Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • अबके होली, हो ली रे

    मैय्या मुझको हबीब गुलाल,
    रंग भरी पिचकारी दिला दे।
    होली के अवसर पर मैय्या,
    मुझे मेरी राधे से मिला दे।।

    सखाओं संग झुंड बनाकर,
    होली खेलने जाऊंगा।
    पहले सखाओं फिर राधे को,
    रंगों से खूब निहलाऊंगा।।

    नहीं लल्ला इस होली पे,
    सरकारी फरमान आया है।
    कोरोना सड़कों पर घूम रहा,
    वो मौत का सामान लाया है।।

    भीड़ से संक्रमण फैल रहा,
    यही संदेशा आया है।
    इस होली घर ही रह लल्ला,
    यही पैगाम आया है।।

    फिर मैय्या नन्दबाबा से कहकर,
    अपने गांव में चुनाव करा दे।
    या फिर दिल्ली बोर्डर जैसा,
    किसानों सा आंदोलन करा दे।।

    चुनाव, आंदोलन की भीड़ में मैय्या,
    कोरोना फटक भी नहीं पा रहा।
    चाहे तो मैय्या राधे संग मेरा,
    पश्चिम बंगाल का टिकट करा दे।।

    मैय्या मुझको हबीब गुलाल,
    रंग भरी पिचकारी दिला दे।
    होली के अवसर पर मैय्या,
    मुझे मेरी राधे से मिला दे।।

  • सात रंग के कलश

    सात रंग के कलश भरे हैं,
    अबीर उड़ रहे हैं पवन में l
    राहें भी रंगीन हुई है,
    जब से आप बसे हो मन में l
    सुर्ख पलाश का केसरिया पानी
    बरसाऊंगी प्रीतम तुम पर,
    बचने के लिए बना लो,
    तुम चाहे कोई कहानी l
    पीत, हरित गुलाबी नीला,
    केसरिया और लाल
    सात रंग के,
    अबीर का लेकर आई थाल l
    आज राह नहीं बचने की,
    रंगे तो जाओगे हर हाल
    रंग है सभी पक्के,मेरे पास
    हर रंग के गुलाल हैं l
    जी भर कर खेलेंगे होली,
    कोई न रोके,..किसकी मजाल है l
    पानी में केसर घुली,चंदन महके अंग
    ना जाने कब रंग गया फागुन सारे रंग
    अकस्मात् मत तोड़ना संयम के प्रतिबंध,
    आज धवल वसन भी भीगेंगे सतरंग
    हृदय पलाश सा हो गया है,
    तन यह हुआ है रोली
    बज उठी खु़शियों की तरंग,
    आओ मिलकर खेलें होली॥
    _____✍गीता

  • रंग दो मुझको साॅंवरिया

    होली में मिलें कई रंग,
    रंग दो मुझको साॅंवरिया
    लाल, गुलाबी प्रेम रंग है,
    हो गई मैं तो बावरिया,
    रंग दो मुझको साॅंवरिया l
    हरा रंग खुशहाली का रंग,
    हरे रंग से खेल मेरे संग
    रंग दो आकर मोहे हरे रंग में सांवरिया l
    पीत, नारंगी रौशनी बरसाए,
    रौशनी की बनूं किरण
    रंग दो मोहे पीले रंग l
    सात रंग के इंद्रधनुष सा,
    रंग बिखेरो साॅंवरिया
    प्रीत में तेरी हो गई मैं तो बावरिया l
    आई है होली खूब खेलेंगे हम-तुम,
    पिचकारी ना मारना, मोहे भीगने से डर लागे l
    टूटें ना कभी भी प्रेम के ये धागे l
    सात रंग में, होली पर
    रंग दो मोहे साॅंवरिया॥
    _____✍गीता

  • किसी को दुःख न मिले

    सब पायें नवरंग
    किसी को दुख न मिले भगवान।
    भरपेट भोजन, वसन ढका तन,
    आस चढ़े परवान।
    किसी को दुःख न मिले भगवान।
    जीवन सबका खुशियों भरा हो
    सूखे न मन कोई,
    हरा ही हरा हो,
    खूब उगें धन-धान।
    किसी को दुख न मिले भगवान।
    समरसता हो
    लोगों के भीतर,
    भेदभाव सब दूर रहे
    मानव एक समान।
    किसी को दुख न मिले भगवान।
    सब राजा हैं
    सब प्रजा हैं
    कोई न समझे मालिक खुद को
    सब हैं यहाँ मेहमान।
    किसी को दुःख न मिले भगवान।
    सब पायें नवरंग
    किसी को दुःख न मिले भगवान।

  • बह रही प्यार की सरिता

    बह रही प्यार की सरिता
    कहे मन लिख डालूँ एक कविता
    सारा नेह निचोड़ दूँ इसमें
    खिल जाये सुन वनिता ।
    डोर हमारी और तुम्हारी
    मजबूती से बंधी रहे यह
    गीत उगें बस, नेह भरे ही,
    राग भरे हों ललिता।
    लिख डालूँ एक कविता।
    प्यार की बह जाये सरिता।
    सुर में सुर और ताल मिलाकर
    मन के भीतर प्रेम बसाकर
    उमंग का मृदङ्ग
    खूब बजाकर,
    लिख डालूँ एक कविता।

  • होली स्पेशल पोएट्री:- कब आएंगे श्याम

    होली की धूम मची
    कान्हा की खातिर राधा सजी
    बैठी नैन बिछाकर
    होंठों पर रंग लगाकर
    श्याम के रंग में रंग जाऊं
    बन जाऊं मैं चाँद
    पुष्पों के संग खेलकर
    कब आएंगे श्याम ?
    कब आएंगे श्याम ?
    बैठकर बाट निहारूं
    चित खोकर गोपाल
    हाय ! तेरी बाट निहारूं
    रंग दे ऐसे रंग में
    जो ना उतरे जीवनपर्यन्त
    अब तो आ जा सांवरे
    सब्र का होता अंत…

  • रंगभरी एकादशी की बधाई

    फूलों और गुलाल के रंग,
    लेकर आए बधाई संग l
    लगा लो रोली,
    बाॅंध के मौली
    आने को है रंग बिरंगी होली l
    रंगभरी एकादशी की,
    आज सबको है बधाई l
    अबीर और पिचकारी लेकर,
    रंग रंगीली होली आई
    मौसम भी हुआ मस्ताना,
    लिखूॅं कविता गाऊॅं गाना l
    होली पर तुम भी आ जाना
    ना करना अब कोई बहाना
    बहाने अब कोई नहीं चलेंगे l
    होली में होली खेलेंगे॥
    _____✍गीता

  • हँसी के फूल खिला दे

    होली में फूल खिला दे
    हँसी के, होली में फूल खिला दे।
    प्यारे-प्यारे रंग-बिरंगे
    फूल ही फूल खिला दे। हँसी के—
    ढंग-बेढंदी हुई जिंदगानी,
    होली में ढंग दिला दे।
    हँसी के होली में फूल खिला दे।
    फैली निराशा जिनके पथ में
    आस की ज्योति जगा दे।
    हँसी के होली में फूल खिला दे।
    हारे-थके जो व्यथित पड़े हैं
    उनमें जोश जगा दे।
    हँसी के, होली में फूल खिला दे।
    बिछुड़ गए हैं जिनके प्रियतम
    होली में आज मिला दे।
    हँसी के, होली में फूल खिला दे।

  • बिखर रही है लाल अरुणिमा

    छवि तेरी मन भाये
    सुबह सब ओर मनोहर कोमल सी,
    बिखर रही है लाल अरुणिमा
    मिहिका बिखरी मुक्ता सी।
    जागूँ देखूँ स्वच्छ सुबह को
    त्याग अवस्था सुप्ता सी।
    तेरी मन भाये सुबह
    सब मनोहर कोमल सी।
    छवि तेरी मन भाये सुबह।
    चहक रहे हैं खगवृन्द धुन में
    महक रहे हैं पुष्प आँगन में
    बिखर रही हैं भानु की किरणें
    साफ, मनोहर, कोमल सी।
    छवि तेरी मन भाये
    मनोहर कोमल सी।
    नोट – प्राकृतिक सौंदर्य पर लिखने का एक प्रयास।

  • Kht pyar bhra

    ख़त कोई प्यार भरा लिख देना
    मशवरा लिखना दुआ लिख देना

    कोई दीवार-ए-शिकस्ता ही सही
    उस पे तुम नाम मिरा लिख देना

    कितना सादा था वो इम्काँ का नशा
    एक झोंके को हवा लिख देना

    कुछ तो आकाश में तस्वीर सा है
    मुस्कुरा दे तो ख़ुदा लिख देना

    बर्ग-ए-आख़िर ने कहा लहरा के
    मुझे मौसम की अना लिख देना

    हाथ लहराना हवा में उस का
    और पैग़ाम-ए-हिना लिख देना

  • सुन्दर तेरी रचना

    सुन्दर तेरी रचना
    अति सुन्दर तेरी रचना विधाता
    रंग बिरंगी सृष्टि रची,
    जा में नाना तरह
    जीवजाति बसी।
    नाना तरह की, विविध तरह
    जीवन ज्योति जगी।
    अति सुन्दर तेरी रचना विधाता,
    कल-कल करती नदिया-झरने
    वन-उपवन, फुलवारी सजी
    अति सुंदर तेरी रचना विधाता
    अति सुन्दर तेरी रचना।
    प्यार मुहब्बत,
    भावना कोमल,
    दया-ममता सब ओर सजी।
    अति सुन्दर तेरी रचना विधाता
    अति सुंदर तेरी रचना।

  • भोजपुरी गजल – पागल के बीमारी बा

    भोजपुरी गजल- पागल के बीमारी बा |

    केहु से प्यार ना मतलब क सब यारी बा |
    रिश्ता नाता ला पता पईसा सभपर भारी बा |
    भाई भाई से मीठ ना बोले मुंह फेर चलेले |
    एक ही घर अलग चूल्हा अलग दुयारी बा |
    इश्क विश्क सब फइसन चार गो फ्रेंड चाही |
    हीर भईली बहिर रांझा पागल के बीमारी बा |
    बेरोजगारी खातिर निकले बहाली राजनित मे |
    अनपढ़ गवार जीत जाला चढ़े के सफारी बा |
    प्यार मे बनेके बा पागल त बन जा मर्जी |
    उनका दुसर मुल्ला खोजे के अब तैयारी बा |
    आइल बा कोरोना बची के रहे के दूर दूर |
    चुनाव से डेराला उ भाषण सुने मारामारी बा |
    वेकसिन लगावा बाकी फोटो चाही पेपर मे |
    केहु के जान जाता केहु के दूकानदारी बा |
    जबसे फइलल कोरोना केहु रोजी रोटी गईल |
    प्राइवेट नौकरी के पूछे छुटल सब सरकारी बा |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक / गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब -995550986

  • मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान

    मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
    कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।2।।
    ———————————————-
    मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
    कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।1।।
    ————————————————
    तेरे नाम बिन, मन हमें भरमाता
    तू जिसे मिल जाये, उसे दुनिया से क्या लेना
    राम तुम्हीं हो मेरे दाता,
    मैं तेरे दर पे भिखारी बनके हूँ आया
    दे दो चरण रज प्रभु जी,
    बस यहीं कामना ये भिखारी करता ।।
    ——————————————–
    मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
    कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।2।।
    ——————————————–
    ये सारी सृष्टि तुझमें ही है समाई
    ये जल,जीव, नभ तुझसे ही मुक्ति पाती
    इस पापी, दुरात्मा को अंत समय तुझसे मिलने हो
    मेरे राम मुझे तुझ से ही लगन हो ।।
    —————————————————
    मेरे राम इतना तु कर दे मुझ पे एहसान
    कि तेरा नाम जपूँ मैं बार-बार ।।3।।
    जय श्री सीताराम ।।

  • मारी नहीं पिचकारी(होली पर )

    गाली न दे मुझे आली
    नहीं मारी तुझे पिचकारी
    मैंने मारी नहीं पिचकारी,
    भर कर रंग, चला कुंज गलियन,
    मारी नहीं पिचकारी।
    शायद तुझको भूल हुई है
    या यह मेरी राह नई है,
    मगर यही सच मेरा
    रंग नहीं यह मेरा,
    नहीं, मैंने मारी नहीं पिचकारी।
    मेरा रंग बड़ा अनजाना,
    जिसको खुद ही नहीं पहचाना।
    मगर आयी अब होली,
    तेरी कान पड़ी मीठी बोली,
    हाँ, मारी मैंने पिचकारी
    तुझे मारी मैंने पिचकारी।

  • एक दीप जलाओ ऐसा

    सौ दीप जला लो मंदिरों में
    चाहे हजारे दीये जल तेरे आँगन में
    जब तक मन की तम ना होंगे दूर
    तब-तक है तेरे सारे दीये की रौनक सून ।।
    ———————————————-
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का
    ———————————————
    झूठी शरीर की रौनक ढ़ल जाती है शामों तक
    पर सच्चे दिलों मे दीपक जलती है कल्पो तक
    दीपक जलाओ लेकिन जलो नहीं ईर्ष्या द्वेषों से
    होगा तेरा कल्याण सिर्फ राम नाम गुण गाने से
    ——————————————————
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।1।।
    ————————————————-
    वासना तो हावी रहता
    सदा नरों के मनो में
    पर जो नर इन्द्रिय दमन करता
    उसके अंदर ही दिव्य ज्योत जलता
    ————————————————
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।2।।
    —————————————-
    कामी नही, भोगी नही, लोभी नही,
    तुम योगी बनो, तेजस्वी बनो
    अपनी ज्वाला से तुम सारी दुनिया को चमकाओ
    ——————————————————-
    एक दीप जलाओ ऐसा
    जिससे विकार दूर हो तेरे मन का ।।3।।
    —————————————–

  • भस्म करूँ खामियाँ स्वयं की

    पावक उग आ तू मेरे मन में,
    भस्म करूँ खामियाँ स्वयं की,
    एक- एक कर खोज -खोज कर
    दुर्बलताएँ दूर करूँ निज।
    बहुत हो चुका डगमग डगमग
    अस्थिर मन अस्थिर तन लेकर
    भटक रहा जो इधर-उधर अब
    सारी उलझन दूर करूँ निज।
    नहीं किसी से गलत कहूँ मैं
    नहीं किसी की गलत सुनूँ मैं,
    खुलकर राह चुनूँ मैं अपनी
    बाधाएं सब दूर करूँ निज।
    अपनी बातें, अपनी राहें
    अपनी खुशियाँ, अपनी आहें
    अपना प्यार, मुहब्बत अपनी
    दूजे को भी नेह करूँ नित।

  • सत्य पथ चलता रहूँ

    लब खुलें तो सत्य बोलें
    अन्यथा पट बन्द हों,
    ईश ऐसी शक्ति देना,
    भाव में नव छन्द हों ।
    याचना है ईश तुझसे,
    काम से मतलब मुझे हो,
    और राहों और बातों से
    नहीं मतलब मुझे हो।
    सत्य की हो बात जो भी
    वो मेरे मन दर्ज हो,
    राह देना पथ भटकते को
    मेरा एक फर्ज हो।
    कोई कुछ भी बोल दे
    मैं कर्मपथ चलता रहूँ
    दूसरों से भी उसी पथ में
    चलो कहता रहूँ।
    कोई माने या न माने
    सत्य में कहता रहूँ
    प्यार पाऊँ, ठेस पाऊँ
    सत्य पथ चलता रहूँ।

  • पावस बहती आंखों में…..

    पावस बहती आंखों में
    तुम नीर-सा बनकर आए
    अविरल बहते रहे
    हृदय में कितने छाले उभर आए
    किंकर्तव्यविमूढ़ बने हम
    तेरा साथ पाकर के
    जो बन पाने को आतुर थे
    वह ना हम बन पाए
    मिथ्या थे वह सारे वादे
    मिथ्या थी वह बातें
    तेरी याद में सिसक-सिसक कर
    रोती थीं मेरी रातें
    पावस बहती आंखों में तुम
    नीर-सा बनकर आए
    अविरल बहते रहे नेत्र से
    हम कुछ भी ना कर पाए ।।

  • खोजता मन है खिलौना ( प्रगतिवाद से अलंकृत)

    खोजता मन है खिलौना
    आसमां छत धरा बिछोना
    गेहूं की बाली सी कोमल
    और स्वर्ण सी जटाएं
    बोलती मिश्री हैं मन में
    काली-काली ये फिजाएं
    धुंध छाए आसमां पर
    कौंध बिजली की उठी
    लिपटकर स्वर्ण रश्मि से
    एक कली मन में खिली
    तीक्ष्ण गन्ध से मन हरा
    हो गया सुन्दर सलोना
    खोजता मन है खिलौना
    खोजता मन है खिलौना ।।

  • ओ याद! भूली बिसरी

    आ बैठ पास मेरे
    ओ याद! भूली बिसरी,
    आ अश्रु! नैन में आ
    या मुँह में आ जा मिश्री।
    बीते पलों की खुशबू
    तू उड़ कहाँ गई है,
    ओ मन की लालसा तू
    धुल कहाँ गई है।
    बांधी थी जो सहेजे,
    भर पोटली में यादें,
    वो पोटली न जाने
    खुल कहाँ गई है।
    यादों में रह गई हैं
    यादें थी जो पुरानी
    उनमें भी कोई यादें
    यादें कहाँ रही हैं।
    खो जाओ मत यूँ यादो
    आओ जरा बैठो,
    रोऊँ, हँसूँ मैं तुम पर
    आओ ना, बैठ जाओ।

  • मन बना पाहन

    मन बना पाहन
    न कारण है पता,
    तोय के धोए से
    केवल धुल गया।
    फिर मरुत से भाप
    बनकर उड़ गया,
    राज भीतर का वो
    भीतर रह गया।
    यामिनी भीतर ही
    बैठी रह गयी,
    दामिनी बाहर
    चमकती दिख रही।
    अब जलधि का
    कौन मंथन कर सके
    उस अमिय की आस
    केवल रह गयी।
    हाँ, नहीं विष की
    कमी है दोस्तों,
    व्याल चारों ओर
    काफी उग गये।
    खुद के भीतर भी
    फणी प्रवृति आ,
    और पर मन विष
    उगलता रह गया।
    मैं स्वयं वनराज
    खुद को मानकर
    पाशविक कृत्यों को
    करता रह गया।

  • बाद में आयेगी गर्मी

    आजकल सो पा रहा है
    वह जरा फुटपाथ पर,
    ठंड कम लगने लगी
    ठिठुरन हुई कम आजकल।
    बीते दिन जाड़ों में रोया
    रात भर सिकुड़ा सा सोया
    बच गया बस जैसे-तैसे
    सोच मन में खूब रोया।
    धीरे-धीरे ऋतु बदल कर
    माह सम मौसम का आया
    उग रहे मधुमास में
    चैन उसने भी है पाया।
    बस यही हैं चैन के दिन
    बाद में आयेगी गर्मी,
    सोचकर कैसे कटेगी
    सोच ने मन है डराया।

  • अब लगो उत्थान में

    खूब बातें हो गई हैं,
    अब लगो उत्थान में,
    देश आशा में लगा है,
    मत चलो अवसान में।
    खूब दूजे पर उछाला
    कीच अब रहने भी दो,
    एक दूजे को समन्वित
    बात तुम रखने भी दो।
    सब चलो मिलजुल के राही
    देश को बढ़ने भी दो,
    छोटी-छोटी बात को तुम
    मत करो, रहने भी दो।
    ताड़ तिल का मत बनाओ
    आड़ ओछी छोड़ दो,
    पिस न पाए आम जनता
    दाढ़ अपना तोड़ लो।
    बस चुनावों तक रहे यह
    एक दूजे पर निशाना,
    बाद में मिलकर चलो सब
    देश है आगे बढ़ाना।

  • जल, ढूंढते रह जाऐंगे

    जल, ढूंढते रह जाऐंगे

    प्यासा कौवा जुगाड़ से,
    पानी ऊपर ला रहा।
    जल की कीमत मूक पक्षी,
    वास्तव में पहचान रहा।।

    हम मनुष्य दिमाग वाले,
    व्यर्थ जल बहा रहे।
    लापरवाही की हद,
    से भी ऊपर जा रहे।।

    दो नल घर में हैं,
    ट्यूबवेल गली में।
    थोड़ी दूर ही कूआं है,
    वहीं पास तालाब है।।

    मत रहो भ्रम में बंधु,
    ये सब सूख जाऐंगे।
    आज ध्यान नहीं दिया,
    तो कल बहुत पछताएंगे।।

    अब भी बचालो पानी को,
    तभी जीवन जी पाएंगे।
    वरना एक दिन पृथ्वी पर,
    जल ढूंढते रह जाऐंगे।।

    राकेश सक्सेना, बून्दी
    9938305806

  • भौपरी पूर्वी होली गीत – कान्हा मारे पिचकरिया

    भोजपुरी पूर्वी होली गीत- कान्हा मारे पिचकरिया |
    कान्हा मारे पिचकरिया ये सखिया
    बदनवा भिंजेला मोर
    कन्हईया जी खेले ले होरिया
    चुनरिया रंगी देले मोर |
    आवा आवा सब सखिया
    सुना सब बतिया मोर
    घेरी कान्हा मारा पिचकरिया
    करेले बलजोरी बड़ी ज़ोर
    कन्हईया जी खेले ले होरिया
    कान्हा आइहे जब ब्रिन्दा हो बनवा
    करिहा जनी सखीया कोई शोर |
    धई के भिंजईहा यमुना के पनिया |
    कन्हईया जी खेले ले होरिया |
    सुना सुना सब ग्वाल हो गोपिया
    होई अबकी होली हो ज़ोर
    मली के लगाईहा गुलाल कन्हईया
    उनकर चले न कोई ज़ोर
    कन्हईया जी खेले ले होरिया
    चुनरिया रंगी देले मोर |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • ,इतना मजबूर कैसे

    इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
    आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
    शायद उम्र का नया सा पड़ाव हो
    या फिर बीते पल का हिसाब हो
    नहीं तो राजनीति का झुकाव हो
    वरना दमदार इंसान चुप हो ऐसे
    इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
    आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
    कई आशाएं कुछ पूरी ज्यादा धूमिल
    उनके अपने कितने पराये व अलग
    दोस्त ऐसे तो गददार किसे कहते हैं
    रक्षक जिसे बनाये भक्षक बनते कैसे
    इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
    आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे
    दोस्त सुस्त तो विकाश हो कैसे
    सेवक बनकर भी अकर्मण्य भैंसे
    सबका साथ हो न हो पर ऐ मालिक
    ये तो ६० साल चिपके रहेंगे ऐसे
    इतना मजबूर सा कोई हो तो कैसे
    आईने शक्ल बदले हर रोज जैसे

  • तुम मेरी भावनाओं का अनुवाद हो…

    तुम मेरी भावनाओं का
    अनुवाद हो
    तुम मेरी आकांक्षाओं का
    आकार हो
    साकार होगा हर स्वप्न मेरा
    गर तुम जो मेरे साथ हो
    तुम्हारे स्वप्न मेरे स्वप्नों के
    बिम्ब हैं
    तुम हमारे हम तुम्हारे
    प्रतिबिम्ब हैं
    दे ना दे गर साथ कोई
    तुम हमारे ही रहोगे
    मिलने में प्रियतम हमारे
    अब कहाँ विलम्ब है….

  • कविता

    असम्भव है तुम्हें परिभाषा के
    दायरे में बांधना..
    तुम हो वो सागर, जिसमें विलीन होता
    है व्याकुलता का दरिया..
    या निष्प्राण मन के भीतर बसी नीरवता को
    चीर के उपजी स्नेहमय अनुगूँज..!!
    एक बजंर हृदय के धरातल पर सहसा
    फूटता हुआ भावों का सोता..
    या फिर एक नज़रिया, जो हर दृष्टिगोचर
    में अंतर्निहित वास्तविक सत्य को
    उजागर करने का..!!

    कविता! तुम पर्याय हो मेरे लिए
    ‘सार्थकता’ की अनुभूति का..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (21/03/21)

  • फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ

    फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ,
    आओ तुम्हे मन-मीत सुनाऊँ।
    दिल में है जो प्रीत सुनाऊँ
    साँझ हो चली दीप जलाऊँ।
    चादर ओढ़े लालिमा की,
    साँझ सुहानी जाने लगी है।
    दीपक की रौशन लौ से,
    एक महक सी आने लगी है।
    चली है चंचल सी हवाएँ,
    कोयल मीठा राग सुनाए।
    सुबह साँझ चले पुरवाई,
    प्रीतम तेरी याद है आई।
    फ़ागुन में एक गीत सुनाऊँ,
    आओ तुम्हे मन-मीत सुनाऊँ।
    ____✍️गीता

  • गजल- इस पर या उस पार

    गजल – इस पार या उस पार |
    जो चाहो वो मिल जाये ऐसा होता नहीं |
    हार कर भी कोई लड़ता मगर रोता नहीं |
    मिल जाती मंजिल यूं ही पा लेते सभी |
    रखता यकीन हाथो मौका कोई खोता नहीं |
    लगाना इल्जाम आसान होता गैरो पर |
    झांक लेता खुद मे परेशान होता नहीं |
    गिर गए खा कर ठोकर तो फिर उठो |
    पाकर लेता दम कोई मगर सोता नहीं |
    आये आंधियाँ तूफान जितनी आने दो |
    तुमसे बड़ा नहीं कोई मगर छोटा नहीं |
    फैसला इस पार या उस पार होने दो |
    हो हौसला बुलंद परेसां कोई होता नहीं |
    डूबोगे या उबरोगे रखो यकीन कूद जाओ |
    दम जिसके बाजुओ दरिया डूबोता नही |
    आने दो डर को थोड़ा करीब आने दो |
    गुजर जाता वक्त रंग अपने भिंगोता नहीं |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • आज की नारी

    आज की नारी,
    सीमित नहीं है
    घर की चार दिवारी तक।
    तन से कोमल मन से सशक्त
    है नारी …
    निभाए दोहरी ज़िम्मेदारी।
    शिक्षा, चिकित्सा का क्षेत्र हो,
    या हो फिर विज्ञान।
    आज की नारी ने,
    बनाया हर क्षेत्र में स्थान।
    हर कला में पारंगत है,
    पाती है समाज में सम्मान।
    घर भी संभालती है,
    काम पर भी जाना है
    दोनों ही स्थानों पर,
    उसका ठिकाना है।
    आज हर क्षेत्र में,
    नारी का बोलबाला है।
    करती है सारे काम फिर भी मुस्कुराए,
    बस थोड़ा सा प्यार
    और थोड़ा सा सम्मान ही तो चाहे।।
    _____✍️गीता

  • प्रोत्साहन

    प्री बोर्ड की परीक्षा का,
    परिणाम जब आया
    उसने अपेक्षा से कम ही अंकों को पाया।
    “क्यों अंक अच्छे नहीं आए हैं तेरे”
    वह खाता था डाँट पिता से साँझ और सवेरे।
    रोज़-रोज़ की डाँट से,
    एक दिन तंग आया
    घर छोड़ने का उसने मन बनाया।
    दो-तीन जोड़ी कपड़े भरकर,
    वह बस्ते में लाया,
    अपनी इस इच्छा को,
    अपने एक साथी को बतलाया।
    साथी छात्र ने उसको बहुत समझाया,
    अरे प्री बोर्ड ही तो है भाई
    ,सालाना परीक्षा में अभी समय है
    करो और तैयारी।
    साथी छात्र ने चुपके से,
    शिक्षिका को यह बात बताई
    शिक्षिका सुनते ही बहुत अधिक घबराई।
    फोन मिलाया उसके पिता को
    और उसके घर आई।
    प्री बोर्ड में अंक कम ही देते हैं हम,
    यह राज़ की बात पिता को समझाई।
    बच्चे को प्रोत्साहित करना,
    इसी में है सबकी भलाई।
    हतोत्साहित ना करना उनको,
    उनकी किशोरावस्था है आई।
    शिक्षिका की बातें सुनकर,
    “पिताजी” को समझ आई।
    हाथ जोड़कर बोले वो,
    अब नहीं डाँटूगा उसको।
    प्रोत्साहन ही देंगे हम,
    यह कसम है खाई।।
    _____✍️गीता

  • इंसानियत को सीखना ही होगा

    सब कुछ सिखा देगा इंटरनेट
    मगर संस्कार तो घर से ही सीखने होंगे,
    छोटे बच्चों को खेल लगाना,
    उनकी चाहत को पहचानना,
    उनकी भूख-प्यास का अहसास
    ये सब तो सीखने ही होंगे।
    बुजुर्गों का अदब,
    उनका सम्मान,
    कोई निर्णय लेने से पहले
    उनकी भी राय ले लेना,
    उनकी जरूरतों का ख्याल रखना
    यह सब तो सीखना ही होगा।
    दूसरे की पीड़ा को महसूस करना
    दया भाव, मुहोब्बत करना,
    निरीहों पर स्नेह लुटाना
    यह सब तो सीखना ही होगा।
    इंसान हो इंटरनेट के अलावा
    इंसानियत को सीखना ही होगा।

  • खिल गई है सुबह

    खिल गई है सुबह
    जाग जा अब पथिक
    हाथ-मुँह धो ले,
    न कर आलस अधिक।
    काम पर लग गई है दुनिया
    चींटीं से लेकर हाथी तक
    अपना चुके हैं,
    मेहनत का पथ।
    उड़गन भी
    नित्यकर्म पूरा कर,
    चल पड़े हैं ड्यूटी पर,
    उठ तू भी,
    लिख दे चार शब्द
    प्राकृतिक ब्यूटी पर।
    रात का अंधेरा बीत गया
    सुबह हो गई जवाँ,
    उठ जुट जा तू भी
    समय मत गँवा।

  • मुहब्बतों में मुझे झुका दे

    तू टिमटिमा मत चमकते तारे
    बिना रुके रोशनी दिखा दे,
    अंधेरा घनघोर सा घिरे जब
    तू कर उजाला मुझे सिखा दे।
    चलूँगा कैसे अंधेरी राहें,
    मुझे तू सारी कला सिखा दे,
    मनाने प्रीतम को क्या लिखूं अब
    दो बात अच्छी मुझे लिखा दे।
    अगर कलम से गलत लिखूं तो
    मुझे बताये बिना मिटा दे।
    अकड़ न जाऊँ कभी किसी से
    मुहब्बतों में मुझे झुका दे।

  • ये गुनगुनाहट कहाँ हुई है

    ये गुनगुनाहट कहाँ हुई है
    जो लेखनी ने बयान की है,
    जो ध्वनि सुनी थी कभी मुहोब्बत की
    आज फिर से सुनाई दी है।
    निगाहों से मिलने को निगाहें
    पलक झपकते मिला ही दी हैं।
    सुहाना मौसम सुहाने पल-क्षण,
    ये आहटें सी सुनाई दी हैं।
    कभी हैं खट्टे फलों सी खुशबू
    कभी वे लगती मिठाई सी हैं।
    जो कह रहे हैं वो कुछ नहीं है
    असल की बातें छुपाई सी हैं।
    बयां न कर पाये थे मुहब्बत
    मगर जिगर में सजाई सी हैं।

  • गौरैया दिवस

    पता नहीं कहाँ खो गई,
    वह छोटी सी प्यारी सी चिरैया।
    फिर से खेलने, फुदकने को,
    आँगन में आओ प्यारी गौरैया।
    किस की बुरी नजर है तुम पर,
    यह हमको बतलाओ।
    चीं-चीं चूँ-चूँ करने को,
    फ़िर आँगन में आओ।
    किसी बात पर गुस्सा हो क्या,
    या हो तुम घबराई
    कितने दिन और साल बीते,
    तुम नजर ना आई।
    देख कर तुमको बचपन में,
    मैं कितना मुस्काती थी
    छत पर रखकर कुछ दाना पानी,
    तुम्हें खाते-पीते देख खिलखिलाती थी।
    सुनो तुम्हारे लिए ही,
    गौरैया दिवस बनाया है
    आज गौरैया दिवस मनाया है।
    आजा छोटी सी चिरैया,
    तुमको सभी ने बुलाया है।
    किसी ने भी नहीं भुलाया है।।
    ______✍️गीता

  • गौरैया

    गौरैया,
    जाने कहाँ उड़ गई तुम
    अपने मखमली परों में बाँध के
    वो सुबहें, जो शुरू होती थी तुम्हारी
    चहचहाहटों के साथ और वो शामें,
    जब आकाश आच्छादित होता था तुम्हारे
    घोसलों में लौटने की आतुरता से…!!

    वो छत पर रखा मिट्टी का कटोरा सूखा पड़ा है
    न जाने कब से…
    आँगन में नहीं बिखेरे जाते अब पूजा की
    थाली के बचे हुए चावल…!!
    एक मुद्दत से नहीं देखा मैंने तुम्हें अपना
    नीड़ बुनते…
    और तुम्हारा अपने बच्चों को खाना खिलाने
    का दृश्य भी अब धुंधलाने लगा है
    मस्तिष्क के पटल से…!!

    अब जब मशीनों के शोर से घुटन होने
    लगती है तो कानों को याद आता
    है तुम्हारा चहचहाना..!!
    सोचती हूँ कोई बच्ची कैसे जान पाएगी
    कि क्या होता है चिड़ियों की तरह
    आकाश में उड़ना…!!

    हे प्रकृति की मासूम प्रतिनिधि! हम
    तुम्हारे अपराधी हैं..
    हम लालची इंसानों ने छीना तुमसे तुम्हारा
    आवास, तुम्हारे हिस्से का आकाश,
    और तुम्हारी परवाज़…!!
    दया आती है मुझे हम इंसानों की लाचारी पर ,
    हमें हर चीज का महत्व समझ तो आता है,
    मगर उसे खो देने के पश्चात..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (20/03/2021)

  • सलामी कुबूल हो

    बाजार में प्रविष्ट करते ही
    छोटे-छोटे बच्चे पीछे लग जाते थे,
    बाबू जी दे दो, माताजी दे दो,
    भैया जी दे दो, दीदी जी दे दो।
    स्कूल का समय होता
    लेकिन वे माँग रहे होते।
    पेट की खातिर हाथ फैला रहे होते।
    तभी युवा अजय ओली की
    स्नेहिल नजर पड़ी उन पर,
    मानवता की भावी पीढ़ी
    भीख मांग रही थी इस कदर।
    पर्वतीय बाजार में
    छोटे बच्चे ठंड में
    भूखे प्यासे, नंगे पैर
    दौड़ रहे थे मांगने के लिए
    राहगीरों के पीछे-पीछे
    दृश्य दयनीय था,
    हृदय पसीज गया उस
    समाजसेवी युवक का,
    उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में
    संकल्प लिया उसने,
    खुद भी नंगे पांव चलकर,
    निरीह बच्चों के दर्द को मिटाने का।
    लाखों रुपये की नौकरी का
    छोड़कर पैकेज,
    नंगे पांव निकल पड़ा वह युवक
    देने मैसेज।
    आज पिथौरागढ़ में बच्चे
    भीख मांगते नहीं दिखते हैं।
    अब उनके पढ़ने व खाने की
    व्यवस्था कर दी है, उस युवक ने
    हजारों किमी की पैदल यात्रा कर
    देश भर में बच्चों के लिए
    जागरूक कर रहा है समाज को
    ऐसे कर्मठ युवा को
    कवि की कविता की
    सलामी कुबूल हो।
    ———– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, जेआरएफ-नेट, पीएचडी, संप्रति- चिकित्सा विभाग, चंपावत।

  • चादर जितने पांव पसारो

    अभिलाषा और ईर्श्या में,
    रात-दिन सा अंतर जानो तुम।
    अभिलाषा मजबूत रखो,
    ईर्श्या से दिल ना जलाओ तुम।।

    चादर जितने पांव पसारो,
    पांव अपने ना कटाओ तुम।।
    अपनी मेहनत से चांद पकड़ो,
    उसे नीचे ना गिराओ तुम।

    “उनके घर में नई कार है,
    मेरा स्कूटर बिल्कुल बेकार है”।
    “एयर कंडीशंड घर है उनका,
    अपना कूलर, पंखा भंगार है”।।

    “उनका घर माॅर्डन स्टाईल का,
    अपना पुराना खंडहर सा है”।
    “वो पार्लर, किटीपार्टी जाती,
    मेरा जीवन ही बेकार है”।।

    ये बातें जिस घर में होती,
    वहां अज्ञान अंधेरा है।
    चादर जितने पांव पसारो,
    वहीं शांति का डेरा है।।

  • आकाश

    बिम्ब बनाना चाहता हूँ
    तेरा आकाश,
    मगर कहाँ से शुरू करूँ
    सोच रहा विश्वास।
    सोच रहा विश्वास,
    इस कदर विस्तृत है तू
    आदि अंत का नहीं
    पता बस विस्तृत है तू।
    कहे लेखनी भानु,
    चमकता जीवनदायी,
    चंदा-तारे, नखत,
    सभी ने छवि बिखरायी।

  • ख़ामोशी का हलाहल

    ख़ामोशी की तह में,
    छिपा कर रखते हैं हम,
    अपने सारे ग़म।
    क्योंकि कर के कोलाहल,
    दिखाकर दुःख दर्द अपने
    नहीं मिटेंगे अन्धेरे ज़िन्दगी के।
    पीना ही पड़ता है,
    ख़ामोशी का हलाहल
    ज़िन्दगी के कुछ उजालों के लिए ।।
    _____✍️गीता

  • मेहनतकश की जिन्दगी

    वो दिन भर
    मेहनत करते हैं,
    रात को सड़कों पर
    शयन करते हैं।
    ऊपर से पाला पड़ता है,
    नीचे से शीत लगती है,
    मेहनतकश की जिंदगी,
    कठिन गीत लिखती है।
    सपने में गुनगुनाता है,
    रोकर मुस्कुराता है,
    पैर खुले रख मुंह ढकता है
    मुँह खुला रख पैर छुपाता है,
    मच्छर गीत सुनाता है,
    मच्छर के चक्कर में
    खुद के कान में चपत लगाता है,
    मच्छर के चुभाए शूल में भी
    मेहनत की नींद सोते हैं।
    कभी हँसते कभी रोते हैं,
    थकान की नींद सोते हैं।

  • अंतर्द्वन्द्व

    जीवन यापन के लिए बहुधा व्यक्ति को वो सब कुछ करना पड़ता है , जिसे उसकी आत्मा सही नहीं समझती, सही नहीं मानती । फिर भी भौतिक प्रगति की दौड़ में स्वयं के विरुद्ध अनैतिक कार्य करते हुए आर्थिक प्रगति प्राप्त करने हेतु अनेक प्रयत्न करता है और भौतिक समृद्धि प्राप्त भी कर लेता है , परन्तु उसकी आत्मा अशांत हो जाती है। इसका परिणाम स्वयं का स्वयम से विरोध , निज से निज का द्वंद्व।  विरोध यदि बाहर से हो तो व्यक्ति लड़ भी ले , परन्तु व्यक्ति का सामना उसकी आत्मा और अंतर्मन से हो तो कैसे शांति स्थापित हो ? मानव के मन और चेतना के अंतर्विरोध को रेखांकित करती हुई रचना ।  

    दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है ना कोई  विरुद्ध खड़ा है।   
    जग की नज़रों में काबिल पर चेतन अंतर रूद्ध डरा है।
    घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।
    अभिलाषा के श्यामल बादल  काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।
    स्वयं जाल ही निर्मित करता और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।
    अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी  मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।
    तबतक जगतक दौड़ लगाते जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।
    किस कीमत पे जग हासिल है चेतन मन अबुद्ध अधरा है।
    अरि दल होता किंचित हरते निज निज से उपरुद्ध अड़ा है।
    किस शिकार का भक्षण श्रेयकर तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।
    निज निश्चय पर संशय अतिशय मन से मन संरुद्ध लड़ा है।
    मन चेतन संयोजन क्या  जब खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।

    अजय अमिताभ सुमन

  • रंग के त्यौहार में

    ऐसी सुना दे पंक्तियाँ
    जो मधुर रस सींच दें,
    रंग के त्यौहार में
    रंगीनियों को सींच दें।
    अश्क सारे सूख जायें
    होंठ गीले से रहें,
    नैन में काजल लगा हो
    खूब नीले से लगें।
    गाल पंखुड़ियां गुलाबी
    लाल हो अधरों में रंग
    देख कर के लालिमा भी
    आज रह जायेगी दंग।
    चाँद चमका हो मस्तक में
    और दस्तक हो दिलों में
    भर तेरे रंगों को खुद में
    आज फूलों सा खिलूँ मैं।
    प्रेम पिचकारी भरी हो
    मारकर बंदूक सी
    फिर उठे थोड़ी सी सिहरन
    ठंड सी कुछ हूक सी।
    खिलखिला भीतर व बाहर
    खुशियां मनाऊं इन पलों की
    खूब रंगों को उड़ेलूँ
    होली मनाऊं इन पलों की।
    ऐसी सुना दे पंक्तियाँ
    जो मधुर रस सींच दें,
    रंग के त्यौहार में
    रंगीनियों को सींच दें।

  • करो परिश्रम ——

    करो परिश्रम कठिनाई से,
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।
    लहरों से तुम हार मत मानो,
    ये बात सीखो त
    जब मँक्षियारा नाव चलाता,
    विचलित नहीं होता वह विपरित धाराओं से ।
    लाख सुनामी चक्रवात बबंडर से टकराकर
    वह लक्षय को भेद जाता है ।
    आखिर गगन की जयघोष की नारा से
    उसकी आँखें नम जाता है ।।1।।
    ————————————————–
    निरन्तर, कठिनाई, परिश्रम में ही
    छिपा भविष्य तेरे बंदे है ।
    परिश्रम, कठिनाई, निरन्तरता से
    कभी मुँह मत मोड़ना बंदे ,
    यहीं तो तेरे भाग्य-विधाता है ।
    करे परिश्रम कठिनाई से जो नर
    वही तो पाते अपना भविष्य-लक्ष्य है ।
    कर्महीन, विषयरम, इन्द्रियसंर्लिप्त मनुष्य
    ऐसे ही जग में जीवन गँवाते है ।
    और अर्थ-अभाव दर-दर मारे फिरते है ।।2
    ——————————————————–
    तन है चोला मिट्टी का,
    वस्त्र तेरे कोई शान नहीं ।
    मिट्टी में मिट्टी मिल जायेंगे ,
    वस्त्र तेरे उतार लिये जायेंगे ।
    कर लो सदुपयोग नर तन का,
    यहीं तो काम आवेंगे ।।
    —————————————
    जो नर मिट्टी को मिट्टी समझे,
    कड़ी -धुप में अन्न उगाते (बीज बोते) ।
    वहीं फसल काटते छाँव में ।।
    ऐसे ही नर कहलाते जगत में
    दिव्यस्वरूप महान है ।
    करो परिश्रम कठिनाइ से
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।।3।।
    —————————————————
    परिश्रम, कठिनाई, असफलता,
    निरंतरता सफलता के हैं चार स्तम्भ ।
    इन चारों स्तम्भों से गुजारना ही
    सफलता के हैं प्रथम उद्देश्य है ।
    निरन्तरता नर को गुणों को निखारता,
    परिश्रम किसी कर्म के योग्य बनाता ।
    असफलता सफलता की पहली सीढ़ी होती
    व जीवन की कठिनाई हैं सफलता की गगनचुंबी ।
    करो परिश्रम कठिनाई से
    जब-तक पास तुम्हारे तन है ।।
    लहरों से तुम हार मत मानो
    ये बात सीखो तुम मँझियारा से ।।
    कवि विकास कुमार
    करो परिश्रम कठिनाई से,
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।
    लहरों से तुम हार मत मानो,
    ये बात सीखो त
    जब मँक्षियारा नाव चलाता,
    विचलित नहीं होता वह विपरित धाराओं से ।
    लाख सुनामी चक्रवात बबंडर से टकराकर
    वह लक्षय को भेद जाता है ।
    आखिर गगन की जयघोष की नारा से
    उसकी आँखें नम जाता है ।।1।।
    ————————————————–
    निरन्तर, कठिनाई, परिश्रम में ही
    छिपा भविष्य तेरे बंदे है ।
    परिश्रम, कठिनाई, निरन्तरता से
    कभी मुँह मत मोड़ना बंदे ,
    यहीं तो तेरे भाग्य-विधाता है ।
    करे परिश्रम कठिनाई से जो नर
    वही तो पाते अपना भविष्य-लक्ष्य है ।
    कर्महीन, विषयरम, इन्द्रियसंर्लिप्त मनुष्य
    ऐसे ही जग में जीवन गँवाते है ।
    और अर्थ-अभाव दर-दर मारे फिरते है ।।2
    ——————————————————–
    तन है चोला मिट्टी का,
    वस्त्र तेरे कोई शान नहीं ।
    मिट्टी में मिट्टी मिल जायेंगे ,
    वस्त्र तेरे उतार लिये जायेंगे ।
    कर लो सदुपयोग नर तन का,
    यहीं तो काम आवेंगे ।।
    —————————————
    जो नर मिट्टी को मिट्टी समझे,
    कड़ी -धुप में अन्न उगाते (बीज बोते) ।
    वहीं फसल काटते छाँव में ।।
    ऐसे ही नर कहलाते जगत में
    दिव्यस्वरूप महान है ।
    करो परिश्रम कठिनाइ से
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।।3।।
    —————————————————
    परिश्रम, कठिनाई, असफलता,
    निरंतरता सफलता के हैं चार स्तम्भ ।
    इन चारों स्तम्भों से गुजारना ही
    सफलता के हैं प्रथम उद्देश्य है ।
    निरन्तरता नर को गुणों को निखारता,
    परिश्रम किसी कर्म के योग्य बनाता ।
    असफलता सफलता की पहली सीढ़ी होती
    व जीवन की कठिनाई हैं सफलता की गगनचुंबी ।
    करो परिश्रम कठिनाई से
    जब-तक पास तुम्हारे तन है ।।
    लहरों से तुम हार मत मानो
    ये बात सीखो तुम मँझियारा से ।।4।।
    कवि विकास कुमार

    कोई किसी से कम नहीं हैं
    क्योंकि सब एक हैं
    करो परिश्रम कठिनाई से,
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।
    लहरों से तुम हार मत मानो,
    ये बात सीखो त
    जब मँक्षियारा नाव चलाता,
    विचलित नहीं होता वह विपरित धाराओं से ।
    लाख सुनामी चक्रवात बबंडर से टकराकर
    वह लक्षय को भेद जाता है ।
    आखिर गगन की जयघोष की नारा से
    उसकी आँखें नम जाता है ।।1।।
    ————————————————–
    निरन्तर, कठिनाई, परिश्रम में ही
    छिपा भविष्य तेरे बंदे है ।
    परिश्रम, कठिनाई, निरन्तरता से
    कभी मुँह मत मोड़ना बंदे ,
    यहीं तो तेरे भाग्य-विधाता है ।
    करे परिश्रम कठिनाई से जो नर
    वही तो पाते अपना भविष्य-लक्ष्य है ।
    कर्महीन, विषयरम, इन्द्रियसंर्लिप्त मनुष्य
    ऐसे ही जग में जीवन गँवाते है ।
    और अर्थ-अभाव दर-दर मारे फिरते है ।।2
    ——————————————————–
    तन है चोला मिट्टी का,
    वस्त्र तेरे कोई शान नहीं ।
    मिट्टी में मिट्टी मिल जायेंगे ,
    वस्त्र तेरे उतार लिये जायेंगे ।
    कर लो सदुपयोग नर तन का,
    यहीं तो काम आवेंगे ।।
    —————————————
    जो नर मिट्टी को मिट्टी समझे,
    कड़ी -धुप में अन्न उगाते (बीज बोते) ।
    वहीं फसल काटते छाँव में ।।
    ऐसे ही नर कहलाते जगत में
    दिव्यस्वरूप महान है ।
    करो परिश्रम कठिनाइ से
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।।3।।
    —————————————————
    परिश्रम, कठिनाई, असफलता,
    निरंतरता सफलता के हैं चार स्तम्भ ।
    इन चारों स्तम्भों से गुजारना ही
    सफलता के हैं प्रथम उद्देश्य है ।
    निरन्तरता नर को गुणों को निखारता,
    परिश्रम किसी कर्म के योग्य बनाता ।
    असफलता सफलता की पहली सीढ़ी होती
    व जीवन की कठिनाई हैं सफलता की गगनचुंबी ।
    करो परिश्रम कठिनाई से
    जब-तक पास तुम्हारे तन है ।।
    लहरों से तुम हार मत मानो
    ये बात सीखो तुम मँझियारा से ।।
    कवि विकास कुमार
    करो परिश्रम कठिनाई से,
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।
    लहरों से तुम हार मत मानो,
    ये बात सीखो त
    जब मँक्षियारा नाव चलाता,
    विचलित नहीं होता वह विपरित धाराओं से ।
    लाख सुनामी चक्रवात बबंडर से टकराकर
    वह लक्षय को भेद जाता है ।
    आखिर गगन की जयघोष की नारा से
    उसकी आँखें नम जाता है ।।1।।
    ————————————————–
    निरन्तर, कठिनाई, परिश्रम में ही
    छिपा भविष्य तेरे बंदे है ।
    परिश्रम, कठिनाई, निरन्तरता से
    कभी मुँह मत मोड़ना बंदे ,
    यहीं तो तेरे भाग्य-विधाता है ।
    करे परिश्रम कठिनाई से जो नर
    वही तो पाते अपना भविष्य-लक्ष्य है ।
    कर्महीन, विषयरम, इन्द्रियसंर्लिप्त मनुष्य
    ऐसे ही जग में जीवन गँवाते है ।
    और अर्थ-अभाव दर-दर मारे फिरते है ।।2
    ——————————————————–
    तन है चोला मिट्टी का,
    वस्त्र तेरे कोई शान नहीं ।
    मिट्टी में मिट्टी मिल जायेंगे ,
    वस्त्र तेरे उतार लिये जायेंगे ।
    कर लो सदुपयोग नर तन का,
    यहीं तो काम आवेंगे ।।
    —————————————
    जो नर मिट्टी को मिट्टी समझे,
    कड़ी -धुप में अन्न उगाते (बीज बोते) ।
    वहीं फसल काटते छाँव में ।।
    ऐसे ही नर कहलाते जगत में
    दिव्यस्वरूप महान है ।
    करो परिश्रम कठिनाइ से
    जब तक पास तुम्हारे तन है ।।3।।
    —————————————————
    परिश्रम, कठिनाई, असफलता,
    निरंतरता सफलता के हैं चार स्तम्भ ।
    इन चारों स्तम्भों से गुजारना ही
    सफलता के हैं प्रथम उद्देश्य है ।
    निरन्तरता नर को गुणों को निखारता,
    परिश्रम किसी कर्म के योग्य बनाता ।
    असफलता सफलता की पहली सीढ़ी होती
    व जीवन की कठिनाई हैं सफलता की गगनचुंबी ।
    करो परिश्रम कठिनाई से
    जब-तक पास तुम्हारे तन है ।।
    लहरों से तुम हार मत मानो
    ये बात सीखो तुम मँझियारा से ।।
    कवि विकास कुमार

  • ज़िन्दगी की राहें

    ज़िन्दगी की राहें,
    सदा कुछ सिखाती ही जाएँ।
    कुछ लोग हाथ पकड़ कर,
    काम निकाल, छोड़ दें झटक कर।
    पकड़ कर राह सच्चाई की,
    कुछ निभाएँ साथ भी।
    रंग-बिरंगी दुनिया है यह,
    रंग सभी दिखलाते हैं
    कुछ पक्के कुछ कच्चे रंग।
    यहां-वहां दिख ही जाते हैं।।
    ______✍️गीता

  • कठपुतली

    कठपुतली तो देखी होगी ना….
    हाँ, वही काठ की गुड़िया।
    जिसकी डोर रहती है सूत्रधार के हाथों में,
    वह अपनी उँगलियों से जैसे चाहे,
    उसे नचाता है….
    दर्शकों को भी आनन्द आता है।
    लगता है कि उसमें जान है,
    लेकिन, कहां….
    वह तो बिल्कुल बेजान है।
    नाचती रहती है सूत्रधार के इशारों पर केवल।
    इशारों पर नाचोगे,
    तो नचाएगा यह जमाना…
    हे प्रभु, कभी किसी को किसी की कठपुतली न बनाना।।
    _______✍️गीता

  • भोजपुरी देश भक्ति होली गीत – पिया तू फगुनवा मे

    भोजपुरी देशभक्ति होली गीत – पिया तू फगुनवा मे |
    काहे नाही आईला पिया तू फगुनवा मे |
    मनवा लागे नाही ना पिया मोर फगुनवा मे |

    तू त हउआ फौजी सिमवा ललकारेला |
    देश दुशमनवा के चुनी चुनी मारेला |
    पिया केकरा संगवा ना खेलब होली अंगनवा मे |
    मनवा लागे नाही ना पिया मोर फगुनवा मे |

    सुनी के दहाड़ तोहार बैरी सियार जस कापेंले |
    पार नाही पावे तोहसे आपन जान लेके भांगेले |
    हमके गुमान तोहरो रहे डर दुशमनवा मे |
    मनवा लागे नाही ना पिया मोर फगुनवा मे |

    जब होरी खेले देशवा अबीर औरी रंगवा से |
    होरी खेले पिया सिमवा बैरी खुनवा से |
    ठाढ़ रइहा सिमवा लगईहा दगीया ना तिरंगवा मे |
    मनवा लागे नाही ना पिया मोर फगुनवा मे |

    बजर पड़ो अगिया लागो आतंकी घुसपैठीयन के |
    होलिया खेलिहा खुनवा बैरी चीन नसपिटिया से
    रही रही ज़ोर मारे ना खुनवा बदनवा मे |
    मनवा लागे नाही ना पिया मोर फगुनवा मे |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • मन की आशाएँ

    राशिफल पढ़ते रहे हम उम्र भर
    खुद ब खुद कुछ भी नहीं हो पाया है,
    जो मिला मेहनत का फल था दोस्तो !!
    बिन किये कुछ भी नहीं हो पाया है।
    मन की आशाएँ धरी ही रह गईं,
    जिस तरफ प्रयास हो पाया नहीं,
    कर्म के फल से अधिक देना कभी
    भाग्य की रेखा को भाया ही नहीं।
    दे स्वयं की भावना को नेक स्वर
    चार शब्दों को किया अंकित सदा
    गम उठा लिपिबद्ध करते ही रहे
    दूसरे का गीत गाया ही नहीं।

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