संपादक की पसंद

तुम शायद जान नहीं पाए

*एक अंश तुम्हारा मुझमें है, तुम शायद जान नही पाए। हर पल मैं तुममे दिखता हूँ, तुम शायद मान नहीं पाए।।* अब कैसे मैं तुमको दिखलाऊं ये सपना नहीं हकीकत है जीवन का हर एक रंग ढंग यह निश्चित नहीं कदाचित है अब तो खोलो आँखें अपनी जीवन को जान नहीं पाएं *हर पल मैं तुममे दिखता हूँ, तुम शायद मान नहीं पाए।।* आयाम तेरे इस जीवन का फिर कौन भला क्यों समझेगा तू आज नही तो कल लेकिन इस संसय में ही तड़पेगा यह कुंठा है तेर... »

मरीचिका

सुंदरता के प्रति हमारा उन्माद इतना अधिक रहा है कि हमनें तकनीकों का सहारा लेकर हर वस्तु को सुंदर बनाने का भरसक प्रयास किया…!! जबकि हमें बदलनी चाहिए थी अपनी दृष्टि जो रचती है भेद सुंदरता और असुन्दरता का !! दुर्भाग्य से हम विफ़ल रहे हैं समस्याओं के वास्तविक मूल को पहचानने में और भटकते रहते हैं अपने मन द्वारा रचित मरीचिकाओं में..!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (06/03/2021) »

प्रार्थना

प्रिय 2020 तेरी विदाई में अब क्या शब्द कहूं, हंगामेदार मौजूदगी की बातें किस मुंह से कहूं। कभी सुना और सोचा भी नहीं वो सब घट गया, तेरे काल में कोरोना का भारी आतंक मच गया।। लोकडाउन कर दुनिया में ताले तूने लगावा दिए, मुंह बंद करवाए तूने, हाथ कई बार धुलवा दिए। घरों में बंद करवाया हमको बाजार सूने करा दिए, हर एक को डराया तूने मौत के दर्शन करवा दिए।। दूध के जले छाछ को भी फूंक फूंक कर पीते हैं, साल 2021 क... »

निज को परख

हद में रह ज्यादा न बोल फट जाए कहीं जैसे कोई ढोल बड़ा या छोटा समझ तो रख तूं है क्या निज को परख पिता हैं तेरे आंखें न‌ दिखा पुत्र तैयार खड़ा तेरा लौटाने को नीचे ही‌ बहती तट तालाब सभी पेय ऊपर फेंकी शक्ल नीचे अभी आदर देकर ही सबका हो पायेगा स्वयं में खोकर सब कुछ गंवाएंगा »

नन्हीं चिड़िया

बड़े का नाम बहुत ही है दुनियां में छोटी चीजें पर खुशी का‌ है कारण नन्हीं नन्हीं चिड़िया जमी पर फुदकती हुई कितनों के मन को करती थी हरण आज उनके बिना सुबह सूनी लगती सबके ही जगने का जो थी कारण काली सफेद लिबास में लिपटी हुई नृत्य उसका मनोरंजन था कितना कैसे कोई जीवंत उदाहरण भी बन जाता है ऐसे इक दिन सपना ओझल हो चुकी ऐसा लगता था इक्की दुक्की फिर हैं दिखने लगी आओ संभाले कीमती नन्हीं परियों को स्वर में जिनक... »

कचहरियां

अप्रमेय तथ्य है सदा से ही अविकल्प जीवन में शांति उन्हीं से पर है कायम प्रमाण सदन तो कुंठा से ही भरे हुए जीवन अवसाद का जो सदा बने कारण न्याय नाम से मची है वहां पर अंधी दौड़ अन्याय का हितैषी है जहां का हर अवयव काग भुसुंडी से दिखते हैं चारोओर कौवे ज्ञान अंशमात्र भी कहां है पर वहां सुलभ तिल मात्र सा भी दरार है जिन रिश्तों में तार बनाने का इन्हें है डिप्लोमा हासिल जन जो पहुंचे थे जख्म मरहम लेने यहां जी... »

भूले- बिसरे गीत

घर आया है रात का पंछी करने लाख सवाल होठों पर अनुपम हिंदी हाथों में है गुलाल। रंग डालेगा शायद मुझको मनसा उसकी लगती है गीली-गीली उसकी आंखें थोड़ा मुझको लगती है। बैठ गया है चादर पर वह दोनों पैर पसारे गाने लगा है मीठी धुन में भूले-बिसरे गीत हमारे। ” मैंने तो था चाहा जिनको वो ना हुए हमारे हाय तौबा! वो ना हो हमारे”………..।। »

मेरी गुड़िया बड़ी हो गई…

मेरी नन्ही सी गुड़िया खिलौनों से खेलते खेलते न जाने कब बड़ी हो गई! आज जब देखी उसकी हाथों में चूड़ियां सिर पर लाल चुनर तो समझ में आया। जो आंगन में फुदकती रहती थी, दिन भर खेलती रहती थी, अपने आगे पीछे सबको नचाया करती थी बातों का खजाना रहता था जिसके पास, अपनी नादान हरकतों से सबको हंसाया करती थी। वह गुड़िया आज इतनी बड़ी हो गई कि उसे डोली में बिठाकर, उसके सपनों के राजकुमार के साथ विदा करने का वक्त आ गया ... »

मनु

मनु मनु तू दौड़ता रह निरंतर गलत, सही का कर अंतर ठोकरें मिलेंगी अनन्तर गिर, उठ फिर चल निरंतर मनु तू कौशिश कर निरंतर हार जीत में ना कर अंतर मौक़े और मिलेंगे अनन्तर हिम्मत रख जीतेगा निरंतर मनु तू विश्वास रख निरंतर खुशी, दु:ख में ना कर अंतर दुनियां का दायरा है अनन्तर दु:ख के बाद खुशियां निरंतर मनु तू मानव ही रह निरंतर अमानवीयता में कर अंतर सत्य, कर्म पथ है अनन्तर उसी पर चलता रहा निरंतर राकेश सक्सेना ब... »

एहसास

कुछ एहसास हैं जो आकर ठहर गये हैं ज़बान की नोंक पर… होंठो की सीमाएँ लाँघने को आतुर, बस उमड़ पड़ना चाहते हैं एक अंतर्नाद करते हुए…!! मगर उन एहसासों के पैर बंधे हुए हैं एक डर की ज़ंजीर से…!! वही जाना-पहचाना डर “उसे खो देने का” जिसे पाया है बड़ी मुश्किल से या फिर इस भ्रम के टूट जाने का कि हाँ! वो मेरा है…!! सच कुछ एहसास कितने बदनसीब होते हैं लफ्ज़ों के साँचे में ढलते ही ब... »

“लेकर गुलाल रंगने लो हम आ गये”

इस फिजा में संवर कर लो हम आ गये, कुछ अलग ही तेवर लेके लो हम आ गये… थी नाराजगी यहाँ की हवाओं से हमको, बदलकर हवाएं लो हम आ गये.. कुछ थे दुश्मन हमारे तो कुछ परवाने, भुलाकर सभी गिले-शिकवे लो हम आ गये… समयाभाव था मेरे जीवन में खालीपन, लेकर थोड़ी फुर्सत लो हम आ गये… मोहब्बत के मारे थे हम तो बेचारे, भूलकर उस खता को लो हम आ गये… स्वागत में हमारे हो कविता तुम्हारी, है सावन हमारा और ... »

पैगाम ए मोहब्बत ” आर्यन सिंह

आर्यन सिंह की रचना से कुछ चुनिंदा शायरी एंड पक्तियाँ निकाली है जिनसे साफ पता चलता है कि आर्यन का दिल इश्क के समुंदर मे हिलोरें ले रहा है ना जाने कौन हैं आर्यन की सच्चे इश्क़ की प्रतिमा वह लड़की ( रश्मि यादव, जो कि संगीत कलाकार हैं ) जिसके लिए आर्यन ने कविता के जरिये पैग़ाम किया है ! 1. मोहब्बत है हमे जिससे ख्यालों का समुंदर है नही मालूम तक उसको यहाँ उसका सिकंदर है ये रिश्ता कब हकीकत मे हमे आशिक बन... »

जीवन की पहेली

मैं दौड़ती ही जा रही थी, ज़िन्दगी की दौड़ में। कुछ अपने छूट गए इसी होड़ में। मैं मिली जब कुछ सपनों से, बिछड़ गई कुछ अपनों से। दौड़ती जा रही थी मैं, किसी मंज़िल की चाह में, कुछ मिले दोस्त, कुछ दुश्मन भी मिले राह में। कभी गिरती कभी उठती थी, इस तरह मैं आगे बढ़ती थी। कभी चट्टाने थी राहों में, कभी धधकती अनल मिली। कहीं-कहीं दम घुटता था, कहीं महकती पवन मिली। यूं ही तो चलता है जीवन, कैसी यह जीवन की पहेली।... »

जीभ महान्

हिम्मत तो देखो ज़ुबान की, कैंची जैसी चलती है, बत्तीस दांतों घिरी होकर भी निडर हो मचलती है। बिना हड्डी की मांसल जीभ, कई कमाल करती है, फंसा दांत में तिनका, निकाल के ही दम भरती है।। दुनियां भर के स्वाद का, ठेका जुबां ने ही ले रखा, मजबूत दांतों के झुंड को गुलाम जुबां ने बना रखा। पहले चखती फिर कहती, ये खा और वो मत खा, बीमारी हो या चिढ़ाना, पहली हरकत जीभ दिखा।। द्रोपदी की जुबान ने ही, महाभारत करवाया था,... »

लापरवाही – व्यंग्य

लाख समझाने पर भी, गली-बाजार में भीड़ करें, बिना मास्क खुल्लमखुल्ला सबसे वार्तालाप करें। सेनेटाइजर का इस्तेमाल, हाथ धोना भी बंद करें, आओ साथी हम भी मरें, औरों का इंतजाम करें।। बार-बार हाथ धो कर, समय क्यों बर्बाद करें, हैंड सेनेटाइजर से हाथ, क्यों अपने खराब करें। मास्क पहनकर अपनी, सुन्दरता क्यों नष्ट करें, आओ साथी हम भी मरें, औरों का इंतजाम करें।। ज़ुखाम खांसी बुखार को, हम नज़रअंदाज़ करें, अपनी बीमा... »

राधे कृष्ण सा प्रेम धागा

हवा में उड़ाओ पतंग, खुद को जमीं पे खड़ा रखो। दान धर्म करके बंधुवर, अपना दिल भी बड़ा रखो। घमण्ड रुपी पतंग कटवाकर, सपनों को बुलंद रखो। रंग-बिरंगी पतंगों जैसा , परचम अपना लहराए रखो। धागे अनेक रंगों के, पकड़ मजबूत बनाए रखो। कच्चा हो या पक्का धागा, उलझने से बचाए रखो। प्रेम का धागा पक्का होता, उसपे विश्वास बनाए रखो। राधा-कृष्ण सा प्रेम धागा, दिल में सदा संजोए रखो। घर, परिवार, यार, दोस्त सबको धागे से बां... »

बम लहरी, बम बम लहरी

बम लहरी, बम बम लहरी (शिव महोत्सव विशेष) शिव शम्भू जटाधारी, इसमें रही क्या मर्जी थारी, सर पे जटाएं, जटा में गंगा, हाथ रहे त्रिशूलधारी। गले से लिपटे नाग प्रभू, लगते हैं भारी विषधारी, असाधारण वेश बना रखा, क्या रही मर्जी थारी।। भुत-प्रेत, चांडाल चौकड़ी, करते सदा पूजा थारी, राक्षस गुलामी करते सारे, चमत्कारी शक्ति थारी। शिवतांडव, नटराज नृत्यकला नहीं बराबरी थारी, मस्तक त्रिनेत्र खुले तो प्रभू, हो जाए प्र... »

पाँव फिर से जी उठे हैं

जब मिलीं दो युगल आँखें अधर पर मुस्कान धर के। गा उठे टूटे हृदय के भ्रमर मधुरिम तान भर के। सर झुकाकर दासता स्वीकार की अधिपत्य ने। गर्मजोशी जब परोसी अतिथि को आतिथ्य ने। यूँ लगा रूखे शहर में गाँव फिर से जी उठे हैं। 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 किंशुकों की कल्पना में कंटकों से घिर चुके थे। पत्थरों की ठोकरों से लड़खड़ाकर गिर चुके थे। सोंचकर छिलने की पीड़ा घाव डरने से लगे थे। फिर सफर के प्रबल आशा भाव मरने से लगे थे। तुम बने आल... »

मुस्कुराना

मुस्कुरा कर बोलना, इन्सानियत का जेवर है। यूं तेवर न दिखलाया करो, हम करते रहते हैं इंतज़ार आपका, यू इंतजार न करवाया करो। माना गुस्से में लगते हो, बहुत ख़ूबसूरत तुम पर हर समय गुस्से में न आया करो। बिन खता के ही खतावार से रहते हैं हम, यूं न हमें डराया करो। एक दिन छोड़ देंगे हम ये जहां, फिर ढूंढोगे तुम हमें कहां। तो मुस्कुराओ जी खोलकर, कह दो जो कहना है बोलकर। हमको यूं न सताया करो, मुस्कुराना इन्सानियत... »

वह बेटी बन कर आई है

एक युवती बन कर बेटी, मेरे घर आई है। अपने खेल खिलौने माँ के घर छोड़कर, हाथों में लगाकर मेहंदी और लाल चुनर ओढ़ कर मेरे घर आई है। छम छम घूमा करती होगी, माँ के घर छोटी गुड़िया सी झांझर झनकाकर, चूड़ियां खनका कर, मेरे घर आई है। बेटी बन चहका करती थी, बहू बन मेरा घर महकाने आई है। एक युवती बन कर बेटी, मेरे घर आई है। अपनी किताबें वहीं छोड़कर, उन किताबों को भीतर समाए मेरे पुत्र के नाम का सिन्दूर माँग में सजा... »

चिंता से चिता तक

मां बाप को बच्चों के भविष्य की चिन्ता, महंगे से स्कूल में एडमिशन की चिन्ता। स्कूल के साथ कोचिंग, ट्यूशन की चिन्ता, शहर से बाहर हाॅस्टल में भर्ती की चिन्ता।। जेईई, नीट, रीट कम्पीटीशन की चिन्ता, सरकारी, विदेशी कं. में नौकरी की चिन्ता। राजशाही स्तर का विवाह करने की चिंता, विवाह पश्चात विदेश में बस जाने की चिंता।। फर्ज निभाकर अब कर्ज चुकाने की चिंता, बुढ़ापे तक कोल्हू में फंसे रहने की चिंता। बच्चों के... »

उदास खिलौना : बाल कबिता

मेरी गुड़िया रानी आखिर क्यों बैठी है गुमसुम होकर। हो उदास ये पूछ रहे हैं तेरे खिलौने कुछ कुछ रोकर।। कुछ खाओ और मुझे खिलाओ ‘चंदा मामा….’ गा-गाकर। तुम गाओ मैं नाचूँ संग- संग डम -डम ड्रम बजाकर ।। वश मुन्नी तू इतना कर दे। चल मुझ में चाभी भर दे।। देख उदासी तेरा ‘विनयचंद ‘ रहा उदास खिलौना होकर। मेरी गुड़िया रानी आखिर क्यों बैठी है गुमसुम होकर।। »

भोजपुरी गीत – बड़ा प्यार आवेला |

भोजपुरी गीत – बड़ा प्यार आवेला | हमके त यार याद तू हर बार आवेला | काहे हमके त तोहरे पर बड़ा प्यार आवेला | मिलना होई की ना हमके कुछउ ना पता | हमार जान हऊ मत करिहा तू हमसे खता | प्यार बा तोहरे दिल मे इ बस सवाल आवेला | हमके त यार याद तू हर बार आवेला | उजड़ल दिल के कब सजईबु बतावा हमके | बन के फूल कब महकइबु सुनावा हमके | तोहरा अईले से उजड़ल बाग मे बहार आवेला | हमके त यार याद तू हर बार आवेला | हंसेलु त जईसे... »

लालच वृद्धि करता प्रति पल

जंगल का दोहन कर डाला, इन्सान तेरे लालच ने। कुदरत के बनाए पशु-पक्षी भी ना छोड़े, इन्सान तेरे लालच ने। हाथी के दांत तोड़े, मयूर के पंख न छोड़े मासूम से खरगोश की नर्म खाल भी नोच डाली, इन्सान तेरे लालच ने। चंद खनकते सिक्कों की खातिर, यह क्या जुल्म कर डाला। सृष्टि की सुंदरता का अंत ही कर डाला इन्सान तेरे लालच ने। कितना भी मिल जाए फिर भी, लालच वृद्धि करता प्रति पल। सुंदर पक्षी ना शुद्ध पवन कैसा होगा अपन... »

जाने तुम कहां गये

अरमानों से सींच बगिया, जाने तुम कहां गए। अंगुली पकड़ चलना सीखाकर, जाने तुम कहां गए।। सच्चाई के पथ हमको चलाकर, जाने तुम कहां गए। हमारे दिलों में घर बनाकर, जाने तुम कहां गए।। तुम क्या जानो क्या क्या बीती, तुम्हारे बनाए उसूलों पर।। वृद्धाश्रम में मां को छोड़ा, बेमेल विवाह मेरा कराया। छोटे की पढ़ाई छुड़ाकर, फैक्ट्री का मजदूर बनाया।। पुश्तेनी अपना मकान बेच, अपना बंगला बना लिया। किस्मत हमारी फूटी निकली,... »

वह एक मज़दूर है

भवन बनाए आलीशान, फ़िर भी उसके रहने को नहीं है उसका एक मकान। झोपड़पट्टी में रहने को मजबूर है हाँ, वह एक मज़दूर है। मेहनत करता है दिन रात, फ़िर भी खाली उसके हाथ। रूखी- सूखी खाकर वह तो, रोज काम पर जाता है। किसी और का सदन बनाता, निज घर से वह दूर है, हाँ, वह एक मज़दूर है। सर्दी गर्मी या बरसात, चलते रहते उसके हाथ। जीवन उसका बहुत कठिन है, कहता है किस्मत उसकी क्रूर है। हाँ, वह एक मज़दूर है।। _____✍️गीता »

कविता : समय का पहिया

मानो तो मोती ,अनमोल है समय नहीं तो मिट्टी के मोल है समय कभी पाषाण सी कठोरता सा है समय कभी एकान्त नीरसता सा है समय समय किसी को नहीं छोड़ता किसी के आंसुओं से नहीं पिघलता समय का पहिया चलता है चरैवेति क्रम कहता है स्वर्ण महल में रहने वाले तेरा मरघट से नाता है सारे ठौर ठिकाने तजकर मानव इसी ठिकाने आता है || भूले से ऐसा ना करना अपनी नजर में गिर जाए पड़ना ये जग सारा बंदी खाना जीव यहाँ आता जाता है विषय ,विला... »

चला चली का मेला

आखिर इक दिन सबको जाना है यह जग चला चली का मेला है यहाँ किसी का नही ठिकाना है फिर किस बात का घबराना है बस इतना सा हमारा अफ़साना है आख़िर इक दिन सबको जाना है ना कुछ संग आया था,ना जाना है कर्मो ने ही अपना फर्ज निभाना है पाप पुण्य की गठरी बांध उड़ जाना है पांच तत्व की काया को मिट्टी हो जाना है आखिर इक दिन सबको जाना है आत्मा को आवागमन से मुक्त कर क्षितिज पार जाना है कुछ प्रतीक्षारत तारों को एक बार गले ... »

सोंच अलग है

सोंच अलग है याददाश्त विलग है अपनी चाहतों के लिए वो आज हमसे अलग हैं लाखों जमा कर दोस्तों ने सारी उम्र की कमाई गवांई शहर की छोटी जमी के लिए वहीं पे सारी सुविधाएं जुटाई सिसकती रही गांव भूमि बेचारी जिन संसाधनों से जिंदगी बनाई कुछ ने बहुत सी फसलें उगाई जमीनें भी ली और बहुत सारी वहीं जहां की खुशबू ने पढ़ाई उन्हें शहर मंजिलो में पहुंचाई करनी पड़ेगी उनकी पर बड़ाई बचपन ने उन्हें यहीं खींच लाई आकर्षण के तार... »

वजूद

लफ़्ज़ों की कमी थी आज शायद या रूह में होने वाले एहसास की 💐💐💐💐💐💐💐💐 नही पता मुझको कहानी तेरी शायद बस इतना जानती हूं कि वजूद को तेरे 💐💐💐💐💐💐💐💐 तूझसे ज्यादा जानती हूं शायद ख्वाबबगाह में जो बसता है वो 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 अलग सी खुमारी और कशिश शायद मेरे रोम रोम में बसी है जो 💐💐💐💐💐💐 कैसे बताऊं तुमको क्या रूमानी एहसास है वो कैसे यकीं दिलाऊं कितना रूमानी है वो 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 बिन फरेब कितना मासूम है वो किसी ख्वाबगाह का सरता... »

एक अजन्मी की दास्तान

सुन्दर सपने देख रही थी, अपनी माँ की कोख में। मात-पिता का प्यार मिलेगा, भाई का भी स्नेह मिलेगा यह सब सुख से सोच रही थी, सहसा समझ में आया कि एक कैंची मुझको नोंच रही थी। क्यों कैंची से कटवाया, मुझको मेरी माँ की कोख में। पूछ रही है एक अजन्मी, एक सवाल समाज से। मैं भी ईश्वर का तोहफा थी, क्यों मेरे जीवन का अपमान किया। तुम्हें एक वरदान मिला था, क्यों ना उसका सम्मान किया। अगर मैं जीवित रहती तो, प्रेम से घर... »

माँ

अपनी माँ को छोड़ कर, वृद्धाश्रम के द्वार पर। जैसे ही वो बेटा अपनी कार में आया, माँ के कपड़ों का थैला, उसने वहीं पर पाया। कुछ सोचकर थैला उठाकर, वृद्धाश्रम के द्वार पर आया। बूढ़ा दरबान देख कर बोला, अब क्या लेने आए हो वह बोला बस यह माँ का, थैला देने आया हूं। दरबान ने फ़िर जो कहा उसे, सुन कर वह सह नहीं पाया, धरा निकली थी पैर तले से खड़ा भी रह नहीं पाया। वह रोता जाता था, भीतर बढ़ता जाता था मां सब मेरी ... »

किसानों का किया है इन्हीं ने तो बुरा हाल

आतंकियों के ठिकाने बदल रहे हैं शिकारियों के पैमाने बदल रहें हैं छिप-छिप के करते थे कभी ठगी जो लालच के उनके आशियाने बदल रहे हैं भोले-भाले को ठगना ही जिनका काम चींटियों की तरह बांबियां बनायी सरेआम सब का ही कर रखा है देखो रास्ता जाम इतने निष्ठुर तो नहीं कहीं होते हैं किसान बेईमानों की प्रत्यक्ष है पहली बार मंडली लूट का पता बता रही हैं तन जमी चर्बी नहीं है ये हितकारी न ही कोई किसान फुटपाथ पे ले आई इन्... »

मैं-मैं व तूं तूं

सारे व्यापार को तेरा आधार संबंधों में भी तुझसे ही है प्यार तुझमें ही सब और सबमें प्रकट तूं फिर भी सब में क्यूं भरा मैं मैं व तूं तूं पल पल के मीत जाते बीत प्यार सच्चा पर अंतराल का गीत नीरस जीवन में लाता मधुरता संगीत प्रियतम तेरे आशीष संबंध सुख पाते जीत तुझसे ही बने हैं सारे रूप नेह आगार भरे कितने अनूप सुंदर जो थे कैसे बन जाते कुरूप प्रभु तुझसे ही तो सब की छांव धूप अंत तुम्हीं तुझमें विश्राम तुझमें... »

बेटी

गांव गांव में मारी जाती, बेटी मां की कोख की, बेटी मां की कोख की, बेटी मां की कोख की।। जूही बेटी, चंपा बेटी, चन्द्रमा तक पहुंच गई, मत मारो बेटी को, जो गोल्ड मेडलिस्ट हो गई, बेटी ममता, बेटी सीता, देवी है वो प्यार की। बेटी बिन घर सूना सूना, प्यारी है संसार की, गांव गांव में मारी जाती, बेटी मां की कोख की।। देवी लक्ष्मी, मां भगवती, बहन कस्तूरबा गांधी थी, धूप छांव सी लगती बेटी, दुश्मन तूने जानी थी। कल्प... »

सागर और सरिता

सागर ने सरिता से पूछा, क्यों भाग-भाग कर आती हो। कितने जंगल वन-उपवन, तुम लांघ-लांघ कर आती हो। बस केवल खारा पानी हूं, तुमको भी खारा कर दूं। मीठे जल की तुम मीठी सी सरिता, क्यों लहराती आती हो। नि:शब्द हो उठी सरिता, उत्तर ना था उसके पास, बोली तुम हो कुछ ख़ास। ऐसा हुआ मुझे आभास, विशाल ह्रदय है तुम्हारा। फैली हैं दोनों बाहें देख, हृदय हर्षित होता है। आ जाती हूं पार कर के, कठिन कंटीली राहें।। ____✍️गीता »

‘‘फितरत’’

हे मानव तेरी फितरत निराली, उलट पुलट सब करता है, बंद कमरे में वीडियो बनाकर, जगजाहिर क्यों करता है? शादी पार्टी में खाना खाकर, भरपेट झकास हो जाता है, बाहर आकर उसी खाने की, कमियां सबको गिनाता है जिस मां की छाती से दूध खींच, बालपन में तू पीता है उसी मां को आश्रम में भेजकर, चैन से कैसे तू जीता है बचपन में तू जिद्द करके अपनी, हर बात मनवाता है बुढ़े माॅ-बाप की हर इच्छा को, दरकिनार कर जाता है मां, बहन, बेट... »

भटके हुए रंगों की होली

आज होली जल रही है मानवता के ढेर में। जनमानस भी भड़क रहा नासमझी के फेर में, हरे लाल पीले की अनजानी सी दौड़ है। देश के प्यारे रंगों में न जाने कैसी होड़ है।। रंगों में ही भंग मिली है नशा सभी को हो रहा। हंसी खुशी की होली में अपना अपनों को खो रहा, नशे नशे के नशे में रंगों का खून हो रहा। इसी नशे के नशे में भाईपना भी खो रहा।। रंग, रंग का ही दुश्मन ना जाने कब हो गया। सबका मालिक ऊपरवाला देख नादानी रो गया,... »

भोजपुरी पारंपरिक होली गीत – ये किसन कन्हईया |

भोजपुरी पारंपरिक होली गीत – ये किसन कन्हईया | होली मे करेला काहे बलजोरिया ये किसन कन्हईया | चुनरिया रंग देला मारी पिचकरिया ये किसन कन्हईया | केतनो लुकाई जहवा भाग जाई | खोजी हरदम हमके रंगवा लगाई | मनबा ना त कहब यशोदा मईया | ये किसन कन्हइया | जब हम जाई यमुना किनरवा | लुकाई भिंगाई देला मोर अंचरवा | छोड़ेना ना हमके केवनों ठहियां | ये किसन कन्हइया | गोरे गाल रंग देला कइसन ढंग बा | छूटे नाही कबों श... »

बसन्त का आगमन

हवाओं ने मौसम का, रूख़ बदल डाला। बसन्त के आगमन का, हाल सुना डाला। नवल हरित पर्ण झूम-झूम लहराए। रंग-बिरंगे फूलों ने, वन-उपवन महकाए। बेला जूही गुलाब की, सुगंधि से हृदय हर्षित हुआ जाए। कोमल-कोमल नव पर्ण, अपने आगमन से जीवन में ख़ुशहाली का, सुखद संदेशा लाए। बीता अब पतझड़ का मौसम, हृदय प्रफुल्लित हुआ जाए।। _____✍️गीता »

पारिजात के फूल

पारिजात के फूल झरे, तन-मन पाए आराम वहां। स्वर्ग से सीधे आए धरा पर, ऐसी मोहक सुगंधि और कहां। छोटी सी नारंगी डंडी, पंच पंखुड़ी श्वेत रंग की। सूर्य-किरण के प्रथम स्पर्श से, आलिंगन करते वसुधा का। वसुधा पर आ जाती बहार, इतने सुन्दर हैं हरसिंगार। रात की रानी भी इनका नाम, ये औषधीय गुणों की खान। श्री हरि व लक्ष्मी पूजन में होते अर्पण, इनकी सुगन्ध सौभाग्य का दर्पण। कितनी कोमल कितनी सुंदर, इन फूलों की कान्ति... »

वचन

जब कभी भी टूटे ये तंद्रा तुम्हारी, जब लगे कि हैं तुम्हारे हाथ खाली! जब न सूझे ज़िन्दगी में राह तुमको, जब लगे कि छलते आये हो स्वयं को! जब भरोसा उठने लगे संसार से , जब मिलें दुत्कार हर एक द्वार से! जग करे परिहास और कीचड़ उछाले, व्यंग्य के जब बाण सम्भले न सम्भाले! ईश्वर करे जब अनसुना तुम्हारे रुदन को, जब लगे वो बैठा है मूंदे नयन को! न बिखरना, न किसी को दोष देना, मेरे दामन में स्वयं को सौंप देना..!! अपन... »

सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

“बदली जो उनकी आंखें इरादा बदल गया। गुल जैसे चमचमाया कि, बुलबुल मसल गया। यह कहने से हवा की छेड़छाड़ थी मगर खिलकर सुगंध से किसी का, दिल बहल गया।” सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की, “बदली जो उनकी आंखें” से ली गई चंद पंक्तियां निराला जी की जन्म २१ फरवरी १८९६ को, हुआ मिदनापुर बंगाल में। हाथ जोड़ शत्-शत् नमन है उनको, २०२१वें साल में। पिता,पंडित राम सहाय त्रिपाठी, माता का नाम था रुक... »

मेरा मन

किसी की सिसकियां सुनती थी अक्सर, कोई दिखाई ना देता था। देखा करती थी इधर-उधर, व्याकुल हो उठती थी मैं, लगता था थोड़ा सा डर। एक दिन मेरा मन मुझसे बोला.. पहचान मुझे मैं ही रोता हूं, अक्सर तेरे नयन भिगोता हूं। मासूमों पर अत्याचार, बुजुर्गों को दुत्कार, वृद्धाश्रमों में बढ़ती भीड़, नारियों की पीड़, इन्हीं से दिल दुखी है दुनिया में क्यों हो रहा है यह व्यवहार। कब समाप्त होगा यह अत्याचार, बस यही सोच-सोच कर... »

शब्द-चित्र

कहती है निशा तुम सो जाओ, मीठे ख्वाबों में खो जाओ। खो जाओ किसी के सपने में, क्या रखा है दिन-रात तड़पने में। मुझे सुलाने की कोशिश में, जागे रात भर तारे। चाँद भी आकर सुला न पाया, वे सब के सब हारे। समझाने आई फिर, मुझको एक छोटी सी बदली मनचाहा मिल पाना, कोई खेल नहीं है पगली। पड़ी रही मैं अलसाई, फ़िर भोर हुई एक सूर्य-किरण आई। छू कर बोली मस्तक मेरा, उठ जाग जगा ले भाग, हुआ है नया सवेरा।। ____✍️गीता »

मातृभाषा

दर्द बनके आँखो के किनारों से बहती है! बनकर दुआ के फूल होंठो से झरती है!! देती है तू सुकून मुझे माँ के आँचल सा! बनके क़भी फुहार सी दिल पे बरसती है!! खुशियाँ ज़ाहिर करने के तरीक़े हज़ार है! मेरे दर्द की गहराई मगर तू समझती है!! जाऊँ कहीं भी मैं इस दुनिया जहान में! बन कर मेरी परछाईं मेरे साथ चलती हैं!! होगी ग़ुलाम दुनिया ये पराई ज़बान की ! मेरी मातृभाषा तू मेरे दिल में धड़कती है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद&#... »

धरती-पुत्र

मूसलाधार बारिश से जब, बर्बाद हुई फ़सल किसान की बदहाली मत पूछो उसकी, बहुत बुरी हालत है भगवन्, धरती-पुत्र महान की। भ्रष्टाचार खूब फैल रहा, काले धन की भी चिंता है। मगर किसी को क्यों नहीं होती, चिंता खेतों और खलिहान की। अपनी फ़सलों की फ़िक्र लेकर, हल ढूंढने निकला है हलधर लेकिन सबको फ़िक्र लगी है, अपने ही अभिमान की। मूसलाधार बारिश से जब, बर्बाद हुई फ़सल किसान की बदहाली मत पूछो उसकी, बहुत बुरी हालत है भ... »

फुलझडियां

मनचले ने रुपसी पर, तंज कुछ ऐसा गढ़ा, काश जुल्फ़ों की छांव में, पड़ा रहूं मैं सदा। रुपसी ने विग उतार, उसे ही पकड़ा दिया, ले रखले जुल्फ़ों को तू, पड़ा रह सदा सदा।। फेसबुक की दोस्त को, बिन देखे ही दिल दे दिया, जो भी मांगा प्रेयसी ने, आॅनलाईन ही भेज दिया। एकदिन पत्नी के पास वही गिफ्ट देख चौंक गया, उसकी पत्नी ही फ्रेंड थी, बेचारा मूर्छित हो गया।। पत्नी से प्रताड़ित पति ने ईश्वर को ताना दिया, क्या पाप क... »

मेहनत के रंग

वो बूढ़ी थी, गरीब थी भीख नहीं मांगी थी उसने, पैन बेच रही थी राहों में मेहनत का खाने की ठानी, मेहनत का ही खाती खाना मेहनत का ही पीती पानी। कहती थी यह पैन नहीं है, यह तो है किस्मत तुम्हारी खूब पढ़ना लिखना बच्चों बदलेगी तकदीर तुम्हारी। बदलेगा फिर भारत सारा, बदलेगी तस्वीर हमारी।। ____✍️गीता »

काँव काँव मत करना कौवे

काँव काँव मत करना कौवे आँगन के पेड़ों में बैठ तेरा झूठ समझता हूं मैं सच में है भीतर तक पैठ। खाली-मूली मुझे ठगाकर इंतज़ार करवाता है, आता कोई नहीं कभी तू बस आंखें भरवाता है। जैसे जैसे दुनिया बदली झूठ लगा बढ़ने-फलने तू भी उसको अपना कर के झूठ लगा मुझसे कहने। रोज सवेरे आस जगाने काँव-काँव करता है तू मुझ जैसों को खूब ठगाने गाँव-गाँव फिरता है तू। अब आगे से खाली ऐसी आस जगाना मत मुझ में तेरी खाली हंसी ठिठोली च... »

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