वो कोई सुखद घटना ही नहीं, मानो सुखों का वरदान था मेरे लिए। उसका आना, हृदय का आह्लादित हो जाना , मेरे आंगन की मुस्कुराहट सी, कुदरत की बनावट सी, मानो खुशियों का भण्डार था […]
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वो कोई सुखद घटना ही नहीं, मानो सुखों का वरदान था मेरे लिए। उसका आना, हृदय का आह्लादित हो जाना , मेरे आंगन की मुस्कुराहट सी, कुदरत की बनावट सी, मानो खुशियों का भण्डार था […]
गरीब गरीब रह गया, सेठ सौ गुना सेठ। खाई सा अंतर हुआ, भूख बराबर पेट।।1 गरीबों के उत्थान की, बनी योजना लाख। कागज में पूरी हुई, उस तक पंहुची खाक।।2 —– सतीश पाण्डेय
.एहसास खोज कर रही हूं, जिंदगी कही चली गयी है । कुछ कहा भी नही, कोई संदेश नही, कुछ पता नहीं, नहीं तो मै रुठने ही नहीं देती। ले जाती उसे बाग में,मॉल मे,किसीं झिल […]
“क्योंकि मैं इंसान हूं ” इंसानियत है मेरे अंदर, क्योकि मैं इंसान हूं । धर्म है मेरे में मानवता का; और बंधन भी है , नैतिकता का अंदर; क्योंकि मैं इंसान हूं। अगर मैं मान […]
हर जीव को जीने का हक़ है, जीवों ने डाली है अर्जी कुदरत ने अपील सुनी है, अब ना चले बस, मानव की मर्ज़ी क्षुधा मिटाने की खातिर, निर्दोषों को है मारा, कैसा है शैतान […]
मन किसी सूखी नदी सा हो रहा आप कहती हो कि बारिश आ गई, जो ये छींटे पड़ रहे हैं उनसे बस एक सूनापन सा मन में गड रहा, कब तलक यूँ ही घिरेगा आसमाँ […]
कितने बदल गये है इंसान। बेच कर अपना ईमान।। सच्चाई से कोस दूर भागे। झूठ के बीज बोये बेईमान।। बुरी नजर वाले का मुंह है गोरा। नेकी करने वाले को बना दिए हैवान।। झूठ के […]
मत उछालो मेरे ज़हन को; मत उछालो मेरे ज़हन को, खिलौना समझ कर, मेरा मिजाज कुछ कोयले सा है! कब लपट बनजाए कुछ पता नहीं।
दु:शासन दुर्योधन की जोङी कबतक गुल खिलाएगी एक दिन चौसर की गोटी खुद उनको नाच नचाएगी — दिन बदलते ही जिनकी फितरत बदले थोड़ी सी भी लाज नहीं,पलपल जिनकी हसरत बदले लाभहानि के सौदे पे […]
हम क्या हमारा व्यक्तित्व क्या। अनन्त ब्रह्माण्ड के प्रान्गन में , हम क्या हमारा अस्तित्व क्या । कब किसके गर्भ में, कैसे कौन पनप रहा कैसे कब कौन-सा किसका सुमन कहाँ किस उपवन में महक […]
जहां हवाएं पल-पल बनाएं एक नई तस्वीर उसी आकाश में लिखना चाहूं मैं अपनी तकदीर नन्ही बूंदे नई किरण संग बना रही रंगोली मैं भी सुख के मोती ले लूं फैलाकर अपनी झोली अपने हृदय […]
मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को उनकी सेवा में खुद को लगा ले, यह तो मौका मिला है तुझे आज मौके का फायदा उठा ले। एक दिन सबने माटी में घुल के शून्यता में समाना है […]
#इंसान हूं मगर ,काल्पनिक सा” जैसे पशु और पक्षियों का अपना वर्ण और रूप होता है , वैसे ही मैंने जन्म लिया ; इंसान के रूप में। पर ये क्या हुआ, मैं इंसान तो था […]
ना रुकेगा ये वक्त ना जमाना बदलेगा सुख जायगा जब पेड़ तो ये परिंदा ठिकाना बदलेगा – हिमांशु ओझा
आत्महत्या न कर जिन्दगी को बचा, कोई दुख तेरे जीवन ज्यादा नहीं। देख चारों तरफ जो घटित हो रहा ढूंढ खुशियां उसी में, दुखों को नहीं। दुःख तो आते रहेंगे जाते रहेंगे। तेरा आना न […]
मैं दिल की जज़्बात लिखूँ। चाहता हूँ एक नात लिखूँ।। मंदिर और मस्जिद में ढूँढ़ा ढूँढ़ा काबा -काशी में। गंगा और यमुना में ढूँढा ढूँढा जलनिधि राशी में। मिला नहीं जो मुझको उसकी क्या मैं […]
प्रगति पथ पर दौङ लगाए चलो नव कृतिमान बनाए। पग- पग पर आने वाली बाधाओं से हंसकर अपनी पहचान बनाए।। चाहे जितनी डगर कठिन हो पर अपना विश्वास अडिग हो परिश्रम की मिठास की खबर […]
रात भर दीपक जला, भोर होने लगी तो बोला,”अब मैं चला” मैंने कहा और जलो, अभी अंधियारा बाकी है, “मेरी भी एक सीमा है”, कह कर वो मुस्कुराया उसकी अर्थपूर्ण मुस्कुराहट में, एक संदेशा मैंने […]
मेरे आशिक ,तूने मुझे पुकारा! तो मैं जरूर आजाऊंगी, किसी के पास देर से आती हूं , किसी के पास जल्दी से आती हूं, तुमने ललकारा है तो क्षण में आ जाऊंगी । तू कर […]
जुदाई का दर्द कांटों से ही प्रेम हो गया ,कलियां दिल में चुभती है दर्द भारी यादों में तेरी मेरी अखियां जगती हैं ज्यादा जुल्म किया फूलों ने कांटे बस बदनाम हुए जो चुभते रहते […]
“रोटी का टूक” वह रो रहा था, सुबक-सुबक कर हाथों से छाती ,पटक-पटक कर आंखें हैं लाल ,पसीने से बुरा हाल सामने पड़ी दो लाशें, कहने को शरीर ,पर दिखने में कंकाल ! वीडियो बना […]
इस महामारी में हजारों लोग काल का ग्रास बन गए, कई परिवारों के कमाऊ लोग चल बसे, विलीन हो गए, झकझोर दिया है आर्थिक स्थिति को, बेरोजगार कर दिया है हजारों लाखों युवाओं को, सपने […]
मुझे तेरी हथेली पर जिगर की बात लिखने दे तुझे लव की कसम है आज सारी रात लिखने दे लिहाजा आप मुझसे हो खफा एहसास है लेकिन मिला जो आपसे मुझको वही सौगात लिखने दे। […]
छाती चौड़ी की सिगरेट जलाई, सोचता है इसे पी रहा हूँ। तू नहीं पी रहा इसको प्यारे यह धुंआ तो मजे से तुझे पी रहा। —– डॉ0 सतीश पाण्डेय
कविता- सदा बहार के जंगल पैर रख कर सिर पर किसी के , चढ़ जाओगे ऊंचाइयों पर जरूर गिरोगे जब जमीन पर ही मगर | सिर की जगह कंधा का सहारा लिया होता गिरते गर […]
कुछ लोग हमारी संस्कृति को पिछड़ेपन का नाम देते हैं। हंस के पश्चिमी संस्कृति की उतरन थाम लेते हैं ।। घर हो या सङक शालीनता हो अपनी झलक नकल किसी और की क्यूँ करे, स्वसंस्कृति […]
कविता इक खूब नहाती दिखी, कुछ मधुर, पंक्ति गाती दिखी , “छटा घन घोर ,मन बड़ा हर्षाया , यूं तो कविता में कागज में ही रही, लिखे जब तुमने प्रेम के दो बोल, आंखों से […]
जो है बात दिल में , वो लब पे आए । चिट्ठी सा बन कर , उस तक पहुंच जाए, हाले दिल को ; शब्द जाल से , कुछ कहकर बतलाना है ; शायरी तो बहाना […]
मौसम सुहाना सावन का आया, संग अपने उत्सवों का पिटारा लाया ठंडी ठंडी ये बहती पवन, बागों में खिले हैं कितने सुमन आए जब बरखा की फुहार, पिया भी करे हैं मनुहार अंगना में भीगे […]
चलो फिर से कुरेदते है बीती सुध को, चंद निमेषों को, अनुराग भरें संदेशों को, चलो फिर से कुरेदते है। क्या अनुपम वेला! आह्लादों का मैला! प्रेम-क्रीडा से; मैं था खेला, गुजरे वक्त की किताबो […]
हिन्दी सावन शिव भजन 20 – गाता है जग सारा | चम चम माथे चमके चन्दा बहे जटा बीच गंगा धारा | शिव शंकर की महिमा गाता है जग सारा | मृग की छाला पहन […]
तुम्हारे हुस्न के मुट्ठीगंज में फंसकर इश्क़ अरैल घाट में डूब जाता है। दिल धड़कता था सिविल लाइन सा, अब यादों का कंपनी बाग बन जाता है।। ~सुरेंद्र जायसवाल (प्रतापगढ़)
न तुमने देखे न मैंने देखा। बहते पवन को किसने देखा? जुल्फ चुनरिया उड़ते जब जब। बहती हवाएँ समझो तब तब।। बादलों को जो चलते देखा। बहते पवन को उसने देखा।। न तुमने देखे न […]
तालाब!! तू परेशान मत हो तेरी एक दो मछलियों की फितरत होती ही ऐसी है कि किसी नयी मछली के आने पर मचल उठती हैं ईर्ष्या से, उन्हें लगता है कहीं ताज न छीन जाए […]
” बुढ़ापे का अकेलापन ” बहुत ही मुसीबतों के दौर से गुजरा है,ये जीवन पर किसे समझाऊं ? कैसे समझाऊं? और क्यो समझाऊं! जब कोई समझता ही नहीं है। अपनों के दुख से; दर्द […]
सफलता क्या है सफलता गरीबी से अमीरी की ओर हार से जीत की यात्रा कांटो से फूलों तक की यात्रा या….आलिशान घर,बड़ी गाड़ी, और नौकर चाकर, खुली आंखों से देखे सपनों का खुशनुमा अंत। सफलता […]
ए वक्त तू गवाह है मेरा, तू बात, बता क्या थी हम बिछड़ गए, मेरी खता क्या थी हजारों बंदिशें भी थीं,हजारों मिन्नतें भी की समझा ना ये ज़माना ,ये बात पता क्या थी वो […]
रिमझिम बरसे सावन सजना। झूले लगे हैं मोरे अंगना।। सब सखियों के आए सजना। क्यों है सूना मेरा अंगना।। आजा अंगना के भाग जगा दे। बमल मोहे झूला झूला दे़……बलम मोहे झूला झूलादे।। लहगा चुनरी […]
हालात दुख देते हैं। हां नहीं निभा पाया मैं वो वादें, तुम्हें खुश रखने के वो इरादे, याद है मुझे। बहुत हालातों से की मैंने बंदगी, मगर दुश्मन है ये जिंदगी! जो चाहूं, वो कर […]
काली जुल्फे सवारे काला लाए अंधियारे मिले कितहु ना चेन बढ़ रही बिरहा रे काहे रूप को सवारू नैन काजल क्यों बारू रंग तेरा भी तो काला तो क्यों अपना निखारू नैन कोमल है मेरे […]
दिल में लगा एक घाव हो गया हर प्रश्न का जवाब हो गया हमे पता ना चला शायद हमे भी उनसे लगाव हो गया ! देर तक सोते थे अब खुली आँखों का ख्वाब हो […]
चलो आज खुद के लिए वक्त की तलाश करते हैं । हर जख्म को अलफाजो से ढक दुख दर्द को किसी दरिया में रख खुद को तराशने की खातिर खुद पर एक सरसरी नजर डालते […]
भोजपुरी सावन शिव भजन 19 – दरबार रे ननदी | जोहत रहली हम सावन के फुहार रे ननदी | चला चली देवघर के दरबार रे ननदी | अबले ना अइले सइया लोक डाउन लगी गईल […]
अनिश्चितता के सवालों में है मानव पङा कैसी होगी जिन्दगी, सुलसा भांति मुँह बाए खङा । कल की जिन्दगी का नहीं जन को पता खता क्या हुई हम से,मेरे रब जरा तुम तो बता जीवन […]
बर्फ के टुकड़े सा है ये प्यार, दगा का सूरज कब पींघला दे, पता नहीं चलता। वक्त बदले या ना बदले, इंसान कब बदल जाए, पता नहीं चलता। अनजान चहरे समझ लेते हैं हमें ; […]
“सावन” पर मुझे मिले, कुछ अनदेखे, अनजाने दोस्त जिनकी समीक्षा पाने की, प्रतीक्षा रहती है हर रोज़ लेखन की इस नगरी में, स्वागत करते हैं सबका शत शत नमन है उन मित्रों को,🙏 मेरा भी […]
मजदूर हूं मैं जरूरत तो पड़ेगी मेरी , क्योंकि मैं निर्माता हूं । माना झोली खाली है मेरी, मजदूरी करके खाता हूं। बहा कर खून-पसीना ; खुशहाल देश बनाता हूं। पूछो उन दीवारों से, भवनों […]
अपने खामोश लबों को कुछ शरारत तो दे दो। मुझे बात करने की थोड़ी इजाजत तो दे दो।।
दुनिया देखूं या खुद को देखूं , ये कैसी घड़ी आई हैं सब कुछ होकर भी हम अकेले, यह कैसी तन्हाई हैं ख़ुद की इच्छा मार कर मैंने, जो दुनिया संग दोस्ती बड़ाई हैं आज […]
Someone, every moment, with a dagger in hand, Must have fear planted in mind’s land. Even after being struck by gusts of storms, Abode of my sentiments alters not in norms. There rests only one […]
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