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Pragya

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Pragya

@pragya_a • Joined Dec 2019 • Active 5 months ago

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Pragya

by Pragya

मुठ्ठी भर यादें…

June 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज कुछ पुरानी सौगात मिली
मैंने अपने कमरे की तलाशी ली।
तो कुछ किताबें धूल में लिपटी हुई,
कुछ खत, कुछ गुलाब के फूल सूखे हुए
कुछ तस्वीरें, कुछ तोहफे
और कुछ बन्द लिफाफे मिले।
जिन्हें छुपाकर रखा था मैंने
भूल गई थी दुनियादारी में पड़कर
आज वो मुठ्ठी भर यादें
मुझे मिल गई।
जिन्हें मैने सबसे छुपाकर अपनी
अलमारी में रख दिया था।
आज वो यादें धूल में लिपटी हुई
मुझे आ मिलीं।
और उनकी स्मृतियों ने
मुझे फिर विचलित कर दिया।
वो मुठ्ठी भर यादें
मुझे मिल गईं।
जिन्हें भूले जमाने हो गए।

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Pragya

by Pragya

“माँ मुझे विवाह नहीं करना”

June 23, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

समाज में स्त्रियों की दशा देखकर
मेरे मन में उठे विचार:-

माँ मुझे विवाह नहीं करना।
पति की परछाई बनकर,
पति के पीछे-पीछे नहीं चलना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

अपने कलेजे के टुकड़े(संतान) पर,
पति का आधिपत्य स्थापित नहीं करना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

परिजनों की दी पहचान मिटा,
ससुराल की प्रथा नहीं बनना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

अपनी लीक से हटकर,
पति की डगर नहीं चुनना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

अपने सपनों की रोशनी मिटा,
अंधेरों में मुझे नहीं मिलना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

खुद अपना अस्तित्व मिटा,
सम्बंधों की बलि नहीं चढ़ना।
माँ मुझे विवाह नहीं करना।

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Pragya

by Pragya

ख्वाहिशों के समंदर…

June 23, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तेरे-मेरे बीच में वो पहले जैसी बात नहीं रही।
ना रही वो बातें, वो मुलाकात नहीं रही।
ख्वाहिशों के समंदर पड़ गए सूखे-सूखे
रीत में प्रीत में वो पहले जैसी बात नहीं रही।
मुश्किलें अब सजा नहीं लगतीं
ख्वाहिशों में भी वो पहले जैसी बात नहीं रही।
गजब का फ़ितूर था हम दोनों के दर्मियां
आफतों में अब पहले जैसी बात नहीं रही।
आशियाना भी रास नहीं आता
लोगों में वो पहले जैसी बात नहीं रही।

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by Pragya

पिता वो दरख्ता है…

June 21, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज योग दिवस ही नहीं
पिता दिवस भी है तथा संगीत दिवस भी है।
पिता के लिये कुछ शब्द:-
🌷🌷🌷🌷🌷

पिता वो दरख्ता है जो
बचपन को छांव देता है।

आये कोई भी मुश्किल
हाँथ थाम लेता है।

उसका साया उठना
किसी हश्र से कम नहीं।

बाप का स्नेह
ममता से कम नहीं।

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Pragya

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नाकामयाब

June 21, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कोशिशें बहुत की उसने मुझे बदल डालने की,
मगर नाकामयाब ही रहा वो मेरे हौसले के आगे।

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Pragya

by Pragya

“गुलाम हूँ अपने संस्कारों की”….

June 21, 2020 in शेर-ओ-शायरी

🌹🌹🌹🌹
गूँगी नहीं हूँ मैं
मुझे भी बोलना आता है।
——————————–
गुलाम हूँ अपने संस्कारों की
वर्ना मुझे भी सबक सिखाना आता है।

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by Pragya

“योग दिवस”:- 21जून

June 21, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

योग दिवस:-
योग करके अपने मानसिक,
शारीरिक और संवेगात्मक
तीनों अवस्थाओं का विकास कीजिए।
योग से अन्तर्मन को निर्मल कीजिए।
योग जीवन का वह अलौकिक दर्शन है
जो हमें मोक्ष की ओर ले जाता है।
मनुष्य को उसकी आत्मा से
जोड़ता हुआ प्रकाशित करता है।
मनुष्य के कल्याण का यह सर्वथा
उत्तम मार्ग है।
योग दर्शन है, विज्ञान है।
योग में ही कल्याण है।
योग आत्मा को परमात्मा से
जोड़ने का सर्वोत्तम मार्ग है।
यह यौवन को चिरस्थायी बनाने का
एकमात्र विकल्प है।
अपने स्वास्थ्य को उत्तम रखने के लिए
और अपने अन्दर ऊर्जा को
दीप्तिमान करने का
योग ही सफल मार्ग है।
तो योग कीजिए और
अपने अन्दर ऊर्जा को
स्फुटित कीजिए।
🙏🙏स्वस्थ्य रहें, मस्त रहें और व्यस्त रहें।
इसी कामना के साथ अपनी लेखनी को विराम देती हूँ।

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नीरोग हूँ मैं

June 21, 2020 in शेर-ओ-शायरी

नीरोग हूँ मैं क्योंकि मैंने
बहुत जतन से प्रेम योग किया है।
नैनासन का अभ्यास करके
खुद को स्वस्थ्य किया है।

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“मेरी कलम की धार”✍

June 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

उठाई थी कलम कुछ अनसुलझे
सवाल लिखने के लिए।
अपने दिल के ज़ज्बात
ना जाने कब लिखने लगी।
लोग कहते हैं कि
मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
बस जितनी तकलीफें
मिलती रहीं तुझसे,
“मेरी कलम की धार”
उतनी तेज चलने लगी।
रूबरू होते गए हम
तेरे दर्द से जितना
मेरी आँखों से मोतियों की
लड़ी झड़ने लगी।
किस्से तो रोज सुनती थी
इश्क, मोहब्बत के।
पर ना जाने कब!
मैं भी तुझसे प्यार करने लगी।
रोका बहुत था मैंने अपने दिल को,
पर तुझे देखते ही मैं तुझ पर मरने लगी।
लोग कहते हैं कि
मैं बहुत अच्छा लिखने लगी।
पर मैं तो बस तेरा दिया हर दर्द लिखने लगी।

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हिंदुस्तान के हाथों मारा जाएगा

June 20, 2020 in मुक्तक

ताश के पत्तों-सा ढह जाएगा
तू एक दिन विलुप्त ही हो जाएगा।
यही हरकतें रही ना तेरी चीन
तो तू बिन मौत ही हिंदुस्तान के हाथों मारा जाएगा।

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पाकिस्तान के दो टुकड़े

June 20, 2020 in Other

1971 में जब इन्दिरा गाँधी जी ने
पाकिस्तान के दो टुकड़े किये थे।
तब चीन मुँह ताकता रह गया था।
उफ़ तक ना निकली थी मुँह से
और अमेरिका, रूस जैसे देश
चूँ तक ना बोले बस
दाँतों तले उंगली दबा कर रह गए।
ऐसा था आयरन लेडी का फैसला
और भारत का औधा।
जिसे मोदी जी ने भी
बरकरार रखा है।
आज भी हर देश भारत की
सराहना करता है।
और सम्मान से देखता है।
मैं इन्दिरा गाँधी जी के
इस फैसले की सराहना
करते हुए उन्हें नमन करती हूँ।
चीन का भी हाल यही होना चाहिए।

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by Pragya

वह पहले जैसी बात नहीं

June 20, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

क्यूँ आज सूरज हो गया निस्तेज
वह पहले जैसी बात नहीं।
हवा भी चल रही है मद्धम-मद्धम
उसमें भी पहले जैसी बात नहीं।
न जाने क्यों बेरुखी कर रहे हैं
सब मौसम के साथ
कोई भी तो नहीं दिखाई देता।
हर गली कह रही है
वह पहले जैसी बात नहीं।
पहले तो यूं भीड़ उमड़ी रहती थी।
हर गली नुक्कड़ पर लोगों की
जमात लगी रहती थी।
ऊपर वाले के एक फैसला से
इतना आ गया फासला!
रिश्तों में भी अब
पहले जैसी बात नहीं।
कितनी मायूसी छाई है चारों तरफ
मेरा दिल कहता है यह कैसा मंजर आया है?
जिसमें पहले जैसी बात नहीं।
तुम भी तो कितना
बदल गए हो वक्त के साथ
तुम्हारे व्यवहार से भी तो जाहिर होता है।
तुम में भी वह पहले जैसी बात नहीं।

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लिख लूँ

June 19, 2020 in शेर-ओ-शायरी

गिले आज भी बहुत हैं तुमसे
बस कुछ इम्तिहानों से निपट लूँ ।
तब तक तुम ढूंढ लो बहाने
और मैं शिकायतें लिख लूँ ।

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Pragya

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तेरी आँखों ने….

June 19, 2020 in शेर-ओ-शायरी

इक शराब ने ही तो सम्भाल रखा है मुझे….
वर्ना
तेरी आँखों ने तो कब का मार डाला था….

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बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी घर छोड़ते हैं।

June 19, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

ये भाग- दौड़ के किस्से अजीब होते हैं,
सबके अपने उद्देश्य और औचित्य होते हैं।
कभी शिक्षा कभी जीवन की नव आशा में,
सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी घर छोड़ते हैं।

जीवन में सबके अजीब उधड़बुन होती है,
समस्याओं की फ़ौज सामने खड़ी होती है।
गुजरना पड़ता है जब विपरीत परिस्थितियों से,
सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी प्रताड़ित होते हैं।

जब सफलता और रोजगार की बात होती है,
असफलता पर जब कुण्ठा व्याप्त होती है।
सारे प्रयास होते हैं जब निरर्थक,
सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी खूब रोते हैं।

घर से दूर रहकर सब तकलीफें सहते हैं,
कभी खाते हैं कभी भूखे रह जाते हैं।
जी भरकर देखते हैं तस्वीर माँ- बाप की,
सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी कम सोते हैं।

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नींद से जागी आँखें

June 19, 2020 in शेर-ओ-शायरी

ना जाने कब नींद से जागी आँखें?
रात भर रोकर सूजी हैं कितनी आँखें।
बिता तो लेंगे हम ज़िन्दगी तेरे बगैर भी
पर तुझे देखकर ज़िंदा हैं ये मेरी आँखें।

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सीमा पर कितने धूर्त?

June 19, 2020 in शेर-ओ-शायरी

सीमा पर कितने धूर्त और मक्कार हैं
अपनी सेना का मनोबल ना गिरने पाए
इस बात का भारतीय रखते खूब ख्याल हैं।

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सितारा

June 19, 2020 in शेर-ओ-शायरी

ढूंढती रह गई बस तुझे हर दर पर
तू मिला नहीं तो देख मैं चांद में खो गई
तुझे ढूंढने की चाहत में मैं खुद सितारा हो गई।

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तेरे बिन

June 19, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तेरे बिन जिंदगी कैसे बताऊंगी
तू तो दूर चला गया पर मैं दूर कैसे जाऊंगी।
मेरी हर सांस की अमानत हो तुम
समझ नहीं आता तुझ बिन कैसे जी पाऊंगी।

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ये दुनिया

June 19, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किसी की कद्र करनी है तो जीते जी कीजिए जाने के बाद तो हर कोई दुःख जता देता है.

जब इंसान जीवित रहता है और किसी दूसरे से कोई उम्मीद करता है तो उसे कोई नहीं समझता.

और जैसे ही व्यक्ति दुनिया से चला जाता है लोग कहना शुरू कर देते है कि कोई तकलीफ थी तो मुझे बता देता मैं तेरी मदद कर देता.

लेकिन कड़वा सच यही है जीते जी ये दुनिया कद्र नहीं
करती।

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चीन को

June 19, 2020 in Other

जीत जायेंगे हम क्योंकि हमारे बाजुओं में है दम
चीन को उसके घर तक खदेड़ आएगें हम

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मेरा लाल

June 19, 2020 in Other

रो-रोकर परिजन का हो गया बुरा हाल
मां पूछती है सबसे कहां गया मेरा लाल

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चीनी सामान

June 18, 2020 in Other

जिस तरह अंग्रजों के सामान को और
उन्हें बहिष्कृत किया था।
उसी प्रकार चीनी सामान को
अपने जीवन से दूर करो।
और आत्मनिर्भर बनो।
अपनी दैनिक आवश्यकताओं का
सामान खुद ही देश में बनाओ।

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चीनी सामान का बहिष्कार करो

June 18, 2020 in Other

चीनी सामान का बहिष्कार करो
इसे अपने जीवन से दूर करो
सरकार ने यह निर्णय लिया है
आप भी यह निर्णय लेकर
देश भक्ति की भावना दिखाओ।

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क्यूँ तूने छुड़ा लिया दामन??

June 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सैनिक के शव से बोली उसकी
पत्नी:-
माँग सूनी रह गई
क्यूँ तूने छुड़ा लिया दामन?
अभी-अभी तो
रूह जुड़ी थी।
क्यूँ तूने छुड़ा लिया दामन?
अभी-अभी तो साथ
चले थे।
क्यूँ तूने छुड़ा लिया दामन?

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Pragya

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भारत माँ विपदा में पड़ी

June 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

भारत माँ की खातिर
कितनी माताओं की
कोख उजड़ी।
भारत माँ विपदा में पड़ी।
हर गली में पसरा सन्नाटा
हर चौखट सूनी पड़ी।
भारत माँ विपदा में पड़ी।
किस किस को खोकर
रोये धरती
यही सोंचे
घड़ी-घड़ी
भारत माँ विपदा में पड़ी।

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एक सैनिक ऐसा भी होगा!

June 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक सैनिक ऐसा भी होगा!
जिसनें प्रेम किया होगा
अपने प्रेम का इजहार किया होगा!
जब आया होगा छुट्टी पर
तो यह वादा किया होगा।
अगली बार जब आऊँगा
तुझको ही प्रिया बनाऊँगा ।
इस बार मिली है कम छुट्टी
अगली बार लम्बी लेकर आऊँगा ।
तेरे घरवालों से तेरी खातिर लड़ जाऊँगा ।
वादा करता हूँ तुझसे
मैं जल्दी घर आऊँगा।
तुझको ही प्रिया बनाऊँगा।
तेरे हाथों में मेहंदी होगी
सिर पर चूनर ओढे होगी
मैं तेरी सिन्दूर से माँग सजाऊँगा।
जब अगली छुट्टी आऊंगा।
वादा है मेरा मैं जल्दी घर आऊँगा।

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हर गली रुदन करती है

June 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कितना कष्ट होता है जब
एक सैनिक शहीद होता है ।
पूरा देश रोता है ।
हर गली रुदन करती है ।
एक अशांत-सी पीड़ा
मन में घर करती है ।
रोती है धरती जब
मृत सैनिक को गोद में
लेती है ।
अग्नि भी गर्मी कम करके
शोक प्रकट
करती है ।
जिस जगह से गुजरता है
जनाजा वह
गली रुदन करती है।
माँ की छाती में दूध उतरता है
जब बेटे की अर्थी आती है।
पत्नी छाती पीट पीटकर
बेसुध होती जाती है ।
मेरी कलम रोती है जब
किसी सैनिक के
शहीद होने की खबर पाती है।
उस कोख को क्या कहूँ जो
सीमा पार उजड़ जाती है ।
बाप किस तरह कन्धा
देता है जिसकी
वेदना और
स्थिति पर ‘प्रज्ञा की कलम’
नि:शब्द हो जाती है।

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Pragya

by Pragya

कितनों ने जान गँवाई

June 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

हाय कितनों ने जान गँवाई!
उस चीन ने जमीन के टुकड़े की खातिर
कर दी नीच-सी हरकत ।
खुद मरा
और मेरे प्यारे देशभक्त सैनिकों ने भी
वीरगति पाई ।
हाय कितनों ने जान गँवाई!

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Pragya

by Pragya

आपसे अनुरोध है🙏🙏

June 18, 2020 in Other

आप एक बार अपने नियमों में बदलाव कीजिये ।
दुश्मन पर वार करने का फैसला,
सेना के विवेक पर छोड़िए।
उसे पाकिस्तान की तरह आजाद कर दीजिये।
🙏🙏🙏आपसे अनुरोध है इसमें राजनीति मत कीजिये।

Comments Off on आपसे अनुरोध है🙏🙏

Pragya

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दूर रखो

June 18, 2020 in Other

अपनी राजनीति को सुरक्षाबल से दूर रखो
राजनीति हर जगह करो पर
सैनिकों को इससे दूर रखो।
जब हमारी सेना राजनीति से दूरियाँ बनाये
तो भारत सरकार तुम भी अपने कदमों को
सेना से दूर रखो।

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Pragya

by Pragya

मत गंवाओ

June 18, 2020 in Other

मत गंवाओ अब और सैनिकों को तुम
एक बार सीधे गोली मारने का आदेश देकर देखो।

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Pragya

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शहादत पर आँसू

June 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

क्यूँ नहीं देती है सरकार सैनिकों को
दुश्मन को सीधे गोली मारने की आजादी?
वो बस राह देखते हैं आदेश की और खाते रहते हैं
सीने पर गोली।
उनकी शहादत पर हम कब तक बहायें आँसू?
सुहागिने कब तक अपना सन्दूर खोएं?
उन्हें एक बार अपनी राजनीति से मुक्त करो
फिर देखो कैसे
चीन की गर्मी निकलती है
और हिन्दुस्तान से सबकी नज़र हटती है ।

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Pragya

by Pragya

यह कैसे अच्छे दिन??

June 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

यह कैसे अच्छे दिन आए हैं?
एक तरफ कोरोना मानव को
निगलने पर तैयार खड़ा है।
दूसरी ओर सीमा पार दुश्मन खड़ा है।
इस महामारी को देखकर भी,
चीन का पेट नहीं भरा है।
इसीलिए तो वह सीमा पर बंदूक लिए खड़ा है।

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Pragya

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नादान बचपन:-कहाँ गई वो गुड़िया

June 9, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

याद आती हैं वो बचपन की बातें
जब पापा के हाथों से
चोटी करवाती थी।
माँ लोरी गाकर सुलाती थी।
कहाँ गई वो बचपन गुड़िया ?
जिसकी शादी मैं रोज़ कराती थी।
बाबा की भजन संध्या में
मैं ही आरती सुनाती थी ।
भाईयों से रोज़ का झगड़ा
और माँ से खफ़ा हो जाती थी।
तुम बेटों को ही प्रेम करती हो
पापा की दुलारी बन जाती थी।
कहाँ गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
कागज़ की नाव पर बैठकर
दुनिया की सैर हो जाती थी।
कहां गई वो बचपन की गुड़िया ?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
दादी बात-बात पर डाटती थी
उन्हें देखकर मैं पुस्तक खोल
पढ़ने बैठ जाती थी।
कहां गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
मेले से हर बार मैं
चश्मा खरीद लाती थी।
भईया के तोड़ने पर
पापा से मार खिलाती थी।
कहां गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।
यही कुछ निशानियाँ हैं मेरे पास
‘नादान बचपन’ की
जब नानी के घर जाती थी।
जब माँ जबरन मुझे खिलाती थी।
कहाँ गई वो बचपन की गुड़िया?
जिसकी शादी मैं रोज कराती थी।

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‘नजरों को बस’….

June 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी

नजरों को बस तेरी ही तलाश रहती है
सुकून भी बस तेरे ही साथ आता है,
मुलाकात भले ही ना होती हो हमारी
पर सारा वक्त तेरी याद में गुजरता है।

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जुबां जो कह नहीं सकती..

June 8, 2020 in ग़ज़ल

जुबां जो कह नहीं सकती
आंखें वो राज़ कहती हैं।
दिल में जो कुछ भी चलता है
धड़कनें आवाज करती हैं ।
लगाए लाख भी पहरे
दिलों पर चाहे जमाना,
मोहब्बत तोड़कर पहरे
दिल को आजाद करती है।
मिले ना दुनिया की शोहरत
सच्चा दिलदार मिल जाए।
जहां में प्यार की दौलत ही
सच में आबाद करती है।
किसी को टूट कर चाहो
अगर वो छोड़ दे दामन,
एक तरफा मोहब्बत ही ‘प्रज्ञा’
जलाकर खाक करती है।

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“खिड़कियों से झांकती आँखें”

June 7, 2020 in Poetry on Picture Contest

कितनी बेबस हैं लोह-पथ-गामिनी (रेलगाड़ी)
की खिड़कियों से झांकती 👁आंखें।
इन आंखों में अनगिनत प्रश्न उपस्थित हैं।
कितनी आशाएं कीर्तिमान हो रही हैं ।
अपने परिजनों से मिलन की उत्सुकता
ह्रदय को अधीर कर रही है।
परंतु कोरोना महामारी का भय
यह सोचने पर मजबूर कर रहा है,
कि कहीं अपने परिजनों को हम
भेंट स्वरूप कोरोना महामारी तो
प्रदान नहीं कर रहे?
यह बात लोह-पथ-गामिनी के इन
सहयात्रियों को व्यथित कर रही है।
मुख पर लगा मुखौटा(मास्क),
इंनकी इस धारणा को बखूबी प्रदर्शित कर रहा है।
इन श्रमिकों, प्रवासी मजदूरों को
इस बात की अत्यंत खुशी है
कि एक अर्से के बाद
जिस रोटी की तलाश में वो परदेस गए थे।
आज उसी रोटी की अभिलाषा में
अपने गंतव्य प्रस्थान करेंगे।
रूखी सूखी खाकर ही,
अपनी जठराग्नि को शांत करेंगे।
“मजबूरी में मजदूरी की
मजबूरी में घर से निकले।
आज फिर मजबूरी में
मजदूरी छोड़ प्रवासी पहुंचेंगे।।”

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Pragya

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“कभी यूं भी आ”!!

June 6, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

गज़ल =”कभी यूं भी आ”
——————————–
कभी यूं भी आ मेरी आंख में
मेरी नजर को खबर ना हो,
मुझे एक रात नवाज दे कि
फिर ‘शहर'(सुबह) ना।

अंशुमाली में तेरी ही आरजू रहती है
मिल जाए जन्नत की उम्र हुकूमत,
फिर भी तेरी ही आरजू रहती है।
कभी यूं भी आ मेरी आंख में,
मेरे अपनों को खबर ना हो।
मुझे एक रात नवाज दे,
कि फिर शहर (सुबह) ना।

दास्तान ए मोहब्बत जब भी
सुनाती हूं किसी को,
सबकी आंखों में एक चमक
दिखाई देती है।
कोई देख ना ले तुझे मेरी आंखों में,
बस यही बात खटकती है।

कभी यूं भी आ मेरी आंख में कि,
मेरे सपनों को खबर ना हो।
मुझे एक रात नवाज दे कि,
फिर शहर (सुबह) ना हो।

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Pragya

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चिपको आंदोलन 1970

June 5, 2020 in लघुकथा

चिपको आन्दोलन की शुरुआत 1970
में सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी,
कल्याण सिंह रावत पर्यावरणविद ने की।
वन विभाग के अधिकारियों को 2400 से अधिक
पेड़ काटने के आदेश पर खदेड़ा।
इसकी शुरुआत तत्कालीन ‘चमोली जिले’ से हुई ।
फिर धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड में फैल गई
इस की सबसे बड़ी बात यह थी
कि इसमें स्त्रियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था
और अपनी जान जोखिम में डालकर राज्य के वन अधिकारियों को पेड़ कटाई पर विरोध किया।
और पेड़ों पर अपना परंपरागत अधिकार जताया।
आज पर्यावरण दिवस पर हम ‘चिपको आंदोलन ‘की
इस घटना को कैसे भूल सकते हैं?
पेड़ हमारे लिए वास्तव में हमारे जीवन का आधार है
जो हमारे जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं को
पूरा करते हैं।
और हमें बहुत सी जड़ी बूटियां, लकड़ियां और जरूरत के सामान उपलब्ध कराते हैं।
हमें इन्हें नहीं काटना चाहिए।
बल्कि हमें उनके हो रहे अंधाधुंध कटाई को रोकना चाहिए।
और संकल्प लेना चाहिए कि वृक्षारोपण करेंगे और उनकी
रक्षा भी करेंगे।

आप सभी को पर्यावरण दिवस की
हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏🙏
कवयित्री:- प्रज्ञा शुक्ला

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याद हैं वो गुजरे जमाने!!

June 4, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

याद हैं वो गुजरे जमाने
तुमको?
जब प्रीत से बढ़कर
और कुछ भी न था।

याद हैं वो गुलिस्ता मुझको
जहाँ तेरे और मेरे सिवा
कुछ भी न था।

कुछ दूर खड़े तुम थे
कुछ दूर खड़े हम थे,
याद है क्या तुमको
मेरी बाँहों में आना?

आज़ादियां कहां अब
तेरे मेरे मिलन की,
तेरा नज़र उठाना
मेरा नज़र झुकाना।

बरसात की वो बूंदें
और तेरा भीग जाना,
तेरे ही दम से खुश था
मेरे दिल का आशियाना।

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Pragya

by Pragya

ज़िन्दगी के भंवर में….

June 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किस्मत से डरी हुई हूँ मैं
ज़िन्दगी के भंवर में
फंसी हुई हूँ मैं ….

तेरी स्मृतियों की दासी हूँ
हालतों की दुविधा से
सहमी हुई हूँ मैं …..

गमों की आंधियों ने
झकझोर दिया है जीवन
याद ही नहीं है मुझे
आखरी बार कब हँसी हूँ मैं?….

मेरे परिजनों ने खुद से
बाँधे रखा है मुझको
पता ही नहीं चला
कब बड़ी हुई हूँ मैं….

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Pragya

by Pragya

दरख्तों सी ज़िन्दगी…

June 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

🌴🌴दरख्तों सी है ज़िन्दगी अपनी🌴🌴
कभी हर साख पर हैं पत्तियां
टूटती….लहराती….
और मिट्टी में मिल जाती….

कभी हर शाख पर गुल खिलता है
कभी दरख्ता वीरान सा नज़र आता है
जिसकी हर एक शाख मृत है……
🍁🍁🍁🍁🍁
बसंत ऋतु आते ही जिसकी हर शाख
पत्तियों से हरी-भरी हो जाती है
जीवंत हो उठता है दरख़्ते का जर्रा जर्रा
जैसें यौवन अंगड़ाइयां ले रहा हो…..

पतझड़ आते ही मानो किसी ने
लूट लिया हो, किसी सुंदरी के अलंकारों को
और विरह की वेदना में व्यथित होकर
वह साज श्रृंगार करना छोड़ चुकी हो….

🌹🌹ऐसी ही है जिंदगी “प्रज्ञा”🌹🌹
जो कभी फूल के जैसे खिल उठती हैं
तो कभी काँटो-सी सूख जाया करती है…..

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🌲🌲दरख़्तों सी जिंदगी🌲🌲

June 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

🌴🌴दरख्तों सी है ज़िन्दगी अपनी🌴🌴
कभी हर साख पर हैं पत्तियां
टूटती….लहराती….
और मिट्टी में मिल जाती….
🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂
कभी हर शाख पर गुल खिलता है
कभी हर शाख वीरान सी नज़र आती है
जिसकी हर एक शाख मृत है……
🍁🍁🍁🍁🍁
🌲🌲बसंत ऋतु आते ही जिसकी हर शाख🌲🌲
पत्तियों से हरी-भरी हो जाती है
जीवंत हो उठता है दरख़्ते का जर्रा जर्रा
जैसें यौवन अंगड़ाइयां ले रहा हो…..
💃💃💃💃💃💃💃
पतझड़ आते ही मानो किसी ने
लूट लिया हो, किसी सुंदरी के अलंकारों को
और विरह की वेदना में व्यथित होकर
वह साज श्रृंगार करना छोड़ चुकी हो…..
🧟‍♀️🧟‍♀️🧟‍♀️🧟‍♀️🧟‍♀️🧟‍♀️🧟‍♀️

🌹🌹ऐसी ही है जिंदगी “प्रज्ञा”🌹🌹
जो कभी फूल के जैसे खिल उठती हैं
तो कभी काँटो-सी सूख जाया करती है…..
🤦‍♀️🤦‍♀️🤦‍♀️🤦‍♀️🤦‍♀️🤦‍♀️🤦‍♀️🤦‍♀️

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“रिश्तों की पौध”

June 2, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम्हारी हर एक बात सही है….
वक्त का पता तो चलता ही नहीं है
अपनों के साथ,
पर अपनों का पता चल जाता है वक्त के साथ।
मगर ए हमदम!
अपनों के प्रति ऐसी संवेदनाएं रखना,
अच्छी बात नहीं होती।
अपनों को अपना बनाने के लिए,
प्रेम की रसधार से सीचना पड़ता है।
“रिश्तों की पौध”को।।

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इज़्ज़त

June 1, 2020 in शेर-ओ-शायरी

बड़ों की इज़्ज़त करने से इज़्ज़त कम नहीं होती,
बल्कि कई गुना बढ़ जाती है।

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आंसुओं की कसम

June 1, 2020 in शेर-ओ-शायरी

हर तरफ तेरी याद का दर्द गहरा है
ना जाने किस बात पर ये दिल ठहरा है,
तेरी आँखों में ठहरे आंसुओं की कसम
ए दोस्त! ये दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है।

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Pragya

by Pragya

अधूरी सी नज़्म

May 31, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

गीत बनकर तुम्हारी जिंदगी में आई थी
एक रोज ……..
गजल बनकर तुम्हारी
ज़िंदगी बन गई।

और रुबाई बनकर
आंखें भिगोई तुम्हारी…

एक दिन ख्वाब बनकर तुम्हारे
सपनों के खटखटाने लगी दरवाजे
और जगाने लगी तुम्हें रातों को….

नींद में भी तुम मुझे ही ढूंढते थे
और मेरे ही खयालों में खोए रहते थे….

पर न जाने किसकी नजर
हमारे प्यार को लग गई?

तुम तुम ना रहे और
हमारी जरूरत भी ना रही…

और मैं अधूरी सी एक नज़्म
बनकर रह गई….

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Pragya

by Pragya

यही हाल

May 31, 2020 in Other

कुछ यही हाल हमारा भी है
नींद आती है तो सो लेते हैं वरना रो लेते हैं।

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Pragya

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तारीफ न सही

May 31, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तारीफ़ न सही तो
आलोचना ही कर दिया करो,
गर हो गये हो गूंगे तो
इशारा ही कर दिया करो।

सयाने बनकर देखते हो
तुम चलन सारे जमाने का …
गर चुप ही रहना है
तो निगाहें नीची कर लिया करो।

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