Satish Pandey's Posts

लालच में न धंस

यूँ तो मानव सोचता है मैं सदा जीवित रहूँगा, सब चले जायेंगे लेकिन में यहां चिपका रहूँगा। पर समय का चक्र कोई रोक पाता है नहीं, कब है आना कब है जाना जान पाता है नहीं। इसलिए तू मोह के जंजाल में ज्यादा न फंस, जिंदगी जी ले खुशी से और लालच में न धंस। — डॉ सतीश पाण्डेय »

शहीदों की पावन कहानी

गोरखा राइफल के जांबाज कैप्टन एम० के ० पांडे ने दुश्मन को घेरा वो बटालिक की दुर्गम पहाड़ी उस पहाड़ी से दुश्मन खदेडा। लग चुकी थी उन्हें गोलियाँ, फिर भी दुश्मन का बंकर उड़ाया, बन गए वे बटालिक के हीरो देश के नाम जीवन चढ़ाया। दूसरे थे परमवीर संजय उनकी राइफल ने जलवा दिखाया, कारगिल के फ्लैट टॉप में मार कर दुश्मनों को भगाया । आज दोनों परमवीर को हिन्द की और से है सलामी याद करती रहेगी धारा यह उन शहीदों की पावन ... »

आज कारगिल विजय दिवस है

आज कारगिल विजय दिवस है नमन करें उन वीरों को, जिनके अदम्य शौर्य साहस से जीत मिली भारत माँ को. छलनी कर दुश्मन का सीना भारत मां का मान बढ़ाया, देश के गौरव की रक्षा को निज सीने का लहू चढ़ाया. बलिदानी वीरों ने हँसते-हँसते शीश चढ़ाये थे, हम सब की रक्षा की खातिर अपने शीश चढ़ाये थे. उन वीरों को कवि की कविता आज सलामी देती है, नमन शहादत को करती है आज सलामी देती है. आज कारगिल विजय दिवस है नमन करें उन वीरों को, ज... »

पुकार रही है भारतमाता

पुकार रही है भारतमाता आप सभी संतानों को, कलम उठा लो, खड़क उठा लो ख़त्म करो हैवानों को. बाहर-भीतर देश के दुश्मन, जो उन्नति के बाधक हैं, सामाजिक ताने-बाने को तोड़ रहे जो कारक हैं. लिखो उजागर करो उन्हें सच्चाई को आगे लाओ, कलम तुम्हारी खड़क बनेगी धार तीव्र करके आओ. कलम उठालो, खड़क उठालो तभी देश उन्नत होगा, वरना यह घुन भीतर – भीतर हम सबको धोखा देगा. साफ़ करो भीतर के दुश्मन ख़त्म करो हैवानों को, पुकार रह... »

बेकारी

चपरासी पद की भर्ती में, पीएचडी धारक आवेदक हैं, एक अनार है सौ बीमार हैं, जुगाड़ में बैठे पहरेदार हैं, इस जुगाड़ के खेल ने सारी प्रतिभाओं को निराश कर दिया, बेकारी के रोग ने देखो, युवाशक्ति को क्षीण कर दिया. —– डा. सतीश पांडेय »

दोहे

गरीब गरीब रह गया, सेठ सौ गुना सेठ। खाई सा अंतर हुआ, भूख बराबर पेट।।1 गरीबों के उत्थान की, बनी योजना लाख। कागज में पूरी हुई, उस तक पंहुची खाक।।2 —– सतीश पाण्डेय »

बेरोजगारी

आत्मघात, मानसिक पीड़ाएँ, छीना-झपटी, राह भटकना, बेरोजगारी के दुष्प्रभाव हैं, पहला काम हो इसे रोकना. »

बारिश

मन किसी सूखी नदी सा हो रहा आप कहती हो कि बारिश आ गई, जो ये छींटे पड़ रहे हैं उनसे बस एक सूनापन सा मन में गड रहा, कब तलक यूँ ही घिरेगा आसमाँ बूंदाबांदी ही रहेगी प्यार की, कब तलक बिछुड़े रहेंगे आप हम कब तलक बरसेगा खुलकर आसमाँ, —————- Dr. सतीश पांडेय »

मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को

मत झिड़क बूढ़े मां-बाप को उनकी सेवा में खुद को लगा ले, यह तो मौका मिला है तुझे आज मौके का फायदा उठा ले। एक दिन सबने माटी में घुल के शून्यता में समाना है प्यारे आज वे वृद्ध हैं कल तू होगा, अपने कल के लिए ही कमा ले। आज जैसा करेगा तुझे कल तेरी संतान से वो मिलेगा ब्याज भी मूल के साथ होगा, जो भी अच्छा-बुरा तू करेगा। बूढ़े मां-बाप घर की हैं पूँजी घर अधूरा है उनके बिना, पूज ले वृद्ध मां-बाप को अपने कल के लि... »

आत्महत्या न कर

आत्महत्या न कर जिन्दगी को बचा, कोई दुख तेरे जीवन ज्यादा नहीं। देख चारों तरफ जो घटित हो रहा ढूंढ खुशियां उसी में, दुखों को नहीं। दुःख तो आते रहेंगे जाते रहेंगे। तेरा आना न होगा दुबारा यहां। रूठ जाये भले तुझसे संसार यह, पर स्वयं से कभी रूठ जाना नहीं। भोग ले सारे संसार के सुख व दुख पर दुखों स्वयं को डराना नहीं। आस मत रख किसी से जी बिंदास बन अपने जीवन ऐसे डुबाना नहीं। और बुझदिल न बन कर ले संघर्ष तू आत... »

बेटियां

बेटियां तो जिंदगी का मूल हैं बेटियां शुभकामना स्फूर्ति हैं, वंश चलने की न कर चिंता मनुज, बेटियां निज वंश की ही पूर्ति हैं, »

अन्यथा बेजान हैं

इस महामारी में हजारों लोग काल का ग्रास बन गए, कई परिवारों के कमाऊ लोग चल बसे, विलीन हो गए, झकझोर दिया है आर्थिक स्थिति को, बेरोजगार कर दिया है हजारों लाखों युवाओं को, सपने चकनाचूर कर दिए हैं मानवता के, रोटी की जरूरत पहली जरुरत है, इंसान की, इसलिए आज की विकट परिस्थिति में, रोटी बटोरने की नहीं रोटी बांटने की जरुरत है, असहाय की मदद को खड़ा होने की जरुरत है, तभी हम इंसान हैं, अन्यथा पत्थर हैं बेजान हैं... »

धुँआ

छाती चौड़ी की सिगरेट जलाई, सोचता है इसे पी रहा हूँ। तू नहीं पी रहा इसको प्यारे यह धुंआ तो मजे से तुझे पी रहा। —– डॉ0 सतीश पाण्डेय »

लोकतंत्र में कवि

लोकतंत्र के वृहद भवन का मुझको स्तम्भ मानो न मानो मैं धरम जाति भेदों से ऊपर आम जनता की बातें लिखूंगा। जो घटित हो रहा है लिखूंगा जो गलत हो रहा है कहूंगा, सब चलें अपने कर्तव्य पथ पर ऐसी कविताएं करता रहूंगा। डॉ0 सतीश पाण्डेय »

पढ़ो लिखो

जीवन में आगे बढ़ने को शिक्षा लो, शिक्षा लो बच्चों, पढ़ो लिखो जी- जान लगाकर कुछ बनने की ठान लो बच्चों, जिसने भी परिश्रम किया है अच्छा सा फल उसे मिला है, यह मन्त्र आगे बढ़ने का इस मंत्र को जान लो बच्चों, आज समय बर्बाद करोगे तो जीवन भर कष्ट सहोगे, आज अगर मेहनत कर लोगे कल मन की मंजिल पा लोगे, ———————————– —- डॉ. सतीश पांडेय »

मुक्तक

स्वप्न में रोज लिखती हूँ तुम्हारे नाम की कविता, कहीं कोई देख ना ले बस इसी चिंता में रहती हूँ, इसलिए उन सबूतों को मिटाकर ही मैं जगती हूँ। »

स्वप्न में ही

हमारी ओर से शुभरात्रि कह देना उन्हें कविता, साथ ही यह भी कह देना कि सपने में चले आना। कहीं पर बैठ करके प्यार की दो बात कर लेंगे। जागते में हमें संसार मिलने ही नहीं देगा। इसलिए स्वप्न में ही प्यार की दो बात कर लेंगे। —डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत। »

आज गर्मी है

पहाड़ों में भी पंखे चल रहे हैं आज गर्मी है, सभी एक दूसरे से जल रहे हैं, आज गर्मी है। किसी के पास पैसा है तो उसको आज गर्मी है, किसी को पद मिला है तो उसे भी आज गर्मी है। छटा सावन की है पर आज चारों ओर गर्मी है। पहाड़ों में भी पंखे चल रहे हैं आज गर्मी है। – डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत। »

कलम से

प्यार के चक्कर में पड़ मेरी तरह प्यारे, अरे तू भी वियोगी कवि न बन जाना कहीं प्यारे। जरूरत है नए उत्साह की कविता लिखे कोई, इस कमी को कलम से आज, पूरी कर मेरे प्यारे। — डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत »

विपरीत

भरी दोपहरी की धूप में जिस तरह सूखने की बजाय गीला हो जाता है पसीने से बदन, ठीक उसी तरह भरी बरसात में हरा-भरा न होकर सुख गया है मन। »

लिखना रात भर कविता

किसी भी हाल में तुझसे नहीं पीछे रहूंगी मैं, तू लिखना रात भर कविता, सुबह जग कर पढूंगी मैं। तेरी हर एक कविता पर हंसूगी और और रोऊँगी, लिखेगा जो भी बातें तू मनन करती रहूँगी मैं। »

प्यार के चक्कर मे

प्यार के चक्कर में मत लिख सैकड़ों कविता, ये सब तो पूर्व में कह कर गए हैं सब वियोगी कवि। तब भी पसीजा क्या कभी दिल बेवफाओं का। कलम मत घिस वियोगों पर नए योगों की रचना कर। —- डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, »

मन चंचल

मुझे अपना बनाने में इस कदर देर मत तू, न जाने मन मेरा चंचल किसी से और जुड़ जाये। मुझे बस लाभ दिखता है इसलिए देर मत कर अब न जाने कब पलट जाऊं न जाने कब मुकर जाऊं। »

मुक्तक

लिखोगी प्यार का रोना न जाने और कब तक तुम मुझे फुरसत कहाँ है अब बच्चों को पढ़ाना है। »

याद

चाय की चुस्कियों पर ही तुम्हारी याद आती है, बाकी तो व्यस्तता है, जो मुझे दिन भर सताती है। जिस दिन अधिक शक्कर पड़ी हो खास कर उस दिन, तुम्हारी याद आती है, दिन भर रुलाती है। — डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत »

गम

गम भी क्या चीज है जो इतनी कविताएं लिखवाता है मुझसे किसी की वेबफाई पर मुझे कवि या कवि सा बना देता है। नित नया दर्द उभर कर, मेरी पंक्तियों में शामिल हो जाता है। भीतर का दर्द बाहर उगलवाता है। »

सूरज

भोर हो रही है धीरे-धीरे सूरज की धमक बढ़ रही है, थोड़ा किनारे हो जा बादल के टुकड़े, आज पूरी तरह चमकने दे उसे, तू इक्कट्ठा कर आज अपने सारे अंश कल बरस लेना पूरी शिद्दत से, आज उजाला होने दे। »

कवि

जब तलक मानव को मानव मात्र से, भेद की नजरों से देखूं तब तलक। जब तलक समभाव मेरे में न हो, तब तलक कविता कहूँ तो झूठ है। कर्म मेरा नीच है तो कवि नहीं, दृष्टि मेरी नीच है तो कवि नहीं। जो लिखूं कविता, मुझे हक भी नहीं। —- डॉ0 सतीश पाण्डेय »

मिलने में है देरी

तू मुस्काया मैं रो दी थी, तू घर आया मैं बाहर थी, उस जाने ऐसा क्या था राहों में मिले अचानक हम, मैं शर्मायी तेरी होकर, तू मुस्काया मेरा होकर तबसे तू मेरा मैं तेरी, फिर भी मिलने में है देरी, »

मुक्तक

रो चुकी प्यार का रोना मैं अब अपनी राह बदल लूँगी , बेवकूफी में तुझसे प्यार किया, धोखे के बाद अकल लूँगी, —— डॉ सतीश पांडेय »

मुक्तक

यह धरा रोगमुक्त हो जाए, पीड़ित मानव राहत पाए जल्दी से जल्दी दवा मिले कुछ नया उपाय निकल आये, —— डॉ सतीश पांडेय »

मीत मेरे

सावन की बूंदें मन में हलचल कर रहीं तुम कहाँ हो मीत मेरे आओ ना, मत रहो यूँ दूर मुझसे आओ ना, मैं मनोहर ऋतु में आखें भर रही, बाढ़ मत आने दो मेरे नैन में मत बहाओ आस मेरी, आओ ना, इस भरी बरसात में बेचैन हूँ तुम कहाँ हो मीत मेरे आओ ना, »

अपराधै का बाटा: कुमाऊँनी कविता

अपराधै का बाटा जिन हिट्या नंतिनौ, अपराधै को बाटो बर्बाद करि दे लो। गरीबै का छोरा गैंगों में जिन घुस्या, गैंगों में फँसि बेर वापसी नै हुनी। जिन फंस्या, जिन फंस्या जन फंस्या नंतिनौ, अपराधै का जाल जन फंस्या नंतिनौ। कमि खाया गमि खाया मिहनत करि लिया। मिहनतै कमाई, कमाई भै इज़ा। मिहनतै की रोटी कमाया नंतिनौ अपराधै का बाटा जिन हिट्या नंतिनौ। पोरै की छ बात उस ठुलो अपराधी मारि बै गिराछ कि रै छ बात। जत्ती लै छ... »

दाग

तुम कहती हो तो मान लेता हूँ कि दाग अच्छे हैं। किन्तु सच यह है कि दाग अच्छे होते नहीं हैं। एक बार लग जाने के बाद कहाँ धुल पाते हैं दाग जब दाग लग ही गया तब फिर कौन मानता है बेदाग। —- डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत »

कविता

सिर्फ तुकबंदी नहीं कविता कोई यह तो ह्रदय से उपजता बोल है, दर्द का साक्षात अनुभव है यही प्रेम, करुणा, स्नेह मिश्रित घोल है, डॉ सतीश पांडेय, चम्पावत उत्तराखंड »

प्रेम

इस भरी बरसात में सब धुल गई बाहरी पर्तें मेरे व्यवहार की, अब छुपाऊँ किस तरह से झुर्रियां जो मेरी असली उमर दर्शा रही। खोट है मेरी नियत में आज भी आप करते हो भरोसा इस कदर सच समझते हो मेरे हर झूठ को प्रेम करते हो भला क्यों इस तरह। — डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत उत्तराखंड »

चित्र

साँझ हो रही है, ऊंचे पहाड़ों के शिखर बादलों से आलिंगन कर रहे हैं। साफ साफ कुछ नहीं दिख रहा है, परस्पर प्रेम है या बस दिखावा है। जो भी है कुछ तो घटित हो रहा है वास्तव में। अंधेरा होगा तभी सुबह फिर उजाला होगा। अब रात भर चोटियों में फुहारें बरसनी ही हैं। फुहारें वहाँ बरसेंगी मन हमारा रोमांचित है। लेकिन चोटियों पर खड़े वे पेड़ शान्त क्यों हैं, जिन्हें सबसे पहले बादलों का स्पर्श करना है। — डॉ0 सतीश ... »

आवरण

आवरण मेरा बहुत ही भव्य है, आचरण में दाग धब्बे पड़ गए, जम गई अंतः पटल में कालिमा भाहरी दिखने की है यह लालिमा। – डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत उत्तराखंड। »

कुमाऊँनी : पर्वतीय कविता

झम झमा बरखा लागी ऐ गौ छ चुंमास डाना काना छाई रौ छ हरिया प्रकाश। त्वै बिना यो मेरो मन नै लिनो सुपास, घर ऐ जा मेरा सुवा लागिगौ उदास। पाणि का एक्केक ट्वॉप्पा »

लय

फ्रिज में रखी शब्जी की तरह धीरे धीरे खराब हो रही है मेरी लय, कल कहीं बेसुरा न हो जाऊं पढ़ ले जल्दी से उन पंक्तियों को जो मैंने तेरे लिए लिखी हैं। —- डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत उत्तराखंड »

बस मेरा अधिकार हो

देह में अभिमान की गर्मी पड़ी आसुंओं के स्रोत सूखे पड़ गये नैन की झिलमिल सुहानी पुतलियां आग के ओले गिराती रह गई। बाजुओं की शक्ति से कमजोर की कुछ मदद करने की चाहत खो गई हर खुशी पर बस मेरा अधिकार हो लूट लेने की सी आदत हो गई। – — डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत उत्तराखंड »

मुक्तक

संवेदनाएं मर चुकी हैं आज सब किस तरह कविता कहूं तुम ही कहो सब दिखावा है मेरे व्यवहार में किस तरह कविता कहूं तुम ही कहो. डॉ. सतीश पांडेय, चम्पावत उत्तराखंड »

बेटी बचाओ

भ्रूण हत्या पाप है तू पाप का भागी न बन बाप है बेटी बचा ले बधिक अपराधी न बन – डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड। »

घोड़ा दबा दे सिपाही

कविता – घोड़ा दबा दे सिपाही तीखी नजर से सिपाही आज ऐसा निशाना लगा दे, मार दे देश के दुश्मनों को उनका नामोनिशां तू मिटा दे। तूने सीमा में डटकर हमेशा दुश्मनों के छुड़ाये हैं छक्के, आज गलवान घाटी में तूने दुश्मनों को लगाये हैं मुक्के। तेरे मुक्के से दुश्मन पिटेगा तेरी गोली से दुश्मन मरेगा, हिन्द की जय हो जय हो हमेशा तेरी बन्दूक का स्वर कहेगा। तेरी नजर लक्ष्य पर है सामने फौज दुश्मन खड़ी है, अब तू घो... »

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