कोई मेरी व्यथा क्यों समझता नहीं,
मैं भी प्यासा हूं,मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।
बढ़ रही उमस इतनी,और धूप कितनी तेज है,
पानी के लिए मैं तरसता,इसका मुझको खेद है,
सब जानते हैं बिन पानी जीवित कोई बचता नहीं,
मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी क्यूं रखता नहीं,
पानी व्यर्थ बहाते सब मेरे लिए पानी नहीं,
सदियों से चला आ रहा,यह कोई नई कहानी नहीं,
उड़ता रहता हूं गगन में ,पर पानी मुझे दिखता नहीं,
मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी क्यों रखता नहीं।
मैं कोई और नहीं मैं हूं चिड़िया पक्षी खग हूं,
जब तक सांसे मेरी तब तक मैं हूं,
मैं भी तो इस जग का हिस्सा,
मानवता के नाते क्या आप से कोई रिश्ता नहीं,
मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।
दिन भर उड़ता फिरता मै रहता हूं,
कभी इस डाल पर कभी उस डाल विचरण करता हूं,
थक हार जब आप की छतों पर आता,
थोड़ा सा पानी चाहिए, चाहिए पूरा मटका नहीं,
मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।
आप सब से मेरा विनम्र निवेदन,
मेरा आग्रह पहुंचाओ जन- जन,
अपनी-अपनी छतों पर मेरे लिए पानी रखो,
जिसकी मुझे आवश्यकता बड़ी,
पानी मिलेगा मुझे भी प्यास मेरी भी मिटेगी,और तृप्त हो जाऊंगा वहीं,
मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।
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संपादक की पसंद
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आखिर मैं भी तो जग का हिस्सा हूं
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ये धुंआ धुंआ सा
ये धुंआ धुंआ सा जल रहा है क्या?
कहीं कोई हो रहा बेखबर सा क्या?सब में प्रभु पहचान
कितना भ्रम है लोगों को
सब उसे देख जलते है
उसे आगे बढ़ते हुए देख
उसकी ही शिकायत करते हैं
इतना समय अब भी शायद
उसके पास नहीं है क्या?ये धुंआ धुंआ सा जल रहा है क्या?
कहीं कोई हो रहा बेखबर सा क्या?निंदकों को सदा रखें पास
बात अब झूठ ही लगती है
तारीफ की आदत सी पड़ी है
बड़ाई ही सुन बड़प्पन भूले हैं
सच के कांटे शूल से चुभे हैं
बड़ाई इक बीमारी नहीं तो क्या— -
कितने याद आते हैं- दोस्त
बचपन से ही न जाने कितने दोस्त बनाये
हंसी ख़ुशी उनके संग ज़िंदगी के पल ये विताये
जगह बदल जाने पर वे कितने याद आते हैं
मायुशियों के पल उनकी यादों से खाश होते हैं
नयी जगह में नए दोस्त ज़िंदगी में आते हैं
इस तरह पुराने दोस्तों को हम भूल जाते हैं
कुछ खाश जिनसे जुड़ जाता है आत्मिक रिश्ता
दिल के कोने में जो जगह पा लेते हैं गहरा
तनाव ज़िंदगी की जो अपने साथ से हर ले
मझदार डूबते को जो किनारे पर कर दे
बीते पलों के साथ वो और याद आते हैं
अच्छाई किसी की कहाँ कोई भी कभी भूल पाते हैं -
यह जीवन जीना जग में साथी..
यह जीवन जीना जग में साथी,
नहीं है सहज सरल।
ज़ालिम यह दुनियाँ है,
पीना पड़ता है गरल।
कोई-कोई ही इस दुनियाँ में,
हॅंसकर साथ निभाता है।
आगे को जाते देख अक्सर,
यह जमाना जल जाता है।
जो साथ निभाते हैं,
वही सच्चे साथी कहलाते हैं।
निकलती है उनके लिए,
सदैव दिल से दुआएँ।
दूर से नमस्ते उनको,
जो आकर दिल दुखाऍं।
पानी के बुलबुले सी,
छोटी सी है ज़िन्दगी
क्यों बैर भाव रखें किसी से,
कर लें प्रभु की बन्दगी॥
_____✍गीता -
कुदरत की छवि
थोड़ा निहारने दो
कुदरत की छवि मुझे तुम
तुम भी निहार लो ना
इस वक्त भूलो सब गम।
सूरज निकल रहा है
सब ओर लालिमा है,
कलरव में उडगनों के
प्यारी सी मधुरिमा है।
चारों तरफ है शुचिता
सब साफ दिख रहा है,
ठंडी पवन का झौंका
नवगीत लिख रहा है।
मज्जन किये से पर्वत
उन रजकणों से ऐसे
चमके हुए हैं देखो,
मोती भरा हो जैसे।
फूलों ने रात भर में
भर कर शहद स्वयं में
भँवरे बुलाने जैसे
संदेश भेजा वन में।
भेजी सुंगध वन में
भेजी उमंग मन में
शोभा सुबह की ऐसे
उल्लास लाई मन में। -
कविता ऐसी कहो कलम
कविता ऐसी कहो कलम,
प्रफुल्लित हो उठे मन।
दुखी ह्रदय में खुशियों के फूल खिलें,
बिछुड़ों के हृदय मिलें।
कभी प्रकृति का हो वर्णन,
कविता ऐसी कहो कलम।
देखें उषा की लाली को,
सुबह की पवन मतवाली को।
आलस्य त्याग उठ जाना है,
एक गीत भोर का गाना है।
जब अरुणोदय हो अम्बर में,
दिनकर बिखेर रहे हों स्वर्ण-रश्मियाँ
वह सुन्दर दृश्य दिखे सभी को,
उसे देखने को आतुर हों सबकी अखियाँ।
आलस छोड़ ऐसी भोर के हों दर्शन,
कविता ऐसी कहो कलम॥
_____✍गीता -
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं
अंधेरी राह जीवन की
हमारी रोशन करते हैं,
हमें जो ज्ञान देते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
दिशा देते हैं जीवन को
करा कर बोध अक्षर का
नयन में ज्योति देते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
बिना शिक्षा के जीवन में
नहीं कोई सफलता है,
हमें शिक्षित बनाते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
हमें सदमार्ग देने को
जिन्हें ईश्वर ने भेजा है,
फरिश्ते से हैं सच में वे
जिन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
हमें मानसिक व सामाजिक
बुलन्दी की तरफ ले जा
हमारा कल सजाते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
नहीं लेते कभी कुछ वे
वरन देते बहुत कुछ हैं
हमें आगे बढ़ाते हैं
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं।
हमें करते प्रेरित हैं
हमारा कल बनाते हैं,
हमें आगे बढ़ाते हैं,
उन्हें हम शिक्षक कहते हैं। -
चिपकाता है पोस्टर
हर बार चिपकाता है
वह पोस्टर।
बैनर टाँगता है हर
चुनाव में।
इस आशा में कि
कभी तो बैठूँगा
अपने विकास की नाव में।
कुछ खिला पिला दिया जाता है
तात्कालिक संतुष्टि को,
ठेके-पल्ले का भरोसा दिया जाता है
ताकि समर्थन की पुष्टि हो,
वह नारे लगाता है जोर से
लेकिन पाँच साल बीत जाते हैं बोर से।
उनकी गाड़ी बदल जाती है,
इसकी उजली दाड़ी निकल आती है,
फिर भी उसका विकास
अटका रह जाता है,
वह भटका रह जाता है।
वह जहाँ था वहीं रह जाता है,
फिर पोस्टर चिपकाने में लग जाता है।
कई पांच साल बीत जाते हैं,
वे जीत जाते हैं
वह हार जाता है,
उसका विकास पड़ा रह जाता है,
और लोग विकसित हो जाते हैं। -
हर दिन हम अच्छे होते जायेंगे
हर दिन हम अच्छे होते जायेंगे
बहुत लगाए बाड़ काटों के
अब फूल से कोमल होते जायेंगेगलत स्पर्धा में हमें नहीं पड़ना
मुरझाये चेहरे अब नहीं गढ़ना
हर चेहरे को सच्ची हंसी से सजायेंगे …औरों की चीजें बहुत ही भाई
पर मेहनत से घर खूब सजाई
निज मेहनत से हर घर को मह्कायेंगे …आलसी बन अब हमें नहीं जीना
औरों की गलतियां नहीं सीना
हरी भरी वही धरा फिर वापस लाएंगे …हर दिन हम अच्छे होते जायेंगे
बहुत लगाए बाड़ काटों के
अब फूल से कोमल होते जायेंगे -
सच कैसी मुश्किल की घडी है
जिसने हमें सम्हाला कितने प्यार से पाला
आज उसे सम्हालने की पड़ी है
सच कैसी मुश्किल की घडी हैमाँ जो हमपे गर्व थी सदा ही करती
संकट में आज है हमारे कारण वो धरती
ऐसा भी कहीं होता है कैसी आफत आ पड़ी है …इक दूजे से प्यार का रिस्ता रहा है हमारा
मुश्किलों में हमें सदा मिला है सहारा
हरकतों से हमारे कितनी सहमी वो डरी है …वसुंधरा का सहारा हमें ही होना है
पाकर सुनहरा साथ इतनी जल्दी नहीं खोना है
सुरक्षा की खातिर अब जोड़ना हर कड़ी है …अपनी सारी गलतियों को हम जल्द सुधारेंगे
इस पवित्र रिश्ते को पावन फिर से बनाएंगे
बेकार चीजों की अब जरुरत हमें नहीं है …जिसके कारन बीता हर दिन दिवश सुनहरा
जिनके रंगो से खिलकर प्यार होता गया गहरा
उसके सुरक्षा के खातिर दिवश मनानी पड़ी है … -
इस तरह हम पृथ्वी दिवस मनाऍंगे
ऑक्सीजन की कमी हुई है देश में,
मार रही है बीमारी, कोरोना के भेष में।
प्रदूषित होती जा रही है धरा,
वृक्ष लगाकर आओ बनाऍं इसको हरा।
ऑक्सीजन के सिलेंडर लेते हो,
तुम कुछ दाम देकर।
फल भी खाओ ऑक्सीजन पाओ,
मात्र कुछ वृक्ष लगाकर।
प्रकृति हमें कितना देती है,
अब इसका दोहन बन्द करो।
कराह रही है धरती माता,
इतना तुम मत गन्द करो।
स्वच्छ करनी है वसुंधरा,
यह वादा निभाऍंगे।
स्वच्छता की रौशनी में,
धरा को जगमगाऍंगे।
बन्द करेंगे प्लास्टिक का उपयोग,
धरा पर वृक्ष लगाऍंगे।
वादा है इस तरह हम,
पृथ्वी दिवस मनाऍंगे॥
____✍गीता -
जीवन के लिए आवश्यक (जागरूकता)
आओ कथा सुनाएं तुम्हें पारिस्थितिकी पारितंत्र की,
खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
दिन-रात खनन हो रहा है चहुंओर हरियाली का,
आधुनिक मशीनें बन गई कारण जीवन की खुशहाली का,
है आवश्यकता फिर से पृथ्वी को हरा-भरा करने के इस मंत्र की,
खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
क्यों फैल रही हैं बीमारियां क्या कभी किसी ने सोचा है,
हम ही कारण बने हैं इसके जो पृथ्वी मां के आंचल को यूं नोचा है,
करो खुलासा इन सबका मत चलो कोई चालें षड्यंत्र की,
खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
चारों तरफ लाशों के ढेर लगे हर आंख से बहता पानी है,
है जीवन की कड़वी सच्चाई मत मानो इसे सिर्फएक कहानी है,
कोई रोग होने ना पाए अब कोई रोने ना पाए,करो व्यवस्था ऐसे यंत्र की,
खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
लाखों लोग इन दिनों कर रहे अपने जीवन से संघर्ष,
घर परिवार के भी लोग ना करते एक दूजे को स्पर्श,
दो गज दूरी मास्क जरूरी यह सोच होनी चाहिए खुद व्यक्ति स्वतंत्र की,
खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
क्या हुआ जो जिस वातावरण में अब तक जीते आए वह हवा भी अब जहरीली हुई,
कहीं इसका कारण हम सब ही हैं जो क्षीण अब हरियाली हुई,
करो ऐसी व्यवस्था आज अपने पारिस्थितिकी पारितंत्र की,
हो जिससे सुरक्षा अपने मानव तंत्र की।। -
“पृथ्वी दिवस”
पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) स्पेशल
——————————–इन दो हाथों के बीच में पृथ्वी
निश्चित ही मुसकाती है
पर यथार्थ में वसुंधरा यह
सिसक-सिसक रह जाती है
जा रही है पृथ्वी अब
प्रदूषण के हाथों में
कितना सुंदर रचा था इसको
लेकर ईश्वर ने अपने हाथों में
कैसा था इसका रूप सलोना
कैसा विकृत रूप हुआ
रे मानव ! तेरे कृत्यों से
धरती का यह स्वरूप हुआ
उगल रही है पवन खफा हो
गर्म-गर्म से गोलों
बुझा ना पाती नदियां अब तो
प्यासे कंठ के शोलों को
ध्वनियों के यह शोर-शराबे
अब ना मन को भाते हैं
दिन प्रतिदिन कर खनन पृथ्वी का
मानव कैसे इतराते हैं
कोप ना देखे पृथ्वी का यह
रहते अपने मद में चूर
जितना सुख पाते हैं भौतिकता से
उतना होते जाते प्रकृति से दूर
कोरोना सम रोग है आया
प्रकृति ने है रोष दिखाया
हे मानव ! अब संभल जा जरा तू
अब तो थोड़ी अकल लगा तू
वृक्ष लगा धरा सुंदर कर दे
पशु-पक्षियों को फिर से घर दे
कल-कल करके नदी बहेगी
जिससे प्राणियों की प्यास बुझेगी
काले-काले मेघ घिरेंगे
धरती सोना फिर उगलेगी
पृथ्वी दिवस* पर प्रण यह कर लो
धरती को फिर से पुलकित कर दो
एक-एक पौधा सभी लगाओ
प्रदूषण को जड़-मूल मिटाओ।।काव्यगत सौंदर्य एवं प्रतियोगिता के मापदंड:-
यह कविता मैंने सावन द्वारा प्रायोजित ‘पोएट्री ऑन पिक्चर कॉन्टेस्ट में दी गई फोटो को देखकर लिखी है।
जिसमें दर्शाया गया है-
“दो हाथों के बीच में पृथ्वी है तथा तो छोटे-छोटे हाथों को सामने दिखाया गया है”जिसे देखकर मेरे कविमन ऐसा लगा जैसे:-
ईश्वर के सुंदर हाथों से पृथ्वी, प्रदूषण के
नन्हे-नन्हे हाथों में जा रही है।
मैंने उस चित्र को देखकर अपने दिमाग में स्थापित किया और उसके बाद इस कविता का निर्माण किया।
आपको कैसी लगी जरूर बताइएगा।।जहां तक बात भाव की है तो यह चित्र भावना प्रधान है।जिसे देखकर अपने आप भावनाएं जागृत हो जाती हैं।क्योंकि पृथ्वी दिवस सिर्फ एक दिवस नहीं है यह एक त्योहार के रूप में मनाया जाना चाहिए।
क्योंकि धरती को हम अपनी मां कहते हैं उसे
स्वच्छ रखना हमारी जिम्मेदारी है।मैंने चित्र की समग्रता का ध्यान रखा है और साथ ही समाज में एक अच्छा संदेश जाए, इसलिए अपनी कविता को एक संदेशात्मक भाषा में विराम दिया है
पाठक को पृथ्वी के प्रति संवेदनशील बनाकर तथा अपनी गलतियों का एहसास कराकर पेड़ पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया है।
ताकि उसमें आंतरिक प्रेरणा जागृत हो और वह पृथ्वी की देखरेख करे, ऐसे काम करे जिससे हमारी पृथ्वी प्रदूषण के हाथों में नहीं बल्कि सुरक्षित हाथों में रहे।समग्रता, भाव- प्रगढ़ता तथा शब्द-चयन में, मैं कितनी कारगर रही यह तो मैं नहीं जानती !
परंतु मैंने यह कविता बहुत ही भावुक होकर लिखी है ताकि समाज को एक नई दिशा मिले।।पृथ्वी दिवस’ पर सावन द्वारा प्रतियोगिता
रखने के लिए मैं सावन का धन्यवाद करती हूं।। -
तेरे जन्मदिन से हो फिर नया विहान
मर्यादा की पराकाष्ठा सद्गुणों के धाम
हे पुरुषोत्तम तुम्हें बारम्बार प्रणामअवतार पूर्व मनुष्यता थी विकल
ज्ञानी ध्यानी सारे संत थे विफल
अत्याचार मुक्ति की न थी युक्ति
विलुप्ति की ओर अग्रसर थी भक्ति
अवतरण से तेरे कष्ट को मिला विश्राम—अज्ञात थे पथ जिसपे मनुष्यता बढ़े
भयग्रस्त से सब कब किस ओर चढ़े
रावण से थे चहुओर कोने कोने भरे
कैसे सब की पीड़ा का हो अवसान—तेरे आने से सबको मिला आराम
सबके ही कष्ट दुख मिटे अभिराम
उत्सव की हुई हर पल शुरुआत
सुखद कथाओं की मिली अचल सौगात
देवताओं का भी विचलित मन हुआ शांततेरे नाम की महिमा का है अब सहारा
तुम बिन हे शाश्वत कहां कोई कहीं प्यारा
फिर से मानवता हो रही है व्यथित
सब हो रहे हैं क़ैद कहां कोई पथिक
तेरे जन्मदिन से हो फिर नया विहान -
आत्मसम्मान जीवित रखो
आत्मसम्मान जीवित रखो
वक्त काफी कठिन क्यों न हो,
बस रहो कर्मपथ पर अडिग
वक्त काफी कठिन क्यों न हो।
मन में घबराहटों के लिए
कोई स्थान ही मत रखो,
खोज कर खूब सारी उमंगें
जिन्दगी को सफल कर चलो।
आप डालो नजर एक उन पर
बोझ ढ़ोते हुए श्रमिकों पर
हैं कमाते बहाकर पसीना,
चल रहे आत्मसम्मान पर।
हो सके न्यून आधिक्य कुछ भी
काम कर के कमाओ व खाओ
छोड़ कर हाथ पैरों को पथ में
आप अपना समय मत लुटाओ।
आत्मसम्मान जीवित रखो
वक्त काफी कठिन क्यों न हो,
बस रहो कर्मपथ पर अडिग
वक्त काफी कठिन क्यों न हो। -
भोजपुरी देवी पचरा गीत – काली माई हो |
भोजपुरी देवी पचरा गीत – काली माई हो |
काली माई हो भगाई देतु कोरोनवा |
भस्म करा खोली आपन तीसरा नयनवा |
काली माई हो भगाई देतु कोरोनवा |
जब से ये आइल मुहाल आराम होई गईले |
सांसत मे सभकर अब जान होई गईले |
कुटी कुटी काटा इनकर धरी गरदनवा |
काली माई हो भगाई देतु कोरोनवा |
घरवा ना चैन कही बहरवा डर लागेला |
जेने देखा वोने लोगवा जान लेके भागेला |
अबकी नवरातन मे देतु इहे वरदनवा |
काली माई हो भगाई देतु कोरोनवा |
अम्बा जगदंबा माई भवानी तू कहालु |
नर नारी देवलोक सबसे तू पुजालू |
जय जयकार होला तोर जमीन असमनवा |
काली माई हो भगाई देतु कोरोनवा |
बध कइलू माई जईसे चंड मुंड दानव|
कृपा करा देशवा संकट हरा अब मानव |
चरण मे गिरि भारती करे तोर नमनवा |
काली माई हो भगाई देतु कोरोनवा |
श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक / गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड ,मोब -995550986 -
धरा माँ है हमारी
धरा माँ है हमारी
पालती है पोसती है,
इसी में जिंदगी
सारे सुखों को भोगती है।
अन्न रस पहली जरूरत
है हमारी जिंदगी की,
वायु-जल के बिन कहाँ है
कल्पना इस जिन्दगी की।
और सबसे मूल है
टिकना हमारा पृथ्वी पर
आश्रय लेना चलाना
जिन्दगी को पृथ्वी पर।
एक आकर्षक गुरुत्वी
खींचता है केंद्र को जो
इस तरह से है कि जैसे
माँ लगाती वक्ष से हो।
चारों तरफ है वायुमंडल
जिंदगी को सांस देता,
नीर है अन्तःपटल में
जिन्दगी की प्यास धोता।
भानु की किरणों से लेकर
ऊष्मा जल मेघ कर के
हर तरफ बरसात देती है
धरा माँ है हमारी।
हजारों जीव बसते हैं
वनस्पतियां हजारों हैं,
सभी को पालने के
पोसने के पथ हजारों हैं।
कहीं लघु कीट कीचड़ में
कहीं महलों में मानव है,
कहीं जलचर कहीं थलचर
कहीं उड़गन का है कलरव।
निभाती पृथ्वी दायित्व पूरे
एक माता का,
करें महसूस हम भी
पूत बनकर दर्द माता का।
है इसका आवरण पर्यावरण
उसको बचाना है,
हमें संतान के दायित्व को
अच्छा निभाना है।
न हो दोहन निरंकुश
पृथ्वी माता के अंगों का,
सरंक्षण करें सब लोग
मिलकर पेड़ पौधों का।
पर्वतों का खदानों का
नियंत्रित ही करें उपयोग,
समुंदर और नदियों का
नियंत्रित ही करें उपभोग।
पेड़ पौधे लगायें
जंगलों को बचाएं हम
अपनी पृथ्वी माँ को
सजायें हम।
पृथ्वी दिवस है
आज यह संकल्प लेना है
धरा है मां हमारी
इस धरा को पूज लेना है।
*******************
कविता पर प्रकाश – कविता भाव, विचार, नाद व प्रस्तुति योजना का समन्वय है। इस समन्वय को कविता में स्थापित करने का प्रयास किया गया है। नाद स्वरूप गति, प्रवाह व तुक का समावेश किया गया है। पाठक हृदय तक सहजता से प्रविष्ट करने हेतु आम जीवन मे प्रचलित भाषा का प्रयोग किया गया है।
पृथ्वी के साथ माता व संतान का पवित्र संबंध स्थापित कर काव्य सृष्टि का लघु प्रयास है। प्रस्तुत और अप्रस्तुत के साथ अनुभूति को उकेरने का एक प्रयास सादर प्रस्तुत है। -
हर एक की सूनी नज़र है
सुनने को कर्ण यह तरस गये
कहां अब कोई अच्छी ख़बर है
वेवसी का आलम है यह कैसा
पल यह कैसा,हर एक की सूनी नज़र है।।
सुनने को अंन्तर्मन यह तरस रहा है
कहीं से उठकर लहर वो आए
मन के डर को दूर बहा के
किसी समंदर में छोङ लाए
कह दे अब ना किसी का भय है
अब ना कहीं संक्रमण का डर है
पल यह कैसा,हर एक की सूनी नज़र है।।
संक्रमण का यह खौंफ कैसा
मनुज पङा लावारिस शव जैसा
धरा पर ढ़ेर मृतकों का लगा है ऐसे
वारूद के अंबार पर नर खङा हो जैसे
मरी संवेदना मन की, करूणा की झलक नहीं है
कैसे कहूं – इंसानियत अब भी अजर-अमर है
पल यह कैसा, हर एक की सूनी नज़र है।।
है बेखबर या, डर से ख़ामोश, यह शहर है
सहम-सहम कर जी रहे, हवाओं में फैलीं ज़हर है
करनी हमारी, कैसे कहें कुदरत का कहर है
आकांक्षाओं की पूर्ति, आहूति जिसमें जीवन की डगर है
मानवता पिसती, बिखरते रिश्ते, फिसलती हाथों से सहर है
पल यह कैसा, हर एक की सूनी नज़र है।। -
महामना मालवीय
हिम किरीटनी, हिम तरंगनी,
युग चरण के रचयिता हे साहित्य देवता
है ऋणि हम,करते है अर्पित श्रद्धा-सुमन,
साहित्यअकादमी से विभूषित,शोभित पद्यभूषण
तेरा यश है फ़ैला, क्या भू-तल क्या गगन।।
परतंत्रता के दर्द को दिखाती
रची तूने जो कैदी-कोकिला
शान्त दिखती, सहजता को पिङोती
तेरी रचित गूढ़ भावो की शब्द-सरिता
युग चरण के रचयिता हे साहित्य देवता——
राष्ट्रीयता से भिगोती
बलिदान की भावना को कर समाहित
देश की स्वतंत्रता की ललक
मन में जगाती भारतीय आत्मा
युग चरण के रचयिता हे साहित्य देवता—-
कर्मवीर, प्रताप को दिया नव तरंग
कभी प्रभा का किया इन्होंने संपादन
देश भक्त कवि ही नहीं,थे पत्रकार प्रखर
धन्य वसुंधरा वहां, जहां चतुर्वेदी ने ली जन्म
युग चरण के रचयिता हे साहित्य देवता—-
बाबयी ग्राम, मध्य प्रदेश है इनकी जन्म भूमि
युगद्रष्टा, सच्चे राष्ट्रकवि के निश्चल समर्पण की
अनन्य देश-प्रेम के बीज निर्जन हृदय में कर समाहित,
“पुष्प की अभिलाषा” सी ललक जन-मानस में जगाने की—
युग चरण के रचयिता हे साहित्य देवता– -
चलना तय सफ़र पर
आसान बहुत है चाह अच्छा बनने की पाल लेना
पर तय सफर पर बढ़ते रहना,बङा ही कठिन है
आस किसी के मन में जगाकर,
खुद के घर की रौनक घटाकर,
पर हित में इच्छा को दबाकर,
खुद के ख्वाइशो के राख पर,
आशिया गैरों का सजाना,
बङा ही कठिन है।
क्या कहूं तुमसे, कैसे बाधक बनूं मैं
चुप रहकर कैसे, तिल-तिल जलू मैं
भला करके भी, कुछ हासिल नहीं
कैसे समझाऊं,वे सहानुभूति के काविल नहीं
डसने वालों की फितरत बदलना
बङा ही कठिन है।
है भरोसा, ऊपर वाले की रहमतों पर
न्याय से वंचित नही, कोई उनके दर पर
आसरा नहीं किसी और की इस मन में जगे
आसरा पूरी करूं, ऐसी लगन बल पौरुष मिले
हे नाथ!तात-मात-सखा आप हो, राफ्ता बदलना
बङा ही कठिन है। -
बोझ खींचे जा रहा था वह
बोझ खींचे जा रहा था वह
हाथ ठेले से,
पेट भीतर तक खींच कर
जोर लगा रहा था।
आँतें एक दूसरे से चिपक कर
सपाट होती जा रही थी।
हड्डियां व पेशियाँ
खिंचती चली जा रही थीं,
वह जोर लगाते जा रहा था
क्योंकि उसने भी
अपने बच्चों के लिए
चाबी वाली गाड़ी
खरीदनी थी।
बच्चे तो पड़ौसी लाला जी के
बच्चे की जैसी
साइकिल मांग रहे थे,
लेकिन पूरा जोर लगा कर भी
संभव नहीं था
उसके लिए साइकिल लेना।
इसलिए वह बीच का
रास्ता निकाल कर
चाहता था छोटी चाबी वाली
कार देना,
इसलिए बोला
जितना लादना है
लाद देना साब,
लेकिन बच्चों के लिए खरीद सकूँ
एवज में इतना देना
बाकी कुछ नहीं। -
अपनी पृथ्वी बचालो
अपनी पृथ्वी बचालो – पृथ्वी दिवस पर मेरी नवीन रचना
हे भूमिपुत्र आज अपनी, पृथ्वी को बचालो तुम,
स्वार्थों से दूर रहकर हाथ अपने मिला लो तुम।
पृथ्वी खतरे में है यारों, पर्यावरण बचा लो तुम,
प्रदूषणमुक्त कर पृथ्वी को काल से बचालो तुम।।मानव अपनी बुद्धि से चांद पर कब्जा कर रहा,
नित नये नये आविष्कार से प्रकृति को छेड़ रहा।
अणु परमाणु खोज कर शक्तिशाली भी हो रहा,
पर मानव अतितरक्की से मानवता भी खो रहा।।अति महत्वाकांक्षा के कारण जंगल नष्ट हो गये,
कारखानों की गंदगी से नदी नहर दूषित हो गये।
ध्वनि और वायु प्रदूषण से शहर प्रदूषित हो गये,
महिलाओं के अपमान से ईश्वर भी कूपित हो गये।।तभी कोरोना काल बन मानव जाति पर छाया है,
हमारी ही गलतियों से, मौत का तांडव मचाया है।
वृक्षों के कटने से पृथ्वी पर, घोर संकट आया है,
इम्युनिटीपाॅवर घटने से वायरस सक्रिय हो पाया है।।अब भी समय है भूमिपुत्रों, अपनी पृथ्वी बचालो,
वृक्ष लगाकर जगह जगह, मानव जीवन बचालो।
प्रदूषण मुक्त कर पृथ्वी को, प्रकृति से सजालो,
हे भूमि पुत्र कोरोना से भी, अपनी पृथ्वी बचालो।। -
पतियों की हालत पत्ति की तरह
पतियों की हालत पत्ति की तरह
श्रम कर कर गिरे पत्ति की तरहकहने को ही घर का मालिक है
दिन श्रमरत रहा रात चौकीदारी है
बीबी की शादी तो हुई शीशे से
पति से नोंक झोंक की रिश्तेदारी है
दिल लाख ललचे खुशी के लिये
पड़ा विस्तर पे चुसे गन्ने की तरहकहने को समाज है मर्दों का
मुर्दों जैसी घर में स्वागत है
पत्नी नौकरानी को बच्चे थमा
विस्तर पर टी वी की रानी है
खा पी मौज ले जो बच जाता
परस देती पति आगे जूठन की तरहक्या सच में कभी इनकी हुकूमत थी
आज तो तेल निकले बादाम सी हालत है
शायद रहम हो जाये कभी औफिस में
घर में इनकी कहां ऐसी किस्मत है
उमर कैद की सजा काट रहे
निरपराध मुजरिमों की तरहपतियों की हालत पत्ति की तरह
श्रम कर कर गिरे पत्ति की तरह -
मैं तुम्हारी धरोहर
मैं तुम्हारी धरोहर
मैं पृथ्वी बोलूँ आज अपने दिल की,
सुनू,देखूँ मैं भी तुमसा तुम ये जानो,
बोला तुम्हरा हर शब्द हर पल मैं सुनती,
सुनू वो जिसे सुन खिल उठती मैं भी,
दिल न चाहें कभी वो भी सुनना पड़ता,
देखूं उसे भी जो सँवारे सजाएं मुझको,
होता वो भी जो हर पल रौंदे मुझको,
फ़र्क रौंदने का हर का मैं भी समझूँ,
भरू पेट किसी का तो पेट मेरा भरता,
नियत नहीँ भरी होती वो रहता भूखा,
हूँ मैं तुम्हारी जननी अब तो मुझे पहचानों,
दे गए तुम्हें अपने तुम्हारे धरोहर मान मुझको,
करो संचय धरोहर की मान तुम अपना,
कल देते समय हो मुस्कान चेहरों पर तुम्हारी,
करे सलाम तुम्हें पीढियां देख धरोहर तुम्हारी।
प्रतिभा जोशी
-
पृथ्वी दिवस
कहने को हम भी कहते हैं धरा को धरती माता,
है कितनी पीड़ा धरती मां को,यह कोई क्यों ना समझ पाता।
करते हम अपने कृत्यों से,धरती मां को यूं गंदा
पर्यावरण को दूषित करने में ,ना घबराता कोई बंदा
जीव जंतुओं की निर्मम हत्या कर ,फैलाते हैं गोरखधंधा
पूजते हम इन दानवों को और देते अपना कंधा
इन काले गोरखधंधो से धरती मां का सीना छलनी हो जाता।
है कितनी पीड़ा धरती मां को यह कोई क्यों ना समझ पाता।।
पहले कुंओ, बावड़ियों से हम सीमित पानी लेते थे
और आज के नए फैशन में कितना पानी यूं व्यर्थ बहा देते हैं,
हे लगे हुए घरों में -
कब रुकेगा
संतापों क्रम यह
कब बदलेगा,
मानव जाति पर आया
संकट कब निपटेगा।
हा हा कार, चीत्कार
विभत्स करुण क्रंदन
कब रुकेगा,
ओ प्रकृति !!
तेरा यह आक्रोश
कब थमेगा।
लाखों जीवन लील चुका
यह विनाश का मंजर
कब थमेगा।
मानव जाति पर यह
अदृश्य खंजर
कब तक चुभेगा।
अस्त-व्यस्त है जिन्दगी
असहाय सी है
संभल रही है
बिखर रही है,
फिर फिर बिखर रही है
यह बिखराव
कब चलेगा,
ओ प्रकृति !
तेरा यह रौद्र रूप
कब तक रहेगा। -
उनकी लेखनी को नमन है 🙏🙏
सीखा तो हमने भी बहुत कुछ है
तुम्हारी लेखनी से
कैसे अविरल,
निर्भीक चलती है
शब्दों की सुंदर कारीगरी तो रहती ही है
साथ में भावों की लहर बहती है
हम तो समझते थे कि हम कवि हैं
पर आज कुछ पुराने कवियों की
कविताएं पढ़ने के बाद
मेरे मस्तक पटल खुल गए
जाग उठी स्मृति रेखाएं
लगा जैसे कुछ नहीं आता
क्या लिखा करती हूं मैं
उनकी लेखनी को नमन है
जिन्होंने सावन को सजाया
मैं खुद को कवि समझती थी
मेरे इस भ्रम को मिटाया।। -
हमने सीख लिया है
अरि के आगे अडिग रहना है,
नहीं अरि से झुकना है।
हिम की ऊॅंची चोटी से,
यह हमने भी सीख लिया है।
फलों से लदी डाली ही अक्सर,
झुकती देखी दरख़्तों की।
सीधे खड़े अकड़े ठूॅंठ को,
कोई ना स्वीकार करे
ना फल है ना फूल है,
ना कोई सुगन्ध तो
कैसे कोई ॲंगीकार करे।
इसीलिए दरख़्तों से हमने,
झुकना सीख लिया है।
तेज़ ऑंधियों से हर कोई बचता,
तूफानों से बचने का ढूॅंढे रस्ता।
पवन के ठॅंडे हल्के झोंकों को,
जब हमने महसूस किया तो
कोमल भाव में रहना, बहना
हमने उस से सीख लिया है।
सूर्य, चन्द्र बाॅंटें निज उजाला,
बिना किसी स्वार्थ के
उनको देखकर हमने भी,
निस्वार्थ सेवा करना सीख लिया है।
पॅंछी को उड़ते देख गगन में,
यह ख़्याल आया है मन में
मंज़िल की ओर निर्बाध कदम से,
जैसी पॅंछी का उड़ना हो
पर फैला कर हमने भी,
लक्ष्य की ओर बढ़ना सीख लिया है।
______✍गीता -
पलायन
गांव के खेत
बंजर होते गये
गांव के बुजुर्ग पेड़
रोते गये,
पुराने घर आँगन
टूटते रह गये।
जो गया लौट कर
आया नहीं।
शहर का हो गया
गांव फिर भाया नहीं।
वह चबूतरा टूटता
टूटता सा,
सोचता है स्वयं में
हुआ कैसा कि आखिर
जो गया भूल गया,
गांव का अपनापन
याद आया नहीं। -
भेड़ चाल
मत चलो भीड़ में बंधु,
भेड़ झुंड कहलाओगे।
एक गिरा कुए में तो,
सभी को उसमें पाओगे।।वो बिना मास्क के रहता,
मानव बम सा लगता है।
आतंकी श्रेणी में आता,
दुश्मन मानवता का लगता है।।लापरवाही की सज़ा मिलेगी,
फिर एक दिन पछताएगा।
धन, दोलत, जान पहचान,
कोई काम नहीं आएगा।।तुमको तुमसे प्यार नहीं,
गलतफहमी मत पालो तुम।
अपने साथ दूसरों का भी,
कीमती जीवन बचालो तुम।।हाथ धोओ लगातार,
दूरी मीटर में दो या चार।
मास्क बिना घर से ना निकलो,
मत बनो मौत के समाचार।। -
मन को भी सुनना होगा
जो कृत्य खुशी दे मन को
वह कृत्य तुझे करना होगा
नफरत विद्वेष भरी बातों से
दूर तुझे रहना होगा।
तन अलग कहे मन अलग कहे
उलझन का मूल यहीं पर है,
तन-मन दोनों की सुन तूने फिर
तालमेल करना होगा।
मन राजी हो तन राजी हो
उसमें ही खुशियाँ आती हैं,
जीने की चाहत बढ़ जाये
ऐसा तूने करना होगा।
तन गलत दिशा में बढ़े अगर
रोके मन उसको शिद्दत से,
तन की जिद को कर शांत तुझे
मन को भी सुनना होगा।
मन से मत कभी बगावत कर
मन में है अद्भुत शक्ति बसी
तेरी राहें रोशन करने
उस ताकत को जगना होगा। -
गलत पर कर प्रहार
समाज में हो रहा गलत
तेरे भीतर की आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या
किसी निरीह की चीत्कार
किसी भूखे की भूख
प्यासे की प्यास
जीवन में व्याप्त दर्द
तेरे भीतर की आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या,
शोषित, उत्पीड़ित
उपेक्षित वर्ग के
तिरस्कार का दर्द,
भेदभाव की बात
भूख से बिलखते
बच्चों की रात
उर का दर्द
तेरे भीतर की आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या।
घूसखोरी व भ्रष्टाचार
युवाओं का
रह जाना बेरोजगार,
निरीहों पर अत्याचार,
तेरी आत्मा को
झकझोरता नहीं क्या।
झकझोरता है तो
उठा ले लेखनी
लेखनी में पैदा कर धार
गलत पर कर प्रहार,
आवाज उठाने को
तेरा मन झकझोरता नहीं क्या। -
लगी है आग जंगल मे
लगी है आग जंगल में
न जाने कौन है ऐसा
रगड़ माचिस की तीली को
जला कर चल दिया घर को।
इधर घर जल रहे लाखों
विकल हैं भस्म हैं प्राणी
उधर है मौज में लेटा
धुँवा महसूस करता है।
नहीं भू पर था बरसा जल
हलक सूखे थे जीवों के
लगाये टकटकी थे वे
निरन्तर नभ के मेघों पर।
इधर जल की जगह बरसी
मुसीबत आग बन उन पर
सभी कुछ भस्म कर डाला
किसी दानव की तीली ने।
ओस की बूंद पीकर वे
बचाये थे स्वयं साँसें
लगाकर आग मानव ने
जला संसार डाला सब।
अधजले सोचते हैं कुछ
बिगाड़ा था क्या हमने जो
लिया इंसान ने बदला,
किया आखिर था हमने क्या। -
मोमबत्तियों-सा है जीवन अब तो..!!!
मोमबत्तियों-सा है जीवन
अब तो
पिघलना है प्रकाश फैलाना है
काव्य लिखने का मन है
अब तो
तेल डाल दे कोई
मेरे जीवनरूपी दीपक में,
अभी और तम मिटाना है
अभी इमारतें बनानी हैं
अभी वो आसमां झुकाना है
वैमनस्यता मिटानी है
प्रेम का दीपक जलाना है
खत्म होने को है
मेरे कलम की स्याही
बाजार से कल और
खरीद लाना है
डायरी के पन्ने कम पड़ गए हैं
फिर उस दोस्त से मंगाना है।। -
चिठ्ठियों की वेदना
चिठ्ठियों की वेदना
कभी सुनी है तुमने?
कितना सिसक-सिसककर
रोती हैं
एक पते को ढूढ़ने में
जमाने लगते थे
अब बात क्षण भर में पहुँचती है
लिखने वाले और पढ़ने वाले में
एक कल्पना का समन्वय होता था
विचार रूह तक पहुँचते थे
प्रेमी और प्रेमिका के
चेहरे चिठ्ठियों में दिखते थे
सालों तक दिल से लगा के
रखते थे लोग अपने अपनों की चिठ्ठियों को
इन्तज़ार रहता था डाकिये का बेसब्री से
चिठ्ठियों में भाव प्रकट होते थे।। -
मत बांधों मेरी नाव को….
कहाँ गई वो दानवीर कर्ण की संतानें ???
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____________________________
मत बाँधो मेरी नाव को
तैरने दो
इसे पीर के विशाल सागर में
भर गया है जो
इन दिनों पीड़ितों की
दयनीय दशा देखकर
चौराहों पर अध कटे हाँथों से
भीख मांगते लोगों को देखकर
नहीं निगाह करते
बगल से गुज़र जाते हैं
जो देखते भी हैं
हँस के चले जाते हैं
कहाँ गई वो दानवीर कर्ण की संतानें?
कहाँ गई वो संवेदनाएँ?
क्या ये संवेदनाएँ सिर्फ
कवि की कविताओं तक ही सीमित हैं
या हकीकत की जमीन पर भी है
उनका कुछ वजूद…!!! -
भले ही सो रहा हूँ मैं
भले ही सो रहा हूँ मैं
थका-माँदा यहाँ
फुटपाथ में
मगर चलती सड़क है
रुकती है बमुश्किल
एकाध घंटा रात में।
उसी में नींद लेता हूँ
उसी में स्वप्न आते हैं,
कभी जब राहगीरों के
बदन पर पैर पड़ते हैं
अचानक स्वप्न थे
जो नींद में
वो टूट जाते हैं।
नया हूँ इस शहर में
भय से आँसू छूट जाते हैं,
यहां क्यों लेटता है कह
सिपाही रूठ जाते हैं।
अंधेरी जगह जाऊँ कहीं
तो श्वान होते हैं,
हमारी तरह उनके भी कुछ
गुमान होते हैं।
मुझे अनुभव नहीं है
इस तरह सड़कों में सोने का,
मगर असहाय हूँ
घर से निकाला हूँ
कमजोर हूँ मैं वृद्ध हूँ
अब तो दिवाला हूँ।
स्थान मुझको चाहिए
थोड़ा सा रोने का।
दो-तीन घंटे लेट कर
थोड़ा सा सोने का।
सुबह फिर काम खोजूंगा
उदर की पूर्ति करने को।
जगूं या जग न पाऊँ कल सुबह
सोचा नहीं मैंने,
मगर इस वक्त आधी रात है
सोया हूँ जगने को। -
यह कोरोना है देशवासियों..
कोरोना का कहर हुआ,
गली-गली हर शहर हुआ।
आ गई है दूजी लहर,
कोरोना ने कितना बीमार किया।
दर्द दिया लाचारी दी,
बहुत बड़ी बीमारी दी
परेशान बहुत किया इसने,
कितनी बड़ी महामारी दी।
फ़िर भी, किसी को पिकनिक मनानी है,
किसी को नदी नहानी है।
यह कोरोना है देशवासियों,
भीड़ नहीं लगानी है।
जब तलक है महामारी यह,
मास्क भी लगाना है,
दो गज दूरी बनानी है।
नम्बर आए जब आपका,
वैक्सीन लगवानी है॥
_____✍गीता -
नया स्वर फूँकना है
रोशनी कर दो ना
जला दो बल्ब सारे,
देखने हैं मुझे
दिवस में चाँद तारे।
अंधेरे से बहुत
उकता गया हूँ,
मन भरी पीड़ को
लिखता गया हूँ।
अब मुझे जूझना है,
नया स्वर फूँकना है,
बुलंदी है जगानी
नहीं अब टूटना है।
दर्द से आज कह दो
जरा दूरी बना ले,
मुझे अब वेदना को
दूर ही फेंकना हैं।
ठंड में ताप बनकर
स्वयं को सेंकना है।
तप्त मौसम अगर हो
शीत मन सींचना है।
मेरा अरमान हो अब
बुलंदी ही बुलंदी,
और संवेदना को
पास ही पास रखना है।
जिन्दगी की कहानी
सदा चलती रही है,
छोड़ कड़वाहटें सब
मधुर रस स्वाद चखना है। -
पापा
तब आप कितने
सुन्दर थे पापा
देख पुरानी फोटो,
देखता रह गया मैं।
फौजी वर्दी
चमकता चेहरा,
फौलादी बाजू,
सीधे लंबे से,
जाने कब की है
यह फ़ोटो,
मुझे याद है
आपकी कर्मठता की
ठंडी चोटियों में
देश सेवा करते करते
दो वर्ष तक घर
न आ पाने की
मगर मनी आर्डर के
ठीक समय पर आने की।
उससे राशन खरीदने
स्कूल की फीस देने की।
पारिवारिक जिम्मेदारियों को
निभाने के लिए
जान लगा देने की
आपकी कर्मठता की
पूरी याद है।
धीरे धीरे आप वृद्ध होते गए।
मुझे फिर याद है।
आपके माथे पर
पड़ी अनुभवों की
झुर्रियां की,
रक्तचाप से परेशान
बार-बार सिर पर हाथ लगाते,
हँसमुख इंसान की।
तमाम तरह की
जीवन की दुश्वारियां
झेल चुके वृद्ध शरीर की।
मुझे तो याद है हम
सभी से स्नेह रखने वाले
हम सभी की
इच्छा पूरी करने वाले
एक देवता की।
कुछ कुछ याद है
मुझे थपकी दे सुलाने वाली
आपकी लोरी की गेयता की।
फिर याद है
आपके द्वारा ली गई
अंतिम साँसों की।
रह गई यादों की
जो अब साथ हैं। -
धन का राज है
धन है धन्य
धन का राज है
सबके दिलों में।
बिना धन जिन्दगी का
पथ कठिन।
न हो धन पास जिसके
दूरियां रखते हैं उससे,
ठुंसा हो जेब में जिसके
खूब धन,
भले वह एक धेला भी न दे,
मगर उससे सभी
रखते हैं अपनापन।
सब कुछ भले संभव न हो
लेकिन बहुत कुछ
संभव है धन से,
मान-ईमान हैं
सब कुछ
खरीदे-बेचते धन से।
बहुत धन हो इकट्ठा गर
बड़ा मानव बनूँगा मैं
अगर संचित न कर पाऊँ
वही छोटा रहूँगा मैं।
यही धन है बनाता है
यहां आकार मानव का
यही धन है बढ़ाता है
मनुज के मन में दानवता।
तभी तो बोलते हैं
धन्य है धन
राज धन का है।
करूँ अर्जित इसे
इस बात पर ही ध्यान सबका है। -
तरस आता है
कविता- तरस आता है
——————————————
हे गरीबी
तुझ पर –
तरस आता है,
क्या बिगाड़ तू पाई इंसान का|
चाहे तू और
बर्बाद कर दे,
चाहे तू और
भिखारी कर दे,
जो इच्छा हो
तेरी आज कर दे,
कंगालो की
तरह उसे बना दे,
बीमारों की
तरह उसे बना दे,
एक दिन ठीक होकर
काम पर जाएगा
बोल गरीबी क्या बिगाड़ पाई तू इंसान का|
आज उसे
मिट्टी में मिला दे,
चाहे उसे
रोड पर कर दे,
चाहे उसे
खेत में कर दे,
हां रोएगा-
छठ भर सही
पर सोएगा,
बोल गरीबी ,क्या बिगाड़ पाई तू इंसान का, सुबह-सुबह,
भीख मांगने जाएगा,
जो मिलेगा,
पकवान समझ खाएगा,
दाने दाने के लिए तरसे वह,
अस्तित्व के खातिर भटके वह,
लाख ठोकर मिले उसे,
सब के आगे हाथ फैलाता है,
दिन में उसे कुछ मिल जाता है,
गरीबी कुछ नहीं कर पाई तू,
किसी को मिटा नहीं पाई तू,
मरा होगा कोई भूख से अगर,
गरीबी तेरी यह कृपा नहीं,
मौत दुख सुख जीवन की सच्चाई है,
जब सोचता हूं तो ,
गरीबी तुझ पर तरस आता है,
गरीबी बचा अपने वजूद को,
कोई ठान ना ले
तुझे भगाने को,
अपने वंश से
तेरा अस्तित्व मिटाने को,
फिर कहां जाएगी तू,
उसके जीवन घर में स्थान नहीं पाएगी तू,
————————————————-
कवि ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ -
जब-जब भी याद बचपन को करती हूँ
जन्म लेकर जब आए,
इस दुनियाँ में हम पहली बार।
जो भी दृश्य देखा,
चकित हृदय हमारा था।
बारिश की पहली बूॅंदों ने भी,
चकित इतना कर डाला
पानी ,पानी कहकर हमने,
वो दृश्य सबको दिखा डाला।
पहली बार जब देखे,
उड़ते हुए पंछी नभ में।
फैलाकर हाथ यूँ ही अपने,
उड़ने के देखे थे सपने।
पहली बार जब देखे,
गगन में चाॅंद और तारे
माँ से माँग लिए हमने,
अपनी मुट्ठी में वो सारे।
आज जब-जब भी याद बचपन को करती हूँ,
माँ-पापा की सूरत ही सामने आती रहती है॥
_______✍गीता -
ख्वाब में वो ख्वाब क्यों (विषम छन्द का एक रूप)
उपवन में फूल खिले, महक आई
सुबह सुबह की मारुत, उड़ा लाई।
याद आया वह मुझे, नलिनी फूल,
या नासिका से जुड़ी, यह है भूल।
देख अनदेखा किया, जाते रहे
ख्वाब में वो ख्वाब क्यों, आते रहे।
हम विदाई गीत यूँ, गाते रहे
चल दिये थे जो वही, भाते रहे।
एक निठुराई सी हम, पाते रहे
क्यों जुड़े उनसे मगर, नाते रहे।
आंसुओं को बस निगल, खाते रहे,
ठेस उनकी ओर से, खाते रहे।
*****
काव्यस्वरूप- विषम छन्द स्वरूप -
सत्यमार्ग पर चलना होगा
गोरी-चिट्टी, काली चमड़ी
को रगड़ रगड़ क्यों धोता है।यह सब कुछ है नश्वर है
जग में कर्मों का लेखा-जोखा होता है।कौन है गोरा कौन है काला
यह ना रखता कोई याद,अच्छे व्यवहार को ही हर कोई
रखता है याद मरने के बाद।यह कहकर ना रोता कोई
वह तो कितना गोरा था,वह अच्छा था, वह प्यारा था
ज्ञान की बातें करता था।कर्मों से ही भले-बुरे की
होती है पहचान यहाँ,जो-जो तुमने यहां किया है
भोगोगे भगवान वहां।सत्यमार्ग पर चलना होगा
सत्कर्मों को करना होगा,अपने स्वार्थ, लोभ के आगे
हे प्रज्ञा! तुझे निकलना होगा।। -
कुछ नया भाव होगा
आँख में देखना
कुछ नया भाव होगा,
धड़कते दिल में
कोई घाव होगा।
वो पुराना हो
या नया हो
मगर रख हौसले से
भरना होगा,
मुकाबला
समस्याओं से
डटकर करना होगा।
कुछ नए परिवर्तन को
एक प्रयास तुझे
करना होगा।
उबलता भाव जो भी हो
न ठंडा हो पाये
बल्कि उस भाव को लेकर
बढ़ना होगा।
भीतर ही नहीं सोखना
उत्साह को,
बल्कि मन में बुलंदी रख
कदम चलना होगा। -
राम
कविता -राम
—————-
राम तुम्हें फिर आना होगा
आओ बाण उठाना होगा
आतंकवाद से मुक्त बना
भारत को आर्यावर्त बनाना होगा
चाहे पाक के पाले आतंकी हों
चाहे जम्मू के पत्थरबाज ही हों
रोती है घर-घर सीता
आओ खत्म करो चाहे दाऊद इब्राहिम हों
राम तुम्हें आना होगा
देश की हर सीता को सुरक्षित रखना होगा
युद्ध करो भारत के घर घर रावण से
देश का शासन संभालना होगा
शबरी निषाद को गले लगाना होगा
भारत में रेपिस्ट की बाढ़ चली है
भारत में तानाशाहों की सरकार बनी है
संसद के कुर्सी पर बैठे हैं अपराधी
आओ राम –
संसद को अपराधीयों से मुक्त बनाना होगा
कोई गुंडा – कोई चोर, कोई बलात्कारी है
करके घोटाला उद्योगपति बना है
इस समस्या का हल कैसे होगा
राम तुम्हें आकर बताना होगा
मनीषा बाल्मिक का रेप हुआ था
उसके संग बड़ा अत्याचार हुआ था
शासन इतनी गंदी निकम्मी था
आधी रात को तेल से अंतिम संस्कार हुआ था
परिजन मुँह को देख न पाए बेटी का,
नेता ने राम तुम्हारे नाम पर वोट लिया
जनता को जाति धर्म में छोड़ दिया
ऐसी स्थिति में राम तुम्हें आना होगा
कोई घटना अब ना घटे
इसलिए आकर रामराज्य स्थापित करना होगा
——————————————————–
✍✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’- -
मोह छोड़ कर थप्पड़ मारो
कविता- मोह छोड़ कर थप्पड़ मारो
———————————————
मां मुझको
चलना सिखा दे,
डगमग करते पैर मेरे
अंगुली पकड़ के राह दिखा दे,
बहुत बड़ी गलती किया हूं,
सभ्यता संस्कारों को भूल गया हूं,
आदर्शों से मुंह मोड़ हूंँ,
मां!इंसान नहीं शैतान बना हूं,
तेरे हर थप्पड़ को भूल गया हूं,
आ कान पकड़कर थप्पड़ मार,
पास बैठा कर हर बात बता,
संस्कारों का मन में दीप जला,
परमारथ की बात सीखा का,
जन नायक राष्ट्र नायक,
वीर पुरुष की कथा सुना,
रोज उठकर दादा दादी का,
घर के सभी बड़े, बुजुर्गों का,
सुबह शुबह प्रणाम करने की बात सिखा,
घर का काम करूं,
खेती बाड़ी का ध्यान रखूं,
पशुओं का भी ख्याल रखूं,
कुल समाज रिश्तेदारों का सम्मान करु,
ना किसी से करूं झगड़ा,
ऐसी मुझको बात सिखा,
बड़ी नादानी कर बैठा हूं,
दारू पीकर नाली में गिर गया हूं,
हालत मेरी ऐसी है,
कुल की इज्जत धो चुका हूंँ,
मां मेरी तुम वैद्य बनो,
नशा मुक्ति की दवा बनो,
मोह छोड़कर थप्पड़ मारो,
मेरी जीवन की राह बनो
——————————
✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’- -
हिन्दू नववर्ष की नई भोर
हिंदू नव वर्ष और चैत्र नवरात्रि की,
आप सबको शुभकामनाएँ।
यही है नववर्ष हमारा,
यही जीवन में खुशियाँ लाए।
एक जनवरी को क्या हुआ,
क्या ऋतु बदली कोई?
या बदला कोई मौसम।
क्या फ़सल बदली?
या बदला कोई नक्षत्र।
पेड़ पौधों की रंगत वही थी,
चाॅंद सितारों की दिशा वही।
फ़िर भी एक जनवरी को,
हम दें नववर्ष की बधाई।
नव वर्ष के नए दिन की,
कुछ तो अलग अनुभूति हो।
चैत्र मास में नए फूल खिले हैं,
वृक्षों पर नए पल्लव मिले हैं।
हरियाली छाई चहुँ ओर,
मानो प्रकृति मना रही है,
नववर्ष की नई भोर।
वही वस्त्र दिसंबर में वही वस्त्र जनवरी में,
चैत्र मास में सर्दी जाती गर्मी आती।
मौसम बदला चैत्र मास में,
विद्यालयों में नया सत्र है चैत्र मास में,
बैंक के खातों की क्लोजिंग चैत्र मास में।
जनवरी में नया कैलेंडर आता है,
लेकिन चैत्र मास में आए नया पंचांग।
उसी के अनुसार ही,
भारतीय पर्व और विवाह आदि के मुहूर्त का,
होता है व्यवधान।
हम शुभ मुहूर्त देखकर ही करते हैं जो कार्य,
मिलती है उसमें सफ़लता बेशुमार।
चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा ही, है हमारा नया साल।
यही है हमारे लिए शुभ और बेमिसाल।
हम अपना नववर्ष मनाते देवी माँ के पूजन से।
कितनी सुन्दर है संस्कृति हमारी,
हृदय प्रसन्न है माँ के आगमन से॥
_____✍गीता -
वे बेजुबान
नवजात बच्चे
दूध पी रहे थे,
भूख उसे भी लगी थी,
दूध पिलाने में
भूख भी बहुत लगती है
दूध पिलाने में।
उर जल रहा था
आमाशय के तेजाब से,
बच्चों को छोटी सी
झाड़ीनुमा गुफा में छिपाकर
चल पड़ी वह घास चरने,
पलकें झपका कर
मासूमों से कह गई
जल्द आऊँगी।
शिकारी को पता था,
कब जानवर चरने निकलते हैं,
ऐसा ही हुआ,
थोड़ी देर में लगा
शिकारी का निशाना,
गोली लगी, गिर पड़ी वह हिरणी।
दो बच्चे झाड़ियों में
उसका इंतजार करते रह गए
धीरे धीरे सूख गए।
जाते जाते
इंसानियत को वे बेजुबान
पता नहीं क्या कह गए।