बोझ खींचे जा रहा था वह

बोझ खींचे जा रहा था वह
हाथ ठेले से,
पेट भीतर तक खींच कर
जोर लगा रहा था।
आँतें एक दूसरे से चिपक कर
सपाट होती जा रही थी।
हड्डियां व पेशियाँ
खिंचती चली जा रही थीं,
वह जोर लगाते जा रहा था
क्योंकि उसने भी
अपने बच्चों के लिए
चाबी वाली गाड़ी
खरीदनी थी।
बच्चे तो पड़ौसी लाला जी के
बच्चे की जैसी
साइकिल मांग रहे थे,
लेकिन पूरा जोर लगा कर भी
संभव नहीं था
उसके लिए साइकिल लेना।
इसलिए वह बीच का
रास्ता निकाल कर
चाहता था छोटी चाबी वाली
कार देना,
इसलिए बोला
जितना लादना है
लाद देना साब,
लेकिन बच्चों के लिए खरीद सकूँ
एवज में इतना देना
बाकी कुछ नहीं।

Comments

2 responses to “बोझ खींचे जा रहा था वह”

  1. Geeta kumari

    जितना लादना है
    लाद देना साब,
    लेकिन बच्चों के लिए खरीद सकूँ
    एवज में इतना देना
    _________ निर्धनता में भी पिता के प्रेम को प्रदर्शित करती हुई बहुत ही श्रेष्ठ रचना, मार्मिक चित्रण और सुंदर अभिव्यक्ति

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