Category: Other

  • नैतिकता का संचार

    सुबह सवेरे , आखोंदेखी घटना का है यह मंजर
    अरूणोदय से पहले पहुँची,बच्चों की टोली चलकर
    दौङ लगाते लगते थे, जैसे हो मंजिल पाने को तत्पर
    स्वाबलम्बी बनने को आतुर, पर मर्यादा का नाम नहीं
    अगल-बगल में कौन चल रहे, थोड़ा-सा भी ध्यान नहीं
    अपशब्दो की झङी लगाते, कहाँ तनिक भी वे शर्माते
    खो गये संस्कार कहाँ ,बची माचनवता आज कहाँ
    क्या अपनी कथनी’ कुकरनी का उन्हें अंदाज कहाँ
    एक यही आवाहन है, थोड़ा नौनिहालो पर ध्यान धरें
    नैतिकता की शिक्षा का उनमें पहले संचार करें

  • नियामत

    खत्म होगा इन्तजार, स्वागत को कब होंगे तैयार
    वह सुहाना पल जब कोरोना मुक्त होगा यह संसार
    इस टूटन-घुटन पङी जिन्दगी से है सभी बेजार
    बस फिर से हो रब की नियामत सुखमय हो संसार

  • इबादत

    तस्लीम नहीं उनकी हिमाकत
    हरहाल में करेंगे अपनी हिफाज़त
    मुमानियत लगाए अपनी आकांक्षाओं पर
    नहीं तो भूल बैठेगे हम भी अपनी सराफत
    मकबूल नहीं तेरी अनैतिक मनाहट
    मान दोगे तो करेंगे हम तेरी इबादत

  • क्यूँ करें

    क्यूँ करें उनकी हिमायत
    उद्धत रवैया जो अपनाए हुए हैं
    खुद पे लगा पाते नहीं मुमानियत
    बदस्तूर आतंक बन छाए हुए हैं

  • मक़बूल नहीं

    रफ्ता-रफ्ता चलते-चलते
    पहुँच गए हम किस मंजिल पे
    बोध नहीं है, सुध-बुध खोके
    मक़बूल नहीं,सब अर्पित करके

    (मकबूल-सर्वप्रिय)

  • अंजुमन

    अंजुमन में कैसे आऊं,
    पीत चुनरिया ले के .।
    केश खुले, श्रृंगार नहीं है ,
    भीष्म पितामह, द्रोण भी बैठे ।

  • हौसला

    इंसाफ की लङाई लङनी हो तो फिर कोरोना का क्या डर
    मुस्कुरा के करेंगे हर मुश्किल का सामना, चाहे जिसका हो कहर

  • पतन

    फांसी, एनकाउन्टर जैसी किसी भी सजा का
    नौनिहालो को न रहा है अब डर
    जब हो गया हो पतन नैतिक मूल्यों का
    फिर कैसे हो आदर्शों का असर।

  • निश्छल

    नदी नाम है अविरल बहती जलधारा की
    त्याग, गतिमय, अवगुण-गुण का भेद मिटाने की
    कश! हममें भी यह सब आ जाए
    अपना चित भी तरनी से निश्छल हो जाएँ

  • घबराता कहाँ

    तरू को आलस सताता कहाँ
    सरिता को रुकना भाता कहाँ
    पाने की जद हो जिन्हें
    मुश्किलों से वो घबराता कहाँ ।

  • अह्लाद मिलेगा

    ज्ञान के पथ पर विवाद मिलेगा।
    प्रेमी बनकर देख अह्लाद मिलेगा।।

  • ख़तावार

    जब सब के भीतर तु है समाया
    तब भी मुझे कैसे तु नजर ना आया
    ख़तावार हूँ मैं
    खुद को ना इसका पात्र बना पाया।

  • चाय

    कहते सर्दी में चाय की तलब बढ़ जाती है
    पर गर्मी में कौन सा कम हो जाती है।

  • प्रज्ञा जी की कविता ‘वनिता’ को प्राप्त हुई सराहना

    हाल ही में प्रज्ञा जी की कविता ‘वनिता’ को प्रेस में काफ़ी सराहना मिली। सावन परिवार प्रज्ञा जी के लिये कामना करता है कि उनको काव्य की दुनिया में हर दिन नई ऊंचाई और दिशा मिले।

  • कुछ नहीं

    हमें आता जाता कुछ भी नहीं,
    सिर्फ शब्दों में खेल रहा हूं|
    परिणाम का हमें कुछ पता नहीं,
    मीठा खट्टा बोल रहा हूं|

    शब्द आन मान शान हैं,
    शब्द शब्द वेदी बाण है|
    शब्द राजाओं की तलवार यदि,
    भिखारियों की ढाल और पहचान है|

    शब्द सिंहासन दे सकता है,
    शब्द ही सब कुछ ले सकता है|
    बनो गवार ज्ञानी चाहे,
    शब्द ही जान ले दे सकता है|

    मां के शब्दों में संस्कार भरा है,
    पापा के शब्दों में प्यार भरा है|
    बढ़ा हुआ जब लाल वहीं,
    देखो बेटे के शब्दों में जहर भरा है|

    करो निरीक्षण उन्नत खातिर,
    मान प्रतिष्ठा वैभव खातिर|
    कुल कुल की लज्जा,
    शब्द सुधारों परिवार के खातिर|

    ऋषि कुमार “प्रभाकर”

  • मैं भारतीय होने पर गर्व करता हूँ

    ऋषि मुनियों की जिसकी धरती है स्वर्ग सी जो लगती है गंगा जहाँ पर बहती है दुनिया उसे भारत कहती है इस देश का होने की खुशी मैं मन में अपने भरता हूँ मैं भारतीय होने पर गर्व करता हूँ शौर्य और वीरता हमारे पर्वजों की निशानी है हर व्यक्ति यहाँ का वीर और बलिदानी हैं विश्वगुरु है भारत, ये बात जग ने मानी है ऐसे प्यारे देश के लिए मैं जीता और मरता हूँ मैं भारतीय होने पर गर्व करता हूँ किसान यहाँ के मेहनतवाले, उगाते स्वर्ण से दाने नारी यहाँ की त्याग की मूर्त, झलकती इनमें धरती माँ की सूरत इस देश की मिट्टी को मस्तक पर अपने धरता हूँ मैं भारतीय होने पर गर्व करता हूँ हम सब का भाईचारा बढ़े, भ्रष्टाचार और आतंकवाद मिटे, भारत प्रगति के शिखर चढ़े, ऐसे सपने आँखों में हमेशा रखता हूँ मैं भारतीय होने पर गर्व करता हूँ

  • सतीश पांडे जी को प्रेस विज्ञप्ति के लिये बधाई

    हाल ही में सतीश पांडे जी को अगस्त माह में आयोजित काव्य प्रतियोगिता में किये गये सर्वश्रेष्ट प्रदर्शन के लिये ‘अमर उजाला’ और ‘शाह टाइम्स’ ने अपने अखबार में स्थान देकर सम्मानित किया।
    सावन परिवार उनकी प्रतिभा और प्रदर्शन की तहे दिल से तारीफ़ करता है और योगदान के लिये आभार व्यक्त करता है।

    अमर उजाला
    अमर उजाला
    शाह टाइम्स
    शाह टाइम्स

     

  • मेरे पथ प्रदर्शक

    बबीता मैम ,
    बहुत सारे शिक्षकों का मुझे मार्गदर्शन प्राप्त हुआ परन्तु आपनें मुझे जीवन जीना सिखाया आपने ।
    मैं तो कुछ भी नहीं थी परन्तु आपने मेरी सुप्तावस्था की क्षमताओ को उजागर किया आपने ।
    मुझपे जितना विश्वास खुद नहीं था, उससे कहीं ज्यादा मुझपे विश्वास जताया आपने ।
    मैं बहुत दूर हूँ, नम्बर नहीं की बात कर सकूँ, परन्तु फिरभी मेरे मन के करीब रहना सिखाया आपने ।
    आज भी निराशाओं की घङी में आपकी कही बातों से प्रेरित होना सिखाया आपने ।
    “मैम जहाँ भी हैं आप हमेशा अपने परिवार के साथ खुश रहे ”
    Happy teacher day

  • बधाई शिक्षक दिवस की

    हे गुरूवर करूँ आपका अभिनन्दनम्
    सानिध्य आप सबो का पाके बन जाऊँ मैं चन्दन शिक्षक दिवस पर सभी गुरुजनों का हार्दिक बधाई!

  • दिल-दिमाग

    दिल भी मेरा, दिमाग भी मेरा
    आंसू भी मेरे, मुसकान भी मेरी
    बसेरा तेरा।

  • लायक

    रोया हूं बहुत चादर में मुंह छुपा कर के,
    लायक हूं ना लायक नहीं,
    जो मरा नहीं किसी के प्यार में,
    गले में रस्सी का फंदा लगा करके|

    वह छोड़ दी तो कोई बड़ी बात नहीं,
    मेरे साथ मेरा परिवार है ,
    इससे बड़ी कोई बात नहीं|
    प्यार करने के लिए बहन भाई मां बाप है-
    जिसे मैं समझूं ओ मुझे न समझे
    उससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं|

  • बेदर्द

    बेदर्दो से मत आस लगाओ,
    कि तुम्हारे दर्द के मल्हन बनेंगे|
    पराए काम आ सकते हैं,
    वक्त पर अपने साथ छोड़ जाएंगे|

  • आलोचक के गुण

    किसी भी आलोचक के लिए सबसे अहम उसका आलोचनात्मक विवेक होता है | इस गुण के बिना आलोचक कवि या काव्य की आत्मा में प्रवेश ही नहीं कर सकता है | आचार्य राम चन्द्र शुक्ल के शब्दों में आलोचक में ‘कवि की अंतर्वृतियों के सुक्ष्म व्यवच्छेद की क्षमता होनी चाहिए | चुकि किसी भी रचना की तरह आलोचना भी पुनर्रचना होती है | अतः जिस भाव-भंगिमा, मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की है, उसमें उतनी ही संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ प्रवेश कर जाने वाला पाठक ही सच्चा आलोचक होता है |

    आलोचक का दूसरा महत्वपूर्ण गुण सहृदयता है | आलोचक के अन्य गुण उसकी सहृदयता के होने पर ही सहायक हो सकते है | सहृदय होकर ही आलोचक किसी रचना से रचनाकार की समान अनुभूति से जुड़ सकता है | समीक्षक को आलोच्य रचना या कृति के उत्कृष्ट या मार्मिक स्थल की पहचान कर उसको प्रमुखता देना चाहिए । अर्थात् आलोचक में सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण होना चाहिए |

    इन अनिवार्य गुणों के अतिरिक्त आलोचक में निष्पक्षता, साहस, इतिहास और वर्तमान का सम्यक ज्ञान, संवेदनशीलता, अध्ययनशीलता और मननशीलता भी होनी चाहिए | निष्पक्षता से तात्पर्य यह है कि आलोचक को अपने आग्रहों से मुक्त होना चाहिए |

    आलोचक के आग्रह, अहम या उसकी इच्छाएं और भावनाएँ निष्पक्ष आलोचना में बाधा बनती है | किसी भी रचना के मूल्यांकन में अपनी बातों को तर्कसंगत और तथ्यपरक ढंग से रखना आलोचक के लिए आवश्यक है , भले ही उसकी स्थापनाएँ पूर्व स्थापित मान्यताओं और सिद्धांतों के प्रतिकूल क्यों न पड़ती हो | ऐसी स्थापनाओं के लिए आलोचक में व्यापक अध्ययन एवं देशी-विदेशी साहित्य और कलाओं का ज्ञान आवश्यक है |

    इसके साथ ही अतीत की घटनाओं, परिस्थितियों और परम्परा एवं वर्तमान के परिवेश का सम्यक ज्ञान होना चाहिए | तभी वह रचना की युगानुकूल व्याख्या कर सकता है । वर्तमानता या समकालीनता से जुड़कर ही कोई आलोचक अपनी दृष्टि को अद्यतन बनाये रखता है | इसके बजाय विदेशों के समीक्षा ग्रंथों से उद्धरण देकर वाम विदेशी समीक्षकों के नाम गिनकर पाठकों को कृति से मुखातिब कराने के स्थान पर उनपर अपने पांडित्य की धाक जमाने की कोशिश आलोचक का गुण नहीं है | आलोचक को किसी सामान्य तथ्य या तत्व तक पहुँचने की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए बल्कि रचना के अक्षय स्रोत को बचाए रखने का गुण भी होना चाहिए |

    Content Partner: Dignified India

  • Aurat ki gehan

    #एक_लड़की_से_मैने_पुछा:- तुमने यह Artificial Ear #Rings_Locket_aur_Ring क्यों पहनी है। तुम्हारे Branded 👌🥼👕कपड़ो से तो तुम गरीब नहीं लग रही।

    #लड़की_बोली:- आज कल #असली गहने पहनने का जमाना नहीं, गली गली 🤺🤺चोर घुम रहे है। घरवाले पुलिस वाले हर कोई मना करता है असली पहनने को।

    #मैने_पूछा – पर कोई तुम्हें ऐसा करने से कैसे रोक सकता है, जबकी यह तुम्हारा अधिकार(Rights) है।
    कानून भी तुम्हे ऐसा करने से नहीं रोक सकता। फिर तुम पर ऐसी पाबंदी क्यों?

    लड़की बोली:- तुम ,🤔😲पागल तो नही हो गए। आज कल गली #गली_चोर_बदमाश 🤺🤺घूम रहे है, क्या मे इतने कीमती #जेवर ऐसे ही ले कर या पहन कर चलूं अधिकार(Rights) तो तुम्हे याद है

    मैने बोला:- मै तुम्हे यही बताना चाहता था। तुम्हारे शरीर/तुम्हारी इज्जत से कीमती 👩‍⚕️गहना कोई नहीं। सोने चांदी हीरे के गहने तो तुम छुपा कर रखती हो पर अनमोल गहने की तुम नुमाइश कर रही ही।
    जबकी तुम्हे भी पता है गली गली दरिंदे 🧟🧟हैवान घूम रहे है।
    छोटे कपड़े पहनना तुम्हारा अधिकार(Rights) है, पर जैसे तुम सोना चांदी के गहनों को संभालना अपना कर्तव्य (Duty) समझती हो वैसे ही इज्जत को पर्दे में रखना तुम्हारा कर्तव्य (Duty) है। चोर हो या बलात्कारी उन्हें शिक्षा/संस्कार/इज्जत से कुछ लेना देना नहीं। हमें खुद ही संभाल कर चलना पड़ेगा।
    अपनी आँखों पर से पश्चिमी सभ्यता (Western Culture) का चश्मा उतारना होगा। नारी के जरा से वस्त्र खींच लेने मात्र पर ” महाभारत ” लड़ने वाले आज देश की दुर्दशा देखिये…..!
    ” आज उसी नारी को दुपट्टा लेने को बोल दो तो ” महाभारत” हो जाती है।
    By chhotu kothay…

  • रोटी

    जब मिली रोटी किसी ने नखरा दिखाया
    जब मिली रोटी किसी ने भूख को मिटाया
    यह कैसी माया है तेरी भगवान्
    जब मिली रोटी किसी को तु नज़र आया।

  • प्रिय बापू

    मेरे प्रिय बापू
    रंग गोरा काला कहकर रंग भेद की आग जलती हैं,तबतब इस चिगांरी बुझाने को मसीहा तेरी कमी खलती हैं।तब तब आगे बढ़ने को प्रिय बापू आप मुझे प्रेरित करते हैं।।
    उँच नीच ,जात-पात पर आज भी दाग दिए जाते हैं,जब जब मन्दिर मस्जिद में हरिजन रोके जाते हैं,।तब तब आगे बढ़ने को प्रिय बापू आप मुझे प्रेरित करते हैं।।
    सस्ती महँगाई के दौर में आज भी कितने भूखे सोते हैं,अमीर खाना खाता हैं गरीब जहा रोते है, तब तब प्रिय बापू आप मुझे प्रेरित करते है।।
    जब दहेज के नाम पर आज भी औरत जलायी जाती हैं,हिन्दु मुस्लिम के नाम पर आग भड़कायी जाती हैं,जब राजनीति के दंगाई जनता को सताती हैं,।तब तब आगे बढ़ने को प्रिय बापू आप मुझे प्रेरित करते हैं।।
    जब लड़का लड़की के नाम पर कन्या भ्रूण हत्या होती हैं,तब हमारी शासन सत्ता कहाँ जाकर सोती हैं।तब तब आगे बढ़ने को प्रिय बापू आप मुझे प्रेरित करते हैं।।
    भावना सरोज(M.Sc, B.Ed) मुरादाबाद

  • सच्ची बात

    संग संग चलती है
    सच्चाई और तन्हाई
    बयां की सच्चाई
    संग आई तन्हाई।

  • दीया बाती

    तुम दीया मैं बाती ही सही
    मैं बाती बन जली
    तुम बाती बदलते रहे।

  • यदि तेज की तलाश हो तो अपने वीर्य को गंदी जगहों पे निवेश करने के बजाय उसे एक सही दिशा दें तो आप ब्रह्मचारी कहलाने के योग्य होंगे ।। जय श्री राम ।।

    संतरूपी कविजन आप हमारी खामियाँ को पढ़कर हमे खूब कोसे खूब परेशान करे, अच्छी बात है लेकिन कोई व्यक्ति इस संसार में किसी भाषा का पूर्ण ज्ञाता नहीं होता । वैसे आज कवियों की भरमार लगी है दुनिया में, लेकिन कवि का काम लिखकर कुछ कमाना और सांसारिक झूठी ऐश्वर्य प्राप्त करता नहीे होता, बल्कि शिक्षक और कवि समाज का दर्पण होता है । वैसे गर्व की बात है कि हमारे देश में संतकवि कबीर, तुलसी, कालि, रहीम और मीराबाई जैसी महान विभूति हुये ।
    ।। सादर प्रणाम ।।
    हमे माफ करते रहियेगा । यही आप कविजन से हमे आशा ।।
    ।। खूब परेशान कीजिये, कमेंट में बकलोली जैसी महान शब्द लिखिये और कमजोर व्यक्ति को आत्महत्या के पथ पे पहुँचायेगी ।।

  • एक सावन ऐसा भी (कहानी)

                  

    किसी ने कहा है कि प्रेम की कोई जात नहीं होती, कोई मजहब नहीं होता ।मगर हर किसी की समझ में कहां आती है ये बातें।

    कुछ लोगों के लिए समाज में इज्जत से बड़ी कुछ चीज नहीं होती है ,मगर यह इज्जत क्या इंसानियत से भी बढ़कर होती है; यह समझना या समझाना बड़ा मुश्किल है।
    बात हरियाणा के एक छोटे से गांव महबूबगड़ की है ।
    गांव के खुले आसमान और  हरियाली भरे वातावरण की छटा ही निराली होती है जो आपको कहीं नहीं मिलता वह गांव में मिलता है जैसे कि एक- दूसरे के साथ भाईचारा, संयुक्त परिवार में रहना, मिलजुल कर काम करना, खाने पीने की चीजें अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी पैदा करना।

    ये सब आजकल शहरों में कहां होता है,सब अपने से मतलब रखते हैं; किसी को किसी से कोई लेना देना नहीं होता । मगर गांव में भी बहुत कुछ गलत होता है जोकि आपको कहानी में आगे पता चलेगा।

    मन में अपने गांव के बारे में सोच- सोच कर, मोहित दिल्ली में अपने फ्लैट की बिल्डिंग से खाली पड़े; मैदान की तरफ घूरे जा रहा था।
    अंदर से कल्पना आवाज देती है -“ऐ जी! सुनते हो खाना तैयार हो गया है आ जाओ।”

    कल्पना की आवाज सुनकर मोहित एकदम से गांव की दुनिया से बाहर निकलता है और टेबल की तरफ आगे बढ़ते हुए ( मुस्कुराते हुए)- “बहुत-बहुत मेहरबानी। मैडम जी!हम पधार रहे हैं।”

    मोहित और कल्पना की शादी को अभी छह महीने भी नहीं हुए हैं ,नई नई शादी और ऊपर से साल का पहला सावन आने वाला है ऊपर से तीज का त्यौहार भी ।
    हरियाणा में वसंत और तीज से महिलाओं को कुछ
    ज्यादा ही प्यार होता है और क्यों नहीं हो, बागों में झूला झूलना, मधुर मधुर गीत गाना, फिर तीज के दिन घरों में अच्छे-अच्छे पकवान बनाना। बहुत सारी बातें हैं प्यार करने की।

    मोहित ने पिछले कुछेक महीनों में बहुत सारी तरक्की कर ली है, अपना खुद का फ्लैट, गाड़ी और सभी ऐसो आराम की चीजें।
    वह दोनों बहुत ही खुश हैं इस रिश्ते से ।
    मगर हैरानी वाली बात यह है की इन दोनों की शादी से न तो मोहित के घर वाले खुश है और ना ही कल्पना के।
    मोहित एक दलित परिवार से संबंध रखता है दूसरा कल्पना ब्राह्मण है ।

    गांव की विचारधारा के अनुसार एक ब्राह्मण कभी भी एक दलित के साथ अपनी बेटी का विवाह नहीं कर सकता है, दूसरे मोहित के घरवाले मन ही मन तो कल्पना को पसंद करते थे मगर गांव वालों के डर से उन्हें भी यह सब मंजूर नहीं था ।

    मोहित और कल्पना ने कोशिश की थी घरवालों को मनाने की मगर उनकी कोशिश असफल रही।
    इसमें कोई दो राय नहीं कि मोहित एक अच्छा लड़का था, अच्छी पढ़ाई लिखाई ,अच्छा व्यवहार, कमी बस यही थी कि वह दलित था।

    कल्पना मोहित को स्कूल टाइम से जानती थी फिर कॉलेज साथ -साथ पढ़ाई की, ऐसे करते -करते एक दूसरे को अच्छे से जानने लगे, पहचानने लगे ;फिर बात शादी तक चली गई।

    मोहित कभी नहीं चाहता था कि वह भाग कर शादी करें, मगर कल्पना की जीद, प्रेम और हालात से मजबूर होकर उसको यह कदम उठाना पड़ा। यही कारण था कि पिछले छह महीनों से गांव में किसी को नहीं पता था कि वह दोनों कहां रह रहे हैं ।

    मोहित के पापा ने उसे बेदखल कर दिया था और कल्पना के घर वालों से माफी मांग ली थी मगर कहीं ना कहीं आग की ज्वाला लपटे खा रही थी। मगर यह दोनों दंपत्ति इन बातों से बेपरवाह थे।

    कल्पना खाना परोस ते हुए- “सूनो जी बहुत दिन से आप ऑफिस से घर, घर से ऑफिस! बस यही कर रहे हो; मैं चाहती हूं कि कुछ छुट्टियां लो और कहीं ना कहीं घूमने चला जाए ।”

    “अपनी शादी के पहले सावन का आनंद लिया जाए।”
    मोहित -“नहीं कल्पना तुम जानती हो ना अभी कुछ भी सही नहीं हुआ है। अभी थोड़ा वक्त और लगेगा तुम्हारे घरवालों का गुस्सा ठंडा होने में।”
    कल्पना-” ऐसा कुछ नहीं है, सॉरी मैं आपको कुछ बताना भूल गई ।”
    मोहित -“क्या?”
    कल्पना-“मेरी बात दीदी से हुई थी ,उन्होंने मुझे फेसबुक पर टैक्स किया था।”

    मोहित-“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था ,कल्पना क्या प्रूफ है कि वह तुम्हारी दीदी ही है। ”
    कल्पना-” प्रूफ है ना मैंने उसको फ्रॉड सिम से व्हाट्सएप कॉलिंग की थी और दीदी ने मुझे बताया कि भैया को छोड़कर सब लोग चाहते हैं कि मैं उन लोगों से मिलु ।”

    मोहित -“यह सब उन लोगों की चाल भी हो सकती है ,गांव के लोगों को मैं बहुत अच्छी तरीके से जानता हूं, आजकल भ्रूण हत्या, ऑनर किलिंग जो हो रही है, सबसे ज्यादा हरियाणा में ही होती है और मैं नहीं चाहता कि तुम्हें हादसों का सामना करना पड़े।”

    कल्पना-“मैं समझती हूं, पर मुझे नहीं लगता कि अब ऐसा कुछ होगा ।”
    “मोहित! मम्मी तो तभी छटपटा रही होंगी, मुझसे मिलने के लिए और पापा का गुस्सा जल्दी ही शांत हो जाता है और भैया को दीदी मना ही लेंगी । ”

    “और दूसरा हमने गलत किया भी क्या है एक ना एक दिन तो शादी करनी ही थी उन्हे मेरी। और तुम भी तो जाना चाहते हो गांव में।”
    मोहित-“कल्पना! चाहता तो  मैं भी हूं मगर!”
    कल्पना -“क्या मगर!”

    मोहित-“मगर मैं अपने दोस्त रोहित से बात करूंगा पहले अगर मुझे लगेगा सब ठीक है तो फिर चलते हैं; तुम्हारा सावन में बाहर घूमने जाना भी हो जाएगा। ”
    मोहित खाना खाकर ऑफिस की तरफ रवाना होता है; रास्ते में वह रोहित के पास फोन करता है ।
    रोहित से बात होने के बाद वह कल्पना को तैयारियां करने के लिए बोल देता है ।

    कल्पना घर जाने की खुशी में कल्पनाओं से भर जाती हैं
    मगर उसके मन में उलझन सी हुई उसने वहां जाने से पहले एक बार अपनी मां से बात करना सही लगा,
    दीदी के पास बात करके वह अपनी मम्मी से बात करती है-“मम्मी !मुझे माफ कर दो, सच में हालात ऐसे हो गए थे,मम्मी मैं नहीं रह सकती थी, मोहित के बगैर और पापा मेरी दूसरी जगह शादी करना चाहते थे।”

    कल्पना की मां-“मैं समझती हूं बेटा मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है ,तुमने मुझे बताया भी तो था।”
    “और मुझे तो मोहित पहले से ही पसंद था जो होता है अच्छे के लिए होता है बेटी। ”
    कल्पना (खुश होते हुए)-क्या मां सच में ! तुम खुश हो इस रिश्ते से।”

    कल्पना की मां-“हां ! बेटी मेरा कलेजा फटा जाता है बस एक बार तुम्हें देखना चाहती हूं ।”
    “आ जाओ बेटा तुम्हारे पापा बताते तो नहीं है, मगर सब समझती हूं मैं वह भी तड़पते रहते हैं तुम्हारे लिए।”
    तो ठीक है, मां हम अगले सप्ताह आ रहे हैं ,आपसे मिलने आप अपना ध्यान रखिए।
    यह कहकर कल्पना फोन काट देती है और उसके मन में एक उमंग सी है अपने घरवालों से मिलने की और गांव में जाने की।

    गांव में हरे भरे खेत आम के पेड़ों पर, पके हुए आम
    जामुन ,अमरूद के बाग; बहुत कुछ देखने लायक है महबूब गढ़ गांव में।
    धीमे धीमे गाड़ी की रफ्तार से मोहित और कल्पना प्रकृति का नजारा ले रहे थे और उन दोनों में एक उत्साह के साथ साथ एक घबराहट भी थी क्योंकि काफी समय बाद वह गांव में जा रहे थे ,फिर भी वह यह बात मन में ही दबाए हुए थे।
    एकदम से बारिश शुरू हो जाती है कल्पना को पता नहीं क्या होता है, जोर से चिल्लाती है मोहित गाड़ी रोको! रोको ,मोहित ने एकदम से गाड़ी को ब्रेक लगाया कल्पना हंसते हुए ,जल्दी से खिड़की खोल कर बाहर बारिश में भीगने चली जाती है ।
    उधर मोहित उसे पकड़ कर लाने के लिए बाहर निकलता है -“अरे !तबीयत खराब हो जाएगी, मत भिगो!”
    मगर कल्पना को बहुत मजा आ रहा था बहुत दिनों में उसे ऐसे मौसम का नजारा देखने को मिल रहा था और उन दोनों  की यह  सावन की पहली बारिश थी, फिर मोहित भी उसके साथ भीगने लग जाता है किसी फिल्मी सिन की तरह वे एक दूसरे में खो जाते हैं, बारिश का मजा लेने के बाद वे दोनों घर की तरफ निकलते हैं।

    कल्पना -“कितना अच्छा मजा आया, मोहित! हमारी शादी के बाद गांव में हमारा पहली बार आना कितना  मजेदार है ,है ना!
    मोहित (मजाक के मूड में) ” हां, शायद।”
    अचानक ,सामने खड़ी गाड़ी को देखकर मोहित एकदम से ब्रेक लगाता है गाड़ी में से उतर कर छह सात लोग आकर उनकी गाड़ी पर टूट पड़ते हैं ।
    अंदर से मोहित और कल्पना चिल्लाते हैं! कौन हो तुम लोग ? पूरी गाड़ी को लठ और डंडों से  डैमेज कर दिया जाता है
    मोहित जल्दी से गाड़ी को पीछे की तरफ चलाता है मगर पीछे भी दो गाड़ियां आकर खड़ी हो जाती हैं मोहित थोड़ा गौर करके देखता है तो पीछे कल्पना के पापा खड़े हैं और ठीक सामने उसके खुद के पापा।
    “रतिराम जी !बोलो क्या करना है अंदर की अंदर ही जला दे दोनों को या बाहर निकाल कर मारना है बहुत बड़ी भूल थी हमारी कि इस हरामी को हमने जन्म दिया” मोहित के पापा बड़े जोश के साथ कल्पना के पापा को कहते हैं।
    “पूरी इज्जत के झंडे गाड़ दिए हैं दोनों ने ऐसे तो नहीं जाने देंगे ,कितने दिन से कुत्तों की तरह ढूंढ रहे थे इन लोगों को । शुक्र है इस बदचलन की मां ने मुझे बता दिया, वह तो आंखें फाड़ फाड़ कर इंतजार कर रही है इसका” रामप्रसाद तुम्हारा काम हो गया है आज से हमारा गिला शिकवा खत्म तुम अपने घर जा सकते हो। और उस रोहित को इनाम के तौर पर दे देना दो लाख रुपए साला कुत्ते का दोस्त कुत्ता होता है”
    उन लोगों  की बात सुनकर मोहित और कल्पना सहमे से रह गए औरआगे होने वाले घटना से मोहित सूचित हो चुका था
    मोहित कल्पना को अपने गले से लगाते हुए कहता है- “हमने एक दूसरे के साथ जितना थोड़ा सा वक्त गुजारा है वो हजारों सालों से भी बहुत अच्छा था और हमारी शादी का यह पहला और आखरी सावन बहुत ही यादगार है और सुंदर है ।”
    कल्पना ने रोते हुए मोहित को कस कर पकड़ लिया और कहने लगी यह सब मेरी वजह से हुआ है ।
    मोहित ने उसे समझाते हुए कहा- “जो होता है अच्छे के लिए होता है। ”
    इतनी बातें हुई थी कि वह जानवरों से भी गए गुजरे लोग कुहाड़ियों ,तलवारों से उस गाड़ी पर टूट पड़े और देखते ही देखते पूरी सड़क लहूलुहान हो गई।
    और जीत हुई उस समाज के उन इज्जतदार, मान मर्यादा वाले ,हैवानों की ,जिन्होंने दो प्यार करने वाले प्रेमियों को जाति, परंपरा और खोखली मर्यादा  के नाम पर खा लिया।

                                  ——-मोहन सिंह मानुष
      कहानी में लिए गए सभी पात्र व गांव का नाम सभी काल्पनिक है इनका किसी भी घटना से कोई संबंध नहीं है।

  • श्री गणेश वंदना

    है बुद्धिदाता,बुद्धि का सबको दान करो।

    है चिंताहरण,संसार की सब चिंता हरो।

    है विघ्नहर्ता ,सृष्टि के सब विघ्न हरो।

    है पापहर्ता ,नर नारी के सब पाप हरो।

    है वक्रतुंड,निर्विघ्न सब मेरे काज करो।

    है सूर्यकोटि,दूर जगत का अंधकार करो।

    है रिद्धि सिद्धि के स्वामी,हर घर में तुम वास करो।

    है मुषकधारी,इस सेवक को सेवा में स्वीकार करो।

    है कृपासागर,इस सेवक पर बस एक कृपा करो।

    मन ना मेरा भटके कभी, हर पल बस तेरा ध्यान धरूं।

  • पपीहे की आस(कहानी)

    पपीहे की आस

    जैसी खुशी बच्चे के पैदा होने पर होती हैं ,शायद उससे भी ज्यादा खुशी किसान  को बारिश होने पर होती हैं
    यही खुशी प्यारेलाल की आंखों में दिख रही है, आज बसंत के मौसम में इंद्र की कृपया से खेतों में मानो जान सी आ गई थी।
    वर्षा के साथ-साथ प्यारेलाल के मन में कल्पनाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया था, अबकी बार फसल अच्छी होगी तो वह सारा कर्जा उतार देगा, फिर मुनिया को ,गंठा रोटी खाने के लिए मजबूर भी नहीं होना पड़ेगा‌।

    दो एकड़ जमीन को बंजर से उपजाऊ बनाने में प्यारेलाल और धनवती ने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी, मगर इस साल बारिश समय पर हुई है इसलिए वह बहुत उत्साहित हैं।
    रिमझिम बारिश में प्यारेलाल को खेत में हल जोतना बहुत ही रास आ रहा था ,वह बैलों के पीछे ऐसे सवार था जैसे कोई राजा अपने राज महल में रथ की सवारी कर रहा हो।

    जैसे-जैसे बारिश तेज तेज होती प्यारेलाल के मुख से संगीतमय गीत की ध्वनि वातावरण में चारों तरफ फैल जाती।

    “ए जी! सुनते हो! आ जाओ खाना खा लो फिर करते रहना जुताई ।”
    धनवती की आवाज सुनकर प्यारेलाल अपने गीत को विराम देता है। “आ गई !भाग्यवान!बस रूको हो गया है काम,आता हूं।”
    “जब तक आप और मुनिया खाना खा लो, तब तक, मैं पौध लगाना शुरु करती हूं। ”
    “मुनिया की मां !ज्यादा मेहनती मत बनो पहले खाना खा लो फिर लगते हैं तीनों!”प्यारेलाल प्यार से कहते हैं।
    “मैं खा लूंगी फिर”धनवती ने उठते हुए कहा।
    प्यारेलाल हाथ पकड़ते हुए “बैठ जाओ और जल्दी से खा लो, जब तक बारिश भी हल्की हो जाएगी।”

    अगले दो  दिन तक बारिश अच्छी होती है प्यारेलाल अपने दोनों खेतों में धान की फसल लगा देता है, फिर पहले की तरह खेत से घर, घर से खेत, यही तो चलता है किसान के जीवनी में।
    मगर अब सूर्य देवता का क्रोध दिन -प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था और इंद्र देवता मानो बादलों को लाना ही भूल गए हो। जो खेत पानी की वजह से लहरा रहे थे, अब वह  धरती की तपन की वजह से मुरझा रहे थे और धरती शुष्क हो गई थी।
    उधर प्यारेलाल की उम्मीद की सीमा तेज धूप में गोते खा रही थी।

    “हे ईश्वर !बस एक बार अपनी कृपया कर दे; हम पर ।
    बस एक बार बरस जाओ, नहीं तो मुनिया के बापू सच में टूट जाएंगे।”धनवती मंदिर में भगवान के सामने हाथ जोड़े खड़ी है ,और मानो आंखों से बह रहा झरना, बहुत कुछ कह रहा है।
    किंतु जिस चीज की आवश्यकता हमें होती है वह जल्दी से मिलती कब हैं!

    उधर प्यारेलाल खेत में आसमान की तरफ आस लगाए बैठा है और उसी पेड़ के ऊपर पपीहा लगातार बोले जा रहा है ,उस पपीहे की दशा प्यारेलाल ही समझ सकता था।

    उस पपीहे में और प्यारेलाल में अब कुछ अंतर नहीं था दोनों ही बारिश के लिए तरस रहे थे।
    बारिश को हुए महीना हो गया खेतो में फसल दिन प्रतिदिन सूखती जा रही थी मगर बारिश के दूर-दूर तक कोई निशान दिखाई नहीं दे रहे थे।
    अब प्यारे लाल के सपनें और कल्पनाएं मानो धूप के नीचे दबती जा रही थी।
    पेड़ के नीचे बारिश की राह देखकर उदास सा मुंह लेकर वह घर लौट आता था।
    उधर पेड़ पर बैठा पपीहा उसकी क्षमता को कुछ हौसला तो देता ही था, मगर प्यास के कारण उसकी भी अवस्था बहुत बुरी हो गई थी।

    अगले दिन प्यारेलाल से उस पपीहे की आवाज सुनी नहीं जा रही थी ,उसकी आवाज में एक तरह से रुदन व  करहाहट थी ।
    मानो वह कह रहा हो कि अगर आज बारिश नहीं हुई तो सच में वह अपने प्राण त्याग देगा ।
    यही स्थिति प्यारेलाल की थी, क्योंकि अबकी बार फसल नहीं हुई तो साहूकार उसे सच में मार देंगे।

    अचानक पीहू- पीहू-पीहू की आवाज शांत हो गई और पपीहा एकदम से नीचे गिर जाता है ,और प्यारेलाल के शरीर में भी मानो जान बाकी ना रही हो ।
    इतना कुछ होने के बाद में अचानक से बहुत तेज बादल गरजते हैं ।और देखते ही देखते प्यारेलाल के शौक में बादल भी रोने लग जाते है । मानो वे कह रहे हो, ईश्वर के दर पर देर है अंधेर नहीं! 
                               समाप्त ।
                                    —–मोहन सिंह मानुष

  • रोने वाले पापा (कहानी)

                             रोने वाले पापा

                                   मुकुल कितना भी गुस्सा हो ,मगर जब भी वह अपनी बेटी से मिलता हमेशा खुश और जिंदादिली दिखाता । दिनभर की उसकी सारी थकान  एक ही सेकंड में फुर हो जाती थी ।

    आजकल काम की वजह से मुकुल काफी परेशान रहने लगा था ।वहीं थोड़ी सी सैलरी और बहुत सारे खर्चे ,बिजली का बिल ,खाने का राशन ,पापा की गालियां और साध्वी की चिक चिक बाजी ।

    ऐसी बहुत सारी बातें थी जो उसके दिमाग में पूरा दिन चलती रहती थी। बस  दो लोग थे घर में जिनसे उसको कोई शिकवा नहीं होता था उसकी मां और उसकी प्यारी सी नन्ही बेटी ; नैंसी।

    चार महीने की बेटी नैंसी अपनी किलकारियां और अपनी मधुर चिल्लाहट से अपने पापा को भी बच्चा बना देती थी और पापा उसके प्यार में मगन होकर सारी दुनिया के काम झाम को भाड़ में कर देते ।

    साध्वी का यह अद्भुत गिफ्ट मुकुल के लिए किसी एंजेल से कम नहीं था और पापा- बेटी के प्यार को देखकर साध्वी को भी कभी कभार ईर्ष्या होती थी क्योंकि मुकुल आजकल साध्वी से इतना प्यार नहीं जताता था जितना कि वह अपनी बेटी को। फिर भी साध्वी उन दोनों की नजर उतारती ।

    साध्वीं  काफी समय से अपने माइके जाना चाहती थी पर गर्भावस्था के कारण वह नहीं जा पाई और अब मुकुल के पास कोई जवाब नहीं होता था ।

    वो किसी भी शर्त पर नैंसी से दूर नहीं हो सकता था, पर मां की जबरदस्ती और पापा की गालियों  के सामने उसकी एक ना चली और साध्वीं का मायके जाना निश्चित हो चुका था ; उधर मुकुल का बुरा हाल था ।
    मां कह रही थी कुछ ही दिनों की तो बात है, बेटा आजाएगी ; फिर ले आना कुछ दिन बाद में ।

    मुकुल उदास सा मन करके ऑफिस चला जाता है और फिर जब श्याम को घर आया तो घर का माहौल कुछ बदला बदला सा दिखाई दे रहा था और उसकी नजरें किसी को ढूंढ रही थी
    पर नन्ही परी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। उसे जिस बात का डर था वही हुआ।

    अचानक मां आकर पानी देते हुए कहती है : -“बेटा राकेश आया था और साध्वी अच्छे से पहुंच गई है वहां सब ठीक-ठाक है।”
    अच्छा ठीक  है, यह कहकर मुकुल जल्दी से अंदर अपने रूम में जाता है और झट से फोन निकालता है।

    फिर अपनी नन्ही परी की फोटो देखकर, भावुक हो जाता है
    “बेटा तुम्हारी मम्मी कितनी बुरी है! कैसे रहूंगा मैं तुम्हारे बिन? मिस कर रहा हूं मेरी छोटी गुड़िया!”
    उसकी आंखे अखरूओं से भर गई थी और दरवाजे के पास खड़ी मां  देखकर हंस रही थी और उसके मन में द्वंद्व  चल रहा था वह प्रसन्न हो या परेशान!

    “मुकुल तू नन्हा मुन्ना कब से बन गया!”  मां ने मुस्कुराते हुए कहा।
    चलो नहा लो और फिर बात कर लेना फोन पर,
    मगर मुकुल पर जूं नहीं रेंग रही थी ,वह तो अब भी बेटी के ख्यालो में खोया था।…..
                          
                          ——मोहन सिंह मानुष

  • एक दर्द, अनकहा सा (कहानी)

                    एक दर्द ,अनकहा सा

    साल में कितने सारे मौसम आते हैं और चले भी जाते हैं, मगर जब भी वसंत और बारिश का मौसम आता है, काव्या का वो दर्द फिर से हरा हो जाता है जिसको संभालते- संभालते दो वर्ष बीत गए हैं ।

    उसे बचपन की सभी यादें स्मरण हो जाती है कि कैसे रक्षाबंधन के दिन वह राकेश भैया को राखी बांधती थी और फिर राकेश उसको पहले तो चिड़ाता था, मगर फिर बाद में अपने गुल्लक के सारे पैसे दे देता था।

    कैसे ! वे दोनों भाई बहन बारिश के मौसम में घर से बाहर कितनी मस्ती किया करते थे और जब ज्यादा पानी बहने लग जाता था तो वह दोनों अपनी अपनी नोटबुक निकाल कर लाते और लग जाते किसी बेहतरीन आर्टिस्ट की तरह अपनी-अपनी कागज की नाव को बनानें ।

    “राकेश भैया बहुत जल्दी नाव बना लेते हो आप और मेरी तो यहां बनती ही नहीं है” काव्या की यह बात सुनकर राकेश उसकी भी नाव बना देता था तो फिर वह दोनों होड़ लगाते थे कि किस की नाव कितना ज्यादा आगे निकलती है।

    एक नाव के खराब होते ही दूसरी नाव बना दी जाती थी।
    यह खेल बहुत ही शानदार होता है बच्चों के लिए।
    कितना अच्छा होता है हमारा बचपन !
    हर कोई उस बचपन की तरफ मुड़ कर जाना चाहता है मगर यह कहा संभव है।

    जिस खेल को खेलने के लिए वह दोनों भाई- बहन बारिश का इंतजार किया करते थे और बहुत खुश हुआ करते थे आज उसी कागज की नाव की यादें काव्या को सच में रुला देती है ।
    अब, जब भी उसको अपने भाई की याद आती है ,तो वह बारिश से ज्यादा आंखों को बहा देती है।
      घर में उसके माता-पिता और वो ! तीनों बहुत याद करते हैं राकेश को ।
    मगर उन्हें कोई गिला शिकवा नहीं है राकेश से बल्कि उनको तो गर्व है उस पर।

    राकेश बहुत अच्छा बेटा था और अच्छा भाई भी था ,
    मगर उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह देश का एक बहादुर, वीर सिपाही था जिसने देश के दुश्मनों का डटकर सामना किया और उन्हें मौत के घाट भी उतार दिया, मगर एक गोली राकेश के सीने को आर-पार कर गई ,जिससे उसने हंसते हंसते भारत माता को अपना बलिदान दे दिया…..
      
    राकेश की बहन एवं माता- पिता कितना अनकहा दर्द छुपाए बैठे हैं ,उसका अंदाजा लगाना बड़ा ही मुश्किल है।

    लेकिन लोगों की नजरों में यह जताना भी बहुत जरूरी है कि उन्हें गम नहीं, बल्कि नाज है कि उनका बेटा देश के लिए शहीद हुआ है किन्तु यह पूरी सच्चाई नहीं है।
    सच यही है कि नहीं कमी पूरी हो पाती है, उन लोगों की जो हमारे दिल में बसे होते हैं। उनकी यादें भूत सा चिपटी रहती हैं हमारे साथ।

    हमें गर्व है ऐसे जवानों पर ! हमारे अमर शहीदों पर….
    और फख्र है उनके परिवारजनों पर जो एक बेटे की शहादत के बाद दूसरे बेटे या बेटी को फिर से तैयार करते हैं, भारतीय सेना में जाने के लिए ।

    सच में धन्य है वे माता- पिता और परिवार जो राकेश जैसे बेटों को जन्म देते हैं, देश पर निछावर करने के लिए !
    जय हिन्द……….
                           
                            ——-मोहन सिंह मानुष

  • “मैं स्त्री हूं”

    सृष्टि कल्याण को कालकूट पिया था शिव ने,
    मैं भी जन्म से मृत्यु तक कालकूट ही पीती हूं।
                                                       मैं स्त्री हूं।
                                                 (कालकूट – विष)

    मचा था चारों ओर घोर त्राहिमाम जब,कोई ना था बचाने को,
    तब तुम्हें बचाने वाली दुर्गा – महाकाली हूं।
                                                        मैं स्त्री हूं।

    मैं जटाधीश की जटाओं से बहने वाली हूं,
    मैं सगर के पुत्रों को मुक्त कराने वाली हूं,मैं गंगा हूं,
                                                            मैं स्त्री हूं।

    है राम अगर मर्यादा पुरषो्तम तो,
    मैं भी तो मर्यादा की देवी हूं,मैं सीता हूं,
                                                   मैं स्त्री हूं।

    मैं सदा अपना पतिव्रत धर्म बचाने वाली हूं,
    मैं तप से त्रिदेवो को भी शिशु बनाने वाली हूं, मैं अनुसुइया हूं,
                    मैं स्त्री हूं।

    मैं राम कृष्ण को जनने वाली हूं,
    मैं माता हूं, मैं बहन हूं, मैं वंश बढ़ाने वाली हूं,
                                                           मैं स्त्री हूं।

    मैं हर दुख को सहने वाली हूं,में राधा हूं,
    मैं सदा भक्ति प्रेम करने वाली हूं, मैं मीरा हूं,
                                                         मैं स्त्री हूं।

    मैं काल से सत्यवान को बचाने वाली हूं, मैं सावित्री हूं,
    मैं सदा शौर्य दिखलाने वाली हूं,में लक्ष्मीबाई हूं,
                                                             मैं स्त्री हूं।

    मैं सम्मान की खातिर जीने मरने वाली हूं,
    मैं चित्तौड़ का जौहर दिखलाने वाली हूं, मैं पद्मिनी हूं,
                                                            मैं स्त्री हूं।

    में सर्वस्व त्याग समर्पण करने वाली हूं ,
    में सदा सहनशीलता रखने वाली हूं,
                                                 मै स्त्री हूं।

    मैं कदम से कदम मिलाकर चलने वाली हूं,
    मैं जरूरत पड़ने पर पिता का अंतिम संस्कार भी करने वाली हूं,
                  मैं स्त्री हूं।

    मैं दयावान हूं,में बुद्धिमान हूं, मैं किसी पुरुष से कम नहीं ,
    फिर भी अपने अपने सपनों को कुचलने वाली हूं,
                                                            मैं स्त्री हूं।

    सब कुछ अपना न्योछावर करके भी,
    बस प्रेम चाहने वाली हूं, मैं संतोषी हूं,
                                                मैं स्त्री हूं।

    मैं तेरी हर मुश्किल हर लेने वाली हूं,
    मैं मयंक जनने वाली हूं ,
                                   मैं स्त्री हूं।
                            ✍️✍️मयंक “उषा” व्यास✍️✍️

  • बचपन

    वो मां का हाथ पकड़कर चलना,
    वो दौड़कर भाई का पकड़ना।

    वो दादी के किस्से कहानी सुनना,
    वो धागे में हाथ पिरोना।

    वो गर्मी में नानी के घर जाना,
    वो मामा का गोद में उठाना ।

    वो दोस्तो के साथ दिनभर खेलना,
    वो चिंतामुक्त शरारती जीवन जीना।

    वो सुबह उठकर स्कूल जाना,
    वो बहाना बनाकर वापस आना।

    वो स्कूल में तिरछी आंखों से उसे निहारते रहना,
    वो शक्तिमान का नाटक देखते रहना।

    वो रूठकर कोने में बैठ जाना,
    वो मां का दुलार पाकर मान जाना।

    कोई बतलाए क्या हम पानी में आग लगा सकते है?
    क्या फिर से  बचपन पा सकते है-2?

    मेरी बस यही गुजारिश है ,
    अपनी उम्मीदों का बोझ तुम बच्चो पर मत डालो,
    तुम बच्चो का बचपन मत मारो।

  • तू मेरी है जिंदगी

    एक प्यारा सा सपना! है जिंदगी,
    तेरी जुल्फों का लटकना !है जिंदगी,
    तेरी आंखो का काजल! है जिंदगी,
    मैने कहा तू मेरी! है जिंदगी।

    तेरे पैरो कि पायल, हैं जिंदगी!
    तेरे हांथो का कंगन, है जिंदगी!
    तेरा मेरा बंधन ,है जिंदगी!
    मैने कहा तू मेरी, है जिंदगी।

    तेरा खिलखिलाना, है जिंदगी!
    तेरा रूठकर बैंठ जाना,है जिंदगी!
    मेरा तुझको मनाना,है जिंदगी!
    मैने कहा तू मेरी ,है जिंदगी।

    मेरा तुझको पुकारना, है जिंदगी!
    तेरा इंतजार कराना,है जिंदगी!
    तेरा दौड़कर आना ,है जिंदगी!
    मैने कहा तू मेरी ,है जिंदगी।

  • सत्ता के निराले खेल

    मध्य प्रदेश की राजनीति का खेल बड़ा निराला था,
    पांच साल की सत्ता को दो वर्षो में ही मारा था।

    महाराज के सारे सपने एक वर्ष में टूट गए,
    महाराज कांग्रेस से बिल्कुल देखो रूठ गए।

    रूठकर महाराज ने सालो पुराना रिश्ता तोड़ दिया,
    महाराज ने कॉग्रेस से सारा नाता तोड़ दिया।

    चलती सत्ता की गाड़ी को पटरी से उतार दिया,
    मामा के संग मिलकर फिर से कमल खिला दिया।

    देखने वाले देखते ही रह गए,
    महाराज राज्यसभा का टिकट ले गए।

    सालो पुराने सारे शिकवे दो पल में ही मिट गए,
    सत्ता बनाने मामा – महाराज एक साथ मिल गए।

    एक तरफ तो बारात में बारातियों का मेला है,
    दूसरी तरफ खड़ा दूल्हा बिल्कुल अकेला है।

    आने वाले उपचुनाव है या फिर शीत युद्ध की तैयारी है,
    जनता का तो पता नहीं पर सत्ता सबको प्यारी है।
                                 ✍️✍️मयंक व्यास✍️✍️

  • Mask

    पहले जब होती थी मुलाकात तो
    अधरों पर उभरी मुसकान देती थी दिखाई
    आज जब मास्क लगाऐ मिले तो
    वही खिलखिलाहट नज़रों ने सुनाई।

  • पूजनीय शिक्षक

    शिक्षक सम संसार में हितकारी ना कोइ।
    सकल सृष्टि के भाग्य का एक विधाता सोइ।।

    कहिए द्विज, शिक्षक, गुरु या कहिए उस्ताद।
    परमेश्वर को पूजिए गुरु पूजन के बाद।।

    लेकर गुरु की चरण- रज मस्तक तिलक रचाय।
    संजय ऐसे शिष्य पर शारद होयँ सहाय।।

    शिक्षक के सम्मान को पहुंचाए जो चोट।
    उस नेता के पक्ष में कभी न करना वोट।।

    बनता अगर कलेक्टर रहता धक्के खाय।
    बलिहारी माँ बाप की शिक्षक दियो बनाय।।
    खुद अध्ययन करता रहे, रहे बाँटता ज्ञान।
    खुद सीखे यदि अनवरत दूर करे अज्ञान।।

    औरन को भल बनन की बांटो तभी सलाह।
    जब तेरे खुद के चरण सही पकड़ लें राह।।

    करे मनन चिंतन सदा दूर करे निज खोंट।
    निर्विकार बन तब करे परदोषों पर चोट।।

    अपने अवगुण ज्ञात कर व्यापक करो प्रचार।
    रिपु में यदि सदगुण दिखे तुरत हृदय में धार।।

    अपनी कमियाँ प्रकट कर दोष अन्य के गोय।
    यद्यपि सो जन गुण रहित पर सर्वोत्तम होय।।

    संजय नारायण

  • कान्हा

    बांवरी हुईं जा रही,
    सुन मुरली की बतिया,
    सुनी होती तान तो ,
    क्या हाल होता, रसिया।

  • शहीदों के नाम

    यह इतना धैर्य तुम कहाँ से लाएं
    तभी तो तुम शहीद् कहलाए
    शस्त्र तुम्हारे हाथ में था
    देश के मान के लिए अडे रहे
    अपने बाहुबल से ही शत्रु मार गिराए
    तभी तो तुम शहीद् कहलाए
    घर तुम्हारा भी था
    परिवार बैठा था आँखे बिछाऐ
    तुमने देश वासी हीं रिश्तेदार बनाऐ
    तभी तो तुम शहीद् कहलाए
    सपने तुम्हारे भी थे
    पूरा करने का इंतजार लिए
    देश के लिए बलिवेदी पर चढाऐ
    तभी तो तुम शहीद् कहलाए
    यह इतना धैर्य तुम कहाँ से लाएं
    तभी तो तुम शहीद् कहलाए।

  • कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

    बहुत कष्ट सहे जिनका गोकुल में जन्म हुआ दुष्ट के साथ कूटनीति, गीता का ज्ञान दिया ना जाने कितने असुरों ने मारने का प्रयास किया फिर भी इतिहास रचा ,धर्म और प्रेम को मान दिया ❣️❣️ हैप्पी कृष्ण जन्माष्टमी

  • पत्थर से पंगा मत लेना

    दोष नहीं दर्पण का थोड़ा
    सदा सत्य दिखलाता है।
    कपटी क्रूर कपूत घमण्डी
    दर्पण को दोषी कहता है।।
    सत्य असत्य के चक्कर में
    पत्थर से पंगा मत लेना।
    देख ‘विनयचंद ‘सीसा हो तुम
    इसको मत भुला देना।।

  • माखन की चोरी

    मनमोहक छवि मनमोहन की
    और मनहर है हर लीला उनकी।
    आनन्दकन्द आनन्द सबन हित
    घर-घर चोरी की माखन की।।

  • रक्षाबंधन

    आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं

  • तरकश

    अभी और भी तीर हैं,तरकश में तेरे बाक़ी,
    हार से पहले रोता क्यूं है।
    इस युद्ध में तेरे विरूद्ध हैं कुछ लोग,
    कुछ लोग तेरे साथ भी हैं,।
    पलकें भिगोता क्यूं है।

  • रंगों का खेल

    रंगों से ही समा बांधे जाते हैं,
    रंगों से ही ये ज़मीं आसमां जाने जाते हैं।
    जनाब पर अब तो रंग भी धर्म के नाम पर बाँट दिये जाते हैं,
    और ये रंग गुरूर की मिसाल बन जाते हैं।
    रंगों के कारण भेद भाव होता देखा है,
    पर अब तो रंगों के साथ भेदभाव होता है।
    डर लगता है प्रकृति हरी देख कर मुसलमान को न दे दें,
    खून लाल देख कर हिंदू का हक न जम जाए।
    गुज़रिश् है की रंगों को मन की खुशियाँ ही बढ़ाने दो,
    वरना जहाँ में भी सरहद बनकर दंगे शुरू हो जाते हैं।
    बाँटने का शौक है तो खुशियाँ बांटो, दुख दर्द बांटो,
    ये रंग क्या चीज है???

  • हे राम

    हर सुबह हर शाम
    मेरे मुख से निकले तेरा नाम
    हे राम हे राम हे राम।।

  • बहते पवन को किसने देखा?

    न तुमने देखे न मैंने देखा।
    बहते पवन को किसने देखा?
    जुल्फ चुनरिया उड़ते जब जब।
    बहती हवाएँ समझो तब तब।।
    बादलों को जो चलते देखा।
    बहते पवन को उसने देखा।।
    न तुमने देखे न मैंने देखा।
    बहते पवन को किसने देखा?
    चहुदिश बजती एक सीटी-सी।
    तन को ठण्ड लगे मीठी-सी।।
    बृक्ष लता सब हिलते देखा।
    बहते पवन को उसने देखा।।
    न तुमने देखे न मैंने देखा।
    बहते पवन को किसने देखा?
    रोसैटी के ये भाव मनोहर।
    शब्दों के एक हार पिरोकर।।
    ‘विनयचंद ‘ नित देखा।
    न तुमने देखे न मैंने देखा।
    बहते पवन को किसने देखा?

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