महारानी

August 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

महारानी
———–
समस्त आकांक्षाओं का वृहद आकाश.. और पतंग सी वह।

उड़ती ..खिचती..
डोर से बँधी
ऊँचा उड़ने का माद्दा रखती..वह।

इंद्रधनुषी रंगो से सजे..
ख्वाब..
हृदय में सजाएँ,
पेंडुलम सी झूलती वह।

भीगे आँचल.. खाली मन को छुपाती,
चेहरे को सुंदर कचनार सी सजाती वह।

पहाड़ी पर खिले बुरुस के फूल सी..
तेज आँधी में डटे हुए पेड़ सी वह।

बंजर मन में केसर की खेती बसाए..
प्रेम श्रृंगार कर
उदास चेहरे पर हँसी चिपकाए वह।

ओस व सूर्य के उजास से आँखे धोती,
चमकती निखरती वह।

चाहती है थोड़ा सा प्रेम, सम्मान,
कोमल एहसास वह।

जब पुरुष समझ जाता है उसका मन
तो बना लेती है उसे प्राणों का आधार वह।

चरण रज भाल पर सजा खिल उठती है ग़ुलाब सी वह।

नाचती है सूर्य रश्मियों सी
महसूस करती है ह्रदय में खुद को कुछ खास…
जैसे बन गई हो
“महारानी” वह।

निमिषा सिंघल

मजदूर

August 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मजदूर
——-
मुट्ठी में बंद उष्णता, सपने, एहसास लिए,
खुली आँखों से देखता है कोई …..
क्षितिज के उस पार।

बंद आँखों से रचता है इंद्रधनुषी ख्वाबों का संसार।

झाड़ता है सपनों पर उग आए कैक्टस और बबूल….
रोपता है सुंदर फूलों के पौधे बार -बार।

उगता है रोज सुबह नई कोपल सा …
करता है सूर्य की पहली किरण का इंतजार।

मासूम हँसी
से मुस्कुराहट लेकर उधार,
चल पड़ता है ख्वाबों का थैला लिए… हँसी
लौटाने का वादा कर हर बार।

श्रम, पसीने के सिक्के बाजार में चला
खरीद लेता है कुछ अरमान…
लौटाने मासूम चेहरों पर हँसी,मुस्कान।

कठोर धरती पर गिरते अरमानों को…
आँखों की कोरों में छुपा,
चिपका लेता है चेहरे पर नकली हँसी,
पर अतृप्त आँखें बता देती है उसके दिल का हाल।

ग़ज़ल

August 30, 2021 in ग़ज़ल

भर लो आगोश में,
आओ कि सहारा दे दो,
इश्क है कि नहीं
थोड़ा सा इशारा दे दो।

1.हम भरम में रहे कि इश्क है तुमको हमसे
करो न याद सितमगर
तो भुलावा दे दो।

2. आरजू है तेरी दिल को जख्म सीने में,
हादसा है बड़ा गहरा कि सहारा दे दो।

3. खलिश है सीने में जहर है मीठा सा,
छीना है चैन मेरा तुमने
उसे वापिस दे दो।

4. न मिले तुम तो हम बस लाश ही रह जाएँगे,
ओ सितमगर मेरी मय्यत को सहारा दे दो।

5. कौन कहता है कि फिरता है कोई दीवाना
शमा जलती रही
बुझने का इशारा दे दो।

स्मृतियां बातें करती हैं

August 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम्हारी हँसी तुम्हारा रुदन,
तुम्हारी स्मृतियाँ
संँजो रखी हैं
कीमती दस्तावेजों की तरह कागजों पर मैनें।

तुम्हारी आंँख से टपके आँसू ..मोती बन
स्वर्णाक्षर से लिख गए हैं वहाँ।

कागज के उस जादुई कालीन पर
तुम्हारे साथ
पार हो जाते हैं जंगल-जंगल, नदी, पहाड़।

बारिश में भीगे तेरे- मेरे अल्फ़ाज़ जब बह निकलते हैं….
कलम, कश्ती बन
कर लेती उन्हें सवार।

चलने लगती स्वत: ही उंँगलियों में समा
भरने लगती कागज,
शब्दों का लग जाता अंबार।

जब स्मृतियांँ बातें करतीं
ग्रंथ रच जाते
अनगिनत कविताएंँ हो जाती तैयार।

निमिषा सिंघल

कोकिला

August 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कोकिला
———–
कानों में मिश्री सी घोले,
काली ‘कोकिला’ मीठा बोले।

रूप रंग लुभाते हैं….
पर गुणों के अभाव में
तिरस्कार ही पाते हैं।

गुण अमूल्य समझाती है,
मीठी तान सुनाती है।

पतझड़ हो या रहे बसंत,
सुर में मगन हो जाती है।

दिन देखें न रात कभी,
बड़ी लगन से गाती है।

कुहू कुहू की नकल करो तो फिर से वही दोहराती है।

नीरस पतझड़ के मौसम में,
राग रस ले आती है।

लगता जैसे मधुर कंठ से
जीवन राग सिखाती है।

निमिषा सिंघल

तुम्हें आना पड़ेगा

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम्हें भारी पड़ेगा
तैरना ऊपर सतह पर,
रत्न मिलते नहीं भटकन वहां पर।
रत्न मिलते हैं गहराइयों में,
तुम्हे आना पड़ेगा, ह्रदयतल में उतरकर।

एक कवि का जाना

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक कवि का जाना
————————
एक कवि अपनी दूर दृष्टि और लेखनी से
पूरे संसार का दुख सुख समेट बिखेर देता है सुंदरता से कागजों पर
कीमती मोतियों की तरह, इनकी
चमक से मिलती है
कुछ भटके पथिकों को राहें
कुछ दुखती रगो को शांति,
किसी उल्लासित मन को प्रेम।
किसी अधूरे से हृदय को अपनी सी कहानी,
किसी दुखी मन को संतोष,
किसी अधीर मन को धैर्य।
सभी को उनके हिस्से का कुछ ना कुछ देकर विदा हो जाता है एक कवि इस संसार से
चमकता सितारा बन।

निमिषा सिंघल

जिंदगी एक किताब

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

“जिंदगी एक किताब है, सारे हर्फ न पढ़ पाएगा‌
दुख सुख है बदलाव है,
बढ़ता चल..
वरना उलझ कर रह जायेगा।”
निमिषा सिंघल

पूस की रात

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पूस की रात
————-
कड़कड़ाती सर्दी,सिसकती सी रात
ठिठुरन, सिहरन आरंपार।
पूस की रात जो हुई बरसात
कांप उठी सारी कायनात।
ना जाने कब
होगी ये प्रातः।

ठंड और कोहरे ने
गला दिए हाड़ मांस।
खून जम चुका है
प्रभु से लगी है आस।

कांप रहे जन
जिनका नहीं है बसेरा कही।
शीत से बचने को
चिथडो में
लिपटे कुछ प्राण है।

शीत का प्रकोप जारी
ठंड है या कोई महामारी
जान पे बनी है
कायनात पर पड़ी हैं भारी।

एक तरफ जश्न है
लोग सब मगन है
एक तरफ कफ़न है
इस ठंड में भी नग्न है।

दीनो को संभालो प्रभु
देवदूतों को उतारो प्रभु
सड़के बनी शमशान
अब तो देदो प्राण दान प्रभु।

चक्र को घुमाओ प्रभु
संकट मिटाओ प्रभु
द्रोपदी की साड़ी सा
कंबल बन जाओ प्रभु।

रक्षक तो थे ही
रक्षाकवच बन जाओ प्रभु।

निमिषा सिंघल

हरसिंगार

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हरसिंगार
———–
रात भर महकता, संवरता करता इंतजार,
तड़प कर बिखर जाता धरा पर ….
होकर बेकरार।
खिल जाती धरा,
मुस्कुराकर कहती
आओ केसरिया बालम
हरसिंगार!

जिंदगी

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिंदगी
———
हर किसी को खुश रख सके…
यह तो भगवान के भी बस की बात नहीं।

किसी के लिए अच्छे हैं तो किसी के लिए बहुत बुरे भी।

तो हार जीत से डरना कैसा!
कोई क्या कहेगा घबराना कैसा!
जिंदगी बदलाव है ठहराव नहीं,
जिंदगी बहुत खूबसूरत है केवल युद्ध का मैदान नहीं।

निमिषा सिंघल

तृप्ति

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तृप्ति
——
वाग्देवी सरस्वती लड़खड़ाती जब
निकलती हैं पहली बार बोलते किसी बालक के स्वर से…
तो रसिक की तरह निहाल हो जाते हैं हम सब।
वह पहला मधुर स्वर सुनने को लालायित, हमारे कान
और नन्हे बालक के
सुकोमल अधरों पर फूटते स्वर…
सूर्य की किरणों के सामान उल्लासित करते हैं सभी को।
उस तुतलाती भाषा में ढूंढ लेते हैं स्वयं ही हम, खुद के लिए बोला जाने वाला संबोधन
और चहक कर चूम लेते हैं पुष्प के सामान कोमल अधर उस बालक के।

आत्मा को चंदन के समान शीतलता प्रदान करती है यह मधुर स्वर लहरियां,
सुगंधित कर देती हैं अंतरात्मा को।
भीनी सुगंध से तृप्त होकर हम फिर झौक देते हैं खुद को जीवन के दावानल में।

फिर सुकून पाने के लिए हाथ बांधे खड़े हो जाते हैं उस बालक के समक्ष,
फिर से प्रेम सुधा पाने के लिए
विलग है ये मनभावन आलौकिक अहम से‌ परे भावों की प्रबलता….
जो भगवान ने बालक के रूप में बिना किसी भेदभाव के सभी प्राणियों को प्रदान की है।
निमिषा सिंघल

शोर

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अनर्गल पक्षियों की चहचहाहट
हमें शोर महसूस होती है

जिस ध्वनि को सुनना
हमारा मन गंवाया न करें
वे सभी शोर हैं

शरद ऋतु का आगाज

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

शरद ऋतु का आगाज़
—————————-
लंबी हो चली रात ,
कोहरा और बरसात।
ऐसे में तेरा साथ,
रूमानी एहसास।
गुलाबी होठों के खुलते ही गर्म सांसों की आवाज़।
कोहरे की चादर ओढ़े सूरज की तबीयत नासाज।
यह है शरद ऋतु का आगाज़।
निमिषा सिंघल

थोड़ा सा कुछ

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

थोड़ा सा कुछ
——————
घर एक कारखाना,
काम करते-करते..
थोड़ा सा कुछ रह ही जाता है।
तन- मन से बढ़िया से बढ़िया करने के बाद,
मुस्कुराहट के साथ परिवारी जनों की प्रतिक्रिया जानने के लिए
जब परसे जाते हैं व्यंजन,
एक तकिया कलाम मिल ही जाता है,।
“बहुत उम्दा बना है
अगर इसमें थोड़ा सा……”
निमिषा सिंघल

गुनगुनी धूप

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

वह गुनगुनी धूप सी तेरी हंसी,
मानो गुलाब की पंखुड़ियां एक साथ झड़ी।
मधुर अधर सकुचाये से शरमाये से
बेकरार दिल ये उड़ा जाए रे।
निमिषा

बेकरार दिल

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक झलक और मुस्कुराहट तुम्हारी,
देती रहें खुशियां..
न हो युद्ध की तैयारी।
धड़कनें राग बजाती रहें,
अभी जिंदा है हम…
यह जताती रहे।
रौंनके बरकरार रहे,
क्या बात हो अगर ..
ता उम्र ..
तेरे प्यार में हम …
बेकरार रहें।

निमिषा सिंघल

लम्हे

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

लम्हें
—–
कुछ गहरे घाव से दुखते होंगे,
कुछ गहरे तंज जो आज भी चुभते होंगे।
कुछ वक्त के मरहम से भर चुके होंगे,
कुछ सुगंधित फूल से महकते होंगे।
कुछ लम्हें तोहमतें,
कुछ तोहफों से जंचते होंगे।
कुछ लम्हें ख्वाबों के उड़ानों के,
कटे पंखों से भी उड़ते होंगे।
कुछ लम्हें बंजारे तो कुछ बेहद दिलकश लगते होंगे। ‌
खट्टी-मीठी सी जिंदगी
के सारे पन्ने,
कभी कड़वे तो कभी रसीले लगते होंगे।
चलो कुछ कड़वापन भुलाते हैं,
मीठे लम्हों की कश्ती के चप्पू चला कर…
ए जिंदगी कहीं दूर निकल जाते हैं।
निमिषा सिंघल

पुनर्स्थापना

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पुनर्स्थापना
————-
गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक और राजा राममोहन राय नहीं जानते होंगे की कुप्रथा पर रोक लगाने के बाद भी….
वे नहीं रोक पायेंगे उन्हे।

बस चोला बदल पुनर्स्थापित कर दी जाएंगी अलग-अलग सदी के आकाओं के हिसाब से।

स्त्रियां अनवांटेड और मोस्ट वांटेड के बीच झूला झूलती रह जायेंगी।

आकांक्षाएं बाज के पंखों सी अनंत आकाश की गोद में फैलती सिकुड़ती रहेंगी।
ढोल नगाड़ों जनित कथित उल्लासित शोर,
बेड़ी पहना स्वागत करता रहेगा।

संरक्षण की चाहत में स्वर लिपियां खुद ही चुन लेती हैं बेड़ियां और
मौन हो जाती हैं।

घूमती रहती हैं बेबस वैशाली के खंडहरों में।

सत्य, झुर्रियों के जंगल में लहूलुहान,आदम स्मृतियों सा विस्मृत उलझा रहता है अपनी खोज में।

लचीली हो चुकी उम्र नियंत्रण पा लेती है खुद पर,
मजबूत होते पंजों की तरह।

कुछ कर गुजरने की ललक और शक्तियों का आह्वाहन बचाए रखता है अस्तित्व को।

अंदर गहरे कुएं में आत्मा का सूफी नृत्य परमानंद की तरह सुख संतोष देता है।

झांझर सी बजती संवेदनाएं आखिर तानाशाह बन जाती है।

बजने लगते हैं फिर से ढोल नगाड़े अपने पसंदीदा।
विभूषित हो जाती है जब कोई नार….
आत्मिक शक्तियों के आवरण से और सवार हो जाता है जुनून…तब
रहस्यमयी आत्मा दिखाने लग जाती है रास्ते रोशनी भरे …. स्वयं का पुनर्स्थापना दिवस मना।

निमिषा सिंघल

सफलता

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सफलता
———–
बुझ रहे हो दीयें सारे, ओट कर.. जलाए रखना।

जल विहीन भूमि से भी, तुम….
निकाल लोगे जल..
विश्वास को बनाए रखना।

अंधकार व्याप्त हो.. सूर्य की तलाश हो,
मार्ग जुगनूओं की रोशनी से तुम सजाए रखना।

मुश्किलें मिले अगर, डर के लौटना न तुम..
आत्मविश्वास की चमक चेहरे पर खिलाए रखना।

मान को बनाए रखना,
सम्मान को बचाए रखना।
रच दो इतिहास , ऐसा परचम फहराये रखना

ज्ञान की मशाल से रोशनी फैलाएं रखना।
जीत लेना दुनिया को,
ह्रदय सदा विशाल रखना।

अस्थियां जलाकर अपनी वज्र का निर्माण कर,
सूर्य की तपिश को भीनी चांदनी बनाए रखना।

तप कर… चोट खाकर ही
निखरता है सोना खरा,
उस तपन की शुद्धता को व्यक्तित्व में समाये रखना।

स्वेद की बूंदों को …ललाट पर सजाए रखना
कर्म करके भाग्य रेखा को पुनः चमकाए रखना।
श्रम की चमक घोल अपने कर्म में मिलाएं रखना।

हौसला विमान हो सपनों की उड़ान हो,
रोक पाए न आंधियां ,
ऐसा जज्बा -ए तूफान हो।
जीत की ललक को .. अपनी आंखों में सजाए रखना।

पर्वतों को तुम झुका कर रास्ता अपना बना लो,
गति कहीं अवरुद्ध ना हो मंजिले ‘जिद ‘तुम बना लो।
लक्ष्य निरंतर भेद कर,
खुद को अलभ्य बनाये रखना।

निमिषा सिंघल

ऊर्जा स्रोत

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ऊर्जा स्रोत
————-
प्रिय!
विद्युत सी है वाणी.. चल पड़ती है तो कानों में घुल… रूपांतरित हो जाती है मेरी हंसी और क्रोध में अनायास।

याद दिला ही देते हो तुम “जूलियस रॉबर्ट मेयर”की…
ऊर्जा के कभी नष्ट ना हो पाने के नियम के साथ।

कभी-कभी बादलों सा हो जाता है हृदय… भरभरा कर फट पड़ता है,
चमकने लगती है कई तरह की बिजलियां… आंखों, चेहरे, जुबां और नाक की नथुनों से।

अबकी बार ऊर्जा का रूपांतरण कुछ डरा देता है तुमको…
और क्षय होने लगती है कुछ हिस्सा ऊर्जा दूसरे नियम के अनुसार।

आंखों से बहते जल की ऊर्जा…. जल शक्ति बन रोशन कर देती है यादों के गलियारों में लटके बल्ब।

आने लगती हैं अच्छी -बुरी यादें एक साथ।

यादें! जो बायोमास की तरह संचित है मन के किसी कोने में।
लग जाती हैं मस्तिष्क में उपजे विचारों की पौध रोपने में।
मंथन! दही सा मथने लगता है विचारों को…
मक्खन की तरह …
ऊर्जा फिर बाहर आने लगती है।

हां! ऊर्जा के इस स्थानांतरण में तापमान में फर्क आ जाता है।

आखिर! मनुजता भी तो विद्युत के तीक्ष्ण झटके खाकर ही परिपक्व हुई है।
तुम्हारी हंसी मिश्रित फूंक… फिर वायु ऊर्जा में बदल. ‌.. घुमाने लगती है पवन चक्की दिमाग की।

दिमाग! जब घूमते- घूमते घनचक्कर बन जाता है तो सूर्य के समान तुम! सौर ऊर्जा युक्त प्रेम से… दे देते हो प्राण….
विद्युत से जलते सूखते हृदय को,

मेरे ऊर्जा स्रोत बन।

निमिषा सिंघल

दस्तावेज

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दस्तावेज
———–
दबे पांव तृष्णायें घेर लेती है एकांत पा,
विचारों की बंदिनी बन असहाय हो जाती है चेतना।

अवचेतन मन घुमड़ने लगता है बादल बन,
लहलहाने लगती है विचारों की फसल।

ऋतु परिवर्तित हो..बसंती हवा से भिगोने लगती है मन।

मन के किसी कोने में बहुमूल्य दस्तावेजों के पन्ने खुलने लगते हैं एक- एक कर,
संवेदनाएं घेर लेती हैं।
धावों से रिसने लगता है लहू।

फिर शब्दों का मरहम शांत कर देता है मन,
समुंद्र की तलहटी में जाकर सुकून ढूंढता सा मन… फिर सतह
पर तैरने लगता है।
अद्भुत है यह प्रयास… डूबने और तैरने का।

साहसी, विद्रोही मन, छलनी देह को बांसुरी बना बजने लगता है,
आर्मी बैंड की धुन “वीर तुम बढ़े चलो” की तरह।

लेखनी हथियार बन सिर कलम करने लग जाती है…
शोषित, पीड़ित, अपराध बोध से ग्रसित आत्मा का।

सिर कलम होते ही परिंदे सी रुह,
बाहर निकल हंसने लगती है मुझ पर,
हथौड़े की चोट सी वह हंसी चटकाने लगती है अंतर्मन।

आंखे तरेर जताने लगती है घाव,
लेखनी पढ़ ही लेती है उन घावों को और रच देती है काव्य…
दस्तावेजों में संग्रह करने के लिए।

निमिषा सिंघल

जिंदगी रुक नहीं सकती

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिंदगी प्रतिक्षण अंतिम पड़ाव की ओर कदम बढ़ाती है
इस सच को हम भूलना चाहते हैं
पर किसी न किसी की मौत हमें यह सच बार-बार दिखाती हैं

मृत्यु का डर बार-बार हमें अच्छे बुरे कर्मों की तस्वीर दिखाता है
मौत समझाती है अटल हूं मैं
प्यार से मिलजुल चाहत के फूल खिलाए रखिए

प्रेम, मोह, स्नेह मृत्यु के आगोश में विलीन हो जाता है,
जिंदगी रुक नहीं सकती किसी के जाने से।

बनाए रखिए

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ज़ुबान तेज हो तो शूल सी चुभती है बहुत
चुभन के दर्द से लोगों को बचाए रखिये।
जिंदगी ठहरी है न ठहरेगी कभी,
प्यार के दीप, फिजाओं में जलाए रखिए।
मौत आगोश में ले लेगी सभी को एकदिन,
यह हकीकत है मगर
मगर दिल में छुपाए रखिए।
चैन मिलता नहीं आसानी से,
बैचेनियां बेच कर कुछ चैन बचाए रखिए।

प्रेम से मिलते रहा कीजिए एक दूसरे से,
क्या पता मौका, मुलाकात कभी हो के न हो।
चाहते बरकरार रहे अलविदा कहने पर भी,
संबंधो में शहद सी मधुरता तो बनाए रखिए।

निमिषा सिंघल

क्षणिका

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ज्ञान का घेरा,
मज़हब का अंधेरा।
अतंर!
शांति और युद्ध जितना।
निमिषा

अनमोल रचनाएं

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कवि की अकुलाहट बोल रही,
बिन लिखे कलम दम तोड़ रही।

रचनाएं हैं अनमोल सभी,
सिक्कों से इनकी तोल नहीं।
निमिषा

कवि

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मौन रही गर कलम कवि की,
दम उसका घुट जाएगा।
चेहरे से जिंदा दिखता हो,
अंदर,भीतर मर जायेगा।
निमिषा

जानवर

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

क्रूर व्यवहार
अच्छे खासे इंसान को
भी कहलवा देता है
“जानवर कहीं का”।
इंसान का जन्म है
इंसान ही रहिए
जानवर बनने की
कोशिश न करिए।
निमिषा

मृगमरीचिका

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मृगमरिचिका
मृगतृष्णा यह जीवन सारा
तृष्णा में डूबा जाता है,
तृष्णाग्रस्त हो खोया रहता है,
हाथ नहीं कुछ आता है।

मरुभूमि में उज्जवल जल सा…
बार-बार बहकाता है।
कस्तूरी की तरह दिशाविहीन हो भटका- भटका जाता है।

रेत खार की परतों पर
सूर्य, चंद्र जब प्रकाश बरसाता है,
लगता जैसे भरा जलाशय
पास जाओ तो अदृश्य हो जाता है।

दीपक तले पतंगा फिर फिर -फिर,
आकर्षित हो जाता है।
अपने पंख जलाकर
औंधे मुंह धरती पर आता है।

चांद से मिलने खोई चकोरी
प्यासी उड़ -उड़ जाती है
खाती है अंगार मोह में
अपनी चोंच जलाती है।

इटली के मैसीना जल से
आकाश में दृश्य बनते हैं
घर, महल हवा में दिखते
जादुई तिलस्मी लगते है।

जापानी तोयामा खाड़ी
आकाश में दृश्य बनाती है
बार-बार लोगों के मन में
डर और भ्रम फैलाती है।

सत्यता को जांचे बिना जब..
तृष्णा में हम मरते हैं।
जान नहीं पाते सच्चाई,
भूगर्भ की उथल-पुथल से
कोहरे और गैस से
हवाओं में दृश्य बनते हैं।
ऐसा ही ये जीवन सारा
भटका -भटका जाता है।
परमपिता में लीन हुए जो
उन्हें कोई न भटका पाता है।

निमिषा सिंघल

महफिल

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

महफिल
———-
महफिल में हंसते चेहरे भी. …
अक्सर बेचैन से रहते हैं,
वह हंसते-हंसते जीते हैं
आंसुओं को भीतर पीते हैं।

महफिल में रौनक छा जाती …
जब प्रेम के नग्मे बजते हैं,
कुछ यादों में खोए रहते हैं
कुछ गमों को पीते रहते हैं।

आबाद हो महफिल कितनी भी..
मन में वीरानी रहती है,
लोगों के बीच में रहकर भी,
यादें आती जाती रहती हैं।

यह नशा बहुत ही जालिम है…
बर्बाद ये दिल को करता है,
महफिल में हंसकर गाकर भी दिल खोया खोया रहता है।

निमिषा सिंघल

स्वरचित/मौलिक
रचना #निमिषा सिंघल

बाबुल

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बाबुल —————- ‌‌ याद आए बाबुल जब-जब तेरी,
आंख भर आए तब तब मेरी।
मैं चिड़िया थी अंगना तेरे,
चहका करती सांझ सवेरे।
गोद में हंसती रोती गाती,
थपकी तेरी मुझे सुलाती।
थी बाबुल तेरी शहजादी
याद तेरी आ आके रूलाती।
याद आए बाबुल जब-जब तेरी,
आंख भर आए तब तब मेरी।

2. आती है जब याद तिहारी
भर जाती आंखों की प्याली।
आंखों में तस्वीर घूमती,
बाहों में तेरी मैं झूलती
मन को मेरे बहुत सताती।
याद तेरी आ आके रूलाती।

बाबुल तेरी याद सताती।

3.प्यार दुलार से पाला तुमने,
बाबुल तेरी याद सताती।
अंधेरों में तेरी शक्ति
हर पल रक्षक बन कर आती।

कैसे कांधे लटक -लटक कर चीनी का बोरा बन जाती।
आंख मेरी आंसू भर लाती।याद तेरी जब आके सताती।

स्वरचित/मौलिक
रचना #निमिषा सिंघल

मधुमक्खियां

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मधुमक्खियां
—————-
कालबेलिया नृत्यांगना सी रंगत…. छरहरी…
बिजली सी फुर्तीली, योद्धा …..
डंक हथियार लिए…
घुमंतू…

चकरी सा नृत्य कर जब तेज स्वर में बजाती है सारंगी सी धुन…

तो मादकता बिखर जाती है हवाओं में,
फूल डूब जाते हैं
वाद्ययंत्रों सी
मधुर आवाज में..

उन्हें मग्न देख..
चुपचाप किसी चिकित्सक की भांति
इंजेक्शन रूपी सूंड़ से
खींच लेती हैं मकरंद,
ठीक उसी पल अपने पंखों से फूलों को सहला…
चिपका लेती है परागकण
और चल देती है प्रकृति द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी का निर्वाह करने…
पेड़ पौधों की संख्या बढ़ाने….
आधा लीटर शहद बनाने के लिए……. बीस लाख फूलों से मकरंद चूस .. एक लाख किलोमीटर की यात्रा कर,
हजारों साल तक खराब न होने वाला अमृत रूपी शहद बनाने और
धरा को हरा भरा रखने…
इस चिंता के साथ…
कहीं खत्म न हो जाए जीवन!
मानव यह हरियाली और
उपहार समझ नहीं पाते अपने कर्मों से लाचार,
लालची बन …छीनते रहते हैं शहद के लिए उनका घरद्वार..
जो बनाती है बेचारी मधुमक्खियां अपने पेट की ग्रंथियों के मोम से
बार बार।
भूल गए हैं शायद!
आइंस्टीन का कथन..
“यदि सारी मधुमक्खियां गई मर
चार वर्ष में खत्म हो जाएगा
इस धरा का हर घर।”

निमिषा सिंघल

गूंगी लड़की

May 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

गूंगी लड़की
—————
रात्रि के अंधकार में,
नहा जाती वह दूधिया प्रकाश से।

जब उसकी कहानी के
पसंदीदा किरदार
उसको घेरे खड़े होते।

बेबाकी से वो दिखा देती
अपने दिल में उठे
ज्वारभाटो के निशान
कह देती वो बात
जो शायद जुबां से ना कह पाती।

हृदय के बंद कमरे में
बजते संगीत से उठती
स्वर लहरियां
छिड़ते तार।

अंदर था कोलाहल
बाहर मौन।

गूंगी लड़की के समान थी y
जो सिर्फ
इशारों में ही
बात समझ जाती।

कठपुतली सी
नाचती रहती चारो ओर।

खोल देती ताले लगे द्वार
और प्रिय का करती इंतज़ार.
ख्वाबों में हाथ पकड़
आलिंगन में बंधी
चल पड़ती उस राह पर
जहां वो जाना चाहती थी
हर बार।

निमिषा सिंघल

किन्नर

May 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किन्नर
——–
व्यंगात्मक हंसी में भी प्रेम तलाशते,
अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर यह संवेदनाओ से भरे हृदय
अपनी दो जून की रोटी के लिए
आपके घर खुशियों के मौकों पर
भर भर झोली दुआएं दे जाते हैं।
बदनसीबी की रेखाएं
हाथ में लेकर पैदा हुए ये इंसान….
मां बाप के दुलार के लिए तड़पते ही रह जाते हैं।

जिन की दुआएं औरों के लिए आसमानों में क़ुबूल की जाती है…
अपने लिए दुआओं के नाम पर इनकी झोली खाली ही रह जाती है।

एकांत में भगवान से शिकायत करते ये इंसान
मांगते हैं बस एक ही दुआ
हे भगवान !अगले जन्म में मुझे ये रूप ना देना।

अपने दुखों को ताली बजा- बजाकर कुछ कम करना चाहते हैं
और आपके सुख में ताली बजा नाच गाकर
आपकी खुशी के लिए दुआएं दे जाते हैं।

घटिया मानसिकता रखने वाले लोग
इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं
कोई पूछे इस धुले- पुछे समाज से…
आखिर गलती क्या है इनकी जो इन्होंने इस रूप में जन्म पाया!

भगवान ने भी एक ही शरीर में स्त्री-पुरुष दोनों के गुण देकर इनको छला है।

जब ये रूप भगवान ने ही दिया है
तो फिर किस बात का मजाक…
किस बात की घिन…
क्यों व्यंग बाण चला चला कर पहले से ही छिदे हुए दिल में और छेद कर देना …
इस क्रूर समाज की नियति बन चुका है।

इनकी पैदाइश भी बदकिस्मती और मौत उससे भी बड़ा परिहास…

जूते चप्पलों से मारकर बुरी तरह मृत शरीर को घसीटा जाता है।

इस तरह एक सुंदर आत्मा को इस क्रूर संसार से विदा किया जाता है।
यह कहकर
इस रूप में फिर वापस ना आना किन्नर।
तुम फिर वापस ना आना इस रूप में किन्नर
——————-
निमिषा सिंघल
——————-

दायरे

May 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किन्नर
——–
व्यंगात्मक हंसी में भी प्रेम तलाशते,
अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर यह संवेदनाओ से भरे हृदय
अपनी दो जून की रोटी के लिए
आपके घर खुशियों के मौकों पर
भर भर झोली दुआएं दे जाते हैं।
बदनसीबी की रेखाएं
हाथ में लेकर पैदा हुए ये इंसान….
मां बाप के दुलार के लिए तड़पते ही रह जाते हैं।

जिन की दुआएं औरों के लिए आसमानों में क़ुबूल की जाती है…
अपने लिए दुआओं के नाम पर इनकी झोली खाली ही रह जाती है।

एकांत में भगवान से शिकायत करते ये इंसान
मांगते हैं बस एक ही दुआ
हे भगवान !अगले जन्म में मुझे ये रूप ना देना।

अपने दुखों को ताली बजा- बजाकर कुछ कम करना चाहते हैं
और आपके सुख में ताली बजा नाच गाकर
आपकी खुशी के लिए दुआएं दे जाते हैं।

घटिया मानसिकता रखने वाले लोग
इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं
कोई पूछे इस धुले- पूछे समाज से…
आखिर गलती क्या है इनकी जो इन्होंने इस रूप में जन्म पाया!

भगवान ने भी एक ही शरीर में स्त्री-पुरुष दोनों के गुण देकर इनको छला है।

जब ये रूप भगवान ने ही दिया है
तो फिर किस बात का मजाक…
किस बात की घिन…
क्यों व्यंग बाण चला चला कर पहले से ही छिदे हुए दिल में और छेद कर देना …
इस क्रूर समाज की नियति बन चुका है।

इनकी पैदाइश भी बदकिस्मती और मौत उससे भी बड़ा परिहास…

जूते चप्पलों से मारकर बुरी तरह मृत शरीर को घसीटा जाता है।

इस तरह एक सुंदर आत्मा को इस क्रूर संसार से विदा किया जाता है।
यह कहकर
इस रूप में फिर वापस ना आना किन्नर।
तुम फिर वापस ना आना इस रूप में किन्नर
——————-
निमिषा सिंघल
——————-

तलवार अब जरूरी

May 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तलवार जरूरी
——————
मराठे, राजपूत, सिख सदा
उसूलों पर ही चले थे।
सीने पर तीर खाएं….
फिर भी…
पीठ पीछे ना वार किए थे।

अंग्रेज या मुगल हो
इनसे ….
धोखे पर धोखे खाए।

हाथ दोस्ती के थामे..
पीठ पर हमेशा खंजर खाये।

इतिहास को पलट लो
दर्पण है आज का भी।

पीठ पीछे वार सहना…
नियति है आज की भी।

सीमा पर हाल देखो!
वीर रक्षक वहां अड़े हैं।

दुश्मन धोखा देने को आज भी तैयार खड़े हैं।

महामारी के कारण. ‌
यहां सब घर में कैद पड़े हैं।

कुछ द्रोहीयो के कारण
खतरे में सब पड़े हैं।

क्या आज का भी भारत
बस ढाल भर रहेगा????

कब तक ऱोकेगा खुद को
तलवार कब बनेगा?

शांति ,स्वागत, अतिथि देवो भव से
दुश्मनों के हौसलों में
कब तक इंधन भरेगा?

जाने नहीं है सस्ती,
इस देश के रक्षकों की।
आगे बढ़ खात्मा हो,
तब ही होगी गई जानो की तृप्ति।

महामारी का हो.. जो साथी
देशद्रोह से नवाजो।
फांसी के फंदे पर ही,
उनकी आरती उतारो।

कुछ सख्त नियम पालन
अब हो गया जरूरी।
देशद्रोहियों का सफाया
सिरे से है जरूरी।

नरम दिल बहुत बन् लिए
कठोर आवरण अब जरूरी।
ढाल बहुत बन लिए
अब तलवार है जरूरी।
अब तलवार है जरूरी।

निमिषा सिंघल

वायरस

May 5, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

वायरस
——–
वायरस हो क्या!
जो लहू में संक्रमण की तरह फैलते ही जा रहे हो।
या फिर परिमल जिस की सुगंध खींच लेती है अपनी ओर।
या व्योम में अंतर्ध्यान शिव
जो जग को मोहित कर लीन है तपस्या में।
या फिर सूरज
जिसकी ऊर्जा से जीवन पाता है यह संसार।
या फिर विशाल गहरे सागर हो तुम
जो हर अच्छाई बुराई को अपने अंदर समा लेते हो कुछ नहीं कहते।
या वैद्य हो
जो प्रेम में पनपी
व्याधियों को ठीक कर देता है।
शायद गंधर्व के वाद्य यंत्र से उपजे ध्रुपद हो तुम।
जिसका माधुर्य लावण्यता अलंकृत कर देती है मुझे।
ठुमरी की थिरकन में बसी ताल हो तुम
कुछ भी हो बेमिसाल हो तुम।
____________________
निमिषा सिंघल
___________

दायरे

May 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

दायरे
____
****
दायरे थे ही नहीं मानव की लालसा के!
हर तरफ फैलाव था पैर पसारे।
जीव सीमट रहे थे दायरो में….

लुप्त और लुप्तप्राय होते जीव
सिर्फ किताबो में छपी तस्वीर बनते जा रहे थे।

बंजर होती धरती ….
सिमटते वनस्थल….

त्राहिमाम की कर्कश ध्वनि ….
जीवो का हाहाकार….
कानों को भेदता,
मानव का क्रूरतम अट्टहास।

बेलगाम मानवता…
दिखावटी जीवन …..
आधुनिक बनते हम।

लहूलुहान धरती….
कटते, सूखते दरख़्त…..
टूटते पहाड़, मौसम के बदलते मिजाज।

अचानक !
रुक गया सब कुछ..
कस गई लगाम…
बंधक हम सब…
जीव जंतु बेलगाम

सूनी नहीं है राहें! मानव के बिना
शांत है बस….

जहां कभी दिखते भी न थे जीव जंतु …..
आज बिना किसी रोक-टोक …
पूरी आजादी से …
बिना किसी डर के ..
नाचते हैं ये सब।

प्रातः बेला….
पक्षियों के गीत…
हवाओं का संगीत…..
भीनी स्वच्छ पवन …
अद्भुत सुंदरता लिए अंबर…

उस पर उगता..
सुनहरी आभा लिए सूर्य..
अद्भुत, अद्वितीय नजारे।

स्वच्छ निर्मल नदियां . …
जैसे मिट गए हो
मलीनता के सारे दाग…
उदास नदियां मुस्कुरा उठी हैं जगमगा रही हैं..
और मानव!
बेड़ियों में जकड़ा लाचार निशब्द..
बढ़ती लालसा अचानक सिमट गई हैं ..
दायरो में रहना सीख ही लिया आखिर मानव ने….।

महसूस किया होगा
उस घुटन को जो मानव ने अपने कृत्यों से पूरी कायनात को जबरदस्ती थोप कर भेंट दी थी…

अब सिमट रहे हैं दायरे मानव के….
दिन पर दिन छोटे होते जा रहे हैं।

बेबस मानव दायरो में रहना सीख रहा है।

जैसे जीव जंतु सिमट गए थे
मानव की बढ़ती लालसा के कारण दायरों में।

आज मानव उन्हीं दायरो में सिमटा है
अपनी आजादी की उम्मीद लिए हाथ जोड़े प्रार्थना करता।।

भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती…..
सिर्फ महसूस होती है
उस की धमक।

आंखों में पश्चाताप के आंसू
और अपने कृत्य!

निमिषा सिंघल

ये समय फिर ना मिले दुबारा

April 14, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

यह समय फिर ना मिले
—————————-
“दौड़ भाग की जिंदगी सुकून छीन ले गई,
हम दौड़ते ही रह गए जिंदगी पीछे रह गई।”
वक्त फिर भी ना रुका,
सबको ठहरा सा दिया।
भागी दौड़ी सी थी जो,
बेबसी से वो थमी।
जो कभी रुकी ना थी,
ठहर गई यहीं कहीं।
ऐसा तो हुआ ना कभी,
जैसा हुआ इस बार अभी।
विश्व संकट में पड़ा,
डर से बुरा हाल हुआ।
मौत का शिकंजा देखा,
आंखों देखा हाल हुआ।
हमने छोड़ा था सुकून,
वक्त ने छीन लिया।
जाना सबने फिर सही,
जिंदगी और भी है।
जीना अपनों के लिए,
खुशियों का ठौर भी है।
खुशियां समझो तो बहुत,
मानो दुख तो और भी हैं।
समझो बर्तन है भरा,
आधा खाली भी वही है।
जो मिले खुशियां ले लो,
दुखों को छोड़ो वही।
दौड़ो जिंदगी के लिए,
न की घुड़दौड़ के लिए।
वक्त ने दिया तुम्हें,
बड़ा अनमोल समय।
सदुपयोग करो इसका,
समझो ना कैद इसे।
जियो जी भर के इसे,
यह समय फिर ना मिले।
यह समय लौटेगा न,
जियो जी भर के इसे।

निमिषा सिंघल

महामारी से मुक्ति प्रार्थना

April 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

महामारी से मुक्ति प्रार्थना
——————————
हे दुख भंजन दयानिधे
कृपासिंधु . .. भव पार करें।
करो कृपा हम दीनजनों पर,
दूर करो सब कष्ट धरा पर।

करे तपस्या सब जन घर पर,
बंद पड़े प्रभु द्वार धरा पर।

मुक्ति दे दो कष्ट हरो सब
खत्म करो यह महादानव अब।

छिन गई खुशियां
बंद हैं हंसी
डर हैभीतर,
सहम गए सभी
भूख प्यास सब हो गयाआधा,
विचलित मन जाए ना साधा।

अब तो सुन लो अरज हमारी,
दूर करो अब यह महामारी।
हवा विषैली अब ना करेंगे मिलजुल कर हम काम करेंगे।
नित नए पेड़ लगा देंगे हम
धरती को स्वर्ग बना देंगे हम।
रोक दिया जब जीवन तुमने
दिखलाया दर्पण फिर तुमने
समझाया
यदि चाहो करना
ठान लो मन में तो कुछ नहीं मुश्किल।
दूर प्रदूषण करके दिखाया
प्रकृति ने हम को बंधक बनाया
पशु पक्षियों को फिर से आजादी देदी।
हम सबको यू सबक सिखाया।।
प्रण लेते हैं भगवन आज से
हरी भरी धरती कर देंगे
स्वस्थ रहेंगे धरा स्वच्छ रखेंगे।
क्षमा प्रार्थना करते सब मिल
कष्ट हरो अब बढ़ाओ ना मुश्किल।

निमिषा सिंघल

मापदंड

April 9, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मापदंड
———-
कुंठित हृदय से उपजती विषाक्त बेल,
लील जाती है कितनी ही हरी कोपले।

उनको कुचलती कोपलों से निकली,
दर्दनाक चीखों का शोर दब जाता है फाइलों तले।

उस हत्या के साथ पूरे परिवार की ही मौत हो जाती है।

नहीं देख पाती हैवानियत…..
इस कठोरता को।

मानसिक दंश झेलते रोते बिलखते परिवार,
और उनकी दुर्दशा को भुनाते अपनी टीआरपी बढ़ाते न्यूज़ चैनल्स …
इंसान की संवेदनाओं की न्यूनता का मापदंड है।
निमिषा सिंघल

ग़ज़ल

April 8, 2020 in ग़ज़ल

ग़ज़ल
——-
दूरियां ,नज़दीकियां, खुशफहमियां तेरे साथ में,
हम मिले ना थे कभी पर बह गए जज्बात में।

1. मौसमै अंदाज था कुछ खास था उस रात में,
थे गिरफ्त में इश्क के उस बेवजह सी बात में।
थी नहीं मंजूर हद …इश्क की बरसात में,
दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

2. जब्बे सैलाबे मोहब्बत ले रहा उफान था,
धड़कने बेकाबू थी दिल में अजब तूफ़ान था।
तेरी आहट देती थी बस.. दिल को थोड़ा सा सुकून,
बेजुबा सी थी मुहब्बत और मुझे तेरा सुरूर।
दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

3. हो हकीकत तो निगाहों से बयां हो जाती वो,
सपना था बंद आंखों का बस याद बन आ जाता वो,
रात भर तारे चमकते चांद बन छा जाता वो,
जुगनू बन गुनगुन वो करता
अक्स सा छप जाता वो।

दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में….

4. दरमियां था फासला इस छोर से उस छोर तक,
दिलकशी थी बस धुआं था , छा गया पुरजोर जो।
बेकरारी तुझ को पा लू
दूरियां अपनी जगह
धड़कने गाती थी सरगम, बेख्याली हर जगह।
दूरियां नज़दीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में……

निमिषा सिंघल

शिखर

April 8, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

शिखर

धरा, गगन, मृदुल पवन हिले तेरी एक हूंक से,
जो तू चले बिना रुके मंजिलें दिखे तुझे।

समुंद्र भी दे रास्ता जो तू कहे जब गूंज से,
चमकीला हो ये आसमान पसीने की तेरी बूंद से।

संगीतमय सारा जहां स्वागत करें भीना पवन,
धरती भरे अभिमान की हुंकार तुझे देखकर।

हिम्मत है गर आगे निकल तू जीत ले सारा जहां,
तेरी चमक से रोशन जहां पाले जो खुद से तू शिखर।

निमिषा सिंघल

युवा पीढ़ी

April 8, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

युवा पीढ़ी

रचो इतिहास लिखो शौर्य की अद्भुत कहानी देश को भय मुक्त करो।

भ्रष्टाचार, दुर्दभ्य दानवता के खिलाफ नए युग का सृजन करो।

आओ युवा पीढ़ी! नारियों को अत्याचारों से मुक्त करो।

हे राष्ट्र के कर्णधारों! देश को नई ऊर्जा उन्नति देकर नवराष्ट्र का सृजन करो ।

निमिषा सिंघल

उम्मीद

April 8, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

उम्मीद की किरण जगमग आई है,
आज फिर याद मुझे तेरी ओर लाई है।

जमाने की तपिश,
जिम्मेदारियों का बोझ..
सहते -सहते दबी राख सुगबुगाई है।

तपती मनस्थली पर स्नेह की बूंदे छलकी,
सूखी धरती पर बदली छाई है।
फिर एक उम्मीद मुझे तेरी और लाई है।

झंझावात तूफानों से घिरी थी जिंदगी,
प्रेम रस में नहाने आई है।
आज फिर उम्मीद मुझे तेरी ओर लाई है।

दिखावटी, अनमनी, अजनबी सी थी कुछ,
जिंदगी फिर से मुस्कुराई है।
फिर एक उम्मीद मुझे तेरी ओर लाई है।

इत्तेफाकन ही सही,रूह रूह से टकराई है,
नैनो को नैनो ने दिल की बोली समझाई है।
फिर एक उम्मीद मुझे तेरी और लाई है।

निमिषा सिंघल

दिया

April 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुनो!
तुम सागर की तरह क्यों लगते हो?
शब्दों में गहराई बहुत है
मानसिक द्वंद छिपाने में
चतुराई बहुत है।
बाहर से एक शांत सतह
भीतर गहरे तूफ़ान से लगते हो।

प्रेम में हारे हुए लडको की तरह
विरह और लौट आने की उम्मीद की शायरी लिखते लिखते
ना जाने कब जिंदगी से कुछ मांगना भी छोड
बस बहते जा रहे हो
बहाव के संग।
जिंदगी से आक्रोश पुराना लगता है
कहीं बहुत दूर रोशन दिए की तपिश
और ऑक्सीजन
डालती रहती है जान एक बेजान बुत में।
वैसे दिया काफी है
एक उम्र प्रेम में डूबे रहने के लिए।
देवदास।

निमिषा सिंघल

बहन

April 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक एक चीज का गिन गिन कर हिसाब लेने वाली
वो लड़ाकी
बन जाती है ढाल अपने भाई की।
मां और पापा ने भाई को किस बात पर बिना वजह डांटा
यह बताने वाली भी एक बहन ही होती है
आंसू भर भर के लड़ जाती है अपने भाई के लिए
भाई की चीजो पर हक जमाने वाली भी तो वही होती है।
कब वो छोटी बहन अचानक बड़ी हो जाती हैं और दे जाती है झोली भर भर दुआये।
अपने भाई से गिन गिन कर हिसाब लेने वाली लड़की जो जीवन पर्यन्त भेजती रहती है
बेहिसाब शुभकामनाएं अपने भाई को।
भगवान का दिया हुआ एक खूबसूरत तोहफा हैं एक अदद लड़ा की बहन।

निमिषा सिंघल

आस्था के कमल

April 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आस्था के कमल
——————–
प्रेम और विश्वास के दरिया में ही खिलते हैं आस्था के कमल।

तुम खरे उतरना इस विश्वास पर
ना मुरझा पाए यह कमल स्मरण रहे।

जीवन, यौवन सौंप दिया है तुम्हे
तुम्हारी संगिनी ने,
तुम भवरे ना बन जाना,
ना मंडराना फूल फूल पर
सहेज रखना खुद को।

जीवन में राह नई मिलेंगी तुम्हें,
उन गुमशुदा राहों पर कहीं गुम ना हो जाना!

यौवन की उमंग में तितलियां भटकाएंगी तुम्हे,
तुम भटकना नहीं।

हर पल स्मरण रखना
किसी को तुम्हारा हर पल इंतजार है
और जब पार कर लोगे उम्र का यह पड़ाव
तब सिर्फ संगिनी की संग होगी तुम्हारे।

दिल ना दुखाना उसका,
वही है मानसिक संबल तुम्हारा।
जब सभी सहारे छूट जाएंगे,
तब हाथों में हाथ दिए
वही होगी संग तुम्हारे।

कठिन से कठिन समय में भी जो संबल बन जाएगी।
ढाल है जीवनसंगिनी
तलवार ना दिखाना

तुम पर आए हर एक वार को
खुद ही झेल जाएगी।

बस तुम बने रहना …..
उसके आस्था के कमल।

निमिषा सिंघल

मेरे जाने के बाद

April 1, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मेरे जाने के बाद
——————–
बिखेर दिया है खुद को
इस कदर मैंने …..
कि ….
मैं ना मिल पाऊं गर तुम्हे …

तो ढूंढ लेना मुझे ….
मेरे गीतों और रचनाओं में।
तुम पर प्रेम छलकाती….
कभी नाराज़गी दिखाती….
किसी ना किसी रूप में मिल ही जाऊंगी।

कभी उदासी घेर ले
तो शायद मै गुदगुदा दू रचनाओं में छुप कर हंसा दू तुम्हे!

बेशक तुम गढ़ लेना कुछ किस्से मनचाहे…..

पर पढ़ लेना मेरा प्रेम जिससे तुम खुद को सरोबोर पाओगे।

भीग जाना चाहो गर…
अचानक हुई प्रेम वर्षा से
तो ढूंढ लेना मुझे फिर
मेरी रचनाओं में।

कभी अधूरी सी कोई कहानी सी मै…. कभी पूर्ण पाओगे,
रचनाएं पढ़ कर जब गले लगाओगे।

मै हमेशा काव्य सुगंध बन महकती रहूंगी
तुम्हारे आसपास..
अपनी रचनाओं में
रजनीगंधा के पुष्प की तरह
तुम जब भी मेरी महक से मदहोश होना चाहो…
तो फिर ढूंढ लेना मुझे!

मै तुम्हे फिर वहीं मिलूंगी..
अपने गीतों और रचनाओं मै
गाती गुनगुनाती
तुम पर प्यार लुटाती।

निमिषा सिंघल

हर सदी इश्क की

April 1, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

हर सदी इश्क की
———————
समुद्र पार रेतीले मैदान में उगते गुलाब,
नन्ही कोपलों से निकलते हरे पत्र, और नमकीन हवा में घुलती मिठास अनुराग की।
मानसिक विरोधाभास के बीच पनपता स्नेह
उम्र की सीमा से परे दो प्रेमी युगल।
अपना ही आसमां ढूंढते हैं।
स्वर्ण आभा युक्त,
सूरत से दमकते तेज पुंज
और स्वर लहरी का अनूठा संगम
जन्म देता है नेह के बंधन को।
शायद
पूर्वजन्म की अपूर्णता खींच लाई हो इस ओर।
रसीली मिठास,दूरियों से अनजान
अनूठे अंदाज से परिपूर्ण,
ये लाल इश्क।
निमिषा सिंघल

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