संतान

माया को रचा हमने प्यार का दीप जलाया जिनका था सहारा हमें उन्हें ही किया बेसहारा गौ माता को पूजते तब तक जब तक अमृत…

बोच बसंत

गुमनामी में गुजर गयी जिंदगी फिर भी न शिकायत कभी की जिनके लिए जी तोड़ मेहनत की उनकी बेरुखी ही हरदम सही फिर भी उदासी…

बापू

मनुष्य कहां कोई सम्पूर्ण जनता की नजर में सब अपूर्ण दुनियां जिन्हें पूजती बारम्बार स्वदेश में उनके निंदक हजार तिनके की तरह ठुकराई सत्ता कभी…

बेटी

हर घर की खुशी व रौनक है बेटी उसी से दुनियां शुरू व खत्म होती किलकारी सब को हर्षा जाती हर मात पिता को ही…

नम्रता

नम्रता ही तो है आभूषण हर्षित करता है सबका मन जीवन में कोई अवरोध नहीं प्रगति भी रुकता है कहीं कर्महीन का सहारा भाग्य उत्साही…

निरंतर

दुख के क्षणों में जो शख्श ऊबता नहीं सुख के क्षणों में अपनो को भूलता नहीं पुरुषों में है सदियों से ही अज्ञानता गलत संगत…

संतान

हर संतान है विशेष यहां अवसर भी भरमार है मालिक की नई रचना पुराने से हमेशा खाश है फिर भी हर पिता को पुत्र में…

ऐतवार

समय के साथ समझ बदल जाती है चाहने वालों की चाहत बदल जाती है प्यार करने वाले गलतियां सहित अपनाते हैं भरोसा है जिसपर कभी…

परिभाषा

प्रेम की परिभाषा नहीं जानते वो ही बढ़ चढ़ इसे बखानते चाहतें जो रही कभी हमारी वही चाहत रही होगी तुम्हारी इसलिए कभी मैं ऊब…

बचपन

जीवन की अवस्था तीन सही बचपन का कोई जवाब नहीं आनंद भरा रहता तन मन पुलकित होता हरेक का संग शिशु मुख लगता प्यारा प्यारा…

पशुता

चीनियों को चीनी की बीमारी चींटी की तरह रेंगते रहते खाने तक की है अक्ल नहीं पशु खा पशुता ही प्राप्त कर रहे अंत करना…

अनिवार्यता

अध्य्यन-अध्यापन का बढ़ता व्यवसायीकरण राष्ट्र के पतन व जनता के घुटन का है कारण अत्याचार कोई जब हद से अधिक बढ़ जाता है प्रकृति तब…

जल-जीवन

जिंदगी को कहीं कैद कहीं आजाद देखा फिर भी न बदलता उसका स्वभाव देखा बुंद बनकर आसमां से लहराते आते देखा कयी बोझिल चेहरे को…

Kahte the log

समय नहीं समय नहीं यह कहते थे लोग, लगता था यह ज़िन्दगी बन गयी एक बोझ. जीवन यूँ ही काम करते हुए बीत जायेगा, अपना…

प्रकृति

प्रकृति की सुन्दरता इसलिए है कायम इसे कभी किसी से इश्क नहीं होता न ही ये कभी किसी के लिए रोता इसलिए शायद सबका प्यारा…

अक्सर

जीवनदायिनी चीजें ही तो अक्सर प्रचूरता में जिंदगानी ले लेती है अग्नि नित सब का चूल्हा चलाती भोजन को कितना मधुर बनाती अधिकता में स्वाद…

पृथ्वी

पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाकर प्रेम दिखाती है बिन मांगे अपनी झोली हमेशा ही भरा पाती है हर चीज समय से जुड़ी है प्रत्येक जगह…

प्रतिस्पर्धा

एक ही प्रतिस्पर्धा में अलग अलग स्वाद मिलते हैं इसी से पर मुश्किल से मंजिलों के ख्वाब पलते हैं लक्ष्य है निर्माण कि स्वतंत्रता सब…

आपदा

जब समझ न आता ऊंच नींच , अहंकारी हो जाता तन मन अग्रज हो की अनुज या पूज्य , व्यवहार सभी से होता सम निर्जीव…

दिल्ली

हॉस्पिटलों का शहर है दिल्ली फिर इतने बीमार क्यों जनसँख्या बिखरी हमारी इमारतों का वहीँ भंडार क्यों यात्रायें चलती रहती आवागमन कभी थमता नहीं आमदनी…

Kanhaiya

माखन निकाल रही यशोदा मैया ध्यान में है सिर्फ श्याम कन्हैया भूखे जब होंगे बाल गोपाल तब दूंगी उन्हें माखन निकाल अभी रख देती हूं…

माधव

माखन निकाल रही यशोदा मैया ध्यान में है सिर्फ श्याम कन्हैया भूखे जब होंगे बाल गोपाल तब दूंगी उन्हें माखन निकाल अभी रख देती हूं…

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