Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • बढ़ता ही जा रहा

    क्यूँ बारम्बार किया जाता महिलाओं के साथ घृणित अपराध,
    कयी तरह की वेदना-संताप से गुजरती,जिनसे होता
    बलात्कार ।
    हर कानून बौना सावित, हर जायज कोशिश जा रही बेकार,
    थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा
    दुराचार ।।
    बेटियाँ परिवार पे बोझ नहीं समझी जाती हैं जब
    हर सुख-सुविधा, समानता, शिक्षा मुहैया है अब
    पर विडम्बना है यह, क्या आई है ईश्वर से वह माँगकर
    कभी बस में, कभी ट्रेन में, कभी स्कुटी से खींचकर
    लुटते अस्मत, दरिन्दगी दे रही नैतिकता को ललकार ,
    थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा
    दुराचार ।।
    आज मातम नहीं, हर्षोल्लास होता इनके जन्म पर
    पर पल्लवित होते देख इन्हें, मन क्यूँ जाता है हहर
    समानता के इस दौर में, कैसे घर पे रखू मैं रोककर
    आतंकित रहते हर माँ-बाप, रहते बेबस और लाचार ,
    थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा
    दुराचार ।।
    बेटियाँ माँ की होती हैं, हरदम सबसे अच्छी सहेली
    पिता की लाडली, हरेक का ख्याल रखती हैं अलबेली
    उसकी हिफाज़त का जिम्मा, बन बैठा अबुझ पहेली
    शिक्षित करने की ही नहीं, है सशक्त करने की दरकार ,
    थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा
    दुराचार ।
    महिलाओं के अधिकारों की लङाई लङ रहे हैं हम
    संसद तक में भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं हम
    चलते-फिरते बहसी मनोरोगियों का क्या करें हम
    आतंक के ठौर में लैंगिक समानता का स्वप्न कैसे ले आकार,
    थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा
    दुराचार ।।
    बेटियों पे लगाते आए, हमेशा कयी तरह की पाबंदियां
    थोड़ी-सी अपने बेटे के प्रति भी निभाले जिम्मेदारियां
    पीङिता के दर्द का, उन्ही में से क़ोई होता गुनाहगार
    ताकि हंसती-खेलती परियां न हो दरिन्दगी का शिकार,
    हाँ, किसी भी बेटी से न हो हिंसा, ना हो कभी कहीं
    दुराचार ।।

  • इस कदर गुज़रेंं हैं..

    ‘इस कदर गुज़रेंं हैं हम इश्क के दौर से,
    दिल धड़कता है यहाँ, सदा आती है कहीं और से..’

    – प्रयाग

    मायने :
    सदा – आवाज़

  • करुण कथा मेहनतकश की

    कुछ तो बेबसी रही होगी,
    जो राहों पर निकल पड़ा मज़दूर।
    ना साधन है ना रोटी है,,
    निज घर जाने को मजबूर।
    कुछ सपने लेकर आया था शहर,
    वो सपने हो गए चकनाचूर ।
    कड़ी धूप है, ना कोई छाया,
    कब से इसने कुछ नहीं खाया।
    भूखा कब तक मरे यहां,
    घर भी तो है कोसों दूर।
    फ़िर भी बच्चों को ले निकल पड़ा,
    बेबस है कितना मज़दूर ।
    किसी ने अपना बालक खोया,
    किसी का उजड़ा है सिन्दूर।
    करुण – कथा सुन,मेहनतकश की व्यथा सुन,
    पलकें भीगेंगी ज़रूर 😥

  • तिनके का महत्व

    तिनके से सिया ने रावण को डराया,
    तिनके में राम का स्वरूप दिखाया।
    श्रद्धा हो तो तिनके में भगवान बसते ,
    नहीं तो मूर्तियों में ही पाषाण दिखते।

    तिनको से पक्षियों का घर बन जाता,
    तिनका गजानन के मस्तक पर चढ जाता।
    तिनका डूबते को सहारा दे देता है,
    तिनका ब्रह्मशीर्षास्त्र का संधान कर देता है।

    तिनका पतित को पावन बना देता,
    तिनका सूतक के सारे दोष मिटा देता।
    तिनके से पितरों का तर्पण होता,
    तिनका बड़ा ही अनमोल होता।
    ✍️मयंक✍️

  • गीत मोहब्बतों के भी लिखे जायेंगे।

    यूँ ना बाँटो नफ़रतों की पर्चीयां,
    गीत मोहब्बतों के भी लिखे जायेंगे।

    सितम चाहे कितने, भी कर लो,
    फूलों की ज़िद है, खिल ही जायेंगे।

    इतिहास जब भी, पढ़ा जाएगा,
    दर्शन आपके हर बार, किये जायेंगे।

    बीजों को गाड़ दो अतल में कहीं,
    एक दिन चीरकर पत्थर आ जायेंगे।

    एक खोजी, अंतर मन से हो जाग्रित,
    टूटे हुए कलम, फिर उठाए जायेंगे।

    हम थे ही कब, जो सदा ही रहेंगे,
    बदलते दौर की कहानी बन जायेंगे।

  • वो डरावना-सा बचपन

    सब चाहते हैं,
    फिर से वो बचपन पाना,
    शरारत से भरी ऑंखें,
    और मुस्कुराना,
    पर मैं नही चाहती,
    वो बचपन पाना,
    डर लगता है,
    उस बचपन से,
    घूरती आँखों,
    और उन हैवानों से,
    अब है हिम्मत,
    हैं डर को जितने का दम,
    तब नहीं था, वो मेरे भीतर,
    डरती थी, सहमती थी,
    बंद कमरे में , सिसकती थी,
    चाहती थी, खुलकर हंस सकूँ,
    पर न कुछ कह पाना न समझ पाना,
    रोना याद कर उन लम्हों को,
    और खुद को सजा देना,
    मैं नही चाहती वो बचपन पाना,
    जहाँ छिनी जाती थी,
    पल पल मेरी खुशियां,
    जोड़ती थी साहस, की खुद को है,
    बचाना,
    बचाया खुद को मैंने,
    कभी वक़्त ने साथ दिया, कभी दूरियों ने,
    कभी अपनों ने, कभी परायो ने,
    कोमल मन पर , वो डर का साया,
    मैं नही चाहती वो बचपन दोहराना।।।।

  • कुछ पाया और कुछ खोया

    कुछ पाया और कुछ खोया,
    क्यों मुझे इस बात पर रोना आया!
    क्यों बिछड़ते रहे अपने,
    क्यों अजनबियों के बीच मुझे रहना आया!
    सपनें टूटते बिखरते रहे,
    उसे समेटते दिल भर आया,
    कुछ खोया और कुछ पाया।

    क्या हुआ जो सब टूटा,
    मेरे भीतर के दर्द को, 
    कब मैंने समेटा,
    जो खोया उसे ठुकराया,
    जानकर भी इस बात पर क्यों,
    इन आँखों ने सैलाब बहाया।
    क्यो मुझे सिर्फ खोना ही आया!
    कुछ पाये थे वो लम्हें, वो बातें।
    इन सब से दूर अब मुझको जीना आया।
    कुछ खोया और कुछ पाया।

  • वो बेख़ौफ दिखाती है, अपनी पहचान

    वो बेख़ौफ़ दिखाती है,
    अपनी पहचान,
    छिपती ही नहीं परदे के पीछे,
    रोका है उसे, टोका हैं उसे,
    छुपाया हैं, उसे,
    दबाया है उसे,
    फिर भी छिपती ही नहीं परदे के पीछे,
    और बेख़ौफ़ दिखाती है,
    अपनी पहचान,
    वो जता देती है,
    वो मदद करती हैं,
    पराये की भी अपनों की तरह,
    वो दिल रखती है अपना ,
    सोने-सा होकर।
    वो जता देती है,
    उसका न होना क्या है।
    बिन माँ के बच्चे का होना क्या है,
    बिन गोद की दुलार का होना क्या है,
    वो बेख़ौफ़ दिखा देती है,
    अपनी पहचान,
    हर रास्ते पर वो चलती है,
    देती है, हमारा साथ,
    वो औरत है,
    जो कही न कही , छुपी रहती है,
    किसी परदे के पीछे,
    और बता देती है,अपनी पहचान।

  • मैं चमकता सा शहर हूं

    मैं चमकता-सा शहर हूँ,
    न रुकता हूँ, न थकता हूँ,
    मेरा कारवां न रुका है,
    वो फिर से दौड़ता है,
    एक रफ़्तार के बाद।
    हादसे तो मेरे भीतर की आम बातें हैं,
    मैं खीचता हूँ, सबको अपनी और अनायास,
    हिला देता हुं किसी की जड़ को,
    मैं खुद मजबूत खड़ा रहता हूँ।
    मेरे भीतर के कालेपन को,
    कोई देख नहीं पाता।
    मेरी ऐसी चमक ही है यारों,
    जो हर किसी को, है भाता,
    मेरे भीतर की हैवानियत,
    कोई जान नहीं पाता,
    मैं चमकता-सा शहर हूँ,
    कैसे कोई लूट जाता हैं,
    कैसे कोई टूट जाता है,
    मैं देखता हूँ, मुस्कुराता हूँ,
    मुझे आदत है अब इन सबकी,
    नयेपन का सब रंग मुझे भाता है।
    मैं पालता हूँ, अजनबियों को अपने भीतर,
    कभी कोई एक न हो जाए,
    शोला भड़कता हूँ,
    मैं शहर हूँ।
    मैं वाकिफ हूँ, आग कहा जलनी चाहिए,
    ख़्वाहिशें लोगो को राख होनी चाहिए,
    उनके भीतर का इंसान मर जाना चाहिए,
    अपराध होते रहे, सामने ,पर वे अंधे होने चाहिए,
    ये नफ़रत ये अंजानापन,
    कभी कम ना होना चाहिए,
    बीतें हादसे को फिर से दोहराना चाहिए,
    आज फिर एक गुनाह मेरे भीतर हुआ,
    कल उसे फिर से दोहराना चाहिए,
    मैं चमकता-सा शहर हूँ,
    तुम्हे मेरे पास आना चाहिए,
    मैं आईना हूँ,
    तुम्हारे भविष्य का,
    जो तुम्हें सब देगा,
    जो जरूरत अगर पूरी न हो,
    उसे पाने में साथ देगा,
    तुम अगर बढ़ना चाहो,
    गुनाह के रस्ते पर,
    तुम्हारा हाथ थाम लेगा,
    तुम मेरे पास आओ,
    अपने गांव की मिट्टी छोड़कर,
    जो तुम्हें संस्कार देती है,
    शर्म देती हैं, उसको भुला देगा,
    मेरे पास आओ,
    वो सिखाती है, तुम्हें, दुसरो की इज़्ज़त देना,
    यहाँ इज़्ज़त नीलाम करने की आज़ादी देगा,
    मैं चमकता सा शहर हूँ,
    मेरे पास आओ,
    जहाँ तुमने कभी आवाज ऊँची भी न की होगी,
    बेख़ौफ़ चिल्लाने की आज़ादी देगा,
    यहाँ बहरे और गूंगे है सब,
    जो तुम्हारे हारने पर,अपनी
    जीत की जश्न देगा।।।।।

  • गंगा बहती है जहाँ

    गंगा बहती है जहाँ
    ***************
    रीषिमुनियो की तपोभूमि बसती हैं वहाँ
    सबसे पावन भूमि है मेरी गंगा बहती है जहाँ ।।
    हरदिन से जुड़ी एक कथा, बयां होती है जहाँ
    हर कथा नैतिकता की पाठ पढाती हैं जहाँ
    बर, पीपल, शमी, तुलसी की पूजा होती जहाँ
    हे राम! के नाम से गुन्जित हर सुबहा है जहाँ
    सबसे पावन भूमि है मेरी गंगा बहती है जहाँ ।।
    प्रकृतिदृश्य की छटा इतनी निराली है जहाँ
    पठार, पहाङ, मैदान, मरूभूमि से सजी धरा है जहाँ
    हर धर्म, हर जाति, हर नस्ल के लोग बस्ते हैं जहाँ
    बोली-भाषाओं में, रीति-रिवाजों में विविधता है जहाँ
    मेरी मातृभूमि है वो गंगा बहती है जहाँ ।।
    मेरे देश के नाम का, जहाँ में सागर बहता
    जिसके चरणों को धोकर, जो पावन होता
    देवता, किन्नर को भी ललक है जहाँ आने की
    भूमि है नानक, पैगम्बर, राम कृष्ण मनभावन की
    मेरी कर्मभूमि है वो गंगा बहती है जहाँ ।।
    यहाँ हर कथा नैतिकता की पाठ सिखाती है
    गर्भ में भी शिक्षण का महत्व बताती है
    जन्म से पूर्व ही संस्कार शुरू हो जातें हैं
    माँ-बाप की सेवा को, पूजा से बङा बताते हैं
    पावन भूमि है वही, गंगा बहती है जहाँ ।।
    बालपन की भूल को भी, नहीं भुलाते हैं
    मित्र का कर्ज, सर्वस्व देके प्रभु चुकाते हैं
    भक्त के भाव में, प्रभु सारथी बन जाते हैं
    कर्म करने का पाठ, युद्धभूमि में सिखाते हैं
    हाँ यह वही भूमि है, गंगा बहती है जहाँ ।।
    सुमन आर्या

  • ये खुद नही मरी है ..

    ये दृश्य मैंने ही इन आँखों में उतारा है,
    ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है..
    ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है..

    दो चार दिन से ही तबियत खराब थी इसकी,
    पर हिम्मत क्या कहूँ बेहिसाब थी इसकी..
    दवा तो दे न सका, मैंने इसे गाली दी,
    ज़िदगी उम्र भर खुली किताब थी इसकी..
    आज थक हार इसने कर लिया किनारा है,
    ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है..

    मिला जो दुनियाँ से, ना वो खिताब छोड़ सका,
    न उसे प्यार दिया, ना शराब छोड़ सका..
    हर एक दिन नई शुरुआत से वो बुनती रही,
    मैं तोड़ता ही गया जितने ख्वाब तोड़ सका..
    हर एक दिन ही इसने मौत सा गुज़ारा है,
    ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है..

    हर इक कसौटी पर उतरी ये खरी है साहब,
    मरी पहले भी, आज पूरी मरी है साहब..
    आज बेजान सी बुत बनके पड़ी है वरना,
    खुद इसने कितनों में ही जान भरी है साहब..
    मौत के घाट इसे कई दफा उतारा है,
    ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है..

    #घरेलूहिंसा

    – प्रयाग धर्मानी

  • क्यों बच गई है मैं?

    क्यों मैं बच गयी, उन कहरो से,
    भ्रूण हत्या, कुरीतियों, और अमावताओं से,
    मिट जाती मिट्टी में,
    न होती मेरी पहचान,
    न होती मैं बदनाम,
    न होती मैं हैवानों से दो चार,
    न होती यौन शोषण का शिकार,
    न चढ़ती मैं दहेज़ की बलि,
    न होती एसिड अटैक का शिकार,
    न बलात्कारियों की बनती हवस,
    क्यों बच गयी मैं?
    क्यों बच गयी मैं?
    निभाते- निभाते सहते- सहते,
    थक गयी हूँ मैं,
    ये ज़िदंगी मिली है मुझे,
    फिर भी हँस लेती हूँ मैं,
    फिर लगता है,
    क्यों नही मैं बन जाऊ,
    इस पाप की भागीदार,
    न दू बेटी समाज को,
    मिटा दू उसकी पहचान,
    फिर से न उठ जाये ये सवाल,
    क्यों बच गयी मैं,?
    क्यों बच गयी मैं?

  • जो सोया है अंधकार में…!!

    जो सोया है अन्धकार में
    जागेगा नवल प्रभात

    उठ-उठकर देखेगा किरणें
    सूर्योदय सम होगा ललाट

    रजत-चाँदनी में स्वप्न को
    नित पुष्पित कर देखेगा

    नारी सम्मोहन छोंड़ कवि
    अब प्रगतिवाद में चमकेगा

    बहुत हुआ प्रज्ञा! अब जीवन
    किसलय सम पुष्पित होगा

    तेरे अन्तस में सुन्दरतम्
    उच्छवास होगा

    तेरे मन-मण्डप में दुल्हन
    सरिस सजेगी कविता

    पाकर तेरे भाव सौष्ठव
    बन बैठेगी वनिता ||

  • अरमान

    अरमान जो सो गए थे , वो फिर से

    जाग उठे हैं

    जैसे अमावस की रात तो है , पर

    तारे जगमगा उठे हैं…

    बहुत चाहा कि इनसे नज़रें फेर लूँ

    पर उनका क्या करूँ,

    जो खुद- ब – खुद मेरे दामन में आ सजे हैं ….

    नामुमकिन तो नहीं पर अपनी किस्मत पे

    मुझे शुभा सा है,

    कही ऐसा तो नहीं , किसी और के ख़त

    मेरे पते पे आने लगे हैं …

    जी चाहता है फिर ऐतबार करना,

    पर पहले भी हम अपने हाथ

    इसी चक्कर में जला चुके हैं……

    कदम फूँक – फूँक कर रखूँ तो

    दिल की आवाज़ सुनाई नहीं देगी ,

    खैर छोड़ो इतना भी क्या सोचना

    के चोट खाए हुए भी तो ज़माने हुए हैं…….

    अर्चना की रचना ” सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास ”

  • शादी की एलबम

    तीन साल का बिट्टू मेरा मुझसे था नाराज़,
    मैंने पूछा क्या हुआ है, गुमसुम क्यूं हो आज।
    बोला, मैं आपको अपनी शादी में नहीं बुलाऊंगा,
    हंसी रोक कर मैंने पूछा, क्या हुआ बताओ ना ।
    मैं सारी एलबम देख के आया,
    मेरा फोटो कहीं नहीं पाया ।
    आपने मुझे अपनी शादी में नहीं बुलाया,
    इसीलिए मुझे गुस्सा आया ।
    ओह! इसलिए तुमने मुंह फुलाया,
    हां, सब आए बस मुझे ही भुलाया ।
    मैं डरने का नाटक कर बोली…
    अरे, ले के गए थे बेटा, पर तू तब था थोड़ा और छोटा।
    मैंने डरते – डरते एलबम खोली,
    एक छोटे बच्चे को दिखा के बोली..
    अरे! ये तो बिट्टू हंस रहा है,
    मामा की गोदी में है, कितना प्यारा लग रहा है ।
    बिट्टू को हो गया विश्वास,
    हे भगवान, आई मेरी सांस में सांस ।।

  • चेतावनी धरती की

    हे अज्ञानी मानव,  सुन ले मेरी पुकार,
    तेरी हूँ मैं पालनहार,  फिर भी तू कड़े है वार l

    तुमको  शुद्ध आहार दिया,  मुझको प्लास्टिक की पहाड़ दिया,
    तुझको जीवनदायी पानी दिया, तुमने उसमें जहर मिलाया  l

    ओजन जैसी प्रहरी दिया, उसको भी कर्म से छेद किया,
    तुमको खुला आसमान दिया, उसको भी प्रदूषित किया l

    तुमको मिट्टी की खुशबू दिया,  तुमने कचरे वाली बदबू  फैलाया ,
    जीवन उपयोगी सारी चीजें दिया,तुमने विनाशकारी चीजें बनाया l

    हे अज्ञानी मानव, अब समय है सुधर जाओ,
    वरना तुमको औकात दिखाऊंगी l

    मैंने ही कई सभ्यता  मिटाई है,
    जरूरत पड़ी तो तुमको भी मिटाऊँगी l

    याद रख मैं तुम्हारी जननी हूँ , सबकी सीमा बांटी  हूँ,
    जहां न जाना था तुमको,  वहां भी बस्ती बसाए हो l

    बाढ़ और भू – चाल जैसी कई चेतावनी दी है तुमको,
    फिर भी समझ ना आई तुमको l

    तूने ही धरती के सारे भेद खोले,
    फिर भी न्यूटन के तीसरे नियम को भूले l

    जो तुम दोगे मुझको, वापस करूंगी मैं तुझको,
    जो मैंने दिया है तुझको , वापस करो तुम मुझको l

    हे अज्ञानी मानव, मेरे जंगल वापस कर तू मुझको,
    प्लास्टिक रहित धरती दे मुझको l

    फूलों से सुगंधित खुशबू वापस कर तू मुझको,
    शुद्ध वायु दे मुझको , वापस कर तू जीवन मुझको l

    दम  तोड़ी जिसने तेरी लालसा के कारण,
    अनंत काल से झेला तुझको, शायद तू संभल जाएगा l

    अब संभलने में देर न कर,
    वरना तू काल के खंडहर में लुप्त हो जाएगा l

    अब समझने और समझाने के दिन गए तेरे,
    अब कुछ करने की है बारी l

    अब न स्नेह दूंगा तुझको न समझाउँगा,
    अब प्रलय  दिखाऊंगी तुझको l

    अब प्रलय  दिखाऊंगी तुझको ll

                                 Rajiv Mahali

  • जन्म भूमि की ओर चलें

    जन्म भूमि की ओर चलें
    *******************
    इस बेगाने शहर में मरने से अच्छा
    अपनी जन्म भूमि की ओर चलें ।
    भूख की जंग में मरने से अच्छा
    मिट्टी की सोनी खुश्बू के बीच रहें।
    एक ऐसा सफ़र,जहाँ पैरों का सहारा है
    जहाँ गाङी नहीं,हौसलों का पंख हमारा है
    हम प्रवासी,भाग्य से दो-चार होने को चलें—-
    कितने कष्टों से होते हुए यह सफ़र पूर्ण हुआ
    दहशत में ना रहो,गाँववासी हूँ वक्त का मारा हुआ
    कष्ट न होगा ,अपनी जमी को अपना बनाने चले–
    अब पलायन नहीं,यही आजीविका तलाशेंगे
    खुद को साबित करने का अपना हुनर को तराशेंगे
    संभावनाओ का ठौर बनाते हुए
    शून्य से शुरूआत करने को चले—
    सुमन आर्या
    ————-

  • पूर्णिमा

    पूर्णिमा जब चांदनी
    धरती पर आकर पसारती है
    लगे चांदी के आभूषण से
    धरती का रूप सवारती है
    मां के पास आंगन में सोए
    नन्हे शिशु पर छांव करें
    उसे हरी समझ कर पूज गईं
    पड़ी किरण शिशु के पांव तले
    जब शीत पवन के झोंके से
    उन द्खतौ ने अंगड़ाई ली
    मां कहे कि पवन सताती है
    फिर चादर से परछाई की
    यह देख चांदनी रूठ गई
    मां ने चादर की ओट करी
    जब कई घड़ी बालक ना दिखा
    वह फिर बादल में लौट गई

  • मनोभाव

    आरोपों के कठघरे में खड़े हो चाहे,
    या प्रशस्ति पाने उठे हो पैर हमारे।
    प्रशंसाओं में कभी हम फूले नहीं,
    इल्जामों से चिंताओं में डूबे नहीं।
    कभी कभी पीठ पर खंजर भी खाए,
    पर कभी स्वार्थ के लिए रिश्ते ना बनाए।
    चाहे कभी किसी के खातिर कुछ नहीं किया,
    पर कभी किसी को भूलकर दुख नहीं दिया।
    अपने अधिकारों को कभी मरने नही दिया ,
    उम्मीदो का दीपक कभी बुझने नहीं दिया ।
    कभी किसी गलत का साथ नही दिया,
    मैने तो सदा अपने मन का किया।
    सदा अपना कर्म करता रहा,
    चाहे जो हो परिणाम आगे बढ़ता रहा।
    जिसने साथ दिया उनका आभार व्यक्त किया,
    साथ छोड़ने वालों से भी नहीं मुझको कोई गिला।
    कभी किसी को नीचा दिखाया नहीं,
    आचरण विरूद्ध कर्म कर कभी कुछ पाया नहीं।
    सुखो और दुखो को समय का फेर जाना,
    सौभाग्य और दुर्भाग्य को कर्म का खेल माना।
    मृत्यु तो नियति मरने से नहीं डरता हूं,
    उन्मुक्त उल्लासित करने वाले ही कार्य करता हूं।
    चाहे आंखो का पानी हो या सुख दुख की कहानी को कभी व्यर्थ नहीं जाने दिया,
    हमेशा अपने मन के भावों को कलम की स्याही में मिलाकर मैंने काव्य बना दिया।
    ✍️मयंक✍️

  • भोजपुरी बिरह गीत – करी केकेरा प सिंगार बलमु |

    भोजपुरी बिरह गीत – करी केकेरा प सिंगार बलमु |
    कईला काहे हमसे अइसन तू प्यार बलमु |
    छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु |
    तोहरे बिना लउके हमके सगरो अनहरिया |
    अंसुवे मे डूबल जाता हमरो उमरिया |
    कइला काहे हमसे तू नैना चार बलमु |
    छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु |
    तन औरी मन राजा तोहके सब सउपली|
    मन के मंदिरवा तोहे देवता नियन पुजली |
    दगाबाज बनला काहे मोर दिलदार बलमु |
    छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु |
    गाँव के बगइचवा संझवा रोज हमके बुलवला |
    प्यार वाली झूठ बतिया से हमके भरमवला |
    नेहिया सौतिनिया लगाई भइला तू गद्दार बलमु |
    छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु |
    हम नाही जनली कबों दगा हमसे करबा |
    भरी मंगीया सेनुरवा छाँव अँचरा मोर रहबा |
    छोड़ी परईला करी केकरा प सिंगार बलमु |
    छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • उम्मीदों का पुलिंदा

    उम्मीदों ने ही किया घायल
    और उम्मीदों पे ही जिंदा था,
    इस उम्मीद- ए- जहां का
    मै एक मासूम परिंदा था।।

    कूट के भरा था दिल में प्यार
    प्यार का मै बंदा था,
    सादगी की सादी चादर औढे
    मासूमियत का मै पुलिंदा था,

    पर ना था महफूज शायद
    जमाना मेरी उम्मीदों के लिए,
    यहां तो ये मासूमियत बस
    शातिर लोगो को धंधा था।।

    ना कद्र मेरी उम्मीदों की
    ना मासूमियत को प्यार मिला,
    ये सब तो इस जमाने में
    मानो गरीब का चन्दा था।।

    तब तक मरता ही रहा
    जब तक मै जिंदा था,
    इस उम्मीद- ए- जहां का
    मै एक मासूम परिंदा था।।
    AK

  • बरसात के आंनद और परेशानियां

    सावन की कमी पूरी हो गई,
    भादों में वर्षा की झड़ी हो गई।
    बदरा गरज गरज कर बरस रहे ,
    निर्मल झरने कल कल कर बह रहे।

    बिजली चम चम कर चमक रही,
    मयूरी छम छम कर नाच रही।
    ठंडी ठंडी हवा सन सना रही,
    प्रकृति में चारो और हरियाली छा रही।

    एक तरफ मन में खुशियां आ रही,
    दूसरी ओर नदियां तांडव दिखा रही।
    मंदिर मकान सबकुछ डूब गए,
    अपनों तक जाने वाले रास्ते टूट गए।

    भ्रष्टाचारी पुल पहली बारिश सह ना सके,
    नदियों की धारा संग मिलकर चल बसे।
    चारो और जलजला आ रहा है,
    फसलों को अपने में समा रहा है।

    सैलाब में भी सेल्फी भा रही ,
    जोखिम लेकर गाडियां भी जा रही,
    सैनिक जिंदगी बचाने में जी जान लगा रहे,
    मगर कुछ तो जान करके मरने जा रहे।

  • तुम जाओगे…

    तुम जाओगे ,कल नहीं;
    आज चलें जाओ,
    छोड़ जाओ, रोकूंगा नहीं,
    मगर काम ज़रा-सा करके जाओ,
    फिर कभी टोकूंगा नहीं।
    ये यादें जो घर बनाएं बैंठी है दिल में,
    ज़रा मेहरबानी ! ले जाओ,
    फिर कभी भी; ईमान से, कोसूंगा नहीं।

  • सावन पर

    किसी ने पूछा मुझसे,
    “सावन” पे लिखती हो, क्या मिल जाता है?
    मैनें कहा —–
    मुझे समझने वाले सखा, सखी हैं,
    समझते हैं, जो रचनाएं मैनें लिखी हैं।
    उनकी लिखी रचनाओं को भी पढ़ पाती हूं,
    इस क्षेत्र में और आगे बढ़ पाती हूं।
    आत्मा की खुराक मिल जाती है,
    दो घड़ी तबीयत भी खिल जाती है।
    आदर, सम्मान, प्रेम, स्नेह सब मिलता है,
    और किसी को क्या चाहिए….

  • तू क्या है..

    ‘समझ में ये नही आता कि आरज़ू क्या है,
    है दिल भी पास अगर फिर ये जुस्तजू क्या है..?

    मैंने देखा है आज खून-ए-जिगर भी अपना,
    मैं सबसे पूछता फिरता था के लहू क्या है..?

    तू इतना वक्त पर पहुँचा कि बात खत्म हुई,
    अब मुझसे पूछ रहा है के गुफ्तगू क्या है..?

    मेरे वजूद पर सवाल उठाने वाले,
    चल आज ये भी बता दे मुझे के तू क्या है..’

    – प्रयाग

    मायने :
    जुस्तजू – तलाश
    जिगर – कलेजा
    गुफ्तगू – बातचीत

  • लाक डाउन

    लॉक डाउन का हम पति घर में रहकर
    शत-प्रतिशत सम्मान कर रहे हैं
    बीवी से जो भी मिली है ड्यूटी लिस्ट
    उसी के मुताबिक सारे काम कर रहे हैं
    ड्यूटी लिस्ट में खाना बनाना
    छोड़कर सब कुछ करना है
    ओखल में जब सर दिया तो
    अब मुसल से क्या डरना है
    पहले दिन घर की डस्टिंग का
    बेगम ने आदेश दिया
    अगले दो दिन क्या करना है
    यह भी संग संदेश दिया
    कमरे के हर पंखे खिड़की
    चद्दर तकिया भी है साफ करना
    जब कभी किचन में आए छिपकली
    उसे भगाने से नहीं है डरना
    रोज सुबह की चाय बनाना
    नींद से फिर हमको जगाना
    अगर उठूं न एक बार में
    नहीं दुबारा आवाज लगाना
    नींद नहीं पूरी हुई अब तक
    समझ ही जाना मत चिल्लाना
    मोबाइल की बैटरी फुल हो
    यह भी जिम्मेदारी निभाना
    झाड़ू-पोछा और बर्तन की चमक देख
    खुश हो, संग अक्षय की फिल्म दिखाती
    स्वच्छता का पाठ पढ़ा कर सासू मां की बिटिया
    हर दूसरे दिन टॉयलेट धुलवाती
    अजब पति की गजब कहानी
    बाहर डंडा, घर में राज है बीवी का
    जब जी चाहा खूब कथा सुनाया
    वॉल्यूम तेज करके टीवी का
    परिहास कर रही दुनिया सारी
    अब तो पति नाम के प्राणी पर
    अदृश्य कोरोना का है आशीर्वाद
    दुनिया में हर लेवल की नारी पर
    लॉक डाउन के दौरान जो शख्स हर हाल में
    पत्नी संग खुश रह कर साथ निभाएगा
    वही अपना नाम 2021 में होने वाली
    भारत की जनगणना में दर्ज करवाएगा।
    वीरेंद्र सेन प्रयागराज

  • क्योंकि आज रविवार है

    थोड़ी देर और मस्ती करने दो
    क्योंकि आज रविवार है
    सपनों की दुनिया में खोने दो
    क्योंकि आज रविवार है
    जिंदगी बहुत हैं शिकवे तुमसे
    चल रहने दे छोड़ सब
    क्योंकि आज रविवार है
    मुझे मालूम है ये ख्वाब झूठे और ख्वाहिशें अधूरी हैं
    मगर जिंदा रहने के लिए कुछ चिंतन जरुरी है
    आज ख़ुशी व चिंतन का वार है
    क्योंकि आज रविवार है
    समझो तो कोई पराया नहीं
    खुद न रूठो ,सबको हंसा दो
    यही जीवन का सार है
    क्योंकि आज रविवार है
    हफ्ते भर बाद फिर आएगी छुटटी
    चलो सुख की छांव में ,मुकाम कर ले
    पोंछ कर रोते लोगों के आंसू
    खुद बने कृष्ण खुद को राम कर लें
    आओ बहा दें मिल प्यार की सरिता
    सूरज बाबा ने दिया हमको यह उपहार है
    क्योंकि आज रविवार है
    सबको जाना है ,जाने से पहले
    प्रभात लेखन की दुनिया में ,अपना नाम तो कर ले
    लिख रहा हूँ ,साहित्य को मेरा उपहार है
    क्योंकि आज रविवार है….

  • भावना

    एक बाबा बरसाने के, प्रतिदिन यमुना में स्नान कर के,
    दर्शन करते थे राधा – रानी के।
    जीवन का एक भाग यूं ही बिताया,
    एक दिन दर्शन करते – करते ,बाबा के मन में विचार आया
    कोई लाए नारियल, चूड़ी, कोई बिंदी साड़ी लाया
    मैनें तो आज तक राधा रानी को कुछ भी नहीं चढ़ाया।
    में भी दूंगा कुछ उपहार, लहंगा,चुनरी या फूलों का हार।
    सुबह- सुबह कर के स्नान – ध्यान,
    बाबा जा पहुंचे एक दुकान
    लहंगा, चूनर, गोटा मिला, अपने हाथों से उसे सिला।
    हर्षित होते जाते थे, मंदिर की ओर दौड़े जाते थे।
    मंदिर की सीढ़ी पर एक “लाली” आई,
    लहंगा, चूनर देख कर मुस्काई,
    बोली, बाबा ये लहंगा – चूनर तो मैं लूंगी,
    बाबा बोले ये तो ना दूंगा लाली,
    कल दिलवा दूंगा दूजी वाली।
    ये राधा – रानी के नाम की है, ये तेरे किस काम की है।
    लाली भी चंचल -चपल थी,लहंगा – चूनर छीन गई
    बाबा बोले ऐसा भी करता क्या कोई, बाबा की फिर अंखियां रोई
    मंदिर के अंदर से फ़िर आई आवाज़ एक,
    राधा – रानी के परिधान , कितने सुंदर हैं देख।
    बाबा भी भागे – भागे आए,
    राधा – रानी को वही लहंगा – चूनर पहने पाए।
    बाबा ने हाथ जोड़ ,स्पर्श किए राधा – रानी के पांव,
    राधा – रानी समझ गई थी, बाबा के मन के भाव।
    इसीलिए स्वयं ही आ के ले गई अपना उपहार,
    भावना ही सर्वोपरि है, ये समझ ले सारा संसार।
    ————- जय हो राधा – रानी की🙏

  • स्वच्छ भारत अभियान

    खुले में शौच से मुक्ति का दावा, बिलकुल निराधार
    घोषित करने से, कार्ययोजना लेती कहाँ आकार ।।
    स्वच्छ भारत अभियान का सच बताता
    ग्रामीण सङको के किनारे चलना मुश्किल होता
    ताजुब हमें तब होता, जब पढने को मिलता
    कोई जिला, कस्बा शौच मुक्त घोषित कैसे होता
    शौचालयों के निर्माण में खानापूर्ति कर रही सरकार
    सिर्फ घोषित करने से कार्ययोजना लेती कहाँ आकार ।
    बता दें कहाँ बारह हजार में होता शौचालय निर्माण
    उसमें भी जब दो हजार की पेशगी लेते विभागप्रधान
    शेष दस हज़ार का हिसाब भी बङा तगङा है
    भूखों ने इतनी मोटी गड्डी पहली दफ़ा पकङा है
    बच्चों की आशापूर्ति करें, या चुकाएं जिनके हैं कर्जदार
    सिर्फ घोषित करने से, कार्ययोजना लेती कहाँ आकार।
    राशि मिलने से पूर्व, तस्वीर जो खींची जाती है
    दीवार खड़ी कर बस फाटक लगा दी जाती है
    फोटो खींच नियमों की धज्जियां उङायी जाती है
    योजनाओं को जमी पे उतारने में बाधक है भ्रष्टाचार
    सिर्फ घोषित करने से, कार्ययोजना लेती कहाँ आकार ।
    भूख से बिलखतो को, भोजन के सिवा क्या दिखता है
    अभावों में पले जीवन को सफाई की सीख भी चुभता है
    पाणि में रोजगार, मुख में रोटी मुअस्सर होगी
    ज्ञान की क्षुधा , तभी जन-जन में जागृत होगी
    सवच्छ भारत अभियान का स्वप्न, तभी तो होगा साकार
    सिर्फ घोषित करने से, कार्ययोजना लेती कहाँ आकार ।
    जबतक जागरूकता ग्रामीण भारत में न आयेगी
    यूँ ही हर अभियान, अधर में दम तोङती नज़र आएगी
    बगैर सही संचालन के, सफल नहीं हो पाएगी
    सही सोच से ही हर विधान सफ़ल हो पाएगी
    सचेत हो नहीं तो हर आकांक्षा पङी होगी मझधार
    सिर्फ घोषित करने से कार्ययोजना लेती नहीं आकर।
    सुमन आर्या

  • मेरा गाँव

    मेरा गाँव
    ————–
    गाँव मेरा, हां वही गाँव है
    जहाँ सर्दी में धूप,गर्मी में शीतलता की छाँव है ।
    अपनेपन का हर जङ चेतन से व्यवहार है
    हर गली हर टोले में छिपा अब भी प्यार है
    एक आवाज़ पे दौङ पङता है जो
    बना भारत की पहचान है हा वही गाँव है ।
    मगही बोली में घुली मिस्री की मिठास है
    गोबर से लिपी गलयो में खुशबू का वास है
    खेतों में लहराती फसल,पगडंडियो पे मखमली घास है
    मन में कोई भेद नहीं,बालमन में गोकुल का रास है
    हर डाली पे कोयल तीतर बटेर मैना का ठाव है
    आने का संदेश देता कौवा का काव काव है ।
    सुमन आर्या

  • मुश्किलें बस ये दिखाने को..

    ‘हैं जबकि और भी कितने ही दर ज़माने में,
    क्यूँ फकत मेरे ठिकाने को चली आती हैं..
    कितने मौजूद मददगार हैं यहाँ तेरे,
    मुश्किलें बस ये दिखाने को चली आती हैं..’

    – प्रयाग

    मायने :
    फकत – सिर्फ

  • मैं खुद से भी ज़्यादा बेहतर..

    ‘सबसे पहले मैं दुनियाँ में
    इस रिश्ते को पहचानती हूँ..
    मैं खुद से भी ज़्यादा बेहतर,
    अपने पापा को जानती हूँ..

    वो कहते हैं कि जान मेरी,
    मेरी गुड़िया में बसती है..
    मैं कहती हूँ कि बस पापा
    इक आप से मेरी हस्ती है..
    बस वही जगह है उनकी भी,
    जितना मैं रब को मानती हूँ..
    मैं खुद से भी ज़्यादा बेहतर,
    अपने पापा को जानती हूँ..

    ‘तू लाई क्या है मायके से’,
    यह तीर हृदय को भेद गया..
    न खुशियों से प्रफुल्ल हुआ,
    न कभी ये मन से खेद गया..
    ससुराल के ऐसे तानों को,
    अच्छी बातों से छानती हूँ..
    मैं खुद से भी ज़्यादा बेहतर,
    अपने पापा को जानती हूँ..

    वो खुद जो पैदल चलते थे,
    उन्होंने आपको गाड़ी दी,
    जीवन में जो भी सहेजा था,
    वो मेहनत अपनी गाढ़ी दी,
    अब उनके पास नही है कुछ,
    यह बात हृदय से जानती हूँ..
    मैं खुद से भी ज़्यादा बेहतर,
    अपने पापा को जानती हूँ..’

    #दहेजप्रथा

    – प्रयाग

  • भारतीय परिधान…

    भारतीय परिधान सजीला
    पहने जो भी लगे रंगीला।

    देखी मैने एक सुन्दर बाला
    हाँथों में चूड़ी, कानों में बाला।

    जुल्फें जिसकी काली-काली
    होंठों से टपक रही थी लाली।

    माथे पर थी नीली बिंदी
    होंठों पर थी अनुपम हिंदी।

    सुन्दर साड़ी लाल किनारी
    कमर में बिछुए भारी-भारी।

    कहीं संभाले पल्लू सरपट
    चाल थी उसकी डगमग-डगमग।

    पीठ छुपाती कहीं बेचारी
    असुविधाजनक थी साड़ी भारी।

    खूबसूरती परिधान में होती
    नज़र है जिनकी गंदी होती।

    यही अलापें वह दिन-रात
    जो रखते हैं दिल में पाप।

  • मुझे पहचान लो

    कविता कहाँ, मैं झूठ लिखता हूँ
    मुझे पहचान लो
    दूसरों पर चोट करता हूँ
    मुझे पहचान लो।
    जब कभी कोई कराहे
    दर्द से फुटपाथ पर,
    नजरें चुरा लेता हूँ उससे ,
    अब मुझे पहचान लो।
    शांति से सब गा रहे हों
    प्रेम का संगीत जब
    मैं वहां नफरत जगाता हूँ
    मुझे पहचान लो।
    जिंदगी की फिल्म
    चलती जा रही है प्यार की
    मैं विलन का रोल करता हूँ
    मुझे पहचान लो।

  • भक्त प्रहलाद

    एक असुर के घर पर जनमा हरि का भक्त महान, उसने मां के गर्भ में ही ले लिया भक्ति का ज्ञान।

    आयु में छोटा था,नाम प्रहलाद था,
    किन्तु हरि पर उसको अटूट विश्वास था।
    कोई ग़लत कर्म वे कभी ना करता था,
    बस हर समय हरि का ही नाम जपता था।

    उसका पिता उसे भी कपटी असुर बनाने पर तुला था,
    मगर उसका मन तो केवल प्रभु की भक्ति में लगा था।
    प्रहलाद, नारद के सानिध्य में नारायण नारायण सीखता था,
    हर समय नारायण नारायण का भजन ही बस करता था।

    प्रहलाद का पिता हिरण्यशिपु बड़ा अधर्मी था,
    प्रहलाद को हरि भक्ति भुलाने करता नई नई युक्ति था।
    कभी उसको खाई में फिखवाता था, तो कभी आग में जलवाता था,
    मगर हरि कृपा के कारण वहां प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं कर पाता था।

    प्रहलाद के मुख से हरि का नाम हिरण्यशिपु को सहन नहीं हो पाया,
    एक दिन अंतिम निर्णय करने का मन बनाया।
    बोला, प्रहलाद तेरा हरि बस एक पत्थर है,
    तेरा पिता ही सबका सच्चा ईश्वर है।

    इसलिए हरि की भक्ति से विरक्ति कर,
    तू भी केवल मेरी ही भक्ति कर।
    अन्यथा परिणाम उचित नहीं होगा,
    तू संसार में जीवित नहीं होगा।

    प्रहलाद बोले हरि का नाम तो नश्वर है,
    हरि ही समस्त संसार के ईश्वर है।
    हिरण्यशिपु बोला मेरा तुझसे बस एक सवाल,
    ये बतला रहता कहां पर है तेरा भगवान?

    प्रहलाद बोले कण कण में हरि निवास करते है,
    तुम्हारे भीतर मेरे भीतर हर जगह पर हरि बसते है,
    यहां वहां चारो और बस हरि नाम का ही वर्चस्व है,
    धरती से लेकर अम्बर तक हरि तो सर्वस्व है।

    क्रोधित हिरण्यकशिपु बोला मुझे तेरे विश्वास का प्रमाण बतला,
    इस महल के खंबे के भीतर से तू हरि दिखला।
    कुछ ही समय में महल में कंपन्न होने लगा,
    महल का खंबा टूटकर नीचे गिरने लगा।

    खंबे के भीतर से भगवान नृसिंह अवतार में प्रकट गए,
    भगवान का स्वरूप देखकर सब राक्षस डर गए,
    नृसिंह भगवान ने क्रोध की दृष्टि से जैसे ही हिरण्यशिपु को देखा ,
    उसके मस्तक पर खिच गई चिंता की रेखा।

    भगवान नृसिंह ने हिरण्यशिपु को दिया ब्रह्मा का वरदान निभाया,
    वर के कारण अधिकमास का पावन मास बनाया,
    हिरण्यशिपु को दहलीज पर ले जाकर गोद में लिटा दिया,
    बिना कोई अस्त्र शस्त्र के अपने नखो से पापी का वध कर दिया।

    प्रभु ने प्रहलाद को गोद में बिठाकर दुलार किया,
    सदा महान भक्त बने रहने का वरदान दिया।
    ✍️✍️मयंक✍️✍️

  • तबाही

    अनजाने में इश्क का गुनाह कर दिया
    बंदिशों से खुद को रिहा कर दिया
    पाक रूह कहकर कभी सजदा करने
    वाले अब कहते हैं मोहब्बत ने तबाह कर दिया

  • पिता का सपना

    हे प्रभु भक्त तेरा हूं,
    मत दे दुनिया की दौलत मुझको|
    दे जा मुझको अनमोल खजाना,
    ना इसके सिवा कुछ चाहत मुझको|

    कई पीढ़ियों से हाथ है सुना,
    दादा बाबा परदादा से |
    लाल दिए हो लाली दे दो,
    दुआ मेरी है जगत विधाता से|

    वह दिन सब कोई रोते थे,
    दुर्भाग्य साली समझते थे|
    शोक सभा हो घर में मानो ,
    जब सुनी कलाई पाते थे|

    उमा रमा सुधा कहू,
    या सीता कह के बुलाऊंगा|
    बिक जाए ,चाहे घर का हर एक कोना,
    बेटे जस पढ़ाऊंगा|

    इतना साहस तेज शिखा दू,
    संस्कारों के फूल खिला दू|
    जहां रहे सभ्यता की खुशबू फैले,
    बेटी है ऐसे संस्कार मैं दू|

    है बेटा बेटी दे दो,
    बहना का प्यार मिले यह अवसर दे दो|
    कुछ घर के बच्चे ,अपनो को नाना कहते,
    बच्चों को मामा-
    हमें नाना बनने का अवसर दे दो|

    सपना देख रहा हूं प्रभु,
    यह दिन भी सब सच हो जाए,
    आश टिकी है तुझ पर ही,
    प्रभु सपना सच हो जाए|

  • तुम्हें नहीं मालूम…

    तुम्हें नहीं मालूम ,
    मगर मंसूबों को तेरे ,
    मैं जान लेता हूं,
    रहता हूं परेशान,
    मगर; फिर भी
    खुद को हर हाल में ,
    संभाल लेता हूं,
    और इत्तेफाक से
    तुम्हारी आंखों और
    लफ्जों का तालमेल,
    बिगड़-सा गया है आजकल ,
    बस !इन्हीं हरकतों से ,
    तुम्हें पहचान लेता हूं,
    इन्हीं हरकतों से ,
    तुम्हें पहचान लेता हूं।

  • मातृत्वसुख

    हर माँ शिशु के जीवन को संवारती
    खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती ।
    की कभी वह, स्वपहचान की भी अनदेखी
    कभी गहरी निद्रा पलकों पे इसकी नहीं देखी
    एक हल्की सी आहट, थोड़ी-सी छटपटाहट
    कयी आशंकाओ से घिरी,आत्मा तक कराहती,
    खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती ।
    गर्वित कर जाता, आँचल से ढक स्तनपान करवाना
    आलोकित करता उसे मातृत्व के अहसास को जीना
    स्नेह की मूरत वह , पलकों पे करूणा का छलक आना
    माँ कहलाने के खातिर, हर पीङा को हंसके लान्घती,
    खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती ।
    कयी तनाव , संघर्षों से खुद जूझते,
    पर पार करती गम के हर पङाव को
    अकेली ही झेलती, सहती हर दुःख संताप को
    नित नये सवालों से रूबरू, जीवन में उतारती,
    खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती ।
    यह एक बेहतरीन पल, आएगा क्या दुवारा
    हर क्षण को जिये, इसे गवाना नहीं गंवारा
    इनकी गतिविधियों को, पलकों पे कर क़ैद
    “मातृत्वसुख” है हासिल, लेता हर अवसाद हर
    रमती बच्चों में, हर क्रियाकलाप को सराहती,
    खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती ।
    माँ जननी ही नहीं, गुरु, मित्र भी, शिशु की होती है
    आखरी लम्हों तक, सुत के नाज-नखरे हंसके ढोती है
    उसकी विशालता के आगे, हर इंसान की कद छोटी है
    अपने सुत-सुता के लिए वह, ईश्वर से बढ़कर होती है
    दुनिया भर की दुआओं संग, खुद को भी निसारती,
    खुद को खोकर, हर पहलू को निखारती ।
    सुमन आर्या

  • मैं खुद को ना पहचान सकी..

    ‘मैं खुद को ना पहचान सकी,
    ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..
    उसमें नफरत भी बेहद थी,
    तेज़ाब जो तुमने उड़ेल दिया..

    तुमने जो छीनी है मुझसे,
    मेरी पहचान वो थी लेकिन,
    मेरे भीतर जो सरलता थी,
    तुमसे अंजान वो थी लेकिन..
    अब क्या हासिल हो जाएगा,
    नफरत का खेल था खेल दिया..
    मैं खुद को ना पहचान सकी,
    ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..

    इक छाला भी हो जाए तो,
    कितना दुखता है सोचा है?
    वो आँसू भी तकलीफों का,
    कैसे रुकता है सोचा है ?
    वो क्या मुझको खुश रख पाता,
    जिसने तकलीफ से मेल दिया..
    मैं खुद को ना पहचान सकी,
    ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..

    तुम क्या जानो कि जिस्मों की,
    जब परतें जलती जाती हैं..
    किस दर्द,जलन की तकलीफ़ें
    सब रौंदके चलती जाती हैं..
    वो कैसा जलता लावा था,
    जो तुमने मुझपे उड़ेल दिया..
    मैं खुद को ना पहचान सकी,
    ऐसी दुनियाँ में धकेल दिया..’

    #एसिडअटैक

    – प्रयाग

  • ❤ दिल के छाले…!!

    ❤❤ अभिव्यक्ति दिल से ❤❤
    _______________
    बेइन्तहां
    मोहब्बत थी
    उनसे हमें
    एक छींक पर भी
    जान निकलती थी
    हमारी….
    ना जाने क्यूँ उन्हें
    हमसे मोहब्बत
    ना हुई!
    इसमें भी शायद
    खता थी हमारी..
    जब वो बीमार होते थे
    हम हमेशा उनके
    पास होते थे…
    फिर भी नहीं की
    कदर उसने हमारी..
    शायद इसमें भी
    खता थी हमारी…
    किसे दिखाएं
    अपने दिल के छाले!
    कोई नहीं समझेगा
    मोहब्बत हमारी…
    उल्टा मुझी पर
    हँसेगा जमाना
    जो भी सुनेगा
    कहानी हमारी…

  • फालतू की योजनाओं में

    फालतू की योजनाओं में
    पैसा मत बहाओ साहब,
    ये गूल चार वर्ष पहले बन चुकी थी
    कागजों में,
    अब असली में मत बनाओ साहब।
    पाइपलाइन नप चुकी है एक बार
    रास्ता बन चुका है चार बार
    पुलिया टूट चुकी है तीन बार
    अब बेवकूफ मत बनाओ साहब।

  • आश बूढ़े माँ-बाप की

    अलगाव, अवसाद से निकलने को ,
    तैयार हो अपनी सोंच बदलने को ।
    खुद को आकने, अंतर्मन में झांकने को ,
    नये हुनर सीख तैयार, बेहतर करने को ।
    भविष्य की अनिश्चितता हमेशा से कायम थी
    अकेलेपन की खुमारी पहले ही से व्याप्त थी
    टूटते संयुक्त परिवार, एकल में हो रहे तब्दील थे
    खुद तक सीमित, पडोसियों से भी अनभिज्ञ थे
    हम अकेले ही नहीं, सब तैयार हैं फल भुगतने को,
    बस तैयार हो अपनी सोंच बदलने को ।
    थोड़ा-सा सुधार करें, खुद में हल्का- सा बदलाव करें
    घर-ग्राम जो छोङ आए, पुनः उसपे भी हम ध्यान धरें
    बुजुर्ग जो घर में बैठे, अपनी आश लगाए हैं
    उनकी कंपित हाथों को थोड़ा-सा आराम दे
    हम जो भी हैं, माने प्रतिफल, उनकी साधना को,
    बस तैयार हो अपनी सोच बदलने को।
    तन्हा बैठे-बैठे तकते रहते वे उस पथ पे
    कान्हा उनका आएगा, छोङ गया जिस दर पे
    कट रही जिन्दगी पडोसियों के रहमो करम पे
    ज़रूरतों के लिए कबतक आश्रृत रहे गैरो पे
    इस कोरोना काल में, बीमार जो वे पङे
    पङोसी भी नहीं आए, थे जो साथ खङे
    इसके का दोषी हम, या दोष दे मानवता को,
    बस तैयार हो अपनी सोंच बदलने को ।
    भूखे रह, खुद को जोखिम में डालकर
    फ़रमाइशे पूरी करने को जो थे हरदम तत्पर
    अपनी जरूरतों के लिए भी निर्भर हैं दूसरों पर
    जिन्हें गरूर समझ, मेहनत-से सीच- सीचकर
    बनाया स्वाबलम्बी, पहुँचाया मनचाहे मुकाम पर
    अपना जहाँ बसा, भुला बैठे अपनों की आश को,
    बस तैयार हो अपनी सोंच बदलने को

  • अब फकत एक ही चारा है..

    ‘अब फकत एक ही चारा है बस दवा के सिवा,
    कोई सुनता, न सुनेगा यहाँ खुदा के सिवा..

    खुदा के मुल्क में इक बस इसी की कीमत है,
    कोई सिक्का नही चलता वहाँ दुआ के सिवा..

    ऐसे गुलशन की हिफाज़त को कौन रोकेगा,
    जहाँ कांटें भी फिक्र में हों बागबां के सिवा..

    तू ये न सोच फकत आसमाँ ने देखा है,
    गवाही और भी कई देंगे कहकशाँ के सिवा..

    एक बस मेरी ही आवाज़ न पहुँची उस तक,
    वरना हर दिल को सुना, उसने इस सदा के सिवा..

    अब फकत एक ही चारा है बस दवा के सिवा,
    कोई सुनता, न सुनेगा यहाँ खुदा के सिवा..’

    – प्रयाग धर्मानी

    मायने :
    फकत – सिर्फ
    चारा – रास्ता
    बागबां – माली
    कहकशाँ – आकाशगंगा
    सदा – आवाज़

  • आ गया तेरा भाई…!

    आज बहुत व्यथित थी
    बार-बार निगाहें दरवाज़े
    तक जाकर लौट आ रही थीं….
    ना जाने कहाँ रह गए वो!
    मेरा बेचैन मन
    मुझे अधीर कर रहा था….
    कहा तो था जल्दी ही
    आ जाऊंगा
    ना जाने कहाँ रह गए वो!
    जितनी बार गली से
    कोई आहट आती
    मन की गति से भी जोर
    मैं भागती
    दरवाज़े पर निहारती
    और हताश होकर
    लौट आती…
    ना जाने कहाँ रह गए वो!
    तभी बाहर से आवाज आई
    कहाँ हो बहना!
    मन प्रसन्नता से
    झूम उठा
    आँखों में चमक आई
    मेरी बेचैनी ने
    मुझे छोंड़कर जाते हुए कहा
    लो आ गया तेरा भाई…

  • प्रेम विरह

    प्रेम विरह

    क्या सही है ,क्या गलत ,
    ना जानू ।
    पर आंखें  टपक- टपक
    नयन-जल बौछार में ;
    भीगा तनबदन,
    क्या करूं? क्या ना करूं ?
    ना जानू।

    नाराज़ हूं ;मैं खुद से
    पर क्यो वो नाराज़ हैं ?
    ग़लत मैं थी या वो ?
    ना जानू ।

    पर क्यों ना रह पाऊ?
    क्यों ना कह पाऊं?
    हर दूख , हर पीड़ा
    सह जाऊं,
    क्रोध को उनके,
    जफ़ा  को उनकी
    पानी-सा समझ पी जाऊं
    पर कैसे मनाऊं उनको ?
    ना जानू।

    एक कक्ष में
    दो परिंदे ,
    कैसे ?कब से ?
    हम हो गए
    ना जानू।

    कुछ भी तो ना भाता ,
    उन बिन,
    एक दिन भी  सौ साल लगे
    कितना मोह होने पर भी
    खफा तुम कैसे हो गए
    ना जानू ।

    —- मोहन सिंह मानुष

  • सूर्य का स्वागत

    नई भोर है सूर्य का स्वागत
    करेंगे हम…
    खिड़कियों से पर्दे हटा
    किरणों से नहाएगे हम..
    तितलियों के पंख से चुरा लेंगे
    तमाम रंग
    फीके आसमां पे जा नित नवीन
    चित्रकारी करेंगे हम..
    सागर की लहरों से सीख लेंगे…
    जीवन के उतार-चढ़ाव
    पंख खोल आसमां में जा
    उड़ेंगे हम…
    पपीहे की पुकार सुन झूम
    उठेंगे मन-गगन
    और रेत से कभी फिसला
    करेंगे हम…
    चुरा लाएगे एक रोज़ हम
    समय की चाबियां
    वक्त-बेवक्त फिर जगा
    करेंगे हम…

  • प्रवासी मजदूर

    क्या तुम कभी यह भूल पाओगे
    क्या फिर कभी वापस आ पाओगे
    शायद तुम्हे आना पड़े, मजबूरी में
    मजबूरी बहुत कुछ करवाती है
    यह ही इन्सान को भटकाती है
    कैसे भूलोगे तुम, इस मीलों के सफर को
    जब तुम आए पहली बार, मन में लिए तरंगें हजार
    जीवन में कुछ पाने की चाह लिए छोड़ा परिवार
    अब, फिर वक़्त ने ठोकर मारी
    फिर छोड़ना पड़ा बसा बसाया घर बार
    हर बार क्या यूँ ही उजड़ते रहोगे
    तुम अपने किसके कहलाओगे
    तुम्हे वापस ना आना पड़े इस बार
    कोई मजबूरी ना आए तुम्हारे पास
    कोशिश करना तुम भूल जायो उस पीड़ा को
    भूल पाऐ तो दर्द कम होगा
    दर्द के निशान रहेंगे बाकी
    तुम यहां भी रहना, मेहनत करते रहना
    यही तुम्हारा सब कुछ है
    कोई माने ना माने जमाना रहेगा सदा कर्जदार तुम्हारा
    तु ऐसे ही नहीं शिल्पकार कहलाता।

  • मैं आग था पहले..

    ‘बुझा गया है कोई, मैं चिराग था पहले,
    जो जगह आज बंज़र है, बाग था पहले..
    बदल ली करवट कुछ इस कदर तकदीर ने,
    डरता हूँ आज धुएँ से, मैं आग था पहले..’

    – प्रयाग

  • प्रतीक बन जा

    कठिन पथ पे चलकर, फतह हासिल करने की
    तू प्रतीक बन जा !
    स्वमेहनत से कुछ ऐसा कर, सभी के मन की
    तू मुरीद बन जा !
    अनेक रंगों से सजे, संग- संग गुजारे
    खट्टे- मीठे कयी भावों में पल बीते हमारे
    बिखरती-संवरती, कभी चल-चल के ठहरती
    चलते रहे निरन्तर एक-दूजे के सहारे
    बस ख्वाहिश है इतनी,नित नव कीर्तिमान गढते
    निडर, निर्भिक, अनवरत् आगे बढते
    निराशाओं के भंवर में भी पुरउम्मीद बन जा !
    कठिन पथ पर चलकर, फ़तह हासिल करने की
    तू प्रतीक बन जा !
    जिसकी चाहत भी न की हो, वह सब हासिल हो तुमको
    मनचाहा वह वर मिले, तेरी खुशी की बस चाहत हो जिनको
    जिनकी हर ख्वाहिश को पूर्ण करने वाली मनभावन
    तू कल्पवृक्ष बन जा !
    कठिन पथ पर चलकर, फ़तह हासिल करने की
    तू प्रतीक बन जा !

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