सोना तपा कुंदन बना,
कुंदन तप के राख
मैं तपी तपती रही,
कुंदन बनी ना राख
बरखा ऋतु आई,
आई नई कोंपल हर शाख
मेरे मन भी उठी उमंगें,
छू लूं मैं आकाश
Tag: संपादक की पसंद
संपादक की पसंद
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मेरा मन
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देर नहीं लगती
देर नहीं लगती
कोई क्यों इतना एहसान फरमा रहा,
कुछ तो है जो संग आ रहा
खाली जेब को,
कभी किसी की नजर नहीं लगती ,
रिश्ते कब मतलबी हो जाए ,
देर नहीं लगती।ऐसे ही छोड़ जाएगी,
मिनटों में दिल तोड़ जाएगी,
इतनी भी वह मुझको फरेबी,
खैर नहीं लगती।
पर बहुत जुड़ते- टूटते रिश्ते; आजकल!
बात कब बिगड़ जाए,
देर नहीं लगती।संगदिल है सब,
हमदर्द हैं सब ,
तेरे सुख के हर पलों में,
पर यह क्या हुआ ?
दुख में तू अकेला !
टूटा सा कोई जैसे ठेला!
वक्त की कड़वी गोली ,
सबक से कम नहीं लगती
कब ?कौन ?कहां?
हाथ छोड़ दे,
देर नहीं लगती। -
नासमझ
जो अपनी खुद की पहचान छिपाये बैठे है।
वो नासमझ मेरे वजूद पर शर्त लगाये बैठे है।। -
दुआ इतनी है
दुआ इतनी है कि रोज इस तरह भी बेशुमार आएं।
दिन ढले तो बहार आए रात गुजरे तो बहार आए।घटाएँ चिलमन हैं खुशियाँ हैं रोशनी की किरण,
घटाएँ ढलती रहें रोशनी के गुबार आएं।हमारी बात और है कि रहते हैं हम अंधेरों में,
तुम उजाले हो क्यों न हमें तुम पर प्यार आए।कुछ समझ नहीं आता क्या बात है चेहरे में,
देखें तो खुमार आए बिन देखे न करार आए।आज का दिन हो उल्फत का तरन्नुम हो साज हो,
आज ही आज हो कल कभी कभार आए।जिंदगी की जिंदादिली मैं तुमसे आज कहता हूँ,
अपनाते चले जाओ जिंदगी में निखार आए।संजय नारायण
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मैं सह सकता हूं।
मैं अखण्ड हूं,
प्रचंड हूं,
निडर हूं ,अजर हूं,
संतोषी हूं ,
मुस्कराती हुई ख़ामोशी हूं,
कड़े दर्द से लड़ सकता हूं,
मैं सह सकता हूं।- २लोगो के बहानो को,
अपनों के तानों को,
मुसीबतों का सामना भी
कर सकता हूं,
मैं सह सकता हूं।-२मैं उस पेड़ सा ,
तुफान मैं जो झुक जाएं
सब्र करे, नियति बदलती है
हर बार,
विरोध के समय, जो मूक जाएं
पानी सा नित बह सकता हूं,
मैं सह सकता हूं।-२कभी कभी करता है मन रो दूं,
आंसूओं से खुद को भिगो दूं,
मिटा दूं वजूद अपना ,
भूल जाऊं हर सपना,
मगर नहीं ,
धैर्य के साथ रह सकता हूं,
मैं सह सकता हूं।-२सह सकता हूं !
ईर्ष्या को,घृणा को,
हीनता को,
पीड़ा को और दरिद्रता को।पर नहीं सह सकता हूं !
पेट की बीमारी को,
जीभ की खूमारी को,
पापिन! हाए!भूख को,
हां ! भूख को ,
मैं नहीं सह सकता हूं।-२
मोहन सिंह (मानुष) -
कवि संघर्ष
गजब संघर्ष सा देखा
कवियों के बीच
अपनी मौलिकता को छोड़कर
होड़ सी करने लगे,
नशा इतना किया गहरा
कि किसी कवि के विचारों को
स्वयं की बोलकर कविता
कहने लगे कविता
खो दी मौलिकता
अभी भी वक्त है जागो
अगर सचमुच में कवि तो
होड़ पुरस्कारों की छोडो
लिखो कुछ नयी कविता
लिखो कुछ सत्य की कविता,
बढ़ाओ प्रेम आपस में,
न बनाओ
संघर्ष कविता को -
हमें भी पिलाइए
मेरे लबों की आप सदा बनके आइए।
खुद जाम पीजिए, हमें भी पिलाइए।नज़रों में आपकी मयखाना नज़र आये।
मखमूर क्यों न हो इनमें जो उतर जाए।
मयकश की लाज रखिए तशरीफ़ लाइए।
खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए।जादू की कशिश हैं ये जलबों भरी अदायें।
जुल्फों में भी हजारों महफूज हैं घटायें।
छिटकाइए ये जुल्फ प्यास को बुझाइए।
खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए।खुशरंग गुलबहार है ये हुस्न आपका।
बेदाग चाँद जैसा है चेहरा जनाब का।
हो जाए जहां रोशन घूँघट उठाइए।
खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए।संजय नारायण
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वो मेरी बचपन की सखी
वो मेरी बचपन की सखी,
मिली मुझे कितने दिन बाद
जानती थी मैं ये कबसे,
आएगी उसे एक दिन मेरी याद
घर गृहस्थी में व्यस्त रही थी,
चेतन मन में थे कितने काम
पर अवचेतन मन में थी मैं कहीं ना कहीं,
ये उसको भी ना था भान
जब फुर्सत के क्षण आए तो,
याद आई होंगी बचपन की बातें
यूं ही तो नहीं छूटते बचपन के प्यारे नाते
रोक ना पाई वो खुद को, संदेशा भिजवाया मुझे
मैं भी भागी भागी आई, कितने दिन बाद वो पाई
वो मेरी बचपन की सखी…. -
पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं
हम भी रोये नहीं मुद्दतें हो गयीं।
पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं।जबसे बेताज वह बादशाह बन गया,
पगड़ियों पर बुरी नीयतें हो गयीं।जख्म भी दर्द देते नहीं आजकल,
कम सितमगर तेरी रहमतें हो गयीं।खुशनुमां एक चेहरा दिखा ख्वाब में,
तबसे जागे न हम मुद्दतें हो गयीं।थी खबर आदमी हैं उधर राह में,
जो भी गुजरा उसे आफ़तें हो गयीं।एक मुफ़लिस था वो रोटियाँ माँगकर,
झोलियाँ भर गया नेमतें हो गयीं।शौक जबसे अमीरी का चढ़ने लगा,
जो जरूरी न थीं, जरूरतें हो गयीं।उसको जो भी मिला चाहने लग गया,
दिल की पूरी सभी मन्नतें हो गयीं।ले गयीं दाद सब वो सजी सूरतें,
और खामोश सी सीरतें हो गयीं।दिल भी टूटा जहां ने भी रुसवा किया,
इस कदर मेहरबां किस्मतें हो गयीं।डूबकर खुद हवस में बिके आदमीं,
मुफ्त बदनाम ये दौलतें हो गयीं।वो मुहब्बत में बदनाम तो हैं मगर,
खुश हैं यूँ मानिए शोहरतें हो गयीं।उसको तनहाइयों ने बिगाड़ा बहुत,
उसकी खुद से बड़ी सोहबतें हो गयीं।गालियों गालियों जब लड़े आदमी,
तब निशाना फ़क़त औरतें हो गयीं।मुस्कराकर जो तुम सामने आ गए,
एक पल में जबां हसरतें हो गयीं।हाँथ में हाँथ ले साथ हम चल पड़े,
दुनियाभर को बहुत दिक्कतें हो गयीं।संजय नारायण
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तुम्हे सुमरने से मिल जाता हैं
जिसको पल-पल खोजू बाहर, ढूंढे से न मिलता हैं
ऐसी भी क्या ख़ता हुई जो, हर बार आशा का दीपक बूझता हैं
एक छोटी सी चाह थी मेरी, कि सबके सपने पूरे करूँ
टूटा हुआ सपना मेरा, अब मन-ही-मन खलता हैं
आँस तुम्से ही लगाई हैं, अब न और मन में पलता हैं
जिसको पल-पल खोजू बाहर, ढूंढे से न मिलता हैं।।हर दर जाकर खोजा सुख को, अब वह कहीं न पाया हैं
दोहुं जगह ही मन का पंछी, अपना घरौंदा बनाता हैं।
एक द्वार तेरा साँवरे वृदावन, जो खुलता हैं
दुजा आसरा तेरा महाकाल जो उजैनी नगरी बसाता हैंकृष्णा तेरा रूप मनोहर, जो मन को चित ठगे जाता हैं
महाकाल की छवि निराली जो मन को ठहराव बताता हैंदोनो ही पूरक है मेरे, न कोई कम न कोई ज्यादा हैं
एक राह दिखलाता हैं, दुजा आस बंधाता हैं
पल- पल जिसको बाहर, वह आप दोनो के सुमिरन भर से मिल जाता हैं।। -
मां के साथ ये कौन है
हास्य कविता
बिट्टू घूम रहा था गुमसुम,
हाथ में लेकर एक फोटो
मां ना जाए छोड़कर कहीं,
इस उलझन में था वो
नाना जी को फोन लगाया,
अपने मन का हाल बताया
नाना -नानी अचरज में आए,
बेटी को फिर फोन लगाए
“बिट्टू ये क्या बोल रहा है”
किस फ़ोटो को ले डोल रहा है
फ़ोटो देख के मां मुसकाई,
सारी बात समझ में आई
मां-पापा की शादी की फ़ोटो लेकर,
बिट्टू गुमसुम घूम रहा है
पापा को पहचान ना पाया,
क्योंकि बाल उड़े और पेट बढ़ आया
फ़ोटो देख के उसका सिर चकराया,
बिट्टू कितना था घबराया
बिट्टू का भोलापन सबको भाया,
हंस हंस कर सबका पेट दुख-आया -
उदासी
उदासी
मधुमक्खी के छत्ते सा है
ये ज़हान ,
यहां सब, मतलब से
झांकने वाले हैं।
अब किसे मैं यहां अपना कहूं,
यहां सब काटने वाले हैं ।
मां को छोड़कर,
सब लोभी है, ढोंगी है,
फरेबी है ।
जरा संभल कर ‘ मानुष ‘
यहां सब पीछे से झपटने वाले हैं।
——–मोहन सिंह मानुष
-
सावन
चला शावर है अंबर से
भिगोने धरती का आंगन
खिला हर पात डाली का
बही गंगधार भी कलकलकरे कलरव हर पंछी
चली है नाव कागज की
समेटे ख्वाहिशें मन भर
हुआ है बालमन उच्छृंखलखिला हर पात डाली का
बही गंगधार भी कलकलबड़ी गूंजें जय भोले की
बुझी चिंगारी शोले की
डले झूले भी सावन के
हुआ गौरी का मन चंचलखिला हर पात डाली का
बही गंगधार भी कलकलकहीं पायल बुलाती है
मिलन की राह दिखाती है
कहीं चूड़ी के शिकवे हैं
हुई हर आस जो धूमलखिला हर पात डाली का
बही गंगधार भी कलकलअजब इस बार का सावन
नहीं कहीं दिख रहा कावड़
मगर उपवास से नर नार
करें इस माह को उर्मिलखिला हर पात डाली का
बही गंगधार भी कलकलस्वरचित
रचना निर्मल
दिल्ली -
मेरा नमन
हे वीर, नमन मेरा तुझको l
वीर पुत्र , सूरवीर हो l l
आप ही प्रहरी , प्रलय भी आप हो l
अश्व जैसी तेज, सिंह की दहाड़ हो ll
शांत प्रिय, रुद्र रूप हो l
जल – थल ,नभ में भी आप हो ll
आप रंग , बेरंग भी हो l
सीमा रेखा ,शत्रु की जीवन रेखा आप हो ll
आप हो तो संभव , न हो तो असम्भव हो l
आप ही शहीद , आप ही अमर हो ll
जीवन रक्षक , शत्रु भक्षक भी आप हो l
कठोर आप , प्रेम सागर आप हो ll
हिन्द को समर्पित हो , मोह के विमुख हो l
आप संगम , आप ही विरह हो ll
आप ही मुस्कराहट , वेदना भी आप हो l
दीपक की लौ , दीप – छांव भी आप हो ll
हे वीर, आप काव्य रस से परिपूर्ण हो l
शौर्य ऐसी, गाथा के लिए शब्द कम हो ll
हे वीर, नमन मेरा तुझको l
हे वीर, नमन मेरा तुझको ll
RAJIV MAHALI -
छतरी (काव्य प्रतियोगिता)
फिर याद आया मुझे, सावन के वो…. दो पहरी।
भीग रहे थे हम दो, थी हमारे पास एक ही छतरी।।
उनसे कभी चिपक जाना, फिर अलग हो जाना।
हवा के झोंको से कभी, उड़ जाती थी अपनी छतरी।।
धीरे धीरे कदमों से कदम, मिला कर आगे बढ़ना।
खींचातानी की आ जाती नौबत, थी एक ही छतरी।।
बूढ़े बरगद के नीचे ठहरना, मीठी मीठी बातें करना।
बात बात पे घुमाते थे, कभी कभी हम अपनी छतरी।।
सुनसान राहों में जब कोई राही पे, नजर पड़ जाता।
हम चेहरे को छुपा लेते थे, झुका के अपनी छतरी।। ।
(सावन में छतरी की भूमिका) -
माँ मेरी
माँ मेरी
******
मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे
विकल हुआ मेरा क्यूँ मन ,फिर आंचल लहरा दे
मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे ।
छूट गये क्यू खेल- खिलौने,
जिम्मेदारी से घिर गए सपने- सलौने ,
सबकी मुझसे उम्मीदें बङी हैं
इन हाथों में कहाँ जादू की छड़ी है
थक गयी मैं,थकान मिटा दे ।
मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे ।।
ईश्वर की धरती पर अवतार है तू
बच्चों की मनचाहा वरदान है तू
डूबते मन की खेवनहार है तू
तेरी ममता अविरल-निश्चल
स्नेह की प्यास बुझा दे ।
मुझे मेरा खोया बचपन लौटा दे ।।
सुमन आर्या -
एक दीप तेरे नाम का
आज जब मानव के बजूद पर बन आई है
फिर भी जाति-धर्म की ये कैसी लङाई है
गरीब देखे न अमीर ये वैश्विक महामारी है
मानव बनकर रहने में हम सब की भलाई है
मानव बनें!दीप इस आश से जलाया है ।।
आज अपनों से भी अछूत बन गए है हम
एक मीटर का फासला क्या लगता है कम
अब भी ना संभले तो कब संभलेगे हम
सद्बुद्धि दे!दीप इस आश जलाया है ।।
जब काम था तो वक्त की कमी थी
काम के चलते अपनों में दूरियां बनी थीं
आज समय है , पर काम की कमी है
दूरियां मिटें!दीप इस आश से जलाया है ।।
देखो ना अब ये कैसी तबाही है
एक दूजे से मिलने की मनाही है
कुछ भी छूने से पहले,कांपे है मन
मन का डर भागे!दीप इस आश से जलाया है ।।
एक युद्ध छिड़ चुका है मानवता के दुश्मन से
अदृश्य हैं दिखता नहीं इन सहमी निगाहों से
जीतेगे हम, अपनी धैर्य, संयम,चतुराई से
इनका हौसला बढे!दीप इस आश से जलाया है ।।
हम हैं घरों में बैठे पूर्ण बंदी का पालन करके
चलें हैं कई महान त्यागी,धरके जान हथेली पे
खाने-पीने की भूख नहीं,जीवन की सूध नहीं
उनकी दीर्घ आयू को!दीप इस आश से जलाया है ।।
सुमन आर्या
————- -
उधार वाला वादा
तुम्हें याद है वह उधार वाला वादा?
याद है तुम्हें एक कप चाय का वादा
जो तुमने किया था मुझसे कभी
और आज तक पूरा नहीं किया
मुझे भी याद है और तुम्हें भी याद है।
पर पता नहीं कब तुम मेरे वादे को
मुकम्मल करने आओगी
और मेरा उधार वाला वादा पूरा करोगी।
क्योंकि वह वादा आज भी उधार है। -
बींद के इंतजार में
आज कुछ बदला- बदला मिज़ाज है
दिल भी बेताब है
सिसकियाँ भी खामोश हैं…..
लफ्जों में मिठास है
गूंजती जा रही है
गलियों में शहनाई
बींद के इन्तज़ार में…..
बीती जा रही है स्वर्ण रात्रि
गेसुओं की घनी छाँव के तले बैठी
मेरी ख्वाइशों भरी एक शाम है…. -
एक दीप तेरे नाम की
आज जब मानव के बजूद पर बन आई है
फिर भी जाति-धर्म की ये कैसी लङाई है
गरीब देखे न अमीर ये वैश्विक महामारी है
मानव बनकर रहने में हम सब की भलाई है
मानव बनें!दीप इस आश से जलाई है ।।
आज अपनों से भी अछूत बन गए है हम
एक मीटर का फासला क्या लगता है कम
अब भी ना संभले तो कब संभलेगे हम
सद्बुद्धि दे !दीप इस आश जलायी है ।।
जब काम था तो वक्त की कमी थी
काम के चलते अपनों में दूरियां बनी थीं
आज समय है , पर काम की कमी है
दूरियां मिटें!दीप इस आश से जलाई है ।।
देखो ना अब ये कैसी तबाही है
एक दूजे से मिलने की मनाही है
कुछ भी छूने से पहले,कांपे है मन
मन का डर भागे!दीप इस आश से जलाई है ।।
एक युद्ध छिड़ चुका है मानवता के दुश्मन से
अदृश्य हैं दिखता नहीं इन सहमी निगाहों से
जीतेगे हम, अपनी धैर्य, संयम,चतुराई से
इनका हौसला बढे!दीप इस आश से जलाई है ।।
हम हैं घरों में बैठे पूर्ण बंदी का पालन करके
चलें हैं कई महान त्यागी,धरके जान हथेली पे
खाने-पीने की भूख नहीं,जीवन की सूध नहीं
उनकी दीर्घ आयु हो !दीप इस आश से जलाई है ।।
सुमन आर्या
————- -
सफ़र
सफ़र
————-
बंदिशो के आँगन में बुलन्दियो के आसमान तक
यह सफ़र है, तेरी बेचैनी से,तेरी पहचान तक
कहाँ थमी है,तेरी चुनौतियों की कंटीली डगर
मंजिल तो पाना है ही,चाहे जितना लम्बा हो सफ़र
सौन्दर्य,मातृत्व व बुद्धि के बल,खुद को साबित करना है
तप,त्याग,महानता की ही नहीं,
सफलता की गौरवगाथा बनना है
खुद को साबित कर,जाना है आसमान तक—–सुमन आर्या
-
बूंद बूंद बूंदें।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदेंबूंद बूंद बरसती है ,
आंखों से मेरी ।
तूने क्यों की रुसवाई ,
जज्बातों से मेरे।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदेंतू धूप सा चुभता रहा,
मैं बर्फ सी पिंघलती रही।
तू गाज सा गिरा मुझ पर ,
मैं सब्र सी सहती गई।
नैना ये तरसते हैं,
यादों में तेरी।
कितनी नींद गवाही ,
यादों में तेरी ।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदेंपागल मनवा ढूंढे तुझको,
पर तू तो मिलता नहीं।
बेबसी का जाम है तू ,
जाम ये चढ़ता नहीं।
जाम ये मिलता नहीं।
दिल का बहम मिटा नहीं,
कि तू बेवफा नहीं।
फिर वफा तो की ही नहीं,
हालातों से मेरे।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदेंबूंद बूंद बरसती है ,
आंखों से मेरी ।
तूने क्यों की रुसवाई ,
जज्बातों से मेरे।
बूंद बूंद बूंदें
बूंद बूंद बूंदें
——मोहन सिंह मानुष -
ख्वाइशें उसकी
ज़िन्दगी कभी अज़ीब सी भंवर उठाती है
चहुँ और पानी तो नज़र आता है
न जाने नाव क्यों न चल पाती है
झकझोरती हैं ख्वाइशें दिल में दबी उसके
पंख फड़फड़ाते तो है
पर वो उड़ान नहीं भर पाती है
बीज बोती है कामयाबी के परचम लहराने को
पर ये क्या फसल हरी होते ही
चिड़िया खेत चुग जाती हैपहनती है सुहाग किसी और के नाम का
कुत्सित रूढ़ियों बेड़ियों में
तब वो जकड जाती है
डरती भी है लड़ती भी
कभी बहुत झल्लाती है
अंत में खुद को ही समझा
अपनी अधूरी हसरतों को
दिल में दबा जाती है
ये समाज है बातें तो
नारी उत्थान की करता है
फिर क्यों वो आगे बढ़ने से रुक जाती हैक्यों बेचारी का दर्ज़ा दे देते है उसको
जब वो अकेली हर बोझ उठा जाती है
कमज़ोर नहीं लाचार नहीं
शक्ति है समझो उसको भी
हसरतें उसमें भी है
वो भी परचम लहरा सकती है
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
कविता
ज़िन्दगी अबूझ पहेली सी है
कभी बहुत करीब एक सहेली सी
कुछ उठते सवाल उलझे से
नहीं मिलते जवाब सुलझे से
बड़ी शिद्दत से अगर खोजें तो
कुछ हल पाने में आसानी होगी
ज़्यादा बुद्धिमत्ता समझने की इसको
शायद बिलकुल बेमानी होगी
चक्रव्यूह ये भेदना आसान नहीं
अथक संयम भी बरतना होगा
हर इम्तिहान का फल चखना होगा
खुली आँखों से परखना भी होगा
तभी परिपक्वता का विस्तार होगा
तेरी शख्शियत में फिर निखार होगा
©अनीता शर्मा
अभिव्यक़्ति बस दिल से -
Shayari
आँखों की नमी देखकर हम,
नज़रें उनसे चुराने लगे,
वो फिर से कही रो ना दें,
हम खुल कर मुस्कुराने लगे
©अनीता शर्मा
अभिव्यक़्ति बस दिल से -
सावन का उत्सव
इस काँच में कहाँ से आई दरारें?
उस रात जब जोर से आँधी आई थी
तब खिड़कियाँ आपस में गले थी।
और चीख-चीख कर
अपने मिलन की खुशी
प्रकट कर रही थी और
सावन के आगमन का
उत्सव मना रही थी।
शायद उसी रात, उसी बरसात में
इन खिड़कियों के काँच में आ गई थीं दरारें। -
कलियों से सौंदर्य
बताओ ना! तुमने यह नूर कहाँ से पाया है?
फूलों से रंगत चुराई,
या फिर कलियों से नूर पाया है।
बताओ ना! तुमने यह नूर कहाँ से पाया है?
तितलियों से ली शरारत
या भंवरों से यह गुर पाया है।
बताओ ना! तुमने यह नूर कहाँ से पाया है?
शाखों से या पत्तियों से लचक पाई है
बताओ ना! तुम्हारे अंदर
यह अनुपम छटा कहाँ से आई है?
जो मेरी जान पर बन आई है।
बताओ ना! तुमने यह सौंदर्य कहाँ से पाया है?
फूलों से ली रंगत, या कलियों से नूर चुराया है।
बताओ ना तुमने यह सौंदर्य कहाँ से पाया है? -
सावन में…
सावन की एक-एक बूंद
कैसा एहसास दिलाती है?
कोपलें भी फूटते लगती हैं….
पत्तियां नाचती हैं सावन में
और पुष्प आपस में
सौंदर्य की बातें करते हैं
सब मगन होते हैं सावन में….
जब बरसात होती है
और सभी के घर, गलियां
उपवन, बरसात में भीगते हैं….
मन मयूर-सा नाच उठता है
और गुनगुनाता है कोई-साज….
मेरा मन भी याद करता है
तुम्हारे साथ बिताए गए
पलों को सावन में…. -
हम स्कूल चलेंगे
शीर्षक:- ‘हम स्कूल चलेंगे’
हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेँगे,
सीखेंगे अच्छी बातें और पायेंगे ज्ञान,
पढ़ लिखकर हम बनेंगे अच्छे और महान,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
प्रार्थना सभा में मिल गाएंगे राष्ट्रीय गान,
सबको बतायेंगे कि है मेरा भारत देश महान,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
पढ़ेंगे हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत और विज्ञान,
पायेंगे गुरूजन से गणित का सारा ज्ञान,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
हम प्रेम और भाईचारे से रहना सीखेंगे,
भूल से भी आपस में न हम कभी लड़ेंगे,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।।रचनाकार:-
अभिषेक शुक्ला (सहायक अध्यापक)
प्राथमिक विद्यालय लदपुरा
जिला- पीलीभीत
उत्तर प्रदेश -
उड़ जा रे पंछी
उड़ जा रे पंछी ख़ुशी से
उस असीमित गगन में
क्या सोचता है बैठ कर
फिर कैद की फिराक में
जल्दी से छोड़ दे ये बसेरा
कहीं और जाकर खोज ले
यहाँ पिंजरे है तेरी ताक में
आज तुझको समझा हूँ मैं
जब खुद को कैद में पाया
नहीं कुछ भाता है ऐसे में
क्या धूप हो या हो छाया
पंखों को फैलाकर अपने
खूब लम्बी उड़ान भरना
आँधी जो रोके राह तेरी
पल भर को तू न डरना
उड़ जा रे पंछी ख़ुशी से
उस असीमित गगन में
©अनीता शर्मा
अभिव्यक़्ति बस दिल से -
सीख मोमबत्ती की
जलते ही रोशनी फैलाती है,
मोमबत्ती भी सीख दे जाती है,
हम मानस पुतलों की तरह
इक तालमेल बैठाती है
व्यक्तित्व छोटा हो या बड़ा,
महक भी चाहे हो जुदा,
लेकिन कार्य पृथक नहीं इनका,
दोनों का काम है जलना
शायद किसी दौड़ में नहीं ये शामिल,
ना चाह में,एक दूसरे को परखना
क्यों किस्मत दोनों ने एक ही पायी
नियति में लिखा इनके है जलना,
बस इसी तरह तुमको हमको,
एक सांचे में मिलकर ढलना!
सोचो भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में
कब जाने,क्या कहाँ छूट जाए ?
प्रतिस्पर्धा से अब परे हटकर
ज़रा शुरू करो मिलना जुलना
क्यूंकि ज़िन्दगी का है यही फलसफा
जब तक जीना तब तक जलना
©अनीता शर्मा
अभिव्यक़्ति बस दिल से -
कविता
तुम्हे दूर जाना था,
तो पास आये ही क्योंवादों से मुकर जाना था,
तो सब्ज़ बाग़ दिखाए क्यूँमेरी फितरत में नहीं शामिल
बेवज़ह रिश्तों को तोड़ देनापर तुम खुदगर्ज़ निकले तो
फिर हम रिश्ते निभाए क्यूँ
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
कविता
सिर्फ तुकबंदी नहीं कविता कोई
यह तो ह्रदय से उपजता बोल है,
दर्द का साक्षात अनुभव है यही
प्रेम, करुणा, स्नेह मिश्रित घोल है,डॉ सतीश पांडेय, चम्पावत
उत्तराखंड -
बंद खिड़की
तलबगार है ये बंद खिड़की
उस शख्श के दीदार की
जो वादा करके गया आने का
अब हद्द हो चुकी इंतज़ार कीगुज़रती हैं जब भी हवाएं यहाँ से
दर्द की आहट उठ जाती है
चरमराती कराहती हैं बहुत
ये खिड़की बहुत चिल्लाती हैजाम से चुके कब्जे इसके
झुँझलाते किटकिटाते से
उन यादों के झरोखों से
तेरी कोई हूक सी उठ जाती हैआजा की रंग फीके न हो जाएँ
खुलने को आज भी बेताब ये खिड़की
रोशनी भी गुज़रने नहीं देती
कैसी ज़िद पर अड़ी है ये खिड़कीकब आकर खटखटाओगे
कब फिर सतरंगी सपने सजाओगे
आजाओ की आस में परेशान
तलबगार तेरी ये बंद खिड़की
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
मनमोहिनी
मेरी कल्पना में कहीं जो बसी है वो
मदमस्त थिरकती जो अपनी ही धुन में ,
फूलों सी महकती हर अदा में अभिव्यक्ति
मोहपाश में बांधे वो कजरारी निगाहें ,
हाँ तुम वही मेरी प्रियवंदिनी हो ,
हाँ तुम वही मेरी मनमोहिनी हो
क्या सुन्दर भंगिमाएं सभी तुम्हारी
हर सुर ताल पर ऐसे बन रही हैं
पुलकित मयूर नाच उठा हो कहीं जैसे
प्रेम रस ऐसे बरसा रही हो
हाँ तुम वही मेरी मनभावनी हो
हाँ तुम वही मेरी मनमोहिनी हो
वो ढ़ोल की हर थाप पर
हौले हौले से जब पग रखती हो
मतवाली उस चाल से अपनी
रग रग में प्राण भरती हो
हाँ तुम वही मेरी संजीवनी हो
हाँ तुम वही मेरी मनमोहिनी हो
वो कोमल हाथों से भाव व्यक्त करना
करती हो नयी उमंग का संचार
मन आनंदित हो झूम उठता है जैसे
पड़ने लगी हो सावन की फुहार
हाँ तुम मेरी कमलनयनी हो
हाँ तुम मेरी मनमोहिनी हो
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
बारिश
मौसम ए साजिश का है,
ये मौसम बारिश का है,
किसी को इंतज़ार रहता है,
बारिश में भीगने का,
एहसास,अच्छा होता है।
हवाओं में वो सुकून होता है,
ये मुहब्बत का सुरूर होता है।
दिल ये मगरूर होता है,
आशिकों का नूर होता है,
ख्वाबों का जुनून होता है।
जब मौसम बारिश का होता है.
मन में बहार होता है,
खेत में अनाज होता है,
बारिश में जो हाल होता है,
सबको वो याद होता है।
दिल में एक सवाल होता है,
कि कैसे ये बरसात होता है। -
वृद्धाश्रम
ओ माँ कितनो को तुझ पर
कविताएं पढ़ते देखा है
तेरी तारीफों में कितने कसीदे गढ़ते देखा है,
कितनो को शब्दोँ से सिर्फ तुझपर प्यार लुटाते देखा है,
कितना इस दुनिया को तेरी ममता का पाठ सुनाते देखा है,
देखा है पर कुछ ऐसा भी जिसके लिए मिलते शब्द नहीं,
मायूसी सी छा जाती है दिल में जग जाते दर्द कहीं,
तू जिसके लिए सब कुछ थी कल तो,
क्यों फिर अब तेरा कोई वजूद नहीं,
कितनी कद्र है तेरी, तेरा ही भविष्य तुझे बताता है,
कैसे एक एक करके सारे हिसाब गिनाता है,
मुड़ कर क्यों नहीं देख पाता वो,
तेरे चेहरे पर छुपी वो मायूसी,
तेरी मुस्कराहट में पीछे भी कितनी है बेबसी,
क्यों याद नहीं कुछ उसको कैसे तू रात भर न सोती थी,
कैसी भी उलझन हो तुझको,तू कभी नहीं रोती थी,
क्या दर्द सहकर तूने उसकेअस्तित्व को सँवारा है,
क्यों आँखों में तू चुभती है जब वो तेरी आँखों का तारा है ,
जिस घर को तूने तिनकों से जोड़ा!
और सुन्दर महल बनाया था,
क्यों आज उसी घर में तेरा होना खटकते देखा है,
जिन हाथों से तूने दिन भर उसकी भूख को मिटाया था,
उन काँपते हाथों को भी मैंने उसको झटकते देखा है,
कितना दर्द तेरी इन बिलखती आँखों में उठते देखा है,
ढलती हुई उम्र की इन कोमल सलवटों को उभरते देखा है,
ओ माँ तेरे हालातों से मैंने पर्दा उठते देखा है ,
तेरी मज़बूर निग़ाहों में तेरी आस को मरते देखा है
ओ माँ कितनो को तुझ पर कविताएं पढ़ते देखा है ,
तेरी तारीफों में कितने कसीदे गढ़ते देखा है!
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
सुप्रभात
फिर हुआ नई सुबह का आगाज़ है
नया दिन नयी उम्मीदों का राज है
चहचहाते पंछियों की गूंजती आवाज़ है
सरसराती सुबह की ठंडी बयार है
उस पर पड़ती सावन की फुहार है
हर तरफ सुहावने मौसम का राज़ है
ये चमकती किरणे पुकारती हैं सबको
जागो उठो खुल कर मुस्कुराओ
स्वागत करो दोनों बाहें फैलाकर
तुम्हारे सामने खड़ा तुम्हारा आज है
सुप्रभात
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
प्रेम
इस भरी बरसात में सब धुल गई
बाहरी पर्तें मेरे व्यवहार की,
अब छुपाऊँ किस तरह से झुर्रियां
जो मेरी असली उमर दर्शा रही।खोट है मेरी नियत में आज भी
आप करते हो भरोसा इस कदर
सच समझते हो मेरे हर झूठ को
प्रेम करते हो भला क्यों इस तरह।— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत
उत्तराखंड -
कभी तो बेवजह मुस्कुराओ
खुशियों को आने का मौका दो
कभी तो बेवजह मुस्कुराओयक़ीनन बहारें लौट आएँगी
तुम ज़रा धीमे से खिलखिलाओ
ढलती उम्र सी हर पल ये ज़िन्दगी
ज़र्रा ज़र्रा हाथ से फिसलती है ज़िन्दगी
सोचते क्यों हो मुस्कान के लिए
ये तो सुकून देगी यूँ विराम ना लगाओ
खुशियों को आने का मौका तो दो
बस कभी बेवजह ही मुस्कुराओमत चूकना किसी के होठों पर मुस्कान देने को
ज़िद छोड़कर अहम् तोड़कर
सबको गले लगाओ
वक़्त ठहरता नहीं किसी के लिए
तुम खुशनसीब होगे गर वक़्त पर
किसी के काम आओ
खुशियों को आने का मौका भी दो
कभी तो ज़रा बेवजह मुस्कुराओ
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
शुभचिँतक- कविता
वो सब्र का पाठ तो पढ़ाते थे
बेसब्र ना हो,सब ठीक होगा !
फिर इम्तिहानों के दलदल में
खुद बेसब्र हो,अकेला छोड़ जाते थे!
हालातों से लड़ते हम वहीँ के वहीँ रह जाते थे!वो आकर अक्सर,हमको ढाँढस बंधाते थे
दर्द को सहन करो सब ठीक ही होगा !
फिर वैसे ही ज़ख्मों को कुरेदकर
नमक छिड़कते चले जाते थे
ज़ुल्म सहन करते हम वहीँ के वहीँ रह जाते थे!वो आते,आकर बड़ी हिम्मत दे जाते थे,
मज़बूती से आगे बढ़ो सब ठीक होगा!
और फिर उन हालातों से पीछा छुड़ा
घबराकर उलटे पाँव लौट जाते थे
वाह रे शुभचिंतक!हम तो वहीं रह जाते थे !खीज़ कर एक दिन हम बुदबुदा ही उठे,
झल्लाकर सवाल कुछ कर ही बैठे
क्यों चले आते हो चिंतन करने
जब दर्द का मेरे एहसास नहीं
भले का जामा पहन,बनते हो शुभचिँतक
पर किंचित चिंता स्वीकार नहींजब मेरी ही लड़ाई और है मेरा संघर्ष
जिसे एकल दम पर मैंने है भोगा
तुम्हारी हमदर्दी की ज़रूरत नहीं
नहीं चाहिए अपनेपन सा धोखा
ठीक होगा या नहीं,इसमें हमको अब पड़ना नहीं
और हाँ आकर ये भी कहने की ज़रूरत नहीं
सब ठीक होगा……..सब ठीक होगा
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
Shayari
खौफ खातीं है सर्द मौसम की हवाएं भी मुझसे
सीने में दहकते सूरज सी जिंदादिली रखती हूँ
हौसला परवान पर है उम्र हारी है ढलती उम्र है तो क्या
जज़्बा ज़िन्दगी जीने का, खुद के दम पर रखती हूँ
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
ज़िन्दगी की किताब
गहनता से लिख रही हूँ मैं
लफ्ज़ कम लगते हैं
गर लिखने बैठो
ज़िन्दगी की किताब
चंद लम्हे फुर्सत मिली
बाकी रहा ज़िम्मेदारियों का दबाव
यादों को तक सँजो ना सके
रखते रहे पल पल का हिसाब
बड़ा कठिन है ज़िन्दगी में
उसूलों पर चलना
वक़्त के साथ सलीके में रहना
कभी तो बड़ा दर्द देता है
भावनाओं का बिखरना
बैचैन किये रहता है इनका
सुख दुःख में बँट जाना
उलझने फँसाती जातीं हैं बेहिसाब
अंदाज ए ज़िन्दगी बड़ा लाजवाब
काश कभी कोई इतना ही समझ जाए
नासूर बन जाते है छोटे छोटे दर्द
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
Shayari
कितनी रातें गुज़र जाती हैं
नींद आये तो भी आंखें सोती नहीं
ज़हन में ख्याल तेरा
नज़र में इंतज़ार
पलकें भीगती हैं पर
आँख रोती नहीं
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
स्वप्न या भ्रम – कविता
हर रोज़ पहुँच जाती हूँ
उस श्वेत निर्मल घरोंदे में
न जाने किस जन्म की कहानी
शायद कैद है उन दीवारों में
जहाँ पहुँच कर अतीत के पन्ने
करवटों की तरह बदलते है
शीतल पवन निर्मल सी बहती है
पुकारती हो जैसे मेरी पहचान को
वो बयार कुछ फुसफुसाती है
जैसे अतरंगता मेरे प्रेम की
बयान करके चली जाती हैं
कोई याद मेरे पूर्वजन्म की
सिमटी है उन गलियारों में
क्या कोई रूहानी ताकत
मुझको बार बार बुलाती है
क्या अतीत था मुझसे जुड़ा
या प्रेम था कोई अधूरा सा
भ्रम के मायाजाल में
शायद बसी ये नगरी
जो तड़प मुझमें जगाती है
बरबस खींचती हुई अपनी ओर
नींद के आगोश में ले जाती है
कोई तो है जो मुझे बुलाता है
क्यों बार बार ये सुन्दर महल
मेरे सपनो में आता जाता है
भटकती हूँ ढूंढ़ती हूँ
इंतज़ार करती हूँ रोज़
कोई तो हल निकले
मेरे सवालों के घेरे को तोड़कर
मेरा हमसफ़र कोई हो तो निकले
क्यामेरे अंतर्मन में द्वंद सा है
कुछ तो जानू क्या मेरे वजूद से जुड़ा
वो सपना है या कोई भ्रम मेरा
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
ना…री – कविता
ना…री तू बिलखना नहीं
किसी सहारे को अब तरसना नहींतू स्वयंसिद्ध और बलवान है
नहीं महत्वहीन तू खुद सबकी पहचान हैसशक्त है तू नाहक ही छवि तेरी कमज़ोर है
पर तेरे जोश का हर कोई सानी हैसबल ममतामयी गुण तुझमें
चेहरा अद्भुत जैसे माँ शक्ति भवानी हैआदिकाल से तू है इतिहास रचयिता
हर जीत में भी सहभागी हैपरचम लहराए हैं तूने भी
अनमोल बड़ी तू अति प्रभावशाली हैतेरी क्षमता का जिनको ज्ञान नहीं
वो भी इक दिन नतमस्तक होगाये सुन्दर सृष्टि के सृजन का सपना
आज नहीं तो कल पूरा होगा
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
विजयी भव
मुश्किलें किसके जीवन में नहीं आतीं
ये दृढ़ता से समझना होगा
खुद की कोशिश नाकाम नहीं होतीं
विजय पथ पर खुद अग्रसर होना होगा
जब कोई अपने हिसाब से लड़ता जाता है
कुछ बेख़ौफ़ बढ़ते रहते हैं
कुछ थक हार मान लेते हैं
कुछ सहारों की तलाश करते हैं
कुछ टूट कर बिखर जाते हैं
मुश्किलों का अफ़सोस न करना
ये तो ज़िन्दगी का अबूझ हिस्सा है
अगर मगर में क्या बंधक होना
हर सफलता से जुड़ा एक कठिन किस्सा है
आसमाँ की लगन गर लगी है तो
ज़मीन से जुड़कर रहना होगा
कर्म को बली करो,भेद लो चक्रव्यूह
उस जीत का फिर,क्या कहना होगा
©अनीता शर्मा
अभिव्यक़्ति बस दिल से -
कुछ अनकही – कविता
वो प्रीत के मनोरम स्वर्णिम पल
दफ़न क्यों हुए चारदीवारी में,
वो जुड़ रही थी या टूट रही थी
जलते से या बुझते अरमानों में,
वो प्रेम या वेदना के पल कहूं
या तार तार हुआ सपनो का महल
कौन देगा उस दुःख को गठरी का हिसाब
जो करुण क्रंदन करती ये चौखट बेहिसाब
गवाह तो सब है गुजरती है वो किस पीड़ा से
ये चरमराते द्वार ये खटखटाती खिड़कियाँ
ये सीलन मैं उखड़ती दरो दीवार
क्या उकेरूँ शब्दों मैं उसकी छुपी दास्ताँ को
कैसे लिखूं वो जर्जर अनुवाद
लड़खड़ाती जुबां से कराहती
आह सी वो आवाज़
कैसे सुनूं कष्टप्रद रूंधते गले की पुकार
समेटना तो चाहती हूँ उसके दर्द को अपने अंदर
क्यूंकि स्त्री हूँ स्त्री की वेदना को पढ़ सकती हूँ
शायद बन सकूं मैं उसकी आवाज़
लेकिन ये क्या बढ़ते उजाले के साथ
फिर वो तैयार है एक नवेली दुल्हन की तरह
भूलकर अपने ज़ख्मो के दर्द
और आंसुओं का उमड़ता सैलाब
वाह! गज़ब है ये रचना स्त्री रूप में
सहती कितनी यातना दुःख और अपमान
फिर भी मुस्कुराती उजली सुबह सी
छाप लिए कलंकिनी की वो हरपल
लेकिन उसी धुरी पर घूमती तत्पर है जैसे
बनने को अपने उसी कुनबे की पहचान
©अनीता शर्मा
अभिव्यक्ति बस दिल से -
चित्र
साँझ हो रही है,
ऊंचे पहाड़ों के शिखर
बादलों से आलिंगन कर रहे हैं।
साफ साफ कुछ नहीं दिख रहा है,
परस्पर प्रेम है
या
बस दिखावा है।
जो भी है
कुछ तो घटित हो रहा है वास्तव में।
अंधेरा होगा तभी सुबह फिर उजाला होगा।
अब
रात भर चोटियों में
फुहारें बरसनी ही हैं।
फुहारें वहाँ बरसेंगी
मन हमारा रोमांचित है।
लेकिन चोटियों पर खड़े वे पेड़
शान्त क्यों हैं,
जिन्हें सबसे पहले बादलों का स्पर्श करना है।
— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड। -
इतना चाहती हूँ
इतना चाहती हूँ
इतना ना इतराया करो,बेरूखी में, ना दिन जाया करो
यूँ दूर ना मुझसे रहो,बुलाने से पहले आ जाया करो
क्यू खामोश हो या खुद में ही मदहोश हो
चुप हो ऐसे तुम जैसे मुझमें ही कोई दोष
यूँ ना रहो, खुलकर जो भी हो, बताया करो
इतना ना इतराया——
दिन हो या रात खुद में मशगूल हो
समय पे काम देने को सबमें मशहूर हो
मेरी भी पीङा ,यूँ ना मेरी बढाया करो
इतना ना इतराया——–
कभी-कभी मेरे किए गए कामों की
मेरे कपङो,मेरी कहीं गयी बातों की
मेरी,मेरी रचनाओ की अच्छाई बताया करो
इतना ना इतराया——-
नुक्श मुझमें निकाला करते हो रोजाना
दाल गाढ़ी नमक कम,कह कर देते हो बेगाना
कभी फीकी चाय को भी मीठा बताया करो
इतना ना इतराया———
सबमें अच्छाइया ढूंढा करते हो अकसर
तरफदारी करते हो उनकी चाहे आए हो थककर
कभी मेरी खामियां मुझसे भी मुझसे छिपाया करो
इतना ना इतराया———–
ख्याल रखते हो, घर में क्या है क्या नहीं
पूछते हो सबकी कौन आया, कौन आया नहीं
कभी मेरी इच्छाओं को भी समझ जाया करो
इतना ना इतराया————
हर बात को कहाँ कब कैसे बताया करूँ
अपने दर्द को,बता दो, कैसे छिपाया करूँ
कभी बताने से पहले खुद ही समझ जाया करो
इतना ना इतराया———