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Saavan

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Pragya

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Pragya

@pragya_a • Joined Dec 2019 • Active 5 months ago

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Pragya

by Pragya

मैं हर बात समझती हूं

May 30, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मैं हर बात समझती हूं
दिमाग की थोड़ी कच्ची हूं
नादानियां कूट-कूट कर भरी है मुझमें
फिर भी दिल की अच्छी हूँ
मैं हर बात समझती हूं

कल्पनाओं में विचरण करती हूं
खट्टे मीठे सपनों में खोई रहती हूं
फिर भी मैं हर बात समझती हूं।

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Pragya

by Pragya

इश्क के दो पन्ने

May 30, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी
तुम्हारी याद में रात भर मैं भी जागूंगी।
——————————
प्रीत की चादर ओढ़ कर
अंबर के तले,
तेरे सपने मैं भी बुनूँगी
इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी।
—————————-
कल्पना के दरिया में तैर कर
रेत का चंदन बदन पर,
मैं भी मलूंगी
इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी।
——————————–
तुम से हार जाऊंगी
उसी को जीत मानूंगी,
तुम्हारी जीत में ही
मैं खुद को विजयी बनाऊंगी
इस तरह इश्क के दो पन्ने मैं भी लिखूंगी।

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Pragya

by Pragya

हमरी सुधि

May 29, 2020 in अवधी

अपने-अपने मां सब परे
हमरी सुधि नाइ कोई लेइ।
ओ बांसुरी बजावई वाले
तनिक हमरीउ सुधि लेउ।।

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Pragya

by Pragya

क्या कहूँ!! ओ ज़ालिम

May 29, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

क्या कहूँ!!
दिल में कितनी उदासी छाई है,
तेरी बेरुखी मेरी जान पर बन आयी है।
————————————
मैं एक गुमशुदा सी शाम हूँ और,
तू मेरी रुसवाई है।
——-‐———–‐—————-
इन तूफानों के आगे,
दिल में मीलों की खाईं है।
————————————
समझ नहीं पाती हूँ मैं कभी-कभी,
ये तेरी मोहब्बत है या बेवफाई है।
————————————-
मेरे अश्कों से तेरा दिल नहीं पिघलता,
ओ ज़ालिम! तू कितना हरजाई है।
————————————–

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by Pragya

”मेरा भोला प्रियतम”

May 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

”मेरा भोला प्रियतम”

जिनकी नज़रों से ललित कलाएं निकलती हैं,
अधरों पर राग अंगड़ाइयां लेते हैं।
केशों से बसंत दुग्ध पान करती है,
और रात अठखेलियां करती है जिनसे।
जिनकी एक चितवन मात्र से,
बिजलियां चमकने लगती हैं ।
अनगिनत दीप जल उठते हैं,
जिनके लावण्य की माधुरी से ।
विस्मय हो उठती हैं किरणें,
जिनकी अगाध छटा से।
प्रकृति मांगती है सौंदर्य जिनसे
ऐसा है ‘मेरा भोला प्रियतम’ ।

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Pragya

by Pragya

दादी माँ

May 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज दादी की बहुत याद आई!
वो बेचैन आत्मा ना जाने कहाँ
घूमती होगी….
ब्रह्मांड के किन कोनों से
गुजरती होगी…
कोई नहीं जानता…
जब मैं भूखी होती थी
तो दादी मां अपने हाथों से
खाना बनाती थी…
और पूरे परिवार को
हंसी-खुशी खिलाती थी…
वह दादी मां
आज बहुत याद आ रही है…
न जाने कहां ब्रह्मांड के किन
कोनों से टकराकर…
गुजरती होगी उसकी आत्मा
न जाने कहां होगी मेरी दादी मां..
शायद मुझे देख रही होगी..
और मुझे सुन रही होगी..

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Pragya

by Pragya

हमहे देखी

May 26, 2020 in अवधी

वईसी डेरु बईठा
अइसी शरम हमका घेरे हई
ना वई द्याखइ ना हमहे देखी

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Pragya

by Pragya

किसने कितना फ़र्ज निभाया ??

May 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किसने कितना फ़र्ज निभाया,
किसने कितने पत्थर फेंके…

हमने इस कठिनाई के दौर में,
लोगों के असली चेहरे देखे…

डॉक्टर,पुलिस और सफ़ाईकर्मियों में
जीवन्त मानवता के लक्षण देखे…

इस बुरे वक्त के अविस्मरणीय पलों में
हमने सुर-असुरों में भेद है देखे….!!

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Pragya

by Pragya

सुनो गाँव ! अब परदेश ना जाना

May 23, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आयी विपदा न कोई सहाय हुआ
छूटा रोजगार बहुत बुरा हाल हुआ
तुम्हारा कष्ट भी किसी ने न जाना
पसीने से सींचा जिन शहरों को…
किसी ने तनिक एहसान न माना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।।

छोड़ आये थे तुम जिसे एक दिन
आयी फिर उस गाँव-घर की याद
पश्चाताप की इस कठिन घड़ी में
न ही तेरा कोई हुआ सहाय…
गाँव का सफ़र पैदल पड़ा नापना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।।

तुम गाँव मे रहकर मेहनत खूब कर लेना
परिवार का भरण पोषण भी कर लेना
मन हो भ्रमित तो याद फिर…
खूब उन विपदा के पलों को कर लेना
सुनो लला!अब परदेश न जाना।
सुनो गाँव!अब परदेश न जाना।।

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चितेरा

May 23, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

ज़िन्दगी की राहों का
है ये कौन चितेरा,
धूमिल -धूमिल गलियारों में
है करता कौन सवेरा।

घनघोर घटा से केशों
पर डोले मुग्ध पपीहा,
किसने उपवन रंगीन किया
है ये  कौन चितेरा।

अलि मंडराते पुष्पों पर
है किसने रंग बिखेरा,
रति के यौवन से भी सुंदर
लगता है आज सवेरा।

विरह की वेदना से जलता है
‘प्रज्ञा’ का जीवन डेरा,
अब हर रात अमावस की
मुट्ठी में बंद सवेरा।।
कवयित्री:-
प्रज्ञा शुक्ला

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द्रोपदी

May 21, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिसका जन्म हुआ यज्ञ
की प्रज्वलित अग्नि से
जो द्रुपद की पुत्री कहलाई
फूलों की नर्म सेज पर सोई
एक दिन हुई पराई
जिसके स्वयंवर में स्वयं
कृष्ण जी आये
वनवासी अर्जुन ही
मछली की आँख भेद पाये
अति सुन्दर द्रोपदी को लेकर
कुन्ती के पास ले आये
कुन्ती की आज्ञा से द्रोपदी
पाँच भाईयों की भार्या हो गई
और जगत में पान्चाली
कहलाई
जुये में पत्नी को हारे
धर्मराज युधिष्ठिर
सबके बीच में वह
अपमानित हुई बेचारी
कृष्ण जी ने एक-एक धागे
का मूल्य चुकाया
पाण्डु कुलवधू की
भरी सभा में लाज़ बचाई
अपमान का घूँट पीकर
द्रोपदी ने प्रतिज्ञा ली
नित खुले रहेगे केश
जब तक प्रतिशोध ना लूंगी
दु:शासन की छाती के
लहू से अपने
कलंकित केश धुलूँगी
नारी जाति की साहसी वीरांगना
थी द्रोपदी
जिसे महाभारत का उत्तरदाई
आज भी है ठहराया जाता
परंतु वह नारी तो
अति सम्माननीय थी
जो सदा घृणा से देखी जाती रही है ।

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सावित्री वट पूजा

May 21, 2020 in अवधी

हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई ।
सावित्री पूजा,कईसे पूजई जाई?
बरगद की डाढ़ मगाई या फिरी,
बरगद के नीचे जाई।
हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई ।
चारि बजे ते पुलिस लागि हई ,
पूजा कईसे करि पाई।
हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई ।
साज-श्रिगार सबई करि बईठेन ,
फेरा कईसे लगाई।
हे सखी! कौनी विधि पूजई जाई ।

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इबादत

May 21, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तेरी यादों में डूबी रहती हूँ ,
तेरे इश्क को ही मैं इबादत कहती हूँ ।

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थोड़ी मोहलत

May 20, 2020 in शेर-ओ-शायरी

खुदा! अगर थोड़ी मोहलत
और दे मुझे तो
मेरी तकदीर में
कितनी मोहब्बत लिखी है
देखना चाहती हूँ मैं ।

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कलम में स्याही

May 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

नि:शब्द हूँ निस्तेज मैं
मस्तिष्क के आवेश में
शब्द भारी पड़ रहे
कलम की स्याही से
नित यह कह रहे
ना उल्लिखित कर पाऊँगा
मैं तेरे भाव को
ना प्रकट मैं कर पाऊँगा
तो मैं क्यूँ लिखूं
मैं क्यूँ रखूँ अब
अपने कलम में स्याही??

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Pragya

by Pragya

जिनिगिया एगो खिलौनवा बा

May 20, 2020 in भोजपुरी कविता

जिनिगिया एगो खिलौनवा बा,
जेकरा से सबै खेलत बिया।
कौनो तड़पत बिया,
कौनो रूतल बिया।
जिनिगिया एगो खिलौनवा बा,
जेकरा से सबै खेलत बिया।
अंखियन के सपनवा ,
टूटल बिया।
जिनिगिया एगो खिलौनवा बा,
जेकरा से सबै खेलत बिया।

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by Pragya

हमका देखि बोलीं भऊजी !!

May 19, 2020 in अवधी

सीतापुरिया अवधी बोली:-

हमका देखि बोलीं भऊजी
काहे नाई सोउती हऊ तुम ?
राति-राति भरि किटिपिटि-
किटिपिटि फोन म का
लिखती हउ तुम?
हम बोलेन ओ भाउजी !
थोरी-बारी कविता लिखा
करिति हन हम,
घर बाईठे ऑनलाइन
कपड़ा द्यखा करिति हन हम।
वइ बोलीं हमकउ
सिखाई देऊ हमहूं
कपड़ा देखिबि,
जऊनी साड़ी नीकी लगिहँई
तुमरे दद्दा तेने कहिके मंगाई लीबि।
हम कहेन ठीक भऊजी
अब हमका जाइ देउ,
कुछु टूटी-फाटी
कवितन का हमका लिखइ देउ ।

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by Pragya

वहि घरका ना जाउ कबहुँ

May 19, 2020 in अवधी

वहि घरका ना जाउ कबहुं
जहां ना होइ सम्मान
नीके जहां कोइ नाइ मिलइ
हुंआँ जाइते हइ अपमान
रूखी-सुखी खाइ लेउ
बढ़िया व्यंजन छोड़ि
प्रेम की छूड़ी रोटी
छप्पनभोग सि बढ़िया होइ
आधी राति का आवेते
घरवाली होति हइ दिक्क
तउ जल्दी घर जावै लगउ
नइ रातिक होई खिटि-पिट्टी ।

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अम्मा भई बाँवली..

May 18, 2020 in अवधी

सीतापुरिया अवधि:-
राति क द्याखँइ चांद-सितारा
दिनमाँ चांद निहारइ
दिन भरि छोटुआ-छोटुआ
कहिके अम्मा लाल पुकारइ
अम्मा भई बाँवली।
टूटी खटिया फटी चटाई
जब अम्मा पहुड़इ
चरमर-चरमर होइगइ पाई।
अम्मा भाई बाँवली…
घुटनन माँ तनिकऊ
बूत नाइ
तबहूँ लाठी लइकई
दिनु भरि
आइसी–वइसी दऊरईं ।
अम्मा भई बाँवरी…
बहुरिया लईके आवइ खाना
बुदु बुदु बुदु बुदु
अम्मा ब्वालई।
अम्मा भई बाँवली…

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by Pragya

अम्मा भई बाँवली..

May 18, 2020 in अवधी

सीतापुरिया अवधि:-
राति क द्याखँइ चांद-सितारा
दिनमाँ चांद निहारइ
दिन भरि छोटुआ-छोटुआ
कहिके अम्मा लाल पुकारइ
अम्मा भई बाँवली।
टूटी खटिया फटी चटाई
जब अम्मा पहुड़इ
चरमर-चरमर होइगइ पाई।
अम्मा भाई बाँवली…
घुटनन माँ तनिकऊ
बूत नाइ
तबहूँ लाठी लाइकई
दिनु भरि
आइसी–वइसी दऊरईं ।
अम्मा भई बाँवरी…
बहुरिया लईके आवइ
बुदु बुदु बुदु बुदु
अम्मा ब्वालई।
अम्मा भई बाँवली…

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घरवाली को बना खिलाओ

May 17, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

घर में ही बैठो और रहो मौन
ना करो किसी से झगड़ा
ना कोई कुतर्क
नहीं पड़ो किसी
प्रपंच में
यदि रहना है सुखी तो
बढ़ाओ अपनी
सहनशक्ति को
और बटाओ हाँथ
घर के काम में
कभी रसोईघर में भी हो आओ
कुछ कच्चा-पक्का
घरवाली को बना खिलाओ
मुफ्त में आर्डर मत मारो
जो भी मिल जाये
वो प्रेम सहित खालो
यदि नहीं करोगे ऐसा तो
तो महाभारत होनी है पक्की
लॉकडाउन को सुखी बनाने की
मेरी राय बहुत है अच्छी।

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Pragya

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दर्दनाक मन्ज़र

May 17, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किसी का दम
निकलता है घर में
तो कोई सड़कों पर
मारा-मारा फिरता है
भूंख लगती है तो
सिर्फ प्यास बुझा लेता है
इतनी धूप में सब
घर में बैठे हैं
तो कोई सड़कों पर
पसीना बहाता फिरता है
कितना दर्दनाक है वो मन्ज़र
जब कोई मीलों का सफ़र
पैदल ही करता है

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by Pragya

कॉलेज का पहला दिन(भाग-2)

May 16, 2020 in लघुकथा

…नंबर अच्छे आये।) अब आगे…
एक दिन मैने उससे पूँछा कोई ज़िंदगी में है तुम्हारी?
उसने कहा नहीं । मुझे पता था की वो किससे प्यार करता है ।वो मेरा बहुत अच्छा दोस्त बन गया । हम दोनों सब कुछ शेयर कर लेते थे । एक दिन उसकी गर्लफ्रेंड ने कहा-मुझसे बात ना किया करे ।मैने भी कहा जब उसे बुरा लगता है है तो मुझसे बात ना किया करो। पर उसने कहा मैं सबको छोड़ सकता हूँ पर तुमको नहीं ।मैने पूछा ऐसा क्या है?उसने कहा-तुम बाकी लडकियों जैसी नहीं हो।तुम्हारा स्वभाव बहुत अच्छा है और चरित्र भी।तुम्हारी पूजा करने का मन करता है ।तुम मेरी बेस्ट फ्रेंड हो और हमेशा रहोगी। एक दिन किसी की बुरी नज़र हमारी दोस्ती को लग गई । हमारी दोस्ती को कलंकित किया गया ।और कुछ छोटी सोंच वालों ने उंगली भी उठाई । मैने उन लोगों को बहुत समझाया । और पवित्रता भी साबित की ।मगर कोई फायदा नहीं हुआ । मैने ये सब अपने दोस्त को बताया ।उसने कहा-ये सब चलता है तुम चिंतित ना हो,लोगों ने तो सीता को भी नहीं छोड़ा था फिर तुम क्या हो? ऐसे लोगों से मतलब ही ना रखो जो तुम्हें समझते नहीं।मैने कहा-मैं उन लोगों को नहीं छोड़ सकती वो लोग मेरे जीने का जरिया हैं ।और उनके कहने पर मैं आज अपनी पवित्र दोस्ती को खत्म कर रही हूँ, हो सके तो मुझे माफ कर देना।शायद तुम भी यही करते अगर तुम्हें मुझमें और अपने प्यार में से किसी एक को चुनना होता । वो सन्न रह गया उसने कहा-जो तुम्हें उचित लगे,पर तुम्हारे जैसी दोस्त मिलेगी नहीं ।हमनें रजामन्दी से एक-दूसरे को अलविदा कहा । ना जाने क्यूँ हम दोनों की आखें नम थीं।फिर हमारी मुलाकात और बात नहीं हुई।

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by Pragya

कॉलेज का पहला दिन !!(भाग1)

May 15, 2020 in लघुकथा

कॉलेज का पहला दिन था थोड़ी देर से गई
क्लास में जाकर बैठी,शिक्षाशास्त्र पढ़ाई जा रही थी ।
सब मुझे देख के अचंभित थे।बहुत सवाल थे सबके मन में..टीचर के जाते ही सबने मुझे आ घेरा।बारी- बारी से सवाल पूंछने लगे। मुझे लाज़ आ रही थी,इतने लोगों के बीच। मैने किसी से दोस्ती नहीं की,सब मुझे बहुत पसंद कर रहे थे। एक लड़का देखते ही जा रहे था कुछ बोल नहीं रहा था ।मेरी निगाहें कई बार उस पर गई।वो पढ़ने में बहुत अच्छा था,हर सवाल का जवाब दे रहा था ।मेरे ह्रदय से आवाज आई:-काश ये परीक्षा में मेरे पास बैठता..मै घर आ गयी ।परीक्षा थी मैं अपना रोल नंबर ढूंढ़ कर बैठी ..डर लग रहा था । सामने से आवाज आई-तुम किस कॉलेज से हो?मैने जवाब दिया,फिर उस लड़के ने पलट के देखा ।
अरे ये क्या! ये तो वही लड़का था । शायद मेरी दुआ मंज़ूर हो गई थी । उसने मुझसे कहा:-जो आता हो दिखा देना।हम्म्म्म मैने कहा।हम दोनों ने एक-दूसरे की सहायता की ।
अच्छे ंनंबर आये।(अगला भाग फिर कभी)

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by Pragya

कर्म करे मानव…!!

May 15, 2020 in हाइकु

प्रस्तुत है
हाइकु विधा में रचना :-

जिसका जो हो
कर्म करे मानव
ना करे चोरी

जीत ले बाजी
हर दांव की वह
ना थके कभी

संघर्ष करे
नित जीवन में वो
ना रुके कभी

कर्म की बेदी
और मानव प्रण
ले आगे बढ़…!!

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मज़दूर हूँ

May 15, 2020 in हाइकु

प्रस्तुत है
हाइकु विधा में कविता:-

मजदूर हूँ
पैदल चल पड़ा
घर की ओर

विपदा आयी
सबने छोड़ दिया
मौत की ओर

आशावादी हूँ
खुद ही जीत लूँगा
यह युद्ध भी

तुम कौन हो?
समाज या शासन
बोलो खुद ही

बन निष्ठुर
हमे ढ़केल दिया
काल की ओर…!!

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जाति- पाति के ताने-बाने

May 14, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

यूँ कहना तो बड़ा आसान है
भूल जाना सारे बन्धनों को
जाति -पाति को छोड़ देना
परंतु सच्चाई यह है
की जाति- पाति के
ताने-बाने हमने ही बनाये हैं और
उनको हम ही
पोषित करते हैं
बची- खुची कोशिश
राजनैतिक दल कर रहे हैं
हमें अलग करने की
आरक्षण का भी अपना
अलग महत्व है
हमें अलग करने में ।

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एक बात कहूँ गर सुनते हो….

May 14, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक बाद कहूँ गर सुनते हो
तुम मुझे अच्छे अच्छे लगते हो
जब होते हो नाराज़ कभी तो
प्यारे प्यारे लगते हो
एक बात कहूँ गर सुनते हो
तुम मुझे भोले -भाले लगते हो

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Pragya

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देख लेना

May 14, 2020 in शेर-ओ-शायरी

एक वक्त ऐसा भी लाऊँगी मैं
जो हमें देख के अनदेखा कर देते हैं
वो हमें देखने को तरसेंगे

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जीवन के माइने

May 14, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कहीं खो से गए हैं सपने
और जाग पड़ी हैं नींदे
लॉक डाउन में जैसे सहम गये हैं
जीवन के माइने
कहीं रिश्तों की डोरी ने
मजबूत हो रही है तो कहीं
टूटने लगी है
जीवन के बन्धन में
सिमट के रह गया है
रिश्तों का कारवां
चारों ओर धुंध सी छाई हुई है
अनगिनत लोगों से
अलगाव सा हो गया है
प्रेम की जो पट्टी आंखों पर बंधी हुई थी
वह पास रहने से खुलती जा रही है
हमदर्दी की झूठी तस्वीर
जो नजर आती थी
वह वास्तविकता के पैमाने
पर उतर रही है
और कई चेहरे सामने आ रहे हैं
जो प्रेम का झूठा
खेल खेला जा रहा था
आज मयस्सर हो गया है
सारी गलत फ़हमिया
अब दूर हो गई हैं
कौन अपना है कौन पराया
सब साफ़ नज़र आ रहा है

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धृतराष्ट्र:- महाभारत के उत्तरदाई

May 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षाओं ने
ही बीज बोया महाभारत का
धृतराष्ट्र आंखों से अंधे थे
उन्होंने दुर्योधन के
व्यक्तित्व को अंधा बना दिया
इतिहास धृतराष्ट्र को ही
महाभारत का जिम्मेदार ठहराता है
गलत नहीं है
क्योंकि धृतराष्ट्र के पुत्र मोह ने ही
दुर्योधन के ह्रदय में वैमनस्य के
बीज बोए और उनको
फलने-फूलने का अवसर दिया
दुर्योधन मामा शकुनि की हाथों का पासा था
और कर्ण की मित्रता का गुरुर
जो उसे युद्ध भूमि की ओर
अग्रसर करता चला गया
सौ पुत्रों की मां कहलाने वाली गांधारी

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Pragya

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जीने का हक

May 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

माँ से बोली एक बेबस बेटी:-

अविस्मरणीय है कोख तेरी माँ
जिसमें स्फुटित हुई हूँ मैं ।

तुझे किसने बता दिया है माँ
बेटा नहीं बेटी हूँ मैं ।

तभी से तू बेसुध है तेरे चेहरे की मुस्कान उड़ी
चिन्ता ने तुझको आ घेरा मेरे जीवन पर आन पड़ी।

तू भी तो एक बेटी है माँ फिर क्यों इतना पश्चाताप करे दुनिया वालों की खातिर तू ‘भ्रूण हत्या’ का पाप करें।

गर्भ में ना मार मुझे हाँथ जोड़
बोली बेटी ये——

अभी-अभी तो साँस मिली है
माँ उसको तुम मत छीनों।

ममता की छाँव नहीं दे सकती हो पर
‘जीने का हक’ तो मत छीनों ।

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Pragya

by Pragya

कर्ण के कवच-कुण्डल

May 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

गुजारिश कर
——————-
और माँग ले
कर्ण के कवच-कुण्डल
जीवन का यही
सत्य है
अपनी मृत्यु को
टाल दे
औरों की मृत्यु का
कारण बन
जगमगा जीवन के प्रकाश में
किसी के जीवन में
तिमिर लाकर
अधिकार जता और
वरदान में माँग ले
कर्ण के कवच-कुण्डल
जीवन की यही
रीत है
आज से नहीं
आदिकाल से ….

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♥️♥️वो माँ होती है ♥️♥️

May 10, 2020 in काव्य प्रतियोगिता

♥️♥️mother’s day special♥️♥️

जो नज़रो से परख ले
वो माँ होती है ।
दर्द को दिल में जो रख ले
वो माँ होती है ।

कर कोई काम तू बुरा
खुदा से चाहे हो छुपा
जो तेरा चेहरा भांप ले
वो माँ होती है ।

जो तुझको जन्म दे
तेरे मुख को चूम ले
हो तू कष्ट में तो रोती है
वो माँ होती है ।

जो कष्ट तेरे छीन ले
चुभते काँटे बीन ले
तुझपे प्यार वार दे
वो मां होती है ।

जब कभी तू उदास हो
भले कोई ना पास हो
जो सदैव साथ दे
वो मां होती ।

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सावन

May 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब से सावन मेरी जिंदगी में
बहार बनके आया
तब से हम कविताओं को
अपनी डायरी में जगह नहीं देते।
शब्द लपेट लेते हैं अपने दामन में
उसको दिल में जगह नहीं देते
घाव कितने भी लगें दिल में
उन्हें हम इतनी अहमियत नहीं देते

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Pragya

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सावन

May 10, 2020 in मुक्तक

जब से सावन मेरी जिंदगी में
बहार बनके आया
तब से हम कविताओं को
अपने डायरी में जगह नहीं देते।

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Pragya

by Pragya

भारत माता के सैनिक

May 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आसमान के तारे भी
सूक्ष्म मलिन से लगते हैं
जब भारत के सैनिक
वर्दी पहन ओढ़ कर चलते हैं
जान ठोकर खाती है कदमों में
और होंठों पर मुस्कान लिए चलते
ऐसा जिगरा तो केवल
भारत मां के सपूत ही रखते हैं
होठों से जय हिंद का गान करें
और छाती पर गोली खाते हैं
ऐसे सपूत हैं भारत के
जो दुश्मन को धूल चटाते हैं
मिट्टी में मिलने से पहले
दहशतगर्दों को मार गिरा
अपनी जान निछावर कर
तिरंगे की आन बचाते हैं
हैं वंदनीय वह माताएं जो
अपने बेटों को
देशभक्ति का पाठ सिखलाती हैं
भारत माता के सैनिक को
अपनी छाती का दूध पिलाती हैं
धन्य वह सपूत
और पूजनीय है वह माता
अपनी ममता से बढ़कर
जिसने मातृभूमि को आंका
है शत-शत नमन
‘प्रज्ञा’ वंदन करती है वीर सपूतों को
आदरणीय है वह कोख जो जन्म देती है ऐसे पूतों को।

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मधुशाला

May 8, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मधुशाला खोल के भारत ने
हरिवंश राय बच्चन की रचना को
चरितार्थ किया
मंदिर-मस्जिद बैर कराते
मेल कराती मधुशाला
फैली है चारों ओर
महामारी फिर भी
खुली हुई है मधुशाला
पूरा भारत है लाक डाउन
पर खुली हुई है मधुशाला
बढ़ता जा रहा है कोरोना संक्रमण
फिर भी खुली हुई है मधुशाला
लम्बी है कतार जहाँ पर
खुली हुई है मधुशाला
सोशल डिसटेंसिग का
उल्लंघन है
जहाँ खुली है मधुशाला

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अल्फ़ाज़ हैं कुछ…

May 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

आजकल अल्फ़ाज़ हैं कुछ बिखरे- बिखरे
कितने भी समेंटूं गज़ल नहीं बनती।

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पैरों तले होंगे आसमां कितने?

May 7, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज उनकी गली में उजाले होंगे
जमीं पर पर बिखरे
अनगिनत सितारे होंगे
पैरों तले होंगे आसमां कितने?
नजरों में जन्नत के नजारे होंगे
कितनी मसरूफ है जिंदगी अपनी
उनके जहां में सुकून के
आलम ढेर सारे होंगे
हमसे गमों का बोझा ढोया नहीं जाता
वह खुशियां कितनी शिद्दत से
धागे में पिरोते होंगे।

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गंगापुत्र:-भीष्म पितामह

May 6, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

भीष्म पितामह श्रेष्ठ योद्धा
भारत का मान बढ़ाते हैं
अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ते
रण में लड़ने जाते हैं
हस्तिनापुर की सीमाएं सुरक्षित
करने का
प्रण ह्रदय में लेकर वह
प्रिय पाण्डवों के सामने उपस्थित हो
युद्घ को तत्पर हो जाते हैं
दिग्विजयी गंगापुत्र
ना अस्त्र उठायेंगे नारी पर
यह भीष्म प्रतिज्ञा लेते हैं
अपनी मृत्यु को स्वयं बताकर
प्रिय अर्जुन के तीरों से
छलनी हो जाते हैं
धन्य है भारत की धरती
जिसपर ऐसे शूरवीर ने
जन्म लिया
भीष्म पितामह की
निष्ठा से भारत माता का
मान बढ़ा
जय हो भीष्म पितामह की
जय हो
उस परशुराम के शिष्य की
जय हो।

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मुझे अच्छा नहीं लगता…

May 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मुझे अच्छा नहीं लगता यूँ
मलिन वस्त्रों में लिपटे रहना।
यूँ अपनी स्मृति खोकर
बेसुध पड़े रहना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
गीतमाला सजाकर
चंद्र को ताकते रहना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
अब बिन वजह
गगन में आंखें गड़ाकर
देखते रहना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
थक के चूर होकर
किसी वृक्ष के तले बैठना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
कीमती वस्त्र धारणकर
मलिन बस्तियों में जाना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
राजभोग खाकर
भूंखों के आगे डकारना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
रेशम की चादरों पर
अपनी रातें गुजारना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
कवि मन है प्रज्ञा!
फिर भी शब्दों से खेलना
मुझे अच्छा नहीं लगता।

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एक दोपहर ऐसी भी

May 2, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक दोपहर ऐसी भी:’
मैं कुछ उधड़-बुन में थी
अपनी आकांक्षाओं की
निर्मम हत्या करके
अपने दंश भरे पलंग पर लेटी…
कुछ आराम पाने की अभिलाषा
हृदय में लेकर…
तभी तुम्हारी स्मृतियों के चक्रव्यू ने
मुझे आ घेरा…
और मेरी वेदना के शूल
हृदय में चुभने लगे…
रक्त स्त्राव और हृदयाघात से
मैं व्यथित होकर विलाप करने लगी…
तभी मैंने अचानक देखा
बादलों में बना एक मेमना
विशाल अंबर का प्रतिबिंब लग रहा था…
हवा का झोंका उसे मेंमने को
विभिन्न आकार दे रहा था…
मेरी कल्पनाओं के क्षितिज
उसे दूर तक देखते रहे
और मेरे नैन थककर सो गए….

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जीवन में…

April 30, 2020 in शेर-ओ-शायरी

जीवन में एक वक्त ऐसा भी आता है जब
रिश्ते भी टूट जाते हैं और फ़रिश्ते भी काम नहीं आते

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कवन मैया गोर बाड़ी

April 29, 2020 in भोजपुरी कविता

भोजपुरी देवी:- कवन मैया गोर बाड़ी

गीत कवन मैया गोर बाड़ी
हमका पता ना
कवन मैया गोर बाड़ी।
निमिया के डाल पर झूला पर बा
हमार मैया झूललबाड़ी हमका पता बा।
सोने की थाली में भोजना बनावा
हमार मैया जेंवल बाड़ी
हमका पता बा।
सोने के गड़ुवा में जलुवा
भरल बा
हमार मैया पियल बाड़ी
हमका पता बा।
फूला नेवारों की सेजा
बिछ्ल बा
हमार मैया सूतल बाड़ी
हमका पता बा।
कवन मैया गोर बाड़ी हमका पता बा।।

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कोरोना योद्धा

April 29, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कोरोना योद्धा
सभी वंदनीय हैं।
पर ना जाने क्यों कुछ अराजकता तो
इन पर पत्थर फेंकते हैं,
जिन पर फूलों की वर्षा करनी चाहिए ।
हर पल तत्पर होकर इस महामारी में
अपनी देशभक्ति निभा रहे हैं।
पर ना जाने क्यों कुछ अराजक तत्व
उन्हें पत्थर मार रहे हैं।
निंदनीय है और
हम इसकी घोर निंदा करते हैं।
डॉक्टर हों या पुलिसकर्मी
या सफाई कर्मचारी
या हो कोई देशभक्त
इस कोरोना की महामारी में
अपनी व्यक्तिगत चिंता छोड़कर
अपना फर्ज निभा रहे हैं।
वो महारथी सम्माननीय हैं
और हमें
उनका सम्मान करना चाहिए
जो अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर
हमारी जिंदगी बचाने में लगे हुए हैं
अभिनंदन हो आपका करोना योद्धा

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कोरोना योद्धा

April 29, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

करोना योद्धा
सभी वंदनीय हैं।
पर ना जाने क्यों कुछ अराजकता तो
इन पर पत्थर फेंकते हैं,
जिन पर फूलों की वर्षा करनी चाहिए ।
हर पल तत्पर होकर इस महामारी में
अपनी देशभक्ति निभा रहे हैं।
पर ना जाने क्यों कुछ अराजक तत्व
उन्हें पत्थर मार रहे हैं।
निंदनीय है और
हम इसकी घोर निंदा करते हैं।
डॉक्टर हों या पुलिसकर्मी
या सफाई कर्मचारी
या हो कोई देशभक्त
इस कोरोना की महामारी में
अपनी व्यक्तिगत चिंता छोड़कर
अपना फर्ज निभा रहे हैं।
वो महारथी सम्माननीय हैं
और हमें
उनका सम्मान करना चाहिए
जो अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर
हमारी जिंदगी बचाने में लगे हुए हैं
अभिनंदन हो आपका करोना योद्धा

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औरत खिलौना नहीं

April 29, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

औरत खिलौना नहीं
उसमें भी जान होती है….
औरत होती है ममता की मूर्ति
प्यार की उपमा
हजारों फूलों की खुशबू
विद्यमान होती है उसमें….
औरत पैरों की जूती नहीं
सिर का ताज है…
तपती दोपहरी में
वह पुरवा का झोंका
ठंडी बयार है….
औरत खिलौना नहीं
उसमें भी जान होती है….
स्पष्टता कुछ कह नहीं पाती
क्योंकि सहनशीलता अपार होती है…
समय पड़ने पर
अग्नि ज्वाला से भी ज्यादा तपती है…
निर्दयी बनकर
प्रतिशोध भी लेती है क्योंकि
औरत सब सहन कर लेती है….
परंतु अपमान नहीं
औरत पूजनीय है हर रिश्ते में
हर रूप में आदरणीय है….
नौ महीने गर्भ धारण करके
औरत ही वंश बढ़ाती है
अपनी ममता की छांव में
शिशु को प्यार का पाठ सिखलाती है….
इसीलिए ‘प्रज्ञा शुक्ला’ कहती है:-
औरत निंदनीय नहीं
हर रूप में वंदनीय है…..
जय हो नारी शक्ति की जय।।
हो भारत माता की।।

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औरत खिलौना नहीं

April 29, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

औरत खिलौना नहीं
उसमें भी जान होती है
औरत होती है ममता की मूर्ति
प्यार की उपमा
हजारों फूलों की खुशबू
विद्यमान होती है उसमें
औरत पैरों की जूती नहीं
सिर का ताज है
तपती दोपहरी में
वह पुरवा का झोंका
ठंडी बयार है
औरत खिलौना नहीं
उसमें भी जान होती है
स्पष्टता कुछ कह नहीं पाती
क्योंकि सहनशीलता पार होती है
समय पड़ने पर
अग्नि ज्वाला से भी ज्यादा तपती है
निर्दयी बनकर
प्रतिशोध भी लेती है क्योंकि
औरत सब सहन कर लेती है
परंतु अपमान नहीं
औरत पूजनीय है हर रिश्ते में
हर रूप में आदरणीय है
नौ महीने गर्भ धारण करके
औरत ही वंश बढ़ाती है
अपनी ममता की छांव में
शिशु को प्यार का पाठ सिखलाती है
इसीलिए ‘प्रज्ञा शुक्ला’ कहती है
औरत निंदनीय नहीं
हर रूप में वंदनीय है
जय हो नारी शक्ति की जय
हो भारत माता की

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तोहरे बिन ज़िनिगिया

April 29, 2020 in भोजपुरी कविता

भोजपुरी काव्य :-

तोहरे बिन ज़िनिगिया
सूनल बा हमार ….
केकरा से हम बोलब बतियाइब
केकरे संग ज़िनिगिया बिताइब
तोहरे बिन ज़िनिगिया
सूनल बा हमार….
साज श्रिंगार तोहरे बिन
अधूरा बा
तोहरे संग ही साजेला
जोड़ा हमार
तोहरे बिन जिनिगिया
सूनल बा हमार…
टूटल बा सगरे
सपनवा हमार
तोहरे बिन ज़िनिगिया
सूनल बा हमार…

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