बाल कविताएँ

मां के साथ ये कौन है

हास्य कविता बिट्टू घूम रहा था गुमसुम, हाथ में लेकर एक फोटो मां ना जाए छोड़कर कहीं, इस उलझन में था वो नाना जी को फोन लगाया, अपने मन का हाल बताया नाना -नानी अचरज में आए, बेटी को फिर फोन लगाए “बिट्टू ये क्या बोल रहा है” किस फ़ोटो को ले डोल रहा है फ़ोटो देख के मां मुसकाई, सारी बात समझ में आई मां-पापा की शादी की फ़ोटो लेकर, बिट्टू गुमसुम घूम रहा है पापा को पहचान ना पाया, क्योंकि बाल उड़े और... »

हम स्कूल चलेंगे

शीर्षक:- ‘हम स्कूल चलेंगे’ हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेँगे, सीखेंगे अच्छी बातें और पायेंगे ज्ञान, पढ़ लिखकर हम बनेंगे अच्छे और महान, हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे। प्रार्थना सभा में मिल गाएंगे राष्ट्रीय गान, सबको बतायेंगे कि है मेरा भारत देश महान, हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे। पढ़ेंगे हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत और विज्ञान, पायेंगे गुरूजन से गणित का सारा ज्ञान, हाँ,... »

शिक्षक

बचपन से ही शिक्षक के हाथों में झूला-झूला करते हैं, ज्ञान का पहला अक्षर हम बच्चे माँ से ही सीखा करते हैं, प्रथम चरण में मात-पिता के चरणों को चूमा करते हैं, दूजे पल हम पढ़ने- लिखने का वादा शिक्षक को करते हैं, विद्यालय के आँगन में शिक्षक हमसे जो अनुभव साझा करते हैं, उतर समाज सागर में हम बच्चे फिर कदमों को साधा करते हैं, एक छोटी सी चींटी से भी शिक्षक हमको धैर्य सिखाया करते हैं, सही मार्ग हम बच्चों को अ... »

ज्ञान

जिसको जैसे समझ आये समझाना पड़ता है, एक शिक्षक को बड़ा दिमाग लगाना पड़ता है, बहुत शरारत करते हैं जब, बच्चे मन के सच्चे हैं जब, गुरु ज्ञान की महिमा को फिर सबको दिखलाना पड़ता है।। राही (अंजाना) »

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

क्यो कुचलते हो परतीभा के परतीभाओ को, चंद पैसो के लिए तुम्हारे घर खुशी जाती पैसो की,, यहाँ परतीभा वाले बच्चे की लाशे मिलते नदी या रेल किनारे मे,, क्यो कुचलते हो चंद पैसो के लिए,, JP singh »

अगर मै कुड़ा कागज होता,

अगर मै कुड़ा कागज होता,

अगर मै कुड़ा-कागज होता , तो मेरा कोई ना सुबह होता ना शाम होता, ना घर होता ना परिवार होता, शिर्फ मेरे साथ रास्ते का धुल होता,,,,, अगर मै कुड़ा–कागज होता, कभी पढ़ने का काम आ जाता कभी बच्चे के खेलने मे काम आ जाता ,, अगर मेरी अस्तीत इंसान के बीच खत्म भी हो जाती ,, तो मै किसी काबारी को भी काम आता!! ,अगर मै कुड़ा -कागज होता_, ना मेरी कभी अंत होती !! मुझे फिर से नया बनाया जाता कभी अफसरो के बीच कभी ... »

गिल्ली

गिल्ली डंडे के खेल पुराने हो गए, कंचे के काँच दिखे जमाने हो गए, भरे रहता था आसमाँ जिन पतँगों से कभी, अब ज़मी पर बच्चे भी निराले हो गए।। राही (अंजाना) »

काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती

✍✍✍काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती , शिर्फ एक इंसायनित की नाम होती,, तो दिल्ली मै बैठे गद्देदार की रोटी नही सिझती। रामायण और कुरान मे भेद बताकर अपनी रोटी सेकते है गद्देदार ,, अगर बच्चे प्रर्थाना करते तु ही राम है,तु रहीम है, तु करीम —– तो सौ वर्षो से हो रही गाथा मे भेद बताकर मुल्क को बाटँते हो गद्देदार, अब बस करो अपनी रोटी सेकना गदे्दार मेरे बच्चे के हाथ मे फुल के बदले हथियार दे... »

बचपन

बारिश के मौसम में कागज़ की कश्ती डूबने का इंतज़ार ही करती रह गयी। और ये बच्चे उड़ने के सपने लिए उस कागज़ को पढ़ते ही रह गए। »

पापा

अगर देती जन्म “‘” माँ”” चलना; सभलना सिखाते है पापा। . …………. जितना भी बच्चे फरमाइस करते; पुरा करते है पापा। अपना सारा अरमान कुचलकर; बच्चे के अरमान को पूरा करते पापा।। अपने बदन पर कपड़ा भले ना हो;_ . बच्चे के बदन पर कपड़ा पुरा करते पापा — अपने आज तक बंद आसमान मे सोए नही …………….. बच्चे के घर पंखा लगाते पापा।। घर ... »

जोकर

पहने सर पर नीली टोपी उछलता -कूदता आता है कभी इधर तो कभी उधर नाचता और नचाता है। भर अपने थैले में टॉफी बिस्कुट सबको लाता है हाथ मिलाकर बच्चों से एक जादू की झप्पी लेता है। रोते बच्चे को झट से अपनी बातों में वो लेता है मुँह फुला कर तोंद दिखाकर खुशियाँ उसको देता है। बच्चों के संग मिलजुल कर वो खेलता और खिलाता है चंद पैसो के खातिर वो ये सब कुछ हँस कर करता है हज़ारों गमों के समुन्दर को वो ज़ाहिर कभी न करता ... »

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे, भला किस तरह ये बच्चे सर झुकाते होंगे, उम्मीदों के जुगनू ही बस मंडराते होंगे, बड़ी मशक्कत से कहीं ये पेट भर पाते होंगे, तन पर चन्द कपड़े ही बस उतराते होंगे, शायद सोंच समझ कर ही ये मुस्काते होंगे, बहुत संग दिल होकर ही वो इतराते होंगे, हालत देख कर भी जो न प्रेम भाव दिखलाते होंगे।। राही (अंजाना) »

मजबूर बच्चे

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे, भला किस तरह ये बच्चे सर झुकाते होंगे, उम्मीदों के जुगनू ही बस मंडराते होंगे, बड़ी मशक्कत से कहीं ये पेट भर पाते होंगे, तन पर चन्द कपड़े ही बस उतराते होंगे, शायद सोंच समझ कर ही ये मुस्काते होंगे, बहुत संग दिल होकर ही वो इतराते होंगे, हालत देख कर भी जो न प्रेम भाव दिखलाते होंगे।। राही (अंजाना) »

खिलौने वाला

हाथ में लेकर सीटी आता साइकिल पर होकर सवार एक डंडे पर ढेर से खिलौने जिसमे रहते उसके पास गली गली और सड़क सड़क बच्चों की खुशियाँ लाता है देख के बच्चे शोर मचाते खिलौने वाला आया है देख कर चिंटू मिंटू से कहता धनुष बाण तो अब मैं लूँगा तब मिंटू चिंटू से कहता हनुमन गदा को मै ही लूँगा इतने में आती है भोली देख के बर्तन करती ठिठोली कहती बर्तन मैं भी लूंगी लूँगी साथ में गुड़िया चूड़ी सोहन मोहन दौड़े आते कहते हम भी ... »

खिलौने वाला

हाथ में लेकर सीटी आता साइकिल पर होकर सवार एक डंडे पर ढेर से खिलौने जिसमे रहते उसके पास गली- गली और सड़क- सड़क बच्चों की खुशियाँ लाता है देख के बच्चे खुश शोर मचाते खिलौने वाला आया है। देख कर चिंटू ,मिंटू से कहता धनुष बाण तो अब मैं लूँगा तब मिंटू ,चिंटू से कहता हनुमन गदा को मै ही लूँगा। इतने में आती है भोली देख के बर्तन करती ठिठोली कहती बर्तन मैं भी लूंगी लूँगी साथ में गुड़िया चूड़ी। सोहन – मोहन द... »

गुब्बारे

देख गुब्बारे वाले को जब बच्चे ने आवाज़ लगाई दिला दो एक गुब्बारा मुझको माँ से अपनी इच्छा जताई। देखो न माँ कितने प्यारे धूप में लगते चमकते सितारे लाल, गुलाबी, नीले ,पीले मन को मेरे भाते गुब्बारे। देख उत्सुक्ता माँ तब बोली बच्चे माँ मन रखने को भैया दे दो इसको गुब्बारा पैसे ले लो मुझसे तुम। »

ममता

एक युवती जब माँ बनती है, ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है, ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके, बच्चे के रंग में ढलते हैं, दिल के तारों से हो झंकृत, लोरी की हीं गूंज निकलती, माँ अल्फाज़ में जैसे हो, दुनियां उसकी सिमटती चलती , फिर क्या, नयनों में झिलमील सपने, आँचल में अमृत ले चलती , पग -पग कांटे चुनती रहती, राहों की सारी बाधाएं, दुआओं से हरती चलती, हो ममता के वशीभूत बहुत, वो जननी बन जीवन जनती है, एक यु... »

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ पानी में बहाते नज़र आते थे, एक रोज़ मिले थे वो बच्चे जो अपने सपने बड़े बताते थे, बन्द चार दीवारों से निकलकर खुले आसमान की ठण्डी छावँ में, इतने सरल सजग जो अक्सर खुली किताब से पढ़े जाते थे।। राही (अंजाना) »

सवाल पूछा

संस्कार में दबे बच्चे से घूरते हुए अध्यापक ने सवाल पूछा, बेटा ये बताओ हम कौन? बच्चा मुस्कुराते बोला, अध्यापक जी आप गुरु हम शिष्य यानी गुरु धाम में हम पढ़ रहे आप पढ़ा रहे ‘हम कौन? हम कौन?’ अशोक बाबू माहौर »

तब आना तुम

तब आना तुम, जब हिना का रंग कई दफा चढ कर उतर जाए। जब अपने बच्चे की खातिर अबला वात्सल्य प्रेम में बिखर जाए तब आना तुम, जब मेरे जुनून जर्जर हो जाए और मेरे पास बहुत कुछ हो, दिखलाने को, बतलाने को, समझाने को, तब आना तुम जब हमारे बीच की खामोशी को इक उम्र हो जाए, और ये सफेद इश्क़ भी अपने इम्तिहान से शर्मसार हो जाए। तब आना तुम। जब आना तुम, आकर लिपट जाना जैसे चंद लम्हे पहले ही मिले हो। हवा के रूख की परवाह क... »

जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)

वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहीं भारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये माता बहन बेटियों के, इज्ज़त धन सम्मान लुटे बिक गये धरम लुट गये करम, सब ओर गुलामी बू छायी प्राचीन सभ्यता संस्कृति गौरव, भूल गये हम सच्चाई ब्राह्मण कहता हम सर्वशेष्ट, छत्रिय कहता हम शासक है बनिया कहता हम धन कुबेर, हरिजन अछूत बस सेवक है मंदिर मस्जिद स्कूल सभी, जाना हरिजन... »

हैरानी सारी हमें ही होनी थी – बृजमोहन स्वामी की घातक कविता।

हैरानी कुछ यूँ हुई कि उन्होंने हमें सर खुजाने का वक़्त भी नही दिया, जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नही देखा गया, लब पर जलती हुई सारी बात हमने फूँक दी सिवाय इस सिद्धांत के कि हमने सपनों की तरह आदमी देखे, जबकि ‘सपने’ किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो सारे अल्ट्रासाउंड घड़ियों की तरह बिकते और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते, मेहँदी की तरह लांछन लगाते, सिगरेटों की तरह घर फूंकते, कुत्तों की तरह ... »

उम्र की पतंगें !

कविता   उम्र की पतंगें : अनुपम त्रिपाठी   वे, बच्चे ! बड़े उल्हास से चहकते—मचलते; पतंग उड़ाते …………. अचानक थम गए !!   उदास मन लिए लौट चले घर को ———— पतंग छूट जाने से ———— डोर टू…ट जाने से   क्या, वे जान सकेंगे ? कभी कि; ———— हम भी बिखेरा करते थे, मुसकानें यूं ही : चढ़ती उम्र के; बे—पनाह जोश में .   मग... »

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के, दो रोटी के वास्ते, ईटे -पत्थर  तलाशते, तन उघरा मन  बिखरा है, बचपन  अपना   उजड़ा है, खेल-खिलौने हैं हमसे दूर, भोला-भाला  बचपन अपना, मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे, लगते बहुत लुभावने , पर बच्चे हम फूटपाथ के, ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते, मन हमारा मानव का है, पर पशुओं सा हम उसे पालते, कूड़ा-करकट के बीच, कोई मीठी गोली तलाशते, सर्दी-गर्मी और बरसात, करते हम पर... »

बचपन गरीब

यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से, पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से, रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में, वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे, बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से, पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥ राही (अंजाना) »

भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती।

भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती। माँ के पास कहानियों के सिवा कुछ न था। @@@@RK@@@@ »

बाल श्रमिक

मंदिर में पानी भरती वह बच्ची चूल्हे चौके में छुकती छुटकी भट्टी में रोटी सा तपता रामू ढावे पर चाय-चाय की आवाज लगाता गुमशुदा श्यामू रिक्से पर बेबसी का बोझ ढोता चवन्नी फैक्ट्रीयों की खड़खड़ में पिसता अठन्नी सड़कों,स्टेशनों,बसस्टॉपों पर भीख माँगते बच्चे भूखे अधनंगे कचरे में धूँढते नन्हे हाथ किस्मत के टुकड़े खो गया कमाई में पत्थर घिसने वाला छोटे किसी तिराहे चौराहे पर बनाता सिलता सबके टूटे चप्पल जूते। दीवार... »

माँ

अहसास प्यार का माँ के, माँ की यादें, माँ का साथ। गज़ब सुकूँ मिलता है, जब माँ सर पर फेरे हाथ॥ माँ के हाँथ की थपकी, माँ का प्यार, वो माँ की ममता। बच्चे को भोजन देकर भूखे सोने की क्षमता॥ माँ ही सृष्टि रचयिता, शिशु की माँ ही रचनाकार है। प्रेम, भक्ति और ज्ञान सभी से बढ़कर माँ का प्यार है॥ बिन माँ सृष्टि अकल्पित नामुमकिन इसका चल पाना है। शब्दों में नामुमकिन माँ को अभिव्यक्ति दे पाना है। ________________ श... »

किताब ज़ार ज़ार रोई

किताबे भी दर्द मे रोती हैं सिसकती हैं ,लहू लहान तेरे दर्द में होती हैं ************ वो चंद घंटे पहले शहर में उतरा ,शहर की कुछ गलियो मे घूमा सड़को को देखा ,जन्नत घूमा,रंग बिरंगे फूल खुशियाँ ही खुशियाँ अचानक मोड़ पर मुड़ते ही टूटे सपनो की बस्ती, पेट की आग रोटी का तमाशा सकंरी गलियाँ, धूप की आग में लिपटा मन,टिन टपड़ की छत और छत के अन्दर बिखरे वजूद,कच्चा फर्श कॉच की बोतल,रेंगता दिल,दो बटन के बीच से झाक... »

मैं बच्चा बन जाता हूँ

मैं बच्चा बन जाता हूँ

कविता … “मैं बच्चा बन जाता हूँ” न बली किसी की चढ़ाता हूँ। न कुर्बानी से हाथ रंगाता हूँ।  रोने की जब दौड़ लगती है, मैं गिद्धों पर आंसू बहाता हूँ। न मैं मंदिर में जाता हूँ। न मस्जिद से टकराता हूँ।  ईश्वर मिलने की चाहत में,  मैं विद्यालय पहुँच जाता हूँ। छोटे-छोटे कृष्ण, सुदामा, पैगम्बर, बुद्ध मिल जाते हैं। हमसे तो बच्चे ही अच्छे, जो एक ही थाली में खाते हैं। जाति, धर्म का ज्ञान नहीं बच्चे मन के सच... »

जब हम बच्चे थे

जब हम बच्चे थे

जब हम बच्चे थे , चाहत थी की बड़े हो जायें | अब लगता है , कि बच्चे ही अच्छे थे || अब न तो हममें कोई सच्चाई है , न ही सराफ़त , पर बचपन मे हम कितने सच्चे थे | जब हम बच्चे थे || अब न तो गर्मी कि छुट्टी है , न ही मामा के घर जाना , माँ का आँचल भी छूट चुका है , पापा से नाता टूट चुका है , पहले सारे रिस्ते कितने सच्चे थे | जब हम बच्चे थे|| न तो कोई चिंता थी , बीबी बच्चे और पेट की, न ही कोई कर्ज़, बैंक ,एलआईसी... »

दरके आइनों को

दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है फासले वस्ल के यू सायें से बढ़े जाते है ये कोई मिलना या तुम्हारी रुखसत है हरसूँ बिखर गए तेरे पन्नें नसीब के अब तो खाली जिल्द की हसरत है वक़्त रूठा किसी बच्चे की माफिक जिसकी जिद है या कोई शरारत है अब किस और जहान जाएँ’अरमान’ जिस तरफ देखिये बस नफरत है दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है राजेश̵... »

” बच्चे और सपने “

सपनों में बच्चे देखना सुखद हो सकता है ; लेकिन ; बच्चों में सपने देखना आपकी भूल है जैसे; सपने…… सिर्फ़ सपने बच्चे : साकार नहीं करते वैसे ही; बच्चों में सपने साकार करना फिजूल है. हाँ ! आप ऐसा करिए; बच्चों में सपने रोपिए शिक्षा और संस्कार कदापि न थोपिए . आपके सपने ————— चाहे जितने रंगीन हों आपकी विफलता की कहानी हैं बच्चों की उडान उनकी सफलता की निशानी हैं. आप ... »

“वे”

आकाश से आती हैं जेसे ठंडी ठंडी ओस की बुंदे। नन्हे नन्हे बच्चे आते हैं आँखे मूंदे।। इन बूंदों को सँभालने वाली वो कोमल से पत्तियां। बन जाती है नजाने क्यों जीवन की आपत्तियां।। गोद में जिनकी किया इस जीवन का आगाज़ । लगती है नजाने क्यों कर्कश उनकी आवाज़।। दुःख हमारे उनके आंसू,ख़ुशी हमारी उनके चेहरे की मुस्कान। करते नही नजाने क्यों उनका ही सम्मान।। हमें खिलाया फिर खाया हमे सुलाकर सोय थे। खुद की उन्हें फिकर ... »

माँ

आँखे तुझ पर थम गई जब तुझको बहते देखा। सोच तुझमे रम गई जब तुझको सेहते देखा ।। अपनी कलकल लहरों से तूने प्रकृति को संवरा है। सबको शरण में लेती माँ तू तेरा ह्रदय किनारा है।। हमे तू नजाने कितनी अनमोल चीज़े देती है । और बदले में हमसे कूड़ा करकट लेती है।। खुद बच्चे बन गए,तुझको माँ कह दिया। तूने भी बिन कुछ कहे हर दर्द को सेह लिया ।। तेरे जल में कितने जलचर जलमग्न ही रहते है। और कर्मकाण्ड के हथियारो से जल में... »

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर…. गमछे रखकर के अपने कन्धों पर बच्चे निकले हैं अपने धन्धों पर। हर जगह पैसे की खातिर है गिरें क्या तरस खाएं ऐसे अन्धों पर। सारा दिन नेतागिरी खूब करी और घर चलता रहा चन्दों पर। अपना ईमान तक उतार आये शर्म आती है ऐसे नंगों पर। जितने अच्छे थे वो बुरे निकले कैसे उंगली उठाएं गन्दों पर। जिन्दगी कटती रही, छिलती रही अपनी मजबूरियों के रन्दों पर। ……..सतीश कसेरा »

बचपन

ठिठुरता बचपन (October 17: Anti Poverty Day)

October 17: Anti Poverty Day सर्दी में नंगे पांव कूड़ा बटोरते बच्चे ठिठुरता बचपन उनका सिकुडी हुई नन्ही काया टाट के थैले की तरह   उनके रूदन का क्या जिक्र करू मैं लफ़्जों के कुछ दायरे होते है नहीं फैल सकते वह उनके रूदन की तरह »