Satish Pandey's Posts

नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी

घास पूस की झोपड़ी मैया है बीमार चौदह की गुड़िया ने थामी, है घर की पतवार। भूख बीमारी बेहाली के झंझावात घिरे हैं, गलत नजर से देख रहे श्वानों से सिरफिरे हैं। चूल्हा-चौका सब करना है भैया-बहनों की देखभाल, नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी अच्छे से है ली संभाल। हालातों से जूझ-जूझकर हुए तजुर्बे जीवन के, लगी हुई है खूब निभाने फर्ज-कर्ज इस जीवन के। »

चैन गंवा कर खूब कमाया (चौपाई छन्द)

खुद खुश रहना औऱ सभी को खुश रखना हो जीवन का पथ, याद रखो नश्वर है जीवन मिट जाना है बस इसका सच। तेरा-मेरा मेरा-तेरा कहते-कहते बीते पल-क्षण अंत समय तक समझ न पाया, जीवन का सच्चा सच यह मन। चैन गंवा कर खूब कमाया, जमा किया जो खाते में धन, खाने तक का समय नहीं था, जीवन भर का था पागलपन। कुछ भी हाथ नहीं रहता है आशा में रह जाता है सब अतः देखकर यह सारा सच खुश रहने की ठानो तुम अब। ———- चौपाई छन... »

दिल में बैठाया करता हूँ

ज्वाला मेरी क्षीण नहीं मैं खुद को मंद रखा करता हूँ धीमे-धीमे जलता हूँ, खुद में स्वच्छन्द जिया करता हूँ। सच्चे दिल के लोगों को दिल में बैठाया करता हूँ, सच्चे मित्रों की महफ़िल में मैं प्रेम लुटाया करता हूँ। »

अच्छे से कट जाये।

मन के भीतर तक पहुँच गई, ठंडक की ठंडी हवा अब क्या हो इस ठिठुरन का हल कुछ है क्या इसकी दवा। होती तो मैं खा लेता, सबको उसे खिला देता, जितने भी मौसम होते हैं उन सबमें खूब मजे लेता। ठंडक में ठंड सताती है गर्मी में बदन पसीने से इतना तर हो जाता है नींद नहीं आ पाती है। ठंडा हो या गर्मी हो या बरसात की नमी हो, सब सह लेता यह शरीर बन जाती कोई औषधि तो। लेकिन हो तो वो सस्ती हो जिसको गरीब भी खा पाये, जीवन के कुछ... »

बादल घिरे हुये हैं नभ में

बादल घिरे हुये हैं नभ में, गरज रहे हैं आज, बूंदें बरस रही आंगन में, छम छम छम छम बाज। ऐसे में तन पुलकित होकर, भीतर करता नाच, बाहर जाने से डरता है, ठंडक की है आंच। पौधे खुश हैं बहुत दिनों के, बाद नीर मिला है। तरस गये थे सूख रहे थे, आज पीर मिला है। पानी है तो जीवन है इस उदक सब सूना है, पानी से ही धरणी में नव, अँकुर उग पाना है। ——————💐💐—- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डे... »

मत सोचो

ठंड की बरसात में घर के भीतर छाता ओढ़कर सोने की मत सोचो दिखावे का रोना रोने की मत सोचो। मुँह चुराकर निकल जाने की मत सोचो। केवल खुद ही खाने की मत सोचो। अपनी खुशी के ही गीत गाने की मत सोचो। जो जरूरतमंद हैं भूखे हैं, वस्त्रहीन हैं उनकी भी मदद कर लो सब कुछ खुद ही पाने की मत सोचो। »

कब के बुझ चुकी

वो जगह छूटी वो लोग छूटे, वो मन की लगी कब के बुझ चुकी, वो चाहत बहुत दूर जा चुकी, वो गलियां अब बेगानी हो चुकी फिर भी नजरें उस ओर पडते ही, आँसू टपक पडे, वो आँसू माटी के भाव बिक गये। »

दूजे की भी मदद कर(कुंडलिया छन्द)

दूजे की भी मदद कर, अपना ही मत देख। ठिठुर रहे जो सड़क पर, उनको भी तो देख। उनको भी तो देख, खिला दे रोटी उनको, पहना दे रे वस्त्र, इतना सक्षम है तू तो। कहे ‘लेखनी’ आज, जरूरत जिनको है वे पीड़ा में हैं जरा, मदद उनकी तू कर ले। ——- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय »

ठंडी हवाएं

बारिश की बूंदें पड़ने लगी हैं, ठंडी हवाएं चलने लगी हैं। सड़कों में बैठे हुए बेघरों की जीवन की साँसें थमने लगी हैं। समाचार पत्रों में छपने लगा है ठंडक से मौतें होने लगी हैं। देखो क्या ? मानव तमद्दुन की बातें सचमुच बुलंदी छूने लगी हैं। जो भी है फिर भी धरातल में देखो ठंडक से मौतें होने लगी हैं। »

गांव की सड़कों में

योजनाओ!! तुम धरातल तक पहुंच जाओ ना, गांव की सड़कों में खूब गड्ढे हो गए हैं। ऐसे झटके हैं कि बीमार या गर्भावस्था में ये गड्ढे समस्याओं के अड्डे हो गए हैं। »

संतोष

सुखी है आदमी कब जब उसे संतोष है, अन्यथा उलझन है मन में रोष है। जो मिला उस पर नहीं कुछ चैन है, इसलिए यह मन मेरा बेचैन है। गर मेरे मन में भरा संतोष है, चमचामते दिन मधुर सी रैन है। हो अगर संतोष तन पुलकित है यह होंठ में मुस्कान मन में चैन है। »

छोटी-छोटी खुशियों की

आज एक टूटी हुई चप्पल मिली उसे कूड़े के ढेर में, साथ ही एक पुरानी बनियान मिली। दो रुपये का सिक्का रख गई हाथ में, सड़क पर चलते एक धनवान मिली। खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसे कूड़े के ढेर में छोटी-छोटी खुशियों की खान मिली। »

न बोलिये बात ऐसी

न बोलिये बात ऐसी कि डर जायें हम, आपको देखकर चूक कर जायें हम। देखिए लाल आंखों से यूँ मत हमें, जिससे कि सचमुच सिहर जायें हम। »

हम समझ न पायेंगे

आपकी बात ऐसे हम समझ न पायेंगे जरा सा खुल के कहो खुल के बता जायेंगे। दिल में तूफान है पर आग अब बुझी सी है, आप चाहो तो उसे और जला लायेंगे। ठंड है खूब और आप भी बुझे से हैं आग लायेंगे आपको भी तपा जायेंगे। आप मुँह मोड़ लो पूरी तरह भले हमसे मगर हमें न कभी आप भुला पायेंगे। »

जीवन कठिन हुआ जीवों का

आज धूप नहीं है बादल छितरे हैं नील गगन में ठिठुर रहा है जीवन बर्फ भरी है आज पवन में। कैसे उठूँ रजाई से, यह ठंडक मुझे रुलाई दे कुछ गर्मी लाने की बातें अब कैसे मुझे सुनाई दें। चाय हाथ में आने तक ठंडी हो जाती है, भैया, ऐसे में कोई छोड़ गया है सड़कों में बूढ़ी गैया। जीवन कठिन हुआ जीवों का खूब पड़ रही है ठंडक, पाले की चादर चमड़ी पर दांत कर रहे हैं टक-टक। »

नव वर्ष आ रहा है

समय की धीर लहरें बढ़े ही जा रही हैं, खुद में बीते दिनों को समाते जा रही हैं। जा रहा यह बरस अब वक्त के इस जलधि में, आ रहा नव-बरस है आज बिंदास गति में। रेत सी जिन्दगी है, बीतता वक्त है यह, काल के इस उदधि में समाता वक्त है यह। नए पल आ रहे हैं पुराने जा रहे हैं, रेत में चिन्ह अपने घोलते जा रहे हैं। पुराना जा रहा है उसे है नम विदाई, नया जो आ रहा है आज उसकी बधाई। पा सके थे नहीं जो आप बीते बरस में, वो मिल... »

नववर्ष की शुभकामनाएं

नववर्ष की शुभकामनाएं हैं हमारी ओर से, जिन्दगी खुशहाल हो पल पल खिला हो आपका। स्वस्थ तन हो स्वस्थ मन हो खूब धन हो आपका। »

ऐसी लेकर आना युक्ति

मानवता व्याधियों से जूझती रही, पूरे साल, ओ दो हजार बीस !! अब विदा ले। दो हजार इक्कीस !! तू खुशियों की झोली भर के ला शुभ बन के आ, मानवता को जिससे मिले पीड़ा से मुक्ति ऐसी लेकर आना युक्ति। »

खूब मनाओ तुम खुशी(कुंडलिया रूप)

खूब मनाओ तुम खुशी, इतना रख लो ध्यान, चमड़ी जिनकी खा रहे, उनमें भी है जान। उनमें भी है जान, मगर तुम खून पी रहे, पीकर खून निरीह का, खुशियां क्यों ढूंढ रहे। कहे ‘कलम’ यह बात, आज तो इन्हें न काटो, नए साल की खुशियां, तुम इनमें भी बांटो। »

जिनकी रुकी हैं शादियां

मुबारक आपको नव बरस में खूब खुशियों से भरी हों वादियां, जो जुटे मेहनत में हैं हो जाएं उनकी चांदियाँ। जल्दी से हों जिनकी रुकी हैं शादियां। झगड़ें नहीं जिनकी हुई हैं शादियां खूब खुशियों से भरी हों वादियां। »

नए वर्ष के स्वागत का जोश

नए वर्ष के स्वागत का जोश पुराने के जाने की खुशी ऐसे मनाई जा रही है बोतलों बोतलें गटकाई जा रही हैं। बहाना अच्छा है पीने का युवाओं में क्या किशोरों में भी पीने का जुनून दिख रहा है, मानवता का भविष्य उज्ज्वल लग रहा है। »

वर्ष की आखिरी रात है

वर्ष की आखिरी रात है थर्टी फर्स्ट मना रहे हैं लोग, मुर्गियां, बकरियां काट कर खुशियां मना रहे हैं लोग। किसी का नया वर्ष आ रहा है किसी प्राणी का सब कुछ जा रहा है, ठहाके लगा रहे हैं लोग थर्टी फर्स्ट मना रहे हैं लोग। जान लेकर नववर्ष की खुशियां मना रहे हैं लोग। »

मन में हिम्मत रख सदा (कुंडलिया छंद)

मन में हिम्मत रख सदा, हिम्मत है हथियार, हिम्मत वाला आदमी, हो जाता है पार। हो जाता है पार, सफलता पा जाता है, साहस से वह कठिन, विजय पाता जाता है। कहे ‘कलम’ हमेशा, हौसला मन में रख ले, हिम्मत रख बुलन्द, स्वाद जीत का चख ले। »

दोस्तों से मिलो मुस्कुराते हुए

गीत गाते हुए खिलखिलाते हुए यह सफर काट लो गुनगुनाते हुए। दूर करते हुए सारी नाराजगी दोस्तों से मिलो मुस्कुराते हुए। »

चाँदनी है दिखी

आज दिन में हमें चाँदनी है दिखी, तार झंकार दे रागिनी है दिखी। बात करते नहीं तो करें मत मगर आंख में चाह की कुछ नमी है दिखी। »

आप बेकार में यूँ खफा हो गए

आप बेकार में यूँ खफा हो गए दुश्मनों के हमारे सखा हो गए, प्यार में जो संजोये थे पल आपके नफ़रतों में सभी वे अदा हो गए। »

मुस्कुराहट बिखेरो न यूँ ठंड में

मुस्कुराहट बिखेरो न यूँ ठंड में विघ्न डालो नहीं आज आनन्द में, मन है कोमल, जरा भोलेपन में भी है आज डालो नहीं आप फिर द्वंद में। »

न जाइये इस तरह

न जाइये इस तरह छोड़कर राह में, हम तो मर जायेंगे आपकी चाह में। बात मत कीजिये और से इस तरह हम तो हो जायेंगे खाक फिर डाह में। आइये बैठिए नेह से देखिए, अन्यथा बीत जायेंगे पल आह में। जिन्दगी है समुन्दर कठिन राह है काट लेंगे इसे प्यार की नाव में। रोकिए अपने कदमों को मत जाइये, साथ में हम रहें प्रीति के गांव में। »

बिना तुम्हारे

बिना तुम्हारे इस ठंडक में बिस्तर से उठने का मन नहीं है, आ जाओ ना, चली आओ, उनके हाथ उनके साथ, ताजगी बनकर नाराजगी तजकर, अन्यथा उठने में हैं असहाय, आ जाओ ना चाय। »

नववर्ष की शुभकामना

शुभकामनायें, मित्रवर नववर्ष की हैं आपको, आपके होंठों में खिलती नित नयी लाली मिले, गीत में संगीत में अंतस व बाहर भीत में, धर्म में भी कर्म में भी नीति में और रीति में नित नया उल्लास पाओ, जिंदगी खुशहाल हो। …………. ……………..आप सभी को नववर्ष की शुभकामनाएं …… डा0 सतीश चन्द्र पाण्डेय, चम्पावत »

समझना है तुम्हें

गरीब को भी इंसान समझना है तुम्हें क्या पता कब कहाँ मिल जायें भगवान तुम्हें। भूख क्या होती है यह भी समझना है तुम्हें, इंसान हो इंसानियत को भी समझना है तुम्हें। मिली है बुद्धि अच्छा और बुरा सोचने की, जानवर हो नहीं, मानव हो समझना है तुम्हें। न मसलो बेजुबानों को न छीनो जिन्दगी का हक दानव नहीं, मानव हो समझना है तुम्हें। »

तुम्हारे बिना

तुम्हारे बिना पाना पाना नहीं है तुमसे अधिक कुछ खजाना नहीं है, तुम तो हो ताकत, तुम तो हो हिम्मत, तुम्हें पास रखना है गँवाना नहीं है। »

खफा हो गए बस

खफा हो गए बस कारण न पूछो, पूछोगे भी तो बता न सकेंगे कुछ ही दिनों में फिर बोल लेंगे ज्यादा खफा भी रह न सकेंगे। »

दिल व साँसों से सटे रहते हैं

ठंड में लब फटे से रहते हैं आजकल वे कटे से रहते हैं, दूर कितना भी चले जायें पर दिल व साँसों से सटे रहते हैं। कभी करीब आते हैं फिर कभी दूर हटे रहे रहते हैं, नैन अपने भी हठीले से हैं हर घड़ी उन में डटे रहते हैं। »

वही दिल जुड़ाता है

वही दिल जुड़ाता है करीब लाता है, फिर वही इस तरह से दूरियां बढ़ाता है। वो रब हमें इस तरह खेल ही खेल में कभी मिलाता है कभी गम बढ़ाता है। हम तो बस चाहते ही रहते हैं हाथ में हाथ रख साथ ही साथ रह नेह की चाह दिल मे रखते हैं। मगर वो रब का निराला न्याय है या किसी प्रेमी दिल हाय है चाह कर भी नहीं करीब रहते हैं बात तो करते हैं दिल से अजीब रहते हैं। »

लिख दे ना

जो हो रहा है घटित अपने चारों तरफ उसे बयान कर दे ना मेरी कलम! लिख दे ना। जी रहे घर बिना लिबास बिना, ठंड में ओढ़नी बिना सोते ऐसे जीवन लिए कुछ कर दे ना, उस दर्द को उठाने को मेरे मन! लिख दे ना। भूख है और खड़ी बेकारी उनकी आवाज को उठा दे ना वो कलम लिख दे ना। जो है वो कह दे ना, मेरी कलम! लिख दे ना। »

थोड़ा काजल, बहुत ही रमता है

अपनी आँखों में लगाकर रखिये थोड़ा काजल, बहुत ही रमता है, हम भी पहचान लेंगे रस्ते में मुँह में तो मास्क बंधा रहता है। जो भी शॉपिंग करोगे सब की सब एक थैले में भर के रख देना, लादकर पीठ में पंहुचा देंगे आप बस एक बार कह देना। »

हर ख़ुशी तेरे नाम हो चुकी है

ठंडक बढ़ रही है लगातार केवल तेरा अहसास गला रहा है जिंदगी में जमी बर्फ को, सर्द हवाएं नाजुक गालों से टकराकर अपने पैरों के निशान छोड़ रही है काले काले टिपके जैसे निशान, मेरी पूरी खुली परत श्याम हो चुकी है , तू पहचान नहीं पायेगा लेकिन हर ख़ुशी तेरे नाम हो चुकी है, मेरे चेहरे की झुर्रियों को अब नजर नहीं लगेगी समय की झुर्री झुर्री तेरे नाम पर बदनाम हो चुकी है, ठंडक ने ओढ़ने पर मजबूर कर दिया है तन की कालिमा... »

मीत तू रागिनी सुना दे ना

इस भरी रात में आये निंदिया मीत तू रागिनी सुना दे ना ये जो दिनभर की आपाधापी थी तू मधुर बोल से भुला दे ना। जिन्दगी में सुबह से रात हुई रात से फिर सुबह का चक्र चला बीतते जा रहे पलों में तू रागिनी प्यार की सुना दे ना। »

फड़फड़ा रहा था

वो लोट-पोट हो रहा था जमीन पर, जिस तरह केंचुआ तिनके से छूने पर फड़फड़ाने लगता है, वैसे वह बेचैनी से फड़फड़ा रहा था। किसी का तो बेटा रहा ही होगा अब इस तरह नशे का आदि होकर भरी सड़क में लेटा उलट-पुलट कर रहा था। चिल्ला रहा था सिर पीट रहा था, नशे से शुष्क हो चुका उसका दिमाग उसके नियंत्रण में नहीं आ रहा था। शायद आज या तो डोज कम हो गई थी, या नशा नहीं मिल पाया था। लेकिन जो भी था नशे ने एक इंसान को सड़क पर लिटा द... »

वो नशे का आदी

ठंड थी खूब पहाड़ों की ठंड, पानी मे कंकड़ जम जाते हैं पानी के नल तक फट जाते हैं, वो बाज़ार में भटकने वाला शराबी बेचैन था, जुगाड़ में था कुछ पीने को मिले तो रात कटे, किसी दुकान के आगे सोकर, था तो वो इंसान ही, लेकिन शराब की लत से घरबार सब छूट गया था, वो अकेला रह गया था, जानवरों की तरह बाज़ार का ही हो गया था। हाथ फैलाकर आने जाने वालों के आगे रोया पेट की खातिर उसने मांगा, पीने लायक मिल गया पी ली, खाने को बच... »

चल रही आंधियां हैं

चल रही आंधियां हैं थपेड़े ठंड के हैं, लिख रहा बेजुबानी भाव कुछ मंद से हैं। फिजाँ झकझोरने को पास कुछ भी नहीं है नैन सूखे हुए हैं होंठ कुछ बन्द से हैं। नहीं हो पाये अपने रहे बेगाने वो भी समझ लें भावना को मित्र भी चंद से हैं। चमकते सूर्य हैं वो ठिठुरते इन दिनों के और हम राह में उनकी घिरे से धुंध से हैं। »

मुहब्बत के नशे में

मुहब्बत के नशे में चूर रहना चाहता हूँ ए जिन्दगी मैं नफ़रतों से दूर रहना चाहता हूँ। इंसान हूँ, कमियां भी हैं, अच्छाइयाँ भी हैं, मगर जैसा भी हूँ इंसानियत को पास रखना चाहता हूं। जा चुका दूर मैं जिनसे उन्हें अहसास हो जाये मैं लौट करके फिर उन्हीं के पास आना चाहता हूँ। घुटन है नफ़रतों में प्यार में सौंधी महक है दोस्तों उस सुरीली हवा में सांस लेना चाहता हूँ। »

समझ जाता है मन यह

आ मेरे मीत आ जा बात मन की बता जा उग रहे भाव हैं जो मेरे मन को दिखा जा। छिपाना छोड़ दे तू कोपलें चाहतों की समझ जाता है मन यह दिशाएं आहटों की। तेरे नयनों की भाषा जान लेते नयन हैं, क्योंकि लाखों में तू ही एक इनका चयन है। जरा सा पास में आ बैठ जा दो घड़ी तू चुराकर मन मुआ यह दूर है क्यों खड़ी तू। »

प्रेम वह है

प्रेम वह है जो आंखों में, मन में दूजे के प्रति उमड़ चाहत के बीज उगा देता है, विरक्त और बुझे मन में, तत्क्षण अनुराग जगा देता है। प्रेम वह है जो सिंचित कर, मन के मुरझाये पौधों को हरा-भरा कर देता है। प्रेम वह है जो नयनों में नव दृष्टि, नव ज्योति जगा देता है। प्रेम वह है जो अवचेतन भावों को जाग्रत कर नवचेतना जगा देता है। प्रेम वह है जो खुशी का संचार कर देता है, जीने का नया उत्साह भर देता है। प्रेम वह है... »

मन मेरा गुनगुनाया

गीत भँवरे ने गाया मैं वहां चुप खड़ा था उसकी लय में बहक कर मन मेरा गुनगुनाया। सुगंधित सी हवा फूल ने जब बिखेरी, नासिका में समाई मन मेरा मुस्कुराया। देख तिरछी नजर से त्वरित दी प्रतिक्रिया कुछ नहीं कह सका तब मन मेरा गुदगुदाया। पड़े असहाय की जब मदद वो कर रहे थे, नैन से देखकर यह तन-बदन खिलखिलाया। निरी इंसानियत को देख कर आज जिन्दा खुशी से भर गया मैं तन-बदन खिलखिलाया। »

तू जगाना खुद की हिम्मत

हौसला रख, न घबरा काम ले हिम्मत से तू जिन्दगी आसान होगी मंजिलें कदमों में होंगी। हो निराशा जब कभी दिल बैठ सा जाये अगर, तू जगाना खुद की हिम्मत मुश्किलें आसान होंगी। आँख भर आयें किसी के दर्द को महसूस कर, या किसी से ठेस पाकर मन व्यथित हो जाये तब, काम लेना हौसले से, शक्ति अंतस की जगाना, मन में बल आयेगा तेरे कुछ खुशी अनुभूत होगी। जब खुशी अनुभूत होगी तब ललक आयेगी मन में मुश्किलों को यह ललक ललकारने लग जाय... »

रख लो ना इसे काम पर

एक छोटे से ढाबे के बाहर खड़ी होकर वो गुहार कर रही थी, रख लो ना इसे काम पर, ग्यारह बरस का हो गया है यह, माँज लेगा चाय के गिलास, धो देगा जूठे बर्तन झाड़ू लगा देगा, मेज पर कपड़ा मार देगा। और भी छोटे -छोटे काम कर देगा, जो कहोगे कर लेगा। तीस रुपये रोज भी इसे दे दोगे तो चलेगा, एक किलो आटा आ जायेगा, इस ठंड में पूरे परिवार का पेट भर जायेगा। रख लो ना इसे, आपका भला होगा। एक उसके गोद में दूसरा ग्यारह बरस के बच्... »

आप आ जाते तो

गुनगुनी धूप है इस ठंड में थोड़ा सहारा, अन्यथा हम बर्फ बनकर ठोस हो जाते। इस गली में गुजरते आपने देखा हमारी झोपड़ी को अन्यथा हम गम भरे बेहोश हो जाते। इन दिनों मन जरा ढीला बना है दोस्तों आप आ जाते तो हम भी जोश पा जाते। इस तरह आपका भी मन न होता खूबसूरत तो हमें कविता न कहनी थी वरन खामोश हो जाते। ——- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय »

रोशनी तरफ की न खिंचते जा

मन मेरे! कीट सा पतंगे सा इस तरह से अंधेरी रातों में रोशनी तरफ की न खिंचते जा झूठ के हाथ यूँ न बिकते जा। ओ कलम! हाथ मेरे आकर अब न रुक वेदना को कहते जा जो कुछ हो पीड़ इस जमाने की उसको कागज में खूब लिखते जा। ओ कदम! डर न तू डराने से सत्य की राह पग बढ़ाने से विघ्न बाधाएं खूब आएं भले मुड़ न पीछे तू आगे बढ़ते जा। मन मेरे! रूठ जाए दुनिया ये सबके सब मुँह चुरा के चलते बनें तब भी विचलित न होना राही तू अपने कर्मो... »

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