ज़िन्दगी से उम्मीद, कुछ ज्यादा ही सही,
‘सब-कुछ’ खोकर, “कुछ” पाने का इरादा ही सही;
.
मिलना, ना-मिलना तो, उस खुदा क हाथ में है,
तू मिलने का वादा तो कर, एक झूठा वादा ही सही !!……#अक्स
ज़िन्दगी से उम्मीद, कुछ ज्यादा ही सही,
‘सब-कुछ’ खोकर, “कुछ” पाने का इरादा ही सही;
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मिलना, ना-मिलना तो, उस खुदा क हाथ में है,
तू मिलने का वादा तो कर, एक झूठा वादा ही सही !!……#अक्स
हर कोई हमारे करीब आना चाहता है
मगर रिश्ता कोई नहीं निभाना चाहता है
चाहत तो हमारी बस सच्चे दिल की ही है
मगर झूठी दुनिया में सच कहां नजर आता है
मैं लिखता हूँ मोहब्त को …
मोहब्त की कलम से….
मैं भरता हूँ अपने ज़ख्मो को ..
उसकी यादों की मरहम से…
कुछ ही महफूज़ बची हैं , सांसे मेरी ….
मैं ज़ी रहा हूँ आज …
तो बस उसकी दुआओं के रहम से…
पंकजोम प्रेम
बरस ना जाये फिर नैना , तू दिल मे कैद कही वो अब्र कर ले..
तो क्या हुआ , अगर कुछ ख्वाईसे पूरी ना हुई तेरी ….
तू अधूरी ख्वाईसों संग पूरा ये सफ़र कर ले…
रिश्तो की रस्में दिल से निभा .
शामिल उनकी हर ख़बर में , अपनी ख़बर कर ले…
जीते ज़ी का हैं सब झमेला …
तू क़दरदान बन , सबकी कदर कर ले…..
खामोश लफ्ज़ो में छिपी हैँ एक ख़ुशी …..
तू वो ख़ुशी महसूस करने , थोड़ा सब्र कर ले…
आगे का सफ़र थोड़ा तन्हा कटेगा…
इत्मीनान से कटे , तो थोड़ी फ़िक्र कर ले…..
पता हैं क़ायनात को तेरे साग़र – ए – इश्क़ का …..
तू इज़हार करने , बेताब दिल की एक – एक लहर कर ले….
अकेलेपन की चिंगारी दे रही है दस्तक ” पंकजोम प्रेम “….
इसके आग बनने से पहले , महफूज़ उसके साथ का नगर कर ले .
बढे जो मेरे हाथ, खुदा की तरफ़
दुनिया ने मुझे काफ़िर करार दे दिया
नहीं समझी दुनिया, न वो खुदा
मेरे सजदे को|
मोहब्बत के झरोखे से ये कैसी रोशनी आयी
मुद्दत बाद हमनें आज फिर नज़रें उठायीं हैं
कि हम तो सोच कर बैठे हि थे अन्जाम क्या होगा
कि किसने आज यूं ऐसे हमें हिम्मत दिलायी है
हुआ था घुप्प अंधेरा थीं मेरी नज़रें बड़ी बोझिल
कि किसने आज हमको देख फिर बाँहें फैला दी हैं। ।।
था बैठा हार से थककर, किसी शम्शान बस्ती में
किसी की एक आहट से हँसी फिर लौट आयी है
कि मैं ख़ुद में हि खोया था, न जाने कब मैं सोया था
थिरकते किसके क़दमों से ये धड़कन मुस्कुराई है।।।
मोहोब्बत के झरोखों से ये कैसी रोशनी आयी
कि मुद्दत बाद हमने आज फिर नज़रें उठायी हैं।।।।।।
।।।धन्यवाद ।।।
अकेले होने का यह मरहला मुसलसल है
यहां किसी को किसी का ख्याल कब कुछ है
तू जाना नहीं इस दिल को छोड़,
मेरी धड़कने बड़ी नक़लची हैं।।।।

कल खो दिया मैंने वो नायाब रत्न …
जिसे पाने को हर इंसान करता है , ना जाने कितने प्रयत्न …..
This Gajal Dedicate to my grandfather …..
रंज की बार – बार दरवाज़े – ए – दिल पर हुई दस्तक हैँ …..
नैना भीग गए , और मायूस चेहरे की रौनक है….
एक पल में तबाह हो गयी , ख़ुशी – ए – जिंदगी…..
अंखियों के पर्दो पर , सिलसिलेवार आपकी झलक है…….
आपका यूँ चुपचाप जग को अलविदा कह जाना …..
दिल में हमेशा के लिए रम चुकी , ये कसक है….
विश्वास नहीं हो रहा किसी के भी दिल को….
सबके गले नीचे नहीं उतरता , दाना – ए – कनक हैं…
आपके हाथों को नन्ही उंगलियों से थामा…..
काँधे पर बैठ सीखे दुनियादारी के सबक हैँ…
एक एक आब सुख गया , पंकजोम ” प्रेम “….
यहीँ थी मर्जी – ए – ख़ुदा , सबके होंठो को छू निकलने वाले शब्द ये दो टूक हैं…
थोडी सी उदासी जमा कर ली है
मुठ्टी भर दर्द को कैद कर रखा है
दिल के इक कौने में
कभी कभी इसी दर्द को घोलकर स्याही में
बिखेर देता हूं उदास कागज़ पर
कुछ अल्फ़ाज़ से खिंच जाते है
लोग कहते है
वाह! क्या नज़्म है|
क्यों नहीं कहता जो फ़साना है तेरा ये कैसा बेमान अफसाना है तेरा
क्यों बना बैठा है वो बुत जो पूजा जाये ये किसकी परस्ती है की वो छा जाये
क्यों नहीं तोड़ता तू ये तमाम बेड़ियांक्यों नहीं छोड़ता तू ये तमाम देहरियां
तेरी बेईमानी तेरा इमान क्यों है ऐ दिल, तू इतना बेजुबान क्यों है
तुम अपने गिर्द हिसारों का सिलसिला रखना
मगर हमारे लिये कोई रास्ता रखना
ज्यादा देर तक जुल्म नहीं सह सकता मैं
अब अगर आयें कडे दिन तो दिल कडा रखना
तुम्हारे साथ सदा रह सकें जरूरी नहीं
अकेलेपन में कोई दोस्त दूसरा रखना
वो कहते हैं न कि जिसका कोई नहीं खुदा होता है
जब भरोसा उठ जाए, तो खुद के पास खुदा रखना
छु न सके हथियार जिसे, उसे वो नजरो से घायल करते रहे,,
हम भी बने हिम्मती इतने,, वो वार करते रहे, हम हलाल होते रहे!!
कल तक मिल्कियत की जिसकी मिसाले देता था जमाना,
उसे ही वो होठों के जाम पिलाते रहे,, हम भी शौक से पीते रहे!!
कुछ तो बात हैं कान्हा, जो सितारे उसे चंदा समझ लेते हैं अक्सर,,
काश!! वो भी मेरी ख़ामोशी समझ पाए और हम भी उन्हें देखते रहे!!
हादसा ऐसा भी उस कूचे में कर जाऊं मैं
कोई खिडकी न खुले और गुजर जाऊं मैं
सुबह होते ही नया एक जजीरा लिख दूं
आज की रात अगर तह में उतर जाऊं मैं
मुन्तजिर कब से हूं इक दश्ते करामाती का
वह अगर शाख हिला दे तो बिखर जाऊं मैं
जी में आता है कि उस दश्ते सदा से गुजरूं
कोई आवाज ना आये तो किधर जाऊं मैं
सारे दरवाजों पे आईने लटकते देखूं
हाथ में संग लिये कौन से घर जाऊं मैं
कभी कभी सोचता हूं
कि हमने पत्थर को भगवान बनाया है
या भगवान को भी पत्थर बना दिया
कर के दरकिनार फासलों को तू बढ़ता जा
तू चढ़ता जा सीढियां वो तमाम
जो हर पल गोल घूम जातीं हैं सताती हैं पर
बताती हैं कि बढ़ना ही जिंदगी है चढ़ना ही जिंदगी है
यह कैसी जिंदगी है
जो अपनी होकर भी परायी है
भीड तो है चारो तरफ़
फिर भी हर तरफ़ फैली तन्हाई है
उसकी यादों की बारिश से , एक एक पल है यूँ भीगा……
किया है जब से दीदार – ए – रुख़ – ए – रोशन हो गए संजीदा…..
क़दम रखा जैसे ही उसने दिल के आशियाने में….
एक – एक गम का लम्हा हो गया अलविदा ….
शुक्रिया अदा करते करते नहीं थकते मेरे अल्फ़ाज़ ….
मेरी क़िस्मत को क्या ख़ूब ख़ुदा ने हैं लिखा…..
वो मुस्कराहट की मल्लिका , जिंदगी में ले आई खुशियों की सौगात….
खुल कर मुस्कुराना भी मैंने उस अप्सरा से है सीखा….
जिंदगी के सफ़र में वो हमसफ़र ना बन सकी….
शायद किसी मज़बूरी ने उसे अपनी और था खींचा….
एक मुलाक़ात के लिए तड़प जाती थी रूह…..
ऐतबार है , नहीं हुआ ख़ुदा से कोई जफ़ा….
बहुत गहरे रंज दिए किसी अपने ने…..
लेकिन दिल उसे मान बैठा , हर रंज की दवा….
ख्वाईश थी , राह – ए – मोहब्त में उसका हाथ थाम चलने की..
लेकिन दर – ए – मोहब्त पर ” पंकज ” अकेला जा पहुँचा…
Pankaj ” prem “
ये दुनियाँ बदल रही है, या बस हम बदल रहे हैं ;
दौड़ बची है पैसों की, सब, सबसे आगे निकल रहे हैं !
यारियाँ है मतलब की, फर्ज अब हक़ में बदल रहे हैं ;
रिश्तों में विश्वाश अब कहाँ, यक़ीन अब शक़ में बदल रहे हैं !
माँ, बहनें महफूज़ नहीं, रक्षक अब भक्षक में बदल रहे हैं ;
जिनके कदमो में हैं राम-ओ-रहीम, उनको पैरों से कुचल रहे हैं !
हर चेहरे पर इक नकाब है ‘अक्स’, और लफ्जों में सियासत;
हर शख्स खुदी में ख़ुदा है, इंसान मजहब में बदल रहे हैं !………#अक्स
तुम साज़ बनो हम गीत बनेंगे ,
तुम प्रिय बनो हम प्रीत बनेंगे |
चल दो कुछ पग मेरे पथ पर
तुम दौड़ बनो हम जीत बनेंगे |
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दिल के बागों मे खुशबुयें ही खुशबुयें रह जायेंगी
तूम चले जाओगे तुम्हारी यादें रह जायेंगी
रहेगा सदा इन्तजार तेरा इन आंखो को
दरवाजे ए दिल पर तुम्हारी दस्तकें रह जायेंगी
आना था तुमको खुशी खुशी हमारी यादों में
क्या पता था रूखसारों पर खारी लकीरें रह जायेंगी
जो कह ना पाये वो लिख देते है आज
नहीं तो तुम्हारी यादें तडपती रह जायेंगी
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VEKH BHAGAT SINGH ! tere supney’n da desh,
jagah-jagah te painda, jaat-dharam da kalesh.
ditti si jaan tu,taan jo desh azaad ho jaawe,
naa ki mulk andr,gareeb-berozgaar pachtaawe,
” faansi da fandha aapne gll paundey tu,
socheya tan ni hona,
kll nu saropey paingye, zaalam sarkaaran de gll..”
Geet’n ch tan tera aksar zikr hunda hai,
23 te 28 di chutti da v fikr hunda ay,
nahi hunda j kuch,
tan oh TERI SOCH DA SHIKHAR HUNDA ay .
khair! ajj v tu sochda howeinga,
ik aas ch baitha howeinga,
koi naujwaan ikalli teri soch,
parheiga-likhega nahi,
saraahega nahi,
saggon,tere supney’n da BHARAT LAIKEY KHALOWEGA !!
जिंदगी एक बार दी है , ख़ुदा ने …
फिर क्यों तन्हा रहते हो…..
मैं हमराज़ हूँ , तेरे हर राज़ में ..
फिर राज़ की बातें , आबो से क्यों कहते हो……
तेरी मुस्कराहट के दीदार का दीवाना है , ये सुख़न – वर ….
बेख़बर तुम हो , लेकिन मेरी रहती है , तेरी हर नज़र पर नज़र ……
अनजान बन नहीं समझते मेरे लफ़्जो को ….
लेकिन ग़ज़ले बड़ी ग़ौर से सुनते हो ….
जिंदगी एक बार दी है ख़ुदा ने..
जरा समझ दिल की भाषा …
बड़ा बेताब है , तुम्हें कुछ समझाने को…..
ख़ामोशी में ही सही , नज़रों का इशारा दो….
आरज़ू है इसकी , तेरी धड़कन में उतर जाने को….
अपना कहकर , ग़ैरों की तरह राह में चलते हो ..
जिंदगी एक बार दी है ख़ुदा ने , फिर क्यों तन्हा रहते हो….
मैं हर लम्हें में , तेरा साथ मांगता हूँ , अपनी हर दुआ में ..
ख़ुदा के दर पर , कभी पैर ज़मीन पर , कभी हाथ आसमां में ….
बदलता है मौसम , लेकिन तुम क्यों बदलते हो…..
जिंदगी एक बार दी ख़ुदा ने , फिर क्यों तन्हा रहते हो…
Pankaj ” prem “
रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||
काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
सांझ घनेरी रात है काली भक्तन को उद्धारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||
बड़ देवन के तुम काज संभारे आसिस दिए बड़े |
देव दनुज गन्धर्व दूत सब तेरे द्वार खड़े||
दृष्टि धरो जगत धरा पर भक्तन को निहारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||
रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||
क्या होगा. . . . . .❤
कभी सोचा है, कि जब तुझको, मेरी याद आई तो क्या होगा;
ना हम होंगे, ना तुम होगे, और ना तन्हाई तो क्या होगा !
कि आकर लफ्ज़ होठों तक, पलट जायेंगे मुमकिन है;
किसी से कह दिया, और हो गयी, रुस्वाई तो क्या होगा!
करोगे जज़्ब कैसे तुम, जो कहना ना हुआ मुमकिन;
ख़ुशी की महफ़िलों में आँख, भर आई तो क्या होगा!
ये माना जीतने का हुनर है, तुम्हारे पास मोहब्बत में;
पर सोंचते हैं, गर किसी से, शिकश्त पायी तो क्या होगा!
रखो बेशक हमारी खामियों का, गुनाहों-सा तुम हिसाब;
कभी सोंचा है, जब तुम्हारी, ज़फाएँ सामने आयीं तो क्या होगा!!. . . . . #अक्स
घर अँधेरे में अब ना किसी का रहे ।
चार सू रंग यूँ रौशनी का रहे ।
जगमगायें यहाँ सब महल झोपड़ी
पर्व सबका ये दीपावली का रहे ।
घर ,मुहल्ले ,शहर खिल उठें प्यार से ,
हर तरफ सिलसिला दोस्ती का रहे ।
आओ दें एक दूजे को शुभकामना ,
दौर सबके लिए उन्नती का रहे ।
ऐसी दीवाली हो अब दुआ कीजिये ,
सबके दिल में तसव्वुर ख़ुशी का रहे ।
नीरज मिश्रा
बिन माँ और पिता का एक बच्चा इसके सिवा सोचेगा भी तो क्या,
कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ
खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया
जिनकी बंद आँखे भी हँसी देती है
और खरीद लूँ वो खिलौने
जिसमें लाखों कि खुशी रहती है
खरीदना है मुझे आँचल वो माँ का
जिसके पहलू में कभी धूप नही लगती
कहाँ पाऊँ मैं जिगर बाप का
जिसके साये में कभी भूख न बिलखती
ऐसी कश्ती से मेरा सामना हर बार हो गया है
कितनी तेजी से ये शहर भी बाज़ार हो गया है
टूटता हूं फिर से जुड जाता हूं
मैं पानी का आईना हूं
घर से लिये हूं रात का सूरज
कहने को मिट्टी का दीया हूं
गले गले है पानी लेकिन
धान की सूरत लहराता हूं
रस की सोत बनेगी दुश्मन
गन्ने सा चुप सोच रहा हूं
मिलती गर इज़ाज़त, थोड़ी सी मोहलत मांग लेता |
पिंजरे की दाल छोड़कर, आसमानों की भांग लेता ||
चल पड़ता जहाँ बढ़ते कदम, मुड़ता बस नज़र की ओर |
उतार देता थैला काँधे से , नौकरी खूंटी पर टांग देता ||
चले जाओगे तुम ये सोच नहीं था
हो जाएगें तनहा हम ये सोचा नहीं था
हंसते हंसते बितायी थी जिंदगी हमने
गम में ढ़ल जाएगी जिंदगी ये सोचा नहीं था
तेरी आंखो के नशे मे डूबे रहे हम जिंदगी भर
मय बन जाएगा मुकद्दर ये सोचा नहीं था
जिंदगी क्या थी हमारी बस तुम्हारा अहसास था
अहसास भी साथ न रहेगा ये सोचा नहीं था
दिल ए आईने में उतार ली थी तस्वीर तुम्हारी
वो आईना टूट जाएगा ये सोचा नहीं था
हर शाम साथ साथ हुई थी बसर हमारी
तमाम शब जगेंगे तनहा ये सोचा नहीं था
मिले थे जब उनसे मिट गयी थी दूरियां
दूरियां हो जाएगीं दरम्यां ये सोचा नहीं था
जिने जानते थे हम अपनी जिंदगी से ज्यादा
वो हो जाएंगे अजनबी ये सोचा नहीं था

2122 1212 22
कुछ दिनों से खफा-खफा सा है ।
चाँद मेरा छुपा-छुपा सा है ।।
कुछ तो जिन्दा है जिस्म के अंदर ;
और कुछ तो जुदा-जुदा सा है ।
जब से’ उतरा हूँ’ होश की तह में ;
होश तब से हवा-हवा सा है ।
सादगी से बदल गयी रंगत ;
ये असर भी नया-नया सा है ।
उसकी’ सांसों ने’ छू लिया था कल ;
जिस्म से रूह तक छुआ सा है ।
उसने’ भी आग को हवा दी थी ;
हर तरफ जो धुँआ-धुँआ सा है ।
राहुल द्विवेदी ‘स्मित’
दीये जलने दो जरा
कूछ उजाला हो जाए
वैसे तो अंधेरे की आदत है
आज कुछ अलग हो जाए
जिंदगी गुजरी है सीधी सी
आज रोकेट को कुछ टेडा कर के छोड देते है
शायद इससे किसी अंधेरे में उजाला हो जाए|
ए – ख़ुदा …..
जरा तू रौनक – ए – बाज़ार देख….
हर इंसान के चेहरे पर …..
मुस्कराहट का कारवाँ सिलसिलेवार देख …..
जरा एक निगाह , फ़लक पर डाल …..
नजारा – ए – आतिशबाज़ी बार – बार देख …..
Happy Diwali ……
PANKAJ ” prem “
सुख़ , समृद्धि और ख़ुशहाली संग , माँ लक्ष्मी का पूजन हो …
अपनों की , अपनों से , अपनेपन की बढ़ती चले मिठास ….
और दूर सभी उलझन हो …
जब दिखे फ़लक पर , नजारा – ए – आतिशबाज़ी …..
तो हर जन – जन का , आनंदित मन हो….
” सोनी परिवार की और से …
आपको और आपके सभी स्नेहजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें ……”
Pankaj Soni…..
मय में भी नशा है….
लेकिन उस रुख़ – ए – रोशन की ख़ूबसूरती से कम नहीं…
हूँ जब आज , मुस्कुराहट के आगोश में ….
तो दिल कहे ,
अब कोई गम नहीं …
जिस दिन उंगलिया छोड़ दे , क़लम का साथ ….
तो समझ लेना , इस दुनिया में हम नहीं…..
ग़ैरों की बस्ती में , अपना भी एक घर होता..
अपने आप चल पड़ते कदम
य़ु तन्हा ना य़े सफर होता….
वक्त बिताने को आवाज देती दीवारे साथ छुटने का ना कोई ड़र होता….
गैरों की बस्ती मे अपना भी एक घर होता…
अपना कहने वाला ख़ास अपना नही फिर भी अभिनंदन होता …
यहां अपने बना देते है पराया
वहां पराय़ो से अपना एक बंधन होता…
हर दर्द तबदील हो जाता ख़ुशी में स्वागत ही इस कदर होता…
काश गैंरो की बस्ती मे अपना भी एक घर होता….
पहन लिए अपनों ने लिबास गैरों के… अपनेपन को भुल
बन गए गुलाम पैसों के …
” अतिथि देवों भव ” का भावार्थ कर मन से दुर …
वे भक्त हैं अपने जैसों के…
सीख़ाय़ा खुद को अपने पहचानने का हुनर होता ….
तब शायद गैरो की बस्ती मे अपना भी एक घर होता …..
जिसे अपना माना ज़िंदगी मे
उसी ने तिरस्कार किया …..
किस और राह तलाशती निगाहें
फिर ग़ैंर ने आकर हाथ थाम लिया…
अपनेपन की बैठा किश्ती मे उसने ख़ुशियों के सागर मे उतार दिया ….
समझदारी की समझ से समझदार हुं लेकिन ना समझ होता …
” तब जाकर कहीं गैंरो की बस्ती मे अपना भी एक घर होता…”
पंकज सोनी
गायब हर मंजर मेरा
ढूढ़े परिंदा घर मेरा
जंगल में गुम फ़स्ल मेरी
नदी में गुम पत्थर मेरा
दुआ मेरी गुम सर सर में
भंवर में गुम महवर मेरा
नाफ़ में गुम सब ख्वाब मेरे
रेत में गुम बिस्तर मेरा
सब बेनूर क्यास मेरे
गुम सार दफ़्तर मेरा
कभी कभी सब कुछ गायब
नाम कि गुम अक्सर मेरा
मैं अपने अंदर की बहार
बानी क्या बाहर मेरा
वह रहे कैदे जमां में जो मकीने आम हो
लम्हा लम्हा जीने वालों का मक़ां कोई नहीं
ऐसी उठा पटक न देखी कभी,
न ही सुने शब्द तीखे तर्रार कभी|
ये तो entertainment का जमाना है भैया
जो जि सब होत रहत है,
वरना पब्लिक तो सब जानती है||
इक लौ थी जो जलती रहती थी
करती थी रोशन अंधेरों को
इक आफ़ताब आया कहीं से
औ निगल गया उसे
छोड गया अंधेरे में दुनिया को
***
उसको हमने कल तडपते हुए देखा था
शायद उसकी यादें कल लोट आयी थी
***
तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे
तेरे लहू के समंदर जरा पुकार मुझे
मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ के क्या देखूं
उरूजे फन! मेरी देहलीज पर उतार मुझे
उबलते देखी है सूरज से मैनें तारीकी
न रास आएगी यह सुबह जरनिगार मुझे
कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पॉव चूमूंगा
जमान लाख करे आके संगसार मुझे
वह फ़ाका मस्त हूं जिस राह से गुजरता हूं
सलाम करता है आशोब रोजगार मुझे
पुरानी जिंदगी कभी कभी जाग उठती है
यादें आ जाती है याद बेवजह
खारी लकीरें छोडकर रुखसारों पर
न जाने कहां खो जाते है जज्बात मेरे
लफ़्ज जो कभी जुबां पर आ ना पाये
जो छुपते रहे ज़हन के किसी कोने में
उमड उठते है कभी कभी
कागज के किसी कोने में
इक नज़्म कभी कभी जाग उठती है|
KOI LOUTA DE MERE VO DIN
JAB ME HANSTI THI POORE MAN SE
KHELTI THI, LADTI – JAGADTI THI
KABHI KABHI NARAZ HO JAATI THI
KHUD SE HI
BANATI THI HAR ROJ NAYE DOST
KARTI THI BAATE KHIDKI PAR BAITHI CHIDIYA SE
HAWAO SE GUFTA-GOO KARTI THI
LAUTA DE KOI MERE VO DIN
AAJ FIR SE JEENE KI KHUWAASIH HAI !
वो जो मुह फेर कर गुजर जाए
हश्र का भी नशा उतर जाए
अब तो ले ले जिन्दगी यारब
क्यों ये तोहमत भी अपने सर जाए
आज उठी इस तरह निगाहें करम
जैसे शबनम से फूल भर जाए
अजनबी रात अजनबी दुनिया
तेरा मजरूह अब किधर जाये
!!!!!! SAGAR KI KALAM SE !!!!!!
Chehre ko nakaab main chupaaye baithe ho
khudh ko khudh se hi chipaaye baithe ho
kab tak bachaate rahoge sachhai se khud ko
ki apne dil main hummi ko samaaye baithe ho
@@ SAGAR @@
5/11/15 :: 1:30 PM …. (630) … ©
!!!!! SAGAR KI KALAM SE !!!!!!
aaj bhi raaton ko karahne ki aawaz
sunaai dete hai iss dil se
jo barso pahle tora diya tha tumne
aaj bhi jinda rakhe hue hun iss dil ko
bari shiddat se
jo barso pahle na jaane kyoun marne
ke liye chor diya tha tumne
@@ SAGAR @@
411/15 :: 8:45 PM … (626) …. ©
एक और इंतजार
सर्दियों के दिन कितने मासूम से दिखते हैं
छोटे बच्चे की तरह ऊनी कपडे में लिपटे हुए
तुम्हारे आने के दिन थे वो
मैं देर तक पटरियों पर बैठे
इंतज़ार सेंका करती
रेल को सब रास्ते याद रहते
एक मेरे पते के सिवा
सूरज डूबता पर तुम्हारा इंतज़ार नहीं
मैं बैठी रहती
चाँद को गोद में लिए हुए
तुम चुपके से नींद में आते
फिर धुंध पर पाँव रख कर लौट जाते
एक और इंतजार मेरे नाम लिखकर
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