Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • क्यों

    रक्त रंग जब एक सा है
    है सूरत सबकी एक सी
    फिर क्यों बाँटी है मानवता ,क्यों सरहद की लकीरें खींची हैं
    क्या ईश्वर ने बनाया है जाति-पाति
    यह सब मानव की करनी है
    एक ही धर्म है दुनियां में
    भिन्न भिन्न अज्ञानियों ने मानी है
    क्यों द्वेष ,अहिंसा और नफरत से
    ये प्यार की दुनिया बाँटी है
    आज इतिहास चित्कार रहा
    हमें लिख दो इतिहासकार सही सही
    हम सब हैं भारत देश के वासी
    फिर क्यूँ किसी धर्म के अनुयायी हैं
    सर्वधर्म आदर भाव बना रहे
    हम सब भाई भाई हैं
    किसी दलित को छू लेने से
    धर्म भ्रष्ट नहीं होता है
    ऐसे विचारों के कारण मंदिर में ईश्वर रोता है
    भ्रष्टाचार वह अंधकूप है ,जिसमें शोषण जल होता है
    इसी कारण इस धरती पर, दुर्बल हीन आज तक रोता है
    नहीं दिखता कि कहीं भी ,प्यार आदर संस्कार है
    क्यों चहुँ ओर फैला व्यभिचार है
    क्यों झोपड़ियों से महलों तक , घनघोर अँधेरा फैला है
    कुंठित हैं सब जन जन ,सूरज भी मटमैला है
    मन्दिर मस्जिद खूब बने हैं ,गिरजा गुरुद्वारों की कमी नहीं
    क्यों मानव ह्रदय स्थल में ,परोपकार की जगह नहीं
    क्यों सांस यहाँ टूटे सपनों सी ,आँखों नींद न आती है
    वेदना की परिभाषा इतनी
    कोई छाँव नहीं भाती है …..

  • कुछ मुझमे सीरत है तेरी

    ‘कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा..
    तू रह गुज़र सी है मुझमे,
    सब तुझसे ही है बसर मेरा..
    कभी सफर हुआ है मंज़िल सा,
    कभी हमसफर ही सफर मेरा..
    कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा..’

    ‘मीलों तक सन्नाटा सा कुछ,
    चादर जैसा था बिछा देखा..
    तू एक हलचल का मंज़र थी,
    जिसे न देखा तो क्या देखा..
    कुछ मैं भी मुअत्तर हूँ तुझसे,
    कुछ तुझमे भी है अत्तर मेरा..
    कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा.. ‘

    ‘शुरुआत नई थी कुछ पहले,
    कुछ चलते चलते वक्त गया..
    तेरे साथ गुज़ारा जो लम्हां,
    वो थमा नही बावक्त गया..
    कुछ तेरा सीधा सादापन,
    कुछ आसां नेक जिगर मेरा..
    कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
    कुछ तुझमे अब है असर मेरा..’

    – ‘प्रयाग’

    अर्थ :-
    मुअत्तर : सुगंधित
    अत्तर : इत्र
    आसां : सरल
    बावक्त : वक्त पर

  • पूरा का पूरा भीग जाऊं

    रिम झिम बर्षा
    बरसे जा
    भीतर का
    सारा जल उड़ेल दे ,
    ऐसे उड़ेल दे कि ऊपर की परत छिन्न-भिन्न न होने पाये
    तेरा प्रवाह मेरी नाजुक परत को छिल कर
    दूर बह न जाए,
    बल्कि मेरे भीतर समा जाए गहरे,
    पूरा का पूरा भीग जाऊं
    बाहर से अंदर तक,
    फिर नयी कोमल
    कोपल उगे मेरे भीतर से
    तेरे प्रेम की। …….

  • रक्षाबंधन

    कुछ इस तरह रिश्ते का मान रह जाए,
    तेरी राखी में बंधके मेरी आन रह जाए..

    तेरे बाँधे हुए धागे की गाँठ जो छूटे,
    मुद्दत्तों बाद भी उसका निशान रह जाए..

    रेत के टीले पर बचपन में घर बनाया था,
    आज इस उम्र में भी वो मकान रह जाए..

    बड़े गिलास में शर्बत के लिए लड़ते थे,
    काश वैसा ही आज भी गुमान रह जाए..

    दौड़ते दौड़ते साईकिल सिखाई थी तुझको,
    गुजरते वक्त को शायद ये ध्यान रह जाए..

    तूने बचपन में ली है मुझसे कई दफा रिश्वत,
    उन्हीं यादों में बसके मेरी जान रह जाए..

    ये सिलसिला कि तू कॉलेज में टॉप कर ले और,
    खिंचे बिना जो कभी मेरा कान रह जाए..

    मुझे पहले की तरह बात हर बताना तुम,
    भावनाओं का ना दिल में उफान रह जाए..

    कुछ इस तरह रिश्ते का मान रह जाए,
    तेरी राखी में बंधके मेरी आन रह जाए..

    – ‘प्रयाग धर्मानी’

  • याद आता है गांव

    याद आता है मुझको अपना गांव,
    वो बड़ा सा आंगन, वो नीम की छांव।
    बारिश के पानी में, चलती थी कागज़ की नाव,
    ख़ूब खेलते थे, धूप हो या छांव।
    जब से आई है ये बैरन जवानी,
    ख़तम हो गई बचपन की कहानी।
    एक – एक करके सखियां ससुराल चली,
    मुझे भी जाना होगा अब पी की गली।
    शहर से आया एक दिन एक कुमार,
    मुझसे शादी करने को हुआ तैयार।
    मां – पापा को था बस यही इंतजार,
    बाबुल की गलियां छूटी, आ गई पिया के द्वार।
    फ़िर भी अक्सर आता है याद गांव,
    वो बड़ा सा आंगन, वो नीम की छांव।

  • नशा

    ये नशा जो युवाओं के रक्त में घुल रहा है
    चलती फिरती लाशों का ये जहान हो रहा है
    जीवन की बगिया में खिलते पुष्पों को दबा रहा है
    कंकालों और हड्डियों की दुनिया बसा रहा है
    अपराध बढ़ रहे हैं ,गृह कलह हो रही है
    असमय सुहागिनें विधवा हो रही हैं
    बच्चे अनाथ हो रहे हैं, बेवक्त बुढ़ापा आ रहा है
    माँ बाप का सहारा ,बोझ बनता जा रहा है
    ये रक्त पी रहा है ,खोखला जिस्म कर रहा है
    मौत अँधेरे की ओर ,जिंदगी ले जा रहा है
    मान सम्मान जा रहा है ,सोंच गर्त में मिला रहा है
    इंसान मन को कुंठित बना रहा है
    नशे की मार से पूरा देश तड़प रहा है
    ये जीवन सुबह को संध्या बना रहा है
    नशा है बुरा ,इससे जीवन में न कोई आस है
    सोंच ले समझ ले ,अभी भी वक्त तेरे पास है
    फिर से खुशमयी जीवन ,पाने की अभी आस है
    गर समय निकल गया तो बाद में पछतायेगा
    नशा मुक्त भारत का सपना ,सिर्फ सपना रह जायेगा ….

  • बचपन की यादों से नोक झोंक

    चाशनी सी मीठी है ये बचपन की यादें
    ये अक्सर लिपट जाती है सीने से आके
    और खिलखिला के पूछती है की ऐसा क्या पाया ?
    मुझको खोकर भी ख़ुद को ना पाया, तो क्या कमाया?
    बहुत जल्दी थी ना तुमको बड़े होने की ?
    पैसा कमाने की,ख़ुद के पैरों पर खड़े होने की?
    तो फिर क्यूँ आज भी सिर्फ़ मुझको ही याद करते हो ?
    काश मैं लौट आऊँ बस यही फ़रियाद करते हो
    अफ़सोस, बीता वक़्त कभी लौट के नहीं आता
    अब इस सच्चाई के कड़वे घूँट पीना सीखों
    आने वाले कल को छोड़ो, आज में जीना सीखों !
    वरना ये पल भी हाथ से फिसल जाएगा
    थोड़ा और की चाहत में, जो है वो भी निकल जाएगा
    अब इस सच्चाई के कड़वे घूँट पीना सीखों
    आने वाले कल को छोड़ो, आज में जीना सीखों !
    ✍️Rinku Chawla

  • स्वागत कैसे करें तुम्हार

    कान्हा तेरो
    स्वागत है बारम्बार !
    जनमाष्टमी आए
    सबके जीवन में हर बार !
    मोर मुकुट तेरो सिर पे सोहे
    तू जन -जन के मन मोहे
    तेरो महिमा अपरमपार
    कान्हा तेरो स्वागत है बारम्बार!
    देवकीसुत वसुदेव के नन्दन
    नन्द- यशोदा करे तेरो अभिनन्दन
    मेरो बन्दन भी करो स्वीकार
    कान्हा तेरो स्वागत है बारम्बार!
    त्रस्त हैं सब वसुधा के बासी
    अदृश्य शत्रु करे हमरो उपहासी
    चुप काहे है तू तेरे नयन हैं हजार
    कान्हा तेरो स्वागत है बारम्बार!
    तेरो जन्मदिन कैसे मनाये
    मन व्यथित है कैसे सोहर गाये
    व्याधि से मुक्त करा, करो सबपे उपकार
    कान्हा तेरो स्वागत है बारम्बार !
    देखो कैसे जी रहे डर-डर के
    तरस गए हैं अपनों के दरश के
    सब हंस के मनाये यह त्यौहार
    कान्हा तेरो स्वागत है बारम्बार!
    सुमन आर्या

  • चलता जा रहा है सुबह शाम आदमी

    कहीं खो गया है आभासी दुनिया में आदमी
    झुंठलाने लगा है अपनी वास्तविकता को आदमी
    परहित को भूलकर स्वहित में लगा है आदमी
    मीठा बोलकर ,पीठ पर वार करता है आदमी
    चलता जा रहा है सुबह शाम आदमी
    पता नहीं किस मंजिल पर पहुँच रहा है आदमी
    अपनी तरक्की की परवाह नहीं है
    दूसरों की तरक्की से ,जल भुन रहा है आदमी
    मन काला है ,पर ग्रंथों की बात करता है आदमी
    दूसरों को सिखाता है ,खुद नहीं सीखता है आदमी
    अपने अन्दर अहम को बढ़ा रहा है आदमी
    पर सुव्यवहार की उम्मीद,दूसरों से कर रहा है आदमी
    क्यूँ आज भीड़ के बावजूद ,हर कोई है अकेला
    दिलों में बसा हुआ है तू मै का झमेला
    बंट गयी है सारी ज़मीन ,ऊँची ऊँची इमारतों में
    या फिर घिर गयी ज़मीन कोठियों की दीवारों में
    सत्य है ,टूटे ख्वाबों की नीव पर खड़े ये ऊँचे महल
    इस ऊंचाई को भी एक दिन जमीन पर सोना है
    अपनी जरूरतों और इच्छाओं की मत सुन
    सब कुछ पाने के बाद भी इसे खोना है
    धर्म मजहब भी ये कहते हैं
    हर एक प्राणी से तुम प्रेम करो
    गीता ,ग्रन्थ ,कुरान में लिखा है
    नेक चलो सब का भला करो
    जिस शक्ति ने किया है पैदा
    भेद किसी से किया नहीं
    प्रेम ,संस्कारों के सिवाय रब ने कुछ लिया नहीँ
    वक्त की बात मानकर ,अब बदलना होगा हमें
    हर धर्म मजहब का अदब करना होगा हमें
    अभिमान और नफ़रत से सिर्फ मिलता है पतन
    आओ सब मिलकर बनाएं एक सपनों का वतन।।

  • बचपन

    फूलों ने जब साथ दिया,
    मैं भी महकना सीख गया
    चिड़ियों ने जब साथ दिया,
    मैं भी चहकना सीख गया
    चलना गिरना, गिरकर चलना,
    लगा रहा यह जख्मो भर
    पापा की जब उंगली थामी,
    तब मैं भी चलना सीख गया
    जीवन के कुछ अनुभव लेने
    घर से बाहर निकला था
    देख के उनकी मोहक सूरत
    दिल से अपने फिसल गया
    छोड़ दिया जिसके खातिर,
    मैंने अपने जीवन को
    वह मुझे छोड़कर बीच डगर में
    घर को अपने निकल गया
    मैं डूबा था जिसकी आंखों में
    ख्वाबों में जिसके खोया था
    वह दिल में मेरे बसती थी
    जिसकी खातिर मै रोया था
    जो कभी नहीं हारा
    बिन कोशिश हरदम जीत गया
    लाख कोशिश की मगर
    वह अपनो से ही हार गया।

    जेपी सिंह ‘अबोध’

  • पतंग

    पतंग को देख कर आज उड़ने को मन हुआ
    फिर पैरों में पड़ी जंजीर देखकर मन थम गया

  • कृष्णा- जन्म

    रात थी गहरी, काली, अंधियारी
    जब जन्मे थे, गोपाल – गिरधारी।
    भाद्रपद का मास था, कृष्णा पक्ष की अष्टमी,
    दिन, उस दिन बुधवार था, नक्षत्र था रोहिणी।
    वसुदेव, देवकी के खुल गए ताले,
    सो गए सारे पहरे वाले।
    आई काली घनघोर घटाएं, बेशुमार जल बरसाती जाएं
    उधर कंस का डर सताए, नन्हा बालक कहां छिपाएं ।
    वसुदेव को फ़िर आया ध्यान, एक परम मित्र का नाम ।
    चल दिए कान्हा को लेकर, वसुदेव नंद के ग्राम ।
    सिर पर लेकर एक टोकरी, उसमे कान्हा को लिटाया,
    देखो जमना जी का भी, जल – स्तर था बढ़ आया
    बारिश हो रही थी छम – छम, मेघ बरस रहे थे झम – झम
    शेषनाग ने करा था साया, जमना जी ने चूमे प्रभ – पांव ।
    वर्षा भी अब थम चुकी थी,
    देवकी – नंदन आ गए नंद के गांव ।
    इस तरह पहुंचे वसुदेव नंद के धाम,
    जय हो कृष्णा ,हाथ जोड़कर तुम्हे प्रणाम।🙏

  • वक़्त

    इंसान एक कठपुतली है ,जो वक्त के हाथों चलती है
    आती जाती सांसों पर ,वक्त की गिनती रहती है
    वक्त जब अंगड़ाई लेता है ,सूर्य ग्रहण लग जाता है
    वक्त सौदागर होता है ,प्रतिपल जीवन संग खेलता है
    समय जब निर्णय करता है ,इंसान सिर्फ बेबस होता है
    अपनापन तो हर कोई दिखाता
    पर अपना कौन है ये वक्त बतलाता
    बिना वक्त की इजाजत के ,कोई काम न जग में होता है
    जान यह सच्चाई सब ,क्यूँ व्यर्थ वक्त को खोता है
    आदर्श विचारों को जग में
    वक्त ने उच्च मुकाम दिलाया है
    मुगलों ,अंग्रेजों के दम्भ को
    मिट्टी में भी मिलाया है
    समय आवाज लगाता है ,असाधारण हूँ बतलाता है
    जब वक्त अच्छा होता है ,इंसान सर्वोपरि होता है
    बुरा समय जब आता है ,राजा रंक बन जाता है
    सोना भी मिट्टी बन जाता है
    जीवन में नैराश्य समाता है
    इंसान की बिसात ही क्या
    समय संम्मुख ,प्रबल पर्वत भी झुक जाता है
    नेता की गद्दी छिन जाती है ,बुद्धिमान की मति फिर जाती है
    समय नहीं है ठहरा पानी
    समय समेटे कई कहानी
    याद दिलाए सबकी नानी
    समय की सीमा आनी जानी….

  • यशोदा प्यारे कृष्ण

    यशोदा प्यारे कृष्ण

    कहें यशोदा मैया कान पकड़ कान्हा से
    तंग हुई मैं लल्ला अब तेरे शरारत से
    सुनो लल्ला माखन चोरी की आदत छोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    छूप-छूप कर तुने सारे माखन हैं खाये
    दही माखन को तुने घर में है गिराये
    मेरे लल्ला अब सारी मस्ती तो छोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    बहुत किया है तंग मुझे माखन गिराकर
    भोली भाली सूरत बना इठलाकर
    सुनो लल्ला मथनी रस्सी अब ना तोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    गली मोहल्ले में तुने तंग किया है सबको
    अपनी मर्जी करके परेशान किया है मुझको
    मान जा कहना मेरा अब जिद छोड़ो
    मेरे प्यारे कृष्ण मुरारी मटकी ना फोड़ों

    महेश गुप्ता जौनपुरी
    गनापुर अजोसी मड़ियाहू जौनपुर उत्तर प्रदेश
    मोबाइल – 9918845864

  • कृष्णलीला

    *कृष्ण लीला*

    तू दधि चोर तो; तोही न छोडूं,
    पकड़ बांह तोरे; कान मरोड़ूँ !
    लल्ला मेरो मोही हिय ते प्यारा
    तोसे कुढ़त गोकुल ब्रिज सारा

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    जग के पालक: जननी के बालक,
    प्रहसन करते; जग संचालक !
    जड़ चेतन बंशी सुन हिलते!!
    ग्वालन संग जमुना तट मिलते,

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    गाय चरैया, पर्वत को उठइया,
    बिषधर को, जमुना में मरैया !
    पुरबाशिन को लाज न आवत,
    मोरे लल्ला को, चोरी लगावत!!

    *खा सौं अब तू मोरी,*
    *न करिहउँ अब मै चोरी* !!

    धीरेन्द्र प्रताप सिंह “धीर”
    भूत पूर्व सैनिक
    रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

  • ओ मैया! मोरी

    ओ मैया! मोरी पीर बड़ी दुखदायी
    सब कहें मोहे नटवर-नागर
    माखनचोर कन्हाई।
    तेरो लाला बरबस नटखट
    कब लघि बात छपाई।
    ओ मैया! तेरो कान्हा
    माखन बिखराई।
    सो खावत सो माखन-मिसरी
    ग्वालन खूब खिलायी।
    फोड़ दई मोरी मटकी- हांड़ी
    गऊवन देत ढिलाई।
    पनघट पे नित बंशी बजावत
    मोरी सुधि-बुधि सब बिसराई।
    राह चलत नित छेड़त नटखट
    छोड़े ना मोरि कलाई।
    सुनि गोपिन के वचन कन्हैया
    मन्द-मन्द मुसकायी।
    ना मोसे फूटी मटकी-हांड़ी
    नाहि गउवन दियो ढिलाई।
    कान पकड़ि खींचे यशोमति माई
    रोवत कृष्ण कन्हाई।
    ब्रजगोपी सब बैरन लागें
    झूठी चुगली करें तोसे माई।
    चूमि-चूमि मुख गीलो नित करि
    ग्वालिन मोहे रोजु नचाई ।
    नाचि-नाचि पग पड़ि गये छाले
    कमर लचकि गई माई।
    ग्वालिन माखन खारा- खट्टा
    बड़ो मीठो लगे तेरो माई।
    ग्वाल- बाल सब चोरी कीन्ही
    दोष लगावे मोहे माई।
    मैं तेरो भोलो-भालो कान्हा
    चोरी ना आवे मोहे माई।
    कान्हा के सुनि वचन यशोदा
    हँसि-हँसि लेति बलाई।
    ब्रह्मा, विष्णु, शंकर रीझत
    नंदलाला की देखि चतुराई।
    मोर-मुकुट प्रभु औरु चन्द्रमुख
    ‘प्रज्ञा’ बलि-बलि जाई।
    ‘प्रज्ञा’ के प्रभु कृष्ण-कन्हैया
    धन्य यशोदा माई।

    काव्यगत सौन्दर्य-
    कृष्ण के बाल-चरित्र की शरारतों का सजीव तथा भावात्मक चित्रण।

    भाषा:-ब्रज,अवधी
    छन्द:-गेय पद
    रस:- वात्सल्य
    गुण:-माधुर्य
    अलंकार:-पुनरुक्ति, अनुप्रास, रूपक, उपमा।

  • अपना गांव

    बहुत ढूंढा, बहुत कोशिश की, बहुत आवाज लगाई।
    लेकिन वह वापस ना आया, वह बचपन था मेरे भाई।
    गांव की गलियों में खेलना, कूदना, दौड़ना, भागना,
    गलती छुपाने के लिए हर बात पर, मां की कसम खाना,
    सब कुछ छूट गया, अपनों तक, बीते वक्त के उस दौर में
    अब हम उलझ चुके है, दो वक्त की रोटी, रहने के ठौर में,
    जिस गांव को छोड़ना, ना चाहता था कोई गांव का भाई,
    रोटी के खातिर अब शहर में, करना पड़ रहा उसे कमाई।।

    जिस हाथ से वो गाव में ,
    मिट्टी की मूर्ति बनाता था
    जाकर अब वह शहर में ,
    डबलरोटी बनाता है
    सपनों को अपने तोड़ कर
    अपने घर को छोड़कर
    खुद चुपके से रोकर वह,
    अपनो को खूब हसाता है।

    जेपी सिंह ‘ अबोध ‘

  • मैंने देखा है ,शैतान ! इंसानों में

    दानव तो है, यूं ही बदनाम
    ग्रंथ-पुराणों में ,
    मैंने देखा है,शैतान! इंसानों में।

    रूह कांप जाए; हृदय फट जाए,
    हैवानियत की हदें पैर फैलाए‌।
    शर्मसार होती है मानवता ;
    सुर्ख़ियों के गलियारों में,
    मैंने देखा है, शैतान! इंसानों में।

    वो कोमल सी,
    नन्ही पंखुड़ी जैसी,
    करहाहट ; उसकी पपीहे जैसी,
    पर; नोचता रहा ,उसे वो हैवान!
    बहता खून; उसके शोषण की कहानी थी ।
    फिर भी बच जाते , ऐसे खूंखार!
    सत्ता ,कानून के दलालों से,
    मैंने देखा है, शैतान! इंसानों में।

    —-मोहन सिंह मानुष

  • माखन चोर 🙏

    छूप छूप के खाये माखन
    है ये माखन चोर
    बड़ा नटखट है
    प्यारा नंद किशोर

    घुसे घर में मित्रो के संग
    देखी माखन की मटकी
    देखा खूब सारा माखन
    सबकी नज़र उसी पे अटकी

    खाये माखन मस्ती में मित्रो के साथ
    देखा आ रही माँ यशोदा
    भागे सब इधर उधर
    बच गए सब
    बस माखन चोर का पकड़ लिया हाथ

    पकड़ के कान्हा के कान को दिया कस
    बह रहा कटोरी से माखन का रस
    बोले क्यों नहीं समझता तू
    बहुत बदमाशी करली अब बस

    छलका के आंसू
    दिखाई भगवन ने लीला
    देख आंसू माता ने
    अपना हाथ कर दिया ढीला

    मन मोहित रूप देख
    माँ ने लगाया नंदलाल को गले
    माता का सुख पाके
    फिर कान्हा माखन चोरी करने चले

    – हिमांशु ओझा

  • कुछ नया करते

    चलो कुछ नया करते हैं,
    लहरों के अनुकूल सभी तैरते,
    चलो हम लहरों के प्रतिकूल तैरते हैं ,
    लहरों में आशियाना बनाते हैं,
    किसी की डूबती नैया पार लगाते हैं l

    चलो कुछ नया करते हैं,
    दुश्मनों की आँखों का सूरमा नहीं,
    आँखे निकाल लाते हैं,
    चलो दुश्मनों से  दुश्मनी निभाते,
    दोस्तों पे कुर्बान हो जाते हैं l

    चलो कुछ नया करते हैं,
    दूसरों का श्रेय लेना बंद करते हैं,
    पीठ – पीछे  तारीफ करते हैं,
    चलो साजिश करना बंध करते,
    प्रेमभाव बढ़ाते हैं l

    चलो कुछ नया करते हैं,
    असामाजिक तत्व को आंख दिखाते,
    फ़न मारने से पहले फ़न कुचलते हैं,
    चलो बुराई के खिलाफ लठ उठाते हैं,
    पीड़ित का सहारा बन जाते हैं l

    चलो कुछ नया करते हैं,
    हार के बाद भी सबके  दिलों को छू जाते हैं,
    एक  और कोशिश करते हैं,
    चलो जीवन को लचीला बनाते हैं,
    हर सुबह नई चुनौती का स्वागत  करते हैं,

    चलो कुछ नया करते हैं ,
    फ़िजा में नई उमंग घोलते है,
    जीवन में उल्लास भरते हैं,
    जो जीना भूल गए हैं,
    हर पल को जीना सिखाते हैं l

    चलो कुछ नया करते हैं ,
    जिंदगी को यूंही नहीं खोते,
    दो दिन की जिंदगी है,
    कुछ खास करके जाते हैं,
    चलो कुछ पल अपने लिए जीते हैं l

    चलो कुछ नया करते हैं,
    मुझे क्या पड़ी है….. अब बोलना छोड़ दो,
    जुल्म ढाने वाले को, बलून की तरह फोड़ दो,
    चलो कुछ नया करते हैं ……. l

                                   Rajiv Mahali

  • दूसरी मुलाक़ात

    पहली मुलाक़ात थी अधूरी सी
    दूजी को हम तरस रहे,
    भूल ना रहे उन लम्हों को
    बादल प्रेम के उमड़ रहे।।

    भूखे- प्यासे हम भटक रहे
    आंखों में उनकी तस्वीर लिए,,
    उनका नाम, न ठिकाना जाने
    फिर भी दिन उनके नाम किए ।।

    दिल बहलाने को फिर एक दिन
    यूं ही लाइब्रेरी में प्रवेश किए,
    किताबें प्रेमचंद्र की वो ढूंढ़ रहे
    हम अपने प्रेम को तलाश लिए।।

    मुस्कराकर फिर कुछ बातें हुई
    और एक – दूजे के नाम मिले,
    ज्योंहि अगले मिलन के वादे हुए
    मानो सूखे में बदल बरस पड़े।।

    इस मिलन से ही फिर
    कहानी में नई शुरुवात हुई,
    दो दिलों की फिर यूं
    ख़त्म दूसरी मुलाक़ात हुई।।

    अनुज कौशिक
    अगर आपने “पहली मुलाक़ात” नहीं पढ़ी तो मेरी प्रोफ़ाइल पर को भी पढ़ें।

  • गरीबी

    गरीबी एक एहसास है,
    इसमें एक मीठी सी दर्द है,
    रोज़ की दर्द में भी संतोष छिपी है,
    फकीरी में अमीरी का एहसास है,
    शायद यही गरीबी है l

    मुर्गे की बांग  से सुबह जग जाना,
    नई उलझनों में फंस जाना,
    उलझनों को सुलझाने की कोशिश करना,
    पक्षी की चहक के साथ घर वापिस आना,
    शायद यही गरीबी की पहचान है l

    गरीबी में न टूटना,
    जरूरतों मे भी न झुकना,
    ज़रूरतों को कर्म से पूरी करना,
    विफलताओं में ईश्वर को कोसना,
    शायद यही गरीबी रेखा है l

    कल की राशन को आज सोचना,
    बच्चों को गले लगा नीत काम में निकल जाना,
    नीर पी दिवा बिता लेना,
    फिर बच्चों के लिए कुछ लाना,
    उनकी हंसी से थकान दूर हो जाना,
    शायद यही गरीबी की निशानी है l

    अपनों की ज़रूरत का पूरी न कर पाना,
    घर आकर झल्ला उठना,
    दूसरे दिन फ़िर से कोशिश करना,
    गरीबी की दर्द को भाग्य समझ लेना,
    शायद यही गरीबी की लकीर है l

    दर्द में थोड़ी खुशियाँ ढूंढ लेना,
    आज की शौक को सालों में पूरा करना,
    बच्चों का आदर्श बन जाना,
    जीवन को धूप और छांव से श्रींगार करना,
    शायद यही गरीबी में संतोष है l

    मिट्टी को विस्तर, आसमान को चादर समझना,
    अँधेरी रात में चाँद को निहारना,
    बेफिक्र होकर खर्राटे लेना,
    दिन में भाग्य बदलने का अथक प्रयास करना ,
    शायद यही गरीबी से जुझना है l

    हर रोज नई उड़ान भरना,
    थक के चूर हो जाना,
    गिर के फिर सम्भल जाना,
    ग़रीबी में हर भाव का होना,
    यही भाव फकीरी को अमीरी बनता l
    फकीरी को अमीरी बनता ll

    Rajiv Mahali

  • कहाँ कुछ है मेरा

    मेरा वजूद भी तेरा
    ———***——-
    मेरा वजूद भी कहाँ रहा मेरा
    इसपर चढ़ा हर रंग तुम्हारा है ।
    छूटे माँ पापा, कहाँ मैका अब मेरा
    तेरा घर ही अपना बसेरा है ।।

    मैं ही नहीं,कहाँ अब नाम भी है मेरा
    सात फेरो के बंधन से हर साँस है तेरा ।
    माथे की बिंदी हो या मांग पर सिन्दूर की लाली
    मेरा वजूद तुझबिन वृहद् आकाश सा खाली ।।

    कंगन की खनखन हो या पाजेब की छनछन
    सभी तुझसे ही शोभित जाने है ये अन्तर्मन ।
    अफसोस है इतना बदला क्यू खुद को इतना
    खुद को भूल खुद से जोङा तुझसे हर सपना ।।

    इबादत की तुम्हारी,घर को जन्नत सा सजाया है
    पर भला तुमने कहाँ कब मुझे अपना सा-जाना है ।
    ना मैका है अपना, ना तुझ संग अपना ठिकाना है
    कहाँ जाए, छलावा-सा हर बेटी का, कैसा फसाना है ।।

    काश! सिर्फ औरत नहीं इन्सान समझा होता
    माँ बहन बेटी की तरह हमें भी सम्मान दिया होता ।
    हमारी उलझनों को भी, संयम से, सुलझाया होता
    फिर डांट डपट चाहे जितनी भी कसक दिया होता ।।

    कोई भी गाङी पहिये के सही तालमेल से चलती है
    नहीं तो, मन्जिल तक कहाँ, कब ढंग से पहुँचती है ।
    लङ के कुछ कहाँ हासिल, कहाँ ऐसे जिन्दगी संवरती है
    सुमन आर्या

  • माखन

    कविता- माखन
    ————————

    नटखट लाला नयनो के तारा, छोड़ दे तू सब काम निराला|

    मैं सह लूंगी बात तुम्हारी,
    आए शिकायत रोज तुम्हारी|
    सुन सुन के मै हार गयी हू,
    गगरी फोरा सब की सारी,

    घर का ही तो माखन चुराए,
    बाल सखा संग माखन खाए|
    खा ले बेटा दुख नहीं मुझको,
    दुख तो मुझको माखन गिराए|

    डांट में तेरे प्यार छिपा है,
    माखन से मीठा हाथ तेरा है|
    कानों को तूने जब-जब पकड़ा,
    माना हमने प्यार मिला है|

    देख जरा तू अपना साथी,
    छोड़ तुझे वे भाग चले हैं|
    कर ले मिताई मुझसे बेटा,
    दूध दही सब तेरे लिए है|

    बिगड़ गया है इनके संग|
    छोड़ दे बेटा इन सब का संग|
    जो करना है तो घर में कर ले,
    मत कर बेटा सब के संग|

    सब कोई तुझको न जान सकेंगे,
    ना बेटा तुझको पहचान सकेंगे|
    समझ ले बेटा मेरी ममता की कीमत,
    कोई तुझको डांटे हम सह न सकेंगे|

    प्रेम रतन धन अनमोल खजाना,
    आजा मेरे मदन गोपाला|
    जब जब आउ इस दुनिया में,
    हो मेरा बेटा तू नटखट लाला|नटखट लाला………

    कवि -ऋषि कुमार “प्रभाकर ”
    पता- ग्राम खजुरी खुर्द ,थाना-तह.कोरांव
    जिला- प्रयागराज, उ. प्र.
    पिन कोड 212360

  • बहना की मुराद

    39: बहना की मुराद
    *************

    बहना की मुराद हुई पूरी
    भाई का आना था जरूरी
    बरसों से चाह थी उस सावन की
    जिसकी पूर्णमासी को भाई की
    सूनी कलाई पे, होगी मंगल कामना की
    रेशम के धागे से बंधी अरमानों की डोरी
    हर साल राखी देख मन को समझाती
    खुद के प्रश्नों में खुद को उलझाती
    देखते देखते राखी आके चली जाती
    हर बार रह जाती कामना अधूरी
    फिर सुना भाई बहन का है एक और त्योहार
    बहन बजरी कूटती,आशीष देती बार-बार
    जीभ में रेगनी चुभा गाली की करती बौछार
    मंगल कामना की लालसा भाई दूज को हुईं पूरी
    अबतक जो आश थी अधूरी जाके अब हुई पूरी
    मन हर दिन अपनों की खैर मनाता है
    हर पल अपनों की याद दिलाता है
    भाई बहन की दूरी अन्तर्मन को जलाता है
    भाई बहन में ना हो कभी कोई दूरी

  • पकड़ मत कान री मैया

    पकड़ मत कान री मैया
    कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।
    शिकायत कर रही झूठी
    कहानी सच की बताऊँ मैं ।।
    करूँ क्यों मैं भला चोरी
    घर में हैं बहुत माखन।
    नचाती नाच छछिया पे
    चखूँ मैं स्वाद को माखन।।
    चूमकर गाल को मेरे
    करती लाल सब ग्वालन।
    छुपाने को इसी खातिर
    लगाती मूँह पे माखन।।
    सताई सब मुझे कितना
    तुझे कैसे बताऊँ मैं?
    पकड़ मत कान री मैया
    कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।।
    शिकायत कर रही झूठी
    कहानी सच की बताऊँ मैं।।
    चराए शौख से कन्हा
    मिलकर ग्वाल संग गैया।
    गरीबी में करे कोई
    मजूरी हाथ से मैया।।
    भरन को पेट मैं इनके
    घर -घर खास की जाऊँ मैं।
    ‘विनयचंद ‘हो मगन मन- मन
    लीला रास की गाऊँ मैं।।
    पकड़ मत कान री मैया
    कसम कुण्डल की खाऊँ मैं।
    शिकायत कर रही झूठी
    कहानी सच की बताऊँ मैं।।

  • अरमान हमारे

    46: अरमान
    ———***—–
    विभिन्न धर्मों की मिली-जुली गूंज
    सदियों से हमारी माटी के कण-कण में विद्यमान है ।
    हमसब के मन-मन्दिर में बसते,
    जन-गण के नायक बस श्रीराम हैं ।।

    जहाँ मन्दिरों के घंटे,मस्जिदों की अजान है
    गुरूद्वारो की गुरूवाणी, चर्च की प्रार्थना,
    संग-संग गुन्जमान हैं ।
    हाँ, यह हमारी प्रचानीता में समाहित
    मजबूत समावेशी भारत की सशक्त पहचान है ।।
    यह विजयप्रतीक नहीं
    मानवता मर्यादा मूल्यों का पुनः
    प्रतिष्ठिकरण का आगाज़ है,
    हमसब एक हैं यही हमारी संस्कृति का अभिमान है ।।
    नव भारत,सशक्त भारत, समावेशी भारत की
    नयी इबारत लिखनी है
    धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक,नागरिक
    अधिकारों को संरक्षित रखने की हिमायत करनी है
    सनातन धर्म हो, सिर्फ इस धरा पर,
    बस यही अरमान हैं।
    सब के—
    सुमन आर्या

  • कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की

    कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की
    कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की
    मर्यादा राम की इस भू पे सीता की इस पवित्र जमीं पे
    कुछ तो सम्मान करो निज भू की ।
    कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
    तेरे मात-पिता-भाई-बहन को पाला है, इस भू ने।
    अपनी छाती चीर-चीर के दिया है, तुझे अन्न-जल, मान व सम्मान रे!
    भूखे रह जाते तु, प्यासे मर जाते अगर भू-माता की कृपा ना होती ।
    कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
    तेरी हर एक खुशी के खातिर किया है माता ने खुद को निराशा रे!
    तु खुश रहें जहां में यही तो हैं मा का आशा रे!
    आशा-निराशा के बंधन में भी तुझे माता ने संभाला है ।
    कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
    आज भी रोती अपनी प्रारब्ध पे ये माता, दुर्जनों ने किया है आँचल इसका मैला
    अगर तुझे निज मातु सम्मान है तो करो अपनी संस्कृति-धर्म व भू की बचाव रे!
    अगर तु नहीं किया तो तु मातु सुत बेकार है ।
    कुछ तो शर्म करो, लाज रखो निज राष्ट्र की ।।
     विकास कुमार

  • रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।

    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    मात-पिता को छोड़ अब वह सुत प्यारा,
    अब तो सास श्वसुर के पास रहते हैं ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    इधर-पिता माता अन्न-जल को तरसे,
    उधर वह सास-श्वसुर को मालपुआ खिलाते है ।
    इधर मात-पिता झोपड़ी में बसर करते,
    उधर ससुराल में वह भवन बनाते है ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    इधर भाई मूर्ख वरदराज पडें है,
    उधर साले साहब को कालिदास बनाते है ।
    इधऱ भाई दाने-दाने को तरसे,
    उधर वह साले-साहब को रेस्टूरेण्ट में भोजन कराते है ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    धर बहन युवती पड़ी है,
    उधऱ साली-साहिबा की मंडप सजाते है ।
    इधऱ बहन की आबरू लूटी जा रही है,
    उधर वह साली-साहिबा की इज्जत के ठेके ले रखे है।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    इधऱ इनकी मुफलिसी पे जहां हँसे,
    उधऱ वह अपनी रईसी जहां को दिखाते है ।
    इधऱ इनकी मुफलिसी मौन है,
    उधर वह अपनी रईसी में गुम है ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    इधऱ मात-पिता, भाई-बहन.
    अपनी किस्मत पे रोते,
    और उधर वह निज सास-श्वसुर,
    साले-साली साहिबा में गुम है ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    इधर मात-पिता निज बहु को तरसे,
    उधर वह निज मात-पिता में गुम है ।
    इधर भाई-बहन स्व भाभी को तरसे,
    इधर वह निज भाई-बहन सखियों में गुम है ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं
    इधर ननद भाभी को तरसे,
    उधर वह अपनी सखियों में गुम है।
    इधर ननद निज मात-पिता की सेवा करती,
    उधर बहु निज मात-पिता में गुम है ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    शर्म भी इनसे शर्म हो चुकी है ।
    लज्जा तो इन्हें आती नहीं, ये निर्लज्ज कहलाते हैं ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    इधर-उधर की बातों को अब क्या कहें हम लोगों से ।
    यह तो दहेज का दुष्परिणाम है ।
    यहीं तो जहां का विधान है ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    न दहेज की माँग होती,
    न रूठती दुल्हन घर की ।
    न नैहर रहती सदा के लिए ।
    न मा-बाप दुल्हन को तरसती,
    और न भाई-बहन भाभी को तरसते ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।
    अन्ततः यही कहना हैः-
    दहेज के सम्बन्ध में
    दहेज घातक होता सभी के लिए ,
    क्योंकि इसके कारण मर जाती युवतियाँ अविवाहित ।
    शर्म करो मानव-3 समझों रिश्तों की अहमियत को,
    कुछ तो कद्र करो, जहां में रिश्तों की ।
    रिश्तों के बाजार में अब तो नाते बिकते हैं ।

     विकास कुमार

  • चितचोर

    मोहक छवि है कैसी, मनभावन कान्हा चितचोर की।
    माखनचोरी की लीला करते ब्रिज के माखनचोर की।।

    वसुदेव के सुत, जो वासुदेव कहाते थे
    नन्द बाबा के घर में नित दृश्य नया दिखाते थे
    यशोदानन्दन नामथा जिनका मुख में ब्रह्माण्ड दिखातेथे
    बात- बात में जो गिरिवर को कनिष्ठा पर उठाते थे
    अपने सदन में छोङ,घर-घर माखन छिप कर खाते थे
    यह दृश्य है ग्वालबाल की टोली के सरदार की।
    मोहक—-

    माँ जशोदा थी बाबा नन्द की पटरानी
    नौ लाख गौवन की थी वो गोकुल की महारानी
    नित सवेरे दधी मथकर माखन को सिक पर रखती थी
    कुछ पल में माखन मटके से, ना जाने कैसे घटती थी
    चिन्तित थी वो देख पतीला खाली
    माखन कहाँ गया बता दे कोई आली
    क्या करू कैसे ख़बर लूँ उस माखनचोर की ।
    मोहक—–

    योजना थी छिपकर चोरन को देखन की
    पर यह क्या, ये मण्डली है अपने कृष्णन की
    बङे शान से निजगृह में चोरी करन गोपाल हैं आयो
    बंधुजन ने तुरत लियो हैं झुककर पीठ चढायो
    कुछ खायो हैं कुछ आनन पर लपटायो
    मित्र जनों को भी संग खाने का पाठ सिखायो
    शब्द नहीं दृश्य हैं ,ऐसो माता हुई, विभोर की।
    मोहक—-

    मैया ने मन को संभाला, कान पकङकर कृष्ण को थामा
    चोरी क्यू की अब तो बता दे,जो कहना है वो भी सुना दे
    मैया मैंने चोरी कहाँ की,जले हाथों में पीङा बङी थी
    जलन की पीड़ा मिटाने,मैं तो चला था माखन लगाने
    मुख पे जो चींटी लगी थीं,मैं लगा था उसको भगाने
    मुखपे है बरबस लपटाये,मुझे तो चाहत है तेरे कोर की ।
    मोहक—

    सुनकर कृष्ण की मीठी बातें सहसा ली गोदी में उठाके
    कान्हा तू पहले बताते,क्यू छिपकर हो माखन खाते
    तू तो जन-जन को भाते,फिर काहे को हो सताते
    मैया मैंनो चोरी कहाँ की,ये करनी है मेरे सखा की
    मुझे तो लत है माखनमिश्री व तेरे आँचल के छोङ की।
    मोहक—-
    सुमन आर्या

  • माखन नहीं चुरायों है!

    भ्रम हुआ है तुमको, मैया !
    भोला तेरा कृष्ण कन्हैया,
    माखन नहीं चुरायों है।

    लांछन लगाएं ब्रजबाला,
    ग्वालिन बड़ी ही सयानी चपला,
    मुझको बहुत नचायों हैं,
    ना नाचूं तो चोर बताएं!
    और मुख पर माखन बहुत लगाए।

    अगर नाचू तो; खुद ही खिलाएं !
    मगर कमरिया नाजुक-सी मोरी ,
    किस-किस का दिल बहलाए रे !
    बहुत सताती हाए!वो मैया!
    भोला तेरा कृष्ण कन्हैया
    माखन नहीं चुरायों हैं।

    मैया तू मुझसे क्यो रूठी,
    बात बताओ! सच्ची है या झूठी?
    मैं नहीं क्या तुम्हारा लल्ला?
    दाऊ भैया ! बहुत चिढ़ाए,
    बाजार से खरीद तुम लाएं,
    आंसू बहाकर मोहन बोलें!
    मेरी मां से मिलाओं ,मैया!
    भोला तेरा कृष्ण कन्हैया,
    माखन नहीं चुरायों हैं।

    जज़्बाती हो ;यशोदा घबराई!
    कान छोड़ , ममता दिखलाई।
    झूठ कहता है ,तेरा भैया!
    मैं ही तो हूं तेरी मैया,
    तू है मेरा प्यारा कन्हैया।
    गले लगाकर आंखें पूछीं,
    नटखटता , इक पल में भुली।
    कान्हा पहले आंचल में छुपे,
    मन्द -मन्द वो फिर मुस्कुराएं,
    झूठ-सांच का घोल पीला कर
    मैया जी को लिया मनाएं।
    भोला तेरा कृष्ण कन्हैया
    माखन नहीं चुरायों हैं।
     
    ———मोहन सिंह मानुष

  • फिर-फिर तुझको तोल रहा हूँ

    प्रियतमे तेरे स्वरूप का
    कैसे वर्णन करूँ अब मैं,
    सब उपमान सुंदरता के
    आ गए पूर्व की कविता में।
    काले बादल से सुन्दर बाल,
    कमल की पंखुड़ियों से गाल,
    झील सी आंख, शुक की सी नाक
    हाथी सी मदमाती चाल ।
    चाँद सा चेहरा, कोयल सी बोली
    इन सब में अब तक तू तोली ,
    फिर-फिर तुझको तोल रहा हूँ
    तुला पुरानी है घटतोली।
    अज्ञेय कह गए थे यह सब
    उपमान हो गए मैले अब,
    तब भी मैं इन उपमानों से
    तुझे सजाता हूँ अब तक।
    तेरी सुंदरता पर अब तक
    मैं खोज न पाया नए शब्द
    जिससे निस्तेज रही कविता
    कलम रही मेरी निःशब्द।

  • मां

    मां मैं तुमसे कुछ आज कहूँ।
    जग से प्यारी तुम मेरी मइया,
    नंदबाबा का मै अनमोल कन्हैया,
    फिर क्यू दाऊ है मुझे चिढाए ,
    मैं काला मां तू क्यू गोरी,
    नंद मुझे क्या मोल के लाए,
    माँ मुझे यही कह भइया चिढाए,
    कहो मइया मैं नंद गोपाल,
    हूँ तेरी आंखो का मै दीपक,
    कान पकड़ मैं बोल रहा हूँ,
    खीझ कराऊ ना मइया तुझको,
    अब तेरी बातों का मान करूँ,
    ना खाऊं माखन चोरी करके,
    ना चटकाऊ अब गोपियों की मटकी,
    फिर भी मां ये जब मुझे सताए,
    आ के मैं तेरे आँचल में छिप जाऊं
    माँ मैं तुमसे कुछ आज कहूँ, ।।
    सिन्जू मौर्या

  • माखनचोर

    मात हमारी यशोदा प्यारी,सुनले मोहे कहे गिरिधारी
    नहीं माखन मैनु निरखत है,झूठ कहत हैं ग्वालननारी।

    मैं तेरो भोला लला हूँ माता,मुझे कहाँ चुरवन है आत
    बस वही मै सब खाता, तेरे हाथों का माखन है भाता
    ठुनक ठुनक कहते असुरारी,झूठ कहत हैं ग्वालननारी।।

    ये जो ग्वालन हैं,बङी चतुरन हैं,बरबस ही पाछे पङत हैं
    ना जाने क्यू मोहे बैरन हैं,झूठ-मूठ तोसे चुगली करत हैं
    मैं तो सीधा-सा हूँ बनवारी, झूठ कहत हैं ग्वालननारी ।।

    मैया अबतक मौन खङी थी,चुप्पी भी चुभ-सी रही थी कान्हा तू झूठ कहत है,हाथों का माखन भेद खोलत हैं
    जा झूठे नहीं तेरो महतारी,झूठ कहत हैं ग्वालननारी ।।

    अश्रु लोचन में भरीं लायो,
    तेरो पूत मै तू मोरो मात कहायो
    भोर भये क्यू मोहे कानन पठवायो
    मोरे हाथों में छाले पङी आयो
    चुभन मिटाने को माखन लपटायो
    सत्य कहत ,बही आयो वारी, झूठ कहत हैं ग्वालननारी।

    लला का रूदन माँ देख न पायीं,गोद उठा गले से लगायी
    माँ- बेटे का संबंध हो ऐसा ही पावन,
    कान्हा- यशोदा का संबंध हो जैसा मनभावन
    अजब-गजब नित लीला रचते अघहारी
    झूठ कहत हैं ग्वालननारी ।।
    सुमन आर्या

  • कान्हा फ़िर से तूने माखन खाया ……

    ओ कान्हा तूने फ़िर से माखन खाया ,
    तोड़ दी हांडी , सारा माखन भी गिराया…..
    क्यों करता है तू , इतनी कुबद रे
    क्यों करता है तू , इतनी कुबद रे….
    थक जाती हूं मैं , बोल कैसे तू सुधरे……

    मित्र भी तेरे सारे साथ ही आते
    पकड़ में तू आता और वो भाग जाते
    कैसे मैं मारूँ तुझको या कैसे समझायूँ…
    तू ही लाल मेरा , तुझ पर सारा प्यार मैं लुटाऊँ…..
    मान जा रे लल्ला मेरे , अपनी माँ की तू अर्जी ,
    चोरी छिपे न किया कर , अपनी मन मर्ज़ी…..

    देती हूँ तुझको जब मैं , तू वो खा लिया कर
    ऐसे न सारा माखन , तू झूठा ना किया कर ….
    प्रसाद भगवन का हैं हमको बनाना..
    प्रसाद भगवन का हैं हमको लगाना
    जाकर फ़िर है गईयों को चारा चराना…

    तेरी कुबद से मैं तो हार ही जाती हूँ
    मार कर तुझको अपना दिल मैं जलाती हूँ
    खा कसम मेरी , न तू वापिस ऐसे करेगा….
    बनेगा मेरा अच्छा लाल , माखन ऐसे झूठा ना करेगा….

    खाता हूँ मोरी मैया मैं फ़िर से ऐसा करूँगा
    मित्र जो मेरे भूखे , उनका पेट मैं हमेशा भरूँगा….
    भगवन को तुम बड़ी देरी से भोग लगाते…
    और हम बालक बेचारे , भूख से तड़प जाते….

    तुझको ना सताऊंगा , मैं बस चोरी चोरी आऊंगा ,
    सारी गोपियों की हांडी , फोड़ माखन मैं चुराऊँगा…
    कृष्ण नाम मेरा , मैं तो अपनी बंसी बजाऊंगा….
    वासुदेव यशोदा का मैं , नटखट लल्ला कह लाऊंगा….
    वासुदेव यशोदा का मैं , कान्हा कह लाऊंगा………

  • अहिल्या पत्थर बनायी जाती है

    अहिल्या पत्थर बनायी जाती है
    —————******——————
    करनी किसी की भी हो,सतायी नारी जाती है ।
    हवस हो इन्द्र की,अहिल्या पत्थर बनायी जाती है ।।
    युग युगांतर से यही,बस होता आया है
    अहम तुष्टि हो नर की, कलंक नारी पे छाया है
    रूप यौवन,सौम्यता नारी ने ईश्वर से पाया है
    हरहाल में दुश्मन,बनी उसकी ही काया है
    चिथङे उङते सम्मान के,कलंकनी कहलायी ज़ाती है ।
    हवस हो इन्द्र की–
    मान गया,सम्मान गया,अनचाहा जीवन पाया है
    नारी की अस्मिता पर,कैसा संकट छाया है
    अन्तर्मन को भेदती निगाहें,दरिन्दगी का कहर ढाहा है
    भूलता क्यू है वो भी, किसी जननी का जाया है
    बहसी बना वह ,कमी उसमें निकाली जाती है ।
    हवस हो इन्द्र की,अहिल्या पत्थर बनायी जाती है ।।—–
    बस फर्क इतना है तब व अब की नारी की आह में
    हर एक से ठोकर खाती,अहिल्या पङी थी राह में
    गौतम का कोपभाजन बन बैठी,इन्द्र की चाल में
    बनी शीला उद्धार हेतु, राम के इन्तजार में
    दोष किसी की नियत का,दोषी वही ठहरायी जाती है ।
    हवस हो इन्द्र की,अहिल्या पत्थर बनायी जाती है ।।—
    कल नहीं थी,आज भी कहाँ,नारी सुरक्षित रहती है
    चौक-चौराहे पे,अनामिका की आवरू,लुटती रहती है
    दुष्कर्म से पीड़ित,नहीं तो,एसिड से जलती रहती है
    कोख में,तो कभी,दहेज की वेदी पे चढ़ती रहती है
    अत्याचारी है कोई,अंगुली नारी पे उठायी जाती है ।–

  • मेरे घर पर आए चोर

    एक रात की बात बताऊं मित्रों ,
    मेरे घर पर आए चोर ।
    थी मैं अकेली उस दिन घर पर,
    मुझ पर आज़माने लग गए ज़ोर ।
    “पैसे देदो, ज़ेवर देदो”, उनकी मांगों का ना था छोर
    एक ने मुंह बंद किया मेरा,
    दूजे ने पिस्तौल लगाई
    मैने भी फिर तुरंत अपनी थोड़ी अक्ल दौड़ाई,
    ले गई दूजे कमरे में, जहां रौशनी थी नहीं।
    झटका उसका हाथ मैंने ,मुंह पर फ़िर एक चपत लगाई
    दौड़ के खिड़की खोली मैंने, मचा दिया जी भर के शोर,
    मदद करो, सब मदद करो,
    मेरे घर पर आए चोर।
    सारे पड़ोसी भागे लेकर लाठी, डंडे, रस्सी की डोर।
    सिर पर पैर रख कर भागे,
    भागे सरपट देखो चोर ।।

    नोट:– ये कविता मेरे जीवन की सत्य घटना पर आधारित है।

  • प्रियतम को कैसे राखी बांधूँ…!

    आज तुम्हारी फोटो देखी
    जब मैनें स्टेटस पे।
    मेरे चेहरे पर ग्लो आया
    जैसे आता है फोकस से।
    मुझसे राखी बंधवाने की खातिर
    लेकिन जब तुम मेरे घर आये।
    पैरों तले जमीन गई
    आँखों में आँसू भर आए।
    ना जाने क्या हो गया तुम्हें
    शायद सपना है यह मेरा।
    जो तुमनें प्रेम विसर्जन की खातिर
    दरवाजा खटकाया मेरा।
    होश मुझे तो तब आया जब
    भाभी ने चुटकी काटी।
    जल्दी से इनको राखी बाँधो
    हाँथों में पकड़ा दी थाथी।
    मैं चलती कैसे? हिलती कैसे?
    मेरे दिल को कहीं सुकून नहीं।
    उस पल यदि काटे कोई मुझे
    मेरे ज़िस्म में रत्तीभर खूँन नहीं।
    मैं बैठ गई जाने कैसे?
    मुझको कोई भी खबर नहीं।
    ऐसी क्या मुझसे खता हुई
    जो तुमको मेरी कदर नहीं।
    हाँथों में राखी लेकर
    देखा मैंने जब कान्हा को
    क्या तुम लोकलाज की खातिर
    भगिनी बना लेते अपनी राधा को?
    वो कुछ ना बोले जैसे कहते हों
    मुझसे कुछ ना हो पायेगा।
    इस लोकलाज के चक्कर में
    तेरा प्रेम बलि चढ़ जाएगा।
    जिसका हाँथ थामकर
    पूरा जीवन जीने का सपना देखा।
    वो आज कलाई आगे कर
    राखी बंधवाने को तत्पर बैठा।
    मैं कोस रही थी उस क्षण को
    और राखी की कीमत जानी।
    उनका चेहरा देखा जब मैनें
    होंठों पर मुस्कान थी मनमानी।
    वो भी कितना बेबस थे
    उनकी भी मजबूरी थी।
    मैं विकल हुई जाती थी पर
    उनमें बहुत सबूरी थी।
    विपदा थी मुझ पर आन पड़ी
    अपने प्रियतम को कैसे राखी बांधूँ।
    जिसके कारण हो गई सती
    उस हमदम को कैसे त्यागूँ ?
    इसी ऊहापोह में थी तब तक
    आवाज़ लगाई मम्मी ने।
    जल्दी जागो! क्या आज भी सोओगी
    स्नान कर ली है तुम्हारे भैया ने।
    ओ शिट! यह मेरा सपना था
    यह जान कर जान में जान आई।
    राधा-कृष्ण को देख के मैं पगली
    मन्द-मन्द सी मुस्काई।।

  • तू मुझे चाह ले

    तू मुझे चाह ले संवर जाऊं।।
    या कहे टूट कर बिखर जाऊं।।

    रास्ता कौन मेरा तकता है
    लौटकर किसलिए मैं घर जाऊं।।

    तू सफ़र में हो तो ये मुमकिन है
    मैं संग-ए-मील सा गुज़र जाऊं।।

    जो न पूछे तो तेरा ज़िक्र करूं
    कोई पूछे तो मैं मुकर जाऊं।।

    इश्क़ का मर्ज़ लाइलाजी है
    चाहे अमृत पिऊं, ज़हर खाऊं।

  • सफ़र छोड़ना पड़ा

    सौ बार सरे-राह सफ़र छोड़ना पड़ा।।
    मंज़िल पे हर परिन्द को पर छोड़ना पड़ा।।

    पुश्तैनी घर की जब मेरे दहलीज़ गिर पड़ी
    घर को बचाने के लिए घर छोड़ना पड़ा।।

    दहशत के लिए हो रहे हैं हमले चारसू
    हमलों के ही ज़वाब में डर छोड़ना पड़ा।।

    अब तो मिला जो काम वही रास आ गया
    जब बिक नहीं सका तो हुनर छोड़ना पड़ा।।

    इनसान ने डंसने की रवायत संभाल ली
    सांपों को शर्म आयी जहर छोड़ना पड़ा।।

  • तेरी रजधूल ओ प्रियतम!

    तुम्हारी राह देखकर ही तो मैं टूट गई
    हर रिश्ते से ऊपर था तू
    तेरे इश्क में मैं मगरूर हुई
    तेरे इश्क का चंदन घिसकर
    अंग प्रफुल्लित हुए सदा
    तेरी रजधूल ओ प्रियतम! मेरे
    मेरी माँग का सिन्दूर हुई।
    बूंद-बूंद कर मैनें तेरे प्रेम का
    रसपान किया
    तेरे नाम से ही मैनें
    नवजीवन का निर्माण किया।
    तेरी स्मृतियों के आगे मैं तो
    खुद को भी भूल गई।
    फिर क्यों छोड़ा दामन तुमने
    आखिर मुझसे क्या खता हुई?
    तेरे वियोग में ओ प्रियतम!
    यह प्रज्ञा!
    कल पुष्प-सी थी अब शूल हुई।।

  • जीवन की चादर

    जिंदगी में मुकाम और भी हैं
    मंज़िल एक है पर
    रास्ते और भी हैं।
    कितनी छोटी है जीवन की चादर
    पैर पसारने के आसमान
    और भी हैं।
    यूंँ नहीं बढ़ते हैं यहाँ फासले
    दुश्मनी के मैदान
    और भी हैं।
    ये हिन्दुस्तान है यहाँ रिश्ते
    निभाये जाते हैं।
    रकीबों के जहान
    और भी हैं।
    तंज कसना ही नहीं है
    हुनर अपना
    पण्डितों(ज्ञानी) के रुआब
    और भी हैं।

  • नारी का अस्तित्व नहीं…

    कहते हैं नारी पानी-सी होती है
    जिस रिश्ते में बंधती है
    उसी की हो जाती है।
    पर प्रज्ञा की यही वेदना है
    क्या नारी का कोई अस्तित्व नहीं?
    वह पानी-सी है।
    उसका कोई स्वरूप नहीं?
    वह सदियों से पुरुषों की है
    उसकी कोई पहचान नहीं?
    नारी तो जगजननी है
    हर रूप में वन्दनीय है।
    वह हर स्वरूप में सुन्दर है
    उस सम कोई परिपूर्ण नहीं।
    नारी दुर्गा है, जगजननी है,
    जीवन की सुंदर प्रतिमा है।
    पुरुषों के जीवन की आधारशिला
    नारी के कन्धों पर ही अवस्थिति है।

  • मेरे लफ्ज़

    कैसे और किससे करें
    हम जिक्र ए गम,
    लफ़्ज दबे बैठे हैं,
    उनको भी है ये भ्रम।।

    सुनने को कोई उनको
    शायद ही यहां रुकेगा,
    कोई तो सुनके उनको
    फिर से अनसुना करेगा।।

    लफ्ज़ आ रहें जुबां पर,
    कहने दास्तां ए गम
    फिर दुबक रहे दिल में
    कि कोई पढ़ लेे यें आंखे नम।।

    इंतहा मेरे लफ़्ज़ों की
    मेरे गम यूं ना देख,
    देख जख्मी दिल को मेरे
    ये झुठी मुस्कराहट तू ना देख।।

    तोड़कर हर बंदिश को मेरी
    तब लफ्ज़ कहेंगे ये गम,
    दास्तां को यूं बयां करने में
    जब शब्द पड़ने लगेंगे मेरे कम।।

  • मोहलत

    थोड़ी मोहलत मांगता हु रब
    बस एक बार उनका दीदार हो जाए
    फासले जो फैसलों की वजह से थे
    बस उस पर सुलह हो जाए

    यूँ रूठना भी कुछ होता है क्या
    एक बार मुरना तोह बनता है ना यार
    रो तू भी रही थी मैं भी
    एक बार मिलाना तो बनता है ना यार

    ए खुदा बोल तेरी रज़ा है क्या
    इन दूरियों की वजह है क्या
    मांग ता कुछ नहीं तुझसे
    बस इस बेरुखी की खता है क्या

  • कविता कहना छोड़ा क्यों ?

    ओ !! प्रियतम मेरे
    तू ही बता,
    मेरा मन इतना
    विचलित क्यों ?
    मैं सच के पथ से
    विचलित क्यों ?
    जो दर्द उठाता कल तक
    आवाज उठाता था कल तक
    वह दर्द उठाना छोड़ा क्यों ?
    कविता कहना छोड़ा क्यों ?
    संसार की बातों में आकर
    क्यों उल्टी-पुल्टी सोच रखी
    इन आँखों में पर्दा रख कर
    तेरी अच्छाई भूला क्यों ??
    ओ !! प्रियतम मेरे
    तू ही बता,
    मैं सच के पथ से
    विचलित क्यों ?
    ——- डॉ. सतीश पांडेय

  • कहाँ है हमारी संवेदना

    आज हम कहाँ और कहाँ है हमारी संवेदना
    भूल गयें अपनों को,कहाँ कैसी है वेदना ।।
    भूल बैठे उन भावनाओं को
    जब किसी मृत के शव पर लिपटकर रोया करते थे
    देते अंतिम विदाई, सुध देह की खोरा करते थे
    आज हैं ऐसी दूरियां
    मृतक को पहचानने से भी इन्कार है हमें
    मलकर भी ना अपनों का साथ
    ना कफन ना वो चार कंधे, ना मुखाग्नी की रश्म
    ना अंतर्मन को छेदती वो वेदना ।।
    बदल गये सारे दस्तूर
    पीङित को छूना नहीं, रहना दूर
    भरा-पूरा परिवार,पर किसी को पास पाया नहीं
    छटपटाते रहे, आवाज़ लगाते रहे,पर कोई आया नहीं
    थोड़ा-सा अपनापन क्या,अंतिम संस्कार भी भाया नहीं
    ना निड खून,ना रिश्तेदार,दूर तच अपनों की छाया नहीं
    मौत इंसानो से भी पहले इन्सानियत को आई है जिन्दगी जा ही रही,रिश्तो में भी वीरानी छायी है
    संक्रमणमुक्त होगा युग,पर क्या जागृत होगी मानव की चेतना ।।
    सुमन आर्या

  • मत समझना कि नादान कवि हूँ

    मत समझना कि नादान कवि हूँ
    बहकी बहकी सी कविता कहूंगा
    जिस तरफ बह रही हो हवा
    धूल सा उस दिशा को बहूँगा।
    राज दरबार का कवि नहीं हूँ
    आम जनता बातें कहूंगा
    सो न जाए कहीं राज सत्ता,
    उस पे कुम्मर सा चुभता रहूंगा।
    कोई तारीफ़ झूठी नहीं ,
    कोई चुपड़ी सी बातें नहीं,
    जो दिखेगा मुझे सच वही
    अपनी कविता में कहता रहूंगा।
    मत समझना कि नादान कवि हूँ
    बहकी बहकी सी कविता कहूंगा
    जिस तरफ बह रही हो हवा
    धूल सा उस दिशा को बहूँगा।
    —— डॉ. सतीश पांडेय
    शब्दार्थ –
    कुम्मर – यह कुमाउनी का शब्द है जिसका अर्थ घास में मिलने वाला काँटा है। घास काटने वाले के कपड़ों से सरक कर भीतर चला जाता है और यदा कदा चुभता रहता है .

  • लम्बे लम्बे हो गए दिन

    लम्बे- लम्बे हो गए दिन ,
    रात समुन्दर जैसी हैं ,

    तेरे बिन; इश्क के मंजर में,
    हालत बंजर जैसी हैं ।

    किया है तूमने जादू हम पर,
    तेरी आंखों में मदहोशी है,
    कैसे ना बहक जाए हम,
    सुरत जो अप्सरा जैसी हैं ।

    लम्बे लम्बे हो गए दिन,
    रात समुन्दर जैसी हैं……

    —-मोहन सिंह मानुष

  • समय रूपी डोर

    समय पतंग की डोर जैसी l
    मांजा बड़ी तेज है l
    किसकी पतंग काट जाए विश्वास नहीं l
    कभी राजा संग कभी रंक संग l
    पल में तेरा पल में मेरा हो जाए l
    कब खुशियों की पतंग कट जाए l
    कभी दर्द उड़ा ले जाए l
    छोटो की क्या औकात l
    मांजा ऎसी बड़ो- बड़ो को मात दे जाए l
    हरिशचंद्र को सड़क पे लाया l
    वाल्मीकि के हाथों रामायण रचाया l
    इस डोर का क्या कहना l
    मुझे इसी डोर से है, अपनी पतंग उड़ना l
    इसी डोर से है, अपनी पतंग उड़ना ll

    Rajiv Mahali

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