कभी इन राहों पर भी…
April 28, 2020 in मुक्तक
कभी इन राहों पर भी आया करो…
क्या ये भी बैरन हैं तेरी मेरी तरह….
by Pragya
April 28, 2020 in मुक्तक
कभी इन राहों पर भी आया करो…
क्या ये भी बैरन हैं तेरी मेरी तरह….
by Pragya
April 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
कोई तकलीफ नहीं है हमको उजालों से
बस ज़िन्दगी के अँधेरे से डर लगता है
रोज़ ही रूठना रहता था तुम्हारा भी
बिछड़ने में गम ना होगा चलो अच्छा है
तुम भी कहां रहे हो तुम
हमें भी तो देखो ना अब हम भूल गए
मुबारक हो तुम्हें जुदाई के हसीं लम्हे
तुम्हें मुझसे दूर जाना ही अच्छा लगता है
अब मुहब्बत कहो या तुम्हारी रुसवाई
मेरा हर अंदाज़ अब शायराना लगता है
हर लम्हात जुड़ा है तेरी यादों से
भूलने से तुम्हें बहुत कुछ याद आता है
जब साँस थमेगी तो चैन आयेगा ‘प्रज्ञा’
अब तो जीना भी मुहाल लगता है
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by Pragya
April 27, 2020 in शेर-ओ-शायरी
नकाब चेहरे पर लिपटा है शोख लगता है….
ये उतर जाता तो बा-खुदा क्या आलम होता….
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by Pragya
by Pragya
April 26, 2020 in शेर-ओ-शायरी
क्यूँ मुझसे नज़रे चुराते हो
क्यूँ अपना प्यार छुपाते हो
नींद नहीं आती तो फिर क्यूँ
मेरे ख्व़ाब सजाते हो
by Pragya
April 25, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
वो बैठते हैं आजकल
मेरे रकीबों के साथ
जिनके हाथों में
रहता था मेरा हाँथ
बुरा नहीं लगता है मुझे पर
अच्छा भी नहीं प्रतीत होता है
क्या करूँ दिल
दिल ही दिल में रोता है
कर कुछ भी नहीं सकती
बड़ी मुश्किल में
रहती हूँ
अश्रु बहते नहीं
आजकल पीती रहती हूँ
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by Pragya
April 24, 2020 in शेर-ओ-शायरी
आज सोंचा जाकर उनसे थोड़ी गुफ्तगू कर लूँ
तभी पीछे से उनकी भाभी आ गयीं हाय तौबा!
by Pragya
April 23, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
ना वास्ता
किसी से
रखते हैं लोग……
फिर जाने क्यूँ
जिन्दगीं से
खेलते हैं लोग…..
हालात बद से बदतर
होते जा रहे हैं
क्यूँ तैश में ही
अक्सर
रहते हैं लोग…..
किसी की ज़िंदगी
से यूँ
खेलना अच्छा
नहीं होता
फिर निहत्थों
पर वार क्यूँ
करते हैं लोग…..
by Pragya
April 23, 2020 in ग़ज़ल
गलतफहमियों के बीज अविश्वास से पनपते हैं
अधसुनी बातों को लोग पूरा सच समझते हैं
बड़े तो हो चले हैं हम अपनी नजरों में प्रज्ञा !
ना जाने लोग क्यों मुझे अभी छोटा ही समझते हैं
जीने की उम्मीद खत्म हो चुकी है मगर जिंदा अभी हैं हम
ये बात समझ ना आई! वो मुझे मुर्दा क्यों समझते हैं?
दाग दर्पण में है चेहरे पर मेरे एक भी नहीं
फ़क़त इतनी-सी बात वो क्यों नहीं समझते हैं
उलझे हैं हम या हमारी जुल्फों में कई राज
इस रहस्य के धागे कभी क्यों नहीं सुलझते हैं
सामना कभी तो होगा उनका मेरी वफा(पवित्रता)से
अभी तो दामन को मेरे वो मैला ही समझते हैं
गम छुपाने के लिए हम जो जरा हंस बोल देते हैं
हंसी तो छोड़ो उन्हें मेरे आंसू भी खटकते हैं
जो दो-चार गजलें हम अपनी तन्हाई में लिखते हैं
कुछ नासमझ हैं जो इसको प्रेमपत्र समझते हैं
प्रेमपत्र तो लिखकर प्रेषित किया जाता है
हम तो अपने जज़्बात कविताओं में निचोड़ देते हैं।
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by Pragya
April 21, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
चौसर खेलने वाले भी
जग में पूजे जाते हैं
राज़-काज,अनुज,पत्नी और प्रजा
सर्वस्व दांव पर रखकर भी
एक भी बाजी ना जीते
सर्वस्व हार ही जाते हैं
समय की विडम्बना देखो
ऐसे लोग भी
धर्मराज कहलाते हैं
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by Pragya
April 20, 2020 in शेर-ओ-शायरी
आसमां तो है सबका मगर
मुझे हकीकत की जमी पर रहने का जुनून है
by Pragya
April 19, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
उनकी बगिया की बहार
देखती ही रह गई
कली जो खिली थी
धूप की तपन में
मुरझा गई ……
अंजुमन में कितने मशरूफ थे
तेरी स्मृतियों के अवशेष
बातें बहुत-सी हुईं
रह गए बस वचन शेष …..
गीत गुनगुना रही थी
नवविवाहिता वसंत
स्तब्ध थे खड़े सभी
सुन रहे थे प्रेमग्रंथ……
प्रज्ञा की वेदना के साक्षी हैं
सभी यहाँ
रात्रि की कौमुदी और
प्रभात की सुर्खियाँ……
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by Pragya
April 19, 2020 in मुक्तक
बिछड़ने से जरा पहले
तुम्हें कुछ याद है हमदम
तुम आये थे मुझसे मिलने
बिछड़ने के इरादे से
by Pragya
April 18, 2020 in शेर-ओ-शायरी
सिले हैं होंठ मेरे उसूलों के धागों से
पर क्या करूँ मेरे उसूल ही मेरे जीने का बहाना हैं…..
by Pragya
April 18, 2020 in शेर-ओ-शायरी
हाँथ फैलाकर मैने कभी कुछ भी नहीं माँगा
पर तुझे पाने की चाहत कयामत तक रहेगी
by Pragya
April 18, 2020 in शेर-ओ-शायरी
हाँथ फैलाकर खुदा से कुछ भी नहीं माँगा
मैने आज तक
मगर ए हमदम!
तुझे पाने की चाहत कायनात तक रहेगी
Comments Off on दो लफ्ज़
by Pragya
April 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
मन करता है…
कि जी लूं कभी अपने हिस्से का जीवन
कुछ न सोचूं न ही कुछ समझूँ।
बन यायावर …
देखूँ सब कुछ चहुँ दिशाओं मे
कुछ न माँगू न ही कुछ जानूं।
मन करता है…
कि बन फक्कड आवारा घूमू
कुछ न खाऊँ न ही कुछ पीयूं।
मन करता है…
बस………. मन करता है
by Pragya
April 17, 2020 in मुक्तक
जिसे हम भूल जाते हैं
खुदा भी रूठ जाता है
चैन उसको नहीं मिलता
लोग भी मुँह चिढ़ाते हैं
by Pragya
April 17, 2020 in मुक्तक
मेरा प्रेम तुम्हारी स्मृतियों से अतृप्त है
अभी कुछ और समेटना है मुझे सफ़र के लिए
by Pragya
April 17, 2020 in शेर-ओ-शायरी
ए काश !मेरा प्यार भी कोरोना जैसा होता
हम उन्हें छू लेते और उन्हें भी हो जाता
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by Pragya
April 17, 2020 in शेर-ओ-शायरी
दूर जाने का उन्हें एक और बहाना मिल गया है
कोरोना वायरस अब मेरी मोहब्बत पर भारी हो चला है
by Pragya
April 17, 2020 in शेर-ओ-शायरी
ना तुम कुछ कहो ना हम कुछ सुनें
बस खामोशियों को खमोशियों से बात करने दो
by Pragya
April 16, 2020 in मुक्तक
ये सन्नाटा चुभता है मेरे दिल को
तुम्हारा बोलते रहना ही अच्छा लगता है
by Pragya
April 16, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
वो भी दिन थे
_________ क्या पल छिन थे
जब तुम मेरे हुआ
_____________करते थे
गीत गुनगुनाते थे
प्रेम के लफ्ज़ हुआ करते थे
——‐————-
रिमझिम बारिश की
फुहार में भीगते थे बदन
———————
होंठो पर सुर्ख गुलाब
हुआ करते थे
——————–
अनगिन वक्त रहता था
तुम्हारे पास
———————
तुम मेरे पास वक्त-बेवक्त
हुआ करते थे
———————-
कमाल हैं तुम्हारे बहाने भी
कभी वक्त नहीं होता था
————————-
तो कभी एकाकीपन
में जिया करते थे ।
by Pragya
April 16, 2020 in ग़ज़ल
कभी मायूस होती हूँ कभी बेचैन होती हूँ
मगर तेरी मोहब्बत में डूबी दिन-रैन होती हूँ,
कभी बातें कभी यादें कभी तन्हाई में तुझको
भुलाकर सब ओ मेरी जान सिर्फ तुझमें ही खोती हूँ ।
——————————————————-
मेरे दिल का नजराना मुबारक हो तुम्हें साहिब
मेरे किस्से मेरे सपने मुबारक हो तुम्हें साहिब
जो ना दे सके तुमको चाहकर भी मेरे हमदम,
वो खुशियां और वो मंजिल मुबारक हो तुम्हें साहिब।
——————————————————
इश्क फरमाते हो तुम भी इश्क फरमाते हैं हम भी
जरा पास आते हो तुम भी जरा पास आते हैं हम भी
बहुत मजबूर हैं हम यार दुनिया के उसूलों से,
अतः खामोश हो तुम भी अतः खामोश हैं हम भी ।
मोहब्बत ही मोहब्बत है तेरे जानिब मेरे जानिब
शरारत ही शरारत है तेरे जानिब मेरे जानिब
नजर आती हैं जब तेरी नजरें मेरी नजरों को,
आग ही आग लगती है तेरे जानिब मेरे जानिब।
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by Pragya
April 15, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
आज पिघली-पिघली है
देखो
पथ्थर की दीवार
बन्धु,सखा,माँ-बाप
सभी छूट रहे हैं
विडम्बना देखो समय की
कुछ बिछड़ रहे तो
कुछ रिश्ते जुड़ रहे हैं
जिस आँगन में खेली- कूदी
वही छोड़ कर जाती है
बेटी ही है जो सारे
कुल की लाज़ बचाती है
बेटों को फिर भी सब अपने
कुल का दीपक कहते हैं
जबकि वंश को सबके
एक बहू ही आगे
बढ़ाती है
सारे घर की दीवारें
रोती हैं बिलखती हैं
जिसने दहलीज़
कभी ना लांघी
आज घर को छोड़े जाती है
बेटी है प्राणों से प्यारी
सब परिजन बिलख-बिलख
कर रोते हैं
माँ-बाप का हाल ना पूँछो
कैसे खुद को समझाते हैं
भाई विदा कर अपनी
लाडली को
सुबक-सुबक कर रोते हैं
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by Pragya
April 14, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
आज कुछ बदला- बदला मिज़ाज है
दिल भी बेताब है
——————–
सिसकियाँ भी खामोश हैं
लफ्जों में मिठास है
———————-
गूंजती जा रही है
गलियों में शहनाई
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बींद के इन्तज़ार में
बीती जा रही है स्वर्ण रात्रि
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गेसुओं की घनी छाँव के तले बैठी
मेरी ख्वाइशों भरी एक शाम है
———————–
उनकी आहटों पर फिर फिसला
मेरी तमन्नाओं का हार है
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खिसक रहे थे जो सपनें
आज हाँथ में आया वही लम्हात है
————————-
प्रेम-पिपासु हूँ जी भर के
पिला दे साकी
————————–
टपक रही जो तेरे
लब से बादा(शराब)है ।
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by Pragya
April 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी
तुम लाख बिठा लो पहरे तुम्हारे दर पर आऊंगी जरूर !!
ना उतरा है ना उतरेगा कभी तेरी आँखों का सुरूर !!
by Pragya
April 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
जब शोर मचा होता है दिल में
खामोशी अच्छी लगती है
—————
रात होती है ख्वाबों में तो
मायूसी अच्छी लगती है
—————
गूंजती है जब बेचैनी तो
खामोशी अच्छी लगती है
—————-
by Pragya
April 12, 2020 in शेर-ओ-शायरी
किसी को मिलती है जन्नत की रौनक
किसी के आशियाने में अँधेरा पसरा हुआ है
खुदा से पूंछ्ना है मुझे
by Pragya
by Pragya
April 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
दर्द के रिश्ते यूँ ही
नहीं निभाये जाते
मुस्कुराना पड़ता है
———
गहरे जख्म खाने के बाद
दिल में लिपटे रहते हैं गम
झूँठी हँसी दिखानी पड़ती है
——————
चलना पड़ता है राह पर
ठोकर खाने के बाद
——————-
चिठ्ठियाँ लिखनी पड़ती हैं
दिल के कागज़ पर
जलाई जाती हैं दिल दुखाने के बाद
—————————
रात भर रोती है ‘प्रज्ञा’
जिसे याद करके
भूलना पड़ता है सुबह
होने के बाद
————‐——
by Pragya
April 11, 2020 in शेर-ओ-शायरी
ये दर्द के रिश्ते यूँ ही नहीं निभाये जाते
मुस्कुराना पड़ता है गहरे जख्म खाने के बाद
Comments Off on गहरे जख्म
by Pragya
April 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
एहसास की पावन चौकी पर
भाव की मूरत बैठी है
———————-
शब्द अलंकार से सुसज्जित हैं और
कल्पना की आराधना होती है
————————
इसी को कहते हैं काव्य सौन्दर्य
जो हर कवि की आत्मा कहलाती है
————————–
इसके बिना हर रचना अपूर्ण ही है
और हर कविता विकलांग सी है
—————————-
अलंकार बिना कविता अपूर्ण
जैसे होती है नारी
—————————–
भाव की बेल पर खिलती है
प्रेम की सुगंधित कली
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by Pragya
April 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
आँचल में अपने छुपाकर वो,
दुनियाँ की बुराइयों से बचाती है
सारे जहान की खुशियाँ
अपने दामन में लिपटाकर
हमपर लुटाती है
वही आँचल लाज़ बचाता है,
और उसी से पसीना सुखाती है
स्त्री की आबरू का सुन्दर
श्रिगार बनता है आँचल,
जब स्त्री माथे की बेंदी छुपाती है
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by Pragya
April 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी
ये कैसा वक्त है
शताब्दियों सा लगता है हर पल मुझको
घड़ी की सुइयां स्थिर ही रहती हैं
ना जाने क्यूँ
by Pragya
April 8, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
स्त्री ऐसी वाणी है हर भाग में पायी जाती है
ये तो ऐसा गीत है जो हर राग में गाई जाती है
पिता और भाई के संरक्षण में रहती है
संरक्षण में वह रहती है,शासन में सब सहती है
विवाहोपरान्त नारी ससुराल में आ जाती है
अपने कर्मों से दोनो कुल की लाज बचाती है
नारी का यौवन अंग-अंग बदले हैं पल-पल रंग-ढंग
कभी ज्वाला सी कभी भाला सी कभी नीर पाई जाती है
यह तो ऐसा गीत है जो हक से अपनाई जाती है
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by Pragya
April 7, 2020 in शेर-ओ-शायरी
तमाम जिंदगी बिता दी मैंने
तुम्हें मनाने में
और कितना वक्त लगेगा तुमको लौट आने में
by Pragya
April 7, 2020 in शेर-ओ-शायरी
तुमको इतनी भी फुर्सत नहीं
जो मेरा हाल भी नहीं पूंछ सकते
दर्द दे सकते हो लेकिन
मरहम नहीं लगा सकते
by Pragya
April 7, 2020 in शेर-ओ-शायरी
संकल्प ले समाज में शिक्षा का संदेश फैलाएंगे
बेटा हो या बेटी सब को एक साथ पढ़ाएंगे
by Pragya
April 6, 2020 in मुक्तक
करुँ कितना भी श्रिंगार पर जानती हूँ
तेरे आगे कुछ भी नहीं हूँ मैं
दीद जिस दिन नहीं होती तेरी
चांद छत पर नहीं आता
आईना जितनी दफ़ा देखूँ
तेरा ही चेहरा नज़र आता
by Pragya
April 6, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
गुलशन फिज़ाओ में यूं ही नहीं महकते हैं
इश्क की बूंदाबांदी से खिल उठते हैं
एहसास की रोशनी से महक उठते हैं
गीत यूंही नहीं बना करते
दिल के जख्मों को हरा करते हैं
by Pragya
by Pragya
by Pragya
by Pragya
April 6, 2020 in शेर-ओ-शायरी
आसमान धुंधला नज़र आता है
आईना तो वही है लेकिन
चेहरा गमगीन नज़र आता है आसमान
मिटती बनती रहती हैं रेखायें फिर भी
नसीब बदलता ना नज़र आता है
by Pragya
by Pragya
April 5, 2020 in शेर-ओ-शायरी
बस तो जाता गम हमारे आशियाने में
बड़ा अफसोस है लेकिन फिर निकलता नहीं
by Pragya
April 5, 2020 in शेर-ओ-शायरी
तुम तो रस्ता ही भूल गए
तुम्हारे इन्तज़ार में कोई कब तक जागे
by Pragya
April 5, 2020 in मुक्तक
उम्मीदों का दीया जलाकर
इस आशा में बैठे हैं
कल सूरज खुशियाँ लाएगा
चाँद सजाकर बैठे हैं
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