कहानी-ना समझ संतान पैतृक संपत्ति से कुशल किसान रहता था, अनेक पशुओं तथा कृषि यंत्रों के साथ एक सुनहरे भवन का मालिक था, किसान के दो पुत्र प्रवेश तथा आवेश, दोनों पुत्रों की शादी हो […]
कहानी-ना समझ संतान पैतृक संपत्ति से कुशल किसान रहता था, अनेक पशुओं तथा कृषि यंत्रों के साथ एक सुनहरे भवन का मालिक था, किसान के दो पुत्र प्रवेश तथा आवेश, दोनों पुत्रों की शादी हो […]
कहानी-बाढ़ ————– सूरज निकलने वाला ही था कि बारिश रिमझिम शुरू हो गई| दोपहर होते-होते बारिश विकराल रूप धारण कर ली चारों तरफ बादल में गड़गड़ाहट बिजलीओं की लपटें, ऐसा प्रतीत होने लगा आज बादल […]
मेरा शोक हर लो, मेरा दोष हर लो, जैसे पिया आपने जहर को वैसे मेरे!हर दुख के आंसू पी लो —— ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ पता-खजुरी खुर्द,तह.कोरांव, प्रया.
शिक्षा ग्रहण करो,संत ज्ञानेश्वर भीमराव बनों —————————————————- यदि मन में अभिलाषा है किसी विशेष कार्य, वस्तु ,लक्ष्य, पद प्रतिष्ठा के लिए और धरातल पर कोई ठोस कदम नहीं, तब स्वाभाविक है कि आने वाले समय […]
मेरा शोक हर लो, मेरा दोष हर लो, जैसे पिया आपने जहर को वैसे मेरे!हर दुख के आंसू पी लो —— ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ पता-खजुरी खुर्द,तह.कोरांव, प्रया.
बारिश की एक फुहार से, सुखे पेड़ में भी जान आ जाती है और जब होता है जिक्र प्यार का, मुझे मेरी मां याद आ जाती है। —मानुष
प्रजातांत्रिक व्यवस्था में पूंजीपति आम जनता के कीमती वोट का शिकार चंद रुपयों का चारा फेंक बड़ी आसानी से कर लेते हैं। काहे का प्रजातंत्र है ये ? हर पांच साल पर प्यार जताने, आ […]
जब तक तारों मे नहीं मै हू यही बस तेरी आस ही है जिनकी चिंगारी जिंदा रखे हुए है रेत मे पैरों के निशान जो खो जाती है वैसा मेरा प्यार नहीं पत्थर पर कुरेदे […]
जीवन रण है संघर्ष भरा, अनगिनत शूल पथ में बिखरे, मेहनत परिश्रम अथक प्रयास, कंटक प्रसून बनकर निखरे। ********************* महामारी काल संघर्ष पूर्ण, कितने कुलदीपक काल ग्रास बने, सांसों की डोर पड़ी कमजोर, आजीविका संसाधन […]
आज एक अर्से के बाद कलम उठाई है। तेरी प्रीत मेरी आँख में भर आई है दिल की पीर से है मुझको कुछ आराम मिला, आज इसी वाइस मैंने कलम उठाई है। दीद हुई जबसे […]
भुला दिया शायद तुमने मुझे, जिस चाहत की मैं हकदार थी वो प्यार ना दिया तुमने मुझे। कैसे आ जाती है नींद तुम्हें, जब एक उम्र ना सोने दिया तुमने मुझे। मैं माँगी थीं कान […]
इन्तज़ार की भी एक हद होती है हमने उस हद को पार करके तेरा इन्तज़ार किया, जानते थे तू नहीं आएगा फिर भी तेरा इन्तज़ार किया। मेरी किस्मत में तू नहीं ना सही सब कुछ […]
कविता- गुलाब जल ————————- चाहत न थी, अब जीने की बस तुम्हें देखा दुआ करने लगा जीने की, साकी दे- प्याला तो, नशा चढ़े| भर नजर- देख ले यह हसीना, जाम से बढ़कर नशा चढ़े, […]
बचपन में पूछा करते जब भी दादी से दादी साड़ी श्र्वेत क्यों सर पर काले केश नहीं क्यों दादी कहतीं ‘ रंग गए सब दादा के संग वेणी, जूड़ा, काजल, बिंदी, केश गए दादा के […]
बारिश की बूंदें सहला गईं प्रकृति का अंग अंग हरियाईं उपेक्षित शिलाएं अहिल्या जन्मी राम जी के पदन्यास से ०८.०२.२०२२
तकलीफ अंदर के शोर से है, तनहाई तो यूँ ही बदनाम होती है। गिरता है खारा जल जब भी ऑंख से, वह सुबह वह शाम, तेरे ही नाम होती है॥ _______✍गीता
हृदय प्रभु ने सरल दिया था, प्रीति युक्त चित्त तरल दिया था, स्नेह सुधा से भरल दिया था , पर जब जग ने गरल दिया था, द्वेष ओत-प्रोत करल दिया था , तब मैंने भी […]
जो तुम चिर प्रतीक्षित सहचर मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष तुम्हे होगा निश्चय ही प्रियकर बात बताता हूँ। तुमसे पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता हूँ अधम शत्रु का निज कर से। सुन मित्र की बातें […]
खुद को जब खंगाला मैंने, क्या बोलूँ क्या पाया मैंने? अति कठिन है मित्र तथ्य वो, बामुश्किल ही मैं कहता हूँ, हौले कविता मैं गढ़ता हूँ, हौले कविता मैं गढ़ता हूँ। अजय अमिताभ सुमन सर्वाधिकार […]
दे ज्ञान हमें मा भारती भर दे झोली इतनी सी हैं आरजू . काया का ना हमें ध्यान इतना हो माँ हमपे मेहरबान . पूर्व संस्कार सब मिटा दें मातेश्वरी दे ज्ञान हमें माँ भारती […]
हिम की बरसात हुई, कहीं तो बीती रात हुई। गिरी नर्म-नर्म रुई सी, चाॅंदी सी बिछ गयी राहों में रूचिर रुपहली रात हुई बही सर्द-सर्द हवाएँ, तन-मन ठिठुरता ही जाए। बादल घुमड़ रहे गगन पर, […]
आधुनिकता के दौर में, कितने आगे हम निकल चुके, भवनों के; निर्माण के लिए खेतों में अब प्लॉट कटे। आधुनिकता के दौर में कुएँ, पोखर सब सुख गए, चहकते थे; मुंडेर पर पँक्षी अब वो […]
इस क्षणभंगुर संसार में जो नर निज पराक्रम की गाथा रच जन मानस के पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है उसी का जीवन सफल होता है। अश्वत्थामा का अद्भुत पराक्रम देखकर कृतवर्मा और […]
अश्वत्थामा दुर्योधन को आगे बताता है कि शिव जी के जल्दी प्रसन्न होने की प्रवृति का भान होने पर वो उनको प्रसन्न करने को अग्रसर हुआ । परंतु प्रयास करने के लिए मात्र रात्रि भर […]
महाकाल क्रुद्ध होने पर कामदेव को भस्म करने में एक क्षण भी नहीं लगाते तो वहीं पर तुष्ट होने पर भस्मासुर को ऐसा वर प्रदान कर देते हैं जिस कारण उनको अपनी जान बचाने के […]
जब अश्वत्थामा ने अपने अंतर्मन की सलाह मान बाहुबल के स्थान पर स्वविवेक के उपयोग करने का निश्चय किया, उसको महादेव के सुलभ तुष्ट होने की प्रवृत्ति का भान तत्क्षण हीं हो गया। तो क्या […]
शिवजी के समक्ष हताश अश्वत्थामा को उसके चित्त ने जब बल के स्थान पर स्वविवेक के प्रति जागरूक होने के लिए प्रोत्साहित किया, तब अश्वत्थामा में नई ऊर्जा का संचार हुआ और उसने शिव जी […]
विपरीत परिस्थितियों में एक पुरुष का किंकर्तव्यविमूढ़ होना एक समान्य बात है । मानव यदि चित्तोन्मुख होकर समाधान की ओर अग्रसर हो तो राह दिखाई पड़ हीं जाती है। जब अश्वत्थामा को इस बात की […]
हिमालय पर्वत के बारे में सुनकर या पढ़कर उसके बारे में जानकरी प्राप्त करना एक बात है और हिमालय पर्वत के हिम आच्छादित तुंग शिखर पर चढ़कर साक्षात अनुभूति करना और बात । शिवजी की […]
मानव को ये तो ज्ञात है हीं कि शारीरिक रूप से सिंह से लड़ना , पहाड़ को अपने छोटे छोटे कदमों से पार करने की कोशिश करना आदि उसके लिए लगभग असंभव हीं है। फिर […]
मृग मरीचिका की तरह होता है झूठ। माया के आवरण में छिपा हुआ होता है सत्य। जल तो होता नहीं, मात्र जल की प्रतीति हीं होती है। आप जल के जितने करीब जाने की कोशिश […]
========================= मन की प्रकृति बड़ी विचित्र है। किसी भी छोटी सी समस्या का समाधान न मिलने पर उसको बहुत बढ़ा चढ़ा कर देखने लगता है। यदि निदान नहीं मिलता है तो एक बिगड़ैल घोड़े की […]
============================= किसी व्यक्ति के चित्त में जब हीनता की भावना आती है तब उसका मन उसके द्वारा किये गए उत्तम कार्यों को याद दिलाकर उसमें वीरता की पुनर्स्थापना करने की कोशिश करता है। कुछ इसी […]
कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का […]
कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को […]
अश्रेयकर लक्ष्य संधान हेतु क्रियाशील हुए व्यक्ति को अगर सहयोगियों का साथ मिल जाता है तब उचित या अनुचित का द्वंद्व क्षीण हो जाता है। अश्वत्थामा दुर्योधन को आगे बताता है कि कृतवर्मा और कृपाचार्य […]
गुजरते वक्त के साथ जिंदगी भी बीत जाएगी । अगर नहीं सुधारोगे खुद को तो एक दिन मौत आ जाएगी ।।1।। ++++++++++++++++++++ मौत सत्य हैं आएगी जरूर । पर गले वहीं लगाएगा जो हैं खुद […]
दिल हमारा टूटा हुआ सा हो गया, जब अपनी राह वो जाने लगे। चाह कर भी रोक पाये हम नहीं, रोकने को उन्हें, ऑंखों के अश्क़ आने लगे। कब तलक देते सहारा वो हमें, अश्कों […]
किसी के साथ कितना भी वक्त बिताओ वो एक दिन चला ही जाता है जिसे जान से ज्यादा चाहो वही दिल दुखाता है इसीलिये अपने देश से प्यार करना चाहिए कम से कम मरने पर […]
वन्दे भारत। प्राणों में मृदुरस आज घोल। नित सजल,करुण तेरी चितवन तेरे पद – पंकज धोता घन परिमल भरता स्मित चंदन। देता अमृत पिक मृदुल बोल। […]
इस क्षणभंगुर संसार में जो नर निज पराक्रम की गाथा रच जन मानस के पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है उसी का जीवन सफल होता है। अश्वत्थामा का अद्भुत पराक्रम देखकर कृतवर्मा और […]
मित्र मेरे! जिंदगी की, हर ख़ुशी तुझको मिले, तेरी खुशियों से निकल कुछ तार मुझ तक भी जुड़े हैं, ठण्ड से सिकुड़े हुए से, बेरहम यादें संजोये, गाँठ बांधी हो किसी ने संवेदनाओं के गले […]
बूंदें न डालो ठंडी ओ बादल!!! ठिठुर गया तन मेरा। नील गगन ही, छत था मेरा, आज उसे है तुमने घेरा, कुहरा-कुहरा, दिन में अंधेरा, रात हुई, संशय ने घेरा, मिल पायेगा या न सवेरा, […]
ख़ामोशियाँ जब ज़ुबाँ बनने लगीं, रफ्ता-रफ्ता दिलों की दूरियाँ घटने लगीं। मोहब्बत में मीठे अहसास हुए इस कदर, एक दूजे की कदर अब बढ़ने लगी। बिन कुछ कहे वो हमें अब समझने लगे, ख़ामोशियाँ भी […]
नीले आसमान पर बादलों का पहरा था, बादलों का रंग भी श्यामल गहरा था। सूरज की ऑंख मिचौली जारी थी अब बारिश आने की बारी थी। साथ निभाने कोहरा भी आ गया, देखते-देखते धरा पर […]
जिद चाहे सही हो या गलत यदि उसमें अश्वत्थामा जैसा समर्पण हो तो उसे पूर्ण होने से कोई रोक नहीं सकता, यहाँ तक कि महादेव भी नहीं। जब पांडव पक्ष के बचे हुए योद्धाओं की […]
पूस माह में सावन आया, काली घनघोर घटाएँ लाया। झमाझम मेघों से बरसा पानी, कुदरत को ऐसे सावन भाया । सर्दी में सर्दी और बढ़ी, जलधर इतना जल कहाँ से लाया। यह कैसा परिवर्तन ऋतु […]
This existence is regulated by strict orderly pattern and discipline. A Man,on the contrary, by his very own nature desires freedom from everything ,be it any kind of control, discipline, rules, order or regulation etc. […]
जन्म लिया जब बेटी ने खुशी थी घर में छाई, घर में आनन्द मगन सब घर की बगिया महकाई खेलकूद कर बड़ी हुई सुंदर सी शिक्षा पाई बिखेर देती चहुंओर खुशियां बनकर रहती मां की […]
कनक तश्तरी सा आलोकित भानु लुटा रहा है स्वर्ण रश्मियाँ । दूर-दूर तक बिखरा सोना, हर पत्ती हर डाली -डाली रौशन हुआ है हर कोना-कोना। देखो नव प्रभात हो रहा है, जागो, अब नहीं है […]
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