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संपादक की पसंद

  • रिश्ता है बस निभाने का

    बस अब और नहीं, गये अब दिन तुम्हारे हैं
    हमने हंस हंस के, जो अपनाये अंगारे हैं
    ये अंधेरे में सने पूनम की जो रातें हैं
    दिये तुमने, पर यही अब संग हमारे हैं ।
    गमों की कहाँ परवाह हमको है
    खुशी की कहाँ चाह मन को है
    मिले जो दर्द तुमसे है
    बस उसीकी परवाह हमको है ।
    थामा प्यार का दामन जो हमने था
    बदला यह , बना कब दर्द का रिश्ता
    समझ पाते, क्या है रिश्ते- नाते
    पर समझने की धैर्य किसमें था।
    खुद को सौंप के तुमको
    निभाया फर्ज अर्धांगनी का
    ख़बर थी कहाँ हमको
    यह नाम का नाता, बस है निभाने को।

  • बेटे के जन्मदिन पर कविता

    एक छोटा सा सपना पूरा हुआ

    जब मेरा बेटा आर्यन आया

    तोतली सी बोली से जब तुमने मुझे पापा बुलाया

    दिल के सारे दर्द दूर हुए

    जब नन्हा चेहरा मुस्कुराया

    तू मेरा लाडला राजकुमार मेरा ही दर्पण कहलाया

    नटखट भोली सी शैतानी तेरी ,सबके मन को भाए

    दादा दादी देख देखकर मंद मंद मुस्काए

    मम्मी तेरी नजर उतारे वारी वारी जाये

    बुआ फूफा चाची ताई तू सबके मन को भाये

    है आज तुम्हारा जन्मदिवस 27 अगस्त है आया

    कृतार्थ हुआ प्रभु का जो ,तू मेरी दुनिया में आया

    दुखों से तू दूर रहे ,खुशियों के सावन आयें

    तेरी जीवन की बगिया में ,रहे सभी की दुआयें

    तोहफे खिलौने और मिठाई सब तुमको दे सकता हूँ

    मगर परमपिता श्री परमब्रह्म से

    तुम्हारी लंबी हो उमर दुआएँ करता हूँ

    रहे हमेशा सदा सलामत जीवन अपना साकार करे

    देकर दूसरों को खुशियों का जीवन

    अपने जीवन में हर रंग भरे।

  • पापा की लाडली

    निकल ही गई ,जान मेरी!
    जब नन्हीं-सी जान ,
    पहली बार बीमार हुई।

    औरों को भी थी गमी,
    पर आंखों से मेरी,
    बेमौसम बरसात हुई,

    नहीं था होश,
    मुझे ना जाने ,
    कितनी बैचैनियो की बाढ़ हुई।

    भागा मैं उसे लिए गोद में ,
    पल पल मन में घबराहट हुई
    फिर से वो मुस्कुराए,
    जल्द फूल- सा वो खिल जाएं ,
    मन से मेरे फ़रियाद हुई।

    जब पहुंचा मैं अस्पताल में,
    डॉक्टर !डॉक्टर! हाय!चित्कार हुई।
    डरना तो बेकार है,
    बस हल्का सा बुखार है!
    डॉक्टर ने ये बतलाया।
    दवा -दारू के दिए घोल से
    बिटिया मेरी स्वस्थ-हाल हुई

    जब गुंजाया घर ;
    किलकारियों से उसने,
    पापा- पापा शब्दों की
    आवर्ती बारंबार हुई।

    सुकून मिला ,बड़े चैन के साथ,
    उस सुख की कोई सीमा न थी
    आनंद ही आनंद घोर आनंद
    संतुष्टि मन को इस बार हुई।

    ——–मोहन सिंह मानुष

  • चश्मे वाले नेताजी!

    चश्मे वाले नेताजी!
    गजब कमाल करते हैं,
    करोड़ों जनों को चुना लगाने का;
    जिगरा सरेआम रखते हैं ,
    ना खाऊंगा ना खाने दूंगा!
    ऐसे-ऐसे वादे तो;
    वो खुलेआम करते हैं,
    चश्मे वाले नेता जी ,
    गजब कमाल करते हैं।

    यह सूट बूट ; ये शानो शौकत
    महज़ एक औपचारिकता,
    असल में नेताजी!
    एक फकीर ठहरे!
    और फिर गंगा पुत्र हैं नेताजी
    मगर ,गंगा अभी मैली ही है,
    फिर भी ,भाषण कला एक अस्त्र!
    इसका प्रयोग नेताजी;
    हर बार करते हैं,
    चश्मे वाले नेताजी!
    गजब कमाल करते हैं‌।

    गरीबों के वो बड़े हिमायती ;
    चुनाव में,
    मगर आजकल उनसे रूठे है,
    कोरोना की महामारी में
    कितने गरीब भूखें है!
    वादे किए थे देंगे रोजगार,
    अब घर-घर में बेरोजगारी हैं,
    पर नेता जी ठहरे जुमले बाज!
    ऐसे इकरार तो , वो हर बार करते हैं,
    चश्मे वाले नेता जी !
    गजब कमाल करते हैं।
     
             …..मोहन सिंह मानुष

  • न जाने कहाँ बसता है वो

    ना जाने बसता कहाँ
    * ———-*——–*——–*
    सङको पे चलता कहाँ वह संक्रमण से अनजान है
    भय व भूख को साथ लिए वो भी एक इन्सान है
    जानता है यह सफ़र शायद हो अंतिम सफ़र
    चल रहा, माथे पे गठरी ,बच्चों की अंगुली पकड़
    धूप से तपते बच्चे को माँ लेती सीने से जकड़
    मुसीबत से बेपरवा,खिलखिला,मासूम नादान है ।
    कभी बिस्कुट की ज़िद करता चिल्ला पङता वो
    तात की अंगुली छूङा,बेखौफ़ दौङ पङता है वो
    खाद्यान्न से भरी ट्रक के आगे,मचलते गिर पङता वो
    भूख मिटाने चला,काल का ग्रास बन बैठा वो
    थी नहीं जिन्दगी की समझ,कहाँ मौत से अनजान है ।
    कोरोना का डर,भूख की लहर,टूटा नियति का कहर
    हुए अपनों से दूर,मा के सपने चूर,कितनी नियति है क्रूर
    देके खुशी,छीनी अधरों से हंसी,दी क्यू ये खामोशी
    ना जाने बसता कहाँ,करते जिसका हम गुणगान हैं
    सुमन आर्या
    *** *** ***

  • तमीज़दार

    ‘उँगली उठा तो दी हमने, पर साबित क्या करेंगे,
    वो तमीज़दार भी इतने हैं कि पत्थर खुद नही फेंकते..’

    – प्रयाग

  • माँ मुझे चाँद की कटोरी में

    कितना नादान था वह बचपन जब…
    माँ मुझे चाँद की कटोरी में
    खिलाती थी…
    मैं खाना खाने में नखरे
    हजार दिखाती थी…
    पर माँ चाँदनी रात में कटोरी
    में जल भर लाती थी..
    मेरी बाँहें पकड़कर
    माँ मुझे गोद में बिठाती थी..
    याद करती हूँ मैं कि कितना
    भोला था बचपन जब माँ
    मुझे
    चाँद की कटोरी में खिलाती थी…
    ना-ना करने पर मुझे प्यार से
    मनाती थी..
    उस जल भरी कटोरी में
    माँ मुझे चन्द्रछाया दिखाती थी…
    मैं पगली उसे चाँद समझकर
    कितना खिलखिलाती थी..
    कितना भोला था वो बचपन!
    जब माँ मुझे चाँद की
    कटोरी में खिलाती थी…
    उस चन्द्रछाया को स्पर्श करते ही,
    जल में हलचल मच जाती थी..
    चाँद के विलुप्त होते ही मैं
    कितना अधीर हो जाती थी..
    माँ कहती थी मत छुओ इसे
    वरना विलुप्त हो जाएगा!
    फिर बोलो तुम्हारे लिए
    चाँद की कटोरी कौन लाएगा?
    झट से मैं माँ की बातों में
    आ जाती थी…
    फिर माँ हर निवाले पर सबका
    नाम लेकर मुझे खिलाती
    थी..
    एक माँ की ही ममता है जो
    चाँद को फलक से कटोरी
    में ले आती थी…
    और मैं पगली यूँ बचपन में
    चाँद की कटोरी में खाती थी…

  • क्या नारी तेरी यही कहानी ?

    युग युग से तू ,आंसू बहाती आई
    पुरुष के अधीन तू, सदा रहती आई
    अपने घर, अपने बच्चो के लिए
    युग युग से तू ,मर मिटती आई
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?
    आंचल में दूध है, आंखों में पानी
    अपनो ने ही ,तुझ पे बनायी नयी कहानी
    खुद दलदल में फंस के,अपनो को आज़ाद किया
    एहसान के बदले में, अपनो ने तुझे क्या दिया
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?
    इस युग में भी, तू पुरुष से कम नहीं
    जब कि, संसार तुझ से ही बना पुरुष से नहीं
    झुका दिया है ,आज तुमने अंबर को
    सब कुछ पा के भी, अपनायी विवशता को
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?
    आज घर घर में ,तू ही घर की मुखिया है
    फिर भी पुरुष के आगे, तेरी क्या औकात है
    दुःख सह के भी ,अपनो को सुख देती रही
    अपनी सिंदूर को सदा,अपना सुहागन समझती रही
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?

  • आओ कुछ बेहतर करते हैं..

    ‘आओ कुछ बेहतर करते हैं..
    कुछ बाहर जग की परिधि में,
    कुछ अपने भीतर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..

    ये विकट समय की बेला है,
    दरकार नही साधारण की..
    है वक्त यही, है यही घड़ी,
    हर विपदा के संधारण की..
    कुछ तेज़ हवाओं से अब हम,
    उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..

    मन इक उपजाऊ भूमि है,
    सब इसमे बढ़ता जाता है..
    जितना भी इसमे उठता है,
    उतना ही गढ़ता जाता है..
    अपने अंतर की सीमा से,
    नफरत को कमतर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..

    कितना पैसा कितना जीवन,
    कितनी इस स्वार्थ की सरहद है..
    जिस हद की दुहाई अब तक दी,
    लो टूट चुकी वो हर हद है..
    क्या सही-गलत का पैमाना,
    अब उसमें अंतर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..
    आओ कुछ बेहतर करते हैं..

    – प्रयाग

    मायने :
    दरकार – आवश्यकता
    संधारण – सहन करना
    कमतर – कम करना

  • महफिल सजाए बैठे हैं

    कब से तुम्हारी राह में नजरें बिछाए बैठे हैं।
    चले भी आओ कि महफिल सजाए बैठे हैं।।

  • सैनिक की अंतिम चाहत

    मैं सैनिक हूं,
    मैं देश को संभालता हूं,
    हर रोज मृत्यु को मारता हूं,
    मैं मौत से नहीं डरता हूं,
    मौत को तो मुठ्ठी में लेकर चलता हूं,
    परिवार की चिंता नहीं करता हूं,
    परिवार देश के हवाले करता हूं,
    अंतिम समय में भी स्वार्थ नहीं चाहता हूं,
    बस एक ही ख्वाहिश ही ईश्वर से फरमाता हूं,
    है ईश्वर कुछ ऐसा चमत्कार कर दो ,
    मुझमें फिर से प्राणों को भर दो,
    बस भारती के शत्रुओं को मस्तक विहीन कर दूं,
    हिन्दुस्तान को शत्रुविहीन कर दूं,
    फिर खुशी खुशी प्राणों को न्योछावर कर दूंगा,
    अपने प्राण वतन के हवाले कर दूंगा।2।

      बस मां तू दुखी मत होना,
      देश की सेवा करना तो मेरा भाग्य है,
      देश ही मेरे लिए सबसे बड़ा भगवान है,
      मृत्यु के मारे क्या में मर जाऊंगा,
      पुनर्जन्म पाकर फिर से तेरा बेटा बनकर आऊंगा,
      कालखंड ये जीवन मृत्यु का सदा चलाऊंगा,
      दोबारा से देश सेवा करने को जरूर जाऊंगा,
      देश की रक्षा को ही अपनी नियति बनाऊंगा,
      जरूरत पड़ी तो हर जनम में अपने प्राण वतन के हवाले  कर जाऊंगा।।
    ✍️✍️मयंक व्यास✍️✍️

  • ॐ साई राम

    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम
    सांई नाम की अलख जगा ले
    भोली सी सूरत अपने मन में बिठा ले
    सच्चा प्यारे सांई नाम
    बाबा जी जपूं मैं तेरा नाम
    कृपा दृष्टि की तेरी माया
    मन कोमल मृदु शीतल काया
    तेरी महिमा कोई जान न पाया
    मुखमंडल पर आभा की छाया
    प्यार का जो अमृत बरसाया
    सुमिरन कर लो सांई नाम
    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम
    मन में अपने भाव जगा लो
    जिस चाहे उस रूप में पा लो
    मिट जाता मन का अंधियारा
    मन को मिलता शांत किनारा
    भटके मन का तू एक सहारा
    चरणों में हैं चारों धाम
    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम
    हांथ जोड़ कर करूं प्रणाम
    विनती करता सुबह शाम
    हर बिगड़े बनते हैं काम
    शृद्धा सुमन तुम्हे अर्पण कर
    मेरे दिल से निकले सांई राम
    शिरडी मंदिर तेरा धाम
    बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम।|

  • नन्ही सी बिटिया

    शैतान की नानी,
    बन्दर-सी शैतानी,
    जादू की पुड़िया,
    सोने की गुड़िया,
    परियों सी रवानी,
    प्रेम की निशानी,
    बालों को नोचे,
    कान को खींचे,
    शरारतें उसकी मन को भाएं,
    थकान का आलस पल मे उड़जाए,
    बेटी मेरी कलेजे का टुकड़ा,
    दिल में बसा है अब उसका मुखड़ा,
    आंगन की मेरे वो है शोभा,
    परिवार की मेरे शान बढ़ाये।

  • देवी नहीं बस इन्सान

    एक ऐसा जहाँ, देवी नहीं बस इंसान समझा जाता हो
    देवी का दर्जा देके न छल, नारी से किया जाता हो।
    आसमां पे बिठा के अस्तित्व पर भी बन आया है
    बाहर तो क्या घर में भी सम्मान कहाँ पाया है
    जिसकी वह अधिकारिणी वह भी छिनता आया है
    खुद पर खुद की इच्छाओं पर मलाल जिसे आया है
    वह नारी है जिसकी सोच पर पाबंदी लगा आया है
    नभ नहीं बस वह जमी मिले,जहाँ मान रखा जाता हो
    जहाँ देवी नहीं बस इंसान समझा जाता हो ।
    कन्या पूजन के लिए, जिसे घर-घर में ढूँढ़ा जाता है
    जमी पे आने से पहले ही, जिसका कत्ल किया जाता है
    दुर्गा, काली, कभी अन्नपूर्णा समझ जिसे पूजा जाता है लक्ष्मी को घर में ही, दहेज की वेदी पे चढाया जाता है
    सारे रिश्ते तो क्या, इन्सानियत को भी भूलाया जाता है
    पत्थर की मूरत नहीं, अर्धांगनी का मान रखा जाता हो
    जहाँ देवी नहीं बस इंसान समझा जाता हो ।

  • तस्वीर हुआ जाता हूँ..

    ‘दे दे कोई तदबीर मुझे हरकत में रहने की,
    मैं उसके तसव्वुर में तस्वीर हुआ जाता हूँ..’

    – प्रयाग

    मायने :
    तदबीर – तरकीब/उपाय
    तसव्वुर – सोच/विचार

  • गौरा-महेश्वर पूजने

    बरस रहा है भाद्रपद
    रिम-झिम बरसता जा रहा है
    इस मनोरम मास में
    गौरा-महेश्वर सज रहे हैं।
    इन पहाड़ों के शिखर
    शिवलिंग जैसे लग रहे हैं,
    गौरा-महेश्वर पूजने
    घर-घर विरुड़ भीगे हुए हैं।
    नारियां बाहों में अपने
    डोर धागा बांधकर
    गा रहीं गौरा की स्तुति,
    दूब भी बांधे हुए हैं।
    घास से गौरा बनाकर
    फूल माला से सजाकर
    एक डलिया में बिठाकर
    सर में रखकर पूजती हैं।
    आज गौरा पूजती हैं।
    आठ दिन आठों मनाकर
    फिर विदा करती हैं उनको
    इस तरह भादो में वे
    गौरा-महेश्वर पूजती हैं।
    रिम-झिम बरसते भाद्रपद में
    गौरा- महेश्वर पूजती हैं।

  • हे प्राणदायनी नारी

    हे प्राणदायनी नारी
    *************
    हे प्राणदायनी नारी,तेरी करूण कहानी
    आँचल में है करूणा,पर आखों में पानी ।
    हर युग में क्यू नारी ही सतायी जाती है
    विरह वेदना सहती,अग्नि में उतारी जाती है
    कदम -कदम पर सहती,सबकी मनमानी ।
    तेरी करूण कहानी—
    स्नेह की डोर से बँधकर,आई है तेरे द्वारे
    एक प्रीत निभाने ख़ातिर,त्यागे सपने प्यारे
    अलग कहाँ है तुमसे,है तेरी अर्धांगनी
    तेरी करूण कहानी—
    पाँच पतियों की द्रोपदी,उसमें उसका कोई दोष नहीं चौसर पर दांव लगा बैठे,धर्मराज को कोई होश नहीं
    पति की करनी,वेश्या कहाती रानी
    तेरी करूण कहानी—-
    अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले,पत्नी से छिपकर भागे
    विरह- वेदना का दुख, क्यू रखा यशो के आगे
    क्यू बनी वह दर्द की अधिकारिणी
    तेरी करूण कहानी—–

    सुमन आर्या

  • भुला दिया उसने..

    ‘मेरी वफाओं का खुलकर सिला दिया उसने,
    न रखा एक भी, हर खत जला दिया उसने..

    दूर होने का फैसला क्या खुद तुम्हारा है ?
    मैंने पूछा तो कैसे सर हिला दिया उसने..

    हमें भी खूब मिली आँसू पोंछने

  • दुर्योधन और दु:शासन

    मनु की संतान पर तंज कसने की कोशिश की है मैनें..
    नया विषय और भारत की समस्याओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा की है मैनें…

    द्वापर छोंड़ दुर्योधन और
    दुःशासन
    कलयुग में आए..
    मानव को सताने के
    नए-नए हथकंडे अपनाए…
    किसी ने सीखी शस्त्र विद्या
    किसी ने अस्त्र विद्या…
    और दुराचार के पैतरे भी
    सीख कर आए…
    जब पहुँचे भारत की
    भूमि पर
    रह गये आश्चर्यचकित
    ब्रज भूमि पर..
    कृष्ण मंदिर का
    नामोनिशान नहीं
    कुरुक्षेत्र महज
    शमशान नहीं..
    हँस पड़े हिन्दू-मुसलमां
    पर
    मस्जिद में पढ़ते कलमां
    पर…
    नेता की मालखोरी पर,
    पुलिस की रिश्वतखोरी पर…
    किसान की आत्महत्या पर,
    युवाओं की बेरोजगारी पर…
    रो पड़े जवान की मृत्यु पर..
    कोरोना जैसी महामारी पर…
    नारी की लाचारी पर…
    कहने लगे दोनों भाई
    यह भारत पर कैसी विपदा
    आई…
    हम लड़ते थे सिर्फ स्वाभिमान की खातिर…
    यह सब मर रहे अभिमान की खातिर…
    जिस धरती पर हमनें जन्म लिया…
    कुछ पाप किये कुछ पुण्य
    किया…
    यह हमारी तो जन्मभूमि
    नहीं…
    जो छोंड़ी थी वह भारत
    भूमि नहीं…
    अब चलो यहाँ से चलते हैं..
    ब्रह्मा जी से जाकर मिलते हैं..
    पूँछते हैं यह किसकी औलादें हैं,
    यह तो मनु की संतान नहीं…

  • देश दर्शन

    शब्दों की सीमा लांघते शिशुपालो को,
    कृष्ण का सुदर्शन दिखलाने आया हूं,
                                     मैं देश दिखाने आया हूं।।

    नारी को अबला समझने वालों को,
    मां काली का रणचंडी अवतार
    याद दिलाने आया हूं,
                             मैं देश दिखाने आया हूं।।

    वचन मर्यादा को शून्य कहने वालो को,
    राम का वनवास याद दिलाने आया हूं,
                                     मैं देश दिखाने आया हूं।।

    प्रेम विरह में मरने वालो को,
    गोपियों का विरह बतलाने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    भक्त की भक्ति को मूर्ख समझने वाले को,
    होलिका का अंजाम याद दिलाने आया हूं,
                                       मैं देश दिखाने आया हूं।।

    भक्ति प्रेम को ज्ञान सिखलाने वालो को,
    उद्धव का हाल बताने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    सत्ता को सबकुछ समझने वालो को,
    भीष्म का त्याग का याद कराने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    भगवान का पता पहुंचने वालो को,
    खंब से प्रगटे नृसिंह दिखलाने आया हूं,
                                         मैं देश दिखाने आया हूं।।

    माता पिता को बोझ समझने वालो को,
    श्रवण कुमार का सेवाभाव दिखलाने आया हूं,
                                       मैं देश दिखाने आया हूं।।
           
    गंगा को मैली करने वालो को,
    भागीरथ का तप याद कराने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    आजादी को शून्य समझने वालो को,
    अनन्त बलिदानों का बोध कराने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    राह भटकते  युवाओं को,
    राह बतलाने आया हूं,
                                 मैं देश दिखाने आया हूं।।

    कविता पड़ने वालो को ,
    मयंक की ‘कलम का प्रणाम’ कराने आया हूं,
                                      मैं देश दिखाने आया हूं।।
           🙏🙏✍️✍️मयंक✍️✍️🙏🙏

  • जिसका ज़िक्र नही..

    ‘वो हादसा के सलीके से जिसका ज़िक्र नही,
    और कुछ लोग थे जो सुर्खियों में आते रहे..
    मदद के वास्ते लाज़िम थे कई हाथ मगर,
    वो सारे हाथ फकत वीडियो बनाते रहे..’

    – प्रयाग

    मायने :
    सलीके से – स्वाभाविक ढंग से
    लाज़िम – अनिवार्य
    फकत – सिर्फ

  • जहाँ बसाते चलें

    कुछ पाना हमारा मकसद न हो
    देने की लत खुद को लगाते चलें
    जीवन हमारा यह रहे न रहे
    दूसरों का जहाँ चलो बसाते चले ।
    हमने देखा दुनिया की भीड़ में भी हम अकेले है
    क्यूँ न अकेले ही आशियाना बसाने चले ।
    बहुत सह लिया अपनो से सितम
    फिर क्यू उनके नाम का दीप जलाते रहे ।
    मेरी भावनाओं की जिन्हें कद्र ही नहीं
    क्यूँ उनकी बेरूखी पे आँसू बहाते रहे ।
    जिन्हे आँसूओ की कद्र ही नहीं
    क्यूँ उनके खातिर खुद को जलाते रहे।
    कयी ऐसे है जिनकी उम्मीदें हैं हमसे जुङे
    क्यू न उनके लिए ही खुद को फिर से बनाते चलें ।
    जीवन का मकसद बदले में पाना नहीं
    बिना पाये ही परहित में खुद को लुटाते चले ।
    ज्यादा नहीं, पर कुछ के लिए बहुत कर सकते है हम
    चलो दूसरों की खुशी को अपना मकसद बनाते चले।

  • एक फ़रिश्ता

    साक्षात्कार था मेरा उस दिन,
    चिंता से था हृदय धड़कता।
    एक दस का नोट पड़ा जेब में,
    ऑफिस तक की भी बस कैसे पकड़ता।
    दो सौ रुपयों की दरकार थी,
    ज़िन्दगी से मेरी तकरार थी।
    एक मंदिर की सीढ़ी पर बैठ गया,
    बोला भगवान दया कर दे।
    मेरे इन हाथों में भी,खुशियों की रेखा भर दे।
    आकाश फूट अम्बर से आई गहरी आवाज़ एक,
    रे मूर्ख व्यर्थ क्यों रोता है,तू आंख उठा कर उधर देख।
    एक फ़कीर देख रहा था मुझको,
    बोला, “बेटा क्या चाहिए तुझको ”
    मैं बोला, बाबा सुन कर क्या करोगे
    तुम खुद दुखी हो, मेरा दुख क्या हरोगे।
    वो बोले, बच्चा तकलीफ़ बता,
    मैं ही मदद कर दूं क्या पता।
    मेरा अंतर्मन सकुचाए,ना जा पाने का दर्द भी सताए।
    बाबा ने कुछ समझा शायद,कुछ रुपए मेरे हाथ में थमाए।
    तुम चंद मिनट हो लेट, द्वार पर चपरासी ने बतलाया,
    मैं मेल – ट्रेन की तरह दौड़ता, कमरे के भीतर आया।
    इंटरव्यू अच्छा गया था, नौकरी भी मिल गई,
    नौकरी मिलते ही ,मेरी तबीयत भी खिल गई।
    आभार जताने पहुंचा बाबा का,जब में मंदिर के जीने पर,
    बाबा नहीं मिले, बस देह मिली
    रो पड़ा लिपट के सीने पर।
    कुछ लोग बात कर रहे थे—–
    “बीमार थे बाबा,दवाई पर जी रहे थे”।
    कल दवाई नहीं मिल पाई, बाबा ने यूं जान गंवाईं।
    अपनी दवाई के रुपए, वो मुझे दे गया।
    वो फ़कीर नहीं, एक फ़रिश्ता था,
    सब उस पर करते थे दया,वो मुझ पर कर गया
    कैसा वो इंसान था, मेरे लिए भगवान था।
    बहुत रोया मैं, उन्हें बहुत याद किया,
    उनकी आत्मा को शांति देना भगवन् ,
    दिल से ये फ़रियाद किया।

  • अभागी क़िस्मत

    आज तू हंस ले ,
    खुलकर मुझ पर,
    मगर ,थोड़ा सा सब्र कर;
    अरी; सुन ! मेरी अभागी क़िस्मत!
    मैं सीख तुम्हें सीखलाऊंगा,
    मेहनत की जंजीरों से जकड़कर,
    मुलाजिम तुम्हें बनाऊंगा।
    मुलाजिम, तुम्हें बनाऊंगा!

    ——मोहन सिंह मानुष

  • संवेदनाओं की माला

    संवेदनाएं कहाँ रहती हैं आज-कल,
    मैं यह जानती नहीं..

    लोग क्यों जलाते हैं नफरत
    के चिराग
    मैं यह जानती नहीं..

    ऊब चुकी हूँ जिन्दगी
    से अपनी,
    साँसों की डोर कब
    टूटेगी
    मैं यह जानती नहीं…

    संवेदनशील मुद्दों पर
    लोग मौन धारण कर लेते हैं
    करते हैं क्यों ऐसा
    मैं यह भी जानती नहीं..

    मरती है मानवता जब
    निहत्थे होकर सड़कों पर
    चुप हो जाते हैं क्यों सब
    यह भी जानती नहीं…

    टूट जाती हैं जब संवेदनाओं की माला
    क्यों बिखर जाती है मानवता
    मैं यह जानती नहीं…

  • बेटियाँ

    कितनी प्यारी होती हैं
    बेटियाँ,
    प्रेम की मूरत होती हैं बेटियाँ..
    आती है जब परिवार पर
    आँच कोई,
    सबसे आगे खड़ी होती
    हैं बेटियाँ…
    प्यार के पालने में झूलती हैं,
    माँ के आँचल में पल्लवित
    होती हैं बेटियाँ…
    बाबुल के घर रोशनी
    उन्हीं से होती है,
    चिड़ियों-सी चहकती रहती
    हैं बेटियाँ..
    हो जाती हैं एक दिन ये कलियाँ पराई,
    अपनी यादों की महक
    छोंड़ जाती हैं बेटियाँ…
    कहता है जब कोई इन्हें
    पराया,
    बहुत बिलख-बिलखकर
    रोती हैं बेटियाँ…
    मायके में पराई अमानत,
    ससुराल में पराये घर की कही जाती हैं…
    आखिर किस घर की
    होती हैं बेटियाँ..?

  • प्यार किसे कहते हैं..

    ‘मेरे इज़हार पर कुछ यूँ लगा तू हाँ की मुहर,
    दुनियाँ देखे कि इकरार किसे कहते हैं..

    तेरे सिवा मुझे उस पर भी यकीं है ऐ खुदा,
    हूँ मुतमईन के ऐतबार किसे कहते हैं..

    किसी उम्मीद पर आए थे तेरे दर पे सनम,
    वरना मालूम था इनकार किसे कहते हैं..

    तेरी खुशी के लिए खुद से उलझ पड़ता हूँ,
    तुझे क्या इल्म के तकरार किसे कहते हैं..

    अपने हिस्से की हमने हर खुशी उसे दे दी,
    कोई सीखे ये हमसे प्यार किसे कहते हैं..’

    – प्रयाग धर्मानी

    मायने :
    मुहर – निशान/चिन्ह
    यकीं – विश्वास
    मुतमईन : निश्चिंत
    इल्म – ज्ञान

  • मैं…

    चलो ‘मैं’ को,
    ‘मैं’ से लड़ाते हैं!
    जीतकर ,
    फिर ‘मैं’ से
    ‘हम’ बनाते हैं।

    विशेष–>
    यमक अलंकार का प्रयोग
    एक “मैं ” अपने आप के लिए
    दूसरा ” मैं ” अहंकार के लिए

  • चारागर

    ‘चारागरों, हम में से किसी एक का इलाज करो,
    आज़ार उन्हें नफरत का है, तो हमें मोहब्बत का..’

    – प्रयाग

    मायने :
    चारागर – डॉक्टर
    आज़ार – रोग

  • पिता बरगद का वृक्ष

    शीर्षक:- पिता:-बरगद का वृक्ष

    पिता वह बरगद का वृक्ष है
    जिसकी छांव में हमें
    प्रेम, स्नेह तथा सुरक्षा मिलती है..
    पिता नारियल का वह
    फल है
    जो ऊपर से सख्त
    परन्तु अन्दर से
    सुकोमल होता है…
    माँ तो आँसू बहाकर
    दुःख प्रकट कर लेती है,
    परन्तु पिता
    निर्मोही होने का ढोंग करता रहता है
    जबकि अन्दर-अन्दर
    रोता रहता है…
    जब वह डाटता है तो
    उसकी डाट में
    फिक्र छुपी होती है
    अपने बच्चे की…
    वट है वह सब खुद
    ही सह लेता है…
    अपनी उदार लताओं
    से हर कदम
    सहारा देता है…
    कंधे पर बिठाकर
    दुनिया दिखाता है..
    उँगली पकड़ कर चलना
    सिखाता है..
    तुम पर आए कोई आँच
    तो सुरक्षा करता है
    डाटता इसलिए है
    क्योंकि प्रेम करता है…
    पुरुष है इसलिए कह
    नहीं पाता…
    माँ की तरह मुख चूम
    नहीं पाता…
    माँ की तरह तुलसी का
    पौधा नहीं है वह
    बरगद है वह इसलिए
    झुक नहीं पाता..

  • अंजान सफर

    चला जा रहा हूँ अंजान से एक सफर में
    साथ न कोई साथी किसी मंजिल का
    एक साये के पीछे न जाने किसकी तलाश में
    एक चेहरा ढूंढता हूँ न जाने किसकी आस में
    कभी कोई मिलता है तो ये सोंचता हूँ
    कि ये वही तो नहीं जिसका ये साया है
    इस अंजान से चेहरे ने ,न जाने किसका चेहरा पाया है
    क्यूँ नहीं समझ पाता ,मैं उसकी बातें
    इसी शरारत में निकल गयीं ,न जाने कितनी रातें
    हंसता हूँ कभी कभी अपनी इसी नासमझी पर
    पल हैं ये बड़े मजेदार अपनी जिंदगी के
    देखता हूँ कब वह खूबसूरत मुकाम मिलता है
    जीवन के इस सफर में ,हमसफ़र कोई मिलता है
    ऐ अंजान से साये
    मुझ पर कुछ तो तरस खा
    तेरे पीछे ये कौन छिपा है
    उसका चेहरा मुझे बता
    दिल के इस कोरे कागज़ पर कोई तो नाम हो
    आँखों पर जिसका चेहरा
    होंठों पर दुआओं का काम तो हो ….

  • गणेश वंदना – श्री गणेश वंदन |

    गणेश वंदना – श्री गणेश वंदन |
    गौरी नंन्द्न शंकर सूत करे सब श्री गणेश वंदन |
    हाथी मस्तक मंगल दस्तक तेरा सत अभिनंदन |

    मूषक वाहन लड्डु भोग करते सदा भक्त निरोग |
    धूप दीप नैवैद्द सिंदूर अर्पण करो मस्तक चन्दन |

    मंगल कर्त्ता बिघ्न्हर्त्ता दुख दूर कर्त्ता हर ओर चर्चा |
    आओ गजानन लगाया स्वर्ण आसन हे दुख भंजन |

    शिव शंकर के प्यारे ललना बुद्धि का क्या कहना |
    दे दो बल बुद्धि सुख शांति चंद्र भाल भय भंजन |

    प्रथम होती श्री गणेश पूजा तुमसा न कोई देव दूजा|
    दानव संघारकर्त्ता दरिद्र तृप्ति कर्त्ता जय सुख नंदन|

    होगा जहा महाराज का आसान चले न बैरी डासन |
    गोर बदन मस्तक रोड़ी चन्दन कोटी कोटी है वंदन |

    शुभ लाभ देते दाता रिद्धी सिद्धि के हो स्वामी तुम |
    मंगल करो कोरोना मारी करो तुम भारत देव भंजन|

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • ऐ मेरी याद-ए-उल्फत सुन

    ‘ऐ मेरी याद-ए-उल्फत सुन, तू इतना काम कर देना,
    जो उसको भूलना चाहूँ, मुझे नाकाम कर देना..

    सुबह का वास्ता किससे, सहर की राह किसको है,
    तू उसकी ज़ुल्फ़ के साये मे मेरी शाम कर देना..

    उसे बेहद ही लाज़िम है, ये मेरी सादगी या रब,
    मेरे किरदार को बस खास से तू आम कर देना,

    वफ़ा की शर्त भी तेरी, मैं बेहद फर्क से जीता,
    है तेरी हद से बाहर अब, मुझे ईनाम कर देना..

    ज़मीने दर्द की सारी, गमों की मिलकियत तेरी,
    तू अपनी ये वसीहत अब से मेरे नाम कर देना..

    ऐ मेरी याद-ए-उल्फत सुन, तू इतना काम कर देना,
    जो उसको भूलना चाहूँ, मुझे नाकाम कर देना..’

    – प्रयाग धर्मानी

    मायने :
    याद ए उल्फत – मोहब्बत की याद
    सहर – सुबह
    लाज़िम – अनिवार्य
    मिलकियत – प्रॉपर्टी

  • गीता

    गीता का सार जिसने भी समझ लिया
    संसार में उसी ने औरों से कुछ अलग किया
    तेरा मेरा अपना पराया माया मोह से जो दूर हुआ
    उसी को मिला मोक्ष का द्वार
    वही हर आंखों का नूर हुआ
    तुम क्यों खिलखिलाते हो
    क्यों उदास होते हो
    ना तुम कुछ लेकर आए
    जो यहां खोते हो
    हंसना है तो दूसरों की खुशियों में
    शामिल हो जाओ
    दूसरों की पीड़ा अपनी समझ कर
    उनके काम आओ
    तुम दूसरों के दूसरे तुम्हारे
    जब काम आने लगेंगे
    कोई नहीं कह सकता कि
    गीता को समझने में जमाने लगेंगे
    मैं कितना खुश नसीब हूं
    मेरे घर में गीता वास करती है
    परिवार सुखमय रहे शायद
    इसीलिए ही उपवास करती है
    मैं दूसरों की क्या कहूं
    गीता को समझने में हमें भी जमाने लगे
    अब ज्ञान गीता का हमको मिल गया है
    तो लगता है कि मेरे हाथ जैसे खजाने लगे
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • नामाबर

    ‘ये रब करे कि मोहब्बत मेरी असर कर ले,
    वो दिल को भेज दे, दिल को ही नामाबर कर ले..’

    – प्रयाग

    मायने :
    नामाबर – डाकिया

  • निर्भया और द्रौपदी

    शरीफों की सभा लगी फिर
    लुटती रही क्यों द्रौपदी?
    दु:शासन के दुराचार पर
    संवेदना क्यों मर गई?
    यही पूँछे द्रौपदी हर सड़क
    और हर गली…

    देवताओं का दाग अहिल्या
    के दामन जा लगा..
    वह नारी से पाथर क्यों हुई?
    यही पूँछे द्रौपदी हर सड़क
    और हर गली…

    सीता थीं चरित्र की कितनी धनी
    और राम पर विपदा घनी..
    फिर सीता वन-वन क्यों फिरी?
    यही पूँछे द्रौपदी हर सड़क
    और हर गली…

    पिंगला थी कितनी सती
    फिर भी चरित्र पर उँगली उठी….
    वह विरहाग्नि में क्यों जल गई?
    यही पूँछे द्रौपदी हर सड़क
    और हर गली…

    कामायनी की श्रद्धा संग भी
    क्या भला अच्छा हुआ?
    मनु श्रद्धा का संग छोंड़
    इड़ा का प्रियतम हुआ…
    क्यों श्रद्धा संग ऐसा हुआ?
    यही पूँछे द्रौपदी हर सड़क
    और हर गली…

    निर्भया संग क्या हुआ यह
    कहने की आवश्यकता नहीं…
    जहाँ दिखानी चाहिए मर्दानगी
    वहाँ तो दिखती नहीं…
    यही कहती द्रौपदी हर सड़क
    और हर गली…

  • खुद को उत्साह में रख

    खुद को उत्साह में रख
    न हो मन दुखी,
    तू बढ़े जा, बढ़े जा
    न हो मन दुखी।
    यह तो संसार है,
    इसमें संघर्ष है,
    जो बढ़ेगा
    उसी का ही उत्कर्ष है।
    तेरे कदमों की आहट
    को सुनकर यहां
    कोई खुश होगा
    कोई रहेगा दुखी।
    टांग खिंचती रहेगी
    निरंतर तेरी,
    पीठ पीछे करेंगे
    बुराई तेरी।
    जब तलक हाँ में हाँ
    तू मिला कर चले,
    तब तलक सब करेंगे
    बड़ाई तेरी।
    जब कभी तू
    चुनौती लगेगा उन्हें,
    शब्द वाणों से होगी
    खिंचाई तेरी।
    तू न परवाह कर
    जा बढ़े जा बढ़े,
    धर्म की राह ले
    सत्य पर रह अड़े।
    खुद को उत्साह में रख
    न हो मन दुखी,
    तू बढ़े जा, बढ़े जा
    न हो मन दुखी।

  • तेरी अदा

    सावन की बदरी सी बरसी
    जो तेरे जुल्फो से बूंदे,
    कच्चे मकां सा मेरा
    ये दिल ढह गया।।

    मदिरा के जाम सी छलकी
    जो तेरी आंखों से मस्ती,
    शराबी सा बदन मेरा
    ये झूमता ही रह गया।।

    पूनम के चांद सी बिखरी
    जो तेरे होठों से मुस्कान,
    गहरे समुंद्र सा मै
    लहरों में बदल गया।।

    स्वर्ग की अप्सरा सी निखरी
    जो तेरी हर एक अदा,
    जब भी देखा बस
    देखता ही रह गया।।

    किस- किस अदा का तेरी
    जिक्र मै करूं,
    एक – एक अदा पे तेरी
    मै कईं बार मर गया।।
    अनुज कौशिक

  • प्रेम – उपहार

    एक था जिम और एक थी डैला,
    दोनों लंदन में रहते थे।
    कहानी ये बिल्कुल सच्ची है,
    मेरे दादा कहते थे।
    डैला थी बहुत ही सुन्दर,
    बाल सुनहरी थे उसके
    जिम भी बांका युवक था,
    डैला भी मरती थी उसपे।
    पति – पत्नी थे वो दोनो,
    पैसों की थोड़ी तंगी थी।
    डैला के सुनहरे बालों खातिर,
    पास ना कोई कंघी थी।
    डैला के उलझे बालों को,
    देख के जिम सोचा करता था।
    एक दिन सुंदर कंघी लाऊंगा,
    वो अक्सर एक पैनी ,गुल्लक में डाला करता था।
    जिम के पास एक सुनहरी घड़ी थी,
    टूटी चेन थी उसकी, वो भी यूं ही पड़ी थी।
    घड़ी देखता था छुप- छुप के,कब पहनूंगा सोचा करता था।
    लेकिन डैला के बालों की, तारीफें करता रहता था।
    डैला को मालूम थी, उसके मन की बात।
    लेकिन पैसों की तंगी थी,
    ना घड़ी की चेन थी, ना बालों की कंघी थी
    क्रिसमस आने वाला था,
    दोनों ने तोहफा देने की ठानी थी।
    साजन – सजनी में प्यार बहुत था,
    एक दूजे के मन की जानी थी।
    बाल बेच चेन ले आई डैला,
    घड़ी बेच जिम लाया कंघी।
    प्यार बहुत था दोनों में बस,पैसे की ही थी तंगी
    एक – दूजे का उपहार देख,
    दोनों के भर आए नैन।
    ना काम आएगी कंघी, ना काम आएगी चेन।
    फिर, ख़ुशी – ख़ुशी मनाया क्रिसमस का त्यौहार,
    सच्चा प्रेम ही था, उन दोनों का उपहार।।

  • चल आ मैदान में..

    चल आ मैदान में पुलकित हो,
    ना रख चिंता ना विचलित हो..
    तेरे मार्ग की हर इक-इक व्याधि,
    तेरी आत्म शक्ति से परिचित हो..

    भय बंधन काट के बाहर आ,
    नित क्रंदन काट के बाहर आ..
    ना हो अभिमान से गदगद तू,
    अभिनंदन काट के बाहर आ..
    अब उठा प्रयत्नों की आंधी,
    ताकि इतिहास भी गर्वित हो..
    तेरे मार्ग की हर इक-इक व्याधि,
    तेरी आत्म शक्ति से परिचित हो..

    क्यों लगे किसी का साथ तुझे,
    क्यों थामे कोई हाथ तुझे..
    है पर्वत सा साहस तुझमे,
    तो डरने की क्या बात तुझे..
    कुछ कर ऐसा तेरे परिजन,
    तेरे ही नाम से चर्चित हो..
    तेरे मार्ग की हर इक-इक व्याधि,
    तेरी आत्म शक्ति से परिचित हो..

    तू अविरल जल की धारा बन,
    दैदीप्यमान ध्रुव तारा बन..
    ना आस किसी की रख मन में,
    तू अपना खुद ही सहारा बन..
    बस लक्ष्य साध और बढ़ता जा,
    भटकाव न तुझमे किंचित हो..
    तेरे मार्ग की हर इक-इक व्याधि,
    तेरी आत्म शक्ति से परिचित हो..

    – प्रयाग

    मायने :
    पुलकित – प्रसन्न
    क्रंदन – विलाप करना/ रोना
    अभिनंदन – बधाई/प्रशंसा
    दैदीप्यमान – प्रकाशयुक्त
    किंचित – थोड़ा भी

  • बारिश ने लिया अवकाश है

    सुनहरी धूप है,
    चारों तरफ प्रकाश है,
    आज लगता कि
    बारिश ने लिया अवकाश है।
    यूँ तो बारिश के बिना
    इस जिन्दगी कल्पना
    कर नहीं सकते हैं हम
    सृजन की प्रमुख साज है।
    फिर भी उसी के साथ
    सूरज की किरण भी है जरूरी,
    इस समन्वय के बिना
    सृजन की गति रहती अधूरी।
    धूप हो, बरसात हो
    सबको सुखद अहसास हो,
    जिंदगी सिंचित रहे,
    पथ में नया प्रकाश हो।

  • बचपन के दिन…..

    वो भी क्या उमर थी,जब मस्ती अपने संग थी ,

    सारी फिकर और जिम्मेदारियाँ, किसी ताले मे बंद थी,

    वो गलियाँ जिसमे खेलते थे क्रिकेट,पतंग उड़ाते कभी थे,

    कभी तोड़ते थे कांच तो कभी पेंच लड़ाते वो हम थे,

    क्या सच में वो दिन थे बचपन के ?

    बारिश मे भीगना ,क्लासेस बँक करना ,

    कीचड़ के पानी मे खुद को भिगोना,

    छत पे खड़े होके सीटी बजाना,

    मोहल्ले मे अपनी शानो -शौकत दिखाना ,

    क्या सच में वो दिन थे बचपन के ?

    दोस्तों के साथ सारे-सारे दिन का बिताना,

    गणपती की पूजा मे पंडाल सजाना,

    विसर्जन मे ढोल की थाप पे थिरकना,

    गप्पे लड़ाना, रूठना मनाना,हँसना हँसाना,

    क्या सच मे वो दिन थे बचपन के?

    रेट के टीले पे चढ़ना घरोंदे बनाना,

    दोस्तों की मोहब्बत को अपना बताना,

    किराये पे साइकिल लाकर दस मिनट ज्यादा चलाना,

    गिर जाने पर कितनी चोट खाना,

    क्या सच में वो दिन थे बचपन के ?

    कभी भूली हुई तो कभी यादों की दस्तक,

    गुजरे जमानों के पुराने पन्नों की हसरत ,

    दादी नानी के वो बूढ़े मगर सपने सयाने,

    अभी भी छुपे हैं वो नगमे सुहाने,

    क्या सच मे वो दिन थे बचपन के ?

    हाँ सच मे वो वही दिन थे बचपन के!!!

  • ज़िन्दगी तू ही बता..

    “साँस लेता हूँ फकत ये भी कोई कम तो नही,
    ज़िंंदगी तू ही बता मुझपे तू सितम तो नही..

    कभी पूछा न ज़माने के शरीफ लोगों ने,
    ‘दीवाने ये बता कि तुझको कोई गम तो नही?’

    किया हमने ही उसकी बात का ऐतबार मगर,
    उसका कहना कोई वादा या फिर कसम तो नही..

    क्यूँ खुदा तक नही पहुँची मेरी सदा अब तक,
    दुआ मुझसे ही चली मुझपे ही खतम तो नही..

    तेरी आँखों में यकीनन कुछ चुभ रहा होगा,
    वरना अब तक तो हुई आँखे तेरी नम तो नही..’

    – प्रयाग धर्मानी

    मायने :
    फकत – सिर्फ
    सदा – आवाज़

  • पहली बार जगे थे, जो अरमान!

    पहली बार जगे थे ,
    जो अरमान !
    तुम्हें देखकर!
    वो ,निहारने का अंदाज
    अभी भी रमा है,
    मेरे जहन में ।

    आंखों का आंखों से
    वार्तालाप!
    करने का हुनर
    अभी भी बसा है,
    मेरे ज़हन में।

    फिर वहम ही है तेरा,
    कि बदल गए हैं हम
    अरे!मोहब्बत भरी धरा हो तुम मेरी ,
    और मैं बारिश का बादल!
    जो हमेशा बरसाता रहेगा
    तुम पर ,
    मोहब्बत !मोहब्बत! मोहब्बत!

  • दरिया था कभी मुझमे..

    ‘ये मेरी मोहब्बत की, शिद्दत का सिलसिला था,
    दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था..

    ज़िद थी गज़ब की मुझमे, तुझको जीताने की,
    हर बार हारकर भी, जीता जो हौसला था..

    मुझमे रवाँ तू जितनी, पर उतना मैं नही हूँ,
    बरसों की शिकायत थी, मुद्दत से ये गिला था..’

    दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था..

    – प्रयाग

  • “मैं स्त्री हूं”

    सृष्टि कल्याण को कालकूट पिया था शिव ने,
    मैं भी जन्म से मृत्यु तक कालकूट ही पीती हूं।
                                                       मैं स्त्री हूं।
                                                 (कालकूट – विष)

    मचा था चारों ओर घोर त्राहिमाम जब,कोई ना था बचाने को,
    तब तुम्हें बचाने वाली दुर्गा – महाकाली हूं।
                                                        मैं स्त्री हूं।

    मैं जटाधीश की जटाओं से बहने वाली हूं,
    मैं सगर के पुत्रों को मुक्त कराने वाली हूं,मैं गंगा हूं,
                                                            मैं स्त्री हूं।

    है राम अगर मर्यादा पुरषो्तम तो,
    मैं भी तो मर्यादा की देवी हूं,मैं सीता हूं,
                                                   मैं स्त्री हूं।

    मैं सदा अपना पतिव्रत धर्म बचाने वाली हूं,
    मैं तप से त्रिदेवो को भी शिशु बनाने वाली हूं, मैं अनुसुइया हूं,
                    मैं स्त्री हूं।

    मैं राम कृष्ण को जनने वाली हूं,
    मैं माता हूं, मैं बहन हूं, मैं वंश बढ़ाने वाली हूं,
                                                           मैं स्त्री हूं।

    मैं हर दुख को सहने वाली हूं,में राधा हूं,
    मैं सदा भक्ति प्रेम करने वाली हूं, मैं मीरा हूं,
                                                         मैं स्त्री हूं।

    मैं काल से सत्यवान को बचाने वाली हूं, मैं सावित्री हूं,
    मैं सदा शौर्य दिखलाने वाली हूं,में लक्ष्मीबाई हूं,
                                                             मैं स्त्री हूं।

    मैं सम्मान की खातिर जीने मरने वाली हूं,
    मैं चित्तौड़ का जौहर दिखलाने वाली हूं, मैं पद्मिनी हूं,
                                                            मैं स्त्री हूं।

    में सर्वस्व त्याग समर्पण करने वाली हूं ,
    में सदा सहनशीलता रखने वाली हूं,
                                                 मै स्त्री हूं।

    मैं कदम से कदम मिलाकर चलने वाली हूं,
    मैं जरूरत पड़ने पर पिता का अंतिम संस्कार भी करने वाली हूं,
                  मैं स्त्री हूं।

    मैं दयावान हूं,में बुद्धिमान हूं, मैं किसी पुरुष से कम नहीं ,
    फिर भी अपने अपने सपनों को कुचलने वाली हूं,
                                                            मैं स्त्री हूं।

    सब कुछ अपना न्योछावर करके भी,
    बस प्रेम चाहने वाली हूं, मैं संतोषी हूं,
                                                मैं स्त्री हूं।

    मैं तेरी हर मुश्किल हर लेने वाली हूं,
    मैं मयंक जनने वाली हूं ,
                                   मैं स्त्री हूं।
                            ✍️✍️मयंक “उषा” व्यास✍️✍️

  • दुल्हन

    ओस के मोतियों जड़ा
    एक हर बनाऊ मैं
    फलक के सितारों से
    तेरी मांग सजाऊंगा मैं ।
    काली घटाओं से मांग लूं
    तेरी आंखों का काजल
    झिलमिलाती लहरों से
    बनाऊं तेरी पायल ।
    श्वेत चांदनी से बुनकर
    पहनाऊं तुझे चुनरी
    सागरों के सीपो जड़ी हो
    तेरी अंगुलियों की मुंदरी ।
    डूबते सूरज की
    सिंदूरी शाम से लेकर
    एक चुटकी भर दूं
    तेरी मांग में ।
    प्रकृति के अनमोल गहनों से
    सजी फिर उस दुल्हन का
    मैं घुंघट उठाऊं
    उसी की आंखों में खो जाऊं
    उसी की बाहों में सो जाऊं।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • हाज़िरजवाबी आ गई

    ‘इतना कुछ लिखा गया फितरत किताबी आ गई,
    ज़िंदगी के मंच पर जुर्रत खिताबी आ गई..
    उंगलियाँ उठी तो अल्फाजों को ताकत मिल गई,
    सवाल इतने उठ गए हाज़िरजवाबी आ गई..’

    – प्रयाग

    मायने :
    अल्फाज़ो को – शब्दों को

  • ईश्वर की कठपुतली

    कुछ खार जमाने में हर चमन में होते हैं,
    चुभते हैं जिस्म को लहूलुहान कर देते हैं,
    तो कुछ खार लफ्जों से घायल कर देते हैं,
    उन खारों से कोई जाकर पूंछे, क्या उन्हीं का स्वाभिमान है सर्वो परि?
    बाकी सबका क्या कोई वजूद नहीं,उनका कोई स्वाभिमान नहीं,
    कुछ भी कह देने से कोई अपमान नहीं!
    सब क्या माटी के ढेले हैं उन सम कोई महान नहीं,
    अरे प्रज्ञा! जाकर उनसे कह दो हम सब ईश्वर की कठपुतली हैं,
    इस दुनिया में सब आते हैं,सबको निश्चित दिन जाना है,
    इस कालचक्र के फेरे से तो बचता कोई भगवान नहीं..फिर खार तो खार हैं, नश्वर हैं,
    दामन छेदकर नष्ट हो जाएगे,बस उनके दिए जख्म़ ही यादगार रह जाएगे…

  • सच्ची आजादी दिला दो तुम

    हे दीनबंधु,परमपिता परमात्मा,
    करते हम तुमसे बस यही प्रार्थना,
    सच्ची आजादी दिला दो तुम ,
    एक ऐसा देश बन दो तुम।

    बेटियां जहां कोख में ही ना मारी जाती हो,
    हर घर में हर नारी सुख सम्मान पाती हो।

    माता पिता को जहां पुत्र से सम्मान मिले,
    भाई भाई में राम लखन सा प्यार मिले।

    देश का हर नेता जहां भ्रष्टाचार मुक्त हो ,
    देश का हर घर निर्धनता विमुक्त हो।

    शिक्षा जहां समान अधिकार से मिलती हो,
    हर कृष्ण को अपनी राधा मिलती हो।

    जहां अमीरी और गरीबी की गहरी खाई ना देखी जाती  हो,
    पैसों की खातिर मर्यादाएं ना बेची जाती हो।

    देश का युवा जुड़ जाए जहां संस्कृति संस्कारो से,
    राम सी मर्यादा रखता हो जो अपने विचारो से।

    मेरी कल्पनाओं में सत्य के पर लगा दो तुम,
    सच्ची आजादी दिला दो तुम,
    एक ऐसा देश बना दो तुम।

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