कितना सरल था गांव का जीवन गले में चुन्नी बाल में रीवन बेरी के नीचे बच्चों की भीड़ थी बुजुर्ग परिवार की एक दृढ़ रीड थी दादा की ज्ञान की महफिल का लगना आंख बचाकर […]

सियासी खेल रचाया जा रहा है कुर्सी पाने के चक्कर में उंगली पर सबको को नचाया जा रहा है यहां रेस लगी है कुर्सी की हाथी, साइकिल और सेना की तोपों को सजाया जा रहा […]

झर झर नीर झरे नैनन से बीच हथेली रख मुखरे को। बिलख बिहारी विनती करते वो कैसे सहेगी इस दुखरे को।। देर भयो ग्वारन संग खेलत भूखा प्यासा लाल तुम्हारो। फिर भी मैया मारन चाहे […]

थोड़ी सी दिल्लगी, थोड़ा सा प्यार। थोड़ा सा गुस्सा, ज्यादा ऐतबार। ताज़गी, समर्पण आकर्षण हथियार। एक दूजे को बांधे रहे, गलबहियों के हार। रूठना,मनाना इनसे जीवन खुशगवार। नीरसता कर देती, जीवन बेकार। एक दूसरे के […]

हंसना मुस्कुराना ना तू दुख मनाना, हर दुख के बाद सूख है जरूर ये मन को है समझाना। अंधेरों के आगे रोशनी का साया है, रब ने दुख सुख से यह जीवन सजाया है। हंस […]

मनमौजी बनकर चलना ये कैसी आजादी है। बिन मर्यादा के जीना जीवन की बर्बादी है।। अनुशासन न कोई बंधन है न तुम पर कोई थोप रहा। एक सफलता की कुंजी है सुख सम्पदा सौंप रहा।। […]

हाथों को अपने फैलाकर के बाबूजी दे तो कहता हूं कभी मेरे मुंख को देख जरा मैं रोता बिलकता रहता हूं उन ठंडी सीत हवाओं मे उन कड़कती काली घटनाओं में मैं डरा सहमा सा […]

कंचन सो तेरो रंग री बावरी मुख पे कमल की लाली है हंसों का सिरताज ले बैठी अब भी झोली खाली है चीर सरोवर तल में झांकें तू तो बड़ी मतवाली है कहते सब संसार […]

दोस्त नहीं अब हम दूर है कही तू किसी और की बाहों में मेरा भी नसीब चल पड़ा है किसी और के साथ लोग कहते है पहला प्यार भुलाया नहीं जाता हम कहते है भूलना […]

पंख काट जाल डाल .. धरती से ऊंचा ना उड़ने दिया, पुरुष महासत्ता का शिकार .. स्त्री को होना पड़ा। सुष्मिता थी वह स्त्री कुसुम, वज्र स्त्री होना पड़ा, स्वाभिमानी को अस्मिता कहा, बैरागन बनना […]

नारी ने चाहा की पर्दा प्रथा दूर हो उससे पर लोग हंस रहे हैं उसे बेपर्दा करके 👩‍🏫👩‍🔧👩‍🏭👩‍🔬👩‍🚀👮‍♀👷‍♀👸👱‍♀🤰🤱 आखिर क्यों

जटायु अंत में आंखें खोले हाथ जोड़ के करे वंदना रोता रोता बोली जटायु अपनी आंखें खोले जल जो पीले तो वह नहीं पीता राम बचा लो दुखी है सीता भक्ति रस में डुबके देखो […]

जटायु अंत में आंखें खोल हाथ जोड़ के करे वंदना रोता रोता बोली जटायु अपनी आंखें खोली जली जो पीले तो वह नहीं पीता राम बचा लो दुखी है सीता भक्ति रस में डुबके देखो […]

जीवन उपहार ——————- कभी खुरचते कभी लेप लगाते, कभी शीतल वाणी, कभी आंखों में पानी। कभी मौन धारक ,कभी गुनगुनाते। कभी प्यार बर्षा,कभी भुनभुनाते। कभी गलती करते ,कभी बनते सुधारक। कभी सुन्न मस्तिष्क, कभी बन […]

‍एक पिता आख़िर पिता होता है.. जीवन की छाया ख़ुशियों का साया पिता जो हो तो जीने में अलग अंदाज़ होता है पिता हर घर की चौखट से बँधा रिवाज़ होता है हमारी सबसे आसान […]

दिलों को जोड़ा ना गया, फैला दी मुल्क में खलिश। सुख चैन लूट कर,आतंकियों ने लगा दी आतिश। 1. धर्म के ठेकेदारों ने धर्म के नाम की बांटी बक्शीश, मासूम सी जानों को खून खराबे […]

रितुराज वसंत के आवन पे बसुधा ने कण कण सजा लिया है । शबनम की बारिश से धरणीधर और तृण तरुवर सब नहा लिया है।। पत्र पुराने त्याग दिए बृक्ष सब नव किसलय तन चढ़ा […]

ये जो मेरा कल आज धुंधला सा है सिर्फ कुछ देर की बात है अभी ज़रा देर का कोहरा सा है धुंध जब ये झट जाएगी एक उजली सुबह नज़र आएगी बिखरेगी सूरज की किरण […]

आया है मधुमास धरा पे रंग -बिरंगी खुशियाँ लेकर। वृक्षों ने परिधान बदलकर नवल पत्र दल बगिया लेकर।। पर्वत खेत बाग सब कुसुमित धरा गगन अज रंगिया केसर। “विनयचंद “इस रितुराज का कर स्वागत दिल […]

मधुमास सुहाना आया है धरती के आँगन में। रक्तिम कुसुम सजाया है प्रकृति के माँगन में।। दुल्हन -सी है सज गई धरती अम्बर मौर सजाया। भ्रमर तितलियाँ बने बराती पर्वत ढोल बजाया।। संग मयूरी लेकर […]

सचमुच ये रितुराज है। तेरे स्वागत में प्रकृति ने वसुधा के कण कण को सजाया। बाग – बगीचा बहती सरिता खुशबू से तरुवर नहलाया।। कोमल किसलय कोमल कुसुम मदमस्त कामराज है। सचमुच ये रितुराज है।।

आया वसंत आया वसंत । बोल रहा है आज दिगन्त।। पतझर ने कहा तरुवर से बनकर किसलय आया वसंत। पत्तों ने कहा फूलों से खुशबू बनकर आया वसंत।। आया वसंत आया वसंत। बोल रहा है […]

जब कोई हमसे हँसकर थोड़ा सा बोला देता है, अपने दिल के दरवाजे हल्के से खोल देता है। हम खुशी मे अपने आपको भूल सा जाते है, दो पलो मे ही सारे जीवन की खुशियाँ […]

खेतों में है फूली सरसों धनिया महके गम गम। बाग बगीचे सजे हुए हैं रंगीले पुष्पों से हरदम।। धरती को रंग डाला कुदरत ने रंगों से। हमने भी अंबर को रंगा रंग विरंगे पतंगों से।। […]

बड़ा इतराता है जुगनू चांद की धूल को मल कर तेरी तारीफ तो बस इस रात ने की है बेपर्दा कर सके जो अख्ज की भीड़ को इतनी हिम्मत तो बस अफताब ने की है

क्योंकर छिलका खाए कृष्णा? इतिहास हमारा क्या कहता है ? क्या मतलब है इसका कहना? एक प्रश्न मन पूछ रहा है क्योंकर छिलका खाए कृष्णा? कदलीवन नारायण को प्यारा कदली से नित होती पूजा। तभी […]

यूँ तो किसी के गिरेवान में मत झाँकना । झाँककर भी किसी को कम नहीं आँकना। गिरिवर उठाने वाले से बचाकर माखन क्योंकर छीका नित -नित ऊँचा टाँगना।।

समय तो समय पर ही समय से चलता रहता है। फ़िक्र कहां है किसी को किसी की…? जमाना तो यूं ही आगे बढ़ता रहता है।

मेरे जीवन की पहली कविता मेरे गुरु को समर्पित Teachers Day स्कूल का वह दिन मेरे जीवन का एक सबसे खास दिन बन गया जिसे मैं कभी भुला नहीं सकती उस दिन मुझे पहली बार […]

माँ ! मुझे फौज में भेज दे। ना बेटा ! अपने मन को जरा परहेज़ दे।। बन जा बेटा आॅफिसर तू राज करोगे जनताओं पर। पब्लिक से नेताओं को भी नाज रहेगा सेवाओं पर।। साहेब […]

गणों को नाज़ है कि वो तंत्र का हिस्सा हैं क्या पता उन्हें कि वो षड़यंत्र का हिस्सा हैं ये जो श्वेत वस्त्र धारी हैं कहलाते लोकतंत्र के पुजारी हैं असल में चुनावी वक्त के […]

गणों को नाज़ है कि वो तंत्र का हिस्सा हैं क्या पता उन्हें कि वो षड़यंत्र का हिस्सा हैं ये जो श्वेत वस्त्र धारी हैं कहलाते लोकतंत्र के पुजारी हैं असल में चुनावी वक्त के […]

हिन्दी ओज कविता-अभिनन्दन बना लेंगे | मिट्टी वतन सिर माथे चन्दन बना लेंगे | ऊंचा तिरंगा भारत सदा वंदन बना लेंगे | रंगी शहीदो खून आजादी नमन उनको | कुर्बानी शहीदों हम वचन बंधन बना […]