Author: Satish Chandra Pandey

  • खिलखिलाए तो सही

    चलो तुम मुस्कुराए तो सही
    भले ही मान कर हमको लतीफा
    खिलखिलाए तो सही।
    जा रहे थे इस गली से
    देखने को आपने
    आंख के चंचल पलक
    कुछ हिलाए तो सही।

  • आहट

    इतना भिगो मत मुझको
    ओ बादल!
    दल-दल बन न डुबो दूँ,
    मुहब्बत।
    खाली-खाली लगूँ
    या हरी सी
    हरियाली को बिछा दूँ।
    चुप ही रहूँ या बता दूँ
    मुझे है,
    उनसे जरा सा चाहत।
    या होने दूँ
    उसकी कुछ आहट।

  • न जाओ

    आंखें चुरा कर जाओ भले ही,
    दिल न चुरा कर जाओ।
    बिखरे हुए हैं मोती नयन के,
    उनको जुड़ा कर जाओ।
    बाहर बरखा बरस रही है,
    अतर नदी सी पथ में पड़ी है
    रुकने दो बहने दो,
    तब तक बैठो आओ।
    यूँ ही न जाओ न जाओ।

  • चंदन दिया

    अश्क ने नैनों से बहकर
    होंठ पर संगम किया
    पत्थरों ने बिन कहे ही
    प्रेम का वर्णन किया।
    ताप बढ़ता ही गया जब
    कक्ष के भीतर हृदय के
    आपने मुस्कान देकर
    ताप में चंदन दिया।

  • कोयल का स्वर

    सब तरफ हरा-भरा है
    खूब रौनक सी सजी है,
    फूल-पत्ती की छठा,
    रोज बढ़ने में लगी है।
    है उसे भी आस सावन
    जल्द आयेगा,
    तृप्त करने प्यास हिय की
    नीर लायेगा।
    बीज से अंकुर उग
    बाहर झाँकने लगा है,
    कवि भी अपनी स्याही को
    आँकने लगा है,
    दूर किसी कोयल का स्वर
    लिखने को
    प्रेरित कर रहा है,
    सावन के आगमन का दृश्य
    अभी से मन को मोहित कर रहा है।

  • आम-खास

    खेल होता है
    कौन नहीं समझता है,
    आम को
    पीठ पीछे धोखा मिलता है,
    कौन नहीं समझता है।
    खास को बिना मांगे
    सब कुछ मिल जाता है,
    कौन नहीं समझता है।
    जिसकी बोलने की आदत हो
    वह मौन नहीं समझता है।
    आम की उपेक्षा
    खास को सब कुछ,
    यही है, यही है
    सच्चाई का सच।
    व्यय होता है आम के नाम पर
    जमा होता है
    खास के जेब पर,
    वो शांत होकर मान लेता है
    अपना भाग्य,
    विधाता के लेख पर।

  • अंधेरी रात है

    अंधेरी रात है
    नभ को ढका है बादलों ने,
    छुप गए हैं सितारे,
    तब उजालों को
    बुलाया है लबों ने।
    मुहब्बत को कहा है
    आपने जबसे मिठाई,
    हुई बेचैन यह रसना
    कर रही है ढिढाई।
    नजर भी रात में
    बस दूर का
    जलता उजाला देखती है।
    नजरअंदाज कर के दर्द को
    केवल हँसी ही देखती है।
    दूर का जलता हुआ
    दीपक बताता है,
    नजर मुझ पर न डालो
    पास का बिखरा अंधेरा देख लो,
    बरफ हो आग हो या
    दूसरों के वस्त्रों का दाग हो,
    नजरअंदाज कर लो
    हो सके शब्द गढ़ लो,
    राग दो।

  • मासूम थी वह

    दो माह पूर्व ही
    विवाह हुआ था उसका
    किसी की नाजों से पाली गई
    बिटिया थी वह,
    कितनी प्यारी गुड़िया थी वह।
    अचानक पता चला
    उसका निधन हो गया है।
    न बीमार थी,
    न कोई अन्य बात थी।
    लेकिन गले में निशान मिला
    लोग बोल रहे थे जिसके
    साथ सात फेरे लिए थे
    उसी ने सुला दिया,
    कभी न जगने वाली नींद में।
    आवाजें उठ रही हैं,
    दहेज हत्या बन्द हो,
    मासूम के कातिलों को
    सजा मिले।
    लेकिन वह तो चली गई,
    जिसकी शादी के लिए
    पिता ने खेत बेच दिया था,
    सारी मांग तो पूरी कर ही दी थी।
    फिर क्या रह गया था,
    जो बिटिया मिटा दिया,
    बेजान बना दिया।

  • कदमों की दिशा

    कदमों की दिशा
    तूने खुद ही बनानी पड़ेगी,
    लोग जायें उधर
    लोग जायें इधर,
    अपनी मंजिल तुझे
    खुद ही चुननी पड़ेगी।
    अपने सपनों की सीढ़ी
    बनानी पड़ेगी,
    और सपनों की डलिया भी
    बुननी पड़ेगी।
    साफ दिखने को चेहरा
    दिखावा भले
    उगती दाढ़ी तुझे ही
    बनानी पड़ेगी।
    मुश्किलें राह में
    जो भी आयें तेरे
    तूने हिम्मत से मुश्किल
    भगानी पड़ेगी,
    थक अगर पैर जायें
    तेरे राह में,
    तूने हिम्मत दुबारा
    जगानी पड़ेगी।
    सुख जायें पलक
    सूख जायें हलक
    दिल में पत्थर जमे,
    मन भी सूखा लगे
    तूने पानी की गाड़ी
    बुलानी पड़ेगी,
    सुध रहे ना रहे
    कोई कुछ भी कहे
    तूने थोड़ा पलक तो
    हिलानी पड़ेगी

  • ओ हवा

    ओ हवा!
    लू न बन, हवा ही रह,
    जरा सा ठंडक दे,
    जरा सा झौंका दे,
    हिला दे जुल्फों को,
    खोल दे लफ्जों को
    प्यार की बात कह दे,
    ऐसा कह दे जिससे
    कुछ दिन उनसे दूर रहने का
    गम, मेरा मन झेल ले।

  • अंधेरी रात है

    अंधेरी रात है
    नभ को ढका है बादलों ने,
    छुप गए हैं सितारे,
    तब उजालों को
    बुलाया है लबों ने।
    मुहब्बत को कहा है
    आपने जबसे मिठाई,
    हुई बेचैन यह रसना
    कर रही है ढिढाई।
    नजर भी रात में
    बस दूर का
    जलता उजाला देखती है।
    नजरअंदाज कर के दर्द को
    केवल हँसी ही देखती है।
    दूर का जलता हुआ
    दीपक बताता है,
    नजर मुझ पर न डालो
    पास का बिखरा अंधेरा देख लो,
    बरफ हो आग हो या
    दूसरों के वस्त्रों का दाग हो,
    नजरअंदाज कर लो
    हो सके शब्द गढ़ लो,
    राग दो।

  • प्रेम का दूसरा नाम हो तुम

    प्रेम का दूसरा नाम हो तुम
    क्या कहें मीठा
    रसीला आम हो तुम।
    सुबह-सुबह की
    मनोहर सी छठा हो कहूँ
    या किसी कीर्तन की
    शाम हो तुम।
    बढ़ा रही हो
    इस कदर अपनी,
    मुहब्बत की कहानी जैसे,
    बढ़ रहे तेल का दाम हो तुम।

  • पहला शब्द हो तुम

    माँ तुम
    जीवन में सब कुछ हो,
    प्राण हो, सांस हो,
    भूमि पर मेरी पकड़ हो,
    हृदय की धड़कन हो,
    उत्साह का मूल हो,
    संसार बदल गया
    लेकिन माँ तुम वही
    वैसी ही
    ममतामयी फूल हो।
    गुरु तुम
    ईश्वर तुम,
    करुणा तुम, अन्नपूर्णा तुम।
    बलिदान का प्रतीक तुम
    सम्मान का प्रतीक तुम।
    तोतली जुबान का
    पहला शब्द हो तुम,
    जीवन का सर्वोच्च
    शब्द हो तुम।
    तुम हो, तब हम हैं माँ
    जीवन का मूल हो तुम।

  • समय कठिन आये जब

    समय कठिन आये जब
    तब भी खोजो अवसर,
    हार मानो नहीं तुम
    करो संघर्ष डटकर।
    लहू को धमनियों में
    बहा दो खूब मथकर,
    जब तलक पा न जाओ
    कहीं बैठो न थककर।
    परीक्षा ले रहा है आपकी
    आज ईश्वर,
    हीन है भाग्य कह मन
    बैठ जाता है अक्सर ।
    मगर मत हीन बनना
    जरा उत्साह रखना,
    रखे उत्साह जो मन
    वही पाता है अक्सर।

  • कर्म है बीज

    कर्म है बीज
    जो भी करूँगा,
    वह उगेगा, खिलेगा
    मुझे कल,
    फल उसी के मुताबिक मिलेगा।
    धर्म है प्रेम,
    नफरत नहीं है,
    प्रेम की राह चलता रहूंगा,
    कल उसी के मुताबिक मिलेगा।

  • काम आते रहो दूसरों के

    काम आते रहो दूसरों के
    आपकी राह खुलती रहेगी,
    तुम भलाई करोगे, भलाई,
    आपके पास आती रहेगी।
    नीर बहता रहा है नदी में
    सैकड़ों जीव पीते रहे हैं,
    आदि युग से अभी तक निरन्तर
    स्रोत जल के उपजते रहे हैं।
    तप्त धरती में बारिश हुई,
    पेड़-पौधे उगे खिल गए सब
    भाप उड़ कर गई आसमां में
    मेघ फिर-फिर बरसते रहे हैं।
    जो करेगा मिलेगा उसी को
    जिस तरह का करेगा मिलेगा,
    खूब तपती हुई आग में,
    स्वर्ण जेवर निखरते रहे हैं।

  • आपकी चंचल चुनरिया

    आपकी चंचल चुनरिया को
    मैं भिगो दूँगा,
    मेघ का एक छोटा टुकड़ा बन
    सावन में झड़ी लगा दूँगा।
    बिछाने हर तरफ
    खुशी की हरियाली,
    अपने जीवन की
    हर एक घड़ी लगा दूँगा।

  • मिले हो आप

    मिले हो आप
    है यह नसीब हमारा,
    तख्तों-ताज का
    मालिक बना है,
    दिल गरीब हमारा।
    आया है आपके जब से
    दिल करीब हमारा,
    नहीं रहा है किसी मायने
    दिल गरीब हमारा।

  • प्रातः हो गई है

    आलस्य तुझे
    दूर जाना ही होगा,
    मुझे दायित्व अपना
    निभाना ही होगा।
    प्रातः हो गई है,
    बीत रजनी गई है,
    मुझे कब से वो चिड़िया
    जगाने में लगी है।
    रात भर की उमस तो
    हाथ-पैरों की ताकत
    गलाना चाहती थी,
    मगर आकर सुबह ने
    जरा सी शक्ति दे दी।
    चाय हाथों की उनकी
    दवा सी बन गयी है,
    जागने की ललक अब
    मन मेरे बन गई है।

  • भावना को लिया ढक

    गरम हवा है
    जल रहे हैं आज भीतर तक,
    देख लो छूकर अगर
    है कोई आपको शक।
    वसन से आज हमने
    भावना को लिया ढक,
    सोच कर खुद की हालत
    बढ़ गई दिल की धक-धक।
    गा रहे हैं ये कविता
    खुशी में और गम में,
    तू भी आकर ओ राही,
    स्वाद इसका जरा चख।

  • संभलना होगा तुझे

    जिन्दगी के बुरे दिन
    भूलने होंगे पथिक,
    भुला कर वे बुरे दिन
    पग बढ़ाने होंगे पथिक।
    अब नहीं होगा बुरा,
    अब भला ही मिलेगा
    सोच कर आज तूने
    पग बढ़ाने होंगे पथिक।
    हो गया हो गया जो,
    अंधेरी रात थी वो,
    जो न सोची कभी
    दर्द की बात थी वो।
    उजाला बुझ गया था,
    निर्दयी थी हवा वह,
    दर्द में दिल था डूबा
    खो गई थी दवा तब।
    अब संभलना होगा तुझे
    उजाला है जगाना,
    आज के बाद अपना
    दिल कभी मत रुलाना।
    पास है जो भी तेरे
    पकड़ चलता ही रह तू
    अब मुझे मत रुलाना
    भाग्य से कहता चल तू।

  • रोक ले ईश्वर

    रोक ले ओ ईश्वर !
    कहर बरपाते अपने बूंद बाणों को..
    रहम कर मानवता की उस चीख पर
    जो दोनों हाथ ऊपर कर..
    मदद को पुकार रही है.
    तू इतना निष्ठुर नहीं हो सकता..
    गलती मानवता का स्वभाव है
    तू उसे बनाया ही ऐसा है.
    तू इतना रौद्र रूप दिखायेगा
    तो मानवता के लिए कहाँ ठौर है
    अब चलने भी दे ….रेस्क्यू ओपरेशन
    रोक ले अपनी प्रकृति की विनाशलीला को
    रोक ले ओ ईश्वर !
    कहर बरपाते अपने बूंद बाणों को..

  • भाव बहने दे

    खुद पर किताब लिखने दे
    गलत-सही किया है
    आज तक जो,
    उसका हिसाब लिखने दे।
    बन्द आंखों से
    आज भीतर तक
    खुद का मिजाज
    पढ़ने दे।
    भीतरी कालिमा
    के बीच पड़ी
    चमकती मणि समान
    रूह है जो,
    उसके सच्चे से भाव
    पढ़ने दे।
    मेरे भीतर के
    भाव बहने दे,
    मुझको खुद से ही
    बात करने दे।

  • जीवन का सत्य है

    सत्य को समझने की
    नजर,
    जरूर मायने रखती है,
    रहस्य समझने वाली
    जिन्दा आत्मा
    अपने भीतर आयने रखती है।
    जो देख लेती कमियाँ
    अपनी देहजनित,
    त्याग देती हैं
    लोभ नेहजनित।
    खूब इकट्ठा करते जाना,
    फिर उसे खा न पाना,
    छोड़ कर ऐसे ही पोटली में
    धरती से चले जाना।
    भूख की स्थिति में
    खा न पाना,
    जब पेट साथ न दे तब
    खाने की अभिलाषा रखना,
    अभिलाषा का अभिलाषा ही
    रह जाना,
    अचानक अलविदा कह जाना,
    कल खाऊंगा की आस में
    कल का कभी न आ पाना,
    यही कथ्य है,
    जीवन का सत्य है।

  • यकीन मानिये

    जरा सा आप भी
    कीजिये मुहब्बत,
    यकीन मानिए,
    सुनकू पाओगे।
    जरा सा आप भी
    सच की राह पर चलिए,
    यकीन मानिये,
    सुकून पाओगे।
    जरा सा आप भी
    त्याग करना सीखिए,
    यकीन मानिए
    सुकून पाओगे।
    जरा आप भी
    दान-धरम कीजिये,
    यकीन मानिए
    सुकून पाओगे।
    जरा सा ठोस के
    साथ नरम होइये
    यकीन मानिए,
    सुकून पाओगे।

  • मुहब्बत नाम है मेरा

    मैं मुस्कुराती हूँ,
    गुनगुनाती हूँ,
    कभी उत्साह में उड़ती
    कभी गम के कुंए में डूबती,
    फिर
    गोता लगाकर लौट आती,
    उतरती डूबती सी
    डूबती फिर से उतरती डूबती सी,
    एक दिन दो दिन, महीने, वर्ष बीते,
    फिर भी
    आपको भूले भुलाए याद करती सी चली,
    उस ओर अपने पग बढाती सी चली,
    जिस ओर केवल आश है,
    झूठी दिलासा साथ है,
    जिस बिंदु को सच्चे समय ठुकरा दिया,
    वो बिंदु फिर मिलता नहीं
    यह आज के वेदों का सच है,
    झूठी दिलासा साथ है ,
    मुहब्बत नाम है मेरा,
    दिलासा काम है मेरा।
    ……………………………………..डॉ. सतीश पांडेय, चम्पावत।

  • पिता

    पिता एक ऐसा शब्द है
    जिसकी जितनी व्याख्या हो
    वह कम है,
    पिता जीवन का मूल है,
    हमारा जीवन उनके
    चरणों की धूल है,
    पिता के बिना अपने अस्तित्व की
    कल्पना करना सबसे बड़ी भूल है।
    कितना संघर्ष करते हैं पिता
    अपने बच्चों तक
    हर सुख पहुंचाने के लिए।
    खुद भूखे रहते हैं
    बच्चों तक अन्न रस पहुंचाने के लिए।
    खुद पसीने से लथपथ होने तक
    मेहनत करते हैं पिता,
    बच्चों के चेहरों पर
    मुस्कान लाने के लिए।
    हम भी नहीं भुला सकते
    पिताजी को
    फादर्स डे पर शत-शत नमन
    पिताजी को।

  • खूब बारिश हो रही है

    खूब बारिश हो रही है
    रात भर, दिन भर
    पहाड़ों में भूस्खलन
    हो रहा है,
    सड़कें टूट चुकी हैं,
    नदियां उफान पर हैं,
    खतरे के निशान पर हैं
    या उससे ऊपर हैं,
    हर जगह नमी है,
    जिन्दगी थमी है।
    मनुष्य क्या, जानवर
    पेड़-पौधे, पक्षी
    सभी सहमे हुए हैं,
    रोजगार ठप है,
    अब मौसम से खुलना कब है,
    इसी आशा में,
    संभले हुए हैं।

  • ईमान साथ रखना है

    लोगों की जुबान का डर
    नहीं रखना है,
    बल्कि ईश्वर की सत्ता का
    भान रखना है।
    लोग गलत देखकर
    गलत कहेंगे,
    लेकिन ईश्वर गलत देखकर
    माफ नहीं करेंगे।
    थोड़ा सा ताकत पाने पर
    गुमान नहीं करना है,
    ईमान साथ रखना है
    बेमान नहीं बनना है,
    निरंकुश नहीं बनना है
    ईश्वरीय सत्ता का
    अंकुश समझना है,
    उस सत्ता की नजर सर्वत्र है
    इसे सचमुच समझना है।

  • मेघा बरसे खूब

    भीग गई पूरी शैय्या
    मेघा बरसे खूब,
    अब मैं सोऊँ कहाँ, रहूँ कैसे।
    यह पगडंडी, घर है मेरा,
    नभ नीला ही, छत है मेरा।
    आज जिसे है मेघ ने घेरा।
    तड़-तड़ बरखा, तन में- मन में
    अब मैं रहूँ कहाँ कैसे।
    जो कुछ था सब
    भीग गया है,
    सिर पर डाले चदरिया
    तन धरती पर बैठ गया है।
    उठ कर जाऊँ कहाँ,
    नहीं है कोई ठिकाना यहां,
    अब मैं रहूँ तो कहाँ अब कैसे,
    खाऊँ कैसे बिना पैसे।

  • देश सोने की चिड़िया

    अपना अपना काम यदि
    कर लें सब ईमान से,
    देश सोने की चिड़िया
    होगा फिर ईमान से।

    पूरा नहीं जरा सा भी
    यदि दायित्व समझ लें सब
    देश सोने की चिड़िया,
    होगा फिर ईमान से।

    कथनी करनी में अंतर
    मिट जाये जब हम सब में,
    देश सोने की चिड़िया
    होगा फिर ईमान से।

  • बात कम हो काम अधिक

    बात कम हो काम अधिक
    तब तो है कुछ बात।
    ऐसा क्या प्रचार जो
    दिन को बोले रात।
    दिन को बोले रात
    रात को दिन कहता हो।
    तस्वीरों को खींच,
    दिखावा ही करता हो।
    कहे कलम दिखावा
    है सच्चाई पर घात,
    पहले कर लो काम
    फिर होगी बाकी बात।

  • दान-धरम में खर्च

    बिल्कुल देर न कीजिये,
    भले काम में आप।
    होता जायेगा भला,
    खुद का अपने आप।।
    गणना करते ही रहा,
    पूँजी की दिन-रात।
    उम्र बिता दी धन कमा,
    समझ न आई बात।।
    यहीं रह गया सब जमा
    जान न पाया राज।
    जाना है सबको भले
    जाये कल या आज।।
    थोड़ा सा हो जाय गर
    दान-धरम में खर्च,
    उत्तम है यह कार्य तुम
    करो कहीं भी सर्च।

  • साँझ इतनी मनोहर है

    साँझ इतनी मनोहर है
    गगन में सितारे हैं
    धरा में भी सितारे हैं,
    बड़े अद्भुत नजारे हैं,
    खड़ा हूँ पर्वत की चोटी में
    बने घर की छत पर,
    बह रही है हवा ठंडी,
    कभी है तेज फिर मंदी।
    कटा सा चाँद आया है
    मगर है चाँदनी सुन्दर,
    बहुत शीतल है बाहर पर
    भरा है ताप कुछ अन्दर।

  • आया मौसम मानसून का

    आया मौसम मानसून का
    बरसा है जल रात भर,
    लाया पानी कहाँ से इतना
    आसमान बादल में भर।
    सुबह-सुबह जल्दी उठ चिड़िया
    रोजगार की खोज में
    चूं-चूं करती दुबकी बैठी
    कुछ रुकने की आस में।
    चिड़िया सोच रही है मेरे
    पास अगर छाता होती
    उर की भूख मिटाने मैं भी
    दाना चुगने को जाती।
    भूखे बच्चे देख घोंसले में
    बैठूँ कैसे बैठूँ,
    लेकिन बाहर मानसून है
    जाऊँ तो कैसे जाऊँ।

  • मिटा दिया

    दो माह पूर्व ही
    विवाह हुआ था उसका
    किसी की नाजों से पाली गई
    बिटिया थी वह,
    कितनी प्यारी गुड़िया थी वह।
    अचानक पता चला
    उसका निधन हो गया है।
    न बीमार थी,
    न कोई अन्य बात थी।
    लेकिन गले में निशान मिला
    लोग बोल रहे थे जिसके
    साथ सात फेरे लिए थे
    उसी ने सुला दिया,
    कभी न जगने वाली नींद में।
    आवाजें उठ रही हैं,
    दहेज हत्या बन्द हो,
    मासूम के कातिलों को
    सजा मिले।
    लेकिन वह तो चली गई,
    जिसकी शादी के लिए
    पिता ने खेत बेच दिया था,
    सारी मांग तो पूरी कर ही दी थी।
    फिर क्या रह गया था,
    जो बिटिया मिटा दिया,
    बेजान बना दिया।

  • रौनक बढ़ा देते हो

    प्याज तुम
    आँसू निकाल देते हो
    फिर भी भाते हो
    क्योंकि
    स्वाद बढ़ा देते हो।
    प्रेम तुम खुशियां
    भी देते हो,
    आँसू भी देते हो,
    लेकिन जिन्दगी की
    रौनक बढ़ा देते हो।
    प्याज की कई
    परतों की तरह,
    जज्बात छिपाए रखते हो
    भीतरी परत तक का
    साथ निभा देते हो।

  • भाव लिखने हैं

    फूल बोने हैं
    भले कांटे उगें बागों में,
    जोड़ दें रिश्ते सभी
    नेह के धागों में।
    भाव लिखने हैं
    भले बेसुरे ही क्यों न हों,
    जिसको भायेंगे वही
    बांध लेगा रागों में।
    खोजने हैं जो
    कहीं खो गए हैं बागों में
    खोजने जायेंगे तो
    खोज लेंगे लाखों में।

  • निपटना होगा तुझे

    निपटना होगा
    विपरीत धारा से,
    तैरना होगा
    पार पाने तुझे।
    घुमाना चाहेगा,
    भंवर जब भी तुझे
    समझ तत्काल तूने
    खुद को संभालना होगा।
    कष्ट सबकी
    परीक्षा लेता है,
    जो डरा वो
    हार जाता है।
    निडर होकर किया
    संघर्ष जिसने
    वही बस पार जाता है।

  • सत्य क्या था

    बीतता जा रहा है निरन्तर
    वक्त रुकता कहाँ है किसी को
    दिन उगा, दोपहर- रात फिर
    चक्र है यह घुमाता सभी को।
    चक्र चलता रहा है अभी तक
    पौध उगती रही और मिटती रही
    आने जाने की निर्मम कथा
    कुदरत भी लिखती रही।
    सोचता रह गया एक मानव
    लक्ष्य क्या था मेरी जिंदगी का
    क्यों उगा, क्यों मिटा, क्यों खपा
    सत्य क्या था मेरी जिंदगी का।

  • आओ दो बोल सुना जाओ ना

    आओ दो बोल
    सुना जाओ ना,
    गीत के बोल
    सुना जाओ ना।
    हो गए दिन बहुत
    सुना ही नहीं,
    अपने उदगार
    सुना जाओ ना।
    सूनी सूनी सी फिजायें हैं अब
    सारी मुरझाई दिशाएं हैं अब,
    वो घनी रात थी वो बीत गई
    वो कड़ी धूप थी जो बीत गई,
    अब तो बारिश जरा सा होने लगी,
    आपके बिन हँसी भी रोने लगी,
    थाम लो आप अब कलेजे को
    आओ दो बोल सुना जाओ ना
    अपने उदगार सुना जाओ ना।

  • पुलकित हुआ तन

    मनोहर शाम है
    छितरे हुए हैं व्योम में घन
    टपकती बूँद के अहसास से
    पुलकित हुआ तन।
    लग रहे हैं बहुत खुश पेड़-पौधे
    उग रहे हैं अनेकों बीज
    दे रहा भानु उनको ताप
    गगन भी दे रहा है सींच।

  • सुकून

    सुकून!!
    तू मेरे पास कब होता है,
    तुझे ही मालूम है,
    या मुझे ही पता है,
    यही तो तेरी अदा है,
    जब मैं कर्तव्य पथ पर
    रमा होता हूँ,
    तब तू मेरे पास होता है।
    निःसहाय की मदद के समय
    परोपकार की भावना के समय
    सच्चाई की चाह के समय
    सुकून तू मेरे पास होता है।
    दायित्व निभाते समय,
    गिर पड़े को उठाते समय
    रूठे को मनाते समय
    स्नेह में नहाते समय
    सुकून तू मेरे पास होता है।
    मेहनत की कमाई के समय
    थोड़ा सा भलाई के समय
    सुकून तू मेरे पास होता है।

  • महसूस कर लेना

    एक रास्ता है जो
    आपसे मिलाता है,
    है कठिन मगर वो ही
    आस को जगाता है।
    मन से मांगकर पाँखें
    तन में घौंप दी जायें
    उड़ चलूँ मिलूँ आकर
    ये उमड़ पड़ी चाहें।
    या मन ही भेज दूँ
    बस पहचान लेना
    भेजे हुए सिंगनल
    महसूस कर लेना।
    मन न भी भेज सको तो
    कुछ तो करना
    प्रत्युत्तर की तरंगें
    भेज देना।

  • भीतर पड़ा है सूखा

    बारिश बहुत है बाहर
    भीतर पड़ा है सूखा,
    खाता हूँ खूब चींजें
    फिर भी रहा हूँ भूखा।
    मन में उमड़ के बादल
    नैनों में खूब बरसा,
    चाहत हुई थी शायद
    ऐसा हुआ है शक सा।

  • कोशिश है भाव पढ़ लूँ

    नजरें टिकी हैं तुम पर
    कोशिश है भाव पढ़ लूँ
    पाने को पार मन का
    पत्थर की नाव गढ़ लूँ।
    उतरे या डूब जाये
    कोशिश कभी न छोडूँ
    तुम छोड़ना भी चाहो
    मन से कभी न छोड़ूँ।
    ऐसे ही सब समझ लूँ
    कहना जो चाहते हो,
    वह भी मैं भांप लूँ जो
    कहना न चाहते हो।

  • मजबूत कर लो हृदय

    आँसू को पोंछ लेना
    खुद को संभाल लेना,
    मजबूत करना मन को
    खुद को संभाल लेना।
    कमजोर पड़ यूँ कैसे
    जीवन चलेगा आगे,
    आशा हो पूरे घर की
    दायित्व भी हैं आगे।
    ईश्वर की जो है मर्जी
    वह ही हुआ है अब तक,
    वश में नहीं है मन के
    रोओगे ऐसे कब तक।
    सब छिन गया लुटा है
    लेकिन करें भी क्या अब
    रख लो ख्याल खुद का
    हृदय संभाल लो अब।
    मजबूत कर लो हृदय
    फिर से खड़े उठो अब
    कुछ याद में जियो कुछ
    आगे को देख लो अब।
    वह रात थी दुखों की
    उसको भुलाना होगा,
    गर भूल भी न पाओ,
    थोड़ा भुलाना होगा।
    कवि और क्या कहे अब
    कविता ही एक मरहम,
    कोशिश करेगी कविता
    दुःख थोड़ा कम हो मन का।

  • विडम्बना

    जिम्मेदारों!!
    यूँ उलझ कर आप आपस में
    भुला देते हो जनहित को।
    बिता देते हो ऐसे ही समय।
    खींचातानी गजब की है
    आपकी जो भूल कर
    आम जीवन के दर्दों को
    अलग मुद्दे उठाते हो
    हँसाने की जगह
    केवल रुलाते हो।
    अहिंसा सत्य की बातें
    समभाव की बातें
    किनारे फेंक देते हो
    भिड़े लड़े आपस में समाज
    ऐसा यत्न करते हो।

  • फर्ज अपना निभाते चल

    फर्ज अपना
    निभाते चल ओ राही,
    बोल उत्साह के
    सुनाते चल ओ राही।
    दुःखी के पोछ आँसू
    जरा सा दे सहारा,
    गमों को दूसरों के
    मिटाते चल ओ राही।
    हर तरफ दुख ही दुख है
    बड़ी विपदा खड़ी है,
    कई घर लुट गए हैं,
    घड़ी संकट भरी है,
    नहीं अब टूटना है,
    तुझे तो जूझना है,
    थके हारे को हिम्मत
    दिलाते चल ओ राही।
    समझ पाया नहीं है
    अगर कोई अभी तक,
    उसे सारी हकीकत
    बताते चल ओ राही।
    जरा सा सावधानी
    सभी रख लें समझ लें
    जीत पायेंगे पक्का
    बताते चल ओ राही।
    —– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय।

  • सोच समझ इंसान

    हवा हवा में उड़ नहीं, सोच समझ इंसान,
    हवा बिना ये फेफड़े, नहीं करेंगे काम।
    नहीं करेंगे काम, जिन्दगी उड़ जायेगी,
    बिना सजग रहे सब, धूल में मिल जायेगी।
    कहे लेखनी काम कर रही आज एक दवा,
    मुँह में मास्क लगा, छान छान कर ले हवा।

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