बाल मन पर कविता

शिक्षक

बचपन से ही शिक्षक के हाथों में झूला-झूला करते हैं, ज्ञान का पहला अक्षर हम बच्चे माँ से ही सीखा करते हैं, प्रथम चरण में मात-पिता के चरणों को चूमा करते हैं, दूजे पल हम पढ़ने- लिखने का वादा शिक्षक को करते हैं, विद्यालय के आँगन में शिक्षक हमसे जो अनुभव साझा करते हैं, उतर समाज सागर में हम बच्चे फिर कदमों को साधा करते हैं, एक छोटी सी चींटी से भी शिक्षक हमको धैर्य सिखाया करते हैं, सही मार्ग हम बच्चों को अ... »

ज्ञान

जिसको जैसे समझ आये समझाना पड़ता है, एक शिक्षक को बड़ा दिमाग लगाना पड़ता है, बहुत शरारत करते हैं जब, बच्चे मन के सच्चे हैं जब, गुरु ज्ञान की महिमा को फिर सबको दिखलाना पड़ता है।। राही (अंजाना) »

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

क्यो कुचलते हो परतीभा के परतीभाओ को, चंद पैसो के लिए तुम्हारे घर खुशी जाती पैसो की,, यहाँ परतीभा वाले बच्चे की लाशे मिलते नदी या रेल किनारे मे,, क्यो कुचलते हो चंद पैसो के लिए,, JP singh »

अगर मै कुड़ा कागज होता,

अगर मै कुड़ा कागज होता,

अगर मै कुड़ा-कागज होता , तो मेरा कोई ना सुबह होता ना शाम होता, ना घर होता ना परिवार होता, शिर्फ मेरे साथ रास्ते का धुल होता,,,,, अगर मै कुड़ा–कागज होता, कभी पढ़ने का काम आ जाता कभी बच्चे के खेलने मे काम आ जाता ,, अगर मेरी अस्तीत इंसान के बीच खत्म भी हो जाती ,, तो मै किसी काबारी को भी काम आता!! ,अगर मै कुड़ा -कागज होता_, ना मेरी कभी अंत होती !! मुझे फिर से नया बनाया जाता कभी अफसरो के बीच कभी ... »

गिल्ली

गिल्ली डंडे के खेल पुराने हो गए, कंचे के काँच दिखे जमाने हो गए, भरे रहता था आसमाँ जिन पतँगों से कभी, अब ज़मी पर बच्चे भी निराले हो गए।। राही (अंजाना) »

काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती

✍✍✍काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती , शिर्फ एक इंसायनित की नाम होती,, तो दिल्ली मै बैठे गद्देदार की रोटी नही सिझती। रामायण और कुरान मे भेद बताकर अपनी रोटी सेकते है गद्देदार ,, अगर बच्चे प्रर्थाना करते तु ही राम है,तु रहीम है, तु करीम —– तो सौ वर्षो से हो रही गाथा मे भेद बताकर मुल्क को बाटँते हो गद्देदार, अब बस करो अपनी रोटी सेकना गदे्दार मेरे बच्चे के हाथ मे फुल के बदले हथियार दे... »

बचपन

बारिश के मौसम में कागज़ की कश्ती डूबने का इंतज़ार ही करती रह गयी। और ये बच्चे उड़ने के सपने लिए उस कागज़ को पढ़ते ही रह गए। »

पापा

अगर देती जन्म “‘” माँ”” चलना; सभलना सिखाते है पापा। . …………. जितना भी बच्चे फरमाइस करते; पुरा करते है पापा। अपना सारा अरमान कुचलकर; बच्चे के अरमान को पूरा करते पापा।। अपने बदन पर कपड़ा भले ना हो;_ . बच्चे के बदन पर कपड़ा पुरा करते पापा — अपने आज तक बंद आसमान मे सोए नही …………….. बच्चे के घर पंखा लगाते पापा।। घर ... »

जोकर

पहने सर पर नीली टोपी उछलता -कूदता आता है कभी इधर तो कभी उधर नाचता और नचाता है। भर अपने थैले में टॉफी बिस्कुट सबको लाता है हाथ मिलाकर बच्चों से एक जादू की झप्पी लेता है। रोते बच्चे को झट से अपनी बातों में वो लेता है मुँह फुला कर तोंद दिखाकर खुशियाँ उसको देता है। बच्चों के संग मिलजुल कर वो खेलता और खिलाता है चंद पैसो के खातिर वो ये सब कुछ हँस कर करता है हज़ारों गमों के समुन्दर को वो ज़ाहिर कभी न करता ... »

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे, भला किस तरह ये बच्चे सर झुकाते होंगे, उम्मीदों के जुगनू ही बस मंडराते होंगे, बड़ी मशक्कत से कहीं ये पेट भर पाते होंगे, तन पर चन्द कपड़े ही बस उतराते होंगे, शायद सोंच समझ कर ही ये मुस्काते होंगे, बहुत संग दिल होकर ही वो इतराते होंगे, हालत देख कर भी जो न प्रेम भाव दिखलाते होंगे।। राही (अंजाना) »

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