“गौर से देख तू इस दिल के उजड़े मंज़र को,
है जो खंडहर कभी आबाद हुआ करता था..
वो जिसे ‘अदना सा शागिर्द’ लोग कहते हैं,
वो कभी इश्क में उस्ताद हुआ करता था..”
– प्रयाग
मायने :
मंज़र – दृश्य
अदना सा – मामूली/छोटा सा
शागिर्द – शिष्य
‘दिखा दिया ये तज़ुर्बा भी ज़िन्दगी ने हमें,
हैं कितने शख्स ज़हर, और दवा है कितने..
न रोशनी को इल्म, न ही चिरागों को पता,
है कितने बुझने और मंज़ूर-ए-हवा हैं कितने..’
‘कुछ इस तरह ज़िन्दगी का फसाना बदल गया,
वो क्या बदला कि सारा ज़माना बदल गया..
रिश्तों पर बेरूखी का असर कुछ यूँ हुआ,
उसका रूठना बदला तो मेरा मनाना बदल गया..’
पतन
हाँ पतन
पतन की शुरुआत
कब होती है ,
जब घमंड की
पराकाष्ठा होती है,
जब अपने से
काबिल कोई
नहीं दिखता है
आँख में
पट्टी बंधी होती है।
जब व्यक्ति दूसरे की
गुणवत्ता पर
परोक्ष रूप से
हमला करता है
या करवाता है,
पतन की शुरुआत
तब होती है।
जब व्यक्ति योग्यता से
आगे बढ़ने की बजाय
दूसरों पर तंज कसता है
या कसवाता है,
दूसरे की लोकप्रियता पर
परेशान हो उठता है,
पतन की शुरुआत
तब होती है।
श्याम का समय,
बहुत जल्दी में थे वे लोग,
तेज तेज कदमों में,
अजीब सी हलचल,
चेहरे पर रोनक,
कुछ पाने की लालसा,
एक के बाद एक,
गुजर रहा था हर शख्स,
मन में मेरे भी पली जिज्ञासा ,
आखिर क्या हुआ है,
कोई अनहोनी या कोई सुखद घटना,
अरे! बहुत जतन से पता चला,
गांव से बाहर एक ठेका खुला।
‘गाँव में हाथ, कई हाथ थामे रखते हैं,
शहर में खींचने को सिर्फ पांँव होता है..
तरक्की कहने को कितनी ही की हो शहरों ने,
यूँ कुछ भी कह लो मगर गाँव, गाँव होता है..’
‘ऐसे किरदार का यूँ भी है महकना वाजिब,
कि नाम जिसका महज़ खुशबुओं से लिखा हो..
आखरी खत ये जो खाली सा नज़र आता है,
यूँ भी हो सकता है कि आँसुओं से लिखा हो..’
जलने दो हृदय की वेदना,
विचलित मन से कैसे डरना |
हो जीवन संताप दुखों का,
फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
~~~~~00000~~~~~
युद्ध अनघ है मन के भीतर,
परितापों से प्राण पिघलते |
दूर करो असमंजस बादल,
मन पावक में कैसे जलते ||
धार बढा दो पराक्रमी तुम,
कुरुक्षेत्र सा जीवन लड़ना |
हो जीवन संताप दुखो का,
फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
~~~~~00000~~~~~
तुम में ज्वाला सूर्य सरीखी
हेतु धर्म तुम जल सकते हो |
पीर पराई थोड़ी समझो,
कष्ट दूर सब कर सकते हो ||
फिर पुण्य मिले कुछ नही मिले,
दीपक बनकर पथ पर जलना |
हो जीवन संताप दुखो का,
फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
~~~~~00000~~~~~
आनंद स्वतः मिल जाएगा,
हो दूर निराशा की बातें |
अपने दीपक तुम स्वयं बनो,
दूर करो अंधेरी रातें ||
कटु वचनों का बोझा लादे,
शुष्क हँसी फिर कैसे हँसना |
हो जीवन संताप दुखो का,
फिर क्या जीना फिर क्या मरना ||
गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
जहाँ रिश्ते तो हैं ,वह मिठास नहीं
जहाँ मिट्टी तो है ,पर खुशबू नहीं
जहाँ तालाब तो है ,पर पानी नहीं
जहाँ आम बौराते तो हैं ,पर सुगन्ध का महकना नहीं
गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
यहाँ लोग बेगाने से हो गये
लोग सुख साधन के भूंखे हो गये
गांव अब शहरों में तब्दील हो गये
गांव अब चकाचौंध से लबरेज हो गये
बुजर्गों के आशिर्वाद में
जो स्नेह कीर्ति का भाव था
पाश्चात्य संस्कृति में ,कहीं विलुप्त हो गया
मिल जुल कर पर्व मनाने की भावना
अलगाव समय रूपी भट्ठी में जल गयी
गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
आदमी को आदमी से मिलने की फुर्सत कहाँ
इन्सानियत और भाईचारा शहरीकरण में खो गया
आधुनिकता का नशा हर व्यक्ति पर छा गया
जो छलकता था प्यार ,वो दिखावा बनकर रह गया
पैसों के लिए हर शख्श पलायन कर गया
विश्वास का घर अब खण्डहर बन गया
गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….
याद कर लो सभी आज उनको
जिनके यत्नों से आजादी पाई,
यह जन्मभूमि भारत हमारी
उस गुलामी से मुक्ति ले पाई।
हर तरफ था अंधेरा घना
कोई आशा न थी आम जन में,
उस निराशा में जिसने जगाया
याद कर लो सभी आज उनको।
बांटने की अनेकों थी कोशिश
फुट डालो करो राजनीति
जाति धर्मों में हमको लड़ाकर,
राज करते थे गोरे फिरंगी।
लूट कर देश की संपदा को
कोष ब्रिटेन का भर रहे थे,
दुर्दशा में था भारत का जीवन
लोग कष्टों में घिरते गए थे।
उन फिरंगी के मुंह में तमाचा
एकजुटता से जिसने लगाया,
जिसने छेड़ी वो जंगे आजादी
याद कर लो सभी आज उनको।
है नमन आज उनको नमन
जिनके यत्नों से आजादी आई,
जिसने अपना पसीना बहाया,
खून की बूंद जिसने चढ़ाई।
कतरे कतरे से सींचा वतन
सिर पे बांधे हुए थे कफन,
देख बलिदान दुश्मन भी काँपा
ऐसे वीरों को शत-शत नमन।
जुल्म सहते रहे, मुस्कुराते रहे
सिर कटा पर झुकाया नहीं,
गोलियां खाईं सीने पे जिसने
ऐसे वीरों को शत-शत नमन।
याद कर लो सभी आज उनको
जिनके यत्नों से आजादी पाई,
यह जन्मभूमि भारत हमारी
उस गुलामी से मुक्ति ले पाई।
हर देश – वासी की ज़ुबान पर,
आज जय – हिन्द का नारा है।
ना .डाले कोई बुरी नज़र,
ये वीरों ने ललकारा है ।
कारगिल का युद्ध हो,
या हो घाटी गलवान
खड़े मिलेंगे हर कदम पर,
वीर सैनिक बलवान
चीन हो या पाकिस्तान,
नहीं झुकेगा हिंदुस्तान।
सैनिक दल ,उरी का बदला ले के आया,
अभिनन्दन भी वापिस पाया।
भारत की जमीं पर,
तिरंगा सदा फहराएंगे।
जीत का परचम, यूं ही लहराएंगे।
इंडो – तिब्बतन बॉर्डर पर भी,
गूंजा जय – हिन्द का नारा है।
वीर – जवानों का जोश देखो,
6000फुट के शिखर पर,
फहराया तिरंगा प्यारा है।
ये पंद्रह अगस्त का पर्व है,
हमको भारत पर गर्व है।
आओ मनाएं इसे शान से,
शुरू करें राष्ट्रीय – गान से।
तिरंगे में लिपट कर जो आए,
उन शहीदों को सलाम।
उनकी शहादत एक कर्ज है,
उनको नमन, उनको प्रणाम।
वीर शहीदों की कुर्बानी,ना जाए बेकार
आओ हम सब मिलकर बोलें,
भारत मां की जय – जयकार।
बहुत सारी वनस्पतियों में,
बस एक ही है वो जादुई पेड़!
हरा -भरा ,घना -निराला,
अलग-अलग सी कलियां उसकी,
खुबसूरत तने का ताना-बाना,
रंग बिरंगी पत्तियां! देखो,
अनोखा दृश्य बिम्ब करें ,
तीन रंगा फूलों का गुच्छा,
हृदय को प्रसन्न करे।
प्रकृति का है ये अनुपम सौंदर्य,
ऐसी विविधता में एकता,
शायद ही कहीं और मिले।
इस पेड़ की शोभा पक्षियों को भाती,
जो भी आता, यही रह जाता,
सौंदर्य में उसके वो खो जाता।
फूलों का रंग; हरा , सफेद , केसरिया!
हरियाली, शान्ति, और बलिदान ,
सबको यहां पहचान मिले,
रहते सब मिलजुलकर साथ,
मुस्कुराते -से सब मेहमान मिले ,
उन सबकी ये अनमोल मोहब्बत,
पेड़ को और गुणवान करें।
मगर पेड़; पर एक कौआ आया,
सभी रंगों को उसने भड़काया,
सुन केसरिया तु है कितना अद्भुत!
पेड़ को सुन्दर तुमने बनाया,
हरे रंग ! तू है बहुत तेजस्वी,
कान में उसके बहुत फुसफुसाया,
सफेद !अगर तू ना हो तो ,
पेड़ कुरूप बने और पेड़ों सा।
मगर, कौआ थोड़ा नासमझ बेचारा!
चालाकी उसकी ना चले; यहां पर,
क्योंकि हरा मिला है केसरिया से ,
सफेद घुला है इन दोनों में।
प्रेम भावना, भाईचारे से,
सबका महान योगदान है,
तभी तो पेड़ दुर्लभ बना!
सबके समान महत्त्व से।
और तभी तो पेड़ अद्भूत बना!
सबके असीम सौंदर्य से।
—मोहन सिंह मानुष
काव्यगत विशेषताएं
भाव—>
पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां पर विभिन्न परंपराओं, विविध संस्कृतियों, अनेक प्रकार की भाषाओं और बहुत सारे धर्मो के लोग; आपस में मिलजुल कर भाईचारे के साथ रहते हैं। विविधता में एकता यहां की मूल पहचान है कविता में यही भाव संजोए गए हैं
प्रतीकात्मक शैली के अनुरूप दुर्लभ पेड़ महान देश भारत का प्रतिनिधित्व करता है,
कलियां–परंपराओं ,रंग बिरंगी पत्तियां- विभिन्न भाषाओं, पक्षी- विदेशी नागरिकों,
तीन रंगा फुल – विभिन्न धर्मो,कौवा- राजनीति एवं राजनेताओं इत्यादि का प्रतीक है
समस्त पेड़ का मानवीकरण किया गया है।
खुशी खूबसूरती और खैर- ख़ैरियत के साथ
चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
आजादी सौगात नहीं,अमर शहीदों की विरासत है
रक्त बून्द से सिंचित,करना हमें जिसकी हिफाज़त है
गली कूनवे, हर जन को करनी मुल्क की इबादत है
हमारी अभिव्यक्ति अपनी नहीं, ये उनकी शहादत है
विकसित नव निर्माण के संकल्प के साथ
चलो मनाते हैं स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
गुलामी के दंश से मातृभूमि को जो राहत दिलायी
कुर्वानी खुद की दे आजादी की मन में चाहत जगायी
कटकर भी जिनके शीश हिमालय शिखर से भी ऊंचे हैं
अपने शौर्य से जिसने आज़ाद हिन्द के अक्श खींचे हैं
उनके पदचिह्नो पर निर्भिक चलने के संकल्प साथ
चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
अब भी क्यू अपने संकीर्णता के पंजे में जकड़े हैं
खुद के गर्व में खुद को बान्धे किस मद में अंधे हैं
कभी धर्मान्धता तो कभी जातिवादिता को पकङे हैं
क्षेत्रवाद, भेदभाव जैसे उन्मादो में अकङे हैं
रूकावटो को दूर कर, राष्ट्रनिर्माण संकल्प के साथ
चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
क्या ये वही भारत है जिसमें थीं वीरों की आस्था
खेत, सङक आसरागृह में सुता की दिखती है व्यथा
फाँसी पे लटकती, अग्नि में जलाती दहेज़ की प्रथा
बेटियों को कमतर आकने की प्रचलित है कुप्रथा
भ्रूणहत्या नहीं, भ्रूणपल्लवन के संकल्प के साथ
चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
हमारी अस्मिता पर टिक न पाए किसी की नजर
बुलन्दी के आगे उठ न पाए किसी दुश्मन का सर
हमारी सर्वशक्ति का विश्वभर में हो ऐसा असर
घुसपैठ की सोचने से पहले दहल जाए उनका जिगर
अपने कण-कण की हिफाज़त के संकल्प के साथ
चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
विभिन्न नस्लों जातियों धर्मों से गुलज़ार है ये उपवन
विभिन्न बोलियों भाषाओं से महकता है प्यारा चमन
अहिंसा के दूत बनें ,पसन्द हो शान्ति -अमन
मतभेदों से उठकर, हम करें इन्सानियत को नमन,
अंजाम को सोचे बिना सत्यवलण के साथ
चलो मनाते हैं देश की स्वतंत्रता की वर्षगांठ ।
सुमन आर्या
****
कभी लहू तो कभी उनका कफ़न बन जाऊ
स्वतंत्र दीप से जगमगाता हुआ चमन बन जाऊ
ए आजादी तू घटा बनके बरसना
और में तेरा भीगता हुआ गगन बन जाऊ
क्यों याद दिला रहा हूँ, जो है बात पुरानी
इक अल्फाज नहीं, ये है पूरी एक कहानी
इस मिट्टी में खूं से लिपटी न जाने कई जवानी
वो पटेल आजाद लाल और सुभास तो याद नहीं तुम्हे
लेकिन ये लहराता तिरंगा है इनकी निशानी
जाओ तुम भी क्या याद करोगे
वो अमर वीर क़ुरबानी
आजादी के नाम पर
धर्म अधर्म का खेल खेलते
जिस्मो का रोज नया बाजार खोलते
वो सत्य नेता की तिजोरी में
और अहिंशा चोरो की चोरी में
फिर क्यू खुदको भारतीय बोलते
वो वीर तीर थे
कभी आग तो कभी प्यार का नीर थे
परछाई भी जिनकी लड़ा करती थी
वही तो भारत बनाने वाले पीर थे
इन्ही से हुआ ये एक देश महान
जिनको कहते हम हिंदुस्तान
लेकिन
भ्रष्ट कपट और अपराध पर करते लोग आज गुमान
आप ही बताओ कैसे कहुँ मैं
मेरा भारत महान
मेरा भारत महान
कृतज्ञ देश है उन वीरों का
जिसने लहू बहाया अपना
देश की खातिर तन मन धन
सब कुछ है लुटाया अपना
बलिदान दिया है कितनी मां ने
कितनी बहनों ने है भाई खोया
आज शहीदों को नमन किया
आज देश है खूब रोया
सारी जवानी भेंट चढ़ा दी
अपनी भारत मां के लिए
दिवाली पर घर आंगन से पहले
शहीदों की चिताओं पर जले दिए
अनमोल दिया है तोहफा हमको
हम सब की आजादी का
गांधी देश के वासी हो तुम
तो कपड़े पहनो खादी का
एक प्रतिज्ञा फिर से ले लो
सवा सौ करोड़ तुम हिंदुस्तानी
अब न वतन से करने देंगे
दुश्मन को अपनी मनमानी
दुश्मन को अपनी मनमानी
अध ढकें तन को छिपाए
दुनिया के बाजार में
गुमसुम सी बैठी
एक नारी
लोग आते हैं और
रुक कर आगे बढ़ जाते हैं
हो रहा हो यहां
कोई तमाशा जैसे
किसी मनचले की नजरें
उसके अधरों पर है
किसी की है उसके खुले
तन बदन पर पर
कोई ऐसा ना मिला
जो समझ सके उसके
आंसुओं की भाषा
शामिल हो सके उसके
जिंदगी की वीरान गलियों में
लगता है सती सीता की गाथा
पन्नों पर रह जाएगी
मां बहन बेटी के आदर्शों से
भरे इस देश में
पग पग व्यथा नारी की
सुनी जाती है।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज
मैं बीता कल हूँ भले ही
तुम्हारे लिए ,
पर किस के लिए तो
आज हूँ मैं।
तुम्हारी नजर में
बेवफा हूँ।
पर किसी वफ़ा का नाज हूँ मैं।
स्वयं ठुकरा के
मेरी बाहों को,
तुम उछालो भले ही
कीच मुझ पर,
तब भी तुमसे नहीं
नाराज हूँ मैं।
उतार फेंका जिसे
वो गले का हार हूँ मैं,
तुम्हारा कुछ भी नहीं अब
किसी का ताज हूँ मैं।
मैं बीता कल हूँ भले ही
तुम्हारे लिए ,
पर किस के लिए तो
आज हूँ मैं।
आजकल बड़े पैतरे आजमाने लगे हो तुम!
मुझसे दूर जाने के…
इतनी समझ आई कहाँ से तुम में?
पहले तो तुम बहुत नादान हुआ करते थे…
अच्छा तो अब ये भी मेरी
संगत का असर है!
ऐसा ही बोल रहे हैं
तुम्हारे सिले होंठ…
काश! कुछ और भी सीख जाते तुम मुझसे
रिश्ते संजोना, दिल रखना, वफ़ाई
तो कितना अच्छा होता!
यूंँ टूटते नहीं हम
बिखरते नहीं हम…
और समेटना नहीं पड़ता मुझे
जज्बातों को इस तरह
गज़लों में, कविताओं में
जिंदगी नहीं ढूंढते हम…
कभी सोने की चिड़िया सा,
ये हिंदुस्तान हमारा था !
जमी पर जैसे जन्नत था,
जगत जग-मग सितारा था !
लुटेरों ने इसे न जाने,
कितनी बार है लूटा !
जुड़ा है टूट कर के ये,
जुड़ा और जुड़ के फिर टूटा !
कहानी न महज समझो,
नही कोई है ये किस्सा !
नही इतिहास ये पूरा,
फकत छोटा सा है हिस्सा !
अभी भूले नही थे हम,
पिछले/मुगली प्रशाशन को !
नज़र अंदाज़ कर सकते नही,
गोरे कुशाशन को !
तृषित था तंत्र भारत का,
ग्रषित ग्रामीण और शहरी !
समय का चक्र ये देखो,
की बिल्ली दूध की प्रहरी !
अतिथि देवो भवः की ये धरा,
फिर भी रही ठहरी !
हमारे पूर्वजों के शान पे,
थी चोट अब गहरी !
उठा भूचाल भूतल पर,
उगे लंगड़ी शमा के पर !
अब फूटी क्रोध की ज्वाला,
औ टूटे सब्र के सागर !
जने तब लाल भारत में,
अपनी जननी की कोखो से !
तपा अब जर्रा-जर्रा था,
दिखीं लपटें झरोखों से !
इरादे जीतने का लेके,
बच्चा बच्चा था आया !
चुनी अब राह सबने वो,
जिसे था जो भी है भाया !
उऋण हो गोद भारत माँ की,
अब बहशी फिरंगी से !
हराई शूरमों ने तोपे,
बस तलवार नंगी से !
कोई हंस कर चढ़ा फांसी,
कोई था वीरगति पाया !
उन्ही वीरों-शहीदों ने,
देश आज़ाद करवाया !
हटी बरसों की जिल्लत,
जब तिरंगा नभ पे लहराया !
सभी ने साथ मिलकर था,
ये बन्दे मातरम गाया !
हमारे उन शहीदों ने,
हमें ये दिन है दिखलाया !
वही ये ऐतिहासिक दिन
*स्वतंत्रता दिवस/15 अगस्त* कहलाया !
हुआ हर *सै* मृदा से अंकुरित,
इस राष्ट्र मधुबन में !
हुए हर्षित थे *जन, गण, मन*
प्रफुल्लित हो उठे मन में !
हमारे पूर्वजों/ *शहीदों*
ने जब,
हमें ये दिन था दिखलाया !
वही इतिहास ने हमको,
*स्वतंत्रता दिवस* बतलाया !!
🙏🙏🙏
धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
*भूत पूर्व सैनिक*
रायबरेली उत्तर प्रदेश
जब भी कोई उम्मीद कभी, मेरे सर पर हाथ फिराती है ..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..
कोई सतरंगी चादर गर, तेरी चूनर सी लहराती है..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..
जब तक तू थी माँ, थाली में, चटनी अचार न खत्म हुई..
हर दिन कुछ अच्छा खाने की, इच्छा दिल में ना दफ्न हुई..
पहले थी फरमाइश पर अब, सूखी सब्जी चल जाती है..
कितनी भी कोशिश कर लूं पर, अक्सर रोटी जल जाती है..
अब हर चिराग हर सूरज और, हर शमा तेरे बाद आती है..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..
बचपन में तूने माँ मेरे, जूतों के फीते बांधे थे..
कितनी ही दुआओं के धागे, तूने वक्त के बीते बांधे थे..
कैसे तेरी हर माँग ऐ माँ, अक्सर पूरी हो जाती है..
मुझको बस इतना बतला दे, तू दुआ कहाँ से लाती है ?
हर बार बनी तावीज़ मेरा, मुझपे जो कोई बात आती है..
माँ तेरी बहुत याद आती है.. माँ तेरी बहुत याद आती है..
रुक रुक सुनले जरा फिर, फिर से मै आता हूँ|
सर सर टप टप आंसू बहता ,
रिम झिम सावन जस होता||
मिल न सके फिर , फिर से कदम,
छोड़ गयी ओ , है एक गम ||
प्यार मिला न उससे हमको,
आज भी हम क्यू रोते है|
शाम शुबह क्यू चेहरा उसका,
आखो मे क्यू सजते है||
फिर क्या होती हालत मेरी,
दर्द को सह सह रोते हैं|
डाट मिला जब जब घर से,
याद में उसके होते हैं|
छिप छिप रोता चादर संग मै,
रोता रहता यारो संग मै|
देख के हालत बोले सब,
रब क्या कर दू इसके संग मै|
माग रहा हूँ तुमसे दुआएँ,
हम सब किससे फरीयाद सुनाएं
आज निभाए यार कि यारी,
सुनले खुदा,हम फरियाद सुनाये|
इतना गहरा दर्द को सहके,
फिर भी भुला नहीं उसको|
जब जब देखा अपनी हालत,
दिआ श्राप नही देख के उसको|
प्यार किया हू हर दर्द सहूगा
तेरे खुशियों खातिर हर धाम चलुगा|
नहीं चाहिए तेरे खुशियों का संदेशा,
तेरे खुशियों के खातिर दुआये कर दूगा|
कभी आई नही मेरे सपनो मे,
यह बात अमल मे लाता हू|
उसके लिए सब कुछ झुठा,
हम बिन याद किये ना सोता हू |रुक रुक……
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
कवि -ऋषि कुमार “प्रभाकर ”
पता, ग्राम -पोस्ट खजुरी खुर्द, खजुरी
थाना- तह. कोरांव
जिला-प्रयागराज, पिन कोड 212306
आओ ना चलो, बात करते है,
ये खामोशी तुम्हारी जान ही ना लेले
आओ ना चलो, बात करते है
एक अरसा हुआ तुमको देखे हुए,
आओ ना चलो, मुलाकात करते है,
आओ ना चलो, बात करते है,
बाते दिल की तुम करना, मैं दिल से सुनूँगा,
राज दिल के तुम कहना, मैं राज ही रखूँगा,
क्यू ना आज ओर अभी से शुरूवात करते है
आओ ना चलो, बात करते है,
बात करने से ही, बात बन जाती है
चोट पत्थर सी हो,तो भी पिघल जाती है,
फिर भी ना जाने क्यू,बात से डरते है
आओ ना चलो, बात करते है
आओ ना चलो, बात करते है
✍️ Rinku Chawla
#shushantsingh incident
कविता :कुछ पल
नीला आकाश ,आकाश में उड़ते पंक्षी
सागर की लहरें ,लहरों पर चलती नाव
रिमझिम बरसता पानी ,वो ओस की बूंदे
मानो सब कुछ कह देती हों
ऐसा लगता है रख लूँ ,समेट लूँ सबको अपने पास
कहीं खो न जायें डरता हूँ ,बहुत किस्मत से मिलते हैं ये पल
कभी कभी लगता है इन पलों में ऐसे खो जाऊँ
किसी भी चीज की रहे न कोई खबर
सचमुच कितने सुहाने होते हैं ये पल
ये पल कितने अपने होते हैं
कितनी ख़ामोशी होती है इन पलों में
फिर भी मानो कुछ कह देते हैं
बंद लवों से सब कुछ बयां कर देते हैं
ये पल
गम-ए-हयात की खातिर या किसी बात की खातिर,
हम तो खामोश रहे इक नई शुरुआत की खातिर..
कुछ रहे पास, खुदा से ये भी बर्दाश्त ना हुआ,
उसने आंँसू भी ले लिए मेरे, बरसात की खातिर..
मैं भी तो नन्ही कली हूँ, तेरे अंदर ही पली हूँ
तू ही तो ज़रिया है माँ, मैं तेरे कदमों से चली हूँ
बस मुझे इतना बता माँ,
क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?
मैंने तेरे पेट में दुनियांं समझकर जी लिया,
जो मिला तुझसे वही खाया वही था पी लिया..
क्या हुई मुझसे खता माँ,
क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?
मैं बड़ी होकर भी तुझ पर बोझ न बनती कभी,
साज़ बन जाती तेरा मैं, सोज़ न बनती कभी..
क्यूँ मिली मुझको सज़ा माँ,
क्या मैं बेटे सी नही ? माँ क्या मैं बेटे सी नही ?
हुआ .गर विरोध तो क्या बिखर जाऊंगी?
रफ़्तार करूं मैं दुगनी, और निखर जाऊंगी।
जीवन में जीत हैं तो हार भी हैं,
यही तो जीवन है, ज़िन्दगी का सार भी है।
सागर है विशाल, लहरें भी ऊंची, तो क्या हार जाऊंगी?
खेती रहूंगी नैया, उस पार जाऊंगी ।।
कविता- पहचान
——————–
सुन्दरता मे सुन्दर हो,
खुदा की बनाई मूरत हो,
खुद पे इतना निर्भर हो,
जब जब कोई समझाये अपने बच्चों को,
बस आप ही उनके लिए उदाहरण हो|
बिन चोट सहे, पत्थर मूरत बन नहि सकती,
बिन अग्नि मे तप ,सोना कगना बन नहीं सकती|
व्यर्थ जवानी होगी तुम्हारी,
यदि गैरो के लिए मिसाल नहीं बन सकती|
सोचो कल संग क्या ले जाओगी,
चिता पर कफ़न छोड़ कुछ ना पाओगी|
सारी मेहनत मिट्टी मिट्टी होगी,
यदि जग मे इतिहास नहीं लिख पाओगी|
परिवार भी होगा,
घर द्वार भी होगा,
हो जग कि हर खुशी तुम्हारी,
ऐसा कुछ करना होगा|
खुद अपने आप से लड़ना होगा,
सभल के पथ पर चलना होगा|
बन जाओ राही एक अनोखी,
जग के लिए ऐसा कुछ करना होगा|
उम्र जवानी प्यार निशानी,
छोड़ो ए सब दुनिया दारी|
ऐसा पालो अपने जीवन को
जहाँ सुख से सोये दुनिया सारी|
कहे “ऋषि” बड़ आस लगाए,
हो तुम भीम दिवानी यह बात
सुहाए|
रच दो जग मे इतिहास नया,
जग की महिलाओं मे, आपकी पूजा हो जाऐ|
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
कवि -ऋषि कुमार “प्रभाकर ”
पता, ग्राम -पोस्ट खजुरी खुर्द, खजुरी
थाना- तह. कोरांव
जिला-प्रयागराज, पिन कोड 212306
वो आसां ज़िंदगी से जाके इतनी दूर बनता है,
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है ।
वो जब हालात के पाटों में पिसकर चूर बनता है,
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..
कसक ये बेबसी की ज़ख्मी पैरों में दिखाई दी,
कभी लथपथ लहू से बिखरे कपड़ों में सुनाई दी..
जहाँ पर वेदना-संवेदना के तार बेसुध थे,
वहाँ पटरी पे बिखरी रोटियों ने भी गवाही दी ।
कहीं जब बेबसी का ज़ख्म भी नासूर बनता है
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..
वो जिसकी ज़िन्दगी हर रोज़ मिलती कामगारी हो,
वो तपती धूप से जिसके सफर की साझेदारी हो..
सफर भर पोछकर बच्चों के आँसू भी चला हरदम,
वो भूखे पेट होकर जिसने हिम्मत भी न हारी हो
पसीना जिस्म पर जब मेहनतों का नूर बनता है,
कई मजबूरियाँ मिलती हैं तब मजदूर बनता है..
रात हो गई है
बात हो गई है
वर्षों से जिन में काफी
दूरी बनी हुयी थी
बिछुड़े दिलों में उनके
मुलाक़ात हो गई है।
दिन भर रही थी गर्मी
उमस भरी हुई थी
फिर शाम होते होते
बरसात हो गई है।
रस्साकशी चली थी
आरोप मढ़ रहे थे
छोटी बात पर वे
नफरत उगल रहे थे
पर प्यार भी था उनमें
नफरत से लड़ रहा था,
संघर्ष में, शाह-मात में
यह बात हो गयी है
शह प्यार की व
नफरत की मात हो गई है।
बिछुड़े दिलों में उनके
मुलाक़ात हो गई है।
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