदय बसो अब,
    राम की भक्ति तुमसे ही मिलती,
    राम के स्वामी कृपा करो अब ।

    जय शिवशंकर गौरीशंकर,
    पार्वतीशिव हरे-हरे(2)।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • गीत

    मेरी सांसों पे तेरा अधिकार हो गया।
    लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।।
    ना सूरत पसन्द, ना शोहरत पसन्द
    तेरी चाहत पे ऐसा इकरार हो गया।
    लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।।
    मुझे चंदा-सी सूरत नहीं चाहिए।
    संगमरमर की मूरत नहीं चाहिए।।
    तेरी सीरत हीं तेरा सिंगार हो गया।
    लो सजनी मुझे तुमसे प्यार हो गया।।
    दूरियां अब अपनी खतम हो गई।
    मेरा सजना मैं तेरी सनम हो गई।।
    दिल की दुनिया पे अपना अधिकार हो गया।
    लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।
    लो सजनी मुझे तुमसे प्यार हो गया।।

  • बोलो राधे-कृष्णा, राधे-कृष्णा, कृष्णा-कृष्षा, राधे-राधे,

    कृष्ण ने बाँसुरी बजायी,
    राधा के मन में प्रीत जगी ।
    सारी दुनिया तम में है सोई,
    राधा रानी प्रेम-मगन है खोई ।। (मग्न)

    बोलो राधे-कृष्णा, राधे-कृष्णा, कृष्णा, कृष्णा, राधे-राधे,
    बोलो राधे-कृष्णा, राधे-कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा, राधे-राधे ।।1।।

    राधे-कृष्णा का प्रेम अमर है,
    दो देह एक परमतत्व है ।
    सबके उर में कृष्ण बिराजे,
    राधा-रानी शक्ति स्वरूप है ।।

    बोलो राधे-कृष्णा, राधे-कृष्णा, कृष्णा-कृष्षा, राधे-राधे,
    बोलो राधे-कृष्णा, राधे-कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा, राधे-राधे ।।2।।

    कृष्ण की महिमा राधे ही जाने,
    राधे की महिमा संत-मुनि गाये,
    जो नर संतों की वाणी गुनगुनाये,
    वो नर जग में सब सुख पाते ।।

    बोलो राधे-कृष्णा, राधे-कृष्णा, कृष्णा-कृष्षा, राधे-राधे,
    बोलो राधे-कृष्णा, राधे-कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा, राधे-राधे ।।3।।

    गीतकार विकास कुमार

  • साथ मिले या ना मिले तुम्हें किसी का

    साथ मिले या ना मिले तुम्हें किसी का,
    पर साथ दे तु हर किसी का ।
    कर भला तु सदा जहां का,
    क्या जहां से भला नहीं होता किसी का?

    साथ मिले या ना मिले तुम्हें किसी का,
    पर साथ दे तु हर किसी का ।।1।।

    रौशनी अँधियारों में कभी भटकता नहीं,
    मिल ही जाती है मंजिल उन्हें कभी-न-कभी ।
    कल उन्हीं के राहों में फूल खिलेंगे,
    आज जिनके पाँवों में काँटे चुभे हैं ।

    साथ मिले या ना मिले तुम्हें किसी का,
    पर साथ दे तु हर किसी का ।।2।।

    मदद कोई व्यवसाय नही,
    कि इसके बदले तुम्हें कोई शय मिले ।
    मिलेंगे तुम्हें वो शय खूदा से,
    जो दुनिया तुम्हें कभी दे न सकें।

    साथ मिले या ना मिले तुम्हें किसी का,
    पर साथ दे तु हर किसी का ।।3।।
    गीत विकास कुमार

  • इक नई कहानी

    #सुप्रभात_मित्रों
    *******************************
    नवभाव लिए
    है गीत मेरा,
    याद रहे यह, तुम्हें जुबानी
    मैं लिखता हूँ उम्मीद भरी,
    इक नई कहानी |

    ^^^^^^^^^०००^^^^^^^^^
    हो मस्त मगन,
    लें चूम गगन,
    उर में उठती, लहर सुहानी |
    मैं लिखता हूँ उम्मीद भरी,
    इक नई कहानी |

    ^^^^^^^^^०००^^^^^^^
    जो है दलदल,
    कर दूं मखमल,
    बंजर भू-सी, रीत पुरानी |
    मैं लिखता हूँ उम्मीद भरी,
    इक नई कहानी |

    ^^^^^^^०००००^^^^^^^^
    ये लक्ष्य तेरा,
    तू भेद जरा,
    हो राह भले, दृढ़ अनजानी |
    मैं लिखता हूँ उम्मीद भरी,
    इक नई कहानी |

    ^^^^^^^^०००^^^^^^^^^
    श्रम के निर्झर,
    झरते झर-झर,
    हो जाये मन, निर्मल पानी।
    मै लिखता हूँ उम्मीद भरी,
    इक नई कहानी।।

    ^^^^^^^^^^०००^^^^^^^^^
    रचना-#राजेंद्र_मेश्राम_नील*

  • “कितना बेबस है इन्सान”

    कोरोना ने छीन ली जान
    कितना बेबस है इन्सान |
    (१) घूमा रहा सड़कों पर देखो
    अपने घर के अन्दर देखो
    संकट में हैं प्राण |
    कितना बेबस है इन्सान ||
    (२) अस्त हुआ प्रगति का सूरज
    खोता देखो मानव धीरज
    कितनी सस्ती हो गई जान |
    कितना बेबस है इन्सान ||
    (३) रिश्तों में अब आ गई दूरी लम्बी
    मानव जाति ही अब मानवता भूली
    अन्त्येष्टि’ को तरसे इन्सान |
    कितना बेबस है इन्सान ||

  • दुनियाँ तो जहरीली है

    सोंच समझकर कदम बढ़ाओ राह बहुत पथरीली है।
    साथी मीठे सुर गुंजाओ, दुनियाँ तो जहरीली है।।

    ख़ुशी परायी देख ख़ुशी से किसका हृदय मचलता है।
    कौन हृदय है जिसके भीतर प्रेम- पपीहा पलता है।
    बिना कपट के किस कोकिल के स्वर का जादू चलता है।
    स्वार्थ न हो तो तुम्हीं बताओ, किसकी कूक सुरीली है।

    साथी मीठे सुर गुंजाओ दुनियाँ तो जहरीली है।।

    मोहक कलियाँ मिल जाती हैं राहों में आते जाते।
    कुछ के अधर इशारा करते कुछ के नैना मुस्काते।
    मृग मरीचिका ये आकर्षण सम्मोहन ही बिखराते।
    इस मद की जद में मत आओ, वनिता नयन नशीली है।

    साथी मीठे सुर गुंजाओ दुनियाँ तो जहरीली है।।

    जीवन एक दौड़ स्पर्धा ठहर गए तो हार गए।
    बाधाओं के गहरे सागर जो उतरे वो पार गए।
    चलते चलते थके वही जो नहीं समय की धार गए।
    समझो सँभलो बढ़ते जाओ पगडण्डी रपटीली है।

    साथी मीठे सुर गुंजाओ दुनियाँ तो जहरीली है।।

    संजय नारायण

  • जीवन भर यह पाप करूँगा

    स्वयं टूटकर स्वयं जुडूँगा सब कुछ अपने आप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    मेरी त्रुटि थी किया भरोसा मैंने अपने यारों पर।
    समझ न पाया पग रख बैठा मैं जलते अंगारों पर।
    यदि स्नान पड़े करनी अब असहनीय पीड़ा के सर में
    करे विधाता दंड नियत यह किंचित नहीं विलाप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूले की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    भेदभाव की फसल उगाकर धरा कहीं से धन्य नहीं है।
    ऊँच-नीच है धर्मकर्म तो धर्मकर्म भी पुण्य नहीं है।
    मैं शोषित वर्गों को उनका हक दिलवाकर ही दम लूँगा
    पुण्य ! क्षमा कर देना मुझको जीवन भर यह पाप करूँगा।
    विगत दिवस जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    दागी छबि का पहनावे से धवल दिखावा अर्थहीन है।
    मानवता से मुड़े मुखों का काशी काबा अर्थहीन है।
    यदि दुखियों को हँसा सका तो मैं अपने दुख विसरा दूँगा
    व्यथित नहीं हो हृदय किसी का ऐसे क्रियाकलाप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    करुनाहीन चक्षु के सम्मुख करुणामय विनती क्या करना।
    निर्दयता ने जो हिय को दी पीड़ा की गिनती क्या करना।
    क्या गिनती करना नेकी की परहित अथवा हरि सुमिरन की
    बिखरा दूँगा कर की मनका फिर अनगिनती जाप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    संजय नारायण

  • दर्द का जो स्वाद है

    दर्द का जो स्वाद है,
    उससे दिल आबाद है,
    मुफ्त है जग में,
    खुदगर्जीया !

    मक्कारियां सरेआम है,
    दर्द का जो स्वाद है,
    उससे दिल आबाद है।

    मदहोशियों का माहौल हैं
    बहरूपियों की यहां फौज हैं,
    पराया यहां,
    किस -किस को कहें,
    अपनों की जरा खोज है,

    बैचेनियां, तन्हाईयां,
    बदनामियां!
    आजाद हैं,
    दर्द का जो स्वाद है,
    उससे दिल आबाद है।

  • अहसास

    तुम वो अहसास हो
    जिसे छू जाये वो संदल सा महक जाये
    तुम वो इश्क़ हो
    जिसे हो जाये वो दीवाना हो जाये!!

  • कोरे मेरे,सपने मेरे…..

    कोरे मेरे, सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे….२
    उम्मीदें देंगी,दस्तक उन तक,
    उम्मीदें ही रह जाएंगी….
    कोरे मेरे, सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे…२
    शामें देगी,उल्फत उनको,
    शामें ही रह जाएंगी…
    कोरे मेरे,सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे….२
    यादें लेगी, करवट उन तक,
    यादें ही रह जाएंगी…
    कोरे मेरे, सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे….२

  • प्रभु! मैं तुझको कैसे पाऊं।

    कौन है यहां अपना मेरा,
    तुझ पर ही है, अर्पित जीवन सारा।
    कौन-सी मैं व्यथा सुनाऊं,
    प्रभु! मैं तुझको कैसे पाऊं।
    कब तक यूं आस लगाऊ।
    कुछ तो बोलो, हे प्रभु!
    कब तक मैं यह ज्योति जलाऊ,
    बुझ रही आशा की लौ,
    कैसे इसमें प्रकाश जगाऊं,
    प्रभु मैं तुझको कैसे पाऊं।

  • हे प्रभु! तुम ही तो हो।

    हे प्रभु! तुम ही तो हो।
    तुम हो सृजन दाता,
    तुम हो रचना निर्माता।
    तुम हो जीवन की आस,
    तुम ही हो निश्चित श्वास।
    तुम ही हो अमूर्त प्रेम,
    तुम ही दिशा और दिन।
    हे प्रभु! तुम ही तो हो।

  • मेरे मन का मोती…

    मेरे मन का मोती,
    मैं तुझको अर्पण कर जाऊं।
    मेरे राम मेरे श्याम…
    प्रभु मैं जपु तेरा नाम पल पल,
    तुझमें ही खो जाऊं ।
    मेरे मन का मोती ,
    मैं तुझको अर्पण कर जाऊं।
    मेरे राम मेरे श्याम ।
    सुध लो प्रभु दुनिया की ,
    यह नैन भी तरस गए ।
    किस और किनारा है मेरा ,
    बस नौका पार लगा दो ।
    मेरे राम मेरे श्याम….
    भूलूं कभी न तेरा नाम ,
    यह अरदास जगा दे ।
    तेरे से ही हो रौशन दुनिया मेरी,
    तेरे पर ही वारी जाऊं।
    मेरे मन का मोती मैं ,
    तुझको अर्पण कर जाऊं।
    मेरे राम मेरे श्याम….

  • (गीत: माँ हिंदी)

    जिस माथे पे चमके,
    हिन्द का नाम
    उन्हें हिंदी से मिलता,
    हो प्रथम ज्ञान।

    जन भाषी भाव वही,
    पथ पावन हो
    की माँ हिंदी का हिन्द,
    में सावन हो।

    की माँ हिंदी का हिन्द,
    में सावन हो
    हाँ माँ हिंदी का हिन्द,
    में सावन हो।।

    (महेश कुमार)

  • एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया

    एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया।
    तुम कपटी हुई , उससे धोखा किया ।।
    नारी तो होती है ममता की मूरत।
    क्या तुझको नहीं थी उसकी जरुरत।।
    ज़िन्दगी के बदले मौत का तोफा दिया।
    एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया।।
    अमर सुधा रस का तुम में है वास।
    फिर क्योंकर जहर को बनाया रे खास।।
    मित्र भी गए मित्रता भी गई
    पाक रिश्ते को तूने बदनाम कर दिया।।
    एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया।

  • सच्ची मोहब्बत ही, ताजमहल बनवाती है

    कविता : सच्ची मोहब्बत ही, ताजमहल बनवाती है
    जो खो गया है मेरी जिंदगी में आकर
    उस पर गजल लिखने के दिन आ गए हैं
    दिल दिमाग का हुआ है बुरा हाल
    अब तो रात भर जागने के दिन आ गए हैं
    प्यार की लहरें जब से दिल में उठ गई
    सजने संवरने के दिन आ गए हैं
    मोहब्बत ने वो एहसास जगाया है दिल में
    अब तो तकदीर पलटने के दिन आ गए हैं
    सच्ची मोहब्बत वो मझधार है
    संग इसके तैरने के दिन आ गए हैं
    वो ही करना पड़ा जो चाहा न दिल ने कभी
    इंतज़ार करने के दिन आ गए हैं
    अब न कुछ खोने का गम है न पाने की ख़ुशी
    तुम्हे याद करने के दिन आ गए हैं
    याद करके उनको ,सांस दोगुनी हुई
    प्यार के शुरुर के दिन आ गए हैं
    याद करके तुमको भीड़ में पाता हूँ अकेला
    सांसों की तपिश में पिघलने के दिन आ गए हैं
    ये दूरियाँ हम दोनों के दरमियान कैसी
    अब तो ख्वाब सजाने के दिन आ गए हैं
    मोहब्बत की दुनिया निःस्वार्थ की दुनिया है
    धोखा ,मौकापरस्ती की कोई जगह नहीं है
    अगर ये नहीं कर सकते ,तो मोहब्बत न करना
    क्योंकि सच्चे जज़्बातों की ये नगरी है
    सच्ची मोहब्बत ही ताजमहल बनवाती है
    नहीं तो सुशांत रिया सा हस्र करवाती है
    सच्ची मोहब्बत को जो प्रोफेशन बनाते हैं
    अंत में वो सब कुछ गंवाते हैं …..

  • देश गान

    माँ तुम्हारे चरणों को
    धोता है हिन्द सागर।
    बनके किरीट सिर पे
    हिमवान है उजागर।। माँ…..
    गांवों में तू है बसती
    खेतों में तू है हँसती
    गंगा की निर्मल धारा
    अमृत की है गागर।। माँ….
    वीरों की तू है जननी
    और वेदध्वनि है पवनी
    हर लब पे “जन-गण”
    कोयल भी ” वन्दे मातराम् ”
    निश-दिन सुनाए गाकर।। माँ….
    विनयचंद ‘बन वफादार
    निज देश के तू खातिर।
    तन -मन को करदे अर्पण
    क्या है तुम्हारा आखिर?
    माँ और मातृभूमि पर
    सौ-सौ जनम न्योछावर।। माँ…

  • बरखा की फुहार

    तपती धरती पर पड़े, जब बरखा की फुहार,
    सोंधी सुगन्ध से महके धरती, ठंडी चले बयार।
    मयूर नाचे झूम – झूम कर, बुलबुल राग सुनाए,
    तितली प्यारी आए सैर को, कोयल कुहू – कुहू गाए।
    मधुकर की मीठी गुंजन है, पपीहा गाए राग – मल्हार,
    तपती धरती पर पड़े जब बरखा की फुहार…..

  • ॐ साई राम

    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम
    सांई नाम की अलख जगा ले
    भोली सी सूरत अपने मन में बिठा ले
    सच्चा प्यारे सांई नाम
    बाबा जी जपूं मैं तेरा नाम
    कृपा दृष्टि की तेरी माया
    मन कोमल मृदु शीतल काया
    तेरी महिमा कोई जान न पाया
    मुखमंडल पर आभा की छाया
    प्यार का जो अमृत बरसाया
    सुमिरन कर लो सांई नाम
    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम
    मन में अपने भाव जगा लो
    जिस चाहे उस रूप में पा लो
    मिट जाता मन का अंधियारा
    मन को मिलता शांत किनारा
    भटके मन का तू एक सहारा
    चरणों में हैं चारों धाम
    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम
    हांथ जोड़ कर करूं प्रणाम
    विनती करता सुबह शाम
    हर बिगड़े बनते हैं काम
    शृद्धा सुमन तुम्हे अर्पण कर
    मेरे दिल से निकले सांई राम
    शिरडी मंदिर तेरा धाम
    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम।|

  • गणपति बप्पा मोरिया

    बुद्धि विनायक पार्वतीनंदन ,मंगलकारी हे गजबंदन
    वक्रकुंड तुम महाकाय तुम ,करता हूँ तेरा अभिनंदन
    कंचन -कंचन काया तेरी ,मुखमंडल पर तेज समाया है
    मूषक वाहन करो सवारी ,मोदक तुमको प्यारा है
    भक्ति भाव में तेरी देखो,खोया ये जग सारा है
    मोहनी मूरत सुन्दर सूरत
    भोले बाबा के तुम प्यारे हो
    गौरी माता के लाल तुम्ही
    तुम ही आँखों के तारे हो
    विघ्न हरण तुम विघ्न को हर लो
    खुशियों से झोली को भर दो
    धन यश वैभव के भंडार भरो
    हमारे सारे दुःख हरो
    दिशाहीन हम ज्ञानहीन हम
    दिशा का तुम आधार बनो
    हे दुखहर्ता ,हैं हम भाग्यहीन
    उदय हमारा भाग्य करो
    हे अंतर्यामी जग के स्वामी ,पूजे तुमको सारा संसार है
    मेरी दुविधा दूर करो प्रभु ,तेरी महिमा अपरंपार है

  • सच्ची आजादी दिला दो तुम

    हे दीनबंधु,परमपिता परमात्मा,
    करते हम तुमसे बस यही प्रार्थना,
    सच्ची आजादी दिला दो तुम ,
    एक ऐसा देश बन दो तुम।

    बेटियां जहां कोख में ही ना मारी जाती हो,
    हर घर में हर नारी सुख सम्मान पाती हो।

    माता पिता को जहां पुत्र से सम्मान मिले,
    भाई भाई में राम लखन सा प्यार मिले।

    देश का हर नेता जहां भ्रष्टाचार मुक्त हो ,
    देश का हर घर निर्धनता विमुक्त हो।

    शिक्षा जहां समान अधिकार से मिलती हो,
    हर कृष्ण को अपनी राधा मिलती हो।

    जहां अमीरी और गरीबी की गहरी खाई ना देखी जाती  हो,
    पैसों की खातिर मर्यादाएं ना बेची जाती हो।

    देश का युवा जुड़ जाए जहां संस्कृति संस्कारो से,
    राम सी मर्यादा रखता हो जो अपने विचारो से।

    मेरी कल्पनाओं में सत्य के पर लगा दो तुम,
    सच्ची आजादी दिला दो तुम,
    एक ऐसा देश बना दो तुम।

  • बादल की बौछार

    दो बूँद गिरा गया बादल
    महका है धरती का आँचल
    बन सर्द पवन लहराई
    मिट्टी की महक-महकाई

    सब काम काज रुक गए हैं
    बादल के आगे झुक गए हैं
    ममता ने ली है अंगड़ाई
    लो सब ने प्यास बुझाई

    खामोश हुआ इंसान जब
    पड़ी गर्ज की चमक दिखाई

    पानी-की बौछार चलाके
    संगीत में सूर को मिलाके
    गालों को मर्म सहलाएँ
    कानों से थरथरी आएँ

    सप्तधनू आकाश में छाया
    देने सूक्ष्म श्रेस्ट बधाई

    दो बूँद गिरा गया बादल
    महका है धरती का आँचल
    बन सर्द पवन लहराई
    मिट्टी की महक-महकाई
    ©M K Yadav

  • अजनबी

    आज किसी ने सोये हुये
    ख्वाबों को जगा दिया
    भूली हुई थी राहें
    भटके हुये मुसाफिर को मिला दिया
    जिंदगी का फलसफा जो
    कहीं रह गया था अधूरा
    मुरझाई हुई तकदीर को
    जीने के काबिल बना दिया
    देना चाहता था मुझे बहुत कुछ
    मगर उसे क्या पता था
    उसकी चाहत की उसी आग ने
    मेरा दामन जला दिया
    बस राख के कुछ ढेर बाकी थे
    वक्त की तेज़ आंधी ने उनको उड़ा दिया
    खाली पड़े उन मकानों में
    परछाईयाँ ही तो बस बाकी हैं
    वरना हालत के इस दौर ने
    सब कुछ मिटा दिया …..

  • फिर क्या जीना फिर क्या मरना

    rajendrameshram619@gmail.com
    ************************

    जलने दो हृदय की वेदना,
    विचलित मन से कैसे डरना |
    हो जीवन संताप दुखों का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
    ~~~~~00000~~~~~

    युद्ध अनघ है मन के भीतर,
    परितापों से प्राण पिघलते |
    दूर करो असमंजस बादल,
    मन पावक में कैसे जलते ||
    धार बढा दो पराक्रमी तुम,
    कुरुक्षेत्र सा जीवन लड़ना |
    हो जीवन संताप दुखो का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
    ~~~~~00000~~~~~

    तुम में ज्वाला सूर्य सरीखी
    हेतु धर्म तुम जल सकते हो |
    पीर पराई थोड़ी समझो,
    कष्ट दूर सब कर सकते हो ||
    फिर पुण्य मिले कुछ नही मिले,
    दीपक बनकर पथ पर जलना |
    हो जीवन संताप दुखो का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
    ~~~~~00000~~~~~

    आनंद स्वतः मिल जाएगा,
    हो दूर निराशा की बातें |
    अपने दीपक तुम स्वयं बनो,
    दूर करो अंधेरी रातें ||
    कटु वचनों का बोझा लादे,
    शुष्क हँसी फिर कैसे हँसना |
    हो जीवन संताप दुखो का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||

    ***************************
    रचना-राजेन्द्र मेश्राम “नील”

  • अपने लहू से

    समस्त देशवासियों को
    #स्वतंत्रता दिवस की 74 वी वर्षगांठ पर हार्दिक मंगलकामनाएँ
    राजेन्द्र मेश्राम-नील
    *******************

    अपने लहू से तर,
    धरा का शृंगार कर,
    सोई हुई चेतना को,
    इतना तो भान दे |

    भावी वर्तमान भूत ,
    सब को बिसारकर ,
    कर तू नवल काज ,
    देश को उत्थान दे |

    फूंक दे प्राणों में प्राण ,
    है हो गए जो निष्प्राण ,
    उनके हृदय चित्त ,
    उर स्वाभिमान दे |

    जन्मदायिनी जो मेरी ,
    मातृभूमी भारती है,
    विजयी पताका नभ ,
    छोर तक तान दे |

    रचना-#राजेन्द्र_मेश्राम_नील

  • स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त

    *15 अगस्त का महापर्व*

    कभी सोने की चिड़िया सा,
    ये हिंदुस्तान हमारा था !
    जमी पर जैसे जन्नत था,
    जगत जग-मग सितारा था !
    लुटेरों ने इसे न जाने,
    कितनी बार है लूटा !
    जुड़ा है टूट कर के ये,
    जुड़ा और जुड़ के फिर टूटा !

    कहानी न महज समझो,
    नही कोई है ये किस्सा !
    नही इतिहास ये पूरा,
    फकत छोटा सा है हिस्सा !
    अभी भूले नही थे हम,
    पिछले/मुगली प्रशाशन को !
    नज़र अंदाज़ कर सकते नही,
    गोरे कुशाशन को !

    तृषित था तंत्र भारत का,
    ग्रषित ग्रामीण और शहरी !
    समय का चक्र ये देखो,
    की बिल्ली दूध की प्रहरी !
    अतिथि देवो भवः की ये धरा,
    फिर भी रही ठहरी !
    हमारे पूर्वजों के शान पे,
    थी चोट अब गहरी !

    उठा भूचाल भूतल पर,
    उगे लंगड़ी शमा के पर !
    अब फूटी क्रोध की ज्वाला,
    औ टूटे सब्र के सागर !
    जने तब लाल भारत में,
    अपनी जननी की कोखो से !
    तपा अब जर्रा-जर्रा था,
    दिखीं लपटें झरोखों से !

    इरादे जीतने का लेके,
    बच्चा बच्चा था आया !
    चुनी अब राह सबने वो,
    जिसे था जो भी है भाया !
    उऋण हो गोद भारत माँ की,
    अब बहशी फिरंगी से !
    हराई शूरमों ने तोपे,
    बस तलवार नंगी से !
    कोई हंस कर चढ़ा फांसी,
    कोई था वीरगति पाया !
    उन्ही वीरों-शहीदों ने,
    देश आज़ाद करवाया !

    हटी बरसों की जिल्लत,
    जब तिरंगा नभ पे लहराया !
    सभी ने साथ मिलकर था,
    ये बन्दे मातरम गाया !
    हमारे उन शहीदों ने,
    हमें ये दिन है दिखलाया !
    वही ये ऐतिहासिक दिन
    *स्वतंत्रता दिवस/15 अगस्त* कहलाया !

    हुआ हर *सै* मृदा से अंकुरित,
    इस राष्ट्र मधुबन में !
    हुए हर्षित थे *जन, गण, मन*
    प्रफुल्लित हो उठे मन में !

    हमारे पूर्वजों/ *शहीदों*
    ने जब,
    हमें ये दिन था दिखलाया !
    वही इतिहास ने हमको,
    *स्वतंत्रता दिवस* बतलाया !!

    🙏🙏🙏
    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    *भूत पूर्व सैनिक*
    रायबरेली उत्तर प्रदेश

  • स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त

    *15 अगस्त का महापर्व*

    कभी सोने की चिड़िया सा,
    ये हिंदुस्तान हमारा था !
    जमी पर जैसे जन्नत था,
    जगत जग-मग सितारा था !
    लुटेरों ने इसे न जाने,
    कितनी बार है लूटा !
    जुड़ा है टूट कर के ये,
    जुड़ा और जुड़ के फिर टूटा !

    कहानी न महज समझो,
    नही कोई है ये किस्सा !
    नही इतिहास ये पूरा,
    फकत छोटा सा है हिस्सा !
    अभी भूले नही थे हम,
    पिछले/मुगली प्रशाशन को !
    नज़र अंदाज़ कर सकते नही,
    गोरे कुशाशन को !

    तृषित था तंत्र भारत का,
    ग्रषित ग्रामीण और शहरी !
    समय का चक्र ये देखो,
    की बिल्ली दूध की प्रहरी !
    अतिथि देवो भवः की ये धरा,
    फिर भी रही ठहरी !
    हमारे पूर्वजों के शान पे,
    थी चोट अब गहरी !

    उठा भूचाल भूतल पर,
    उगे लंगड़ी शमा के पर !
    अब फूटी क्रोध की ज्वाला,
    औ टूटे सब्र के सागर !
    जने तब लाल भारत में,
    अपनी जननी की कोखो से !
    तपा अब जर्रा-जर्रा था,
    दिखीं लपटें झरोखों से !

    इरादे जीतने का लेके,
    बच्चा बच्चा था आया !
    चुनी अब राह सबने वो,
    जिसे था जो भी है भाया !
    उऋण हो गोद भारत माँ की,
    अब बहशी फिरंगी से !
    हराई शूरमों ने तोपे,
    बस तलवार नंगी से !
    कोई हंस कर चढ़ा फांसी,
    कोई था वीरगति पाया !
    उन्ही वीरों-शहीदों ने,
    देश आज़ाद करवाया !

    हटी बरसों की जिल्लत,
    जब तिरंगा नभ पे लहराया !
    सभी ने साथ मिलकर था,
    ये बन्दे मातरम गाया !
    हमारे उन शहीदों ने,
    हमें ये दिन है दिखलाया !
    वही ये ऐतिहासिक दिन
    *स्वतंत्रता दिवस/15 अगस्त* कहलाया !

    हुआ हर *सै* मृदा से अंकुरित,
    इस राष्ट्र मधुबन में !
    हुए हर्षित थे *जन, गण, मन*
    प्रफुल्लित हो उठे मन में !

    हमारे पूर्वजों/ *शहीदों*
    ने जब,
    हमें ये दिन था दिखलाया !
    वही इतिहास ने हमको,
    *स्वतंत्रता दिवस* बतलाया !!

    🙏🙏🙏
    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    *भूत पूर्व सैनिक*
    रायबरेली उत्तर प्रदेश

  • Karsni leeli

    🍀🌹🙏सादर प्रणाम आप सभी सम्मानित जनों को 🍀🌹🙏,,,,,,,,,,कर्ष्ण लीला,,,,,,,, 🍀🌹🙏
    तेरी लीला है अपरंपार,,
    ओ जग के हे पालनहारा ,,,,,,🌻🌻
    जनम लियों है मथुरा बीच मैं,,,,
    तेरे नैन (आखं) खुल्यों है गोकुल मां,, 🍀🌸
    मुक्त करियों सब बन्दी जन को,,,,
    चैन की बंसी बजैया,,,,,, तेरी लीला है अपरंपार,,,, 🌺🌹
    लाल को मारन पूतना आई,,,,
    छाती को दूध पिलाया,,
    पिलियों दूध जो छाती को है,,,,, 🍁🍁
    खुद पूतना को नीद (मार) सुलाया,,,, तेरी ,,,
    सुदामा संग है बालापन बितायों,,,,,,,
    नैनन नीर हैं चरण धुलाय,,,,,, 🌹🌻
    जाके सुदामा को महल बिठायों,,
    हो रही जै जै कार,,,, तेरी लीला अपरंपार,,,,, 🍀🌸🌻
    माखन चोरी में चोरी दिखाई,,,,,,,,
    दिखाई हैं जननी को जग की लीला,,,, 🌻🌼
    कालिया नाग को मार गिरायों,,,,,,,
    फन में नाच दिखायों,,,,,, तेरी लीला है अपरंपार,,,, 🌼🍁
    मामा कंस की छाती है तोडीं,,,,
    , राज है मुक्त कराय,,,,,तेरी लीला है अपरंपार ओ,,,,, जग के पालन हारा,,,,, 🌼🍁🌺,,,,🌻🌼🍁
    ,,,,,,,,,🙏🌹पी सी जोशी, बरेली रोड हल्द्वानी,,, 🌹🙏
    ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,🙏🙏,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

  • Karsni leeli

    🍀🌹🙏सादर प्रणाम आप सभी सम्मानित जनों को 🍀🌹🙏,,,,,,,,,,कर्ष्ण लीला,,,,,,,, 🍀🌹🙏
    तेरी लीला है अपरंपार,,
    ओ जग के हे पालनहारा ,,,,,,🌻🌻
    जनम लियों है मथुरा बीच मैं,,,,
    तेरे नैन (आखं) खुल्यों है गोकुल मां,, 🍀🌸
    मुक्त करियों सब बन्दी जन को,,,,
    चैन की बंसी बजैया,,,,,, तेरी लीला है अपरंपार,,,, 🌺🌹
    लाल को मारन पूतना आई,,,,
    छाती को दूध पिलाया,,
    पिलियों दूध जो छाती को है,,,,, 🍁🍁
    खुद पूतना को नीद (मार) सुलाया,,,, तेरी ,,,
    सुदामा संग है बालापन बितायों,,,,,,,
    नैनन नीर हैं चरण धुलाय,,,,,, 🌹🌻
    जाके सुदामा को महल बिठायों,,
    हो रही जै जै कार,,,, तेरी लीला अपरंपार,,,,, 🍀🌸🌻
    माखन चोरी में चोरी दिखाई,,,,,,,,
    दिखाई हैं जननी को जग की लीला,,,, 🌻🌼
    कालिया नाग को मार गिरायों,,,,,,,
    फन में नाच दिखायों,,,,,, तेरी लीला है अपरंपार,,,, 🌼🍁
    मामा कंस की छाती है तोडीं,,,,
    , राज है मुक्त कराय,,,,,तेरी लीला है अपरंपार ओ,,,,, जग के पालन हारा,,,,, 🌼🍁🌺,,,,🌻🌼🍁
    ,,,,,,,,,🙏🌹पी सी जोशी, बरेली रोड हल्द्वानी,,, 🌹🙏
    ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,🙏🙏,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

  • प्यार में भीगते-भिगाते रहो

    आज जितना भी बरसता है
    बरस जाने दो,
    फिर तो सावन भी चला जायेगा,
    सींच कर कोना-कोना धरती का
    फिर तो सावन भी चला जायेगा।
    आज जितना भी चाहो भीगो तुम
    प्यार ही प्यार भरा मौसम है,
    प्यार में भीगते-भिगाते रहो,
    फिर तो सावन भी चला जायेगा।

  • कृष्णलीला

    *कृष्ण लीला*

    तू दधि चोर तो; तोही न छोडूं,
    पकड़ बांह तोरे; कान मरोड़ूँ !
    लल्ला मेरो मोही हिय ते प्यारा
    तोसे कुढ़त गोकुल ब्रिज सारा

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    जग के पालक: जननी के बालक,
    प्रहसन करते; जग संचालक !
    जड़ चेतन बंशी सुन हिलते!!
    ग्वालन संग जमुना तट मिलते,

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    गाय चरैया, पर्वत को उठइया,
    बिषधर को, जमुना में मरैया !
    पुरबाशिन को लाज न आवत,
    मोरे लल्ला को, चोरी लगावत!!

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    भूत पूर्व सैनिक
    रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

  • संजना

    सावन में ए सखी, खनके क्यों कँगना।
    कोयलिया गीत सुनाए ,क्यों मेरे घर अँगना।।
    बार बार दिल धड़काए, प्यास जगाए।
    जाने क्या करेगी, मेरी नादान ए कँगना।।
    जब सुनती हूँ, “ए शोभा पियु कहाँ ” की मीठी स्वर।
    तब न पूछ सखी , घायल हो जाती है ए संजना।।

  • – मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!

    मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!
    कभी राम नाम लिया तो नहीं ।
    मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!
    नर तन लेकर इस जहां में
    आया नारायण को पाने को ।
    भोग-विलास में रमा रहा ।
    याद न आया कभी नारायण को ।।
    मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!
    कभी राम नाम लिया तो नहीं ।
    मिथ रिश्ते-नातें में मैं यूँही बँधा ही रहा ।
    कभी साँचा रिश्ता याद आया ही नहीं ।।
    मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!

    कभी राम नाम लिया तो नहीं ।।
    मोह-माया के इस जन-जाल में
    मैं यूँही जकड़ा ही रहा ।
    कभी राम नाम सुमिरा तो नहीं ।।
    मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!
    कभी राम नाम लिया तो नहीं ।।
    आस-निरास के बंधन में यूँही बँधा ही रहा ।
    कभी श्रद्धा और विश्वास में रमा तो नहीं ।
    शिव-पार्वती को सुमिरन कभी किया तो नहीं ।
    मैंने व्यर्थ ही जिन्दगी गँवायो रे!
    कभी राम नाम लिया तो नहीं ।।
     विकास कुमार

  • कपड़े बदले, वेश बदला, बदला घर-संसारा ।

    कपड़े बदले, वेश बदला, बदला घर-संसारा ।
    माया-मोह में फँसा रहा तु नर पर बदल सका न अपना व्यवहार ।
    रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
    तन को धोया नित-नित दिन तु, पर मन को धोया कभी नहीं
    अगर एक बार जो मन धो लो हो जाये तन तेरा शुद्ध ।
    रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
    मन शुद्ध है तो तन शुध्द है, आहार शुध्द तो विचार शुद्ध है ।
    जल शुद्ध है तो वाणी शुद्ध है, संगत शुद्ध तो रंगत शुध्द है ।
    रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
    आया तु सफेद चादर ओढ़ के और मैल किया तु इस जन-जाल में ।
    रोवत-रोवत अब क्यूँ मरते है, अब भी क्यूँ न राम सुमिरन करत है ।
    रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
    माया में तो तु फँसा रहा है, एक बार भी तु नहीं राम जपा है ।
    जब जानता है राम नाम है जगत में मोक्ष अधारा तो क्यूँ नहीं जपा अभागा !
    रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
     विकास कुमार

  • आजा-2 मेरे राम दुलारा ।।

    कौसल्या का आँख का तारा, दशरथ राम दुलारा ।
    कैकयी सुमित्रा का है तु सबसे प्यारा
    आजा-2 मेरे राम दुलारा ।।
    उर में तेरा भरत का वासा,
    संग में रहते लक्ष्मण न्यारा ।
    शत्रुघ्न है तेरा सबसे प्यारा ।
    आजा-2 मेरे राम दुलारा ।।
    हनुमान है तेरा भक्तों में निराला,
    और जपत रहत राम-नाम का माला ।।
    आजा-2 मेरे राम दुलारा ।।
    शक्ति है तेरी सीता मईया ।
    भक्ति है तेरी सबरी मईया ।।
    आजा-2 मेरे राम दुलारा ।।
    प्रेम निश्चल है भक्ततत केवट का ।
    मित्र है तेरा भक्त विभीषण ।।
    आजा-2 मेरे राम दुलारा ।।
     विकास कुमार

  • पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।

    पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।
    पर क्या खाक मिला हमें, तुझसे ओ बेवफा मुहब्बत करने से ।।
    पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।
    उनको मुहब्बत मिले जहां मे, जो तेरे हुश्न गुलाम हो ।।
    हम तो सिर्फ दिल-ही-दिल में चाहें, क्योंकि तु न बदनाम हो ।
    पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।।
    तु मेहरबां जो मुझसे होते, बदनसीब हम न होते ।
    कट जाती यूँही जिन्दगानी खुशियों से, हम दुःखी ना होते ।।
    पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।
    अब ये वक्त का रूख कुछ नया अंदाज दिखाया ।।
    गैर को अपना बनाके तुने अपनी अंदाज दिखाया ।
    पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से । ।
    अब टूट गये हम खूद से ही, तुझसे क्या फिर जुड़े हम ।
    पर क्या खाक मिला हमे, तुझसे ओ बेवफा मुहब्बत करने से ।।
    पत्थर को पूजते-पूजते थक गये हम कई वर्षों से ।
     विकास कुमार

  • अपनी अदा देखाकर हुश्न के बाजार में मेरा भाव लगाया तुमने।

    अपनी अदा देखाकर हुश्न के बाजार में मेरा भाव लगाया तुमने।
    मिल गया कोई रईसजादा तो इस मुफलिस गरीब को ठुकराया तुमने।।
    मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने ।
    रईसों के महफिल में मेरा मजाक उड़ाया तुमने ।।
    मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने ।
    पत्थऱ समझके ठुकराया तुमने।
    खिलौना समझके खेला तुमने।।
    मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने।
    वफा के हर मोड़ पर बेवफाई निभाई तुमने।
    अपनी निगाहों का सहारा देकर,
    गैरों को निगाहों में बसाया तुमने ।।
    मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने ।
    कभी जुल्फें तले सुलाया तुमने ।
    मीठी-मीठी गीत गुनगुनाया तुमने ।।
    मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने ।
    अब वो दौर ह, गैरों को बाहों का सहारा बनाया तुमने ।
    और अपनी रईसी का रौब दिखाया तुमने ।।
    मेरी मुफलिसी का औकात दिखाया तुमने
     विकास कुमार

  • नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।

    नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।
    जहां की सारी खुशियाँ झुके तेरे कदम,ये दुआ है मेरे ।।
    नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।।1।।

    लगे तेरे नसीब की हर एक बला हमें, मााँगु रब से यही दुआ मैं ।
    न आये तेरे नसीब में वो घडी कभी, जो तुझे मेरी जरूरत पडे ।।
    नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।।2।।

    जिये जहाँ में तु जहां के साथ मुस्कुरा के सदा ।
    न छूटे तेरे लबों की हँसी वो कभी ।।
    नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।।3।।

    तु जहाँ रहें, जहाँ की वादियाँ साथ दे तुम्हें ।
    ना पडे तेरे नसीब मौसम का वो आाँच कभी ।।
    नये लोग, नयी शहर, नयी जहाां मुबारक हो तुम्हें ।।4।।

    ना आये तुझे वो कभी मेरा याद ।
    तु अपनी जहां में आबाद रहें ।।
    नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।।5।।

    अब क्या पेश करूँ तुझे मैं, जहां की सारी खुशियाँ नसीब हो तुम्हें ।
    तेरी किसम्त की हर एक बला नसीब हो हमें ।।
    नये लोग, नयी शहर, नयी जहां मुबारक हो तुम्हें ।।6।।
     विकास कुमार

  • जय जय जय जय जय श्री राम

    जय जय जय जय जय श्री राम
    मर्यादा के दुसरे नाम,
    जय जय….
    वन वासी भये तज के राज
    इस जीवन के तुम कृपा निधान
    जय जय….
    मानवता के सूत्र पिरोये,
    तुम शौर्य, तेज, सूरज के वंशज
    इस जग में तुम काल अजय हो
    तुम्हरे नाम में चारों धाम,
    जय जय ….
    धर्मात्मा तुम अधर्मि नाशक,
    सर्वश्रेष्ठ,तुम मानव के नायक,
    हर सुख का बस एक ही नाम
    जय जय….
    ~अजित सोनपाल

  • जय जय जय जय जय श्री राम

    जय जय जय जय जय श्री राम
    मर्यादा के दुसरे नाम,
    जय जय….
    वन वासी भये तज के राज
    इस जीवन के तुम कृपा निधान
    जय जय….
    मानवता के सूत्र पिरोये,
    तुम शौर्य, तेज, सूरज के वंशज
    इस जग में तुम काल अजय हो
    तुम्हरे नाम में चारों धाम,
    जय जय ….
    धर्मात्मा तुम अधर्मि नाशक,
    सर्वश्रेष्ठ,तुम मानव के नायक,
    हर सुख का बस एक ही नाम
    जय जय….
    ~अजित सोनपाल

  • हम दीन-दुःखी, निर्बल, असहाय, प्रभु! माया के अधीन है ।।

    हम दीन-दुखी, निर्बल, असहाय, प्रभु माया के अधीन है ।
    प्रभु तुम दीनदयाल, दीनानाथ, दुखभंजन आदि प्रभु तेरो नाम है ।
    हम माया के दासी, लोभी, भिखारी, दुर्जन, दुष्ट, विकारी प्रभु पापी है ।
    प्रभु तुम माया के स्वामी, दाता-विधाता, निर्गुण,निर्विकार, सनातन पुरूष महान हो ।।1।।

    हम इन्द्रियों के दासी, भोगी-विलासी, कामी, आताताई,अग्यानी, दुष्ट मानव है।
    प्रभु तुम जितेन्द्रिय,गुणों के स्वामी,बुद्धिमान, सकल जगत के स्वामी हो।
    हम अहंकारी, इर्ष्यालु, लाभ-हानि, मान-अपमान में फँसे प्रभु तेरो सेवक है ।
    उद्धार करो प्रभु, निस्तार करो प्रभु हम तेरो माया के अधीन है ।।2।।

    हम भक्षक, मन के चंचल, धरा पे पाप फैलाने वाला प्रभु अधम-नीच है ।
    प्रभु तुम रक्षक, मन के स्थिर, धरा पे धर्म फैलाने वाला सज्जन पुरूष महान हो ।
    हम पृथ्वीसुत प्रभु तुम प्रथ्वीपति प्रभु ,इस नाते प्रभु हम तेरो बालक है ।
    सारे जहां के पिता प्रभु तुम, निज पुत्रों को कल्याण करो प्रभु!।।3।।

    हे रामचन्द्र! गणिका के उध्दारक,अहल्या के प्रभु तुम निस्तारक ।
    हम कलियुग के प्राणी, काम,क्रोध,मद, व्यसन में फँसे प्रभु तेरो दास है ।
    दासों के प्रति प्रभु तेरो करतब बड़़े महान है ।
    उध्दार करो प्रभु! निस्तार करो प्रभु! हम तेरो माया के अधीन है ।।4।।
    जय श्री राम ।।
    कवि विकास कुमार ।।01:34 10/06/2020 जया श्री राम ।।

New Report

Close