Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • तेरी खुशी है किसमे

    ‘तेरी खुशी है किसमे, तय कर ये रज़ा अपनी
    परेशान हो गया हूँ, दुआ बदल-बदल के..

    शायद के कोशिशों से, घुट जाए दम भी मेरा,
    जलती है आग भी अब, धुँआ बदल-बदल के..

    होगी तेरी नज़र में, हँसी खेल ये मोहब्बत,
    इश्क भी अक्सर तुझे, हुआ बदल-बदल के..

    कुछ अपनी रहगुज़र में, तब्दीलियां चाहते थे,
    खेला है ज़िन्दगी का, जुआ बदल-बदल के..’

    – प्रयाग धर्मानी

    मायने :
    रज़ा – मर्ज़ी
    रहगुज़र – रास्ता
    तब्दीलियां – परिवर्तन

  • मंज़र

    “गौर से देख तू इस दिल के उजड़े मंज़र को,
    है जो खंडहर कभी आबाद हुआ करता था..
    वो जिसे ‘अदना सा शागिर्द’ लोग कहते हैं,
    वो कभी इश्क में उस्ताद हुआ करता था..”

    – प्रयाग

    मायने :
    मंज़र – दृश्य
    अदना सा – मामूली/छोटा सा
    शागिर्द – शिष्य

  • खुशहाली

    अपने पन की बगिया है ,खुशहाली का द्वार

    जीवन भर की पूंजी है ,एक सुखी परिवार

    खुशहाली वह दीप है यारों ,हर कोई जलाना चाहता है

    खुशहाली वह रंग है यार्रों ,हर कोई रमना चाहता है

    खुशहाली वह दौर था यारों ,कागज़ की नावें होती थीं

    मिट्टी के घरौंदे थे ,छप्पर की दुकानें होती थी

    कहीं सुनाई देती थी रामायण ,कहीं रोज अजानें होती थी

    खुशहाली को नजर लग गयी ,अब मद सब पर छाया है

    खुशहाली कहीं दब गई ,इंसानों ने इसे हराया है

    यह बदकिश्मती है खुशहाली की ,हर रोज दंगा होता है

    गणतंत्र यहाँ चौराहों पर ,रोज रोज ही रोता है

    जो शासक है वो ईश्वर से ,खुद की तुलना करते हैं

    और नेता आज के दौर का बस ,गिरगिट सा रंग बदलता है

    खुशहाली को कोई समझ न पाया ,यह दौलत से नहीं मिलती है

    खुशहाली को नजर लग गई ,अब वह रुदन करती है ||

  • तज़ुर्बा

    ‘दिखा दिया ये तज़ुर्बा भी ज़िन्दगी ने हमें,
    हैं कितने शख्स ज़हर, और दवा है कितने..
    न रोशनी को इल्म, न ही चिरागों को पता,
    है कितने बुझने और मंज़ूर-ए-हवा हैं कितने..’

    – प्रयाग

    मायने :
    इल्म – ज्ञान

  • खुदगर्ज़ी

    ‘यही चलन सा हो गया है अब ज़माने का,
    हो जो खुदगर्ज़ी तो एहसान घट ही जाता है..
    रास्ता कौन बदलता है किसी की खातिर,
    जो पेड़ बीच में आता है कट ही जाता है..’

    – प्रयाग

  • बे-लौस

    ‘बे-लौस किस ज़ुबाँ से कहें आज बशर को,
    साये में बैठकर भी काट डाला शजर को..’

    – प्रयाग

    मायने :
    बे-लौस – नि:स्वार्थ
    बशर – इंसान
    शजर – पेड़

  • हे! सबला तू महान है

    सहनशीलता की तू देवी ,
    हर किरदारों में ढल लेती,
    ‘मानुष’ तेरी महिमा का ,
    करता गुणगान है ,
    हे! सबला, तू महान है।

    अर्धांगिनी बनकर,
    तुने हर धर्म निभाया ,
    बंद मकान को ,
    तूने घर बनाया ,
    हर पति को होता,
    तुझ पर बड़ा गुमान है ,
    हे!सबला तू महान है।

    मां बनकर तू‌ने,
    बहुत दर्द सहा,
    रोयी बहुत,
    मगर कुछ ना कहा,
    ममता तेरी निस्वार्थ,
    तेरी पवित्रता की पहचान है ,
    हे! सबला तू महान है।

    बहन बनी जब,
    तूने खुशियां बांटी,
    प्रेम मिठाई हमेशा,
    भाईयों को खिलाई,
    अपना हिस्सा हमेशा ,
    तूने किया बलिदान है,
    हे!सबला तू महान है।

    तू वीरांगना बनी,
    तू प्रेरणा बनी
    मातृभूमि की प्रतिष्ठा बनी,
    रिश्तो से ऊपर भी,
    तेरी अपनी एक मिशाल है
    हे!सबला तू महान है

    …….मोहन सिंह मानुष

  • बदल गया

    ‘कुछ इस तरह ज़िन्दगी का फसाना बदल गया,
    वो क्या बदला कि सारा ज़माना बदल गया..
    रिश्तों पर बेरूखी का असर कुछ यूँ हुआ,
    उसका रूठना बदला तो मेरा मनाना बदल गया..’

    – प्रयाग

  • पतन

    पतन
    हाँ पतन
    पतन की शुरुआत
    कब होती है ,
    जब घमंड की
    पराकाष्ठा होती है,
    जब अपने से
    काबिल कोई
    नहीं दिखता है
    आँख में
    पट्टी बंधी होती है।
    जब व्यक्ति दूसरे की
    गुणवत्ता पर
    परोक्ष रूप से
    हमला करता है
    या करवाता है,
    पतन की शुरुआत
    तब होती है।
    जब व्यक्ति योग्यता से
    आगे बढ़ने की बजाय
    दूसरों पर तंज कसता है
    या कसवाता है,
    दूसरे की लोकप्रियता पर
    परेशान हो उठता है,
    पतन की शुरुआत
    तब होती है।

  • पूजनीय शिक्षक

    शिक्षक सम संसार में हितकारी ना कोइ।
    सकल सृष्टि के भाग्य का एक विधाता सोइ।।

    कहिए द्विज, शिक्षक, गुरु या कहिए उस्ताद।
    परमेश्वर को पूजिए गुरु पूजन के बाद।।

    लेकर गुरु की चरण- रज मस्तक तिलक रचाय।
    संजय ऐसे शिष्य पर शारद होयँ सहाय।।

    शिक्षक के सम्मान को पहुंचाए जो चोट।
    उस नेता के पक्ष में कभी न करना वोट।।

    बनता अगर कलेक्टर रहता धक्के खाय।
    बलिहारी माँ बाप की शिक्षक दियो बनाय।।
    खुद अध्ययन करता रहे, रहे बाँटता ज्ञान।
    खुद सीखे यदि अनवरत दूर करे अज्ञान।।

    औरन को भल बनन की बांटो तभी सलाह।
    जब तेरे खुद के चरण सही पकड़ लें राह।।

    करे मनन चिंतन सदा दूर करे निज खोंट।
    निर्विकार बन तब करे परदोषों पर चोट।।

    अपने अवगुण ज्ञात कर व्यापक करो प्रचार।
    रिपु में यदि सदगुण दिखे तुरत हृदय में धार।।

    अपनी कमियाँ प्रकट कर दोष अन्य के गोय।
    यद्यपि सो जन गुण रहित पर सर्वोत्तम होय।।

    संजय नारायण

  • जल्दी जल्दी में (हास्यव्यंग्य)

    श्याम का समय,
    बहुत जल्दी में थे वे लोग,
    तेज तेज कदमों में,
    अजीब सी हलचल,
    चेहरे पर रोनक,
    कुछ पाने की लालसा,
    एक के बाद एक,
    गुजर रहा था हर शख्स,
    मन में मेरे भी पली जिज्ञासा ,
    आखिर क्या हुआ है,
    कोई अनहोनी या कोई सुखद घटना,
    अरे! बहुत जतन से पता चला,
    गांव से बाहर एक ठेका खुला।

  • गाँव

    ‘गाँव में हाथ, कई हाथ थामे रखते हैं,
    शहर में खींचने को सिर्फ पांँव होता है..
    तरक्की कहने को कितनी ही की हो शहरों ने,
    यूँ कुछ भी कह लो मगर गाँव, गाँव होता है..’

    – प्रयाग

  • किरदार

    ‘ऐसे किरदार का यूँ भी है महकना वाजिब,
    कि नाम जिसका महज़ खुशबुओं से लिखा हो..
    आखरी खत ये जो खाली सा नज़र आता है,
    यूँ भी हो सकता है कि आँसुओं से लिखा हो..’

    – प्रयाग

  • अयादत

    ‘तेरे खयाल से बस ये सवाल पूछा है,
    किसी तरह से यूँ खुद को संभाल, पूछा है
    नही मिला है जब, कोई हमें अयादत को,
    तेरी ही बेरुखी से अपना हाल पूछा है..’

    – प्रयाग

    मायने :
    अयादत : हाल चाल पूछना

  • फिर क्या जीना फिर क्या मरना

    rajendrameshram619@gmail.com
    ************************

    जलने दो हृदय की वेदना,
    विचलित मन से कैसे डरना |
    हो जीवन संताप दुखों का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
    ~~~~~00000~~~~~

    युद्ध अनघ है मन के भीतर,
    परितापों से प्राण पिघलते |
    दूर करो असमंजस बादल,
    मन पावक में कैसे जलते ||
    धार बढा दो पराक्रमी तुम,
    कुरुक्षेत्र सा जीवन लड़ना |
    हो जीवन संताप दुखो का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
    ~~~~~00000~~~~~

    तुम में ज्वाला सूर्य सरीखी
    हेतु धर्म तुम जल सकते हो |
    पीर पराई थोड़ी समझो,
    कष्ट दूर सब कर सकते हो ||
    फिर पुण्य मिले कुछ नही मिले,
    दीपक बनकर पथ पर जलना |
    हो जीवन संताप दुखो का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
    ~~~~~00000~~~~~

    आनंद स्वतः मिल जाएगा,
    हो दूर निराशा की बातें |
    अपने दीपक तुम स्वयं बनो,
    दूर करो अंधेरी रातें ||
    कटु वचनों का बोझा लादे,
    शुष्क हँसी फिर कैसे हँसना |
    हो जीवन संताप दुखो का,
    फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||

    ***************************
    रचना-राजेन्द्र मेश्राम “नील”

  • गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….

    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
    जहाँ रिश्ते तो हैं ,वह मिठास नहीं
    जहाँ मिट्टी तो है ,पर खुशबू नहीं
    जहाँ तालाब तो है ,पर पानी नहीं
    जहाँ आम बौराते तो हैं ,पर सुगन्ध का महकना नहीं
    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
    यहाँ लोग बेगाने से हो गये
    लोग सुख साधन के भूंखे हो गये
    गांव अब शहरों में तब्दील हो गये
    गांव अब चकाचौंध से लबरेज हो गये
    बुजर्गों के आशिर्वाद में
    जो स्नेह कीर्ति का भाव था
    पाश्चात्य संस्कृति में ,कहीं विलुप्त हो गया
    मिल जुल कर पर्व मनाने की भावना
    अलगाव समय रूपी भट्ठी में जल गयी
    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
    आदमी को आदमी से मिलने की फुर्सत कहाँ
    इन्सानियत और भाईचारा शहरीकरण में खो गया
    आधुनिकता का नशा हर व्यक्ति पर छा गया
    जो छलकता था प्यार ,वो दिखावा बनकर रह गया
    पैसों के लिए हर शख्श पलायन कर गया
    विश्वास का घर अब खण्डहर बन गया
    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….

  • डर लगता है

    ‘गुज़री कुछ यूँ कि अब तन्हाई से डर लगता है,
    हमें तो अपनी ही परछाई से डर लगता है..

    गहराई अब तो समंदर की बेअसर हैं यहाँ,
    हमें तो इश्क की गहराई से डर लगता है..

    इक अदा थी जो गिरफ्तार कर गई हमको,
    आजकल हर हसीं अंगड़ाई से डर लगता है..

    जान पहचान ने ही दर-बदर किया हमको,
    अब तो हर शख्स की आशनाई से डर लगता है..’

    – प्रयाग

    मायने :
    आशनाई – पहचान

  • दम तोड़ती जिंदगी

    अचानक से कर्ण में एक ध्वनि गूंजी ,

    देखा तो भीड़ में कोई दम तोड़ रही थी,

    पालन हार अपनी जिंदगी की जंग लड़ रही थी,

    कटती अंग – प्रत्यंग के साथ काली घटा छा रही थी,

    मानों अपनी कातर नजरों से बहुत कुछ कह रही थी,

    प्राण खोने का भय न था उसमें जरा भी,

    मानों किसी की तिवान उसे कचोट रही थी,

    कौन देगा जीवन इस संसार को ?

    पखेरू कहाँ  ढूंढेगा अपना बसेरा ?

    बटोही ढूंढेगा छाँव कहाँ ?

    सुत करेंगे किलोल कहाँ ?

    ओह !….. उसकी पीड़ा असहनीय थी ,

    सवालों के साथ जिंदगी ने भी दम तोड़ दी,

    नेक इरादा मानव स्वार्थ के बली चढ़ गयी ,

    अकस्मात घनघोर बादल छा गयी ,

    मानों प्रकृति भी मातम माना रही ,

    पर मानव इसबार भी मूक दर्शक बनी रही l

         इसबार भी मूक दर्शक बनी रही l l

                                  Rajiv Mahali

  • बड़ी मुश्किल से बना हूँ

    बड़ी मुश्किल से बना हूँ टूट जाने के बाद,
    मैं आज भी रो देता हूँ मुस्कुराने के बाद..

    तुझसे मोहब्बत थी मुझे बेइंतहां लेकिन,
    अक्सर ये महसूस हुआ, तेरे जाने के बाद..

    ढूंढ रहा हूँ मैं अपने अंदर उस शख्स को,
    जो नज़र से खो गया है, नज़र आने के बाद..

    – प्रयाग

  • आँसू

    रुकने नही दिया किसी की पलकों ने हमें,
    जब भी किसी की आँख का आँसू बने हैं हम..

  • याद कर लो सभी आज उनको

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    याद कर लो सभी आज उनको
    जिनके यत्नों से आजादी पाई,
    यह जन्मभूमि भारत हमारी
    उस गुलामी से मुक्ति ले पाई।
    हर तरफ था अंधेरा घना
    कोई आशा न थी आम जन में,
    उस निराशा में जिसने जगाया
    याद कर लो सभी आज उनको।
    बांटने की अनेकों थी कोशिश
    फुट डालो करो राजनीति
    जाति धर्मों में हमको लड़ाकर,
    राज करते थे गोरे फिरंगी।
    लूट कर देश की संपदा को
    कोष ब्रिटेन का भर रहे थे,
    दुर्दशा में था भारत का जीवन
    लोग कष्टों में घिरते गए थे।
    उन फिरंगी के मुंह में तमाचा
    एकजुटता से जिसने लगाया,
    जिसने छेड़ी वो जंगे आजादी
    याद कर लो सभी आज उनको।
    है नमन आज उनको नमन
    जिनके यत्नों से आजादी आई,
    जिसने अपना पसीना बहाया,
    खून की बूंद जिसने चढ़ाई।
    कतरे कतरे से सींचा वतन
    सिर पे बांधे हुए थे कफन,
    देख बलिदान दुश्मन भी काँपा
    ऐसे वीरों को शत-शत नमन।
    जुल्म सहते रहे, मुस्कुराते रहे
    सिर कटा पर झुकाया नहीं,
    गोलियां खाईं सीने पे जिसने
    ऐसे वीरों को शत-शत नमन।
    याद कर लो सभी आज उनको
    जिनके यत्नों से आजादी पाई,
    यह जन्मभूमि भारत हमारी
    उस गुलामी से मुक्ति ले पाई।

    —- सतीश चंद्र पाण्डेय

  • जिंदगी और मौत

    हालत कुछ आज ऐसी बनी
    चलती जिंदगी से मौत उलझ गई,
    अकड़ कर वो कुछ यूं खड़ी
    मानो जिंदगी से बड़ी हो गई।।

    ऐ मौत, यूं ना तू मुझपे अकड़
    बाकी है मेरी अभी सांसो पे पकड़
    ना एक कदम जिंदगी पीछे हटी
    मौत भी खड़ी गुर्राती गई।।

    ना सांसे तेरी अपनी होंगी
    जिस दिन वक़्त मेरा आएगा,
    ऐ जिन्दगी, तू याद रखना
    तूझपे मेरा एक वार बाकी है।।

    लोगो के दिलो मै अभी
    मेरे हिस्से का प्यार बाकी है,
    माना वक़्त आएगा तेरा एक दिन
    पर मेरा तो अभी दौर बाकी है।।

    यूं डट कर लडी आज जिंदगी
    हारती हुई मौत चली गई,
    हालत कुछ आज ऐसी बनी
    चलती जिंदगी से मौत उलझ गई।।
    AK

  • 15 अगस्त का पर्व है

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    हर देश – वासी की ज़ुबान पर,
    आज जय – हिन्द का नारा है।
    ना .डाले कोई बुरी नज़र,
    ये वीरों ने ललकारा है ।
    कारगिल का युद्ध हो,
    या हो घाटी गलवान
    खड़े मिलेंगे हर कदम पर,
    वीर सैनिक बलवान
    चीन हो या पाकिस्तान,
    नहीं झुकेगा हिंदुस्तान।
    सैनिक दल ,उरी का बदला ले के आया,
    अभिनन्दन भी वापिस पाया।
    भारत की जमीं पर,
    तिरंगा सदा फहराएंगे।
    जीत का परचम, यूं ही लहराएंगे।
    इंडो – तिब्बतन बॉर्डर पर भी,
    गूंजा जय – हिन्द का नारा है।
    वीर – जवानों का जोश देखो,
    6000फुट के शिखर पर,
    फहराया तिरंगा प्यारा है।
    ये पंद्रह अगस्त का पर्व है,
    हमको भारत पर गर्व है।
    आओ मनाएं इसे शान से,
    शुरू करें राष्ट्रीय – गान से।
    तिरंगे में लिपट कर जो आए,
    उन शहीदों को सलाम।
    उनकी शहादत एक कर्ज है,
    उनको नमन, उनको प्रणाम।
    वीर शहीदों की कुर्बानी,ना जाए बेकार
    आओ हम सब मिलकर बोलें,
    भारत मां की जय – जयकार।

    -गीता कुमारी

  • दुर्लभ पेड़

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    बहुत सारी वनस्पतियों में,
    बस एक ही है वो जादुई पेड़!
    हरा -भरा ,घना -निराला,
    अलग-अलग सी कलियां उसकी,
    खुबसूरत तने का ताना-बाना,

    रंग बिरंगी पत्तियां! देखो,
    अनोखा दृश्य बिम्ब करें ,
    तीन रंगा फूलों का गुच्छा,
    हृदय को प्रसन्न करे।

    प्रकृति का है ये अनुपम सौंदर्य,
    ऐसी विविधता में एकता,
    शायद ही कहीं और मिले।

    इस पेड़ की शोभा पक्षियों को भाती,
    जो भी आता, यही रह जाता,
    सौंदर्य में उसके वो खो जाता।

    फूलों का रंग; हरा , सफेद , केसरिया!
    हरियाली, शान्ति, और बलिदान ,
    सबको यहां पहचान मिले,
    रहते सब मिलजुलकर साथ,
    मुस्कुराते -से सब मेहमान मिले ,
    उन सबकी ये अनमोल मोहब्बत,
    पेड़ को और गुणवान करें।

    मगर पेड़; पर एक कौआ आया,
    सभी रंगों को उसने भड़काया,
    सुन केसरिया तु है कितना अद्भुत!
    पेड़ को सुन्दर तुमने बनाया,

    हरे रंग ! तू है बहुत तेजस्वी,
    कान में उसके बहुत फुसफुसाया,
    सफेद !अगर तू ना हो तो ,
    पेड़ कुरूप बने और पेड़ों सा।

    मगर, कौआ थोड़ा नासमझ बेचारा!
    चालाकी उसकी ना चले; यहां पर,
    क्योंकि हरा मिला है केसरिया से ,
    सफेद घुला है इन दोनों में।

    प्रेम भावना, भाईचारे से,
    सबका महान योगदान है,

    तभी तो पेड़ दुर्लभ बना!
    सबके समान महत्त्व से।
    और तभी तो पेड़ अद्भूत बना!
    सबके असीम सौंदर्य से।

    —मोहन सिंह मानुष

    काव्यगत विशेषताएं
    भाव—>
    पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां पर विभिन्न परंपराओं, विविध संस्कृतियों, अनेक प्रकार की भाषाओं और बहुत सारे धर्मो के लोग; आपस में मिलजुल कर भाईचारे के साथ रहते हैं। विविधता में एकता यहां की मूल पहचान है कविता में यही भाव संजोए गए हैं
    प्रतीकात्मक शैली के अनुरूप दुर्लभ पेड़ महान देश भारत का प्रतिनिधित्व करता है,
    कलियां–परंपराओं ,रंग बिरंगी पत्तियां- विभिन्न भाषाओं, पक्षी- विदेशी नागरिकों,
    तीन रंगा फुल – विभिन्न धर्मो,कौवा- राजनीति एवं राजनेताओं इत्यादि का प्रतीक है
    समस्त पेड़ का मानवीकरण किया गया है।

  • सिला दिया उसने

    मेरी वफाओं का खुलकर सिला दिया उसने,
    न रखा एक भी, हर खत जला दिया उसने..

    ‘दूर होने का फैसला क्या खुद तुम्हारा है ?’
    मैंने पूछा तो कैसे सर हिला दिया उसने..

    हमें भी खूब मिली आंसू पोंंछने की सज़ा,
    हँसाया जिसको था अब तक, रुला दिया उसने..

    गैर हाजिर है मेरे दिल से अब उम्मीद मेरी,
    मुझे यकीं है कि मुझको भुला दिया उसने..

    मेरी वफाओं का खुलकर सिला दिया उसने,
    न रखा एक भी, हर खत जला दिया उसने..

  • स्वतंत्रता की वर्षगांठ

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    खुशी खूबसूरती और खैर- ख़ैरियत के साथ
    चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
    आजादी सौगात नहीं,अमर शहीदों की विरासत है
    रक्त बून्द से सिंचित,करना हमें जिसकी हिफाज़त है
    गली कूनवे, हर जन को करनी मुल्क की इबादत है
    हमारी अभिव्यक्ति अपनी नहीं, ये उनकी शहादत है
    विकसित नव निर्माण के संकल्प के साथ
    चलो मनाते हैं स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
    गुलामी के दंश से मातृभूमि को जो राहत दिलायी
    कुर्वानी खुद की दे आजादी की मन में चाहत जगायी
    कटकर भी जिनके शीश हिमालय शिखर से भी ऊंचे हैं
    अपने शौर्य से जिसने आज़ाद हिन्द के अक्श खींचे हैं
    उनके पदचिह्नो पर निर्भिक चलने के संकल्प साथ
    चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
    अब भी क्यू अपने संकीर्णता के पंजे में जकड़े हैं
    खुद के गर्व में खुद को बान्धे किस मद में अंधे हैं
    कभी धर्मान्धता तो कभी जातिवादिता को पकङे हैं
    क्षेत्रवाद, भेदभाव जैसे उन्मादो में अकङे हैं
    रूकावटो को दूर कर, राष्ट्रनिर्माण संकल्प के साथ
    चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
    क्या ये वही भारत है जिसमें थीं वीरों की आस्था
    खेत, सङक आसरागृह में सुता की दिखती है व्यथा
    फाँसी पे लटकती, अग्नि में जलाती दहेज़ की प्रथा
    बेटियों को कमतर आकने की प्रचलित है कुप्रथा
    भ्रूणहत्या नहीं, भ्रूणपल्लवन के संकल्प के साथ
    चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
    हमारी अस्मिता पर टिक न पाए किसी की नजर
    बुलन्दी के आगे उठ न पाए किसी दुश्मन का सर
    हमारी सर्वशक्ति का विश्वभर में हो ऐसा असर
    घुसपैठ की सोचने से पहले दहल जाए उनका जिगर
    अपने कण-कण की हिफाज़त के संकल्प के साथ
    चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
    विभिन्न नस्लों जातियों धर्मों से गुलज़ार है ये उपवन
    विभिन्न बोलियों भाषाओं से महकता है प्यारा चमन
    अहिंसा के दूत बनें ,पसन्द हो शान्ति -अमन
    मतभेदों से उठकर, हम करें इन्सानियत को नमन,
    अंजाम को सोचे बिना सत्यवलण के साथ
    चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
    सुमन आर्या
    ****

  • इंक़लाब

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

  • कल ही लिपटे थे दामन से

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    कल ही लिपटे थे दामन से
    क्यूँ आज तिरंगा ओढ़ चले?
    दो कदम चले थे साथ अभी
    क्यों आज मुझे तुम छोड़ चले?

    अब प्रेम गगरिया को अपनी मैं
    आँखों से छलकाऊँगी,
    तेरे हत्यारों को साजन सूली पर चढ़वाऊँगी।
    मैं सूली पर चढ़वाऊँगी…

    सूनी गलियां सूना आंगन
    सूनी मेरी दुनिया साजन
    ‘परिणय’ के वो सुमधुर कंगन
    कैसे मैं खनकाऊँगी।
    तेरे हत्यारों को साजन सूली पर चढ़वाऊँगी…

    मीठे-मीठे सपने कल के
    तुमने देखे हमने देखे
    तेरे बिन ओ बोल रे साजन!
    कैसे मैं जी पाऊंगी।
    तेरे हत्यारों को साजन सूली पर चढ़वाऊँगी…

    मेरी बिंदिया मेरी पायल
    तेरी राहें देख-देखकर
    आंसू भी अब सूख गए हैं
    तेरे नाम का लगा के काजल
    कैसे मैं जी पाऊँगी।
    तेरे हत्यारों को साजन सूली पर चढ़वाऊँगी…

    कवयित्री:- प्रज्ञा शुक्ला ‘सीतापुर

  • कभी लहू तो कभी उनका कफ़न बन जाऊ

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    कभी लहू तो कभी उनका कफ़न बन जाऊ
    स्वतंत्र दीप से जगमगाता हुआ चमन बन जाऊ
    ए आजादी तू घटा बनके बरसना
    और में तेरा भीगता हुआ गगन बन जाऊ

    क्यों याद दिला रहा हूँ, जो है बात पुरानी
    इक अल्फाज नहीं, ये है पूरी एक कहानी
    इस मिट्टी में खूं से लिपटी न जाने कई जवानी
    वो पटेल आजाद लाल और सुभास तो याद नहीं तुम्हे
    लेकिन ये लहराता तिरंगा है इनकी निशानी
    जाओ तुम भी क्या याद करोगे
    वो अमर वीर क़ुरबानी

    आजादी के नाम पर
    धर्म अधर्म का खेल खेलते
    जिस्मो का रोज नया बाजार खोलते
    वो सत्य नेता की तिजोरी में
    और अहिंशा चोरो की चोरी में
    फिर क्यू खुदको भारतीय बोलते

    वो वीर तीर थे
    कभी आग तो कभी प्यार का नीर थे
    परछाई भी जिनकी लड़ा करती थी
    वही तो भारत बनाने वाले पीर थे
    इन्ही से हुआ ये एक देश महान
    जिनको कहते हम हिंदुस्तान

    लेकिन
    भ्रष्ट कपट और अपराध पर करते लोग आज गुमान
    आप ही बताओ कैसे कहुँ मैं
    मेरा भारत महान
    मेरा भारत महान

  • आज़ादी

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    दृढ़ निश्चय लेके निकले
    मुसीबत को निकाला जड़ से उखाड़
    ये देश भक्त हुए दुनिया में विख्यात
    जब लहू से लिखा इन वीरो ने भारत माँ का नाम

    करने आये थे व्यापार
    और कर रहे थे देश को बर्बाद
    देश के वीरो ने किया
    इन अंग्रेज़ो से हमे आज़ाद

    कठिन था हराना
    मजबूत थे जज्बात
    अंग्रेज़ो पे फ़तेह पाकर
    इस देश को किया आबाद

    मुसीबत की लेहरो को
    अपने जोश से मोड़ दिया
    जिस घमंड से आये थे अंग्रेज़
    उस घमंड को भी भारत के वीरो ने तोड़ दिया

    गाँधी ,नेहरु ,पटेल , सुभाष ने
    इस देश को आज़ादी दिलाई
    भगत , राजगुरु और , सुखदेव की
    क़ुरबानी से हर देशवासी की आँखे भर आई,

    दिखाई एकता की ताकत
    हुआ भारत विख्यात पूरे जहान में
    बुरी नज़र वालो दूर रहना
    ऐसे और वीर है इस हिंदुस्तान में

    फेहराओ तिरंगा
    याद रखो उन वीरो को
    भारत माँ की रक्षा
    की तोड़के अंग्रेज़ो की जंजीरो को

    देश का त्यौहार है आया
    खुशियाँ मनाओ और बांटो मिठाइयाँ
    आप सभी देशवासियो को
    स्वतंत्रता दिवस की खूब बधाइयाँ

    – अंशुल ओझा

  • शहीद

    स्वतंत्रता दिवस काव्य पाठ प्रतियोगिता:-

    कृतज्ञ देश है उन वीरों का
    जिसने लहू बहाया अपना
    देश की खातिर तन मन धन
    सब कुछ है लुटाया अपना
    बलिदान दिया है कितनी मां ने
    कितनी बहनों ने है भाई खोया
    आज शहीदों को नमन किया
    आज देश है खूब रोया
    सारी जवानी भेंट चढ़ा दी
    अपनी भारत मां के लिए
    दिवाली पर घर आंगन से पहले
    शहीदों की चिताओं पर जले दिए
    अनमोल दिया है तोहफा हमको
    हम सब की आजादी का
    गांधी देश के वासी हो तुम
    तो कपड़े पहनो खादी का
    एक प्रतिज्ञा फिर से ले लो
    सवा सौ करोड़ तुम हिंदुस्तानी
    अब न वतन से करने देंगे
    दुश्मन को अपनी मनमानी
    दुश्मन को अपनी मनमानी

    – वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • व्यथा

    अध ढकें तन को छिपाए
    दुनिया के बाजार में
    गुमसुम सी बैठी
    एक नारी
    लोग आते हैं और
    रुक कर आगे बढ़ जाते हैं
    हो रहा हो यहां
    कोई तमाशा जैसे
    किसी मनचले की नजरें
    उसके अधरों पर है
    किसी की है उसके खुले
    तन बदन पर पर
    कोई ऐसा ना मिला
    जो समझ सके उसके
    आंसुओं की भाषा
    शामिल हो सके उसके
    जिंदगी की वीरान गलियों में
    लगता है सती सीता की गाथा
    पन्नों पर रह जाएगी
    मां बहन बेटी के आदर्शों से
    भरे इस देश में
    पग पग व्यथा नारी की
    सुनी जाती है।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • मैं बीता कल हूँ भले ही

    मैं बीता कल हूँ भले ही
    तुम्हारे लिए ,
    पर किस के लिए तो
    आज हूँ मैं।
    तुम्हारी नजर में
    बेवफा हूँ।
    पर किसी वफ़ा का नाज हूँ मैं।
    स्वयं ठुकरा के
    मेरी बाहों को,
    तुम उछालो भले ही
    कीच मुझ पर,
    तब भी तुमसे नहीं
    नाराज हूँ मैं।
    उतार फेंका जिसे
    वो गले का हार हूँ मैं,
    तुम्हारा कुछ भी नहीं अब
    किसी का ताज हूँ मैं।
    मैं बीता कल हूँ भले ही
    तुम्हारे लिए ,
    पर किस के लिए तो
    आज हूँ मैं।

  • तुम्हारे सिले होंठ…

    आजकल बड़े पैतरे आजमाने लगे हो तुम!
    मुझसे दूर जाने के…
    इतनी समझ आई कहाँ से तुम में?
    पहले तो तुम बहुत नादान हुआ करते थे…
    अच्छा तो अब ये भी मेरी
    संगत का असर है!
    ऐसा ही बोल रहे हैं
    तुम्हारे सिले होंठ…
    काश! कुछ और भी सीख जाते तुम मुझसे
    रिश्ते संजोना, दिल रखना, वफ़ाई
    तो कितना अच्छा होता!
    यूंँ टूटते नहीं हम
    बिखरते नहीं हम…
    और समेटना नहीं पड़ता मुझे
    जज्बातों को इस तरह
    गज़लों में, कविताओं में
    जिंदगी नहीं ढूंढते हम…

  • स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त

    *15 अगस्त का महापर्व*

    कभी सोने की चिड़िया सा,
    ये हिंदुस्तान हमारा था !
    जमी पर जैसे जन्नत था,
    जगत जग-मग सितारा था !
    लुटेरों ने इसे न जाने,
    कितनी बार है लूटा !
    जुड़ा है टूट कर के ये,
    जुड़ा और जुड़ के फिर टूटा !

    कहानी न महज समझो,
    नही कोई है ये किस्सा !
    नही इतिहास ये पूरा,
    फकत छोटा सा है हिस्सा !
    अभी भूले नही थे हम,
    पिछले/मुगली प्रशाशन को !
    नज़र अंदाज़ कर सकते नही,
    गोरे कुशाशन को !

    तृषित था तंत्र भारत का,
    ग्रषित ग्रामीण और शहरी !
    समय का चक्र ये देखो,
    की बिल्ली दूध की प्रहरी !
    अतिथि देवो भवः की ये धरा,
    फिर भी रही ठहरी !
    हमारे पूर्वजों के शान पे,
    थी चोट अब गहरी !

    उठा भूचाल भूतल पर,
    उगे लंगड़ी शमा के पर !
    अब फूटी क्रोध की ज्वाला,
    औ टूटे सब्र के सागर !
    जने तब लाल भारत में,
    अपनी जननी की कोखो से !
    तपा अब जर्रा-जर्रा था,
    दिखीं लपटें झरोखों से !

    इरादे जीतने का लेके,
    बच्चा बच्चा था आया !
    चुनी अब राह सबने वो,
    जिसे था जो भी है भाया !
    उऋण हो गोद भारत माँ की,
    अब बहशी फिरंगी से !
    हराई शूरमों ने तोपे,
    बस तलवार नंगी से !
    कोई हंस कर चढ़ा फांसी,
    कोई था वीरगति पाया !
    उन्ही वीरों-शहीदों ने,
    देश आज़ाद करवाया !

    हटी बरसों की जिल्लत,
    जब तिरंगा नभ पे लहराया !
    सभी ने साथ मिलकर था,
    ये बन्दे मातरम गाया !
    हमारे उन शहीदों ने,
    हमें ये दिन है दिखलाया !
    वही ये ऐतिहासिक दिन
    *स्वतंत्रता दिवस/15 अगस्त* कहलाया !

    हुआ हर *सै* मृदा से अंकुरित,
    इस राष्ट्र मधुबन में !
    हुए हर्षित थे *जन, गण, मन*
    प्रफुल्लित हो उठे मन में !

    हमारे पूर्वजों/ *शहीदों*
    ने जब,
    हमें ये दिन था दिखलाया !
    वही इतिहास ने हमको,
    *स्वतंत्रता दिवस* बतलाया !!

    🙏🙏🙏
    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    *भूत पूर्व सैनिक*
    रायबरेली उत्तर प्रदेश

  • आजादी के जश्न में तो मनाता हर कोई है

    आजादी के जश्न में तो मनाता हर कोई है
    आजादी का मायना समझ सके तो कोई बात बने

    समाज जब संवेदनहीन हो जाये
    तब कोई संवेदना से बाते करे तो कोई बात बने

    तिरंगे के कपड़े को तो सबने देखा है मगर
    उसकी रूह में झांक सकें तो कोई बात बनें

    हर कोई अपनी बात ही करता है यहां
    कभी कोई दूसरे की बात हो तो बात बनें

    मेरी बातों से लहू मत करना तुम दिल अपना
    किसी के क्रन्दन से जब दिल दुखे तो कोई बात बनें

  • माँ तेरी बहुत याद आती है

    जब भी कोई उम्मीद कभी, मेरे सर पर हाथ फिराती है ..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..
    कोई सतरंगी चादर गर, तेरी चूनर सी लहराती है..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

    जब तक तू थी माँ, थाली में, चटनी अचार न खत्म हुई..
    हर दिन कुछ अच्छा खाने की, इच्छा दिल में ना दफ्न हुई..
    पहले थी फरमाइश पर अब, सूखी सब्जी चल जाती है..
    कितनी भी कोशिश कर लूं पर, अक्सर रोटी जल जाती है..
    अब हर चिराग हर सूरज और, हर शमा तेरे बाद आती है..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

    बचपन में तूने माँ मेरे, जूतों के फीते बांधे थे..
    कितनी ही दुआओं के धागे, तूने वक्त के बीते बांधे थे..
    कैसे तेरी हर माँग ऐ माँ, अक्सर पूरी हो जाती है..
    मुझको बस इतना बतला दे, तू दुआ कहाँ से लाती है ?
    हर बार बनी तावीज़ मेरा, मुझपे जो कोई बात आती है..
    माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..

  • वतनपरस्ती के अशआर

    आदाब

    जहाँ के वास्ते बेशक कोई वरदान है भारत
    फरिश्तों के लिए भी आरज़ू-अरमान है भारत

    यहीं जन्मी है दुनियाँ की पुरानी सभ्यता यारो
    सभी वेदों पुराणों का कोई सम्मान है भारत

    क़सीदा हो, रुबाई हो, ग़ज़ल हो यां कोई नग़मा
    सभी दानिशवरों का एक ही उन्वान है भारत

    कभी है खीर की ख़ुश्बू कभी मीठी सेवइयां हैं
    कभी दीपावली है ये कभी रमजान है भारत

    मेरा मशरिक़ में हो घर याँ ठिकाना हो मेरा मग़रिब
    रहूँ चाहे कहीं पे भी मेरी पहचान है भारत

    हज़ारों बोलियों की खुशबुएँ घुलती फ़िज़ाओं में
    सभी धर्मों से महका सा बड़ा गुलदान है भारत

    करेगा ‘आरज़ू’ कुर्बान अपनी ज़िंदगी हसके
    तू मेरी आन, मेरी शान, मेरी जान है भारत

    अर्जुन गुप्ता (आरज़ू)

  • Ghazal

    जय हिन्द साथियो

    पहचान क्यों अलग सी है सारे जहान में
    सब सोचते ऐसा है क्या हिन्दोस्तान में

    है सभ्यता की मूल ये हिन्दोस्तां मेरा
    कितनी मिठास मिलती हमारी ज़ुबान में

    हर रूप में हैं पूजते नारी को हम यहाँ
    तुमको खुदा मिलेंगे हमारे ईमान में

    ख़ुश्बू उड़े हवा में सुबह शाम पाक सी
    गीता सुनाई देती यहाँ पर क़ुरान में

    यूँ लाँघना कठिन है फ़सीलों को भी यहाँ
    बारूद भर दिया है यहाँ हर जवान में

    है केसरी सफेद हरे रंग से बना
    ऊँचा रहे तिरंगा सदा आसमान में

    बस खुशनसीब लिपटें तिरंगे में ‘आरज़ू’
    कर जाते नाम भी अमर दोनों जहान में

    जय हिंद
    जय जवान,जय किसान,जय विज्ञान

    Arjun Gupta (Aarzoo)

  • चादर

    कविता- चादर
    ——————

    रुक रुक सुनले जरा फिर, फिर से मै आता हूँ|
    सर सर टप टप आंसू बहता ,
    रिम झिम सावन जस होता||
    मिल न सके फिर , फिर से कदम,
    छोड़ गयी ओ , है एक गम ||

    प्यार मिला न उससे हमको,
    आज भी हम क्यू रोते है|
    शाम शुबह क्यू चेहरा उसका,
    आखो मे क्यू सजते है||

    फिर क्या होती हालत मेरी,
    दर्द को सह सह रोते हैं|
    डाट मिला जब जब घर से,
    याद में उसके होते हैं|

    छिप छिप रोता चादर संग मै,
    रोता रहता यारो संग मै|
    देख के हालत बोले सब,
    रब क्या कर दू इसके संग मै|

    माग रहा हूँ तुमसे दुआएँ,
    हम सब किससे फरीयाद सुनाएं
    आज निभाए यार कि यारी,
    सुनले खुदा,हम फरियाद सुनाये|

    इतना गहरा दर्द को सहके,
    फिर भी भुला नहीं उसको|
    जब जब देखा अपनी हालत,
    दिआ श्राप नही देख के उसको|

    प्यार किया हू हर दर्द सहूगा
    तेरे खुशियों खातिर हर धाम चलुगा|
    नहीं चाहिए तेरे खुशियों का संदेशा,
    तेरे खुशियों के खातिर दुआये कर दूगा|

    कभी आई नही मेरे सपनो मे,
    यह बात अमल मे लाता हू|
    उसके लिए सब कुछ झुठा,
    हम बिन याद किये ना सोता हू |रुक रुक……
    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
    कवि -ऋषि कुमार “प्रभाकर ”
    पता, ग्राम -पोस्ट खजुरी खुर्द, खजुरी
    थाना- तह. कोरांव
    जिला-प्रयागराज, पिन कोड 212306

  • बात इक शुरुआत

    आओ ना चलो, बात करते है,
    ये खामोशी तुम्हारी जान ही ना लेले
    आओ ना चलो, बात करते है
    एक अरसा हुआ तुमको देखे हुए,
    आओ ना चलो, मुलाकात करते है,
    आओ ना चलो, बात करते है,
    बाते दिल की तुम करना, मैं दिल से सुनूँगा,
    राज दिल के तुम कहना, मैं राज ही रखूँगा,
    क्यू ना आज ओर अभी से शुरूवात करते है
    आओ ना चलो, बात करते है,
    बात करने से ही, बात बन जाती है
    चोट पत्थर सी हो,तो भी पिघल जाती है,
    फिर भी ना जाने क्यू,बात से डरते है
    आओ ना चलो, बात करते है
    आओ ना चलो, बात करते है
    ✍️ Rinku Chawla
    #shushantsingh incident

  • पालघर

    ये बेबस सी दिखती है जो, ये उस निर्दोष की पत्नी है,
    जिसे संतों के संग कत्ल किया, ये उस खामोश की पत्नी है ।

    क्या मिला है ऐसा कर तुमको, क्या हासिल कर ले जाओगे,
    इन मज़लूमों की आहों पर कितनी आगे तक जाओगे ?

    जिसने सारथी होकर उस पल, संतों के रथ को खींचा था,
    जिसने परिवार की भूमि को अपनी मेहनत से सींचा था ।

    जिसका निश्चय बस इतना था, कि संतों को ले जाना है,
    जिसने इक पल ना ये सोचा, कि रुकना है या जाना है ।

    इस तरह रचकर चक्रव्यूह, जिसने संतों को मारा हो,
    ना इस जग, ना ही उस जग में, उसका कोई करुण किनारा हो ।

    उसको भी वहशत मार गई, जिसने भगवा का साथ दिया,
    उसको भी धकेला लोगों ने, जिसने उठने को हाथ दिया ।

    ये कैसी रंजिश है आखिर, ये कौन सा क्रोध उतारा है?
    इन मरे हुओं को देखो सब, इन्हें बिके हुओं ने मारा है ।

    इन मरे हुओं को देखो सब, इन्हें बिके हुओं ने मारा है ।

    #पालघरड्राइवर

  • :कुछ पल

    कविता :कुछ पल
    नीला आकाश ,आकाश में उड़ते पंक्षी
    सागर की लहरें ,लहरों पर चलती नाव
    रिमझिम बरसता पानी ,वो ओस की बूंदे
    मानो सब कुछ कह देती हों
    ऐसा लगता है रख लूँ ,समेट लूँ सबको अपने पास
    कहीं खो न जायें डरता हूँ ,बहुत किस्मत से मिलते हैं ये पल
    कभी कभी लगता है इन पलों में ऐसे खो जाऊँ
    किसी भी चीज की रहे न कोई खबर
    सचमुच कितने सुहाने होते हैं ये पल
    ये पल कितने अपने होते हैं
    कितनी ख़ामोशी होती है इन पलों में
    फिर भी मानो कुछ कह देते हैं
    बंद लवों से सब कुछ बयां कर देते हैं
    ये पल

  • शुरुआत की खातिर

    गम-ए-हयात की खातिर या किसी बात की खातिर,
    हम तो खामोश रहे इक नई शुरुआत की खातिर..
    कुछ रहे पास, खुदा से ये भी बर्दाश्त ना हुआ,
    उसने आंँसू भी ले लिए मेरे, बरसात की खातिर..

    मायने :
    गम-ए-हयात – ज़िन्दगी के गम

  • अभिलाषा

    मैं कब कहता हूँ फूलों की सेज मिले,
    मुझे तो कमल जैसी सुदृढ मन मिले l
    जो खिलता तो कीचड़ में है,
    पर दाग नहीं लगने देता दामन में l

    कब कहता हूँ पीड़ा रहित जीवन मिले,
    मुझे तो गुलाब जैसी जज़्बा मिले l
    जो कांटों में भी मुस्कुराते रहें,
    फिर भी प्यार का प्रतीक कहलाए ll

    मैं कब कहता हूँ कि दूसरों की सेवा मिले,
    मुझे तो रजनीगंधा जैसी सेवा भाव मिले l
    जो डाली से टूटकर कहीं और सज जाए,
    फिर भी खुशबू फैलाती जाए l

    Rajiv Mahali

  • बेटी

    मैं भी तो नन्ही कली हूँ, तेरे अंदर ही पली हूँ
    तू ही तो ज़रिया है माँ, मैं तेरे कदमों से चली हूँ
    बस मुझे इतना बता माँ,
    क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?

    मैंने तेरे पेट में दुनियांं समझकर जी लिया,
    जो मिला तुझसे वही खाया वही था पी लिया..
    क्या हुई मुझसे खता माँ,
    क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?

    मैं बड़ी होकर भी तुझ पर बोझ न बनती कभी,
    साज़ बन जाती तेरा मैं, सोज़ न बनती कभी..
    क्यूँ मिली मुझको सज़ा माँ,
    क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?

    मायने:
    साज़ – संगीत वाद्य
    सोज़ – जलन

  • ज़िन्दगी का सार

    हुआ .गर विरोध तो क्या बिखर जाऊंगी?
    रफ़्तार करूं मैं दुगनी, और निखर जाऊंगी।
    जीवन में जीत हैं तो हार भी हैं,
    यही तो जीवन है, ज़िन्दगी का सार भी है।
    सागर है विशाल, लहरें भी ऊंची, तो क्या हार जाऊंगी?
    खेती रहूंगी नैया, उस पार जाऊंगी ।।

  • पहचान

    कविता- पहचान
    ——————–
    सुन्दरता मे सुन्दर हो,
    खुदा की बनाई मूरत हो,
    खुद पे इतना निर्भर हो,
    जब जब कोई समझाये अपने बच्चों को,
    बस आप ही उनके लिए उदाहरण हो|

    बिन चोट सहे, पत्थर मूरत बन नहि सकती,
    बिन अग्नि मे तप ,सोना कगना बन नहीं सकती|
    व्यर्थ जवानी होगी तुम्हारी,
    यदि गैरो के लिए मिसाल नहीं बन सकती|

    सोचो कल संग क्या ले जाओगी,
    चिता पर कफ़न छोड़ कुछ ना पाओगी|
    सारी मेहनत मिट्टी मिट्टी होगी,
    यदि जग मे इतिहास नहीं लिख पाओगी|

    परिवार भी होगा,
    घर द्वार भी होगा,
    हो जग कि हर खुशी तुम्हारी,
    ऐसा कुछ करना होगा|

    खुद अपने आप से लड़ना होगा,
    सभल के पथ पर चलना होगा|
    बन जाओ राही एक अनोखी,
    जग के लिए ऐसा कुछ करना होगा|

    उम्र जवानी प्यार निशानी,
    छोड़ो ए सब दुनिया दारी|
    ऐसा पालो अपने जीवन को
    जहाँ सुख से सोये दुनिया सारी|

    कहे “ऋषि” बड़ आस लगाए,
    हो तुम भीम दिवानी यह बात
    सुहाए|
    रच दो जग मे इतिहास नया,
    जग की महिलाओं मे, आपकी पूजा हो जाऐ|
    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
    कवि -ऋषि कुमार “प्रभाकर ”
    पता, ग्राम -पोस्ट खजुरी खुर्द, खजुरी
    थाना- तह. कोरांव
    जिला-प्रयागराज, पिन कोड 212306

  • मजदूर

    वो आसां ज़िंदगी से जाके इतनी दूर बनता है,
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है ।
    वो जब हालात के पाटों में पिसकर चूर बनता है,
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..

    कसक ये बेबसी की ज़ख्मी पैरों में दिखाई दी,
    कभी लथपथ लहू से बिखरे कपड़ों में सुनाई दी..
    जहाँ पर वेदना-संवेदना के तार बेसुध थे,
    वहाँ पटरी पे बिखरी रोटियों ने भी गवाही दी ।
    कहीं जब बेबसी का ज़ख्म भी नासूर बनता है
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..

    वो जिसकी ज़िन्दगी हर रोज़ मिलती कामगारी हो,
    वो तपती धूप से जिसके सफर की साझेदारी हो..
    सफर भर पोछकर बच्चों के आँसू भी चला हरदम,
    वो भूखे पेट होकर जिसने हिम्मत भी न हारी हो
    पसीना जिस्म पर जब मेहनतों का नूर बनता है,
    कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..

    #लॉकडाउन और मजदूर

  • बिछुड़े दिलों में उनके

    रात हो गई है
    बात हो गई है
    वर्षों से जिन में काफी
    दूरी बनी हुयी थी
    बिछुड़े दिलों में उनके
    मुलाक़ात हो गई है।
    दिन भर रही थी गर्मी
    उमस भरी हुई थी
    फिर शाम होते होते
    बरसात हो गई है।
    रस्साकशी चली थी
    आरोप मढ़ रहे थे
    छोटी बात पर वे
    नफरत उगल रहे थे
    पर प्यार भी था उनमें
    नफरत से लड़ रहा था,
    संघर्ष में, शाह-मात में
    यह बात हो गयी है
    शह प्यार की व
    नफरत की मात हो गई है।
    बिछुड़े दिलों में उनके
    मुलाक़ात हो गई है।

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