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संपादक की पसंद

  • होगा कोई लोभी

    कविता-होगा कोई लोभी
    ——————————-
    होगा कोई लोभी,
    होगा कोई ना समझ,
    जो तुम्हें खरीदे रुपयों में
    वरना तुम्हारी कीमत चवन्नी से भी कम है,
    अरे….
    होगा कोई आंख का अंधा,
    जो तुम्हारी सूरत को ,उगता चांद कहे,
    मेरी नजर में तुम बदसूरत सूरत हो,
    क्योंकि कवि बिन देखे कुछ नहीं कहता।
    होगा कोई कामी पुरुष,
    दिल में जगह पाने के लिए,
    सच्चाई ना कहके के बढ़ाई करें,
    लंगड़ी काली कानी बदसूरत को भी,
    अप्सरा मेनका से तुलना करें,
    बात बात पर तुम्हें हँसाये
    सपनों में लेकर चांद पर जाए,
    सच्चाई को देखता नहीं
    मां बाप का पैसा तुम पर उड़ाए,
    खरीदी होती कुछ किताबें,
    तुम्हें देता मुझे एतराज नहीं,
    एतराज मुझे इस बात से है,
    तुमने उसे घुमाया-
    पर पढ़ने के लिए कहा नहीं
    वो अंधा था,
    वो पागल था,
    बंदे में हर गुण था,
    लोगों को कैसे परखे,
    उसमें यह समझ नहीं था,
    परखा होता तुम्हें अगर,
    यह अच्छे घर की निशानी नहीं,
    यह अच्छे संस्कारों में पली नहीं
    यह रावण की बहन इच्छाधारी सूपनखा है
    किसी अच्छे भाई की बहन नहीं है,
    मेरे देश की हर बेटी,
    सीता मरियम राधा मीरा-
    के पद चिन्हों पर चलती है,
    यदि कोई उल्लंघन करके चलती,
    और रावण की बहन है
    विभीषण की बहन नहीं|
    —————————————
    कवि-ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-

  • ममता

    ममता किसने भर दी मन में
    गाय को बछड़े से ममता है
    माँ को बेटे से।
    ये ममता किसने भर दी मन में।
    ममता जिसने पैदा की वह
    ईश्वर सबसे ऊपर है,
    ममता का गुण सारे गुण से
    ऊपर है बस ऊपर है।
    पैदा होता है जब बच्चा
    होता है असहाय,
    निर्भर पूरी तौर वो माँ पर
    ममता रखे ख्याल
    ये ममता किसने भरी मन में।
    थोड़ा सा भी बालक रोये
    विचलित हो जाती है,
    कब है भूख प्यास कब है
    सब कुछ समझ जाती है।
    ये ममता किसने भरी मन में।
    ममता काफी कुछ जीवन में
    प्यार मुहब्बत देती है,
    ममता ही जीवन को देखो
    नई दिशाएं देती है।
    ममता किसने भर दी मन में।

  • करार

    किसी की जीत या किसी की हार का बाजार शोक नहीं मनाता। एक व्यापारी का पतन दूसरे व्यापारी के उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, प्रेम इत्यादि की बातें व्यापार में खोटे सिक्के की तरह हैं, जो मूल्यवान दिखाई तो पड़ती है , परन्तु होती हैं मूल्यहीन । अक्सर बेईमानी , धूर्त्तता, रिश्वतखोरी, दलाली और झूठ की राह पर चलने वाले बाजार में तरक्की का पाठ पढ़ाते हुए मिल जाएंगे। बाजार में मुनाफा से बढ़कर कोई मित्र नहीं और नुकसान से बुरा कोई शत्रु नहीं। हालाँकि बाजार के मूल्यों पर आधारित जीवन वालों का पतन भी बाजार के नियमों के अनुसार हीं होता है। ये ठीक वैसा हीं है जैसे कि जंगल के नियम के अनुसार जीवन व्यतित करनेवाले राजा बालि का अंत भी जंगल के कानून के अनुसार हीं हुआ। बाजार के व्यवहार अनुसार जीवन जीने वालों को इसके दुष्परिणामों के प्रति सचेत करती हुई व्ययंगात्मक कविता।

    करार
    बिखर रहा है कोई ये जान लो तो ठीक ,
    यही तो वक़्त चोट दो औजार के साथ।
    वक्त का क्या मौका ये आए न आए,
    कि ढह चला है किला दरार के साथ।

    छिपी हुई बारीकियां नेपथ्य में ले सीख ,
    कि झूठ हीं फैलाना सत्याचार के साथ ।
    औकात पे नजर रहे जज्बात बेअसर रहे ,
    शतरंजी चाल बाजियाँ करार के साथ।

    दास्ताने क़ुसूर भी बता के क्या मिलेगा,
    गुनाह छिप हैं जातें अखबार के साथ।
    नसीहत-ए-बाजार में आँसू बेजार हैं ,
    कि दाम हर दुआ की बीमार के साथ।

    चुप सी हीं होती हैं चीखती खामोशियाँ,
    ये शोर का सलीका कारोबार के साथ।
    ईमान के भी मशवरें हैं लेते हज्जाल से,
    मजबूरियाँ भी कैसी लाचार के साथ।

    झूठ के दलाल करे सच को हलाल हैं,
    पूछो न क्या हुआ है खुद्दार के साथ।
    तररकी का ज्ञान बांटे चोर खुल्ले आम,
    कि चल रही है रोजी गद्दार के साथ।

    दाग जो हैं पैसे से होते बेदाग आज ,
    बिक रही है आबरू चीत्कार के साथ।
    सच्ची जुबाँ की भी बोल क्या मोल क्या?
    गिरवी न चाहे क्या क्या उधार के साथ।

    आन में भी क्या है कि शान में भी क्या है,
    ना जीत से है मतलब ना हार के साथ।
    फायदा नुकसान की हीं बात जानता है,
    यही कायदा कानून है करार के साथ।

    सीख लो बारीकियाँ ये कायदा ये फायदा,
    हँसकर भी क्या मिलेगा व्यापार के साथ।
    बाज़ार में हो घर पे जमीर रख के आना,
    खोटे है सिक्के सारे कारोबार के साथ।

    नफे की खुमारी में तुम जो मदहोश आज,
    कि छू रहो हो आसमां व्यापार के साथ ।
    कोठरी-ए-काजल सफेदी क्या मांगना?
    सोचो न क्या क्या होगा खरीददार के साथ।

    काटते हो इससे कट जाओगे भी एक दिन,
    देख धार बड़ी तेज इस हथियार से साथ।
    मक्कार है बाजार ये ना माँ का ना बाप का ,
    डूबोगे तब हंसेगा धिक्कार के साथ ।
    अजय अमिताभ सुमन

  • बालपन मोबाईल में

    खो गए खेल
    आज बचपन के,
    रम गया बालपन मोबाइल में,
    आँख का सूख रहा पानी है
    टकटकी आज है मोबाइल में।
    वक्त है ही नहीं बचा जिससे
    संस्कारों को सीख लें बच्चे,
    कुछ रहा बोझ गृहकार्यों का
    बाकी सब खो गया मोबाईल में।
    न रहा सीखना बड़ों से कुछ
    न रही चाह सीखने की अब
    न रहा शिष्य गुरु का नाता अब
    गुरु तो अब भर गया मोबाईल में।
    खेल क्रिकेट के कब्बडी के
    हो रहे खेल सब मोबाईल में,
    तनाव बढ़ रहा मोबाईल में
    शरीर घट रहा मोबाईल में।
    छीन बचपन के खेलकूद सभी
    खा रहा है दिमाग मोबाईल
    जानते हैं कि एक घुन है यह
    फिर भी हैं डूबते मोबाईल में।

  • माँ और कवि

    कविता – मां और कवि
    —————————-
    मां और कवि में ,
    अंतर इतना,
    सीता और बाल्मिकी में,
    अंतर जितना,
    मां सुधा अगर है,
    कवि पारस पत्थर है,
    मां सरिता गर है,
    कवि सागर की गहराई है,
    मां गंगा सी निर्मल,
    या मानस की चौपाई है,
    कवि ब्रह्म समान,
    कवि ने ही मां की महिमा बतलाई है,
    यदि मां प्रेम की मूरत है,
    कवि मां की महिमा की सूरत है,
    मां बच्चों की जरूरत है,
    कवि दुखियों की जरूरत है,
    जान गई रोने से,
    बच्चे को भूख लगी है या टट्टी,
    कवि जान गया रोने से,
    दिल जलता आग की भट्टी से,
    मां हर्षित होकर रोती है,
    बच्चे को पाकर सोती है ,
    कवि खुद की व्यथा लिख कर सोता है,
    दुनिया सुनकर हंसती है,
    मां आंखों में आंसू भर कर
    गाल पर थपकी देती है,
    कवि शोक लहर में हो करके,
    कविता बैठ के लिखता है,
    मां रो भी दे आकार बने,
    कवि सौ ग्रंथ लिखे,
    ना आकार बने,
    बने आकार,
    प्रकार कई,
    मां के हर शब्दों में,
    प्यार कई,
    कवि और मां पर कविता लिखना,
    मेरे बस की बात नहीं ,
    कहें ऋषि मैं हार गया,
    तुकबंदी से चलता काम नहीं,
    ————————————-
    ✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’

  • आलसी तू आलसी है

    कविता- आलसी तू आलसी है
    ————————————–
    आलसी तू आलसी है
    तू बेरोजगार नही है
    आलस छोड़ काम कर
    वरना तेरी खैर नही है,
    डिग्री हैं डिप्लोमा हैं
    है पास तेरे कोई हुनर,
    कुछ नहीं है तो क्या कर सकता
    भैंस चरा और खेती कर,
    वक्त नहीं बिगड़ा है
    वक्त नहीं गुजरा है,
    बात मेरी मान
    कुछ सीख अभी समय बहुत है,
    बाल काटना सीख अभी,
    वाहन चलाना सीख अभी,
    वाहन बनाना सीख अभी,
    कर्ज ले सरकारी तू-
    पर काम शुरू कर आज अभी,
    सस्ता वाला काम बताऊं,
    हलवाई का काम सीख ले,
    इससे अच्छा काम बताऊं,
    चाय पान का धंधा कर ले,
    छोड़ आलसी आलस करना,
    दुनिया में तू भी नाम कमा,
    सब्जी की दुकान लगा ले,
    कम पूंजी में अच्छा कमा,
    जितना मेहनत आज करे तू,
    उतना सुख बच्चे पाएंगे,
    वरना वह भी किसी की भैंस चरायेंगे
    बैठ के तेरे संग बीड़ी फूंकेगें,
    घर छोड़ के परदेश चला जा,
    कारखानों में काम मिलेगा,
    समय बिताने से अच्छा है,
    परदेसी बन हर काम मिलेगा,
    ———————————
    ✍✍ऋषि कुमार प्रभाकर

  • युद्ध से एक सैनिक जब घर आया

    युद्ध से एक सैनिक घर आया,
    बिटिया को द्वारे पर पाया।
    एक हाथ में थैला था उसके,
    दूजा पीठ पीछे छिपाया।
    पांच साल की छोटी बिटिया के,
    चेहरे पर आई मुस्कान।
    उसने सोचा पापा के हाथ में,
    खाने-पीने का है कुछ सामान।
    चाॅकलेट, टाॅफी, बिस्किट सब कुछ,
    उसके ख्वाबों में आया।
    पीठ पीछे भाग कर आई,
    तो पापा का एक हाथ नहीं पाया।
    जंग में उसके पापा ने ,
    अपना एक हाथ गॅंवाया था।
    रोई पापा के गले मिल,
    उसको चैन न आया था।
    आंखें भर आई सैनिक की,
    गले लगाकर बिटिया से बोला वो,
    जंग जीत कर आया हूॅं बिटिया
    हाथ देखकर तू ना रो।
    सही सलामत देख पति को,
    उसकी पत्नी आंखों में आंसू ले मुस्काई थी
    जंग जीत कर आया साजन,
    यही सोच हर्षायी थी॥
    _____✍गीता

  • अपने अपने कर्मक्षेत्र में

    नफरत केवल खून सुखाता
    प्यार उजाला देता है।
    मेहनत का परिणाम अंततः
    हमें निवाला देता है।
    दूजे से ईर्ष्या रखने से
    नहीं किसी का भला हुआ,
    अपने ही संघर्ष से साथी
    सबका अपना भला हुआ।
    आमंत्रण देता कीटों को
    मधु भर पुष्प खिला हुआ
    ले जाओ मकरंद मधुर रस
    अपनी किस्मत लिखा हुआ।
    लेकिन उड़ने का प्रयास तो
    उनको ही करना होगा
    पाने को मकरंद मधुर
    मधुमक्खी को उड़ना होगा।
    प्यार मुहब्बत दया भाव से
    हम सबको रहना होगा,
    अपने अपने कर्मक्षेत्र में
    तत्पर रहना ही होगा।

  • कोमल आभा बिखर रही है ( चौपाई छन्द)

    चमक रही है नयी सुबह
    सूरज की किरणें फैली हैं,
    बन्द रात भर थी जो आंखें,
    उनमें नई उमंग खिली है।
    गमलों के पौधों में देखो,
    नई ताजगी निखर रही है,
    फूलों में कलियों में प्यारी
    कोमल आभा बिखर रही है।
    आँखें मलते गुड़िया आयी,
    सुप्रभात कहने को सब से,
    शुभाशीष लेकर वह सबका
    प्रार्थना करती है रब से।
    बिजली के तारों में बैठी
    चिड़ियाओं की बातचीत सुन,
    ऐसा लगता है दिन भर के
    रोजगार की है उधेड़बुन।
    राही थे आराम कर रहे
    अपनी-अपनी शालाओं में
    वे सब फिर से निकल चुके हैं
    सुबह सुबह की वेलाओं में।
    काव्यगत सौंदर्य – चौपाई छन्द में प्रकृति वर्णन का छोटा सा प्रयास।

  • एक बूँद भी टपक न पाई

    स्टैंड पोस्ट का नल बेचारा
    खड़ा रहा बस खड़ा रहा,
    एक बूंद भी टपक न पाई,
    ऐसा सूखा पड़ा रहा।
    प्यासों के खाली बर्तन जब
    देखे उसने रोना चाहा,
    मगर कहाँ से आते आँसू,
    ऐसा सूखा पड़ा रहा।
    पिछली बारिश के मौसम में
    ठेकेदार ने खड़ा किया था,
    तब पानी था स्रोतों में भी,
    इस कारण से खड़ा किया था,
    जैसे ही बीती बरसातें
    क्या करता बस खड़ा रहा,
    एक बूंद भी टपक न पाई
    आशा में बस खड़ा रहा।
    परेशान है टोंटी उसकी
    आते-जाते घुमा रहे हैं,
    यह भी तो बेकार लगा है
    ऐसी बातें सुना रहे हैं।
    कुछ करना बस नहीं है उसके
    बस उलझन में खड़ा रहा है,
    कभी तो टपकेगा जल मुझसे
    ऐसी आशा लगा रहा है।

  • पेट में हैं दांत…!! मैं मजदूर कहाऊं

    नही हाथ में उंगलियां
    पर पेट में हैं दात
    जितना कमाती है किस्मत
    उतना खाती आंत
    उतना खाती आंत
    करूं क्या मुझे बताओ
    मेरी हालत पर
    तुम ना हमदर्दी दिखाओ
    काम कराओ
    फिर मुझको दो
    हक का दाना
    मजदूर हूँ पर
    मजबूर ना हमें बतलाना
    कर्म करके भरता हूँ पेट
    मुफ्त की मैं ना खाऊं
    हूँ मजदूर इसी कारण
    मैं मजबूर कहाऊं…

  • भोर

    भोर होती है
    हर रोज
    बहुल के लिए
    आशा की
    एक किरण लेकर
    नऐ विचार
    नई ख्वाहिशें
    नई चाह
    नई भूख
    जो होती है
    पद-प्रतिष्ठा
    धन- दौलत
    वस्तुओं
    संबंधों
    को समेटने की…

    बहुल के होती है भोर
    बस वही प्राचीन
    एक चिर-परिचित
    भूख लिए
    रोटी की…..

  • असामान्य समय

    घड़ी तो घड़ी है
    साधारण हो या फिर असामान्य।
    पर समय बड़ा हीं
    होता जग में सदा से असामान्य।।
    टिक – टिक करती सूई वाली।
    अपने हीं चाल में चलने वाली।।
    डिजिटल घड़ी में अंकों का मेल।
    जिसे चलाए व दर्शाए विद्युत सेल।।
    चाभी वाली हो या विद्युतवाली
    जग में दोनों है अतिमान्य। । घड़ी तो घड़ी है………
    भरके सिक्ता काँचपात्र में
    पूर्वकाल में घड़ी बनाया।
    उलट – पुलट कर यंत्र हमारा
    सतत समय सबको बतलाया ।।
    साधारण से असामान्य बनी
    पर समय सदा असामान्य रहा।
    ‘विनयचंद’ नहीं केवल भैया
    जग के सब गणमान्य कहा।।

  • उषा काल की मॅंजुल बेला

    उगते सूर्य की रश्मियाँ,
    जब-जब पड़ी हरित किसलय पर
    सुनहरी पत्तियाँ हो गईं,
    देख सुनहरी आभा उनकी,
    आली, मैं कहीं खो गई।
    वृक्षों के बीच-बीच से,
    रश्मियाँ छन-छन कर आती थीं
    उषा काल की सुन्दर बेला में,
    मेरे मन को भाती थीं।
    उषा काल की सूर्य रश्मियाँ,
    सबके भाग जगाती हैं।
    कोयल भी कुहू-कुहू कर,
    मीठे राग सुनाती है।
    उषा काल की मॅंजुल बेला,
    मन को बहुत लुभाती है।
    ठॅंडी-ठॅंडी पवन बहे जब,
    याद किसी की आती है॥
    ____✍गीता

  • मेरी बेटी, मेरी है, सिर्फ मेरी है

    मेरी बेटी, मेरी है, सिर्फ मेरी है
    मेरी है, मेरी है, सिर्फ मेरी है,
    तुम सिर्फ मेरी है,
    मेरे बिना कोई दूसरा तुम से ज्यादा प्यार नहीं कर सकता मेरी जान,
    तेरे सिवा किसी ओर से प्यार नहीं करुँगी,
    तेरे नाम ही होगी मेरी आखिरी सांस,
    तेरे साथ ही ये ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ मेरी गुड़िया,
    मुझे ताने तब देना जब मैं तेरे साथ नहीं होगी, जीते जी तुझे छोड़ नहीं सकती मेरे बच्चे और मरुँगी मैं उस समय,
    जब तुम मेरे साथ नहीं होगी, मेरी बेटी,
    मेरी दुनिया जितना प्यार मैं तुम से करती हूं,
    उतना तुम सोच नहीं सकती,
    मुझे दिन रात तेरी फिक्र बहुत सताती है,
    मेरी बच्ची, मेरी बेटी तू ही मेरे जीने का एकमात्र सहारा है,
    मेरी बेटी, मेरी है सिर्फ मेरी है,
    मेरी बेटी मेरी दुनिया है,
    अपनी दुनिया, अपनी प्यारी बेटी तुम्हे सीने से लगाकर रखूगी,
    मेरी बेटी, मेरी है, सिर्फ मेरी है

  • वक्त मुश्किलों से भरा है

    हम सब परेशान है
    ये वक्त ही मुश्किलों से भरा है
    सब रास्ते है खुले
    और सड़के भी साफ है
    एक किनारे पर है चलना
    दुसरे पर मौत है
    ज़िंदगी की इस सफर में
    सब मौत से डरा है
    हम सब परेशान है
    ये वक्त ही मुश्किलों से भरा हैं
    हर कोई कोशिशें कर रहा है
    ज़िंदगी में खुशियाँ लाने की
    हर एक की ये चाह है
    की ज़िंदगी में हो खूशी
    ज़िंदगी का दर्द है
    और मौत का है खौफ
    रोज रोज ये ज़िंदगी
    रोज रोज ये मौत
    मौत का है ज़ोर पर
    जीने का फैसला हैं
    हम सब परेशान हैं
    ये वक्त ही मुश्किलों से भरा है।।

  • दो रूप न दिख पाऊँ

    हाथी की तरह
    दो दांत मत देना मुझे प्रभो
    कि बाहर अलग, भीतर अलग।
    दो रूप न दिख पाऊँ।
    दो राह न चल पाऊँ।
    जैसा भी दिखूँ
    एक दिखूँ,
    नेक रहूँ।
    न किसी से ठेस लूँ,
    न किसी को ठेस दूँ।
    बिंदास गति में बहती
    नदी सा
    चलता रहूँ।
    हों अच्छे काम मुझसे,
    उल्टा न चलूँ
    सुल्टा रहूँ,
    धूप हो या बरसात हो,
    उगता रहूँ,
    फूल बनकर
    बगीचे में खिलता रहूँ।
    महक बिखेरता रहूँ,
    प्रेम सहेजता रहूँ।

  • सखी चली ससुराल

    मेरी एक सखी चली ससुराल,
    आशीष लेकर बुजुर्गों का।
    गले मिलकर सखियों के,
    भावी जीवन के सपने
    लेकर अपनी अंखियों में
    सखी चली ससुराल।
    सखियों की भी दुआएँ,
    लेती जाना तुम।
    साजन सॅंग मिलकर,
    नव-सॅंसार बसाना तुम।
    पर भूल ना जाना हमको आली,
    बतियाॅं वही पुरानी वाली।
    याद हमें तुम आओगी ज्यादा,
    भूल न जाना अपना वादा।
    प्रेम-प्रीत हमारी तुम्हारी,
    साजन संग मिल भूल न जाना।
    अरे !अरे! रोना नहीं है,
    अच्छा अब हॅंस दो ना थोड़ा
    ये बन्धन ईश्वर ने जोड़ा।
    याद हमें भी रखना बस तुम,
    भूल ना जाना सखी प्यारी
    साजन के द्वारे अब जा री॥
    ____✍गीता

  • सुधार की दरकार

    कर्म के लिए कहां कोई करार
    बैठे हैं बेकार आलस की कतार
    बेजार की पगार सरकार की बुखार
    तंत्र में अरसे से सुधार की दरकार
    सुरक्षा की दीवार में है दरार
    अधिकारी दे रहे भ्रष्टों को दुलार
    देश की धार हो रही जार जार
    श्रमिकों का हो रहा जीना दुश्वार
    खाश पदों पर काबिज हैं गंवार
    बोझ के डर से कब से हैं फरार
    कागज चुरा बने काम के शाह
    हीरा कब कहे मैं हूं बादशाह
    सरकार के संस्कार में रविवार
    कैसे मिटेगा वतन से भ्रष्टाचार

  • खबर ले ले

    कविता- खबर ले ले
    ————————-
    कोई तो हो खबर ले ले,
    कहां थे अब तक-
    यह सवाल पूछ ले,
    वक्त का हिसाब मांगे,
    साथ रहने का साथ मांगे,
    हो फोन जब व्यस्त मेरा,
    फोन पर ही दो बात कह दे,
    वक्त गुजार रहे या,
    औरों को वक्त दे रहें,
    क्या बात है आजकल,
    हमसे जो दूर हो रहें ,
    रुठ जाए इसी बात पर,
    उसे मनाने के लिए –
    हम कई उपाय कर रहे,
    पुरानी बातों को याद करके
    पहले मिलन का वही गीत गा रहे,
    नाराजगी दूर हो जाए,
    पुराने पत्रों को हम चुम रहें,
    हंसाने के चक्कर में
    गाल पर एक चाटा मिला,
    बेशर्म इंसान हो-
    सुनने को यह शब्द मिला,
    ठमक के नखरे के संग
    बिस्तर पर लेट जाए,
    बुद बुदाये क्रोध दिखाएं
    कोई तो हो मुझसे रूठ जाए|कोई तो हो……
    रूठ जाए हम उसे मनाए ,
    प्यार में उसके गीत गाए,
    सर दुख रहा है, तुम भी न खाओ,
    कमरे से यह आवाज आए,
    लाल किला कुतुब मीनार
    ताजमहल की बात करूंगा,
    शिमला रांची नैनीताल,
    गोवा चलने की बात करूंगा,
    सर पर हाथ फेर कर उसे मनाऊं,
    पकड़ कर हाथ की उंगली उसे उठाऊं,
    झटक दे हाथ मेरा-
    फिर पास बैठ कर ,उसे मनाऊं
    नाराजगी इतनी बड़ी हो जाए,
    बिना गलती स्वीकार किए-
    ना माफी पाऊं,
    फिर उठे साथ चले
    क्रोध पीकर प्यार दिखाएं,
    कोई तो हो!
    रूठे और मनाने का-
    हमें भी अवसर दे जाए| कोई तो हो……..
    ——————————————————-
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

  • तुम्हारी आँखे

    कल अचानक ही तुम्हारी तस्वीर पर आकर
    ठहर गईं मेरी निगाहें…
    और मैं उलझकर रह गयी तुम्हारी
    आँखों के तिलिस्म में ..!!

    गहरी ख़ामोशी समेटे हुए सागर सी ये तुम्हारी आँखे,
    साक्षी हैं ज़िन्दगी के न जाने कितने तूफानों,
    न जाने कितने ही चक्रवातों की,
    दर्द के लाखों मोती रोज ही मिलते हैं
    इस सागर की तलहटी में..!!

    जानते हो एक दिलचस्प किस्सागोई करती हैं ये,
    तुम्हारे होंठों से कहीं ज़्यादा कहानियाँ बसती
    हैं तुम्हारी आँखों में,
    तुम्हें पता है, एक पूरी ज़िन्दगी बिताई जा सकती है
    इन्हें पढ़ते हुए..!!

    उदासियों द्वारा कत्ल की गई शामों के लहू में डूबी
    ये तुम्हारी कत्थई आँखे जब भी नम होती होंगी
    तो अमावस के अंधेरों से लड़ते हुए किसी
    सुर्ख तारे सी चमकती होंगीं,
    जब तुम हँसते होंगे तो हजारों जुगनू झिलमिलाते
    हुए नज़र आते होंगे इनमें…!!

    तुम्हारी इन आँखों को निहारते हुए अचानक ये
    एहसास हुआ कि ईश्वर का निवास इंसान के
    हृदय में नहीं बल्कि आँखों में होता है.. !!

    सुनो! अगर कल को ज़िन्दगी से हारी हुई कोई
    तलाश तुम्हारी आँखों मे पनाह माँगे न तो
    उसे निराश मत करना,
    क्योंकि मैं चाहती हूँ कि ये दुनिया इस तथ्य को जाने
    कि इस क़ायनात में अब भी एक महफूज़ जगह है
    और वो है ‘तुम्हारी आँखे’…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • बिल्ली की पूछ

    बिल्ली की पूंछ
    ——————-
    रुकी कलम अगर
    भूत भविष्य बिखर जाएगा
    रखो न हाथ गिरवी,
    जमाना भूखे बच्चों को-
    व्रती बता जाएगा,
    जिन्हें शुद्ध पानी नसीब नहीं,
    उन्हें बोतल का-
    पानी पीने की सलाह दे जाएगा,
    अब तो खबर बेखबर हुई
    टीवी पर झूठी बहस हुई
    रोजगार भ्रष्टाचार
    रेप हत्या एसिड,
    संसद में अपराधियों की संख्या बढ़ रही,
    जनहित के मुद्दे सब गायब हैं,
    हीरोइन की शादी, नेता की नींद,
    सरकारी संपत्ति बेचने की डील,
    किसकी बेटी भागी किसके साथ है
    अश्लील जोक्स कार्टून,
    निरोध,जापानी तेल से भरा अखबार है
    बिल्ली की पूंछ
    पर बहस हो रही है
    टीवी पर कुछ बड़ाई कर रहे हैं
    संसद में कुछ लड़ाई कर रहे हैं
    एक आंख मारता
    एक भक्ति के नाम पर झूठ बोलता,
    जहां पशुओं से अधिक
    इंसान की कीमत गिर गई,
    गाय से अधिक-
    भैंस की कीमत हो गई,
    किसान भी कितना लाचार है,
    गाय का दूध बिके ना साठ रुपए में,
    गोमूत्र बिके सौ रुपए में,
    इन पर बहस कौन करेगा,
    मां भारती का दर्द कौन लिखेगा,
    भूखे नंगे सो रहे जो फुटपाथ पर
    उनका दर्द कौन लिखेगा,
    हमें कुछ हाथ जुबा गिरवी लग रहे हैं
    कविता को हथियार बनाकर,
    ‘ऋषि’ क्या तुम भी स्वतंत्र निष्पक्ष
    हर मौसम में हर प्रकार की
    जनहित से जुड़ी कविता लिख रहे ।
    ———————————————
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

  • हिरण सा मन बना लूँ

    जुबान से मेरी
    किसी का दिल न दुखे
    न कभी लेखनी यह,
    ठेस के भाव लिखे।
    न निशाना हो मेरा
    कहीं पर व्यक्तिगत सा
    न कोई बात बोलूं
    दिखूँ जो व्यक्तिगत सा।
    चाह इतनी रखूं कि
    दिखे जो अनगिनत सी,
    भूल जाऊँ वो टूटन
    जो उपज थी विगत की।
    हिरण सा मन बना लूँ
    दिखे चंचल सा बाहर
    मगर भीतर कलेजा
    शेर का अब लगा लूँ।
    धीर-गंभीर बैठूँ
    नहीं विचलित कहीं पर,
    कदम रौखड़ जमीं
    आँख होंगी नमी पर।
    भटक जाऊँ अगर तो
    वहां पहुँचूं भटकर
    जहाँ मन ईश मन्दिर
    खड़ा बिंदास डटकर।
    लिखूं वो सब मुझे जो
    ले चले प्रेम पथ पर,
    मिटा दूँ सब गलत वह
    उगे जो द्वेष पथ पर।

  • जीवन की मधुर बातों में

    गुनगुनाते गीत मेरे
    जीवन से जुड़े लफ़्ज़ों में
    बुजुर्गों की दुआओं में,
    प्रेम की निगाहों में ।
    ममता के अश्कों में,
    उमड़ते भावों में
    भर रहे घावों में
    टूटती चाहों में
    दर्द में आहों में।
    निकलते बोल मेरे
    जीवन की मधुर बातों में
    नेह भरे नातों में
    मीठी मुलाकातों में
    बीत गई यादों में,
    गुनगुनाते रहे
    गीत मेरे होंठो में
    बिक रहे नोटों
    बड़ों में छोटों में
    दिल में लगी चोटों में,
    निकलते बोल मेरे
    ईश तुम सुन लेना
    और सत पथ देना।

  • अभी कहाँ तू थककर बैठ गया ! तुझे क्षितिज तक जाना है…

    जीवन में उत्साह हो
    मन नाचे बनकर मोर
    हे युवा ! तू परिश्रम कर
    सफलता मिलेगी घनघोर
    अभी तो तूने जीवन की
    बस एक दोपहरी देखी है
    अभी तो तूने सावन की
    बस पहली बारिश देखी है
    अभी तो तुझको अपनी हथेली पर
    भाग्य का दिनकर उगाना है
    भावों का मंथन करके तुझको
    साहित्य का सागर पाना है
    अभी कहाँ तू थककर बैठ गया
    तुझे क्षितिज तक जाना है….

  • “परिपक्व बंधन”

    हमारे परिपक्व बंधन पर था
    घोर अंधेरा छाया
    एक भंवरे ने आकर के
    तेरा हाल बताया
    तेरी बेचैनी पर मेरी आँख
    भर आई
    तेरी नादानी पर मुझको
    हँसी खूब है आई
    ये कैसा अल्हण पन है ?
    यह फागुन का मौसम है
    आ बाँहों में तू आ जा
    यह मन अब भी पावन है
    है तूने दूरी बनाई
    है पास तुझे ही आना
    एक वादा अब कर देना
    फिर दूर कभी ना जाना….

  • धरा के सच्चे हीरे हैं

    आशा भी न थी कि मिल पायेंगे
    बचपन के कई साल गुजारे साथ
    दशकों तक सिर्फ याद बन जायेंगे
    मीठे ख्वाब फिर कहीं गुम जाएगें

    बहस में पड़ने वाले कई होंगे
    सामंजस्य बिठाने वाले थोड़े हैं
    मतभेद को जो मिटा सके
    वो ही धरा के सच्चे हीरे हैं

    सुख दुख के साथी हम सब
    किसी के अधिकार से दूर रहें
    बड़ी मुश्किल से मिलें है यारों
    आपसी तूं तूं मैं मैं से दूर रहें

    सभी मुसाफिर हैं यहां जगत में
    शदियों से लगा आना जाना हैं
    खेल खिलौने धन थे पहले से ही
    बस मेरा तेरा साथ ही पुराना है

  • अश्क चमकीले ओस बने

    मेरे अश्क जो गिरे धरा पर,
    वो चमकीले ओस बने।
    मुस्कुरा दिए वो दूर से देखकर,
    मैं मोम सी पिघलती रही..
    वो पाहन सम ठोस बने।
    मेरी सिसकियों में उनको,
    ठॅंडी पवन का एहसास हुआ
    मेरे गर्म आंसू..
    मेरी देह पिघलाते रहे॥
    _______✍गीता

  • साहित्य है सबके लिए

    साहित्य है सबके लिए,
    यही समाज का है दर्शन।
    रुचिकर भी हो पढ़ने में,
    हो उस काल का दर्पण।
    जीवन की समस्याओं पर भी करे विचार,
    ऐसा हो साहित्यकार।
    कठिनाइयों पर विजय पाने की,
    नैराश्य में आशा लाने की
    जो कवि ज्योति जगाता है,
    वही सच्चा कवि और साहित्यकार कहलाता है।
    सूरज का उगना,डूबना
    उषा और संध्या की लाली,
    सुन्दर सुगन्धित चलती पवन
    और कभी फलों की झुकी डाली।
    प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन,
    जब कोई कवि निज कलम से करता है,
    प्रतिदिन आने वाली चिड़िया की भी,
    वह मीठी बोली सुनता है।
    कल-कल करती नदी बहती
    झर-झर झरने बहते हैं
    नाचता हुआ मयूर है दिखता,
    इसे ही सौंदर्य कहते हैं।
    समाज की समस्याओं की ओर,
    जब साहित्यकार ध्यान दिलाता है
    अवसाद निराशा में डूबा मानव भी
    आशा की किरण को पाता है।
    यही है साहित्य का काम,
    इसलिए कवि कलम को ना दो आराम
    काली घटाएं ठंडी हवाएं,
    साहित्य की यही जान हैं
    मौसम और माहौल से परिचित करवाना,
    यही साहित्य की पहचान है॥
    _______गीता कुमारी

  • ईस्टर संडे

    21 मार्च के बाद,
    प्रथम पूर्णिमा के पश्चात
    आने वाले पहले रविवार
    ईस्टर संडे मनाया जाता है।
    गुड फ्राइडे के बाद,
    आने वाला प्रथम रविवार
    ईस्टर संडे कहलाता है।
    उषा काल में महिलाओं द्वारा,
    की जाती है आराधना
    क्योंकि इसी समय हुआ था,
    प्रभु यीशु का पुनरुत्थान।
    पौराणिक कथा के अनुसार,
    गुड फ्राइडे के तीसरे दिन रविवार को,
    ईसा मसीह पुनः जी उठे,
    करने उत्थान संसार का।
    इसीलिए यह है एक पावन पर्व।
    “ईस्टर संडे” के नाम का।
    गिरजाघर में एकत्रित होकर,
    जलाकर मोमबत्तियां
    याद किया जाता है यीशु को,
    दी जाती है बधाइयां।
    प्रभु भोज में फिर शामिल होकर,
    सब होते हैं प्रसन्न।
    अपने-अपने घरों को भी,
    मोमबत्ती और प्रकाश से करते हैं रौशन।
    याद करते हैं यीशु के प्रेम के संदेश को,
    शीश झुकाते हैं उनके प्रेम और सत्य के वेष को॥
    _______✍गीता

  • मित्रता में राम हो मित्रता में श्याम हो

    मित्रता में राम हो
    मित्रता में श्याम हो
    बस अंगुली पकड़ के चलने दो
    दिल में अपने रहने दो,
    सत्य वचन, सत्य के प्रेमी,
    ना बड़बोला,
    हक है इतना
    सब कुछ कहना,
    स्व हित परहित,
    सब कुछ कहना,
    डांट प्यार से,
    मां भाई बनकर ,
    कान पकड़कर ,
    गाल पर थप्पड़ देना,
    गुरु का डंडा
    मां के मुख से निकली वचन है गंगा
    भाई पिता के हाथों का डंडा,
    है सुधा संस्कार विजय का झंडा,
    दादी तेरा डांट मिले,
    बाबा के मुख से गाली,
    तुम जो कहते अनुभवों से ,
    हम जो करते बिन अनुभव से,
    इसीलिए रूठ जाता हूं ,
    फिर से मुझे आज संभालो
    कच्चा घड़ा हू,
    कच्चा घड़ा के जैसे टूट जाता हूं
    ————————————–
    कवि ऋषि कुमार प्रभाकर

  • अपना सावन

    सावन तुमसे माफी है
    माफी दिनकर कालिदास के बच्चों से है,
    काफी दिन मै दूर रहा
    दूर कारण-
    फोन मेरा चोरी हुआ था,
    अभी फोन लिया नही
    पर सावन तुमसे दूर हुआ नही,
    कहां गए सब ,
    सावन आज बुलाता है,
    पतझड़ जैसे दिखता है,
    देख अस्तित्व को रोता है,
    गालिब के बच्चों,
    कालिदास के बच्चों
    बच्चन की मधुशाला पीकर
    क्या भटक गए हो,
    कोई टैगोर की धरती से था,
    कोई जम्मू कश्मीर से था,
    कोही पूरब पश्चिम से था,
    कोई दिनकर की धरती से था,
    कोई प्रयागराज से था,
    कोई कन्याकुमारी से था,
    कहां गए सब सावन पूछ रहा है,
    गर्मी जाति वर्षा आती,
    वर्षा मे सावन पतझड़ जैसा लगता है
    आओ मिलकर एक काम करें,
    सावन के माध्यम से जनता से संवाद करें,
    उसके हित की बात करें
    देश धर्म का उत्थान करें,
    हर कष्टों का उपचार करें ,
    बिग बिगड़ी बातों को नजरअंदाज करें ,
    सब मिलकर के सावन को कविता से भर ,
    ————————————————
    कवि ऋषि कुमार प्रभाकर

  • पश्चाताप

    अक्सर मंदिर के पुजारी व्यक्ति को जीवन के आसक्ति के प्रति पश्चताप का भाव रख कर ईश्वर से क्षमा प्रार्थी होने की सलाह देते हैं। इनके अनुसार यदि वासना के प्रति निरासक्त होकर ईश्वर से क्षमा याचना की जाए तो मरणोपरांत ऊर्ध्व गति प्राप्त होती है।  व्यक्ति डरकर दबी जुबान से क्षमा मांग तो लेता है परन्तु उसे अपनी अनगिनत  वासनाओं के अतृप्त रहने  का अफसोस होता है। वो पश्चाताप जो केवल जुबाँ से किया गया हो  क्या एक आत्मा के अध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो सकता हैं?

    तुम कहते हो करूँ पश्चताप,
    कि जीवन के प्रति रहा आकर्षित ,
    अनगिनत वासनाओं से आसक्ति की ,

    मन के पीछे भागा , कभी तन के पीछे भागा ,
    कभी कम की चिंता तो कभी धन की भक्ति की। 

    करूँ पश्चाताप कि शक्ति के पीछे रहा आसक्त  ,
    कभी अनिरा से दूरी , कभी  मदिरा की मज़बूरी  ,
    कभी लोभ कभी भोग तो कभी मोह का वियोग ,
    पर योग के प्रति विषय-रोध के प्रति रहा निरासक्त?

    और मैं सोचता हूँ  पश्चाताप तो करूँ पर किसका ?
    उन ईक्छाओं की जो कभी तृप्त  ना हो  सकी?
    वो  चाहतें  जो मन में तो थी पर तन में खिल ना सकी?

    हाँ हाँ इसका भी अफ़सोस  है मुझे ,
    कि मिल ना सका मुझे वो अतुलित धन ,
    वो आपार संपदा जिन्हें रचना था मुझे , करना था सृजन। 

    और और भी वो बहुत सारी शक्तियां, वो असीम ताकत ,
    जिन्हें हासिल करनी थी , जिनका करना था अर्जन। 

    मगर अफ़सोस ये कहाँ आकर फंस गया?
    कि सुनना था अपने तन की। 
    मोक्ष की की बात तो तू अपने पास हीं रख ,
    करने दे मुझे मेरे मन की। 

    अजय अमिताभ सुमन

  • मेहनत-मंजिल

    मनुष्य सोचता है
    मंजिल दिखे तो ,
    तब मैं मेहनत करूँ।
    मंजिल सोचती है
    मेहनत करे तो
    उसे झलक दे सकूँ।
    ऐसे में जिसने
    कर्मपथ को अपना
    कदम है बढ़ाया,
    उसी ने हमेशा
    मंजिल को पाया।
    जिसने दिखाया
    आलस्य खुद में
    उसने स्वयं का
    पथ भटका पाया।
    जिसने निगाहों को
    शिखर पर टिकाया
    उसने स्वयं को
    मंजिल में पाया।
    जिसने भी मन अपना
    भटका दिया,
    उसने स्वयं को
    अटका दिया।
    कल के लिए काम
    लटका दिया
    उसने स्वयं को
    झटका दिया।

  • गुड फ्राइडे

    शुक्रवार का ही दिवस था,
    यीशु के बलिदान का दिन,
    सूली पर चढ़ गए,
    उस महान इन्सान की याद का दिन।
    शत्-शत् नमन है ईसा मसीह को
    मसीहा था जो इन्सानियत का
    एक पवित्र आत्मा इस धरा पर आई
    देने को प्रेम का संदेश।
    25 दिसंबर को जन्म हुआ था,
    येरूशलम के बेतलहम गांव में।
    माता का नाम मदर मरियम,
    पिता का नाम जोसफ था।
    यहाँ कुछ लोग उन्हें,
    प्रभु का पुत्र या अवतार मानते हैं।
    ईस्टर के पहले शुक्रवार को,
    कुछ लोगों के कहने पर पितालुस ने,
    क्रॉस वाली सूली पर लटकाया था।
    गुड फ्राइडे मनाते हैं, यीशु की याद में
    प्रार्थना करते हैं और मोमबत्तियां जलाते हैं
    ईसा मसीह की याद में।
    तकदीर सुधारने आए थे,
    वो सब की इस संसार में।
    बिना किसी गलती के ही,
    चढ़ा दिया था सूली पर
    संसार के कुछ शैतानों ने।
    आज उन्हीं यीशु की याद में,
    हम गुड फ्राइडे दिवस मनाते हैं
    हाथ जोड़ कोटिशः नमन है,
    आओ हम सब शीश झुकाते हैं॥
    _____✍गीता

  • क्यूं ना थोड़ा सा अलग बनें

    क्यूं ना थोड़ा सा,
    अलग बनें।
    खुश रहने की सलाह,
    बहुत दी..
    अब खुश रहने की वजह बनें।
    मिटा कर किसी के,
    ह्रदय का संताप
    फिर अपने ह्रदय की खुशी को माप।
    खिलाकर किसी गरीब को खाना,
    कितना सुख मिलता है इससे,
    यह तो खिला कर ही जाना।
    पढ़ा कर किसी निर्धन बच्चे को,
    जान जाओगे तुम, सुख सच्चे को।
    ह्रदय में बहने लगेगी,
    एक पवित्र सी गंगा
    वस्त्र दान कर दो,
    गर मिले कोई भूखा नंगा।
    किसी गरीब बेरोजगार को,
    देकर अपने घर-आंगन में थोड़ा सा काम
    सुख भर दो उसके जीवन में,
    महसूस करा दो उसको भी,
    स्वावलंबन का सुकून-ओ-आराम
    _______✍गीता

  • नेकी के वस्त्रों से

    ऊपर वाला
    बिना वस्त्रों के भेजता है,
    जन्म के वक्त निःवस्त्र
    भेजता है।
    ताकि आप ढक सको
    नेकी के वस्त्रों से
    अपना तन,
    प्रेम से आच्छादित कर सको
    अपना मन।
    नेकी जरूरी है,
    नेकी से ही
    सार्थक होता है जीवन।
    नेकी करने को
    आपके सामने है
    विस्तृत भूमि
    और खुला आसमान,
    मानो खुद को
    धरती पर
    केवल एक मेहमान
    नेकी करो
    और अपना बना लो
    धरती और आसमान।

  • भोजपुरी चइता गीत- हरी हरी बलिया

    भोजपुरी चईता – हरी हरी बलिया |
    हरी हरी डलिया मे भरी भरी फलिया ये रामा ,
    खेतवा मे डोले ले गेंहुया के बलिया ये रामा
    खेतवा मे |
    चढले चइत के जबसे मस्त महीनवा ये रामा ,
    बहकेला गोरिया के मातल मनवा ये रामा ,
    खेतवा मे |
    सरसो पियरा गइली मटर गदरइली ये रामा ,
    महुआ मे मदन रस अमवा मोजरईले ये रामा ,
    खेतवा मे |
    कुहुके कोइलरिया बहे पूर्वी बयरिया ये रामा ,
    उड़े गोरी के चुनरिया पिया डहके गुजरिया ये रामा ,
    खेतवा मे |
    फुलवा फुलाई भवरा लोभाई,सजनी सजना रिझावे ये रामा ,
    गोरी लेवे अंगड़ाई चइत पिया पिरितिया बढ़ावे ये रामा ,
    खेतवा मे |
    हरी हरी डलिया मे भरी भरी फलिया ये रामा ,
    खेतवा मे डोले ले गेंहुया के बलिया ये रामा
    खेतवा मे |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक / गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड ,मोब -995550986

  • तभी सार्थक है लिखना

    मेरे लिखे से उजाला हो जाये
    कुछ भी नहीं तो
    उठें चिंगारिया,
    किसी को जिन्दगी का
    रास्ता मिल जाये।
    अंधेरे में भटकता
    अगर मन हो किसी का
    मेरी दो पंक्ति उसको
    रास्ता दे आये।
    तभी सार्थक है लिखना
    किसी काम आये,
    मेरी पहचान छोड़ो
    जमाना लाभ पाये।
    देख अदना सा कवि हूँ
    मगर संदेश मेरा,
    अडिग रह राह अपनी,
    न बन चिंता का डेरा।
    साथ लाये नहीं कुछ
    साथ जाये नहीं कुछ
    बताकर सब गए हैं
    पुराने कवि यही सच।
    किसी को ठेस देने
    कलम मेरी उठे मत
    शुद्ध साहित्य सेवा
    रहे केवल मेरा पथ।

  • घिस-घिस रेत बनते हो

    अहो पत्थर! नदी से
    घिस- घिस रेत बनते हो,
    धूल बह जाती है,
    तुम ही तुम शेष रहते हो।
    नदी की नीलिमा में
    तुम बहुत ही श्वेत लगते हो।
    भवन निर्माण में
    तुम्हीं मजबूत बनते हो।
    फिर भी नजीरों में जमाना
    भावनाहीनों की तुलना
    पत्थरों से कर
    निरा अपराध करता है।
    बोल कर पत्थर का दिल
    पत्थर का वो अपमान करता है।

  • अनुभव सिखायेगा

    ईंट फेंकेगा आप पर कोई
    आप उस ईंट को संभाल कर रखना,
    कभी भवन बनाओगे
    या कुछ सृजन करोगे,
    काम आयेंगी वे ईंट और पत्थर।
    आंख में रेत झौंके
    आपके अगर कोई,
    सच का चश्मा लगाना
    आँख की नदी के
    किनारे खड़े हो,
    एकत्र कर लेना वह रेत।
    सच का भवन बनाते वक्त,
    रेत काम आयेगी।
    जिन्दगी बतायेगी,
    जमाना बतायेगा,
    किस परिस्थिति में क्या करना है
    अनुभव सिखायेगा।

  • ईश ऐसा वर मुझे दे

    ईश ऐसा वर मुझे दे
    ईर्ष्या से दूर बैठूँ,
    पंक्तियाँ लिख दूँ वहाँ
    जिस ओर थोड़ा दर्द देखूँ।
    देख अनदेखा नहीं
    कर पाऊँ पीड़ा दूसरे की,
    बल्कि खुद महसूस
    कर पाऊँ मैं पीड़ा दूसरे की।
    मैं किसी के काम आऊँ
    सीख यह मिलती रहे,
    उठ मदद कर दूसरे की
    आत्मा कहती रहे।
    ईश मेरा मन करे
    कुछ इस तरह की बात बस
    बस रहूँ सेवा में रत
    कोई नहीं हो कशमकश।

  • किन्नर होना अभिशाप है !!

    किन्नर होना अभिशाप है !!
    यह जाना जन्म पाकर
    जहां भी जाऊं माहौल
    बन जाता है हास्यास्पद
    मैं तो गौरी शंकर का रूप हूं
    हां मैं अर्धनारीश्वर हूं
    क्यों नहीं समझते
    दुनिया वाले मुझको अपने जैसा
    हां तन से हूं विचित्र
    पर मन से बिल्कुल वैसा
    मेरी दुआएं हर किसी के काम आतीं हैं
    लोगों की व्यंगात्मक निगाहें
    मेरे मन को छोल जाती हैं
    मेरी दुआओं की तरह
    मुझे भी अपना लो
    प्रेम ना करो तो
    थोड़ी मानवता ही अपना लो।।

  • पानी बचाओ

    कई माह बीत गये
    बारिश नहीं हुई।
    सूखी धरा के अधर
    ताकते हैं नभ को।
    प्राणी हैं व्याकुल
    जल की कमी से,
    सब तरफ है सूखा
    प्यास आज सबको।
    पौधे झुलस कर
    मुरझा गए हैं,
    कब होगी बारिश
    देखते हैं नभ को।
    पानी बिना जीवन
    कुछ भी नहीं है,
    पानी से ज्यादा
    कुछ भी नहीं है,
    अतः आज ऐसा
    नारा लगाओ
    पानी बचाओ
    पानी बचाओ।

  • दुआ खूब पाता रहेगा

    जाग इंसान उनकी मदद कर
    है सहारे की जिनको जरूरत,
    भूख से जो बिलखता है बचपन
    आगे रहकर तू उसकी मदद कर।
    क्या करेगा कमा करके इतना
    क्या करेगा जमा करके इतना,
    तू कमा खूब लेकिन कमाई
    तू गरीबों में थोड़ा लगा ले।
    कब तलक यूँ नजर फेर लेगा,
    दान में भी जरा सा लगा ले।
    साथ धेला नहीं जा सकेगा
    सब यहाँ का यहां ही रहेगा,
    गर जरा सा मदद को बढ़ेगा,
    तू दुआ खूब पाता रहेगा।

  • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान”

    “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”
    ———————————-
    एक बेटी को शिक्षित करने से
    दो कुल शिक्षित हो जाते हैं।
    फिर भी ना जाने क्यों लोग
    अपनी बेटियों को नहीं पढ़ाते हैं ।
    जल्दी शादी करने की
    जाने क्या जल्दी होती है।
    जो बेटियां पढ़ने नहीं जाती
    उनकी क्या मजबूरी होती है ??
    नि:शुल्क शिक्षा होने पर भी
    क्यों नहीं बेटियां पढ़ पाती हैं ??
    सफल होती है हर क्षेत्र में वह
    जिस क्षेत्र में बेटियां जाती हैं ।
    बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ”
    यह अभियान निरर्थक है ।
    जब तक समाज में सड़ी सोंच के
    जीवित रहे समर्थक हैं।
    इस सोच से निकलकर
    हम सब हम सबको बाहर आना है ।
    प्रण करना है हम सबको
    अपनी बेटियों को पढ़ाना है।।

  • किये पे रोना ही पड़ेगा

    किये पे रोना ही पड़ेगा
    मायूस मन नीचे गिरायेगा ही,
    झूठ का साथ देना है आसान
    पर मुश्किल घड़ी में सच ही आयेगा काम ।।1।।
    ———————————————————
    क्यूँ करते हो गलत काम
    जब सच ही आयेंगे काम
    छोड़ो झूठ अब तो
    सच अपनालो आज तो ।।2।।
    ————————————————————
    जल गई होलिका झूठ की आग में,
    निखर गया प्रहलाद सच के प्रभाव से,
    हिरण्यकश्यप मर गया झूठी शान में,
    जीतता आया है सच झूठों के चक्रव्यूह से ।।3।।
    ——————————————————————
    कोई अब तो मत मनाओ ऐसी होली
    कि तुम्हारे चुल्ही पे चढ़े निर्दोषों की बलि
    झूठी की शान नही,
    सच की जीत का त्योहार है यह होली ।।4।।
    ———————————————–
    मनाओ होली खाकर मिष्ठान्न
    और भूलो भूली-बिसरी बात
    गले मिलकर करो एक-दूसरों से मीठी बात
    मनाओ होली खाकरग मिष्ठान्न ।।5।।
    जय श्री सीताराम

  • नशे को दूर भगाओ

    नशा नहीं, जिन्दगी बचाओ
    त्यौहारों के समय इस तरह
    मत जीवन पर दांव लगाओ।
    नशा स्वयं से दूर भगाओ।
    झगड़े और फसादों की जड़
    मद्यपान विवादों की जड़,
    अपनी हानि नशे से होती,
    इज्जत सबके आगे खोती
    मानो इसको एक बीमारी
    भरी समस्या इसमें सारी।
    नशा न लो जिन्दगी बचाओ।
    तन के भीतर कोमल अंग हैं
    मद्यपान से सारे तंग हैं,
    थोड़ी देर आनन्द रहेगा,
    बाकी सब कुछ मंद करेगा।
    अतः नशे को दूर भगाओ
    जीवन को खुशहाल बनाओ।

  • रंगमंच

    दुनियाॅं के रंगमंच पर,
    हम सभी आते हैं
    अपना-अपना किरदार निभाने,
    किरदार निभाते-निभाते
    भूल ही जाते हैं..
    कि एक दिन इस रंगमंच से,
    जाना है एक दूसरी दुनियाँ में,
    यहां रहकर जो मिला है किरदार,
    वह निभाना है
    अपना एक स्थान बनाना है,
    और फिर इस रंगमंच से
    चले जाना है,
    यही है जीवन..
    और जीवन का रंगमंच…
    ____✍गीता

    विश्व रंगमंच की हार्दिक शुभकामनाएं

  • रंग नही हैं अब क्या जमाने में

    रंग नही हैं अब क्या जमाने में
    कि लोग बेरंग हो गये जहां में
    ———————————-
    हाँ रंग ही नही, सब कुछ है जहां में
    फिर क्यूँ लोग भटक रहे है, मन के अँधियारों में
    ————————————————-
    अथाह रंग है नरों के जीवन में
    फिर क्यूँ बेरंग रिश्ते है मानवों के विचारों में
    ———————————————————
    रंग तो खेल ही लेंगे हम रंगों के मौषम में
    लेकिन मैं हर पल खेलता रंग खूद के संग में
    —————————————————
    त्योहार है यह रंग का
    या कहूँ मैं यह मौषम है बहार बसंत का
    यह कुछ भी नहीं है,
    यह त्योहार है भक्त प्रहलाद का ।।
    ——————————————
    3:52 AM 3/25/2021
    जय श्री सीताराम
    खूद से बात करना, खूद से प्यार करना है ।।
    — विकास कुमार

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