वृद्धाश्रम

July 28, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

पेट में आया था जिस दिन तू
फूले नहीं समाई थी मैं,
बार -बार छूं उदर त्वचा को
मन ही मन मुस्काई थी मैं।
नौ महीने तक पल पल तेरा
ख्याल सजाया था मन ही मन।
कितनी उत्साहित थी तब मैं
तू क्या जाने ममता का मन।
जन्म लिया था जिस दिन तूने
महादर्द में भी खुश थी मैं।
भूल गयी थी सारी पीड़ा
हासिल कर बैठी सब कुछ थी मैं।
धीरे-धीरे बड़ा हुआ तू
दूध अमृत रस तुझे पिलाया,
अपना आधा पेट रही मैं
खुद से पहले तुझे खिलाया।
पढ़ा- लिखा लिखाकर आंखें खोली
अपना फर्ज निभाया मैंने,
आज बड़ा होकर अपने मैं
मस्त राह अपनाई तूने।
तू अपने पत्नी -बच्चों के
साथ हवेली में खुश रहना
मुझे छोड़ इस वृद्ध आश्रम
जा बेटा , खुद में खुश रहना।
— डॉ0 सतीश पाण्डेय

मीत मेरे

July 28, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तेरी सूरत पर निर्भर रह कर
नहीं किया था प्यार तुझे
मैंने तेरी सीरत देखी
तभी किया था प्यार तुझे।
सूरत सदा नहीं रहती है
सीरत देती है अंतिम साथ,
तन आकर्षित संबंधों का
अधिक नहीं होता है साथ।
मन से जुड़े हुए रिश्ते ही
हर स्थिति में, होते हैं साथ,
इसीलिये मन जोड़ा तुझसे
अंतिम साँसों तक है साथ।
—— Dr. Satish Pandey

चीन के बहकावे में न आ

July 28, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

नेपाल !! तू मेरा मित्र रहा है,
चीन के बहकावे में न आ,
वह तुझे शून्य करवा देगा,
तेरा अस्तित्व मिटा देगा।
अब तक इतिहास में यही दर्ज है
नहीं रहा तू गुलाम कभी,
अब ड्रैगन के चंगुल में आकर
गुलामी करता है उसकी।
भूख मिटाने का लालच
देकर तेरी संप्रभुता को
लूट रहा है धीरे- धीरे
तू
समझ न पाया ड्रैगन को।
सब कुछ तेरा ही बिगड़ेगा
भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा,
तेरे कंधे पर रख बंदूक
यदि ड्रैगन आँख दिखायेगा
भारत की ताकतवर सेना से
तू कैसे बच पायेगा।
इसलिए गुलामी छोड़ अभी
अपने कंधे को बचा मित्र
उस ड्रैगन के बहकावे में
अपने को मत मिटा मित्र।
—— Dr. Satish Pandey

क्यों फुदक रहा नेपाल तू

July 28, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

चीन के चक्कर में पड़ कर
क्यों फुदक रहा नेपाल तू,
भूल गया क्या रिश्ते – नाते
संबंधों का हाल तू।
रोजी-रोटी चली आज तक
जिस भारत की भूमि से
आज उसे ही आँख दिखाता
आखिर क्यों नेपाल तू।
तुझे दूध की मक्खी जैसे
चूस के पटकेगा वो दूर
मदहोशी में कब समझेगा
उस ड्रैगन की चाल तू।
भड़काकर तेरी सत्ता को
भारत के विपरीत किया
हाँक रहा है तुझे चीन
जैसे तू पशु हो पालतू।
पिस जाएगा चक्की के
दो पाटों में मत फंस नेपाल,
हम चाइना को उत्तर देंगे
होगा बस बेहाल तू।
अभी संभल जा, आँख दिखा मत
भारत को तू फ़ालतू,
चीन के चक्कर में पड़ कर
क्यों फुदक रहा नेपाल तू।
————— Dr. Satish Pandey

जय हिन्द

July 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जाते समय वे
कह गए थे,
उदास न होना प्रिये।
यह नौकरी है फ़ौज की
जाना पडेगा अब मुझे।
सीमा में कुछ गड़बड़ है,
उसको ठीक करना है हमें,
हिन्द के दुश्मन मिटाकर
चैन लेना है हमें।
चढ़ यदि शीश मेरा
जंग में, माँ भारती को,
तू दुखित होना नहीं
जय हिन्द कह देना प्रिये।
आज जब लिपटे तिरंगे में
पधारे शान से ,
जोर से जय हिन्द निकला
मेरी इस जुबान से।
————- Dr Satish Pandey

कहो ड्रैगन ! क्या समझे थे

July 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कहो ड्रैगन ! क्या समझे थे
क्या अब भी बासठ का सन है ,
या ताकत में भारत तुझसे
किसी मामले में भी कम है।
तभी पीठ पर छुरा घौंपने
आया था गलवान में,
दिखा दिया भारत ने तुझको
कितना हूँ बलवान मैं।
धो डाला मुक्का – मुक्की में
तेरे कई जवानों को,
तूने संख्या नहीं बताई
छुपा रहा उन बातों को।
पाकिस्तान, नेपाल आदि के
कंधे पर बन्दुक न रख
नीति बदल ले, अपने में रह
हिन्द देश पर नजर न रख।
किसी बात में भारत तुझसे
आज नहीं है कम सुन ले
तेरी हर तिकड़मबाजी का
उत्तर देगा यह सुन ले।
———— Dr. सतीश पांडेय

असहायों की मदद को उठो

July 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

असहायों की मदद को
उठो, रुको मत, उठो
उठो ना,
जो असहाय हैं, जिनका कोई सहारा नहीं
उन्हें तुम सहारा दो।
जो डूब रहे हैं
उन्हें किनारा दो।
उठो, सोचो मत, उठो
तुम मदद कर सकते हो,
जगाओ अपने भीतर का मानव,
जगाओ, रुको मत, जगाओ
जगाओ ना,
अन्धकार में दीपक जगाओ ना।
तुम नहीं तो
कौन करेगा उजाला।
तुम्हारे पास तेल भी है
बाती भी है,
बचाकर क्या करोगे
जला दो ना।
आज वे असहाय हैं
उनके पास न तेल है न बाती है,
क्या पता कल उनका
सूरज भी उग जाए
आज तुम उजाला दिखा दो ना,
दो रोटी खिला दो ना,
खिला दो, रुको मत, खिला दो
खिला दो ना,
जो भूखे हैं उन्हें
दो रोटी खिला दो ना।
—— डॉ. सतीश पांडेय

उन वीरों को नमन करें हम

July 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

उन वीरों को नमन करें हम
जो सीमा पर जूझ रहे हैं ,
भारत माँ की रक्षा खातिर
जो दुश्मन को कूट रहे हैं।
ऊँचे – ऊँचे, ठन्डे – ठन्डे
कठिन पर्वतों की चोटी पर,
अडिग खड़े हैं, निडर खड़े हैं
जोशीले भरपूर रहे हैं।
दुश्मन की घुसपैठ रोकने
को ताने बंदूक खड़े हैं,
भारतमाता के चरणों में
लहू चढाने कूद पड़े हैं।
भारतमाता की जय के नारे
लगा रहे हैं सीमा पर,
सारा मुल्क सलामी देता
स्नेह निछावर वीरों पर।
——- डॉ सतीश पांडेय

माँ

July 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

हम सभी का मूल माँ है
यदि नहीं होती जो माता
किस तरह इस सुरमयी
संसार को मैं देख पाता।
जनम जननी ने दिया
इससे अधिक कोई किसी को
दे नहीं सकता है कुछ भी
हो भले कैसा ही दाता।
माँ थी, तब हम आज हैं
माँ के बिना होते न हम भी,
फिर क्यों? तू प्यारे मनुज
दुत्कारता है आज माता।

दूसरे को रुलाना नहीं जिंदगी

July 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

प्यार सबसे करो,
छोड़ दो नफ़रतें,
नफरतों के लिए है नहीं जिंदगी।
जितनी भी हो सके
बाटों सबको खुशी
दूसरे को रुलाना नहीं जिंदगी।
जो भी मेहनत से पाओ
रहो उसमें खुश
हक हड़पना किसी का नहीं जिंदगी।
राह में कोई दुखिया
मिले गर कहीं
उससे नजरें चुराना नहीं जिंदगी।
प्यार सबसे करो,
छोड़ दो नफ़रतें,
नफरतों के लिए है नहीं जिंदगी।
— डॉ0 सतीश पाण्डेय

लालच में न धंस

July 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

यूँ तो मानव सोचता है
मैं सदा जीवित रहूँगा,
सब चले जायेंगे लेकिन
में यहां चिपका रहूँगा।
पर समय का चक्र कोई
रोक पाता है नहीं,
कब है आना कब है जाना
जान पाता है नहीं।
इसलिए तू मोह के
जंजाल में ज्यादा न फंस,
जिंदगी जी ले खुशी से
और लालच में न धंस।
— डॉ सतीश पाण्डेय

शहीदों की पावन कहानी

July 26, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

गोरखा राइफल के जांबाज कैप्टन
एम० के ० पांडे ने दुश्मन को घेरा
वो बटालिक की दुर्गम पहाड़ी
उस पहाड़ी से दुश्मन खदेडा।
लग चुकी थी उन्हें गोलियाँ,
फिर भी दुश्मन का बंकर उड़ाया,
बन गए वे बटालिक के हीरो
देश के नाम जीवन चढ़ाया।
दूसरे थे परमवीर संजय
उनकी राइफल ने जलवा दिखाया,
कारगिल के फ्लैट टॉप में
मार कर दुश्मनों को भगाया ।
आज दोनों परमवीर को
हिन्द की और से है सलामी
याद करती रहेगी धारा यह
उन शहीदों की पावन कहानी।

आज कारगिल विजय दिवस है

July 26, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज कारगिल विजय दिवस है
नमन करें उन वीरों को,
जिनके अदम्य शौर्य साहस से
जीत मिली भारत माँ को.
छलनी कर दुश्मन का सीना
भारत मां का मान बढ़ाया,
देश के गौरव की रक्षा को
निज सीने का लहू चढ़ाया.
बलिदानी वीरों ने
हँसते-हँसते शीश चढ़ाये थे,
हम सब की रक्षा की खातिर
अपने शीश चढ़ाये थे.
उन वीरों को कवि की कविता
आज सलामी देती है,
नमन शहादत को करती है
आज सलामी देती है.
आज कारगिल विजय दिवस है
नमन करें उन वीरों को,
जिनके अदम्य शौर्य साहस से
जीत मिली भारत माँ को.
—– डॉ. सतीश पाण्डेय, चम्पावत

पुकार रही है भारतमाता

July 26, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

पुकार रही है भारतमाता
आप सभी संतानों को,
कलम उठा लो, खड़क उठा लो
ख़त्म करो हैवानों को.
बाहर-भीतर देश के दुश्मन,
जो उन्नति के बाधक हैं,
सामाजिक ताने-बाने को
तोड़ रहे जो कारक हैं.
लिखो उजागर करो उन्हें
सच्चाई को आगे लाओ,
कलम तुम्हारी खड़क बनेगी
धार तीव्र करके आओ.
कलम उठालो, खड़क उठालो
तभी देश उन्नत होगा,
वरना यह घुन भीतर – भीतर
हम सबको धोखा देगा.
साफ़ करो भीतर के दुश्मन
ख़त्म करो हैवानों को,
पुकार रही है भारतमाता
आप सभी संतानों को.
—– डॉ. सतीश पाण्डेय, चम्पावत

बेकारी

July 25, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

चपरासी पद की भर्ती में,
पीएचडी धारक आवेदक हैं,
एक अनार है सौ बीमार हैं,
जुगाड़ में बैठे पहरेदार हैं,
इस जुगाड़ के खेल ने सारी
प्रतिभाओं को निराश कर दिया,
बेकारी के रोग ने देखो,
युवाशक्ति को क्षीण कर दिया.
—– डा. सतीश पांडेय

दोहे

July 25, 2020 in मुक्तक

गरीब गरीब रह गया, सेठ सौ गुना सेठ।
खाई सा अंतर हुआ, भूख बराबर पेट।।1
गरीबों के उत्थान की, बनी योजना लाख।
कागज में पूरी हुई, उस तक पंहुची खाक।।2
—– सतीश पाण्डेय

बेरोजगारी

July 25, 2020 in मुक्तक

आत्मघात, मानसिक पीड़ाएँ,
छीना-झपटी, राह भटकना,
बेरोजगारी के दुष्प्रभाव हैं,
पहला काम हो इसे रोकना.

बारिश

July 25, 2020 in गीत

मन किसी सूखी नदी सा हो रहा
आप कहती हो कि बारिश आ गई,
जो ये छींटे पड़ रहे हैं उनसे बस
एक सूनापन सा मन में गड रहा,
कब तलक यूँ ही घिरेगा आसमाँ
बूंदाबांदी ही रहेगी प्यार की,
कब तलक बिछुड़े रहेंगे आप हम
कब तलक बरसेगा खुलकर आसमाँ,
—————- Dr. सतीश पांडेय

मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को

July 24, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को
उनकी सेवा में खुद को लगा ले,
यह तो मौका मिला है तुझे
आज मौके का फायदा उठा ले।
एक दिन सबने माटी में घुल के
शून्यता में समाना है प्यारे
आज वे वृद्ध हैं कल तू होगा,
अपने कल के लिए ही कमा ले।
आज जैसा करेगा तुझे कल
तेरी संतान से वो मिलेगा
ब्याज भी मूल के साथ होगा,
जो भी अच्छा-बुरा तू करेगा।
बूढ़े मां-बाप घर की हैं पूँजी
घर अधूरा है उनके बिना,
पूज ले वृद्ध मां-बाप को
अपने कल के लिए तू कमा ले।
– – – डॉ0 सतीश पाण्डेय

आत्महत्या न कर

July 24, 2020 in गीत

आत्महत्या न कर
जिन्दगी को बचा,
कोई दुख तेरे जीवन ज्यादा नहीं।
देख चारों तरफ
जो घटित हो रहा
ढूंढ खुशियां उसी में, दुखों को नहीं।
दुःख तो आते रहेंगे
जाते रहेंगे।
तेरा आना न होगा दुबारा यहां।
रूठ जाये भले
तुझसे संसार यह,
पर स्वयं से कभी रूठ जाना नहीं।
भोग ले सारे संसार के
सुख व दुख
पर दुखों स्वयं को डराना नहीं।
आस मत रख किसी से
जी बिंदास बन
अपने जीवन ऐसे डुबाना नहीं।
और बुझदिल न बन
कर ले संघर्ष तू
आत्महत्या से खुद को गंवाना नहीं।
—– डॉ0 सतीश पाण्डेय,

बेटियां

July 23, 2020 in मुक्तक

बेटियां तो जिंदगी का मूल हैं
बेटियां शुभकामना स्फूर्ति हैं,
वंश चलने की न कर चिंता मनुज,
बेटियां निज वंश की ही पूर्ति हैं,

अन्यथा बेजान हैं

July 23, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस महामारी में
हजारों लोग
काल का ग्रास बन गए,
कई परिवारों के
कमाऊ लोग
चल बसे, विलीन हो गए,
झकझोर दिया है
आर्थिक स्थिति को,
बेरोजगार कर दिया है
हजारों लाखों युवाओं को,
सपने चकनाचूर
कर दिए हैं
मानवता के,
रोटी की जरूरत
पहली जरुरत है, इंसान की,
इसलिए आज की विकट परिस्थिति में,
रोटी बटोरने की नहीं
रोटी बांटने की जरुरत है,
असहाय की मदद को
खड़ा होने की जरुरत है,
तभी हम इंसान हैं,
अन्यथा पत्थर हैं
बेजान हैं,
—————–
डॉ. सतीश पांडेय

धुँआ

July 22, 2020 in मुक्तक

छाती चौड़ी की
सिगरेट जलाई,
सोचता है इसे पी रहा हूँ।
तू नहीं पी रहा
इसको प्यारे
यह धुंआ तो मजे से तुझे पी रहा।
—– डॉ0 सतीश पाण्डेय

लोकतंत्र में कवि

July 22, 2020 in मुक्तक

लोकतंत्र के वृहद भवन का
मुझको स्तम्भ मानो न मानो
मैं धरम जाति भेदों से ऊपर
आम जनता की बातें लिखूंगा।
जो घटित हो रहा है लिखूंगा
जो गलत हो रहा है कहूंगा,
सब चलें अपने कर्तव्य पथ पर
ऐसी कविताएं करता रहूंगा।
डॉ0 सतीश पाण्डेय

पढ़ो लिखो

July 21, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जीवन में आगे बढ़ने को
शिक्षा लो, शिक्षा लो बच्चों,
पढ़ो लिखो जी- जान लगाकर
कुछ बनने की ठान लो बच्चों,
जिसने भी परिश्रम किया है
अच्छा सा फल उसे मिला है,
यह मन्त्र आगे बढ़ने का
इस मंत्र को जान लो बच्चों,
आज समय बर्बाद करोगे
तो जीवन भर कष्ट सहोगे,
आज अगर मेहनत कर लोगे
कल मन की मंजिल पा लोगे,
———————————–
—- डॉ. सतीश पांडेय

मुक्तक

July 13, 2020 in मुक्तक

स्वप्न में रोज लिखती हूँ
तुम्हारे नाम की कविता,
कहीं कोई देख ना ले
बस इसी चिंता में रहती हूँ,
इसलिए उन सबूतों को
मिटाकर ही मैं जगती हूँ।

स्वप्न में ही

July 13, 2020 in गीत

हमारी ओर से शुभरात्रि
कह देना उन्हें कविता,
साथ ही यह भी कह देना कि
सपने में चले आना।
कहीं पर बैठ करके
प्यार की दो बात कर लेंगे।
जागते में हमें संसार
मिलने ही नहीं देगा।
इसलिए स्वप्न में ही
प्यार की दो बात कर लेंगे।
—डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत।

आज गर्मी है

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

पहाड़ों में भी पंखे चल रहे हैं
आज गर्मी है,
सभी एक दूसरे से जल रहे हैं,
आज गर्मी है।
किसी के पास पैसा है तो उसको
आज गर्मी है,
किसी को पद मिला है तो उसे भी
आज गर्मी है।
छटा सावन की है पर आज
चारों ओर गर्मी है।
पहाड़ों में भी पंखे चल रहे हैं
आज गर्मी है।
– डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत।

कलम से

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

प्यार के चक्कर में पड़
मेरी तरह प्यारे,
अरे तू भी वियोगी कवि
न बन जाना कहीं प्यारे।
जरूरत है नए उत्साह की
कविता लिखे कोई,
इस कमी को कलम से आज,
पूरी कर मेरे प्यारे।

— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत

विपरीत

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

भरी दोपहरी की धूप में
जिस तरह सूखने की बजाय
गीला हो जाता है पसीने से
बदन,
ठीक उसी तरह
भरी बरसात में
हरा-भरा न होकर
सुख गया है मन।

लिखना रात भर कविता

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किसी भी हाल में तुझसे
नहीं पीछे रहूंगी मैं,
तू लिखना रात भर कविता,
सुबह जग कर पढूंगी मैं।
तेरी हर एक कविता पर
हंसूगी और और रोऊँगी,
लिखेगा जो भी बातें तू
मनन करती रहूँगी मैं।

प्यार के चक्कर मे

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

प्यार के चक्कर में
मत लिख सैकड़ों कविता,
ये सब तो पूर्व में
कह कर गए हैं सब वियोगी कवि।
तब भी पसीजा क्या कभी
दिल बेवफाओं का।
कलम मत घिस वियोगों पर
नए योगों की रचना कर।
—- डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत,

मन चंचल

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मुझे अपना बनाने में
इस कदर देर मत तू,
न जाने मन मेरा चंचल
किसी से और जुड़ जाये।
मुझे बस लाभ दिखता है
इसलिए देर मत कर अब
न जाने कब पलट जाऊं
न जाने कब मुकर जाऊं।

मुक्तक

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

लिखोगी प्यार का रोना
न जाने और कब तक तुम
मुझे फुरसत कहाँ है अब
बच्चों को पढ़ाना है।

याद

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

चाय की चुस्कियों पर ही
तुम्हारी याद आती है,
बाकी तो व्यस्तता है,
जो मुझे दिन भर सताती है।
जिस दिन अधिक शक्कर पड़ी हो
खास कर उस दिन,
तुम्हारी याद आती है,
दिन भर रुलाती है।
— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत

गम

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

गम भी क्या चीज है
जो इतनी कविताएं लिखवाता है मुझसे
किसी की वेबफाई पर
मुझे कवि या
कवि सा बना देता है।
नित नया दर्द उभर कर,
मेरी पंक्तियों में शामिल हो जाता है।
भीतर का दर्द
बाहर उगलवाता है।

सूरज

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

भोर हो रही है
धीरे-धीरे
सूरज की धमक बढ़ रही है,
थोड़ा किनारे हो जा
बादल के टुकड़े,
आज पूरी तरह चमकने दे उसे,
तू इक्कट्ठा कर आज
अपने सारे अंश
कल बरस लेना पूरी शिद्दत से,
आज उजाला होने दे।

कवि

July 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब तलक मानव को
मानव मात्र से,
भेद की नजरों से देखूं तब तलक।
जब तलक समभाव मेरे में न हो,
तब तलक कविता कहूँ तो
झूठ है।
कर्म मेरा नीच है तो
कवि नहीं,
दृष्टि मेरी नीच है तो
कवि नहीं।
जो लिखूं कविता,
मुझे हक भी नहीं।
—- डॉ0 सतीश पाण्डेय

मिलने में है देरी

July 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तू मुस्काया
मैं रो दी थी,
तू घर आया
मैं बाहर थी,
उस जाने ऐसा क्या था
राहों में मिले अचानक हम,
मैं शर्मायी
तेरी होकर,
तू मुस्काया मेरा होकर
तबसे तू मेरा
मैं तेरी,
फिर भी मिलने में
है देरी,

मुक्तक

July 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

रो चुकी प्यार का रोना मैं
अब अपनी राह बदल लूँगी ,
बेवकूफी में तुझसे प्यार किया,
धोखे के बाद अकल लूँगी,
—— डॉ सतीश पांडेय

मुक्तक

July 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

यह धरा रोगमुक्त हो जाए,
पीड़ित मानव राहत पाए
जल्दी से जल्दी दवा मिले
कुछ नया उपाय निकल आये,

—— डॉ सतीश पांडेय

मीत मेरे

July 12, 2020 in गीत

सावन की बूंदें मन में हलचल कर रहीं
तुम कहाँ हो मीत मेरे आओ ना,
मत रहो यूँ दूर मुझसे आओ ना,
मैं मनोहर ऋतु में आखें भर रही,
बाढ़ मत आने दो मेरे नैन में
मत बहाओ आस मेरी, आओ ना,
इस भरी बरसात में बेचैन हूँ
तुम कहाँ हो मीत मेरे आओ ना,

अपराधै का बाटा: कुमाऊँनी कविता

July 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

अपराधै का बाटा
जिन हिट्या नंतिनौ,
अपराधै को बाटो
बर्बाद करि दे लो।
गरीबै का छोरा
गैंगों में जिन घुस्या,
गैंगों में फँसि बेर
वापसी नै हुनी।
जिन फंस्या, जिन फंस्या
जन फंस्या नंतिनौ,
अपराधै का जाल
जन फंस्या नंतिनौ।
कमि खाया गमि खाया
मिहनत करि लिया।
मिहनतै कमाई,
कमाई भै इज़ा।
मिहनतै की रोटी
कमाया नंतिनौ
अपराधै का बाटा
जिन हिट्या नंतिनौ।
पोरै की छ बात
उस ठुलो अपराधी
मारि बै गिराछ
कि रै छ बात।
जत्ती लै छ्या वीका
पछेट नंतीनौं,
सब्बौ का बिहाल
हैग्यान नंतिनौ।
आई ल गै यो बात
सुनि लिया नंतिनौ
अपराधै का बाटा,
जन हिट्या नंतिनौ।

—- डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड

दाग

July 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम कहती हो तो मान लेता हूँ
कि
दाग अच्छे हैं।
किन्तु सच यह है कि
दाग अच्छे होते नहीं हैं।
एक बार लग जाने के बाद
कहाँ धुल पाते हैं दाग
जब दाग लग ही गया
तब फिर
कौन मानता है बेदाग।

—- डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत

कविता

July 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सिर्फ तुकबंदी नहीं कविता कोई
यह तो ह्रदय से उपजता बोल है,
दर्द का साक्षात अनुभव है यही
प्रेम, करुणा, स्नेह मिश्रित घोल है,

डॉ सतीश पांडेय, चम्पावत
उत्तराखंड

प्रेम

July 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस भरी बरसात में सब धुल गई
बाहरी पर्तें मेरे व्यवहार की,
अब छुपाऊँ किस तरह से झुर्रियां
जो मेरी असली उमर दर्शा रही।

खोट है मेरी नियत में आज भी
आप करते हो भरोसा इस कदर
सच समझते हो मेरे हर झूठ को
प्रेम करते हो भला क्यों इस तरह।

— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत
उत्तराखंड

चित्र

July 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

साँझ हो रही है,
ऊंचे पहाड़ों के शिखर
बादलों से आलिंगन कर रहे हैं।
साफ साफ कुछ नहीं दिख रहा है,
परस्पर प्रेम है
या
बस दिखावा है।
जो भी है
कुछ तो घटित हो रहा है वास्तव में।
अंधेरा होगा तभी सुबह फिर उजाला होगा।
अब
रात भर चोटियों में
फुहारें बरसनी ही हैं।
फुहारें वहाँ बरसेंगी
मन हमारा रोमांचित है।
लेकिन चोटियों पर खड़े वे पेड़
शान्त क्यों हैं,
जिन्हें सबसे पहले बादलों का स्पर्श करना है।
— डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।

आवरण

July 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

आवरण मेरा बहुत ही भव्य है,
आचरण में दाग धब्बे पड़ गए,
जम गई अंतः पटल में कालिमा
भाहरी दिखने की है यह लालिमा।
– डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत
उत्तराखंड।

कुमाऊँनी : पर्वतीय कविता

July 11, 2020 in कुमाऊँनी

झम झमा बरखा लागी
ऐ गौ छ चुंमास
डाना काना छाई रौ छ
हरिया प्रकाश।
त्वै बिना यो मेरो मन
नै लिनो सुपास,
घर ऐ जा मेरा सुवा
लागिगौ उदास।
पाणि का एक्केक ट्वॉप्पा

लय

July 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

फ्रिज में रखी शब्जी की तरह
धीरे धीरे खराब हो रही है
मेरी लय,
कल कहीं बेसुरा न हो जाऊं
पढ़ ले जल्दी से उन पंक्तियों को
जो मैंने
तेरे लिए लिखी हैं।
—- डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत
उत्तराखंड

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