सोना तपा कुंदन बना, कुंदन तप के राख मैं तपी तपती रही, कुंदन बनी ना राख बरखा ऋतु आई, आई नई कोंपल हर शाख मेरे मन भी उठी उमंगें, छू लूं मैं आकाश
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सोना तपा कुंदन बना, कुंदन तप के राख मैं तपी तपती रही, कुंदन बनी ना राख बरखा ऋतु आई, आई नई कोंपल हर शाख मेरे मन भी उठी उमंगें, छू लूं मैं आकाश
देर नहीं लगती कोई क्यों इतना एहसान फरमा रहा, कुछ तो है जो संग आ रहा खाली जेब को, कभी किसी की नजर नहीं लगती , रिश्ते कब मतलबी हो जाए , देर नहीं लगती। […]
जो अपनी खुद की पहचान छिपाये बैठे है। वो नासमझ मेरे वजूद पर शर्त लगाये बैठे है।।
दुआ इतनी है कि रोज इस तरह भी बेशुमार आएं। दिन ढले तो बहार आए रात गुजरे तो बहार आए। घटाएँ चिलमन हैं खुशियाँ हैं रोशनी की किरण, घटाएँ ढलती रहें रोशनी के गुबार आएं। […]
मैं अखण्ड हूं, प्रचंड हूं, निडर हूं ,अजर हूं, संतोषी हूं , मुस्कराती हुई ख़ामोशी हूं, कड़े दर्द से लड़ सकता हूं, मैं सह सकता हूं।- २ लोगो के बहानो को, अपनों के तानों को, […]
गजब संघर्ष सा देखा कवियों के बीच अपनी मौलिकता को छोड़कर होड़ सी करने लगे, नशा इतना किया गहरा कि किसी कवि के विचारों को स्वयं की बोलकर कविता कहने लगे कविता खो दी मौलिकता […]
मेरे लबों की आप सदा बनके आइए। खुद जाम पीजिए, हमें भी पिलाइए। नज़रों में आपकी मयखाना नज़र आये। मखमूर क्यों न हो इनमें जो उतर जाए। मयकश की लाज रखिए तशरीफ़ लाइए। खुद जाम […]
वो मेरी बचपन की सखी, मिली मुझे कितने दिन बाद जानती थी मैं ये कबसे, आएगी उसे एक दिन मेरी याद घर गृहस्थी में व्यस्त रही थी, चेतन मन में थे कितने काम पर अवचेतन […]
हम भी रोये नहीं मुद्दतें हो गयीं। पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं। जबसे बेताज वह बादशाह बन गया, पगड़ियों पर बुरी नीयतें हो गयीं। जख्म भी दर्द देते नहीं आजकल, कम सितमगर तेरी रहमतें […]
जिसको पल-पल खोजू बाहर, ढूंढे से न मिलता हैं ऐसी भी क्या ख़ता हुई जो, हर बार आशा का दीपक बूझता हैं एक छोटी सी चाह थी मेरी, कि सबके सपने पूरे करूँ टूटा हुआ […]
हास्य कविता बिट्टू घूम रहा था गुमसुम, हाथ में लेकर एक फोटो मां ना जाए छोड़कर कहीं, इस उलझन में था वो नाना जी को फोन लगाया, अपने मन का हाल बताया नाना -नानी अचरज […]
उदासी मधुमक्खी के छत्ते सा है ये ज़हान , यहां सब, मतलब से झांकने वाले हैं। अब किसे मैं यहां अपना कहूं, यहां सब काटने वाले हैं । मां को छोड़कर, सब लोभी है, ढोंगी […]
चला शावर है अंबर से भिगोने धरती का आंगन खिला हर पात डाली का बही गंगधार भी कलकल करे कलरव हर पंछी चली है नाव कागज की समेटे ख्वाहिशें मन भर हुआ है बालमन उच्छृंखल […]
हे वीर, नमन मेरा तुझको l वीर पुत्र , सूरवीर हो l l आप ही प्रहरी , प्रलय भी आप हो l अश्व जैसी तेज, सिंह की दहाड़ हो ll शांत प्रिय, रुद्र रूप […]
फिर याद आया मुझे, सावन के वो…. दो पहरी। भीग रहे थे हम दो, थी हमारे पास एक ही छतरी।। उनसे कभी चिपक जाना, फिर अलग हो जाना। हवा के झोंको से कभी, उड़ जाती […]
माँ मेरी ****** मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे विकल हुआ मेरा क्यूँ मन ,फिर आंचल लहरा दे मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे । छूट गये क्यू खेल- खिलौने, जिम्मेदारी से घिर गए सपने- […]
आज जब मानव के बजूद पर बन आई है फिर भी जाति-धर्म की ये कैसी लङाई है गरीब देखे न अमीर ये वैश्विक महामारी है मानव बनकर रहने में हम सब की भलाई है मानव […]
तुम्हें याद है वह उधार वाला वादा? याद है तुम्हें एक कप चाय का वादा जो तुमने किया था मुझसे कभी और आज तक पूरा नहीं किया मुझे भी याद है और तुम्हें भी याद […]
आज कुछ बदला- बदला मिज़ाज है दिल भी बेताब है सिसकियाँ भी खामोश हैं….. लफ्जों में मिठास है गूंजती जा रही है गलियों में शहनाई बींद के इन्तज़ार में….. बीती जा रही है स्वर्ण रात्रि […]
आज जब मानव के बजूद पर बन आई है फिर भी जाति-धर्म की ये कैसी लङाई है गरीब देखे न अमीर ये वैश्विक महामारी है मानव बनकर रहने में हम सब की भलाई है मानव […]
सफ़र ————- बंदिशो के आँगन में बुलन्दियो के आसमान तक यह सफ़र है, तेरी बेचैनी से,तेरी पहचान तक कहाँ थमी है,तेरी चुनौतियों की कंटीली डगर मंजिल तो पाना है ही,चाहे जितना लम्बा हो सफ़र सौन्दर्य,मातृत्व […]
बूंद बूंद बूंदें बूंद बूंद बूंदें बूंद बूंद बरसती है , आंखों से मेरी । तूने क्यों की रुसवाई , जज्बातों से मेरे। बूंद बूंद बूंदें बूंद बूंद बूंदें तू धूप सा चुभता रहा, मैं […]
ज़िन्दगी कभी अज़ीब सी भंवर उठाती है चहुँ और पानी तो नज़र आता है न जाने नाव क्यों न चल पाती है झकझोरती हैं ख्वाइशें दिल में दबी उसके पंख फड़फड़ाते तो है पर वो […]
ज़िन्दगी अबूझ पहेली सी है कभी बहुत करीब एक सहेली सी कुछ उठते सवाल उलझे से नहीं मिलते जवाब सुलझे से बड़ी शिद्दत से अगर खोजें तो कुछ हल पाने में आसानी होगी ज़्यादा बुद्धिमत्ता […]
आँखों की नमी देखकर हम, नज़रें उनसे चुराने लगे, वो फिर से कही रो ना दें, हम खुल कर मुस्कुराने लगे ©अनीता शर्मा अभिव्यक़्ति बस दिल से
इस काँच में कहाँ से आई दरारें? उस रात जब जोर से आँधी आई थी तब खिड़कियाँ आपस में गले थी। और चीख-चीख कर अपने मिलन की खुशी प्रकट कर रही थी और सावन के […]
बताओ ना! तुमने यह नूर कहाँ से पाया है? फूलों से रंगत चुराई, या फिर कलियों से नूर पाया है। बताओ ना! तुमने यह नूर कहाँ से पाया है? तितलियों से ली शरारत या भंवरों […]
सावन की एक-एक बूंद कैसा एहसास दिलाती है? कोपलें भी फूटते लगती हैं…. पत्तियां नाचती हैं सावन में और पुष्प आपस में सौंदर्य की बातें करते हैं सब मगन होते हैं सावन में…. जब बरसात […]
शीर्षक:- ‘हम स्कूल चलेंगे’ हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेँगे, सीखेंगे अच्छी बातें और पायेंगे ज्ञान, पढ़ लिखकर हम बनेंगे अच्छे और महान, हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे। प्रार्थना सभा में […]
उड़ जा रे पंछी ख़ुशी से उस असीमित गगन में क्या सोचता है बैठ कर फिर कैद की फिराक में जल्दी से छोड़ दे ये बसेरा कहीं और जाकर खोज ले यहाँ पिंजरे है तेरी […]
जलते ही रोशनी फैलाती है, मोमबत्ती भी सीख दे जाती है, हम मानस पुतलों की तरह इक तालमेल बैठाती है व्यक्तित्व छोटा हो या बड़ा, महक भी चाहे हो जुदा, लेकिन कार्य पृथक नहीं इनका, […]
तुम्हे दूर जाना था, तो पास आये ही क्यों वादों से मुकर जाना था, तो सब्ज़ बाग़ दिखाए क्यूँ मेरी फितरत में नहीं शामिल बेवज़ह रिश्तों को तोड़ देना पर तुम खुदगर्ज़ निकले तो फिर […]
सिर्फ तुकबंदी नहीं कविता कोई यह तो ह्रदय से उपजता बोल है, दर्द का साक्षात अनुभव है यही प्रेम, करुणा, स्नेह मिश्रित घोल है, डॉ सतीश पांडेय, चम्पावत उत्तराखंड
तलबगार है ये बंद खिड़की उस शख्श के दीदार की जो वादा करके गया आने का अब हद्द हो चुकी इंतज़ार की गुज़रती हैं जब भी हवाएं यहाँ से दर्द की आहट उठ जाती है […]
मेरी कल्पना में कहीं जो बसी है वो मदमस्त थिरकती जो अपनी ही धुन में , फूलों सी महकती हर अदा में अभिव्यक्ति मोहपाश में बांधे वो कजरारी निगाहें , हाँ तुम वही मेरी प्रियवंदिनी […]
मौसम ए साजिश का है, ये मौसम बारिश का है, किसी को इंतज़ार रहता है, बारिश में भीगने का, एहसास,अच्छा होता है। हवाओं में वो सुकून होता है, ये मुहब्बत का सुरूर होता है। दिल […]
ओ माँ कितनो को तुझ पर कविताएं पढ़ते देखा है तेरी तारीफों में कितने कसीदे गढ़ते देखा है, कितनो को शब्दोँ से सिर्फ तुझपर प्यार लुटाते देखा है, कितना इस दुनिया को तेरी ममता का […]
फिर हुआ नई सुबह का आगाज़ है नया दिन नयी उम्मीदों का राज है चहचहाते पंछियों की गूंजती आवाज़ है सरसराती सुबह की ठंडी बयार है उस पर पड़ती सावन की फुहार है हर तरफ […]
इस भरी बरसात में सब धुल गई बाहरी पर्तें मेरे व्यवहार की, अब छुपाऊँ किस तरह से झुर्रियां जो मेरी असली उमर दर्शा रही। खोट है मेरी नियत में आज भी आप करते हो भरोसा […]
खुशियों को आने का मौका दो कभी तो बेवजह मुस्कुराओ यक़ीनन बहारें लौट आएँगी तुम ज़रा धीमे से खिलखिलाओ ढलती उम्र सी हर पल ये ज़िन्दगी ज़र्रा ज़र्रा हाथ से फिसलती है ज़िन्दगी सोचते क्यों […]
वो सब्र का पाठ तो पढ़ाते थे बेसब्र ना हो,सब ठीक होगा ! फिर इम्तिहानों के दलदल में खुद बेसब्र हो,अकेला छोड़ जाते थे! हालातों से लड़ते हम वहीँ के वहीँ रह जाते थे! वो […]
खौफ खातीं है सर्द मौसम की हवाएं भी मुझसे सीने में दहकते सूरज सी जिंदादिली रखती हूँ हौसला परवान पर है उम्र हारी है ढलती उम्र है तो क्या जज़्बा ज़िन्दगी जीने का, खुद के […]
गहनता से लिख रही हूँ मैं लफ्ज़ कम लगते हैं गर लिखने बैठो ज़िन्दगी की किताब चंद लम्हे फुर्सत मिली बाकी रहा ज़िम्मेदारियों का दबाव यादों को तक सँजो ना सके रखते रहे पल पल […]
कितनी रातें गुज़र जाती हैं नींद आये तो भी आंखें सोती नहीं ज़हन में ख्याल तेरा नज़र में इंतज़ार पलकें भीगती हैं पर आँख रोती नहीं ©अनीता शर्मा अभिव्यक्ति बस दिल से
हर रोज़ पहुँच जाती हूँ उस श्वेत निर्मल घरोंदे में न जाने किस जन्म की कहानी शायद कैद है उन दीवारों में जहाँ पहुँच कर अतीत के पन्ने करवटों की तरह बदलते है शीतल पवन […]
ना…री तू बिलखना नहीं किसी सहारे को अब तरसना नहीं तू स्वयंसिद्ध और बलवान है नहीं महत्वहीन तू खुद सबकी पहचान है सशक्त है तू नाहक ही छवि तेरी कमज़ोर है पर तेरे जोश का […]
मुश्किलें किसके जीवन में नहीं आतीं ये दृढ़ता से समझना होगा खुद की कोशिश नाकाम नहीं होतीं विजय पथ पर खुद अग्रसर होना होगा जब कोई अपने हिसाब से लड़ता जाता है कुछ बेख़ौफ़ बढ़ते […]
वो प्रीत के मनोरम स्वर्णिम पल दफ़न क्यों हुए चारदीवारी में, वो जुड़ रही थी या टूट रही थी जलते से या बुझते अरमानों में, वो प्रेम या वेदना के पल कहूं या तार तार […]
साँझ हो रही है, ऊंचे पहाड़ों के शिखर बादलों से आलिंगन कर रहे हैं। साफ साफ कुछ नहीं दिख रहा है, परस्पर प्रेम है या बस दिखावा है। जो भी है कुछ तो घटित हो […]
इतना चाहती हूँ इतना ना इतराया करो,बेरूखी में, ना दिन जाया करो यूँ दूर ना मुझसे रहो,बुलाने से पहले आ जाया करो क्यू खामोश हो या खुद में ही मदहोश हो चुप हो ऐसे तुम […]
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