संपादक की पसंद

गौरैया

गौरैया, जाने कहाँ उड़ गई तुम अपने मखमली परों में बाँध के वो सुबहें, जो शुरू होती थी तुम्हारी चहचहाहटों के साथ और वो शामें, जब आकाश आच्छादित होता था तुम्हारे घोसलों में लौटने की आतुरता से…!! वो छत पर रखा मिट्टी का कटोरा सूखा पड़ा है न जाने कब से… आँगन में नहीं बिखेरे जाते अब पूजा की थाली के बचे हुए चावल…!! एक मुद्दत से नहीं देखा मैंने तुम्हें अपना नीड़ बुनते… और तुम्हारा अपने ब... »

सलामी कुबूल हो

बाजार में प्रविष्ट करते ही छोटे-छोटे बच्चे पीछे लग जाते थे, बाबू जी दे दो, माताजी दे दो, भैया जी दे दो, दीदी जी दे दो। स्कूल का समय होता लेकिन वे माँग रहे होते। पेट की खातिर हाथ फैला रहे होते। तभी युवा अजय ओली की स्नेहिल नजर पड़ी उन पर, मानवता की भावी पीढ़ी भीख मांग रही थी इस कदर। पर्वतीय बाजार में छोटे बच्चे ठंड में भूखे प्यासे, नंगे पैर दौड़ रहे थे मांगने के लिए राहगीरों के पीछे-पीछे दृश्य दयनीय था... »

चादर जितने पांव पसारो

अभिलाषा और ईर्श्या में, रात-दिन सा अंतर जानो तुम। अभिलाषा मजबूत रखो, ईर्श्या से दिल ना जलाओ तुम।। चादर जितने पांव पसारो, पांव अपने ना कटाओ तुम।। अपनी मेहनत से चांद पकड़ो, उसे नीचे ना गिराओ तुम। “उनके घर में नई कार है, मेरा स्कूटर बिल्कुल बेकार है”। “एयर कंडीशंड घर है उनका, अपना कूलर, पंखा भंगार है”।। “उनका घर माॅर्डन स्टाईल का, अपना पुराना खंडहर सा है”। “व... »

आकाश

बिम्ब बनाना चाहता हूँ तेरा आकाश, मगर कहाँ से शुरू करूँ सोच रहा विश्वास। सोच रहा विश्वास, इस कदर विस्तृत है तू आदि अंत का नहीं पता बस विस्तृत है तू। कहे लेखनी भानु, चमकता जीवनदायी, चंदा-तारे, नखत, सभी ने छवि बिखरायी। »

ख़ामोशी का हलाहल

ख़ामोशी की तह में, छिपा कर रखते हैं हम, अपने सारे ग़म। क्योंकि कर के कोलाहल, दिखाकर दुःख दर्द अपने नहीं मिटेंगे अन्धेरे ज़िन्दगी के। पीना ही पड़ता है, ख़ामोशी का हलाहल ज़िन्दगी के कुछ उजालों के लिए ।। _____✍️गीता »

मेहनतकश की जिन्दगी

वो दिन भर मेहनत करते हैं, रात को सड़कों पर शयन करते हैं। ऊपर से पाला पड़ता है, नीचे से शीत लगती है, मेहनतकश की जिंदगी, कठिन गीत लिखती है। सपने में गुनगुनाता है, रोकर मुस्कुराता है, पैर खुले रख मुंह ढकता है मुँह खुला रख पैर छुपाता है, मच्छर गीत सुनाता है, मच्छर के चक्कर में खुद के कान में चपत लगाता है, मच्छर के चुभाए शूल में भी मेहनत की नींद सोते हैं। कभी हँसते कभी रोते हैं, थकान की नींद सोते हैं। »

अंतर्द्वन्द्व

जीवन यापन के लिए बहुधा व्यक्ति को वो सब कुछ करना पड़ता है , जिसे उसकी आत्मा सही नहीं समझती, सही नहीं मानती । फिर भी भौतिक प्रगति की दौड़ में स्वयं के विरुद्ध अनैतिक कार्य करते हुए आर्थिक प्रगति प्राप्त करने हेतु अनेक प्रयत्न करता है और भौतिक समृद्धि प्राप्त भी कर लेता है , परन्तु उसकी आत्मा अशांत हो जाती है। इसका परिणाम स्वयं का स्वयम से विरोध , निज से निज का द्वंद्व।  विरोध यदि बाहर से हो तो व्यक्त... »

रंग के त्यौहार में

ऐसी सुना दे पंक्तियाँ जो मधुर रस सींच दें, रंग के त्यौहार में रंगीनियों को सींच दें। अश्क सारे सूख जायें होंठ गीले से रहें, नैन में काजल लगा हो खूब नीले से लगें। गाल पंखुड़ियां गुलाबी लाल हो अधरों में रंग देख कर के लालिमा भी आज रह जायेगी दंग। चाँद चमका हो मस्तक में और दस्तक हो दिलों में भर तेरे रंगों को खुद में आज फूलों सा खिलूँ मैं। प्रेम पिचकारी भरी हो मारकर बंदूक सी फिर उठे थोड़ी सी सिहरन ठंड सी ... »

करो परिश्रम ——

करो परिश्रम कठिनाई से, जब तक पास तुम्हारे तन है । लहरों से तुम हार मत मानो, ये बात सीखो त जब मँक्षियारा नाव चलाता, विचलित नहीं होता वह विपरित धाराओं से । लाख सुनामी चक्रवात बबंडर से टकराकर वह लक्षय को भेद जाता है । आखिर गगन की जयघोष की नारा से उसकी आँखें नम जाता है ।।1।। ————————————————– निरन्तर,... »

ज़िन्दगी की राहें

ज़िन्दगी की राहें, सदा कुछ सिखाती ही जाएँ। कुछ लोग हाथ पकड़ कर, काम निकाल, छोड़ दें झटक कर। पकड़ कर राह सच्चाई की, कुछ निभाएँ साथ भी। रंग-बिरंगी दुनिया है यह, रंग सभी दिखलाते हैं कुछ पक्के कुछ कच्चे रंग। यहां-वहां दिख ही जाते हैं।। ______✍️गीता »

कठपुतली

कठपुतली तो देखी होगी ना…. हाँ, वही काठ की गुड़िया। जिसकी डोर रहती है सूत्रधार के हाथों में, वह अपनी उँगलियों से जैसे चाहे, उसे नचाता है…. दर्शकों को भी आनन्द आता है। लगता है कि उसमें जान है, लेकिन, कहां…. वह तो बिल्कुल बेजान है। नाचती रहती है सूत्रधार के इशारों पर केवल। इशारों पर नाचोगे, तो नचाएगा यह जमाना… हे प्रभु, कभी किसी को किसी की कठपुतली न बनाना।। _______✍️गीता »

भोजपुरी देश भक्ति होली गीत – पिया तू फगुनवा मे

भोजपुरी देशभक्ति होली गीत – पिया तू फगुनवा मे | काहे नाही आईला पिया तू फगुनवा मे | मनवा लागे नाही ना पिया मोर फगुनवा मे | तू त हउआ फौजी सिमवा ललकारेला | देश दुशमनवा के चुनी चुनी मारेला | पिया केकरा संगवा ना खेलब होली अंगनवा मे | मनवा लागे नाही ना पिया मोर फगुनवा मे | सुनी के दहाड़ तोहार बैरी सियार जस कापेंले | पार नाही पावे तोहसे आपन जान लेके भांगेले | हमके गुमान तोहरो रहे डर दुशमनवा मे | मनवा लागे... »

मन की आशाएँ

राशिफल पढ़ते रहे हम उम्र भर खुद ब खुद कुछ भी नहीं हो पाया है, जो मिला मेहनत का फल था दोस्तो !! बिन किये कुछ भी नहीं हो पाया है। मन की आशाएँ धरी ही रह गईं, जिस तरफ प्रयास हो पाया नहीं, कर्म के फल से अधिक देना कभी भाग्य की रेखा को भाया ही नहीं। दे स्वयं की भावना को नेक स्वर चार शब्दों को किया अंकित सदा गम उठा लिपिबद्ध करते ही रहे दूसरे का गीत गाया ही नहीं। »

बिन कहे बात बताकर आये

सामने बोल भी नहीं पाये आँख हम खोल भी नहीं पाये था वजन बात में भरा कितना उसको हम तोल भी नहीं पाये। आँख चुँधिया गई थी जब अपनी धूल औरों में झोंक कर आये, गा चुके गीत जब थे वे अपने तब कहीं फाग हम सुना आये। उनकी कोशिश थी जल छिड़कने की उस जगह आग हम लगा आये, साफ कालीन-दन बिछाए थे, उनमें नौ दाग लगाकर आये। जितनी शंका भरी थी उनके मन सारी हम दूर भागकर आये, तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं बिन कहे बात बताकर आये । व... »

सादगी भाती है

गरम चाय पीने से ताजगी आती है, तुम्हारे व्यक्तित्व की सादगी भाती है। सवेरा भी जरूर होता है राह दिखाने को अंधेरा भी मिटता है, रात भी जाती है। मेहनत का फल जरूर मिलता है, ऊँची सफलता हाथ भी आती है। धरती में अर्जित धन यहीं रह जाता है, अच्छाई- बुराई तो साथ भी जाती है। तुम्हारे जाने के बाद भुला नहीं देते हम कभी कभी तो याद भी आती है। »

कैसे जिया जाए जीवन ??

कैसे जिया जाए यह जीवन नीरस-नीरस लगता जीवन | बह जाती है सांस कहीं तो बह जाती है धड़कन | रूठ जाएं कभी सारे अपने बन जाएं कभी गैर भी अपने | उपजे मन में बछोह के बादल बरसे आंसू बन नैनन | कैसे जिया जाए जीवन?? कैसे हो जीवन पावन ?? »

°°° मैं तुम्हें फिर मिलूंगी…..

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी किसी टूटे दिल के अनगिनत टुकड़ो में, किसी गरीब की फटी हुई झोली की सच्चाई में, एक कटी पतंग की बेसहारा होती उम्मीदों में मैं तुम्हें फिर मिलूंगी…. कांच के उन टुकड़ों में जिसमें मेरा अक्श देखकर तुमने तोड़ दिया होगा मैं तुम्हें फिर मिलूंगी… बेसहारा होते पंछियों के छूटते घरौंदों में, बेपरवाह आशिक की बेशर्म हरकतों में मेरी जुल्फों के जैसी घनघोर घटाओं में मैं तुम्हें फि... »

°°°विश्वसनीयता…..

विश्वसनीयता *************** आज डायरी के अथाह पन्ने पलटने के बाद मिला मुझे एक ऐसा शब्द जिसके मायने ढूंढने, समझने और समझाने में जमाने गुजर गये विश्वसनीयता’ क्या है ?? किसमें है ?? किस पर है ?? किसको है ?? इन चार सवालों के जवाब ढूंढने के लिए अनगिनत वेब पेज पलट डाले पर उसका जवाब तो हमें अपने रिश्ते में मिला जो सालों पहले टूट चुका था !! »

गुत्थियां

कुछ भ्रांतियां ऐसी जो, हास्यास्पदसी लगती हैं कहावतें भी जीवन का, प्रतिनिधित्व करती हैं ज़मीं पे गिरी मिठाई को, उठाकर नहीं खाना है वो बोले मिट्टी की काया, मिट्टी में मिल जाना है बंदे खाली हाथ आए थे खाली हाथ ही जाएंगे फिर बेईमानी की कमाई, साथ कैसे ले जाएंगे रात दिन दौलत, कमाने में ही जीवन बिताते हैं वो मेहनत की कमाई झूठी मोह माया बताते हैं पति-पत्नी का जोड़ा, जन्म-जन्मांतर बताते हैं फिर क्यों आये दि... »

मुस्कान आपकी

मुस्कान आपकी खिले फूल जैसी, भुलाने सक्षम है गम हमारे। वाणी में इतना मीठा भरा है, विरोधी भी हो जाते हैं तुम्हारे। चमकता हुआ बल्ब बोलूँ न बोलूँ, मगर इस अंधेरे में हो तुम दुलारे। निराशा के कुएं में पड़ने लगे थे मगर तुमने आकर किये नौ सहारे। »

अब ना ढूंढना कभी……..!!

अब ना ढूंढना कभी मुझे मन के उजालों में अंधकार की ओर बस एक कदम बढ़ा लेना बिखरें हों जहाँ कंटक बेशुमार बस वही पर मेरा निशान मिलेगा… अब ना ढूंढना कभी मोतियों की चादर में धूप की लड़ियों में याद आए तो खोज लेना… स्वप्न में आऊंगी तुम्हारे तुम्हारी पलकों के द्वार खट-खटा कर कहूँगी तुमसे अब ना ढूंढना कभी…………!! »

धर्म आंतरिक जागृति है

धर्म आंतरिक जागृति है संवेदना का अहसास है अंतर्मन अगर साफ है मजहब हमेशा पास है शांति संदेश के लिए समूह प्रेम का एकल स्वतंत्र विचार है जीवन सरल सीमित सबका भंडारण के लिए आचार है ईश्वर से पा पा जीवन भर देना जिसको आ जाता है जीना उसी का सार्थक हुआ जी ना अपनों से चुराता है धर्म श्रेष्ठ जो प्रेम सिखाए सहयोग राह पर हमें चलाए संगठन का नित पाठ पढ़ाए सहृदय बना देश रक्षा कराये सर्वहित के लिए हमे जोड़े कर्मठ ब... »

शिशु सुधार की चाह

शिशु सुधार की चाह में रहते हर जन खुद चाहे रहा बिकर्षित उनका जीवन ब्यर्थ चिंतित हो उल्झाता जन निज मन धरा अवतरण हेतु सबका अपना कारण स्वभाव अलग हो सबका यह है संभव प्यास हरता सबका पर वही शीतल जल प्यार बिना सूना है पर सबका मधुबन प्यार‌ से ही बनता है सरल हर संसाधन।।।। संतान से चाह है मात-पिता की भूल मांग बन जाती नन्हीं सी ह्रदय की शूल अम्बर का परिचय सच उन्हें कराना है क्षितिज तक उन्हें किंतु स्वयं ही जा... »

नदिया बहती है

कल कल कल कल नदिया बहती है, साफ स्वच्छ है पानी, जी करता है खूब नहा लूँ, मगर डर रही है रानी, मन की रानी का डरना मेरे मन में करता हैरानी। पूछा तो कहती है वो क्यों करते हो इतनी नादानी मौसम बदल गया है लेकिन अभी भी है ठंडा पानी। भरी दोपहर भी गर होती तब भी थोड़ा कहते हम, मगर सुबह में ठंड बहुत है छींटे से धो डालो गम। »

उनके बिन

मिला हुआ प्रेम खोना मत दिल मेरे जोर से तू रोना मत शूल चुभ जायें उनकी राहों में ऐसे बीजों को आज बोना मत। अब पता खुद का तू बदल लेना ताकि पाऊं नहीं मैं उनका खत, खुद की नजरों में गिर पडूँ चाहे खोज लूँ खो गई स्वयं इज्जत। आ रही नींद को रोकूँ कैसे उनके बिन अश्क को सोखूँ कैसे, शूल गमले में दिल के उग आये फूल रंगीन मैं रोपूं कैसे हो सके तो कभी भी आ जाना बैठ पलकों में मन लुभा जाना दो घड़ी देख कर के खिल जाऊं, ... »

जी लो, जब तक जीवन है

पापा प्लीज फीस जमा करादो छड़ी की मार सहपाठियों में अपमान अब सहन नहीं होता।। मम्मी आज टिफिन में ठंडी रोटी पे नमक-मिर्च पानी लगा मत देना, निरीक्षण है स्कूल में गर्म पंरांठा रख देना।। एक शर्ट नयी साड़ी जुगाड़ कर लेते आना, चिंदिया लगे कपड़ों में अब छेद दिखने लगे हैं।। भाग्यवान तुम भी ना बच्चों सी बातें ना करो, आज की महंगाई में बस जी सको उतनी बात करो।। »

कविता : गांधी के सपनों का ,उड़ता नित्य उपहास है ..

वही पालकी देश की जनता वही कहार है लोकतन्त्र के नाम पर बदले सिर्फ सवार हैं राज है सिर्फ अंधेरों का उजालों को वनवास है यहाँ तो गांधी के सपनों का उड़ता नित्य उपहास है || महफ़िल है इन्सानों की , निर्णायक शैतान है प्रश्न ,पहेली ,उलझन सब हैं गुम तो सिर्फ समाधान है वही पालकी देश की जनता वही कहार है लोकतन्त्र के नाम पर बदले सिर्फ सवार हैं || राजनीति की हैं प्रदूषित गलियां खरपतवारों की पोर है गूंज उठा धुन दल... »

याद रहे जन दर्द

सत्ता में जाकर जिसे, याद रहे जन दर्द, वही मिटा सकता यहाँ, धूल और सब गर्द, धूल और सब गर्द, पड़ी हो जो विकास में, पहले वो हो साफ, रिआया इसी आस में, कहे लेखनी सोई, रैयत बिछा के गत्ता, नजरे इनायत कर, ले उस ओर ओ सत्ता। »

भारतीय साहित्य:-“संवेदना के अनुकूल”

तुम क्यों कहते हो मुझे कवयित्री हूँ मैं टूटा-फूटा राग हूँ और जोगन हूँ मैं जैसे मीरा लिखती रही भक्ति के पद रोज वैसे मैं लिखती हूँ सदा विरहाग्नि को कर जोड़ विरहाग्नि को कर जोड़ सदा लिखती रहती हूँ भावों की ज्वाला में सदा तपती रहती हूँ मेरी कविता का सदा भाव’ रहेगा मूल अपसारी चिंतन प्रकृति है संवेदना के अनुकूल… »

तू मानव है कुछ सोच रहा।

तू निर्मल है तू निर्भय है , क्या बैठ यहाँ तू सोच रहा। विधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।। ये जीवन है जीते हैं सब, कुछ लोग यहाँ रोते रोते इसमे भाग्य का दोष नही, ये मानव है सोते सोते सब अपनी करनी भोग रहे, तू इनको क्या अब देख रहा विधि में तेरे लिखा क्या है, तू मानव है कुछ सोच रहा।। नम आंखों को तू पोछ जरा , जीवन का अब सम्मान तू कर उठ कर अपने पैरों पर तु, इस दुनिया पर एहसान तू कर। तेरे... »

“किसान और श्रमिक की व्यथा”

कैसे बन्धु ? कैसे रिश्ते ? कैसा यह संसार कैसा जीवनसाथी भाई ? स्वार्थ पड़े तब प्यार स्वार्थ पड़े तब प्यार किया है यहाँ सभी ने बैरी भी घूमे बन मीत दिल की प्रेम गली में विपदा आई नहीं किसी ने मुझे सम्भाला मैंने स्वेद बहाकर कितने घरों को सम्भाला ना सरकार हमारी ना दो गज जमीं हमारी अपने स्वेद से सींचकर मैंने फसल उगा ली… »

“शिवरात्रि का भोर”

शिवरात्रि का भोर भोर जीवन में लाया भाँग- धतूरा चढ़ा के मैंने शिव को मनाया शिव-शंभू हे नाथ ! अरज मेरी सुन लीजे मेरे श्याम की राधा केवल मुझको कीजे मुझको कीजे नाथ बड़ा उपकार रहेगा प्रज्ञा’ का सर्वस्व तुम्हारा सदा रहेगा जो ना पाई श्याम ! नाम ना लूंगी तेरा मेरे तन-मन में श्याम कि यह मन जोगन मेरा भूल के भोलेनाथ ना मुझको रुसवा करना चरणों में तेरे, मन में है श्याम के रहना पूरी कर दी जो अभिलाषा तेरे ... »

शिव रात्रि,उमा महादेव के विवाह की वर्ष गांठ

हर ओर सत्यम शिवम सुंदरम, हर हृदय में हर-हर हैं। गरल कंठ में धारण कर, वो सरल भोले शंकर हैं व्याघ्र खाल तन पर लपेटे, भस्म-भभूत ललाट पर लगाए डम-डम डमरू बाजे जिनका, वो गिरीश गंगाधर हैं। कर में जिनके त्रिशूल साजे, वाम अंग “मां”गौरी विराजें शिरोधरा में विचरें भुजंग वो आशुतोष,शिव शंभू शंकर, वो विश्वनाथ वो नीलकंठ, पीड़ा का सबकी कर दें अंत। चंद्र शिखर पर धारण करते, वो चंद्रशेखर वो महादेव, कैलाश... »

कहीं आग कहीं पानी

बहुत हो चुकी नफरत की आग जल रहे हैं दिल के जंगल मुहोब्बत कर चुके हैं खाक, अब नहीं रही वैसी धाक जो एक नजर पर चुरा ले जाती थी दिल, अब तो नजरें मिला पाना भी हो गया है मुश्किल, क्योंकि सच सामने आते ही रिश्तों की बुनियाद जाती है हिल। कहीं आग है कहीं पानी है, फिर भी न बुझा पाये तो हमारी नादानी है। »

कोई तो है पास

स्याह काली रात किस तरह हो सितारों से मतलब की बात, कुंडली में अंकित ग्रह नक्षत्र, दिख रहे आकाश में, मगर भाग्य है अवकाश में, फिर भी हूँ आस में, क्योंकि कोई तो है पास में। »

कि तुम याद आ गयी

आज सोच रहा था कोई कविता लिखू पर कैसे ये सोच ही रहा था की तुम याद आ गयी नयन अदृश्य कामना में लीन हो गए वो संसय वो समपर्ण वो अभिधान(नाम) सब कुछ तो शायद मैं भूल ही गया कि तुम याद आ गयी इस मनः स्थिति की दशा एक भ्रमर की भांति है जो गुन गुन तो करता पर उड़ता नहीं है स्वप्न का आदर्श निश्चय ही एक प्रतीक बन गया तो क्या अब सब कुछ निश्चित हो गया ये सोच ही रहा था कि कि तुम याद आ गयी मन तो अब खुद पर भी व्यंग करत... »

हो गया है उजाला

हो गया है उजाला अब मुझे भान हुआ जब खुली आँख तब सुबह का ज्ञान हुआ। इन चहकते हुए उड़गनों ने बताया, जाग जा अब तो तूने अंधेरा है बिताया, हो गई है सुबह साफ कर तन वदन दूर आलस भगा ले कर्मपथ पर लगा मन। रात भर स्वप्न देखे अब उन्हें कर ले पूरा इस तरह काम कर ले रहे मत कुछ अधूरा। »

ले गए याद सभी

अंधेरे का गीत लिखूं या सुबह की आस लिखूं नींद आ-जा रही है, और कुछ खास लिखूं। स्वप्न हैं पास खड़े इंतजार करते हैं, बन्द आँखों में ही, वे राज करते हैं। बात गम की भी न थी, साख कम भी न थी, फिर भी मुड़कर के देखा आंख नम भी तो न थी। हम तो कहते ही रहे बैठो जाओ न अभी, मगर वो खुद तो गए ले गए याद सभी। »

पतझर

आंखे तेरी सब कह देती है हाले दिल बयां कर जाती है जो कह नही पाते हो जुबान से वही दर्द वो चुपके से बता जाती है संगी बिन जीना कितना मुश्किल दिल का आर्तनाद सुना जाती है जो प्यार तुम जीवन भर बता ना सके उसी प्रीत की चुगली कर जाती है… उसने जताया पल-पल प्रेम, मांग दुआ, व्रत-उपवास रख वो भी जुबान से कुछ ना कहती थी…. वो जीवित है भीतर तेरे, चलती है श्र्वासो की तरह, यह तेरे अश्रुरहित भीगे नयन, गूंज... »

“दीपक और पतंगा”

पतंगे की कहानी:- ********************** शाम हुई लेकर तम को अपने संग आई, नहीं दिखा कुछ भी मुझको तो माचिस ले आई. जला दिया और गुनगुन करके गीत सुनाया तभी उधर से उड़कर एक पतंगा आया दीपक बोला:- मत जल तू मुझसे बस थोड़ा दूर चला जा पतंगे ने कहा:- परवाना हूँ मैं, तू मेरे आगोश में आ जा तू मेरी लौ में जल करके मर जाएगा ना पगले ! ये दीवाना तुझ बिन मर जाएगा तेरी लौ में जलने का भी तो एक मजा है महबूब को पाकर खो दे... »

Happy International Women’s Day

Happy International Women’s Day नारी हर घर की शान होती हैं, आज के युग में तो नारी घर के साथ साथ सभी क्षेत्रों में अपना स्थान बना चुकी हैं। महिला समाज एवं परिवार का मुख्य आधार होती हैं। महिलाएं समाज को सभ्य बनाने से लेकर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आज महिलाओं ने खुद को हर क्षेत्र में साबित किया है। इंसान के वजूद के लिए आसमान का होना बेहद ज़रूरी है, इसी से हमें बारिश मिलती है... »

पानी तूने धो दिये

पानी तूने धो दिये, बड़े बड़ों के दाग, तब भी हो पाया नहीं, मेरा मन बेदाग, मेरा मन बेदाग, नहीं कुछ साफ भाव हैं, जूते भीतर कीच, सने गंदले पांव हैं, कहे लेखनी खूब, रही कवि की नादानी, जहां दाग थे वहाँ, नहीं पहुँचाया पानी। »

“नारी का सम्मान”

💞Women’s Day Special poetry💞 ************************************ महिलाओं की बात निराली, माँ, भगिनी हो या घरवाली …. इनसे ही संसार बसा है दिल में प्रेम अपार छुपा है…. सुंदर सबका रूप सजीला परिधान है इनका रंग-रंगीला…. ये होती हैं दिल की अच्छी हाँ, थोड़ा-सा गुस्सा करती…. सबको अपना प्यार दिखाती रिश्तों को भी खूब निभाती….. हर मैदान फते कर जाती पुरुषों को पीछे कर जाती&... »

सुनो वनिता

संसार द्वारा रचित तुम्हारी महानता के प्रतिमान वास्तव में षड्यंत्र हैं तुम्हारे विरुद्ध…!! तुम सदा उलझी रही स्वयं को उन प्रतिमानों के अनुरूप ढालने में और वंचित रही अपने सुखों से..!! सुनो वनिता! जब तक तुम अनभिज्ञ हो इस तथ्य से कि “तुम्हारा सुख तुम्हारी महानता में नहीं वरन तुम्हारे साधारण होने में है”… तब तक ये सृष्टि हो नहीं सकेगी तुम्हारे योग्य…!! ©अनु उर्मिल ‘अन... »

वह नारी है

होली के रंगों सी मुस्कुराए, दीवाली के दीपों सी जगमगाए, बेटी बनकर घर महकाती है, बहन बनकर लुटाती है स्नेह बनकर वनिता और वधू दूजे का घर अपनाती है। प्रयत्न करती है,सबको सुख देने का, प्रेम से उस घर को अपना बनाती है। दे कर जन्म इन्सान को, उसे इन्सानियत सिखाती है। प्रभु की नेमत है वह, रचती सृष्टि सारी है, ज़रा से प्यार के बदले, सर्वस्व लुटा दे, वह नारी है।। ______✍️गीता *अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्द... »

पदर माझ्या माईचा

माझ्यासाठी तो राब राबतोया , अन् उन्हातात तो खपतोया , काट्याकुट्यात ही झटतोया , असा पदर माझ्या माईचा…. जीव तीचा तुट तुट तुटतोया , आपल्या लेकरासाठी तो रडतोया , स्वताःच्या सुखालेही गाडतोया असा पदर माझ्या माईचा … दुःखाच्या डोंगरांना पाडतोया , काटे रस्तातले माझ्या झाडतोया , संकटालाही तो नडतोया , असा पदर माझ्या माईचा…. सावली मस्तकी माझ्या धरतोया , जीवनातील व्यथा दुर करतोया , माझ्यासाठी... »

नारी तू ही शक्ति है (महिला दिवस पर विशेष)

नारी तू कमजोर नहीं, तुझमें अलोकिक शक्ति है, भूमण्डल पर तुमसे ही, जीवों की होती उत्पत्ति है। प्रकृति की अनमोल मूरत, तू देवी जैसी लगती है, परिवार तुझी से है नारी, तू दिलमें ममता रखती है।। म से “ममता”, हि से “हिम्मत” ला से तू “लावा” है, महिला का इतिहास भी, हिम्मत बढ़ाने वाला है। ठान ले तो पर्वत हिला दे, विश्वास नहीं ये दावा है, हिम्मत करे तो दरिंदों की, जान का भी ल... »

बोलूँ कैसे बात

चुप रहना आता नहीं, बोलूँ कैसे बात, चावल पककर बन गया, गीला गीला भात, गीला गीला भात, हर तरफ पानी पानी, सूखे सूखे होंठ, और मन में नादानी, कहे लेखनी बात समझ मन तू जा अब छुप, कर अनदेखी आज बोल मत हो जा तू चुप। »

अमृत कलश

स्वर्णिम किरणों के रेशमी तार मन सबके मनके जैसे वो हार कितना उसको है मुझसे लाड़ सुर संगीत लिए आता सबके द्वार सुनते हैं ऊज्ज्वलता का श्रोत वहीं श्रृष्टि की सुन्दरता का‌ वो ही रथी बल बुद्धि ज्ञान का भंडार सही तभी तो अहंकार का लेश नहीं दिनकर दरस को न तरसे कभी इतनी ही आकांक्षा ईश से है अमृत कलश तूं अमर रहे यही इतनी प्रार्थना जगदीश से है »

यश

यूं ही नहीं मिलता किसी का साथ ये तो जन्मों जन्मों की अधूरी आश खेल कूद कर संगी साथी के संग खबर न हुई कब बड़े हो गए कीमती उनकी यादों के तार ने सूने पल के गुजरने का सहारा बने वक्त के साथ यादों पर धूल जमी कभी हमी हतास कभी उनकी कमी भूल कर प्रीत को जब आगे बढ़े खूबसूरत अहसास थे पर में पड़े साथ बचपन की महक थी कहीं दबी दूब को नमी मिलते ही वो चल पड़ी मीठी सी आस है फिर तेरी प्यास है शैशव में थे अकेले अब पूरी... »

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